3/30/10

मैथिली मेरी माँ और भोजपुरी मौसी है-पद्मश्री प्रो.शारदा सिन्हा.





शारदा सिन्हा ना केवल बिहार बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और विश्व भर में जहां कहीं भी हमारे गिरमिटिया पूरबिया कौम है उनके लिए एक पारिवारिक सदस्य सरीखा नाम है.शारदा सिन्हा नाम सुनो तो लगता है अड़ोस-पड़ोस की बुआ,ताई,या मौसी है.ये मैं नहीं कह रहा बल्कि उन अनेक सज्जनों ,छात्रों से सुन चुका हूँ जो भोजपुरी से परिचित हैं और जिनके लिए भाषा का प्रश्न उनकी अपनी संस्कृति से गुजरना होता है चाहे वह इस दुनिया के किसी भी छोर पे हों.पटना से बैदा बोलाई द हो नजरा गईले गुईयाँ/निमिया के डाढी मैया/पनिया के जहाज़ से पलटनिया बनी आईह पिया इत्यादि कुछ ऐसे अमर गीत हैं जिन्होंने शारदा जी के गले से निकल कर अमरता को पा लिया.कला सुदूर दरभंगा में भी हो तो पारखियों के नज़र से नहीं बच पाती,राजश्री प्रोडक्शन वालों ने जब अपनी सुपरहिट फिल्म 'मैंने प्यार किया'के एक गीत जो की लोकधुन आधारित था को गवाना चाहा तो मुम्बई से हजारों किलोमीटर बैठी शारदा जी ही याद आई.इस फिल्म के अकेले इस गीत'कहे तोसे सजना तोहरी सजनिया'के लिए दसियों बार देखी गयी थी.
मेरे पिताजी जो भोजपुरी फिल्मों के(८०-९०के दशक की फिल्में)तथा भोजपुरी लोककलाओं के बड़े रसिक हैं एक बार छत के गीत 'केरवा जे फरेला घवध से ओईपर सुगा मेड़राये/पटना के पक्की सड़किया/कांचही बांस के बहंगिया बहंगी लचकत जाये...आदि सुनते हुए बोले-"शारदा सिन्हा के आवाज़ में हमनी के परिवार के मेहरारू लोगिन के आवाज़ लागेला"-उनके कहने का तात्पर्य था-'शारदा सिन्हा की आवाज़ में भोजपुरिया पुरखों की आवाज़ गूंजती है.
पिछले २८ मार्च को प्रगति मैदान नयी दिल्ली के हंसध्वनी थियेटर के मंच से मैथिली-भोजपुरी अकादमी के सौजन्य से इस अज़ीम शख्सियत से रूबरू होने का मौका मिला.यहाँ पर उन्होंने गायन से पहले अपने संबोधन में कहा-मैं पैदा मिथिला में हुई.मैथिली मेरी माँ है और भोजपुरी मेरी मौसी.वो कहते हैं ना कि'मारे माई,जियावे मौसी' यानी इन दोनों भाषाओँ की सांस्कृतिक दूत की सच्ची अधिकारी की इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि शारदा सिन्हा जी को कोई भी भोजपुरिया ये नहीं कह सकता कि वह उनकी अपनी नहीं है.उनके सुनते हुए आज भी वही कसक वही ठसक वही खांटी घरेलूपन उतनी ही गहराई से बरकरार है. भारत सरकार से शारदा सिन्हा जी को 'पद्मश्री'देकर सम्मानित किया है.इतना ही नहीं प्रो.शारदा जी मिथिला यूनिवर्सिटी के संगीत विभाग में भी हैं.मैंने पहली बार शारदा जी को सुना/देखा अहसास नहीं हुआ कि वाकई यही शारदा जी हैं जो पूरे भोजपुरियों कि खास अपनी ही हैं.हालाँकि मैथिली गीतों में भी इनकी पर्याप्त ख्याति है पर शायद संख्या अधिक होने की वजह से इन्होने भोजपुरिया समाज के विशाल परिवार में अपनी जबरदस्त पैठ बनायीं है.मैं सोचता हूँ आखिर कोई कैसे इतना अपना हो सकता है कि ना मिले हुआ भी घरेलु हो और जिनके बिना एक संस्कार पूरा ना हो,यह तो कोई मिथकीय चरित्र ही है जो बरबस ही हमारी गोदी में आ गिरा.शारदा सिन्हा जी भोजपुरी गीत संगीत की उस परंपरा की ध्वजवाहक हैं जो भड़ैतीपने से दूर लोक की ठेठ गंवई अभिव्यक्ति है.सच ही तो है -'पद्मश्री प्रो.शारदा सिन्हा जी की आवाज़ सच्चे अर्थों में हमारे पुरखों (यहाँ मैं साफ़ कर दूं कि पुरखों से तात्पर्य भोजपुरियो-मैथिलियों की नारियां)की आवाज़ है.हम खुशनसीब हैं कि शारदा जी हमारी मिटटी में पैदा हुईं'-

भोजपुरी की 'मदर इंडिया'-"धरती मईया".......


