3/15/21

भोजपुरी के पहले ऑर्केस्ट्रा बैंड वाले 'मोहम्मद खलील'


वह साठ के आसपास का समय रहा होगा जब भोजपुरी के रत्न गीतकार भोलानाथ गहमरी के लिखे गीत के शब्द "कवने खोंतवा में लुकईलू आई हो बालम चिरई" और देवेंद्र चंचल के लिखे "छलकल गगरिया मोर निरमोहिया, ढलकल गगरिया मोर"- की टांस भोजपुरिया अंचल में गूँजी और घर-घर में, गले-गले में बस गयी। मोतिहारी के भवानीपुर जिरात मोहल्ला के रहने वाले भारतीय रेलवे के एक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी मोहम्मद खलील का तबादला बलिया से इलाहाबाद हुआ। फिर इलाहाबाद वह जमीन बना जहाँ उनकी गायकी के शौक ने भोजपुरी के पहले बैंड या यूँ कहिए कि ऑर्केस्ट्रा बैंड "झंकार पार्टी" को मजबूती से स्थापित किया, जिसके नींव बलिया की जमीन में डाली गयी थी। नबीन चंद्रकला कुमार ने इस झंकार पार्टी को भोजपुरी का पहला ऑर्केस्ट्रा बैंड बताते हुए लिखा कि "आज के दौर में जब भोजपुरी इलाके में ऑर्केस्ट्रा संस्कृति का मतलब एक खास तरह के नाच-गान रह गया है वहाँ मोहम्मद खलील का ऑर्केस्ट्रा इस अंचल की सबसे सार्थक सांगीतिक पहचान रहा है।" सीताराम चतुर्वेदी के गीत "छलकत गगरिया मोर निरमोहिया" और "अजब सनेहिया बा तोर निरमोहिया" गाकर मोहम्मद खलील ने भोजपुरी गायकी में वह स्थान और कद पाया, जहाँ से यह पैमाइश की जाने लगी कि यह खलील की गायकी के पासंग है या नहीं। जिस वक़्त भोजपुरी नित नए गायकों के अलबमों की बाढ़ टी-सीरीज जैसे बड़े कंपनियों और चंदा, नीलम जैसे स्थानीय कैसेट कंपनियों से आ रही थी, उस दौर में भी खलील के गायन के स्तर का कोई गायक न हुआ। मोहम्मद खलील की गायन प्रतिभा के लिए भोजपुरी के शिखर साहित्यत्कार कैलाश गौतम ने कहा था 'अब गीत तो हैं पर मोहम्मद खलील के अंदाज़ में टेर लगाने वाला कोई गायक नहीं है। खलील के गीत में आकर्षण ही आकर्षण है। थथमल मीठी आवाज़, अद्भुत संतुलन, खलील का अंदाज़ और गीतों का नयापन, यही था खलील के घर-घर पहुँचने का कारण। अब तो पता नहीं वैसे गीत लिखे जा रहे हैं कि नहीं, आगे खलील जैसे गायक होंगे या नहीं।"- वाकई नब्बे के शुरू में मधुमेह से ग्रस्त मात्र पचपन साल की उम्र में 1991 में जैसे ही मोहम्मद खलील इस दुनिया से रुखसत होते हैं, भोजपुरी गायकी एक अँधेरे कुँए में उतरती है और भोजपुरी को नोच खाने वाले गायकों की बाढ सी आती है पर खलील तक पहुँचने की कुव्वत किसी में नहीं होती। क्षणिक लोकप्रियता और अदूरदर्शिता ने भोजपुरी गायकी में एक शून्य पैदा किया, जिसकी भरपाई करने की कोशिश किसी की नहीं रही। बाद के गायकों ने कोशिश की लेकिन बाजार कहिए कि अधैर्यता कोई उस पैमाने पर खरा न उतरा। गले में शास्त्रीयता ला सकते हैं सुरीलापन ला सकते हैं, मुरकियाँ लगा सकते है, ऊँची तान मार सकते हैं पर मोहम्मद खलील के गाये गीतों की साहित्यिकता, गले की टांसदार, संतुलित आवाज़ और लोक का स्वच्छंद उल्लास कहाँ से लाते। वह मोहम्मद खलील के गायकी में थी, शायद यहीं वजह  जो उन्हें दूसरों से खास बनाती थी। सरस्वती का उनके गले ही नहीं चित्त में भी वास था। आज खलील होते तो पटेया नहीं किस पाले में जबरिया धकेले जाते लेकिन जब तक उनकी गायकी और झंकार पार्टी सलामत रही, गायकी की शुरुआत सरस्वती वंदना और देवी गीत ही गाया जाता था। "बिनइले सारदा भवानी, पत राखीं महारानी" और " माई मोरा गितिया में अस रस भरि दे, जगवा के झूमे जवानी" - भोजपुरी जगत में सरस्वती वंदना के शास्त्रीय मंत्र के सामने लोक की सीधी उपस्थिति है। मोहम्मद खलील को इलाहाबाद में चंदर परदेसी(हारमोनियम), इकबाल अहमद (वायलिन), हजारीलाल चौहान (बाँसुरी) और  मो. इब्राहिम (ढोलक) पर  संगत में मिले और महेंद्र मिश्र, श्रीधर शास्त्री, उमाकांत मालवीय, भोलानाथ गहमरी, राहगीर बनारसी, युक्तिभद्र दीक्षित, मोती बी.