1/27/11

नाटककार लुइगी पिरान्देलो :- एक परिचय


इटली के विख्यात उपन्यासकार,कहानीकार तथा नाटककार लुइगी पिरान्देलो का जन्म २८ जून १८६७ में सिसली के मध्य दक्षिणी समुद्र तट पर स्थित एग्रीजेंटो में हुआ था उसके माता-पिता गैरीबाल्डी समर्थक परिवारों से थे राजनैतिक उथल-पुथल के कारण उनको देहात में जाकर रहना पड़ा प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई अनेक पाठशालाओं में पढ़ने के बाद वह १८८७ में रोम विश्वविद्यालय पहुंचा परन्तु वहां आत्म-संतुष्टि नहीं मिली बौन जाकर डॉक्टर ऑफ फिलोसाफी की डिग्री प्राप्त की सन १८९१ में रोम आये,जहां जीवन भर रहे

व्यापार में रूचि तो थी ही नहीं,१८९४ में पिता को व्यापार में घाटाहोने पर टीचर्ज़ कालिज में साहित्य-शास्त्र तथा भाषण का अध्यापन कार्य संभालना पड़ा,जो १९२३ तक चलता रहा उसी वर्ष एंतोनियेता पोरतुलानो से विवाह हुआ जो सफल ने हुआ पत्नी बहुत जिद्दी तथा झगडालू थी तीन बच्चे स्टीफानो (लेखक) रोजाली तथा स्टीफानो (पेंटर)होने पर भी जीवन सुखी न था अपने एक लेख में उसने सूखे,रंगहीन जीवन,अध्यापन कार्य से छुटकारा पाने की इच्छा तथा गाँव में जाकर लिखने की चाह की चर्चा की है

इटली के नाटककार पैल्लीको से प्रभावित होकर पहला दुखांत 'बारबारो'लिखा जो बाद में खो गया पहला उपन्यास 'आउट कास्ट'१८९३ में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ 'दी टर्न'कहानी-संग्रह था प्रसिद्ध उपन्यास 'लेट माटिया पास्कल'१९०४ में आया 'एपिलोग'१८९८ में तथा 'सिस्लियन लाईन्ज़' १९१० में छपे

पिरान्देलो जब लिखने पर आये तो एक वर्ष में नौ नाटक लिख डाले एक नाटक तीन दिन में तो दूसरा छह में सन १९१६ से १९२५ तक अधिकाधिक नाटक लिखे वह फासिस्ट पार्टी का सदस्य बन गया ,जिससे मूसोलोनी ने उसके रंगमंच को मान्यता प्रदान कर दी १९२५ में अपना नाट्य दल गठित किया और यूरोप भ्रमण के लिए गए कलात्मक सफलता तो मिली परन्तु घाटे का सौदा रहा ख्याति बढ़ने लगी यूरोप,टर्की,जापान आदि देशों की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुए सन १९३४ में नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ मृत्यु के दिन(१० दिसंबर १९३६) तक उसका लेखन जारी रहा

पिरान्देलो की नाटक रचनाओं पर इटली की परम्परागत शैली'कामेदिया देल आर्ते 'का प्रभाव दिखाई देता है वर्ज़ जैसे नाटककारों का प्रभाव भी दिखाई देता है,जिनका 'थियेटर आफ दी ग्रोतेस्क प्रथम महायुद्ध की प्रताड़ना के कारण जीवन की विपरीत छवि दिखाता था सत्य,तथा मिथ्या,चेहरा तथा मुखौटे , दिखावे के पीछे की वास्तविकता का चित्रण ही उसका मुख्य उद्देश्य बन कर रह गया वास्तविकता से दूर रहकर , निर्लिप्त भाव से अवलोकन तथा मनन उसके पात्र जानते-बूझते हुए पीड़ा झेलते हैं जीवन की असंगतियाँ तथा उतार-चढ़ाव उसकी रचनाओं में साफ़ झलकती है उसके नाटक उलझावेदारऔर पात्र जो न जाने कब क्या कर बैठें सच तो यह है कि पिरान्देलो सही माने में पहला एब्सर्ड (असंगत) नाटककार है

उसका मत था कि मनुष्य अपने लिए एक अलग व्यक्तित्व का निर्माण कर लेता है जिसकी आड़ में वह समाज का सभ्य सदस्य बनने का दिखावा करता है समाज का अपना ढांचा होता है,धर्म,क़ानून,आचार-संहिता आदि से बंधा होता है वह मनुष्य की सहजता को नष्ट कर देता है

कला का विरोधाभास यह है कि वह एक ही समय में रचना भी करती है और विनाश भी वह पल-पल बदलने वाली वस्तुस्थिति को एक स्थायी रूप दे देती है मनुष्य जीवन की रचना करता है और उसी पल का बंदी बनकर रह जाता है यथार्थ निश्चित नहीं होता वह देखने वाले की दृष्टि के साथ-साथ बदलता रहता है कला एक शाश्वत यथार्थ है क्योंकि वह स्थायी है और जीवन परिवर्तनशील परन्तु कला गतिशील नहीं है इसलिए जीवन से उत्कृष्ट नहीं हो पाती है यह एक विरोधाभास है आदि मानव तथा समाज-निर्माता मनुष्य , प्रकृति तथा आकृति , सत्य तथा दिखने वाला सत्य ,मुख और मुखौटा, यह सब नाटककार पिरान्देलो के लिए चिंतन के मुद्दे बन जाते हैं

