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Showing posts from January, 2011

नाटककार लुइगी पिरान्देलो :- एक परिचय

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इटली के विख्यात उपन्यासकार, कहानीकार तथा नाटककार लुइगी पिरान्देलो का जन्म २८ जून १८६७ में सिसली के मध्य दक्षिणी समुद्र तट पर स्थित एग्रीजेंटो में हुआ था उसके माता- पिता गैरीबाल्डी समर्थक परिवारों से थे राजनैतिक उथल-पुथल के कारण उनको देहात में जाकर रहना पड़ा प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई अनेक पाठशालाओं में पढ़ने के बाद वह १८८७ में रोम विश्वविद्यालय पहुंचा परन्तु वहां आत्म-संतुष्टि नहीं मिली बौन जाकर डॉक्टर ऑफ फिलोसाफी की डिग्री प्राप्त की सन १८९१ में रोम आये, जहां जीवन भर रहे व्यापार में रूचि तो थी ही नहीं, १८९४ में पिता को व्यापार में घाटाहोने पर टीचर्ज़ कालिज में साहित्य- शास्त्र तथा भाषण का अध्यापन कार्य संभालना पड़ा,जो १९२३ तक चलता रहा उसी वर्ष एंतोनियेता पोरतुलानो से विवाह हुआ जो सफल ने हुआ पत्नी बहुत जिद्दी तथा झगडालू थी तीन बच्चे स्टीफानो (लेखक) रोजाली तथा स्टीफानो (पेंटर)होने पर भी जीवन सुखी न था अपने एक लेख में उसने सूखे,रंगहीन जीवन,अध्यापन कार्य से छुटकारा पाने की इच्छा तथा गाँव में जाकर लिखने की चाह की चर्चा की है इटली के नाटककार पैल्लीको से प्रभावित होकर पहला दुखांत '

एक पत्नी और माँ की पाती-'जगदम्बा'

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यह नाटक किसी मिथकीय चरित्र वाली जगदम्बा का नहीं बल्कि एक वैसी महिला का आत्म है, जिसने जिंदगी भर सबके लिए बा और एक आदर्श पत्नी का धर्म निभाया पर अपने वैयक्तिक जीवन में पति और बेटे के बीच के दुधारी तलवार पर चलती रही यह नाटक गाँधी जी की कस्तूरबा, भारतीय जनमानस की बा और अपने अनथक सामाजिक,राजनैतिक प्रयासों और लड़ाई में जगदम्बा की आपकबूली है,जो अब तक हमारी नजरों से परे थाआधुनिक इतिहास के अध्येता इस बात को जानते हैं कि कस्तूरबा मात्र गाँधी जी की सहचरी नहीं थी बल्कि एक वैसी साथिन के रूप में थी जिसने हर कदम पर पति का साथ तो दिया पर उनका अन्धानुकरण नहीं किया और गाँधी जी के देशहित के प्रयासों में हर कदम पर साथ रही पर एक माँ भी होने के नाते अपने बेटों हरिलाल और मणिलाल से अपने जुड़ाव को पृथक नहीं कर पायीं अपने टेक्स्ट में रामदास भटकल का यह नाटक एक पत्नी का अपने महान बनते जाते पति के अंदरूनी पारिवारिक चरित्र के अनछुए पहलुओं पर एक बारीक नज़र और उसी की डायरी है नाटक में बा के कैरेक्टर को रंगमंच की वरिष्ठ अभिनेत्री 'रोहिणी हठांगरी' ने जीवंत किया रोहिणी जी इस किरदार में रच बस गयी हैं,दर्शकों

राख सरीखा गर्म और बेहतर-कश्मीर कश्मीर

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अल्बेयर कामू ने 'मिथ ऑफ़ सिफिसस'में लिखा है-'मानव ऐसे सूनेपन में है,जिसका कोई उपचार नहीं है,आखिर वह अपने खोले हुए घर, जमीन की स्मृतियों तक से वंचित हो गया है यहाँ तक कि उसे अपनी धरती और आने की आशा के किसी वायदे की उम्मीद नहीं है मनुष्य और उसकी ज़िन्दगी के बीच अलगाव, कलाकार और पर्यावरण के बीच अलगाव सच में ही,अलगाव को जन्म देते हैं ' एब्सर्ड रंगमंच यथार्थ को अपने टूल्स के साथ ही ले आता है और उसी यथार्थ को फिर खारिज भी कर देता है बात चाहे,लुइगी पिरान्देलो के 'सिक्स कैरेक्टर्स इन सर्च ऑफ़ ऍन आथर 'की हो या हिन्दुस्तानी' गारबो' या ;कश्मीर कश्मीर'की ,यह सच दिखने और फिर तुरंत ही उसे आँखों के आगे से खींच ले जाने की अय्यारी इसी रंगमंच की खासियत है यह रंग-प्रयोग द्वितीय विश्वयुद्ध के बादकी स्थिति से उपजा रंगप्रयोग है यह अपने कथानकों में कोई निदान नहीं देता कश्मीर कश्मीर ऐसा ही नाटक है ,इसमें से कोई पात्र ऐसा नहीं है जिनसे आप प्रेम या घृणा कर सकें ,इनमे विचारों की एक अंतहीन पुनरावृति तथा अनिर्णय की स्थिति भी है ,जो आमतौर पर इस तरह के रंगमंच की खासियत होत

