1/4/13

नौटंकी

उत्तर भारत के इस लोकनाट्य शैली की प्रसिद्धि का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके प्रभाव में उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश तक आते हैं | जयशंकर प्रसाद नौटंकी का सम्बन्ध नाटकी से जोड़ते हैं | अन्य लोक नाटकों की ही तरह नौटंकी के शुरुआत और नामकरण के सम्बन्ध में पर्याप्त मतभेद हैं | कोई इसका सम्बन्ध महाकवि कालिदास के 'मालविकाग्निमित्रम्' के स्वांग नाट्य से जोड़ता है, तो कोई सिद्ध कन्हपा के डोमिनि के साथ | ब्रजभूमि में इसका सम्बन्ध नखरीली नवयुवती से जोड़ा जाता है  | बहरहाल, जो भी हो, नौटंकी लोकनाट्य की जनप्रिय विधा है और इसका इतिहास भी अधिक पुराना नहीं लगता, क्योंकि इसके प्रदर्शनों पर कई अन्य नाट्यों का भी प्रभाव है | लोकनाट्यों के अध्येता शिवकुमार 'मधुर' इसे कुल डेढ़ सौ वर्षों का बताते हैं | नौटंकी के बारे में वह लिखते हैं -"जहाँ बृज क्षेत्र में स्वांग और भगत नामक लोकमंच लीला-नाटकों से प्रभावित होकर भक्ति भावों से ओत-प्रोत रहा, वहाँ पंजाब और हरियाणा में वाजिद अली शाह के रहस और अमानत (लखनवी) की 'इन्दर सभा' के रंग वाली उर्दू काव्य शैली और तुर्राकलंगी की गायन शैली में नौटंकी श्रृंगारपरक नाट्य-प्रस्तुति के रूप में सामने आयी | श्रृंगार और मनोरंजन प्रधान लोक मंच की प्रकृति के अनुरूप शहजादी नौटंकी और फूलसिंह की प्रणय कथा इतनी सार्थक सिद्ध हुई कि वह नाट्य-प्रस्तुति उत्तर भारत की इस लोक नाट्य शैली का पर्याय हो गयी |"(छाया नट, अंक-14,पृष्ठ-31.)  

नौटंकी के शिल्प पर बात करते हुए नाटककार मुद्राराक्षस इसे 'एपिक थियेटर' के समकक्ष खड़ा करते हैं -"नौटंकी विधा की बहुत बड़ी विशेषता है, इसकी महाकाव्यात्मकता | बहुत बाद में ब्रेख्त ने एपिक थियेटर की वह परिकल्पना की है, जो नौटंकी में पहले से ही मौजूद दिखाई दी |"(रंगदर्शन,नेमिचंद्र जैन,पृष्ठ-212.) नौटंकी में 'नगाड़ा'(नौटंकी का प्राण) और 'रंगा' की भूमिका महत्वपूर्ण होती है | प्रदर्शन में चौबोलों, ठुमरी, दादरा, बहरे तबील, सवैया और दोहों की लड़ियाँ लगायी जाती है | नगाड़े पर लगातार चोटें मारकर दर्शकों को आकर्षित किया जाता है | नौटंकी का मंच अब अधिक साज-सज्जा का होने लगा है, पहले यह सामान्य ही हुआ करता था | इसमें कुछेक तख्तों को जोड़कर मंच-निर्माण कर लिया जाता है | मंच के तीन तरफ दर्शकों के बैठने की व्यवस्था होती है | सूत्रधार नौटंकी की कथा को संगीतमय भाषा में आगे बढ़ाता है और साजिंदों के मंच पर ही बैठने की सुविधा होती है | 


मेलें लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं और नौटंकी मेलों का बड़ा आकर्षण | इसकी कथा मूलतः लोक प्रचलित आख्यान ही होते हैं, पर कुछ सामाजिक उपदेशात्मक कथाएँ भी इसमें दिखायी जाती है | अधिकतर नौटंकी कथानक धार्मिक कथाओं पर आधारित हैं, यथा- भक्त प्रहलाद, सत्य हरिश्चंद्र, दानी मोरध्वज, पूरनमल आदि | हीर-रांझा, लैला-मजनूँ, शहजादी नौटंकी और फूलसिंह पंजाबी, अमरसिंह राठौर आदि अन्य कहानियाँ हैं, जो नौटंकी मंडलियों में मशहूर रही हैं | इसके अलावे नौटंकी के उस्ताद पंडित नत्थाराम गौड़ रचित 'सुल्ताना डाकू' भी बहुत प्रसिद्ध नौटंकी है | नौटंकी के कथाओं के शब्दों के द्वारा जनता के मर्मस्थल छूने की कवायद होती है | जो कथा जितनी ज्यादा दर्शकों से जुड़ेगी, वह उतनी ही मशहूर होती है |