ए., बेकल उत्साही, पंडित हरिराम द्विवेदी जैसे गीतकारों के शब्दों को अपने गले में बिठाकर मोहम्मद खलील ने भोजपुरी गायकी में अपनी प्रतिभा का डंका पीट दिया। बाद के समय तो भोलानाथ गहमरी और मोहम्मद खलील का साथ एक दूसरे से ऐसे जुड़ा गोया सुर और ताल एकसम हो गए। मोहम्मद खलील ने भोजपुरी के हर मिज़ाज़ के गीत गए और एक से बढ़कर एक गाये। उनके कुछ बेहद चर्चित गीतों में "प्रीति करीं अइसे जईसे कटहर के लासा"/"गोरी झुकी झुकी काटेली धान, खेतिया भईल भगवान"/"सावन है सखी सावन"/"छिंटिया पहिर गोरी बिटिया हो गईली"/"लेले अईहा बालम बजरिया से चुनरिया"/"लाली लाली बिंदिया"/"प्रीति में ना धोखाधड़ी, प्यार में ना झांसा"/ "अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया हो"- प्रमुख हैं। मोहम्मद खलील के गाए गीतों ने आगे आने वाले कई गीतकारों को न केवल तुकबंदी करने, शब्दों के मेल बिठाने की अक्ल दी बल्कि संगीतकारों को भोजपुरी संगीत की एक तमीज़ सिखाई। मो. खलील ऑल इंडिया रेडियो और बाद के सालों में दूरदर्शन पर भोजपुरी गायकी की अनिवार्य उपस्थिति हो गए थे। पर एस डी ओझा एक अफसोस के साथ लिखते हैं - "जिसने भोजपुरी की नई राह रची, उसके रिकॉर्ड बाज़ार में नहीं हैं। रेडियो स्टेशनों या दूरदर्शन में हो तो हों।" एक पूरी पीढ़ी जिस गायक को सुन सुन रीझती रही उसके रिकॉर्ड उपलब्ध ना होना, भोजपुरी सांगीतिक परम्परा की सबसे बड़ा दुर्भाग्य है पर भोजपुरी के साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने वाले ऑनलाइन पोर्टल आखर ने अपने प्लेटफॉर्म पर उनके गीत, उन्हीं की आवाज़ में ही संग्रहित किए हैं। हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध संगीतकार नौशाद साहब मोहम्मद खलील की इस प्रतिभा के मुरीद थे।  दयानंद पांडेय मोहम्मद खलील पर लिखे अपने एक लेख में दर्ज करते हैं कि "नौशाद उन्हें मुम्बई लेकर आए तो वह अपने साथ परंपरागत साज़ों के साथ ही पहुँचे। नौशाद जब उनको गायकी में तब्दील करने को कहते तो एक दिन आज़ीज़ आकर नौशाद से उन्होंने हाथ जोड़कर कहा - 'नौशाद साहब जरूरत पड़ी तो मैं भोजपुरी के लिए खुद को बेच दूँगा पर अपनी कमाई के लिए भोजपुरी को नहीं बेचूँगा।' और वह चुपचाप अपनी टीम लेकर वापस इलाहाबाद लौट आए।"- भोजपुरी का आज का अधिकतर सांगीतिक परिदृश्य जहाँ फूहड़ शब्द, गायकी और दृश्य के षड्यंत्रों में डूबा हुआ है, वहाँ भोजपुरिये गर्व से सीना ताने कह सकते हैं कि एक दौर वह रहा है, जब हमारे मोहम्मद खलील भी हुए थे, जिसने रेलवे की नौकरी की और भोजपुरी की सेवा। वह दौर था जब भोजपुरी गायकी में द्विअर्थी गीत, ऑकवर्डनेस नहीं, उसका खालिस सौंदर्य था।  जिसमें ऑडिएंस के भेद का थोथा तर्क नहीं था। मो. खलील को मरणोपरांत 'भोजपुरी रत्न' से सम्मानित किया गया। 90 के शुरू में जैसे ही बाजार और उसके प्रभाव में भोजपुरी समाज और संगीत ने करवट ली, मोहम्मद खलील की विरासत भी विदा (1991) हो गई। मोहम्मद खलील के गाये गीत 'कवने खोतवाँ में लुकइलु आईहो बालम चिरई' की मानिंद आज की भोजपुरी की समृद्ध गायकी भी कहीं छिप गयी है। 
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मोहम्मद खलील के गीतों के कुछ लिंक 
https://youtu.be/J1jujZoFuEk (सरस्वती वंदना)

(अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया)

(लेले अईहा बालम बजरिया से)

(लेख द लल्लन टॉप पर प्रकाशित । बिना अनुमति किसी पोर्टल पर पब्लिश न करें - मोडरेटर ) 

3/9/21

खाओ कसम कि अब किसी ... लाली (शॉर्ट फिल्म)

 लहसनवाँ हीराबाई के यहाँ क्यों टिका? मालूम है? उसने हिरामन और साथियों को बताया था कि ‘हीराबाई के कपड़े धोने के बाद कठौत का पानी अतर गुलाब हो जाता है. उसमें अपनी गमछी डुबाकर छोड़ देता हूँ. लो सूँघो ना कैसी खुशबू आती है.’ – यही खुशबू तो शिवपूजन सहाय बाबू के धोबी को मिली है उसको भी एक दिन संयोग की बात ऐसी सनक सवार हुई कि वह कबूल बैठा ‘मैं उर्वशी और रंभा की साड़ियों और कुर्तियों को एकांत में सूंघ रहा था. उनकी मानसोन्मादिनी सुरभि से मस्तिष्क ऐसा आमोदपूर्ण हो गया कि  आँखों में मादकता की गहरी लाली उतर आयी.’ – शार्ट फ़िल्म “लाली” ( Laali Review ) देखते हुए हम उसके मुख्य नायक के साथ इन मानवीय भावों और उसके मनोविज्ञान को महसूसते हैं जिसे रेणु या शिवपूजन सहाय ने कभी लिखा था. इसमें अनायास ही कथानायक पंकज त्रिपाठी के एकाकी जीवन में यह भाव शामिल हो गया है, जहाँ वह लाली के लालित्य को सूँघता आत्मसात करने लगा है. यह साधारण कथा नहीं है बल्कि इसके हर फ्रेम में चिन्हशास्त्र का अद्भुत आख्यान है.  लेखक ने अपने निर्देशन में एक मुकम्मल साहित्यिक पाठ रचा है, जो शब्दों से अधिक इशारों में संवाद करती है और अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने निर्देशक की सोच को अपने अभिनय कौशल से लोक की नैसर्गिक सरसता में रूपांतरित करके साहित्यिक सिनेमाई भाषा में ढाल दिया है.

