11/5/13

“Beyond Borders people and perception “ दसवाँ सत्यवती मेमोरियल लेक्चर (जाहिदा हिना)

( पिछले कुछ महीनों से मीडिया द्वारा कश्मीर में बार-बार बोर्डर पर गोलीबारी, क्रोस बोर्डर आतंकवाद की खबरें  आ रही हैं, इधर देश के भीतर आगामी चुनावों को लेकर जिस तरह का माहौल एक सोची-समझी रणनीति के तहत रच दिया गया है, वैसे में एक अजीबोगरीब घुटन का वातावरण आस-पास आकार लेने लगा है. इस तरह के हालात में मुझे यह जायज़ लगा कि लगभग एक वर्ष पहले मेरे कॉलेज में पाकिस्तान की ख्यात लेखिका जाहिदा हिना का दिया सत्यवती मेमोरियल व्याख्यान beyond borders, people and perception आपसे शेयर किया जाये, हमें आइना दिखाता यह व्याख्यान यहाँ प्रस्तुत है कि हम जा कहाँ रहे हैं, हम हो क्या गए हैं.- मोडरेटर) 


माननीय उप-कुलपति दिल्ली विश्वविद्यालय प्रो.विवेक सुनेजा, प्रो.अपूर्वानंद, शिबा सी.पांडा, डॉ.अजीत झा, डॉ.सतेन्द्र कुमार जोशी, डॉ.देवेन्द्र प्रकाश, डॉ.साधना आर्या, मैं आप सब लोगों का बेहद शुक्रिया अदा करती हूँ कि आपने मुझे दिल्ली के इस मशहूर कॉलेज में आने की दावत दी और ‘Beyond borders people and perception’ जैसे अहम मुद्दे पर बात करने का मौका दिया | मैं हॉल में बैठे हुए तमाम फैकल्टी मेम्बर्स, तमाम स्टूडेंट्स एवं दूसरे मेहमानों की भी शुक्रगुजार हूँ |

ये मेरे लिए बहुत इज्ज़त की बात है कि मैं ‘फ्रीडम मूवमेंट’ की एक आदर्शवादी महिला के नाम पर बने हुए ‘एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन’ में आप लोगों के बीच मौजूद हूँ और अपने दिल की बात आपसे कह रही हूँ |

अब से चंद दिनों पहले जब मुझे आपके कॉलेज की मेमोरियल लेक्चर कमिटी की तरफ से ‘१०वें सत्यवती मेमोरियल लेक्चर’ की दावत मिली और ये कहा गया कि मैं ‘Beyond borders people and perception’ पर बात करूँ तो मैं ये सोचती रही कि शब्द.....हवा, चाँदनी, धूप, पक्षी, पखेरू और दरिया की लहरों जैसे होते हैं,जो तमाम सरहदों और हदों को, सारी सीमाओं को किसी मुश्किल, किसी अड़चन, किसी पासपोर्ट, किसी वीजा के बिना पार कर जाते हैं | अगर मेरी सोच शब्दों में ढलकर सीमाओं को पार न करती, तो ये कैसे मुमकिन था कि आज मैं यहाँ आपके सामने अपनी बात करने के लिए मौजूद होती |