'जाके ससुरारिया गरब जन करिह
सबके बिठा के पलक कोठे रखिह
बड़के आदर दिहा छोट के सनेहवा
इहे बा सकल जिनगी के हो सनेसवा
दुनु कुल के इजत रखिह
बोलिहा जन तींत बोलिया..'
पैदा होते ही परंपरा से भर दिए गए इसी भाव-बोध के साथ एक लड़की,उसी तरह विदा होकर मायके से ससुराल आती है.और सारी उम्र अपने उस नए घर को सँवारने में अपनी जिंदगी की सार्थकता मान लेती है.'धरती मईया'इसी भावबोध की कहानी है.एक स्त्री के उच्चतम आदर्शों की छवि की कहानी.कमाल की बात है कि मेनस्ट्रीम फ़िल्मी फ्रेम के भीतर यह आदर्श उभरता है.ब्रजकिशोर,कुनाल,पद्मा खन्ना,श्रीगोपाल अभिनीत और कमर नार्वी निर्देशित भोजपुरी फिल्म 'धरती मईया'(१९८१)अपने दौर की सफलतम फिल्मों में से एक है.अपने पति को दिए वचन के अनुसार ताउम्र उसको निभाने में नायिका(पद्मा खन्ना)का जीवन संघर्ष अंततः जीतकर सुखान्तकी रचता है.उपरी तौर पर कहें तो अपनी सीमाओं के साथ यह फिल्म भोजपुरी की मदर इंडिया है पर दुखांतक नहीं.वैसे भी जिस तरह से हालीवुड की फिल्मों का प्रभाव हमारी हिंदी फिल्मों में रहता है उसी तरह क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों पर भी हिंदी फिल्मों का प्रभाव बेहद होता है.ऐसा होना स्वाभाविक भी है.
'धरती मईया'की कहानी और उसमें वर्णित समाज-व्यवस्था भले ही सामंती ढाँचे और सोच में ढली रही हो,परन्तु उससे टकराने तथा उसमें अपने होने के अर्थ को तलाशकर उस ढाँचे को तोड़ने की तत्परता भी इसमें है.मंगल(राकेश पाण्डेय)एक विधुर किसान हैवह अपने लड़के राम की अच्छी परवरिश की खातिर दूसरी शादी कौशल्या(पद्मा खन्ना)से करता है.सुहाग की सेज पर वह अपनी पत्नी से वचन लेता है कि वह राम की सगी माँ बन जाये और इस वचन से आबद्ध हो कौशल्या उस बिन माँ के बच्चे की माँ बन जाती है.इसी गाँव में लाला /महाजन भी है,जो गरीब किसानों को क़र्ज़ देकर न केवल अपनी जमीन कौड़ियों के मोल हथिया लेता है बल्कि उन्हें बंधुआ मजदूर भी बनके अपनी गिरफ्त में ले लेता है.जब नायक मंगल पर उसकी दाल नहीं गलती तब वह उसे मरवा देता है और जिस नयी-नवेली औरत के पाँव की महावर भी अभी नहीं छूटी वह एक बच्चे को गोद तथा दुसरे को गर्भ में धारण किये जीवन संघर्ष के रण में उतर जाती है.'धरती मईया,यहीं से रफ़्तार पकडती है.