Laali Review

अभिरुप बसु लिखित निर्देशित शार्ट फ़िल्म “लाली” आधे घंटे से थोड़े ऊपर जाती है और पूरी कथा का चक्र पंकज त्रिपाठी के किरदार के आसपास चक्कर काटता है. एकावली खन्ना बेहद कम किन्तु जरूरी हिस्से के रूप में आती हैं. निर्देशक को अपनी लिखी कथा और उसके गढ़े दृश्यों में इतना भरोसा और महारत है कि उन्होंने संवाद और दृश्य भी तोल के रखे हैं, न सूत भर कम न, धेले भर ज़्यादा. हम इस फ़िल्म के फ्रेम दर फ्रेम में अभिनेता पंकज त्रिपाठी के अभिनय कौशल की मिश्री को घुलकर आबे-हयात होते देखते हैं. आपको उनका किरदार याद रहता है, उसका मायावी नाम नहीं. शुरुआत ही लंबे वन टेक शॉट के साथ होती है और आप लगातार किरदार के एक्शन्स में खुद भी किस्से के बहाव को तलाशने लगते हैं. किस्सा क्या है – ऊपरी तौर पर बस एक अकेला शख्स, एक जनाना ड्रेस और उसके साथ उस आदमी का जिया गया चंद पहरों में कुछ क्षण. जिनमें वह किरदार है और उस लाली की मधुर स्मृतियाँ, एक बिम्ब, जिसमें उसका, उससे यूँ ही मन का करार था.

बिहार के भोजपुरी इलाकों से कलकत्ते की ओर गए बिदेसियों की एक आधी हकीकत और आधे फसाने की ज़िंदगी का एक सच यह भी रहा है- एककी जीवन में एक लाली का स्वप्न. धर्मतल्ला के आसपास पतुरिया का नाच देख नौजवान बिदेसिया के पास बर बुता जाने को क्या था – देह! उढ़रिया ऐसे ही तो शामिल हुई उसके खालीपन में. और लेखक अभिरुप कलकत्ते की जमीन पर उगे इस दृश्य के एक हिस्से से अपने कथानायक का एकांत और उसकी जिंदगी के एकरसता को चुनते हैं. पंकज त्रिपाठी के लिए कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति न होगी कि लाली का यह अभिनेता कोई और ही है, जिससे अपने सिनेजगत का परिचय न था. रेडियो में बेचैन मन का सुकून तलाशते ‘चैन आये मेरे दिल को दुआ कीजिए’ वाला किरदार, एक कमरे और चंद फ्रेम की ज़िंदगी में एक पोस्टर की कोमल कल्पना के साथ उस ड्रेस को शामिल कर दर्शकों को यह बताने में सफल होता है कि हम सब अपने साथ कुछ आद्य स्मृतियाँ रखते हैं और उनके सहारे एक स्वप्न देखते हैं और जीवन कट जाता है. प्रकाश, लेंस, संगीत और सबसे प्रभावी पंकज त्रिपाठी का अभिनय एकाएक मणिकौल के ‘उसकी रोटी’ जैसा प्रभाव पैदा करने लगता है. हालांकि तुलना असंगत है और अभिरुप को अभी अपने को भी सिद्ध करना बाकी है लेकिन वह खालीपन जो सुच्चा की बीवी के हिस्से के इंतज़ार में दिखता था, उसका सबसे जटिलतम और महीन विन्यास पंकज त्रिपाठी के अभिनय में लाली में उभरता है. खासकर उस किरदार के सपने के टूटने और उन चंद घड़ियों की लाली के टूट जाने के क्रम में जब पंकज त्रिपाठी हारकर थसमसा कर बैठते हैं तो लगता है गोया वाकई जीवन का एक हिस्सा ही खत्म हो गया. रेत आखिर कब तक मुट्ठी में ठहरती. मारे गए गुलफाम के किस्से से गुजरते वह बात जेहन में उभरती है “भूख वही अच्छी जो पूरी हो, प्यास वही अच्छा जो मिट सके, प्यार वही अच्छा जहाँ जुनून हो, प्रेमी वही अच्छा जो जोगी हो और कथा वही अच्छी जो अधूरी हो.” वैसे एक बार  जो मन को भा गया , वो तन से साथ न हो, मन में हमेशा रहता है…पूरी तरह से…लेकिन एकाकी और खुद में घुलता. और फिर लाली का कथा नायक तो आईने में झलके अक्स को अपना समझ बैठा है. सो लाली को जाना ही था. यह काव्यात्मक शार्ट फ़िल्म है इसमें उदासी का काफ्काई इफेक्ट है और भावनाओं का ओ हेनरी सिग्नेचर भी.