मैं आज इस मेमोरियल लेक्चर के शुरू में बहन सत्यवती को याद करुँगी, जिन्होंने सिर्फ 38 वर्ष  की उम्र पाई और जो हमारी freedom movement(स्वतंत्रता संग्राम) का एक चमकता हुआ सितारा हैं |
उन्होंने जिस जीवटपन और बहादुरी से अपना चैन, आराम, अपनी घर-गृहस्थी, अपने बच्चों की मोहब्बत भरी और शरारतों से भरा उनका बचपन freedom movement(स्वतंत्रता संग्राम) पर, quit india movement (भारत छोड़ो आंदोलन) पर कुर्बान कर दिया और अपनी तमाम खुशियाँ तज दीं | इसके लिए हम उन्हें जितने सलाम करें, वो कम है | हमारे घरों की दूसरी माँओं की तरह उन्होंने कितनी मर्तबा अपने बच्चों को अपने हाथों से पूरी खिलाई होगी लेकिन फिर इन्हीं हाथों से उन्होंने लाहौर जेल पर तिरंगा लहराया | उनको सलाम करते हुए मुझे अपनी एक कहानी ‘तितलियाँ ढूँढने वाली’ याद आई, जिसमें एक आदर्शवादी माँ अपने वतन के तमाम बच्चों के लिए आज़ादी की तमाम तितलियाँ ढूँढते हुए लाहौर जेल में फाँसी चढ़ गई थी | मेरी ये कहानी आज़ादी मिलने के बाद की है, जब पाकिस्तान में dictatorship(तानाशाही) के ज़माने में सियासी जद्दोजहद से जुड़ी हुई एक औरत ने माँ होने के बावजूद मौत का इंतखाब किया था |

हम जब सीमाओं की बात करते हैं, तो ये बात याद आती है कि आज़ादी के जोश ने औरत और मर्द के बीच Gender differences(लिंग भेद) के बीच की सीमाएँ मिटा दी थी | जेल जाने और लाठियाँ खाने के लिए, जान से गुज़र जाने के लिए सब एक थे | वो मर्द हों या औरतें, स्टूडेंट्स हों या घर-गृहस्थिनें सबके आदर्श एक थे | सत्यवती, सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, मृदुला साराबाई, अनीस किदवई, कमला बहन पटेल और दूसरी बहुत-सी औरतों ने हजारों बरस पर फैली हुई Gender Identity(लिंग आधारित पहचान) की सरहदें पार कर ली थी और Freedom movement(स्वतंत्रता संग्राम) के इस अज़ीम धारे का हिस्सा बन गई थी, जिसमें सभी शामिल थे |

हम सब सरहदों के बारे में जानने की कोशिश करते हैं, तो हमें मालूम होता है कि समय का दरिया इन सरहदों, इन सीमाओं को बदलता चला जाता है | यही देखिये की आज जिस जगह हम मौजूद हैं, उसका नाम अशोक-ए-आज़म के नाम पर अशोक विहार है | किसी ज़माने में अशोक की सल्तनत की सीमाएँ मगध से बामियान तक फैली हुई थीं, लेकिन फिर ये सीमाएँ बदलती रहीं और हम नहीं जानते कि आने वाले वर्षों में कितने मुल्कों की सीमाएँ बदलेंगी |
लेकिन जब आज हम Beyond borders(सीमाओं से परे) की बात करते हैं, तो ये दरअसल हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का किस्सा है | इन दोनों मुल्कों का रिश्ता पहले दिन से तनाव का शिकार रहा है | जिस ज़माने में मुस्लिम लीग पाकिस्तान मूवमेंट चला रही थी, उस वक्त ये कहा जा रहा था कि हमें ब्रिटिश राज से आज़ादी के साथ ही बँटवारा भी चाहिए | ये कहा जाता था कि कम्युनल लाईन्स पर हिंदुस्तान की तफ्सीम से हिंदू-मुस्लिम संघर्ष (Conflicts) और झगड़ा खत्म हो जायेगा और दोनों मुल्कों के लोग अपनी-अपनी सरहदों के अंदर आज़ादी से जिंदगी गुज़ारेंगे | अपने शहरियों को उनके Political, Democratic और Social rights (सामाजिक अधिकार)  देंगे और दोनों Co-Existence(सह-अस्तित्व) की बुनियाद पर International Community(अंतर्राष्ट्रीय समुदाय) में अपनी सकारात्मक भूमिका अदा करेंगे लेकिन बँटवारे  के बाद दोनों तरफ जो कुछ हुआ, वो इन वादों के बिल्कुल उलट था |     
ये इसी का नतीजा है कि आज दोनों मुल्क जो एक बहुत बड़ी मैन पावर रखते हैं, दोनों Natural और  Mineral resources से मालामाल हैं, जिनके खेत सोना उगलते हैं, उनकी दौलत जंग की तैयारियाँ निगलती रहती हैं | आज से दस बरस पहले महबूब-उल-हक हियोमन Develpoment Report में कहा गया कि
“आजकल हमें (पाकिस्तान) जुनूबी कोरिया बनने का शौक हो रहा है, लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि जुनूबी कोरिया हर साल अपनी आबादी के हर शख्स की बेसिक एजुकेशन पर तक़रीबन 130 डॉलर खर्च करता है, जबकि मलेशिया तालीम पर सालाना 128 डॉलर फी शख्स खर्च कर रहा है | अगर इसका Comparison(तुलना) जुनूबी एशिया के मुल्कों से किया जाये तो मालूम होता है कि हिन्दुस्तान अपनी आबादी के हर फर्द की बेसिक तालीम पर सालाना 9 डॉलर, पाकिस्तान 3 डॉलर, बांग्लादेश 2 डॉलर, फी शख्स के हिसाब से खर्च कर रहे हैं |“

हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दक्खिनी एशिया के पिछड़े हुए मुल्कों में हैं | दक्खिनी एशिया के 80 करोड़ लोग सेहत और सफाई की बुनियादी सुविधाओं से महरूम हैं | 38 करोड़ अफराद पढ़े-लिखे हैं और 30 करोड़ इंसान नल की बजाय जोहड़ों का पानी पीने पर मजबूर हैं |

इन तमाम मुश्किलों के बावजूद ये आप लोगों की खुशकिस्मती है कि आपके यहाँ पहले दिन से Democracy (जम्हूरियत/प्रजातंत्र)) कायम रही और इसका सफर कदम-बा-कदम आगे बढ़ता रहा और हमारी बदनसीबी है कि हम आज़ादी के बाद Democracy(जम्हूरियत/प्रजातंत्र)  को बढ़ावा ना दे सके | ऐसा पहली मर्तबा हुआ है कि हमारी एक Elected Government(चुनी हुई सरकार) अपना tenure(कार्यकाल/अवधि) पूरा करने वाली है, वरना उससे पहले कभी दो, कभी ढाई वर्ष में हमारी Elected Government(चुनी हुई सरकार) की छुट्टी होती रही | आपके यहाँ भी ग़ुरबत और भुखमरी है लेकिन हमारे यहाँ Poverty Line(गरीबी रेखा) से नीचे जिंदगी जीने वालों में मुसलसल बढ़ोतरी हो रही है और अब वो चालीस फीसद हो चुकी है |

इस जगह मुझे महात्मा गाँधी के चंद जुमले याद आ रहे हैं | उन्होंने कहा था – “उस गरीब तरीन, कमज़ोर तरीन शख्स को याद कीजिए, जिसे आपने देखा हो और अपने आप से पूछिए कि जो कदम आप उठाने जा रहे हैं, क्या उसका कुछ फायदा उसको होगा ? क्या उसे उससे कुछ हासिल होगा ? क्या उससे वो अपनी जिंदगी और अपनी किस्मत पर कुछ काबू हासिल कर सकेगा ?”

महात्मा गाँधी ने जिस गरीब इंसान की बात की थी, बरेसगीर के इस पिछड़े हुए और पिसे हुए गरीब इंसान को क्या हमने बीते हुए चौंसठ वर्षों में कुछ याद किया ? हमने ऐसा नहीं किया और दोनों तरफ सरहदें मज़बूत की जाती रहीं, उन पर जंग होती रही | दोनों तरफ की गोलीबारी ने इंसानों के घरों और पक्षी-पखेरुओं के घोंसलों को जलाकर राख कर दिया |

