हंगामा है क्यों बरपा " देसवा"और पक्ष-विपक्ष

इंडिया हैबिटेट सेंटर में 'देसवा'के प्रदर्शन के बाद जितनी चर्चा इस फिल्म को लेकर उठी है या सोशल नेटवर्किंग साईट फेसबुक पर जबरदस्त टिप्पणियों (जो व्यक्तिगत हमलों तक पहुँच गयी या ले ली गयी  ) का जो दौर चला है,उसे मैं एक सकारात्मक कदम मानता हूँ | जिसका प्रभाव आगे आने वाली इस तरह की भोजपुरी फिल्मों पर पड़ेगा इसकी थोड़ी उम्मीद की जा सकती है | देसवा को लेकर अविनाश (मोहल्ला लाईव ) और अमितेश के अपने अपने पक्ष रहे और बाद में स्वप्निल जी ने भी चवन्नी पर अपनी राय दी है | 
मेरी बात पहले अमितेश के लिखे से है,फिर स्वप्निल जी के और तब मेरी बात 'देसवा' को लेकर है की क्यों मैं देसवा के पक्ष में हूँ |
अमितेश ने 'देसवा' के पक्ष में नहीं होने के अपने कारण गिनाये हैं और देसवा को एक बेहतर सिनेमा बनते बनते एक औसत सिनेमा रह जाने को लेकर पूरी बात रखते दिखाई देते हैं | जिसपर कईयों ने उनके साथ नूराकुश्ती शुरू कर दी | यह भी दुरुस्त स्थिति नहीं है | हम कोई लक्ष्मण रेखा नहीं खींच सकते कि कौन हमारे सिनेमा के पक्ष में खड़ा  होगा , कौन नहीं या किसे नहीं खड़ा होना चाहिए | अमितेश सिर्फ देसवा को भोजपुरी फिल्म के बदलते चेहरे का अगुआ मानने की मुहिम को नकारते हैं पर उसके प्रयास को सराहते दीखते हैं -"देसवा भोजपुरी फिल्मों के लिए रास्ता बनाना चाहती है इस तर्क के आधार पर इस मुहिम को समर्थन दिया जा सकता है |...आज भी मेरी शुभकामना इसके (देसवा) साथ है |"- ऐसे में उनकी राय को एकदम से विपक्ष में खड़ा भी नहीं मान सकते | दरअसल,'देसवा' विविध मंचों से पिछले कई महीनों से भोजपूरी सिने प्रेमियों के बीच चर्चा में थी,तो ऐसे में कईयों ने इससे कुछ अधिक ही उम्मीद लगा ली थी शायद जहाँ तक नितीन चन्द्र नहीं सोच पाए,मेरे लिहाज़ से उन्हें सोचना भी क्यों चाहिए था उन्हें जो बनाना था उस ओर उनकी लेखनी/निर्देशकीय चली भी है पर किस हद तक वह इफेक्टिव रही है यह आगे पता चलेगा  | वैसे भी कोई  फिल्म कितनी महान है,होनी है या होगी इसका निर्णय तब तक आलोचकों के हाथ में नहीं है जब तक कि वह दर्शक वर्ग के बीच ना जाये | कई बार उसको उसकी मेहनत का सर्टिफिकेट जनता देती है | तो कई बार आलोचक फिल्म के पब्लिक डोमेन में आने के बाद अपनी राय और दृष्टियों से फिल्म को महान या क्लासिक की श्रेणी में रख देता है भले ही दर्शकों के लिहाज़ से वह फिल्म कैसी भी रही हो | यह एक अलग स्थिति है | देसवा को लेकर जो भी टिप्पणियाँ हो रही हैं या हुई हैं,उनमें से कई अराजकता की हद तक की हैं | ऐसे में हमें तय करना होगा कि हम कितने परिपक्व हैं कि अपनी एक सीधी आलोचना भी हमसे बर्दाश्त नहीं होती | बेहतर स्थिति यह होती है कि हम एक तर्क के बरक्स अपना भी एक सॉलिड तर्क से सामने वाले को संतुष्ट करें | वर्ना यह सब कुकुरहांव छोड़कर कुछ और नहीं हो सकेगा | 