कहा जाता है कि पिरान्देलो के नाटक विचार अथवा मस्तिष्क प्रधान होते हैं परन्तु यह सत्य नहीं है उसके नाटकों का द्वंद्व ह्रदय से ही उभरता है वही नाटकों का 'बीज' होता है उसके पात्र तीव्र ,भरपूर जीवन जीते हैं उनमें घृणा,प्यार,डर,उल्लास ,रोमांच इत्यादि मानवीय भावनाओं का समावेश है परन्तु उसके समीक्षक उसमें बौद्धिक तत्व ही खोजते हैं

पिरान्देलो के पात्र जीवन की असंगतियों तथा अस्त-व्यस्त स्थितियों में जीते हैं वह यथार्थ की खोज में जुटे रहते हैं परन्तु उनके हाथ निराशा ही लगती है वह उस संसार में जीने पर बाध्य होते हैं,जिसे वह लेश मात्र भी पसंद नहीं करते वह अपने ऊपर एक मायाजाल-सा ओढ़ लेते हैं और एक सपनों का संसार सज़ा लेते हैं परन्तु जीवन की विभीषिकाओं से उन्हें छुटकारा नहीं मिलता .....(क्रमशः )
[साभार:- लुइगी पिरान्देलो के बारे में कुमार मनोज बंसल का लिखा यह परिचय हमने पिरान्देलो के ही मशहूर नाटक 'सिक्स कैरेक्टर इन सर्च आफ ऍन आथर 'के जीतेन्द्र कौशल द्वारा अनुदित बुक (संस्करण १९८६,भारती भाषा प्रकाशन दिल्ली) से ली है 'सिक्स कैरेक्टर इन सर्च आफ ऍन आथर 'के बारे में अगली पोस्ट में पढ़िए ]

1/24/11

एक पत्नी और माँ की पाती-'जगदम्बा'


यह नाटक किसी मिथकीय चरित्र वाली जगदम्बा का नहीं बल्कि एक वैसी महिला का आत्म है, जिसने जिंदगी भर सबके लिए बा और एक आदर्श पत्नी का धर्म निभाया पर अपने वैयक्तिक जीवन में पति और बेटे के बीच के दुधारी तलवार पर चलती रही यह नाटक गाँधी जी की कस्तूरबा,भारतीय जनमानस की बा और अपने अनथक सामाजिक,राजनैतिक प्रयासों और लड़ाई में जगदम्बा की आपकबूली है,जो अब तक हमारी नजरों से परे थाआधुनिक इतिहास के अध्येता इस बात को जानते हैं कि कस्तूरबा मात्र गाँधी जी की सहचरी नहीं थी बल्कि एक वैसी साथिन के रूप में थी जिसने हर कदम पर पति का साथ तो दिया पर उनका अन्धानुकरण नहीं किया और गाँधी जी के देशहित के प्रयासों में हर कदम पर साथ रही पर एक माँ भी होने के नाते अपने बेटों हरिलाल और मणिलाल से अपने जुड़ाव को पृथक नहीं कर पायीं अपने टेक्स्ट में रामदास भटकल का यह नाटक एक पत्नी का अपने महान बनते जाते पति के अंदरूनी पारिवारिक चरित्र के अनछुए पहलुओं पर एक बारीक नज़र और उसी की डायरी है नाटक में बा के कैरेक्टर को रंगमंच की वरिष्ठ अभिनेत्री 'रोहिणी हठांगरी'ने जीवंत किया रोहिणी जी इस किरदार में रच बस गयी हैं,दर्शकों को रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गाँधी तो याद ही होगी बहरहाल,यह नाटक मराठी में खेला जाता रहा है पर हिंदी में यह पहली प्रस्तुति रही ,इस वजह से कई बार संवादों की तारतम्यता भंग हुई और दर्शकों तथा मंच का सम्बन्ध टूटते-टूटते बचा तो इसकी एकमात्र वजह रोहिणी जी का अभिनय ही रहा पर इन सबके अलावे भी एक बड़ी कमी इसकी समयावधि भी रही,जिससे कई बार यह नाटक खींचता सा लगा नाटक के कई प्रसंग हटाये जा सकने वाले प्रतीत हुए,बहुत संभव है कि आगे जब यह नाटक खेला जाये तो यह कमी भी दूर हो जाये 'जगदम्बा'कथावाचन शैली का नाटक है- एक माँ की चिंता के केंद्र में उसकी संतान हमेशा रही है पर एक तरफ पति का आदर्शवादी जीवन भी था,ऐसे में बा की स्थिति त्रिशंकु सरीखी रही और यह वह कारण है,जो गाँधी जी को मोहनदास तक खींच लाता है हर मोर्चे पर सफल रहने वाले नैतिक गाँधी जी अपने ही बेटे के मोर्चे पर विफल रहे,बा के चरित्र से यह बात और खुलकर सामने आती है कि,अपने नियमों को कड़ी से अपने बच्चों पर लागू करना बापू के 'बापू'बने रहने की धारणा का फल था जीवन के छोटे-छोटे सत्याग्रही प्रसंगों को अपने दैनिक व्यवहार में बा का व्यक्तित्व सहधर्मिणी से एकदम अलग तरीके से उस आम महिला का भी नज़र आता है,जिसने अपने पति की उस बात को तो गांठ बाँध कर निभाया कि देश के लिए जेल जाना एक पाठशाला जाने सरीखा है पर इस पाठ को पढ़ते-पढ़ते परिवार की नांव किस ठाँव चली गयी उसकी भी पड़ताल है नाटक का पाठ बार-बार इस बात की और इशारा करता है कि गाँधी जी गाँधी ना होते गर बा न होती जगदम्बा का नाट्यालेख न केवल बा के जीवन को चिन्हित करता है बल्कि भारतीय राजनीति और गाँधी जी के संघर्षपूर्ण जीवन के विविध पडावों को एक सरल,सुघड़ पत्नी के नज़र से बयान भी करता है,ऐसे में नाटक का पाठ लंबा हो जाना स्वाभाविक है,पर रंगमंच की भी एक समस्या है कि अगर मंच पर घटनाओं का कौतुहल और तनाव बरकरार नहीं रहता तो दर्शक ऊबने लगता है,यह नाटक भी इसी का शिकार हो गया डायरी शैली का कथावाचन और उम्दा अभिनय भी नाटक को धीमा कर देते हैं तो इसकी एकमात्र वजह यही है बावजूद इसके नाटक के अंतिम दृश्यों में माँ-बेटे का संवाद सहसा ही गाँधी जी के इस उपेक्षित और तथाकथित नालायक बेटे हरिलाल के प्रति सहानुभूति पैदा कर जाता है पर कहते हैं न कि रंगमंच एक गतिमान स्थिति में ही कथा कहे तो दर्शकीय प्यार पाता है,जगदम्बा इससे तो थोड़ी दूर जाती है पर संवेदनशील विषयों को परखने वाले सामाजिकों को यह नाटक पसंद आया