आज सरहदें भी वहीँ हैं, सरहदों के पार मुल्क भी वहीँ है और उन मुल्कों में रहने वाले लोग भी वहीँ हैं और ये सब कुछ 1947 से मौजूद है | एक पाकिस्तानी के तौर पर मुझे ये मानना चाहिए कि मेरे मुल्क की सीमाएँ सिमट गई हैं | ईस्ट बंगाल हमसे अलग हो गया और 1971 से वो  बांग्लादेश है, एक आज़ाद मुल्क |
हम ये कैसे भुला सकते हैं कि हिन्दुस्तान के नक़्शे पर जब सरहदें खींची गई तो दोनों तरफ के लाखों बेगुनाह लोग, दोनों तरफ के जुनूनी और सफाक लोगों के हाथों क़त्ल हुए | बस्तियाँ और औरतें बर्बाद हुईं | इतिहास का सबसे बड़ा Exodus(निष्क्रमण) सबसे बड़ा तरके वतन हुआ | वो ख्वाब जो दिखाए गए थे, के ये बँटवारे के बाद हिन्दू और मुस्लिम Community(समुदाय) के बीच तनाव खत्म हो जायेगा, वो झूठा साबित हुआ | तभी 14 अगस्त 1947 की रात फैज़ साहब ने लाहौर के माल रोड पर अपनी आँखों से जो कुछ होते देखा, उसने उनके दिल के टुकड़े कर दिए और उन्होंने अपनी मशहूर नज़्म लिखी –

‘ये दाग दाग उजाला ये शब गज़ीदा सहर
वो इंतज़ार था जिसका ये वो सहर तो नहीं’
उन्होंने अपनी इस नज़्म को खत्म करते हुए कहा था –
‘निजात-यय-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई
चले चलो के वो मंजिल अभी नहीं आई’

इनकी ये नज़्म लाहौर से निकलने वाले अदबी रिसाले ‘सवेरा’ में छपी थी और इस जुर्म सज़ा में ‘सवेरा’ की पब्लिकेशन पर छः महीने का बैन (Ban) लग गया था और फिर फैज़ साहब पर जो गुजरी, वो एक लंबी कहानी है, जिसको आप, मैं और दूसरे यहाँ बैठे हुए बहुत से लोग जानते हैं | जिस वक्त बँटवारा हो रहा था, उस वक्त ऐसे बहुत से लोग मौजूद थे, जो ये जानते थे कि अगर हमने बँटवारे की कीमत पर आज़ादी ली, तो वो हमें बहुत महँगी पड़ेगी | आपसी नफरत खत्म होना तो दूर की बात है, ये नफरत अपनी इन्तहा को पहुँचेगी | उन लोगों में सबसे अहम नाम मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और उनके दूसरे साथियों का है, जो बेबसी से ये सब कुछ होता देखते रहे | समय उस वक्त उनके खिलाफ था और उसने उनकी ख्वाहिश के खिलाफ फैसला दिया | इसके बावजूद मौलाना आज़ाद ने और दूसरे बहुत से लोगों ने अपना point of view (दृष्टिकोण) नहीं बदला और अपनी बात पर अटल रहे | मौलाना को कॉंग्रेस का ‘शो ब्वॉय’ कहा गया | अलीगढ़ स्टेशन पर उनके गले में जूते के हार डाले गए लेकिन उन्होंने कॉंग्रेस और हिन्दुस्तान को नहीं छोड़ा | वो दोनों Communities (समुदायों)  के बीच भाईचारे की बात करते रहे |
गुजरी हुई छह दहाइयों में दोनों मुल्कों की सरहदों पर Tension (तनाव) अपनी इन्तेहा पर पहुँची | हमने आपस में छोटी-बड़ी पाँच जंगें लड़ीं | हमारे आपसी Relations(संबंध) खराब रहे | हमारे अंदर नफरतों का ज़हर फैलता रहा 
लेकिन दोनों तरफ कुछ लोग थे, जो ये कहते रहे कि लड़ाई-दंगे से, नफरत से कुछ नहीं होगा, एक-दूसरे की सरहदों का एहतराम कीजिए | एक-दूसरे के लिए अच्छा सोचिए | निर्मला देशपांडे, जिन्हें हम सब दीदी कहते थे, वो “गोली नहीं बोली” का नारा लगाती रहीं | मुझ जैसे लोग पाकिस्तान में “पाक-हिंद प्रेम सभा” बनाकर अमन की और दोस्ती की बात करते रहे | हम कहते थे कि हमने लड़ाई-दंगों को आजमा कर देख लिया | इसका नतीजा सिर्फ तबाही, बर्बादी, भुखमरी, ग़ुरबत और बेरोज़गारी की सूरत में निकला | अब क्यों न अमन को भी एक मौका दिया जाए | उसे आजमा कर देखा जाये कि उसका नतीजा क्या निकलता है |