लाला नायिका के दोनों बैलों को मरवा देता है.किसान के बैल उसके जवान बेटों की तरह होते हैं जिनके कन्धों पर वह जिंदगी का जुवा रखकर खेती करता है और अपने लाल पसीने से उसे सींचता है.बैलों के मरने पर भी नायिका का हौसला नहीं मरता,वह जुवे को अपने कन्धों पर उठती है और अपने दोनों बच्चों की परवरिश करती है और इतना ही नहीं अपनी एकमात्र ननद की शादी भी कराती है.वह कहती है-'हम तहार भउजी ना हईं,अब तू हमरा के आपन भईया समझिह.'-ननद नायिका के पैरों में झुक जाती है कहती है-'हम अपना माई के नईखीं देखले तू जाउन कईलू उ ता आपनो माई ना करीत'-यहीं से नायिका का चरित्र और उदात्त रूप धर लेता है और नायिका का चरित्र सबको भरने वाली माई के तौर पर उभर के सामने आता है.अंततः दुःख के दिन बीतते हैं और दोनों बेटे युवा होतें हैं.नायिका को अपना संघर्ष समाप्त होता दीखता है परन्तु सौतेले बड़े भाई के प्रति माँ का विशेष राग देखकर लखन(कुणाल)लाला के बहकावे में आकर बंटवारा करवाता है परन्तु लाला की असलियत सबके सामने खुल जाती है कि मंगल(नायिका का पति)को उसीने मरवाया था.गाँव का एक बैल लाला को अपनी सींगो से मार-मारकर मौत देकर 'पोएटिक जस्टिस'की पुष्टि कर देता है और एक बेहतरीन बनी फिल्म अपनी पूर्णता को पाती है.
धरती मईया का उत्तरार्द्ध तमाम फ़िल्मी फार्मूलों से बंधा होने के बावजूद कुछ जमीनी समस्याओं की पड़ताल करता है और उसका निदान भी सुझाता है.किसानों का,समस्या और बैलों की एक जोड़ी से अन्योनन्यास्र्य संबंद्ध हमेशा से रहा है चाहे वह कृषक भारत के किसी भी प्रांत का हो.नायक ने अपनी माँ के कन्धों पर जुवा देखा है ऐसे में उसके लिए व्याह प्राथमिकता में नहीं वरन ड्योढ़ी पर एक जोड़ी बैल हैं-'माथा पर मऊर बान्हला से जियादे जरुरी बा दुआरी पर बैल बान्हल'-साथ ही,'धरती मईया'समाज में व्याप्त शराबखोरी,बाल-विवाह,विधवा विवाह आदि मुद्दों से भी दो-दो हाथ करती है.शांति बाल विधवा है और मनहूस के नाम से पूरे मोहल्ले में कुख्यात है.पर वह राम की बाल-सखी भी है,जिसके साथ राम ने कभी घरौंदे बनाये थे जीवन के मीठे ख्वाब बुने थे,.वह उसका हाथ थामता है और वह उसे स्वीकारता है और शांति की इस दशा के लिए रुढियों को को दोष देता है.'तहार कवनो दोस नईखे शांति.कसूर बा त इ प्रथा के बा जेकरा चलते तहार बचपने में बियाह हो गईल'-वह उसे तमाम विरोधों के बाद भी स्वीकारता है,इसमें उसकी माँ उसका साथ देती है.नायक के इस कदम से घर में बंटवारे की स्थिति आ जाती है और जब घर फूटते हैं तो गंवार लूटते हैं की लोक-कहावत साफ़ उभरकर सामने आ जाती है.इसी प्रसंग में लखन(कुणाल)ताड़ीखाने में ताड़ी पीने की वजह से पूरे समाज की नजरों में गिर जाता है.आज भी हमारे ग्राम्य-समाजों में शराब पीने वालोए को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता.