1/23/11

राख सरीखा गर्म और बेहतर-कश्मीर कश्मीर


अल्बेयर कामू ने 'मिथ ऑफ़ सिफिसस'में लिखा है-'मानव ऐसे सूनेपन में है,जिसका कोई उपचार नहीं है,आखिर वह अपने खोले हुए घर,जमीन की स्मृतियों तक से वंचित हो गया है यहाँ तक कि उसे अपनी धरती और आने की आशा के किसी वायदे की उम्मीद नहीं है मनुष्य और उसकी ज़िन्दगी के बीच अलगाव, कलाकार और पर्यावरण के बीच अलगाव सच में ही,अलगाव को जन्म देते हैं '

एब्सर्ड रंगमंच यथार्थ को अपने टूल्स के साथ ही ले आता है और उसी यथार्थ को फिर खारिज भी कर देता है बात चाहे,लुइगी पिरान्देलो के 'सिक्स कैरेक्टर्स इन सर्च ऑफ़ ऍन आथर 'की हो या हिन्दुस्तानी'गारबो' या ;कश्मीर कश्मीर'की ,यह सच दिखने और फिर तुरंत ही उसे आँखों के आगे से खींच ले जाने की अय्यारी इसी रंगमंच की खासियत है यह रंग-प्रयोग द्वितीय विश्वयुद्ध के बादकी स्थिति से उपजा रंगप्रयोग है यह अपने कथानकों में कोई निदान नहीं देता कश्मीर कश्मीर ऐसा ही नाटक है ,इसमें से कोई पात्र ऐसा नहीं है जिनसे आप प्रेम या घृणा कर सकें ,इनमे विचारों की एक अंतहीन पुनरावृति तथा अनिर्णय की स्थिति भी है ,जो आमतौर पर इस तरह के रंगमंच की खासियत होती है बहित संभव है कि नाटक के पारंपरिक दर्शकों को यहाँ कुछ ने मिले क्योंकि पहली बार देखने पर इस तरह के प्रयोग वाले नाटक उन दर्शकों को सारहीन ही लगते हैं फिर भी ,एब्सर्ड नाटक में मुख्य शक्ति दर्शक को सतर्क,सजग करने की है तथा प्रतीकों और रूपकों का सहारा लेकर दर्शकों में एक तरह की विश्लेषण शैली को विकसित करना भी उसका ध्येय है भी है और उसका सौंदर्य भी चूँकि,इन नाटकों का सारा एक्शन,मूल्यबोध एब्सर्ड,अपूर्ण होता है इसलिए इसमें एक ख़ास तरह की एकरसता भी पूरे नाटक में आद्योपांत बनी रहती है इसको सँभालने की जिम्मेदारी अभिनेता और निर्देशक की होती है 'कश्मीर कश्मीर' नाटक इसी तरह एक अंतहीन दृश्य को मंच पर उतारता है यहाँ कश्मीर एक होटल के रूप में सामने आता है यानि होटल, कश्मीर का रूपक है दर्शक बिना तामझाम वाले मंच पर एक बेहतर टेक्स्ट को ,उम्दा अभिनय,गतियों ध्वनि-प्रभाव और प्रकाश में मंच पर रूपायित होते देखते हैं निर्देशक मोहित तकलकर ने कश्मीर की जमीनी हालात इसी होटल का रूपक रचकर और दो हनीमून जोड़े तथा कुछ और किरदारों को एक धुंधली इमेज के साथ दिखाते हैं,यह इमेज दर्शक के मन में उभरती है जो सीधे कश्मीर के स्याह हो रहे ,हो चुके चरित्र और इसके पीछे के खेल को भी दिखाती है कुछ गैर जरुरी घटनाक्रम भी नाटक में हैं पर वह इसकी असंगति को ही दृढ करते हैं कुल मिलाकर 'कश्मीर कश्मीर'एक मेटाफर है ,जो नाटकीय घटनाक्रमों के साथ आगे बढ़ते हुए कश्मीर की हकीकत बयानी बन जाता है और जो आज के कश्मीर की वाजिब कडवी सच्चाई भी है जो कश्मीर ६० के दशक से अस्सी के अंतिम तक 'अगर कहीं जन्नत है तो...'की टेर लगाता दिखता था,वह अब इजराईल-फिलिस्तीन-गाजापट्टी,ईराक,अफगानिस्तान,जैसी जगहों के साथ अर्थसंदर्भितहोने लगा है ?-यह कितनी भयावह बात है पर सच्चाई यही है लाल देद(लल्लेश्वरी ) के गान अब कहाँ किस कश्मीर की बात है ?जरा इमेजिन कीजिये नाटक देखते-देखते अब यह कश्मीर चीनी-खरबूजे का काटा जाना जैसी ऐतिहासिक घटना की अनजाने ही याद दिलाता है,एक झुनझूने की शक्ल में ,जिसे जब मन किया बजा रहा है यद्यपि नाटक सीधे इस तरह के प्रश्नों को नहीं उठाता पर होटल में हनीमून मनाने आये जोड़े से लेकर,होटलकर्मियों की हरकतें ,रह रहकर आते विजुअल्स तथा व्वाईस ओवर से यह साफ़ तौर पर उभरता है कई कहानियों के इर्द-गिर्द चक्कर काटकर यह नाटक एक अंतहीन-सा नैराश्य,पीछे रह गयीं विकृत छवियाँ ,'जो कश्मीर की आम छवियों से अलग और अजीब तौर पर भयानक हैं,'कई अनसुलझे,अनुत्तरित प्रश्नों का सुर्ख और स्याह प्रभाव छोड़ता है खुद मोहित तकलकर का बयान है-'यह उस बाहरी सच के उद्देश्य पर सवाल खड़े करती है,जो कश्मीर के आतंरिक हालात को समझने के लिए बनायीं गयी है राज्य की शांति को निगल रहे कई मुद्दों से जुड़ने और उनकी झलक देखने के लिए यह नाटक एक सेतु है '-हालांकि यह सेतु उतना मजबूत नहीं बन सका है पर सेतु की मूल प्रकृति जो है उसमे यह फिट बैठता है एब्सर्ड नाटक अपने चरित्र में एकदम निश्चित नहीं होते,कश्मीर कश्मीर'इसका अपवाद नहीं है यह नाटक बीच में धीमा पड़ता जरुर है पर उत्कृष्ट अभिनय इसे तुरंत ही संभाल लेता है और यह नाटक होटल कश्मीर कश्मीर को विखंडित करके 'हाट एज ऐश 'यानि राख सरीखा गर्म के रूप में सामने ला देता है,क्या यह स्थिति जानी-पहचानी नहीं लगती ? 'कश्मीर कश्मीर' भले एक नायब मास्टर पीस ने बन सका हो पर अपने फ़ार्म में बेहतरीन प्रस्तुति रही