मुझे अच्छी तरह याद है कि 1979 में जब हम 12-14 लोगों ने “पाक-हिंद प्रेम सभा” बनाई, अमन की और दोस्ती की बात करने के लिए जलसा किया और उस वक्त के इंडियन कौंसिल जेनरल मणिशंकर अय्यर को चीफ गेस्ट बनाया तो हम गद्दार और ‘रॉ’ (RAW) के एजेंट कहे गए |

शायद यही वजह है कि कारगिल एडवेंचर(Adventure) के फ़ौरन बाद मई 2000 में जब हिना जिलानी, अस्मा जहाँगीर और मैं 60 औरतों और लड़कियों के साथ दोस्ती बस के जरिए लाहौर से वाघा के रास्ते दिल्ली के लिए रवाना हुए तो मुझे अपनी आँखों पर यकीन नहीं आता था कि हिन्दुस्तान जाने के लिए इतनी बहुत-सी औरतें हमारे साथ हैं | इसलिए कि जब 1979 में हम कराची वालों ने “पाक-हिंद प्रेम सभा” बनाई, तो बहुत मुश्किल से 10-12 लोग उसमें शामिल होने के लिए तैयार हुए थे | हर शख्स डरता था, यूँ लगता था, जैसे हम हिन्दुस्तान से अमन की बात नहीं कर रहे, पाकिस्तान से गद्दारी कर रहे हैं | और अब पुलों के नीचे से पानी तो क्या बड़े-बड़े दरिया बह गए हैं | पाकिस्तान-हिन्दुस्तान के दरम्यान अमन की बात करना इन दिनों फैशन है | अब जब मैं साल में तीन मर्तबा औरतों की बुलाई हुई अमन कॉन्फ्रेसों में जाती हूँ, वहाँ बेहतरीन अदीब, खवातीन और अमन के लिए सर गरम कारकुन औरतों की बातें सुनती हूँ, तो जी खुश होता है और महसूस होता है कि बात वाकई आगे बढ़ी है |

जंग...औरतों, मर्दों, बच्चों, बूढों, शहरों, देहातों सभी को अपना निवाला बनाती है, लेकिन औरत पर दोहरा अज़ाब आता है | जंग की सूरत में उनका सब कुछ दाँव पर लग जाता है | उनका घर, उनके बच्चे, उनका खानदान, घर के मर्द लड़ने जायेंगे, मारे जाएँ, जंगी कैदी बनें या लापता हो जायें, जिस्मानी या जेहनी तौर पर माजूर होकर घर लौटें तो उनकी हर वजह के तश्दूद को उनके घर की औरत सहती है | दर-ब-दर होने की सूरत में सर छुपाने के लिए ठिकाना ढूँढना, दो वक्त की रोटी, ईंधन, पानी और दवा का इंतजाम करना उनकी जिम्मेदारी होती है | और सितम बलाए सितम ये के वो फातेह फौजियों के हाथों बे-हुरमत होकर बदतरीन जिस्मानी और रूहानी और जेहनी टॉर्चर से गुजरती हैं |