भारतीय ग्रामीण समाज सदा से ही विविध समस्याओं बाढ़,सूखा,महाजनी-सामंती फांस आदि का शिकार रहा है.अन्न उपजाने वाला खुद दो जून की रोटी को तरसता है,ऐसे समाज के लोगों द्वारा इस अभाव में भी भाव पैदा करने वाले कारणों की खोज कर ली जाती है और यह सांझ को चौपालों पर होते कीर्तनों में दीखता भिया है यानी 'हारे को हरिनाम'.फिल्म में 'संतोषी मईया' का दैवीय चरित्र ऐसी स्थिति में इन गरीबों को आत्मबल देता है क्योंकि यह मईया'गरीबों के 'कम खाओ ग़म खाओ'की मूर्तिरुपा है.इसलिए 'धरती मईया'में संतोषी मईया को केन्द्रित करके एक गीत डाला गया है,जो नायिका के विपरीत परिस्थितियों में दर्शकों तक को संतोष देता है भगवन सब ठीक करेगा एक दिन.अनपढ़ जनता इसी भुलावे में तो जीती रही है आजतक.बहरहाल,यह गीत संभवतः तबकी जबरदस्त हिट फिल्म 'जय संतोषी मईया'की सफलता से प्रेरित होकर डाली गयी होगी ऐसा कहना गैर मुनासिब नहीं होगा.
'धरती मईया'में भोजपुरी लोक कहावतें भी बहुतायत में हैं जो संवादों को और अधिक असरदार बनाती हैं मसलन-'ना नव मन तेल होई ना राधा नचिहें/जल्दी के बियाह कनपटी में सेनुर/गोदी में लईका नगर में ढिंढोरा/रसरी जर गईल बाकी अईठल ना गईल/मीठ सम्बन्ध से दुश्मनी ख़तम हो जाला-इत्यादि कुछेक ऐसी कहावतें हैं जो भिओज्पुरिया जनजीवन के दैनंदिन वार्तालाप में चटनी का काम करती है.१९८० के शुरूआती वर्षों से लगभग १९८६-८७ तक भोजपुरी फिल्मों का एक बेहतरीन दौर है.इन फिमों की पृष्ठभूमि और ट्रीटमेंट खालिस औडिएंस को ध्यान में रखकर बनायीं जाती थी यही कारण है कि फिल्मों में आज भी भोजपुरिया जनता नोस्टाल्जिया में चली जाती है.'धरती मईया'उसी कड़ी की गोल्डेन जुबली मना चुकी एक भोजपुरी क्लासिक है.भारतीय फिल्मों का दर्शक वर्ग गीत-संगीत के बिना फिल्म की कल्पना नहीं करता,यह उनके भीतर तक पैठा हुआ है.ग्रामीण समाज में भिन्न-भिन्न त्योहारों,फसलों,मौसमों,संस्कारों,आयोजनों आदि के गीत गाये जाते रहे हैं और जनता की इसी चित्तवृति को इन फिल्मों ने पकड़ा.'धरती मईया'इस एंगल से भी मजबूत फिल्म है,लक्ष्मण शाहाबादी के गीत और चित्रगुप्त के खांटी पूर्वी संगीत की जुगलबंदी ने बॉक्स-ऑफिस पर तहलका मचा दिया-'जल्दी जल्दी चल$ रे कहारा,सुरुज डूबे रे नदिया/ फूट जाई हमरी गगरिया ना/पूजिंले ले चरण तोहार ऐ संतोषी मईया/आपण सुख के सुख ना बूझे,सबके दुःख अपनावे,हमार धरती मईया/केहू लुटेरा केहू चोर हो जाला आवेला जवानी बड़ा शोर हो जाला/ना जा ना जा ना कर लरिकैया बलम/जाने कईसन जादू कईलू मंतर दिहलू मार/हाथवा में मेहँदी,पांवे महाबर,मथवा टिकुलिया सजा द$बलमू '-जैसे गीत आज भी भोजपुरी की शक्ल बिगाड़ते भौंडे और अश्लील गीतों की बहुतायत के बीच बड़े चाव और गर्व से सुने-सुनाये जाते हैं.कोई गीत कितनी खूबसूरती से स्त्री देह की मांसलता और सौंदर्य को,सौन्दर्य के खांचे में ही रखकर फिल्माया जा सकता है,यह'फूट जाई हमरी गगरिया ना$भउजी दिहें हमरा के गरिया ना'-गीत में नायिका के नाभि-दर्शना साड़ी, भींगे आँचल और नायिका के (हिंसक) नृत्य के बावजूद कुशल निर्देशकीय का ही कमाल है जो यह गाना अश्लील होने से बच जाता है,जिसकी पूरी सम्भावना थी.वरना थोड़ी सी चूक से यह गाना अश्लील हो सकता था.'धरती मईया' इसी बारीकी से बुनी और रची गयी फिल्म है यही वजह है कि आज भी यह फिल्म न केवल अपने कथ्य में बल्कि प्रयोग में भी पुरानी मालूम नहीं पड़ती.यह आज भी भोजपुरी समाज की तस्वीर लेकर सामने आती है,जिसमें भोजपुरी के अपने संस्कार हैं,जो आजकल की भोजपुरी फिल्मों से नदारद होता जा रहा है.