रूपम पाठक के पक्ष में

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झारखण्ड कैडर के एक भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी पी.एस.नटराजन के यौन-उत्पीडन की शिकार सुषमा बड़ाईक नामक महिला इन दिनों न्याय पाने के लिए जगह-जगह अर्जियां लगाती फिर रही है.पिछले दिनों यह फरियादी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के यहाँ भी आई क्योंकि झारखण्ड में उसकी फ़रियाद सुनने वाला नहीं है.उसका कहना है कि गुमला की पुलिस उसे झारखण्ड आर्मी नामक उग्रवादी संगठन की सरगना साबित करने पर तुली है.वह अपनी लाख कोशिशों के बावजूद झारखण्ड सरकार के दरबार में किसी से मिल नहीं पाई है,तब जाकर उसने नीतीश के जनता दरबार में अर्जी लगायी.यद्यपि इस सन्दर्भ में बिहार सरकार ने सुषमा के आवेदन को झारखण्ड सरकार तथा केन्द्रीय गृह मंत्रालय को अपने आग्रह-पत्र के साथ अग्रसारित कर दिया है.अब ऐसे में यदि सुषमा की अर्जी नहीं सुनी गयी तो क्या मालूम एक और रूपम पाठक केस सामने आ जाये ? इस चिंता की वाजिब वजहें हैं.मान लीजिये कि अगर सुषमा की बात सच्ची हैऔर उसकी फ़रियाद कहीं नहीं सुनी जा रही है तब ऐसे में उसके पास क्या चारा बचेगा?हालांकि संयुक्त बिहार के राजद सरकार में चम्पा विश्वास काण्ड लोगों से भूला नहीं होगा.सरकारी तंत्र अप

'अबाउट राम'- राम कथा की निराली प्रस्तुति

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कहानी कहने का या सम्प्रेषण की दृष्टि से रंगमंच एक जीवंत और बहुत सशक्त माध्यम है यह सीधे तौर पर अभिनेता और दर्शक के बीच संवाद करता है और यह संवाद विविध रूपों में होता है-जैसे अनेक प्रकार की ध्वनियाँ ,शारीरिक मुद्राएं आदि अभिनेता अपने अभिनय से अपना सम्प्रेषण सामाजिकों तक प्रेषित करता है कभी गाकर, कभी नाच कर तो कभी अपने अभिनय से परन्तु ,मंच से अभिनेता अदृश्य हो और उसकी जगह कठपुतलियों,मुखौटो,तथा तकनीक को सामने लाया जाए तो संवाद के लिए एक कुशल और अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता होती है मानव के सहयोग से इनमें गतियाँ उत्पन्न होती हैं और यह बेजान होते हुए भी मंच पर बोल पड़ती हैं ,दर्शकों का जुड़ाव उससे हो जाता है इस तरह की प्रस्तुति कठिन तपस्या और निरंतर अभ्यास की मांग करती है नाटक की पश्चमी परंपरा में यूनानी देवता डायोनिशस के उत्सवों में मुखौटों को लगाने की परिपाटी थी जो आगे चलकर अभिनेताओं के मुंह पर लगाकर मंचासीन होने की परम्परा में आ गयी जापान की 'नोह'शैली या काबुकी में, तो अपने यहाँ ठेरुकुट्टू कुडी अट्टम आदि में इनका प्रयोग देखने को मिलता है यह मुखौटें सभी प्रयोगों में कथा के प