बात वाकई आगे बढ़ी है और जिंगोइज्म(jingoism) में दोनों तरफ की माशी और इक्तासादी तरक्की को जिस क़दर नुकसान पहुँचाया, उसने आहिस्ता-आहिस्ता दोनों तरफ के लोगों का perception(धारणा) बदलना शुरू कर दिया | और अब हाल यह है कि दोनों हुकूमतें अमन की बात करने और फ्रेंडशिप पैक्ट (friendship pact) पर दस्तखत करने में पीछे रह गयीं हैं और दोनों तरफ के लोग आगे निकल गए हैं |

सरहद के पार जहाँ से मैं आई हूँ, वहाँ अब जनता कि Majority(बहुमत)  तमाम बड़ी पॉलिटिकल पार्टीज, ज्यादातर अदीब, शायर और Intellectuals (बुद्धिजीवी), journalists(पत्रकार), industrialists(उद्योगपति) यही कहते हैं के सरहदों के दोनों तरफ न सिर्फ अमन चाहिए बल्कि हर सेक्टर में हमें मिलजुल कर काम करना चाहिए, वीजा रिजीम(resime) को बहुत liberal(उदार) होना चाहिए, क्योंकि लोग जब आज़ादी से एक-दूसरे से मिलते हैं, तो उनका perception (धारणा) बदलता है और वह यह जान पाते हैं के दूसरी तरफ भी इन्हीं जैसे इंसान बसते हैं और इनके दुःख-दर्द भी इन्हीं के जैसे हैं |

आज सरहदें भी वहीँ हैं, सरहदों के पास बसने वाले दोनों मुल्क वहीँ हैं, इनमें रहने वाले भी वहीँ हैं, लेकिन लोगों की सोच में, इनके perception (धारणा) में ड्रामाई तब्दीली हुई है | अमन, दोस्ती और भाईचारे की जो फिज़ा आज है, वह इससे पहले कभी नहीं थी | हद तो यह है के पाकिस्तान के सबसे पॉपुलर टेलीविजन स्टेशन से चंद दिनों पहले एक प्रोग्राम में यह कहा गया के आज का पाकिस्तान न सिर्फ करारदाद पाकिस्तान से मुख्तलिफ़ है, बल्के Founding Father और करोड़ों मुसलमानों ने पाकिस्तान के बारे में जो ख्वाब देखा था, उससे भी बिल्कुल मुख्तलिफ़ नज़र आता है | आज का पाकिस्तान वो पाकिस्तान नज़र आता है, जो दरअसल कॉंग्रेस से जुड़े हुए और पाकिस्तान की तकसीम को कबूल न करने वाले मुसलमान लीडर दिखाते थे | वह कहते थे के पाकिस्तान के नाम पर हिन्दुस्तान की तकसीम दरअसल मुसलामानों के लिए अच्छा फार्मूला नहीं है |  और ये बर्रेसगीर में रहने वाले मुसलमानों की बेहतरी का मंसूबा नहीं है , ये बात सौ फीसद तो सही साबित नहीं हुई, लेकिन मुकम्मल तौर पर गलत भी साबित नहीं हुई है | प्रोग्राम के एंकर पर्सन ने कहा के उस वक्त के कॉंग्रेस के सदर मौलाना अबुल कलाम आजाद की हर मुमकिन कोशिश थी के हिंदुस्तान की तकसीम न हो | उनका ये कहना था के हिंदुस्तान की तकसीम मुसलमानों के लिए परेशानी का सामान पैदा कर सकती है |

23 मार्च 2012 वह ऑन एयर जाने वाले इस प्रोग्राम में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के विजन से जो बातें कही गयीं, उन्हें सुनकर मुझे यकीन नहीं आया के पाकिस्तानी टेलीविजन से मौलाना आज़ाद की तक़रीर सुनाई जा सकती है | ऐसे ही बहुत-सी बातें हैं, जो अब पाकिस्तान में की जा रही हैं | आपके यहाँ भी लोगों का Perception(धारणा) बदल रहा है | सोचने की बात यह है के इस Perception(धारणा) में बदलाव आने की कितनी भारी कीमत हम दोनों मुल्कों में रहने वालों ने अदा की है |