स्वप्निल जी ने जो कुछ लिखा है उस पर मन एक पल को स्तब्ध होता है कि क्या हमारी मादरे-जबान कोई पानी पर खींची लकीर है जो कुछेक फ़ालतू फिल्मों और उनमें प्रयुक्त द्विअर्थी संवादों ,गीतों से मोहभंग का शिकार हो जाये ? वह भी तब जब भोजपुरी के वाक्य संरचना में एक बेलौसपन है,जहां भदेस शब्द (मेरा ईशारा भोजपुरिये समझ रहे होंगे ) धड़ल्ले से प्रयोग में आतें हैं और वाक्यों को चुटीला /बात को प्रभावी बनाने के लिए उसमें इस तरह के शब्द प्रयोग चटनी का काम करते हैं | मसलन उन्होंने लिखा है -" जितना ही इस भाषा से प्रेम है उतना ही इस भाषा में बनने वाली फिल्मों से दूरी बनाये रखता हूँ |मुझे डर लगता है कि ये फिल्में अपनी विषयवस्तु की वजह से इस भाषा से मेरा मोहभंग कर सकती है | 'गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो'को छोड़कर कोई भी दूसरी फिल्म मुझपर प्रभाव नहीं छोड़ पाई या बहुत बुरा प्रभाव छोड़ा |" अब इस पूरे स्टेटमेंट में कई पेंच हैं | स्वप्निल जी ने अगर भोजपुरी फिल्मों की सीमा को गंगा मईया...तक ही सीमित कर दिया तो इस लिस्ट में कई नाम हाशिये पर चले गए हैं जो भोजपुरी सिनेमा की मास्टरपीस हैं जैसे-भईया दूज,गंगा किनारे मोरा गाँव,बलम परदेसिया,साँची पिरितिया,लागी नाही छूटे राम,दुल्हा गंगा पार के,गंगा जईसन भौजी हमार,पिया के गाँव,सजनवा बैरी भईले हमार,दंगल इत्यादी तथा कुछ समय पहले आई गंगा जईसन माई हमार और कब अईबू अंगनवा हमार जैसी फिल्में अगर उन्होंने देख लेंगे  तो मेरा दावा है कि उनकी आशंका निर्मूल साबित होगी | भोजपुरी सिनेमा की जड़े 'कचा-कच'छाप (जिस ओर देसवा में  इशारा है ) सिनेमा की नहीं है | यह तो आगे चलकर ऐसा बना और इसका एक बड़ा कारण ८८-९५ के बीच आये इसके विभिन्न अल्बम थे जिन्हें बिजेंदर गिरी ,तपेश्वर चौहान,राधेश्याम रसिया,गुड्डू रंगीला,कलुआ जैसे छुट्भईयों ने बनाया और जिनके मुनाफे के बाज़ार को देखते हुए बाद में फिल्मों में भी अपना लिया गया क्योंकि बाज़ार का अर्थशास्त्र इसको सूट करता था | बावजूद इसके शारदा सिन्हा ,भरत शर्मा'व्यास',मुन्ना सिंह,काफी हद बालेश्वर यादव,आनंद मोहन (सांच कह ब$ जूता खईब$ फेम) और थोडा पीछे जायें तो महेंद्र मिश्र,महेंद्र शास्त्री (सिवान वाले ) और भिखारी ठाकुर के गीत भी भोजपुरी अस्मिता की पहचान रहे | तब ऐसे में पलायन करके या आशंका जता के कि 'कहीं अपनी नैसर्गिक भाषा से मेरा मोहभंग न हो जाये 'की चिंता गैरवाजिब है क्योंकि हमें ही इसके पतन के कारणों की तलाशकर उन्हें या तो दूर करना चाहिए अथवा जो इस कोशिश में लगे हैं उनको सहयोग करना चाहिए | और बावजूद इसके हमारी नज़र यदि 'गंगा मईया तोहे..'से आगे नहीं  जाती तब शक होता है कि भोजपुरी सिनेमा को देखने का अनुभव कितना है | 
'देसवा'को मैंने फेसबुक पर if u missed deswa u missed the changing/new face of bhojpuri cinema,its a honest start,lets join hands लिखा | यह एक त्वरित नहीं बल्कि एक सोची-समझी लिखाई थी | ऐसा नहीं है कि मुझे देसवा से उसके कथ्य,उसके ट्रीटमेंट,डिटेलिंग को लेकर समस्या नहीं रही पर मेरे लिए वाजिब बात यह थी कि काफी समय बाद एक फिल्म  भोजपुरी में आई जो पूरी तरह से भोजपुर ही नहीं बल्कि पूरे बिहार और पूर्वांचल की जमीनी दिक्कतों की पड़ताल करता है | इसके अलावे इस समय में जब भोजपुरी संगीत के मायने 'जब मारे ला बलमुआ त,हचाहच मारेला,सईयाँ फरलके पर फार अ ता, बलमुआ छक्का मार गईल,मिसिर जी तू त बाड़ा बड़ी ठंढा,मार द सटा के लोहा गरम बा '-बन गए हैं ऐसे में देसवा में