1/13/11

रूपम पाठक के पक्ष में


झारखण्ड कैडर के एक भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी पी.एस.नटराजन के यौन-उत्पीडन की शिकार सुषमा बड़ाईक नामक महिला इन दिनों न्याय पाने के लिए जगह-जगह अर्जियां लगाती फिर रही है.पिछले दिनों यह फरियादी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के यहाँ भी आई क्योंकि झारखण्ड में उसकी फ़रियाद सुनने वाला नहीं है.उसका कहना है कि गुमला की पुलिस उसे झारखण्ड आर्मी नामक उग्रवादी संगठन की सरगना साबित करने पर तुली है.वह अपनी लाख कोशिशों के बावजूद झारखण्ड सरकार के दरबार में किसी से मिल नहीं पाई है,तब जाकर उसने नीतीश के जनता दरबार में अर्जी लगायी.यद्यपि इस सन्दर्भ में बिहार सरकार ने सुषमा के आवेदन को झारखण्ड सरकार तथा केन्द्रीय गृह मंत्रालय को अपने आग्रह-पत्र के साथ अग्रसारित कर दिया है.अब ऐसे में यदि सुषमा की अर्जी नहीं सुनी गयी तो क्या मालूम एक और रूपम पाठक केस सामने आ जाये ? इस चिंता की वाजिब वजहें हैं.मान लीजिये कि अगर सुषमा की बात सच्ची हैऔर उसकी फ़रियाद कहीं नहीं सुनी जा रही है तब ऐसे में उसके पास क्या चारा बचेगा?हालांकि संयुक्त बिहार के राजद सरकार में चम्पा विश्वास काण्ड लोगों से भूला नहीं होगा.सरकारी तंत्र अपने लाल-बत्ती और पावर के घमंड में न-जाने कितने ही दलितों-दमितों और अशक्त आम लोगों की अस्मत से खिलवाड़ करता रहा है,यह सिर्फ बिहार या झारखण्ड का ही मामला नहीं है.और हमारा सामाजिक-ढांचा ऐसा है कि इसमें औरत की जाति ही निर्धारित नहीं है वह हर जगह एक सी स्थिति में है-भोग्या. हमारा सामंती समाज उसे एक ऑब्जेक्ट से अधिक कुछ नहीं समझता.रूपम पाठक का मामला इस तरह की कथा-बयानी है.जिस औरत ने मृतक विधायक के खिलाफ पहले पुलिस रिपोर्ट दर्ज करायी और दुबारा उसे वापस लेने पर मजबूर हुई उसके पीछे कोई सोच-समझी साजिश नहीं बल्कि उस जगह पर अपने परिवार की हिफाजत ही रही होगी इसमें कोई दो-राय नहीं.बिहार सरकार के भाजपा कोटे के मंत्री महोदय तो यह कहते नज़र आये कि रूपम पाठक एक ब्लैकमेलर थी.यह कितनी वाहियात बात है.आज तक यह खबर सुनने में नहीं आई कि किसी ब्लेकमेलर ने अपने शिकार को मार दिया.ब्लेकमेलर नाम का जीव खुद एक ऐसी कुत्सित मानसिकता से ग्रस्त होता है.जहाँ वह अपने से अधिक प्यार करता है और उसीके लिए सारा खेल रचता है.ऐसे में कोई भी ब्लेकमेलर अपने सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को नहीं मारता.हाँ यह सुनने में या फिल्मों में देखने में आता है कि ब्लेकमेलर से आजिज़ आ शिकार ही उसे मार या मरवा दता है.भला कभी बाड़ ने खेत को चर लिया,या खा लिया ऐसा सुनने में आया है ? एक औरत जब खुले-आम जब किसी की हत्या खासतौर पर जब वह एक रसूखदार व्यक्ति हो तब उसके भीतर उतर कर कम-से-कम उस पीड़ा को समझना चाहिए जहाँ उसने अपने घर की दहलीज़ से बाहर आकर हत्या करने जैसा कदम उठाया.प्रथम दृष्टया ही रूपम पाठक का मामला साफ़ दीखता है.ख़बरों के मुताबिक रूपम ने हत्या के बाड़ और घायलावस्था में अस्पताल ले जाते वक़्त यह लगातार कहा है कि-'मुझे मार दो,फांसी दे दो मैन जीना नहीं चाहती '-क्या अब भी कुछ कहने की बात रह जाति है.