इस एक मेटाफर को अभिरुप ने बड़ी कमाल और नफासत से रचा है और पंकज त्रिपाठी ने इसे बड़ी खूबसूरती से मूर्त किया है. आखिर गुलफाम के मारे जाने की पीड़ा उनके अध्ययनशील अभिनेता मन ने महसूसा है. ‘मन मतवाला, भोला भाला, भूला जग की रीत . प्रीत की रीत में ऐसा डूबा, प्रीत मिली ना मीत.’…पोस्टर पर गोपालगंज वाली लाली धीरे से अपने नायक को कहती लगती है ‘तुम्हारा जी छोटा हो गया है. है ना मीता? तुम्हारी महुआ घटवारिन को सौदागर ने खरीद लिया….’ पर  फिर पंकज त्रिपाठी का किरदार सुन कहाँ रहा है –

‘जो ग़मे हबीब से दूर थे वो खुद आग में जल गए/

जो ग़मे हबीब को पा गए वो ग़मों को हँसके निकल गए.”

लाली धीमे स्वर में बतियाती कविता की तरह का आख्यान है. इसका कथानायक करे क्या! उसके जीवन में एक बिजली की कौंध सुख की, कामना की, एक हल्की रूमानी मादकता साया हुई और तुरंत फना भी. लाली अपने कथा ट्रीटमेंट से मुस्कुराने पर मजबूर करती है. यह देखने लायक जरुरी शार्ट फ़िल्म है. अभिरुप बसु भविष्य की बड़ी उम्मीद जगाते हैं और पंकज त्रिपाठी का यह अनजाना, अनचीन्हा अभिनय है, जिसे अब तक देखा नहीं गया है. एक अभिनेता के लिए लाली का टेक्स्ट और ट्रीटमेंट एक परीक्षा है, पंकज त्रिपाठी ने इसे निभाया भी उसी तरह है. लाली का अंतिम दृश्य हिरामन की कसम की तरह जान पड़ता है. पर किरदार का भाव और प्रसाद की उन काव्य पंक्तियों की तरह है ‘मिला कहाँ वह सुख, जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया, आलिंगन में आते आते मुस्कयाकर जो भाग गया.’ – जब पंकज त्रिपाठी का किरदार गोधूलि के सूर्य सा काउंटर पर दूल्हे की शेरवानी डाले बैठा है. रेत घड़ी ने कहीं सारा रेत उलट कर समय घड़ी को उस पल में रोक दिया है और उसी समय कहीं किसी जगह एक हिरामन बैलों को डपटते हुए कह रहा है – ‘उलट उलट कर क्या देखते हो ? खाओ कसम की अब किसी…और तभी एक बारात सामने से गुजर जाती है. यह दर्शन मन कहाँ समझता है कि सवारी तो अपने मंजिल पर गयी, इसमें उदास होने की क्या बात है. पर मन…मन तो समझते हैं ना आप?