हामरे देहातों में आज भी 'न्यूक्लियर फैमिली'का कांसेप्ट पूर्णतया स्वीकार्य नही है.'धरती मईया'जैसी फिल्में इसी आदर्श स्थिति की भूमिका रचती हैं.वर्तमान की भोजपुरी फिल्मों से वह सहजता तथा जमीनी जुड़ाव गायब है.आज जरुरत है थोड़ा-सा ज़मीनी समस्याओं और यथार्थ से जुड़ने की,वरना जितनी तेज़ी से आज का भोजपुरी फिल्म जगत उभरा है,उसे बुझने में देर नहीं नहीं लगेगी.'धरती मईया'यूँ ही नहीं क्लासिक की परंपरा में आई है,आखिर आज की किस भोजपुरी सिनेमा में बच्चे 'ओका बोका तीन तडोका' खेलते हैं?यह लोकरंग गायब हो चला है और भोजपुरी फिल्में इस समाज और उसके सांस्कृतिक परिवेश से कटती जा रही हैं,मेरे जैसा सिनेड़ी भी भोजपुरी की नयी फिल्मों से डरने लगा है पर उम्मीद की लौ अभी भी जल रही है.
(जस्ट इंडिया (मासिक पत्रिका)के अप्रैल अंक में प्रकाशित)

3/26/10

भोजपुरी की पहली फिल्म-गंगा मईया तोहे पियरी चढईबो


'गंगा मईया तोहे पियरी चढईबो'को भोजपुरी की पहली फिल्म होने का गौरव प्राप्त हैi इस फिल्म के निर्माता विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी तथा निर्देशक कुंदन कुमार थे.साथ ही,संगीत का जिम्मा चित्रगुप्त का था और फिल्म के गीतों को लता मंगेशकर,सुमन कल्याणपुर,मो.रफ़ी,उषा मंगेशकर ने स्वर दिया था.यह बहुत संभव है कि किसी क्षेत्रीय ज़बान की पहली फिल्म को शायद ही वह सफलता नसीब हुई हो,जो भोजपुरी की;गंगा मईया...'के हिस्से आई.नए-नए आज़ाद देश की तत्कालीन समस्याओं को एक बेहतरीन कथानक तथा उम्दा गीत-संगीत में पिरोकर सेल्युलाईड पर उतारा गया था,यही वज़ह रही कि यह फिल्म भोजपुरी की एक उत्कृष्ट क्लासिक का दर्ज़ा पा सकी.
दर्शकों के हिस्से दो मापदंड होते हैं,एक कहानी के कारण कोई फिल्म अच्छी लगती है तो दूसरे अपनी कलात्मकता की वज़ह से उनके मन को भाती है.यद्यपि कलात्मकता के मूल में भी कहानी ही होती है.सारा क्रिया-व्यापार कहानी-कलात्मकता-सम्प्रेषण के सामंजस्य की मांग करता है.इसी का मेल फिल्म को जीवंत और उत्तम बनता है.'गंगा मईया...'की शुरुआत ही जमींदार (तिवारी)द्वारा एक किसान की बटाई ज़मीन वापस ले लिए जाने से होती है-'सरकार त अइसन कानून बनवले ह कि जेकर जोत रही खेत ओकर हो जाई'-यह फिल्म आज़ादी के बाद के नेहरूवियन समाजवाद का माडल तथा तत्कालीन राजनीतिक-सामाजिक दर्शन की झांकी लिए है.फिल्म का नायक(असीम कुमार)एक शिक्षित आदर्शवादी युवक की भूमिका में है,जो अपने ज़मींदार पिता के उलट समता की बात करता है.वह शहर में ऊँचे दर्जे तक पढने के बावजूद गाँव में ही रहकर खेती करना चाहता है क्योंकि उसका मानना है कि पढ़े-लिखे लोग अधिक वैज्ञानिक ढंग से खेती कर सकते हैं,पर उसके पिता का कहना है कि-'कागज़ पर हल ना चलेला'-नायिका (कुमकुम)को इस बात का मलाल है कि वह अनपढ़ है,वरना अपनी प्रेमपाती खुद ही लिखती.नए रंग-ढंग और पुराने कुरीतियों के बीच की बहस को इस फिल्म में इतनी सावधानी से पिरोया गया है कि वह कहीं से भी ठूंसी नहीं लगती.