यदि रूपम पाठक बदनीयत वाली या ब्लेकमेलर महिला होती तो जाहिर तौर पर कभी सामने से वार नहीं करती ना ही इस मानसिकता के लोग करते हैं.अस्सी के दशक में एक बहुचर्चित फिल्म आई थी-'प्रतिघात'.इस फिल्म की नायिका अपने ऊपर हुए अत्याचारों से सब दरवाजों को खटखटाती है पर हमारा भ्रष्ट-तंत्र उस औरत को न्याय नहीं दिला पाता.नायिका अपनी अंततः हाथ में कुल्हाड़ी लिए मंचासीन विलेन को जो संयोग से एक विधायक ही है,काट देती है.रूपम पाठक के केस में प्रतिघात का याद आना अनायास ही है.क्योंकि जब भी व्यवस्था में बैठे लोग जनता को अपनी रैयत-मातहत समझेंगे और अपने क्षेत्र की महिलों को अपनी प्रापर्टी समझेंगे ऐसे दृश्य बार-बार घटित होंगे.मृतक विधायक से एक बड़ा तबका है जो सहानुभूति नहीं रखता.बावजूद उस व्यक्ति का वाहन दुबारा चुना जाना जनता के ऊपर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है.इधर एक नयी खबर आई है कि रूपम पाठक के समर्थन में बिहार की कै महिला नेत्रियों ने पार्टी लाइन से परे जाकर आवाज़ उठाई है.एपवा,जनवादी महिला मोर्चा,जदयू,लोजपा जैसी पार्टियों की महिलाएं एक साथ एक मंच पर आ खड़ी हुई हैं.पटना विश्वविद्यालय के छात्रों ने रूपम पाठक को न्याय दिलाने और इस मामले को विधायक की मौत से भी पहले सबके सामने लेन वाले पत्रकार नवलेश पाठक के लिए एक मानव-श्रृंखला बनायीं है.आईसा और इंकलाबी नौजवान सभा के छात्रों की यह पहल वाकई काबिले-तारीफ़ है.इस बीच मुख्यमंत्री ने यह घोषणा कर दी है कि मामले की सीबीआई जांच करायी जाएगी तब तक स्थानीय पुलिसिया जांच जारी रहेगी.यह वाकई चिंताजनक बात है.सीबीआई जांच होने तक इस मामले से कम-से-कम लोकल पुलिस को तो परे ही रखना चाहिए क्योंकि यह केस के हित में अत्यधिक जरुरी है.बिहार के समाजवादी बुद्धिजीवी तबके को जो आकंठ नीतीश गुणगान में आज डूबा है उसे भी खुलकर हर प्रकार से रूपम पाठक के साथ आना होगा और यह उसका नैतिक फ़र्ज़ भी है,kam-से-कम इस वर्ग से नैतिकता की उम्मीद हमें है ही.व्यवस्था कभी जनता फ्रेंडली नहीं होती वह उसका दिखावा करती है.वह एक कम करती है दस घोषणाएं भी जो कभी पूरी नहीं होनी है और खुद की पीठ भी खुद ही थपथपा लेती है.यह नहीं होता तो आज रूपम पाठक को ऐसा कदम उठाने को मजबूर न होना पड़ता क्या पता अगर आज भी नहीं चेते तो कल कोई और खड़ा होगा,क्योंकि दिनों-दिन दूषित होती जाती राजनीति का चेहरा भी वह नहीं रहा जो वह हमेशा जनता को दिखता रहता है.आज रूपम जैसी महिला-शक्ति सामने आई भले ही परिस्थितियाँ अलग थी तो कल कोई सुषमा आ जाएगी,उत्तर-पूर्व में मनोरमा का मामला और सशस्त्र बलों का अत्याचार पुरानी बात नहीं महिलाएं ऐसे ही सामने आएँगी.रूपम ने तो हत्या की है पर ऐसे कई उदाहरण हैं कि सत्ताधीशों की लपलपाती जिव्हा ने कईयों को आत्महत्या पर मजबूर कर दिया और बदले में कुछ महीने की सजा पाई.इस कमीनी व्यवस्था का चेहरा अभी उसी क्रूर मुस्कान के साथ हमारे इर्द-गिर्द चक्कर मार रहा है.
(जनसत्ता में दिनांक-१९.०१.२०११ को प्रकाशित )
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1/10/11