संगीत नौटंकी की जान होती है, इसलिए नौटंकी के अभिनेताओं और अभिनेताओं से संगीत की समझ की अपेक्षा की जाती है | संगीत में लोकधुन और शास्त्रीय का सम्मिश्रण होता है और संवाद गद्य-पद्य दोनों में | साथ ही, नौटंकी के अभिनेता में 'इम्प्रोवाईजेशन' की कुशलता उसकी महती योग्यता मानी जाती है | जहाँ तक इस नाट्य विधा के अभिनेत्रियों की बात है, तो इसमें भी स्त्री चरित्र पहले सुकुमार पुरुष ही निभाया करते थे, कालांतर में स्त्री अभिनेत्रियों का भी इस मंच पर आगमन हुआ | ऐसी ही नौटंकी की एक अभिनेत्री का नाम गुलाब बाई है, जिन्हें 'क्वीन ऑफ़ नौटंकी' कहा गया है | "नौटंकी के प्रदर्शन में दृश्य-विधान अथवा उपकरणों का कोई स्थान नहीं | इसका रंग-विधान सीधा और सरल होता है |........संगीतमूलक नौटंकी कल्पनाप्रधान थियेटरी रचना है, जिसमें यथार्थ के अनुकरण का प्रयत्न तनिक भी नहीं किया जाता |"(लेख,राजस्थान और मालवा का ख्याल नाच,डॉ.महेंद्र भानावत,मालवा का लोकनाट्य और अन्य विधाएं ,सं.डॉ.शैलेन्द्र कुमार शर्मा,पृष्ठ-28.)  पर नौटंकी में अब आधुनिक उपकरणों और तामझाम ने जगह बनानी शुरू कर दी है | अब किसी नौटंकी समूह के प्रभाव और उसके ऑडीएंस का निर्माण उसके अभिनेता, कथानक, शेर और चौबोल ही नहीं करते, बल्कि अब उनके लिए मंच का आडम्बर भी जरुरी हो गया है |

इतना ही नहीं हिंदी रंगमंच और नाट्यलेखन पर भी नौटंकी शैली ने अपनी छाप छोड़ी है | सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की 'बकरी', लक्ष्मी नारायण लाल की 'एक सत्य हरिश्चंद्र' और मुद्राराक्षस का 'आला अफसर' नौटंकी शैली में लिखी नाट्य रचनायें हैं | फणीश्वर नाथ रेनू की चर्चित कहानी मारे गए गुलफाम उर्फ़ तीसरी कसम नौटंकी वाली से एक गाड़ीवान के असफल प्रेम की कहानी है | यह नौंटकी का ही जादू है, जिससे प्रभाव से साहित्यकार भी नहीं बच पाए |
 (published in hindi daily JANSATTA's samantar column on 25th january 2013)
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1/2/13