यह पंकज त्रिपाठी के प्रशंसकों के लिए उनके अभिनय का जादुई सरप्राइज है और लेखक निर्देशक अभिरुप बसु के साहित्यिक सिनेमाई सूझ और कौशल का प्रमाण.

-Munna K Pandey

https://www.filmaniaentertainment.com/laali-review-khao-kasam-ki-ab-kisi/

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6/4/19

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले


भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक पहले एक और नाच कलाकार रसूल मियाँ हुए । रसूल मियाँ गुलाम भारत में न केवल अपने समय की राजनीति को देख-समझ रहे थे बल्कि उसके खिलाफ अपने नाच और कविताई के मार्फ़त अपने तरीके से जनजागृति का काम भी कर रहे थे । रसूल मियाँ भोजपुरी के सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवेश में गाँधी जी के समय में गिने जाएँगे लेकिन अफ़सोस उनके बारे में अभी भी बहुत कम जानकारी उपलब्ध है और इस इलाके के जिन बुजुर्गों में रसूल की याद है उनके लिए रसूल नचनिए से अधिक कुछ नहीं । यह वही समाज है जिसे भिखारी ठाकुर भी नचनिया या नाच पार्टी चलाने वाले से अधिक नहीं लगते ।
रसूल मियाँ  की ओर समाज की नजर प्रसिद्ध कथाकार सुभाषचंद्र कुशवाहा जी के शोधपरक लेख से गई, जिसे उन्होंने लोकरंग-1 में प्रकाशित किया है ।  सच कहा जाए तो यह लेख संभवतः पहला ही लेख है जिसने इस गुमनाम लोक कलाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व की ओर सबका ध्यान खींचा । इस लेख में सुभाष कुशवाहा जी ने लिखा है कि ‘भोजपुरी के शेक्सपियर नाम से चर्चित भिखारी ठाकुर, नाच या नौटंकी की जिस परंपरा के लोक कलाकार थे, उस परंपरा के पिता थे रसूल मियाँ ।"  रसूल के बारे में अधिक कुछ उपलब्ध नहीं है । इसलिए इस सन्दर्भ में जो कुछ सुभाषचन्द्र कुशवाहा जी ने लिखा फिलहाल वही प्रमाणिक तथ्य है और कुछ बुजुर्गों के मौखिक किस्से । बाकी एकाध लेख इधर कुछ भोजपुरी लेखकों ने रसूल पर अपने तरीके से लिखे लेकिन वह सब सुभाषचंद्र कुशवाहा जी के लेख की ही रचनात्मक पुनर्प्रस्तुति भर ही है ।
रसूल पर अपना शोध-पत्र लिखने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार सुभाषचंद्र कुशवाहा कहते हैं ''मेरे पिताजी नाच देखने के शौक़ीन थे । मैंने रसूल और उनके नाच के बारे में बचपन से पिताजी कथा सुनी थी कि उन्होंने तमकुही राज (उत्तरप्रदेश और बिहार का सीमाई इलाका) में रसूल का नाच देखा था । वहाँ नाच में रसूल ने गीत गाया था “इ बुढ़िया, जहर के पुड़िया, ना माने मोर बतिया रे,अपना पिया से ठाठ उड़ावे, यार से करे बतिया रे किसी ने रानी को यह चुगली क्र दी कि रसूल ने इस गीत में आप पर तंज कसा है । फिर क्या था रानी ने रसूल को बुलवाया और उनकी पिटाई करवा दी, जिसकी वजह से रसूल के आगे के दांत टूट गए । लेकिन बाद में शोध के क्रम में मैंने पाया कि यह मामला तमकुही नहीं बल्कि हथुआ स्टेट (महाराजा ऑफ़ हथवा) दरबार से जुड़ा हुआ था । बाद में रानी ने रसूल को खेत और कुछ और इनाम देकर सम्मानित किया । लेकिन एक जरुरी बात इसमें यह भी है कि रसूल के ऊपर कोई लिखित दस्तावेज मौजूद ना होने की वजह से मैंने जो उनके समकालीनों से सुना और जो थोड़ा बहुत मिला, उसी के आधार पर एक मौखित इतिहास को लिखित फॉर्म में सामने लाया ।"     