'अबाउट राम'- राम कथा की निराली प्रस्तुति


कहानी कहने का या सम्प्रेषण की दृष्टि से रंगमंच एक जीवंत और बहुत सशक्त माध्यम है यह सीधे तौर पर अभिनेता और दर्शक के बीच संवाद करता है और यह संवाद विविध रूपों में होता है-जैसे अनेक प्रकार की ध्वनियाँ ,शारीरिक मुद्राएं आदि अभिनेता अपने अभिनय से अपना सम्प्रेषण सामाजिकों तक प्रेषित करता है कभी गाकर,कभी नाच कर तो कभी अपने अभिनय से परन्तु ,मंच से अभिनेता अदृश्य हो और उसकी जगह कठपुतलियों,मुखौटो,तथा तकनीक को सामने लाया जाए तो संवाद के लिए एक कुशल और अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता होती है मानव के सहयोग से इनमें गतियाँ उत्पन्न होती हैं और यह बेजान होते हुए भी मंच पर बोल पड़ती हैं ,दर्शकों का जुड़ाव उससे हो जाता है इस तरह की प्रस्तुति कठिन तपस्या और निरंतर अभ्यास की मांग करती है नाटक की पश्चमी परंपरा में यूनानी देवता डायोनिशस के उत्सवों में मुखौटों को लगाने की परिपाटी थी जो आगे चलकर अभिनेताओं के मुंह पर लगाकर मंचासीन होने की परम्परा में आ गयी जापान की 'नोह'शैली या काबुकी में,तो अपने यहाँ ठेरुकुट्टू कुडीअट्टम आदि में इनका प्रयोग देखने को मिलता है यह मुखौटें सभी प्रयोगों में कथा के पात्रों को ही दर्शकों तक संप्रेषित करते हैं जब कठपुतली या नान-वर्बल नाटकों की बात आती है तब यह मुखौटें या चेहरे की पेंटिंग भाव-सम्प्रेषण में काफी बड़ी भुमिका निभाता है क्योंकि इनका इस्तेमाल उस नाटक की सर्जनात्मक जरुरत बन जाती है और ऐसे में यह मात्र एक उपकरण ना रहकर अभिनय-विधि की भुमिका में उतर आते हैं निर्देशक अनुरुपा राव और काठ्कथा पपेट आर्ट ट्रस्ट ,दिल्ली की प्रस्तुति 'अबाउट राम 'कहने को राम कथा भर है पर यह कठपुतलियों ,मुखौटों और तकनीक का विलक्षण नान-वर्बल संस्करण है इसके मंचासीन नाचते चित्र और पुतले इतने सजीव हो उठते हैं कि हमारे सामने राम का एक अलग ही रूप सामने आता है वैसे भी संसार में.साहित्य में राम के कितने रूप पढ़े-गाये-खेले जाते हैं,इसकी छानबीन की जाये तो एक अनूठी तस्वीर सामने आएगी भवभूति का राम इन सबने उत्तम है क्योंकि बाकियों के राजनीतिक राम के बरक्स उसकी छवि गृहस्थ राम की है,जिसने लोक के लिए एक तरह का अभिशप्त जीवन चुना 'अबाउट राम'भवभूति के राम का ही आधार लेकर राम कथा को कहने का एक अनूठा रास्ता है यह नाटक कठपुतलियों,मुखौटों और देहभाषा का अद्भुत समन्वय है कठपुतलियों के माध्यम से राम-सीता-रावण की यह प्रस्तुति कठपुतली रंगमंच का एक उंचा मानदंड खडा करती तथा इस तरह के रंगमंच की सीमाओं का विस्तार भी करती है कथा कहने में आजकल तकनीकी टूल्स काफी सहयोगी भुमिका निभाने लगे हैं पर यह सहयोग अतिरंजना पूर्ण होना चाहिए रंगमंच अभिनेता का माध्यम है और उसकी कमान उसीके हाथों में हो तो बेहतर रहता है अबाउट राम में कठपुतली अभिनेताओं को तीन सहयोगी अभिनेता भी उपलब्ध थे,जिन्होंने अपने सधे कौशल से नाटक का औत्सुक्य कभी कम नहीं पड़ने दिया इतना ही नहीं,अबाउट राम को पसंद करने के और भी कई कारण हैं-मसलन ,संगीत और मल्टीमीडिया का लाजवाब समन्वय इस नाटक के विजुअल्स जितने कमालके रहे उतना ही बेहतर इसका संगीत पक्ष भी रहा भारंगम में खेला गया यह नाटक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रशिक्षुओं के लिए एक नायाबउपलब्धि ही कही जाएगी कठपुतलियों,मुखौटों ,एनिमेशन,छवि-संयोजन,प्रकाश,संगीत-नृत्य के समन्वय से कथा-अभिव्यक्ति का यह रंगमंचीय प्रयोग राम के प्रति एक अजीब तरह की करुना भर देता है 'अबाउट राम' राम को दिव्यता के आसन से नीचे लाकर जनता के बीच खडा कर देता है,उस राम को जो अंततः एक सामान्य मनुष्य ही बनके सामने आया और यह किसी बड़े नाम के अभिनेता ने नहीं किया यह कहानी कही पुतलों ने और रोमांचित होकर आश्चर्य के साथ दर्शकों ने देखा बिना किसी परेशानी और दिक्कत के यह हमारे कथा कहने की एक अलग विधा की ताकत थी,जिसके लिए यह समूचा ग्रुप और विशेषकर इसकी निर्देशिका स्टैंडिंग एवियेशन की हकदार हैं