जिन दिनों दोनों मुल्कों ने एटमी धमाके किये, उस ज़माने में जिंगोइज्म(jingoism) उरूज पर था, दोनों तरफ से यह कहा जा रहा था के Balance of Terror कायम रहना चाहिए | ये बहुत मुश्किल वक्त था | ये वह दिन थे, जब Balance of Terror को ना मानने वाले गद्दार कहे जा रहे थे | ऐसे मौके पर Pakistan peace coalition  ने 28 मई 2002 को जिंगोइज्म(jingoism) के खिलाफ कराची में एक सेमिनार किया था | मैंने इसमें एक पर्चा पढ़ा था और इसके आखिर में कहा था के पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के दरम्यान अगर न्यूकलियाई जंग छिड़ जाती है अगर जौहरी हथियार इस्तेमाल होते हैं तो इनकी आँच ढाका और काठमांडू तक जायेगी, इनके खंडहर से उठने वाले न्युकलियाई बादल श्रीलंका को भी ढाँप लेंगे और तिब्बत के इन बौद्ध मठों तक इस आग की तपीश महसूस की जायेगी, जहाँ अभी बारूद की बू तक नहीं पहुँची | हिमालय की बर्फ पिघलेगी और चीन के खेत भी झुलस जायेंगे, जो चीनी किसानों ने पहाड़ों में सीढियाँ तराश कर उगाई हैं | ये मसला सिर्फ पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का नहीं है, ये जुनूबी एशिया का मामला है, ये इससे आगे की ज़मीनों और इंसानों की जिंदगी का मामला है |

इस रोज मैंने ये भी कहा था के कैसे भूल सकते हैं, इन शहरों में हम सब का माजी रहता है, हमारा हाल और मुस्तकबिल साँस लेता है, क्या हम यह सोच भी सकते हैं के सिंधु, रावी, गंगा, जमुना, सून और मूसा नदी दलदल बन जाए और ये दलदलें करोड़ों इंसानों की लाशों से भरी पड़ी हों | क्या हम अपने तमाम तहजीबी, तारीखी, सकाफती विरसे को भाप बनकार उड़ते हुए देखने का तसव्वुर भी कर सकते हैं | हमारे बर्रेसगीर में वेदें लिखी गई, रामायण लिखी गई, यहाँ महात्मा बुद्ध और महावीर पैदा हुए, खुसरो, मीर, कबीर, ग़ालिब और नजीर पैदा हुए | मताई, गुलेशा, सचल, सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, पंडित रतन नाथ, सरशार, फिराक गोरखपुरी, फैज़ ने यहाँ शायरी की | यहाँ अजंता एलोरा तराशे गए, यहाँ ताजमहल तामीर हुआ, इसी बररेसगीर के हिस्से में हजारहा साधू-संत,पीर-फ़कीर, औलिया आये | मोईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी, सरफुद्दीन याहिया मनेरी, निजामुद्दीन औलिया और देवा शरीफ दरवाद की दरगाहें – क्या इसलिए हैं के यह धुल बनाकर उड़ा दी जाये |

मैं पाकिस्तानी शहरी होने के साथ ही बररेसगीर की शहरी भी हूँ, मेरे लिए कराची, कलकत्ता और कानपूर में लाहौर, लखनऊ और दिल्ली में ढाके और पेशावर में कोई फर्क नहीं है | ये बररेसगीर के शहर हैं | मैं इन सबमें रहती हूँ और ये सारे शहर मेरे अंदर आबाद हैं और गौरी चले या अग्नि निशाना बररेसगीर के कोई भी बस्ती वीरान बने, हलाकत मेरी होगी | किसी हिंदू, किसी मुसलमान, किसी सिख या किसी ईसाई, किसी औरत, मर्द, बच्चे, बूढ़े, किसी कट्टरपंथी या किसी नास्तिक के रूप में मेरी ही जात हलाक हो रही होगी |