रसूल नाच परंपरा (भोजपुरी के लौंडा नाच परंपरा) के कलाकार थे पर अपने तत्कालीन परिवेश से पूरी तरह वाकिफ थे । इस मामले में वह अपने समय के नाच के कलाकारो से मीलों आगे ठहरते हैं -  
“छोड़ द गोरकी के अब तु खुशामी बालमा । (गोरी की खुशामद करना छोड़ दो, बलमा)
एकर कहिया ले करबs गुलामी बालमा । (इसकी कब तक करोगे गुलामी बलमा)
देसवा हमार बनल ई आ के रानी । ( हमारे देश में आकर यह रानी बनी)
करे ले हमनीं पर ई हुक्मरानी । (हमलोगों पर यह हुक्म चलाती है)
एकर छोड़ द अब दीहल सलामी बालमा । (इसकी सलामी देना छोड़ दो बलमा)
एकर कहिया ले करबs गुलामी बालमा ।” ( इसकी कब तक करोगे गुलामी बलमा)

पैदाईश का समय
रसूल मियाँ का जन्म गोपालगंज जिला के जिगना मजार टोला में गुलाम भारत में भिखारी ठाकुर से पैदाईश से चौदह-पंद्रह वर्ष पहले का है, इस हिसाब से उन का जन्म वर्ष 1872 के आस पास ठहरता है । उन्हें पारिवारिक विरासत में नाच-गाना-बजाना और राजनीतिक-सामाजिक विरासत में गुलामी का परिवेश मिला था  । रसूल मियाँ के अब्बा भी कलकत्ता छावनी (मार्कुस लाइन) में बावर्ची के काम करते थे और रसूल के लिए कलकत्ते का परिवेश जाना-पहचाना भी था । रसूल एक तरफ वह विदेशी सत्ता के खिलाफ लिख रहे थे, तो दूसरी ओर राष्ट्रप्रेम की कवितायें भी रच रहे थे । भारत-पकिस्तान के बँटवारे में जहाँ चारों ओर धार्मिक वैमनस्य और दंगों का जहर वातावरण में घुला हुआ था, वहाँ भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति के पैरवीकार रसूल मियाँ ने जाति-धर्म से ऊपर उठकर एक गीत लिखा और कबीर की तरह भरे समाज गाया -
‘‘सर पर चढ़ल आज़ाद गगरिया, संभल के चलऽ डगरिया ना
एक कुइंयां पर दू पनिहारन, एक ही लागल डोर
कोई खींचे हिंदुस्तान की ओर, कोई पाकिस्तान की ओर
 ...हिंदू दौड़े पुराण लेकर, मुसलमान कुरान
आपस में दूनों मिल-जुल लिहो, एके रख ईमान
सब मिलजुल के मंगल गावें, भारत की दुअरिया ना । सर पर...।
कह रसूल भारतवासी से यही बात समुझाई
भारत के कोने-कोने में तिरंगा लहराई
बाँध के मिल्लत की पगड़िया ना  । सर पर । । ।”
(सर पर आज़ादी रूपी गगरी चढ़ गई है/रस्ते पर संभल के चलो/एक कुँएं पर दो पनिहारन हैं/ और एक ही डोर लगी है/कोई हिंदुस्तान की ओर खींच रहा है/कोई पाकिस्तान की ओर/हिन्दू पुराण लेकर दौड़ रहे हैं/मुसलमान कुरान लेकर/एक ईमान रखके दोनों आपस में मिलजुलकर रहो/सब मिलजुलकर मंगल गाओ/भारतभूमि के दरवाजे पर/रसूल भारतवासियों को यही बात समझा रहे हैं/भारत के कोने कोने में तिरंगा लहराएगा/जनतंत्र की पगड़ी बाँधकर )