विदापत नाच या कीर्तनिया

जगदीशचन्द्र माथुर ने बिदापत नाच को 'उत्तर बिहार की अल्प-परिचित प्रदर्शन-विधा' से अभिहित किया है | "बिहार के पूर्णिया जिले में 'बिदापत नाच' नाम से एक आंचलिक नाटक की परंपरा है | इसमें मध्ययुगीन मिथिला के किर्तनियाँ नाटक तथा असम के अंकिया नात दोनों की झलक दिखाई पड़ती है | मंडलियों में प्रायः किसान और मजदूर होते हैं - अधिकतर हरिजन-वर्ग के |.......मंच और अभिनय परंपरा में असमिया अंकिया नाट का प्रभाव अधिक स्पष्ट है |.......जिस स्थान पर पात्र अपनी सज्जा करते हैं, उसे यहाँ 'साज घर' कहा जाता है | इसकी तुलना असमिया-नाटक के 'छ्घर' या 'छद्मगृह' से की जा सकती है |"(देखें,परंपराशील नाट्य ,जगदीशचंद्र माथुर,पृष्ठ-88.) इसमें मंच का विधान मुक्ताकाशी होता है | अन्य लोक नाटकों की तरह ही इस नाट्य-रूप की शक्ति इसका 'संगीत' पक्ष ही है | मुख्य गायक 'मूलगाईन' कहलाता है और उसके साथियों को 'समाजी' कहा जाता है | मूलगाईन असम नाट्य अंकिया के मूल गायक को भी कहते हैं, तो उधर समाजी भोजपुरी के नाट्य रूप बिदेसिया में भी उपस्थित होते हैं | गीतात्मक अभिव्यक्तियों से पात्रों का परिचय करवाना और 'बिकटा'(विदूषक) इसकी कुछ अन्य विशेषताएं हैं | 

बिदापत मूलतः विद्यापति का अपभ्रंश शब्दरूप है | विद्यापति के गीत (प्रत्येक नाटक और प्रस्तुति का भगवती वंदना से शुरू होना) का नाटकीय प्रयोग इस नाम प्रचलन के पीछे रहा होगा, ऐसा माना जा सकता है | बिदापत नाच की शुरुआत 'भगवती वंदना' से या 'विघ्नविनाशक गणपति की वंदना' से होती है | इसके कथावस्तु का आधार लोक-प्रचलित धार्मिक आख्यान ही हैं | उमापति उपाध्याय रचित 'पारिजात हरण नाटक'(1325 ई.) इसका प्रतिनिधि नाटक है | माथुर जी ने यहाँ भी इसका सन्दर्भ असम से जोड़ा है - " 'पारिजात हरण' नाम से महापुरुष शंकर देव ने असम में 15वीं सदी के आसपास एक दूसरा नाटक लिखा, जो रंगमंचीय तत्वों में उमापति उपाध्याय के नाटकों की अपेक्षा अधिक समृद्ध है | झिरवा गाँव के जनकदास की मंडली ने,जो 'पारिजात हरण' नाटक खेला, उसके लेखक का नाम वे नहीं दे सकें | किन्तु, जान पड़ता है कि उसमें दोनों ही नाटकों का सम्मिश्रण है |"(वही,पृष्ठ-88-89.) 

बिहार के लोकनाट्यों पर असम और कलकत्ते (पूरब मुलुक) के सांस्कृतिक प्रभाव का मुख्य कारण यहाँ के मजदूरों का पूरब देश की और आजीविका के लिए उधर जाना और दिन-भर के थकान के बाद मनोरंजन के लिए उनके नाटकों को देखकर, वापिस आते वक़्त उन परम्पराओं को आत्मसात करके अपना एक नाट्यरूप अपनी जमीन पर तैयार किये जाने को हम स्वाभाविक तौर पर मान सकते हैं | कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु ने 'बिदापत नाच' पर एक लेख भी लिखा है और अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'मैला आँचल' में एक दृश्य भी खींचा है |  

बहरहाल, बिदापत नाच के मूलकथा से पहले वाद्यों (ढोल और मृदंग, झाल आदि ) की संगत बिठाई जाती है | (दर्शकों का जमावड़ा तैयार करने की, माहौल बनाए की यह जुगत हमें और भी कई नाट्य रूपों में देखने को मिलती है |) "इसे यहाँ (मिथिला) वाले 'जमीनिका' कहते हैं | 'जमीनिका' का अर्थ है भूमिका और 'जमीनिका' 'यवनिका' का अपभ्रंशित रूप होगी, ऐसा माथुर जी ने भी माना है | (देखें,वही,88-89.) कीर्तनियां नाम के पीछे की वजह इसके कीर्तन शैली के गीत-भजन-संगीत की अधिकता है | इसके प्रणेता उमापति उपाध्याय कीर्तन शैली में कृष्ण की मूर्ति के सामने नाचते और गाते थे | यह गायन और नृत्य बाद में इसका ट्रेडमार्क स्टाईल बन गया | इसमें भी पूर्वरंग में सूत्रधार नांदी पाठ के बाद ही वार्ता शुरू करता है | 