इससे बढ़कर खुशी की बात और क्या हो सकती है कि वह मुश्किल दिन गुजर गए हैं, लेकिन फिर भी हमें जागते रहने की जरुरत है के कोई ग्रुप या आतंकवादी दोनों तरफ के लोगों के इस Perception (धारणा) को नुकसान पहुँचाने की कोशिश न करे | हमारी नस्लों का मुस्तकबिल इनका आने वाला कल अमन से जुदा हुआ हो | अमन की हिफाजत हमें जी-जान से करना चाहिए |

अपनी बात खत्म करने से पहले जी चाहता है के आपको बहुत पहले सुनी हुई एक कहानी सुनाऊं | अमन की बात करते हुए, ये कहानी मैं सुनाती हूँ, कहानी कुछ यूँ है | एक कस्बे में दो बच्चे रहते थे | दोनों दो बरस के हुए, तो एक-दूसरे से लड़ने-झगड़ने लगे | कभी एक दूसरे को घूँसे मार कर भाग जाता तो कभी पहला दूसरे को एक थप्पड़ रसीद कर देता | दोनों बारह बरस के हुए तो एक-दूसरे के खिलाफ डंडों और पत्थरों का इस्तेमाल, कभी एक सर फटता तो कभी दूसरे का हाथ टूटता | बाईस बरस के हुए तो दोनों ने एक-दूसरे पर गोलियाँ बरसाने का काम शुरू कर दिया | बयालीस बरस को पहुँचते-पहुँचते दोनों एक-दूसरे पर बम बरसाने लगे | जब बासठ बरस के हुए तो एक-दूसरे के खिलाफ ज़रासीम हथियार तैयार करने लगे | बयासी बरस की उम्र में दोनों मर गए | मरने के बाद भी उनका एक-दूसरे से नाता न टूटा और इनके बेटों ने इन्हें एक-दूसरे के बराबर में दफन कर दिया | कब्र का कीड़ा अपने लातादाद बेटों-बेटियों, पोतों-पोतियों और नवासा-नवासियों के साथ इन दोनों के लाशों को खा रहा था | तो कब्र के कीड़े का ये खानदान इस बात से आगाह नहीं था के इसने जिन लाशों पर जितने दिन दावत उड़ाई है, वे एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे और वे कीड़े जानते भी कैसे के दोनों की कब्रों की मिटटी एक ही जैसी थी |

जरा थमिये कहानी अभी खत्म नहीं हुई है और बात सन 5000 ए.डी. तक जाती है | 5000 ए.डी. में एक बिज्जू ने जमीन से सर निकाल कर अपने चारों तरफ निगाह की तो देखा कि पेड़ झूमते हैं, कौवा काँव-काँव करता है, कुत्ते भौं-भौं करते हैं, मछलियाँ और घोंघे, चाँद और सितारे,समंदर की लहरें, दरिया की मौजें, जमीन पर रेंगती हुई चींटी और हवा में उड़ती हुई गौरेया सब इसी तरह हैं | बिज्जू ने आदमी को तलाश किया लेकिन वह उसे नहीं मिला | उसने करीब से गुजरते हुए लक्कड़बग्घे से आदमी के बारे में पूछा, तो उसने अफ़सोस से गर्दन हिलाई और कहा आदमी.........??? हाँ ! कभी-कभार कोई आदमी नजर आ जाता है |

मुझे यकीन है कि हमारे खूबसूरत बररेसगीर में ऐसा कभी नहीं होगा लेकिन इसके लिए दोनों तरफ के अमन पसंदों को बहुत चौकन्ना रहने की जरुरत है |
आप लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया आप लोगों ने मुझे सुना |
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------         

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...