1/9/11

जाना 'बालेश्वर यादव' का-स्मृति शेष


आज जबकि भोजपुरी लोक-संगीत अपनी अस्मिता की लड़ाई में संघर्षरत है,वैसे में बालेश्वर यादव जैसे लोक-गायक के असमय निधन से भोजपुरी अंचल और इसके लोकसंगीत को अपूरणीय क्षति हुई है.बालेश्वर यादव भोजपुरी समाज और भाषा के महेंद्र मिश्र वाली परंपरा के लोक कलाकार थे.श्री यादव लखनऊ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी अस्पताल में कुछ समय से इलाज़ हेतु भर्ती थे.बालेश्वर यादव को उत्तर प्रदेश की सरकार ने 'उनके लोक-संगीत में अतुलनीय योगदान हेतु 'यश भारती सम्मान'से नवाज़ा था.इतना ही नहीं बालेश्वर पुरस्कारों की सरकारी लिस्ट के गायक नहीं बल्कि सही मायनों में जनगायक थे,उन्होंने भोजपुरी के प्रसार के अगुआ के तौर पर देश-विदेश में पहचाने गए.ब्रिटिश गुयाना,त्रिनिदाद,मारीशस,फिजी,सूरीनाम,हौलैंड इत्यादि देशो में मशहूर बालेश्वर यादव जी के मौत भरत शर्मा,मदन राय,प्रो.शारदा सिन्हा, आनंद मोहन,गोपाल राय जैसे गायकों को भोजपुरी अस्मिता में उनका साथ देने वाले एक स्तम्भ के गिरने जैसा है.ईश्वर बालेश्वर यादव जी की आत्मा को शांति दे और भोजपुरी गीत संगीत से बलात्कार करने वाले सड़कछाप गायकों को सद्बुद्धि दे

भारतीयता की ओर लंगड़ी प्रस्तुति 'सलाम इंडिया'(लुशिन दुबे)


नाटक में महत्वपूर्ण यह है कि जो प्लाट आप चुनते हैं , उसकी स्टोरी टेलिंग सही टाईमिंग और तरीके से मंच पर हो | वह नाटक अपने मंच पर उतरने के साथ ही,अपनी आगे की जिज्ञासा प्रेक्षकों में जगा दे | ऐसा होने के लिए खेले जाने वाले नाटक के रंगपाठ का कसा हुआ होना चाहिए फिर बारी आती है-अभिनेताओं की | नाटक की प्रस्तुति में नाटक,दर्शक और स्पेस का सम्बन्ध महत्वपूर्ण होता है | जब नाटक रनिंग टाईम में इन तीनों से अलग होता है,वैसे ही डिरेल हो जाता है | यह त्रयी टाईम,एक्शन,प्लेस की त्रयी से तनिक अलग है |लुशिन दुबे द्वारा निर्देशित 'सलाम इंडिया'(अभिमंच सभागार,रानावि)इसी तरह के डिरेलमेंट का शिकार हो जाता है | 'सलाम इंडिया'पवन वर्मा के बेस्ट सेलर पुस्तक 'बीईंग इंडियन'से प्रभावित है और इसके नाटककार नागालैंड के निकोलस खारकोंगकर हैं | इस नाटक में कोलाज़ की तरह चार कहानियों के सोलह किरदारों को मंच पर चार अभिनेता निभाते हैं | पर कई बार ऐसा होता है कि अभिनेता अपने-अपने चरित्र को निभाने में काफी लाउड हो जाते हैं | नाटक में कई सामाजिक इश्यु उठाए गए हैं,जिनमें कई पेंच रखे गए हैं,दिक्कत केवल निर्वहन को लेकर है | बैरी जान की शिष्य रहीं दुबे अलेक पदमसी के नाटक 'लेडी मैकबेथ' में निभाई अपनी भूमिका के लिए सराही जा चुकी हैं,पर भर्तिया की कहानी कहने में उनके भीतर का कलाकार भूमिका से न्याय करने में असफल रह जाता है | भारतीय और खासकर शहर-ए-दिल्ली के चार अलग-अलग संस्कृतियों/समाजों की कहानी और वैश्विक/ग्लोकल होते जाते भारत और इसके लोगों की कथा कहते कहते यह नाटक लंगड़ी चाल में रेंगकर एक सतही प्रस्तुति बनकर रह जाती है | ऐसे समय में जब कई छोटे सेंटर्स के रंगकर्मियों का रंगकर्म हमें एक नयापन अपने सीमित कूबत के बावजूद लगातार दे रहा है,वैसे में इतने सीनियर रंगकर्मियों ,सच कहें तो फाईव स्टारी रंगकर्मियों को भी एक नए नज़रिए का रंगकर्म सामने लाना चाहिए जिसकी कथा-कहने की शैली कम-से-कम कायदे की हो | लुशिन दुबे के इस नाटक ने वाकई बहुत निराश किया |



"१३वां भारंगम"-फिर वही कहानी


पिछले तेरह वर्षों से भारंगम सफलतापूर्वक अपने नए नए सोपानों पर चढ़ता जा रहा है | इसमें कोई दो-राय नहीं कि इसने एक अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप गढ़ लिया है | बावजूद इसके हर बार भारंगम एक ख़ास तरह के रंगकर्मियों,नाटकों और खेमेबाज़ियों के कारण हमेशा चर्चा में रहा है,जो कि विवादों की जमीन पर पनपे पौधे सरीखा है | इसके कई वाजिब कारण हैं | मसलन-

(१) इस समारोह में वही कुछ चेहरे क्यों रिपीट होते रहते हैं जिनका योगदान भारतीय रंग-परंपरा को बढाने में कुछ विशेष नहीं है और वह अभी लर्निंग पीरियड में ही हैं पर,वह इस आयोजन के प्रतिनिधि रंग-व्यक्तित्व बने दीखते हैं ?

(२) क्यों यह समारोह आज भी एक ईमानदार भारतीय रंग-परम्परा का मंच नहीं बन पाया ?