शारदा सिन्हा ,भरत शर्मा के गाये गीत कितने घटना आधारित मार्मिक और दिल को छू लेने वाले हैं इस पर देसवा के कथानक /ट्रीटमेंट से असहमति रखने वाले भी सहमती जताएंगे और जता रहे हैं | दरअसल देसवा जिस तरह के कलेवर की फिल्म है उस तरह से इसका दर्शक वर्ग तैयार नहीं हुआ है | और यह बात भी उतनी ही सच्ची है कि इंडिया हैबिटेट सेंटर में उपस्थित दर्शक समुदाय भोजपुरी सिनेमा के दर्शक-वर्ग का चेहरा नहीं था ,होगा भी कि नहीं इसको भी स्पष्टतः नहीं कहा जा सकता | भोजपुरी का मध्य वर्ग भोजपुरी सिनेमा नहीं देखता | आगे देसवा अगर ऐसी गुंजाईश पैदा करती दिखती है तो उसका स्वागत होना ही चाहिए | भोजपुरी सिनेमा के पिछले २० सालों के प्रोडक्शन पर गौर फरमाईये ,आप सहज ही अंदाज़ा लगा लेंगे कि मुद्दों पर आधारित कितनी फिल्में बनी हैं ? अंग-प्रदर्शन और अश्लीलता के मुद्दे पर अलग से बिचार और बहस की पर्याप्त गुंजाईश बनती है | देसवा के बनाने वाले ने जिस तन्मयता से फिल्म बनानी चाही अगर वह समीक्षकों की उम्मीदों सरीखा नही बन पाया तो इसके लिए अधिक शोरगुल के जरुरत नहीं हैं | जरुरत इसके अच्छे पक्ष को भी उजागर करने की है | यह पक्ष अभिनय ,संगीत-गीत,गायकों का चयन,कलाकारों का चयन,लोकेशन,इश्यु बेस्ड प्लाट का भी हो सकता है है और इस ओर से देसवा देखें तो मामला बैलेंस हो जाता है | इसलिए अपने तमाम कच्चेपन में भी (जिसे आलोचकों समीक्षकों ने नकारा )यह फिल्म भोजपुरी सिनेमा के लिए एक बड़ा प्लेटफोर्म तैयार कर चुकी है | या तो हम देसवा को चेंजिंग सिनेमा के तौर पर देखें सराहें या पिनाकियों की तरह लम्बी नाक लिए दोष सूंघते फिरे ! 'देसवा'अगर थोड़ी सी ही सही सम्भावना जगाती है तब तो यह अपने आप में वाकई काबिले तारीफ़ है | थोड़े समय के लिए छोडिये कंटेंट,गीत,शब्द चयन,सीन का ट्रीटमेंट आइये सीधे उन सवालों पर जो सिनेमा उठाती है तब शायद देसवा को हम दिल के करीब महसूस करेंगे | इसमें कोई दो-राय नही कि भले ही देसवा बदलते भोजपुरी सिनेमा का अगुआ दस्ता न हो पर एक मजबूत पिलर जरूर बनकर उभरी है | क्योंकि सिनेमा केवल एक चीज़ से नहीं बनती,देसवा भी इसका उदाहरण है इसमें कै शेड्स हैं जो इसे आम फिल्मों से परे एक खास आकार देते हैं | नितीन ने कहा था कि सभी कुछ होगा इस सिनेमा में ,नही होगा तो बस एक वल्गरिटी | और इस वायदे को नितीन ने सईलेंटली दिखा दिया है | देसवा इसी वजह से देखना चाहिए | और कहानी लिखने से परे उसे उसके रिलीज़ होने का इंतज़ार करें |अभी के लिए तो 'देसवा'सही राह पर है और मशाल लेकर उस राह पर है,जहां से कुछेक उत्साही साथी आगे आयेंगे और भोजपुरी सिनेमा बदल जायेगा पूरी तरह से | देसवा को कमतर आंकना भूल है और बॉक्स आफिस इसे प्रभावित नही करेगा | कैसे एक सिनेमा अपने तमाम कमियों के बावजूद 'कल्ट'बनती जाती है ,देसवा उसका उत्कृष्ट उदाहरण है | जहां धड़ल्ले से वाहियात फिल्में आ रही हो और भोजपुरी सिनेमा के रूप को अरूप कर रही है ,वैसे में नितीन चन्द्र की यह फिल्म अपनी तमाम सीमाओं के 
के बावजूद एक संभावना जगाती है तब  तक रिलीज़ होने से पहले इसपर हल्ला मचाना पक्ष या विपक्ष में उचित नहीं होगा | 

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