इस नाट्य रूप पर रामलीला और रासलीला का भी प्रभाव दीखता है | दरअसल, "किर्तनिया शैली में वही लचीलापन है,जो रामलीला और रासलीला लोकनाट्य शैली में है | रामलीला करने वाले लोग एक ओर पूरे रामचरित मानस को मंच पर उतारने की शक्ति रखते हैं,तो दूसरी ओर राधेश्याम कथावाचक की शैली में लिपिबद्ध रामकथा को मंचस्थ करने का सामर्थ्य भी रखते हैं |"(देखें,मैथिली साहित्यिक इतिहास,प्रो.बालगोबिंद झा'व्यथित',पृष्ठ-48-49.)

इस नाट्यशैली में मुखौटों का प्रयोग भी देखने को मिलता है | कृष्ण और शिव के गण मुखौटे धारण किये मंच पर आते हैं और "उस समय समाजी जो गीत गाते हैं उसकी गति त्वरा होती है और 'मार्चिंग सॉंग ' की-सी ध्वनि निकलती है |"(प्राचीन भाषा नाटक,सं.जगदीशचंद्र माथुर/दशरथ ओझा,पृष्ठ-46.) पद्यात्मक संवाद इस शैली की विशेषता है, इसमें प्रवेश और संवादों के स्तर पर गीतों का प्रयोग दिखाई देता है |

वास्तव में, यह लोकनाट्य शैली अपने मंचन और स्वरुप में 'टोटल थियेटर' है और इसके प्रदर्शन के इतिहास पर नज़र डालें, तो यह "लोकभाषा का आदि रंगमंच"(देखें,बिहार विहार, सं.विनोद अनुपम,पृष्ठ-४१.) | इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके प्रभाव क्षेत्र में न केवल मिथिला प्रान्त बल्कि नेपाल, उड़ीसा, असम और बंगाल तक के क्षेत्र हैं | 
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1/1/13

लोकनाट्य सांग

[जन्नत टॉकीज पर लोक नाट्य रूपों के बारे में  एक इन्फोर्मेटिव(सूचनात्मक) टिप्पणी  की पहली कड़ी में हरियाणा के लोक नाट्य सांग के बारे में चंद बातें ]

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हरियाणा का लोकनाट्य ‘सांग’ नाटक के किसी शास्त्रीय रूप और बंधन से पूरी तरह नहीं जुड़ता | श्री जगदीश चंद्र प्रभाकर “सांग को प्राचीनतम नाम ‘संगीतक’ मानते हैं | उनका मानना है कि ‘संगीतक’ से ‘सांगीत’ और ‘सांगीत’ से ‘सांग’ शब्द विकसित हुआ|"(देखें,हरियाणा पुरातत्व,इतिहास,संस्कृति एवं लोकवार्ता,पृष्ठ-२०६).जबकि सुरेश अवस्थी ने नौटंकी, संगीत, भजन, निहालदे और स्वांग को समानार्थी मानते हुए, स्वांग को इसका प्राचीनतम रूप माना है |”(भारतीय नाट्य साहित्य,डॉ.नगेन्द्र,पृष्ठ-४१०). सांग की उत्पत्ति का सन्दर्भ चाहे जो हो, पर इतना तय है कि यह हरियाणा के जनसमुदाय की सांस्कृतिक पहचान है | जैसे कि हर प्रदेश का लोकनाट्य उसका सांस्कृतिक दस्तावेज़ होता है, वैसे ही सांग भी हरियाणा का सांस्कृतिक दस्तावेज़ है |

सांग खुले आसमान के नीचे, चौतरफा दर्शकों से घिरा लोकरंजन और लोकरुचि का क्षेत्र है | इसके कलाकर अभिनय कुशल, संगीत विशेषज्ञ तथा दर्शकों को नृत्य-संगीत और भाव-सम्प्रेषण के साथ बाँधकर रखते हैं | ‘सांग’ में पंडित लखमीचंद की प्रसिद्धि बहुत है, इन्हें ‘सांग सम्राट’ की उपाधि से अभिहित किया जाता है | पंडित लखमीचंद सांग में कई प्रमुख भूमिकाएं स्वयं निभाते थे | हरिश्चंद्र सांग में “उनका अभिनय इतना अचूक होता था कि हजारों दर्शक सांग देखने के बाद आँसू लिए घर लौटते थे | यही तो लोक कविता और लोक नाट्य की सबसे बड़ी खूबी है कि दर्शक पात्रों के साथ ही जीते हैं |”(पंडित लखमीचंद ग्रंथावली,श्रीकृष्णचन्द्र शर्मा, पृष्ठ-१९.)