जाना 'बालेश्वर यादव' का-स्मृति शेष

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आज जबकि भोजपुरी लोक-संगीत अपनी अस्मिता की लड़ाई में संघर्षरत है,वैसे में बालेश्वर यादव जैसे लोक-गायक के असमय निधन से भोजपुरी अंचल और इसके लोकसंगीत को अपूरणीय क्षति हुई है.बालेश्वर यादव भोजपुरी समाज और भाषा के महेंद्र मिश्र वाली परंपरा के लोक कलाकार थे.श्री यादव लखनऊ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी अस्पताल में कुछ समय से इलाज़ हेतु भर्ती थे.बालेश्वर यादव को उत्तर प्रदेश की सरकार ने 'उनके लोक-संगीत में अतुलनीय योगदान हेतु 'यश भारती सम्मान'से नवाज़ा था.इतना ही नहीं बालेश्वर पुरस्कारों की सरकारी लिस्ट के गायक नहीं बल्कि सही मायनों में जनगायक थे,उन्होंने भोजपुरी के प्रसार के अगुआ के तौर पर देश-विदेश में पहचाने गए.ब्रिटिश गुयाना,त्रिनिदाद,मारीशस,फिजी,सूरीनाम,हौलैंड इत्यादि देशो में मशहूर बालेश्वर यादव जी के मौत भरत शर्मा,मदन राय,प्रो.शारदा सिन्हा, आनंद मोहन,गोपाल राय जैसे गायकों को भोजपुरी अस्मिता में उनका साथ देने वाले एक स्तम्भ के गिरने जैसा है.ईश्वर बालेश्वर यादव जी की आत्मा को शांति दे और भोजपुरी गीत संगीत से बलात्कार करने वाले सड़कछाप गायकों को सद्बुद्धि दे

भारतीयता की ओर लंगड़ी प्रस्तुति 'सलाम इंडिया'(लुशिन दुबे)

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नाटक में महत्वपूर्ण यह है कि जो प्लाट आप चुनते हैं , उसकी स्टोरी टेलिंग सही टाईमिंग और तरीके से मंच पर हो | वह नाटक अपने मंच पर उतरने के साथ ही,अपनी आगे की जिज्ञासा प्रेक्षकों में जगा दे | ऐसा होने के लिए खेले जाने वाले नाटक के रंगपाठ का कसा हुआ होना चाहिए फिर बारी आती है-अभिनेताओं की | नाटक की प्रस्तुति में नाटक,दर्शक और स्पेस का सम्बन्ध महत्वपूर्ण होता है | जब नाटक रनिंग टाईम में इन तीनों से अलग होता है,वैसे ही डिरेल हो जाता है | यह त्रयी टाईम,एक्शन,प्लेस की त्रयी से तनिक अलग है |लुशिन दुबे द्वारा निर्देशित 'सलाम इंडिया'(अभिमंच सभागार,रानावि)इसी तरह के डिरेलमेंट का शिकार हो जाता है | 'सलाम इंडिया'पवन वर्मा के बेस्ट सेलर पुस्तक 'बीईंग इंडियन'से प्रभावित है और इसके नाटककार नागालैंड के निकोलस खारकोंगकर हैं | इस नाटक में कोलाज़ की तरह चार कहानियों के सोलह किरदारों को मंच पर चार अभिनेता निभाते हैं | पर कई बार ऐसा होता है कि अभिनेता अपने-अपने चरित्र को निभाने में काफी लाउड हो जाते हैं | नाटक में कई सामाजिक इश्यु उठाए गए हैं,जिनमें कई पेंच रखे गए हैं,दिक्कत केवल

"१३वां भारंगम"-फिर वही कहानी

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पिछले तेरह वर्षों से भारंगम सफलतापूर्वक अपने नए नए सोपानों पर चढ़ता जा रहा है | इसमें कोई दो-राय नहीं कि इसने एक अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप गढ़ लिया है | बावजूद इसके हर बार भारंगम एक ख़ास तरह के रंगकर्मियों,नाटकों और खेमेबाज़ियों के कारण हमेशा चर्चा में रहा है,जो कि विवादों की जमीन पर पनपे पौधे सरीखा है | इसके कई वाजिब कारण हैं | मसलन- (१) इस समारोह में वही कुछ चेहरे क्यों रिपीट होते रहते हैं जिनका योगदान भारतीय रंग-परंपरा को बढाने में कुछ विशेष नहीं है और वह अभी लर्निंग पीरियड में ही हैं पर,वह इस आयोजन के प्रतिनिधि रंग-व्यक्तित्व बने दीखते हैं ? (२) क्यों यह समारोह आज भी एक ईमानदार भारतीय रंग-परम्परा का मंच नहीं बन पाया ? (३) इतना ही नहीं,यह समारोह हर वर्ष इस तथ्य की जाने-अनजाने पुष्टि करता क्यों दीखता है कि जो रंगकर्मी या दल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के आला हाकिमों के खेमे का नहीं उनके नाटकों को ही इस समारोह का एंट्री कार्ड क्यों मिलता है? (४) क्यों अब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ही पास आउट (प्रशिक्षित)स्नातकों को ही वरीयता मिलती रही है ? (५) इस समारोह में पिछले कुछ समय से विद्या