'गंगा मईया...'की मूल कथा के बीच प्रकरी की तरह एक दृश्य है-गाँव के स्कूल के लिए चंदा इकठ्ठा करने को बैठी पंचायत का क्योकि स्कूल में बच्चों की संख्या में इजाफा हो गया है और मूलभूत सुविधाएं उस अनुपात में नहीं हैं.यह अकेला दृश्य काफी देर तक हमारे दिलो-दिमाग पर छाया रहता है.एक ग्रामीण का तर्क है कि लड़कियों का नाम स्कूल से हटा दिया जाये क्योंकि 'लड़की सभे के पढ़े-लिखे के का जरुरत बा?-नायिका का पिता(नजीर हुसैन)खुद ही अनपढ़ होने का दंश झेल रहा है,वह विरोध जताते हुए कहता है कि मर्दों के काम के लिए बाहर चले जाने पर-'हमनी यहाँ के औरत चिट्ठी-पत्री तार अईला पर तीन किलोमीटर टेशन जाली पढ़वावे बड़े.लड़की कुल पढिहें त इ नौबत काहे आई?-यह ग्रामीण समाज भी अभावों को झेलने को अभिशप्त है.अतः एक प्रश्न और उठता है कि स्कूल आदि की सुविधाओं को देखने का काम तो सरकार का है,तब पंचों का जवाब है-'सरकार स्कूल के रूपया-पईसा देले पर उ पूरा ना पड़ेला,फेर सात लाख गाँव बा इ देश में तब सरकार एतना जल्दी कईसे सब कोई तक पहुंची?तब हमनी के ऐ तरफ से भी सोचे के बा.-यानी नए स्वाधीन देश में सहकारिता और सामूहिक प्रयास से उन्नति का प्रयास.नेहरु के सन्देश की पैरवी.
असीम कुमार अपने पिता की दहेज़ के लालच को धिक्कारता है-'आज हमार एगो बहिन रहित त एतना दहेज़ के बात पर रउआ पर का बितीत'-'ऐ देश में हमार अईसन केतना भाई बहिन बाड़े जे तिलक-दहेज़ के समस्यासे त्रस्त बाड़े'-यहाँ पर नायक का चरित्र एक प्रगतिशील आदर्शवादी युवक के तौर पर उभरता है परन्तु इतने ऊँचे मूल्यों की बात करने वाले नायक की तमाम आदर्शवादिता पंचों के आगे यह हिम्मत नहीं कर पाती कि वह नायिका से अपने रिश्तों को स्वीकार सके और गरीबी तथा क़र्ज़ के बोझ तले दबा लड़की का पिता अपनी जवान बिटिया की शादी उसके उम्र से दोगुने उम्र के पुरुष से करने को मजबूर होता है.बेमेल विवाह के परिणामतः नायिका असमय विधवा हो जाती है.नायिका की माँ(लीला मिश्र)इसी दुःख से चल बसती है.'गंगा मईया...'बरबस ही प्रेमचंद के 'गोदान'की याद दिलाता है ना केवल कथानक के प्रवाह में बल्कि दृश्यों तक में.नज़र हुसैन अँधेरी कोठरी में बैठा है और गाँव की महिलाएं सनझा रोशन कर रही हैं और नजीर के घर कोई औरत नहीं जो सांझ का दिया जलाये,बिन घरनी घर भूत का डेरा स्वतः ही सामने आ जाता है.मरद का साठे पे पाठा होना हो अथवा ज़मींदार,महाजन,क़र्ज़.किसान,जाति-भेद,बेमेल विवाह की समस्या जितनी गोदान के लिखते वक्त थीं उससे रत्ती भर भी कम नए आज़ाद भारत में नहीं था.आदर्श और यथार्थ का गहरे तक गूंथा हुआ कथानक फिल्म को ऊँचा उठा देता है.