सांग में भी मंच की सज्जा साधारण ही होती है | यह मंच पर किसी बड़े तामझाम को नहीं अपनाता, लोक पोषित इन नाट्य-रूपों में इसकी सम्भावना भी अधिक नहीं है, वरना यह भी अभिजन का कृत्रिम मंच बन जायेगा | तब इन नाट्य रूपों की सहजता भी समाप्त हो जायेगी | इस नाट्य में मुख्य कलाकार अपने साथियों और प्रयोग में आने वाले वाद्य-यंत्रों के साथ मंच पर ही बैठता है और पात्र मंच पर ही घूम-घूमकर अभिनय करते हैं | राजेंद्र स्वरुप वत्स लिखते हैं-“यद्यपि उपलब्ध सांगों में हिंदी के नाटकों की तरह देशकाल व वातावरण का सृजन करने के उद्देश्य से वेशभूषा, आभूषण इत्यादि के संबंध में कोई लिखित निर्देश नहीं मिलते, फिर भी समस्त विश्वस्त सूचकों से लखमीचंद की सांग मंचन कला के बारे में प्राप्त सूचना के आधार पर यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि लखमीचंद अपनी सहज बुद्धि व अनुभव के बल पर वेशभूषा, आभूषण इत्यादि के माध्यम से वांछित देशकाल व वातावरण का सृजन कर लेते थे |”(सांग सम्राट पं.लखमीचंद,पृष्ठ-२३४.)

सांग में गीत-संगीत-नृत्य का संयोजन एवं उत्कृष्ट अभिनय उसके प्रभाव में वृद्धि कर देता है | सांग का अभिनेता हाव-भाव, चुहल, छेड़छाड़, आंगिक क्रियाओं से दर्शकों को अपने से जोड़ता है | सांग में मूल कथा के बीच में एक पात्र ‘भांड’ या ‘नकलची’ आता है, जो अपने क्रियाकलापों से दर्शकों का मनोरंजन भी करता है और मुख्य कथा में सहयोग भी देता है | अमूमन सांग का अभिनेता अपने हाव-भाव,चुहल,छेड़छाड़,वाक्-पटुता और आंगिक क्रियाओं से दर्शकों को अपने साथ जोड़ता है पर इस प्रयास में उसके संकेत कभी-कभी अश्लील भी हो जाते हैं| परन्तु यह बस उस लोक के भीतर पैठने के क्रम में हुआ अभिनय होता है, अतः सांग प्रेमी जनता इसकी परवाह नहीं करती | सांग में समस्त मंचीय क्रियाव्यापार पुरुषों द्वारा निभाया जाता रहा है,हालांकि देवीशंकर प्रभाकर ने अपने शोध-पत्र  में लिखा है "हरियाणा में कुछ ऐसी सांग मंडलियाँ भी काम करती रही हैं,जिनमें सभी औरतें काम करती थी | ये सांग मंडलियाँ यमुना के खादर में खेल खेलती थीं | इनमें कलायत की सरदारी, गंगरू की नरनी और इंद्री की बाली थीं|' (देखें,डॉ.केशवानंद ममगई, हरिगंधा,नवम्बर-८७-फरवरी-८८,पृष्ठ-७३.)पंडित लखमीचंद के अलावे सांग के कुछ चर्चित कलाकारों में मांगेराम,किशनलाल भाट,पंडित दीपचंद,पनदिर रतिराम,सरुपचंद,नेतराम,हरदेवा आदि प्रमुख हैं | सांग में काल्पनिक और लोकप्रचलित पौराणिक एवं प्रेमाख्यानक कहानियों को कथा आधार बनाया जाता है | हीर-राँझा, पद्मावत, सेठ ताराचंद, विराट पर्व, सत्यवान-सावित्री, नल-दमयंती, मीराबाई, पूरण भगत, शाही लकडहारा, मदनावत, हरिश्चंद्र इत्यादि प्रमुख सांग हैं |
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एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...