(३) इतना ही नहीं,यह समारोह हर वर्ष इस तथ्य की जाने-अनजाने पुष्टि करता क्यों दीखता है कि जो रंगकर्मी या दल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के आला हाकिमों के खेमे का नहीं उनके नाटकों को ही इस समारोह का एंट्री कार्ड क्यों मिलता है?

(४) क्यों अब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ही पास आउट (प्रशिक्षित)स्नातकों को ही वरीयता मिलती रही है ?

(५) इस समारोह में पिछले कुछ समय से विद्यालय के खेले गए छात्र प्रस्तुतियों को शामिल कर लिया जाता है ?

(६) बाकी बचे-खुचे में रेपर्टरी के अधिक खेले गए प्रस्तुतियों को शामिल कर लिया जाता है ?

(७) क्या ऐसे प्रयास इस महोत्सव को एनएसडी के रेडियस तक ही सीमित नहीं कर देंगे ?

(८) ऐसे कदम से क्या यह समझ बनाने की कोशिश की जा रही है कि यही एकमात्र प्लेटफार्म है,जिसने भारतीय रंगकर्म को पूरी तरह बचा रखा है ?

ऐसे और कई प्रश्न हैं,जो इस धारणा की पुष्टि करते हैं कि वाकई कुछ ऐसा चल रहा है या हो रहा है,जो कम-से-कम एक भारतीय रंग महोत्सव के पाक-साफ़ ईमेज बिल्डिंग के लिए किसी तरह से ठीक नहीं है | १० वें भारंगम में प्रख्यात रंगकर्मी प्रसन्ना ने एनएसडी के इस कार्यक्रम का खुलेआम बहिष्कार किया था और बहुत मुखर होकर कहा था कि-'इस महोत्सव को केवल एनएसडी तक सीमित कर देने से उन प्रस्तुतियों को जगह नहीं मिल सकेगी,जो बहुत बेहतर हैं और एनएसडी में सम्बंधित नहीं हैं |'रानावि समिति ने प्रसन्ना के इस तर्क को तब खारिज करते हुए कहा था कि,चूँकि इस वर्ष एनएसडी ने अपनी स्थापना के पचास वर्ष पुरे किये है,अतः रानावि के प्रशिक्षित रंगकर्मियों पर जोर ज्यादा है पर उनका संकेत यह था कि अगले वर्ष से यह व्यवस्था पूर्ववत हो जाएगी | यह व्यवस्था पूर्ववत होने का आश्वासनरूपी लेमनचूस आज तक उन रंगकर्मियों के मुँह में पडा हुआ है,जो बरसोंबरस से अपना रंगकर्म देश के छोटे-बड़े सेंटर्स पर प्रदर्शित करते जा रहे हैं | ऐसे में उनके मन में यह धारणा गांठ मारती जाए,कि इस भारंगम में रानावि दिल्ली में बैठे किसी माई-बाप के एटेस्टेशन या पुश के उनका काम देश-दुनिया के सामने इस मंच से नहीं दिखाया जा सकता,तो क्या आश्चर्य ? समझ में नहीं आता कि यह जो बेहतरीन(?) और बड़ा आयोजन थियेटर को प्रभावी भूमिका में लाने के लिए हो रहा है,उसके आयोजक या मालिक-मुख्तार इसके एक मुकम्मल भारतीय (विदेशी भी )रंगकर्म की भूमिका का प्रसार रचने में कितना गंभीर है? कितनी ईमानदारी से इसे आम-दर्शक से जोड़ने का प्रयास हो रहा है(अब तो कोई टिकट मूल्य भी ऐसा नहीं बचा कि आम छात्र भी इसका हिस्सा बन पाए ) तथा एनएसडी से दूर रहकर चुपचाप रंगकर्म में प्रवृत अनेक रंगधुनी कैसे और कब अपना मुकाम इस मंच पर पा सकेंगे | जिस दिन यह कदम ईमानदारी से उन अब तक उपेक्षित रंगधुनियों तक चलके जायेंगे तब इस रंग-महोत्सव का स्वरुप और विशद,विशाल, रंगीन और सम्पूर्ण हो सकेगा | कुछ ऐसा कदम हो,जिसका रूप वास्तव में अखिल भारतीय हो | जहां एनएसडी के साथ-साथ भारत भवन,भारतेंदु नाट्य अकादमी,कालिदास रंगालय,सुदुर पूर्वोत्तर,दक्षिण,पश्चिम और उत्तर के अनेक छोटे-बड़े सेंटर्स के रंगकर्मी अपने-अपने मास्टरपीस लेकर आने वाले समय में इस मंच पर आयें और सम्पूर्ण विश्व के सामने सच्चे अर्थों में भारतीय रंग-परंपरा को लाये | बिना यह हुए भारंगम अपने उद्देश्यों में इसी तरह के विवादों की नर्सरी बनता रहेगा |
और किसी मुगालते या गफलत कि हमीं बेस्ट हैं, में रहकर केवल अपनी पीठ थपथपाने से भी कुछ नहीं होने वाला है ऐसे में यह महज़ चमकदार वार्षिक आयोजन ही रह जायेगा | जो भारंगम के चरित्र और मंच के लिए तो अच्छा कतई नहीं है | पर यह घेरे-खेमे से परे कब जायेगा,कुछ साफ़-सा नहीं दिख रहा | भारतीय राजनीति के चरित्र और तेवर की झलक कला-जगत में ना ही दिखे तो बेहतर है,क्योंकि यह रंग-ढंग वहीँ का है,जिसकी जगह कम-से-कम भरतमुनि के वंशजों की कर्मस्थली में नहीं है और ना होना चाहिए |

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...