यह फिल्म ढहते हुए सामन्तवाद का भी चेहरा सामने लाती है.नजीर हुसैन ताड़ीखाने में ताड़ी पी रहा है,यह ऐसी जगह है जहां जात नहीं पैसा अहमियत रखता है.वह ताड़ी के प्याले में ऊँगली डालकर कहता है-'ताड़ी के लबनी केतना गहिर बा?हमार खेतवा,बरिया,घरवा सब एही में डूब गईल...पईसा ही सबसे बड़का बाबु साहेब ह'-इधर अपनी किस्मत की मारी नायिका तवायफ के कोठे पर जा पहुँचती है और उधर अपनी खुद्दारी पर पिता द्वारा हमला होते देख नायक भी अवसाद में घर छोड़ देता है.तवायफ के हिस्से दो बेहतरीन संवाद हैं-'वेश्या के जनम देला तहरा नियन बाप,भाई और समाज-'और -'मरद के बड़ से बड़ गलती इ दुनिया माफ़ कर देला लेकिन औरत के एक गलती भी ना'-
'गंगा मईया..'के गीत भी उत्कृष्ट भोजपुरी कविताई का नमूना है.'हे गंगा मईया तोहे पियरी चढईबो,सईयाँ से कर द मिलनवा,हम त खेलत रहनी अम्मा जी के गोदिया,काहे बंसुरिया बजावल s ,मारे करेजवा में पीर,लुक-छिप बदरा में चमके जैसे चंदा,मोरा मुख दमके '-आदि गीत आज भी झूमने को मजबूर कर देते हैं.
वर्तमान की भोजपुरी फिल्में भाषा की काकटेल दे रही हैं,उसके उलट 'गंगा मईया...'की भाषा ठेठ भोजपुरी की होने के बावजूद चरित्र प्रधान है और फिल्म देखते हुए एकाएक लगता है गोया अपने ही गाँव की कहानी देख रहे हैं.बाज़ार का दबाव हमेशा से रहा है और रहेगा पर तब के लोग जो फिल्में बनाते थे,उसके जीवन-मूल्यों की महता को बरक़रार रखते थे.वर्तमान की भोजपुरी फिल्मों से वह अपनापन गायब होता जा रहा है और क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों के पतन का एक बड़ा कारण उनका अपने परिवेश-बोध से दूर होते जाना रहा है.सिनेमा की रचना-प्रक्रिया एक डिसिप्लिन की मांग करती है,जिसमें कहानी कहने का प्रयास भर ना हो बल्कि उस कहानी को उत्कृष्ट गीत-संगीत,अभिनय,सम्पादन,सिनेमेटोग्राफी तथा कुशल निर्देशन से उस कहानी को उसकी तात्कालिकता तथा परिवेश के साथ मिलाकर रचनात्मकता के साथ सामने लाना है.एक उम्दा फिल्म हवा-हवाई या रातों-रात तैयार नहीं होती.'गंगा मईया तोहे...'एक ऐसी ही फिल्म है जो तमाम विसंगतियों को साथ लेकर एक सुखान्त प्रेमकथा की भाव -भूमि रचती है और इसी नींव पर आज के भोजपुरी फिल्म जगत की ईमारत कड़ी है,अच्छी या बुरी यह तो समय तय करेगा पर इतना तो है कि'गंगा मईया...'जैसी फिल्म से किसी भाषा की फिल्मों की शुरुआत होना,क्रिकेट के खेल में पारी की पहली ही गेंद पर छक्का लगाने जैसा है,पर एक बात है ध्यान देने की है कि 'गंगा मईया...'की ईमानदारी आज की भोजपुरी फिल्मों से गायब होती जा रही है.

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...