गाँधी, सुराज और रसूल
गाँधी का प्रभाव भारतीय जनमानस पर जादुई था  । रसूल भी इसका अपवाद नहीं थे, उनकी रचना ‘छोड़ द जमींदारी’ में गाँधीजी के स्वदेशी आन्दोलन का प्रभाव साफ़ दिखता है । अपने इस गीत में सामंती व्यवस्था को नसीहत देते हुए उन्होंने ‘आज़ादी’ नाटक में लिखा कि -

छोड़ द बलमुआ जमींदारी परथा ।(बालम जमींदारी प्रथा छोड़ दो)
सईंया बोअ ना कपास, हम चलाईब चरखा ।(सैयां तुम कपास बोओ, मैं चरखा चलाऊंगा)

रसूल मियाँ के नाच की इन गीतों को पढ़ते समय यह मत भूलिए कि रसूल किस समुदाय के थे और किस विधा को अपने कथ्य का माध्यम बनाकर रचना कर रहे थे । रसूल ने अपने नाच में गाँधी की हत्या का प्रसंग गया है । जहाँ रसूल ने गाँधी जी की हत्या के प्रसंग का गीत गाया है, वहाँ वह कविता के शिल्प और संवेदना के स्तर पर कई नामवर कवियों से मीलों आगे खड़े दिखते है । यह गीत उन्होंने कलकत्ता में अपने नाच के दौरान भरे गले से गाया था -

के मारल हमरा गाँधी के गोली हो, धमाधम तीन गो ।(किसने मेरे गाँधी को गोली मारा, धमाधम तीन)
कल्हीये आज़ादी मिलल, आज चललऽ गोली (कल ही आज़ादी मिली, आज गोली चली)
 । । ।कहत रसूल, सूल सबका के दे के, (कहे रसूल शूल सबको देकर)
कहाँ गइले मोर अनार के कली हो, धमाधम तीन गो । । । ।”(कहाँ चले गए मेरे अनार की कली, धमाधम । । ।)

आज़ादी की लड़ाई में भोजपुरी अंचल की भूमिका बहुत सक्रिय रही है । इतिहास पुनर्लेखन की नयी प्रविधियों ने कई अज्ञात रचनाकारों और आंदोलनकर्मियों की खोजबीन की है, जिससे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन की एक दूसरी सुखद तस्वीर सामने आई है । रसूल मियाँ की रचनाएँ इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं । आज बेशक मंदिर-मस्जिद और भारत माता के नाम पर हिन्दुओं-मुसलमानों में सिर फुटौवल हो रहा है लेकिन 15 अगस्त 1947 को मिली आज़ादी के अवसर और बंटवारे की आग में झुलसते हिन्दू-मुसलमानों के लिए रसूल ने एकता के साथ रहने और सुराज में जुड़कर रहने का सपना देखा और गाया-
पंद्रह अगस्त सन् सैंतालिस के सुराज मिललऽ (पंद्रह अगस्त सन सैंतालिस को सुराज मिला)
बड़ा कठिन से ताज मिललऽ (बहुत कठिनाई से ताज मिला)
सुन ल हिंदू-मुसलमान भाई, (सुनो हिन्दू और मुसलमान भाई)
अपना देशवा के कर लऽ भलाई (अपने देश की कर लो भलाई)
तोहरे हथवा में हिन्द माता के लाज मिललऽ…”(तुम्हारे हाथ में हिन्द माता कि लाज मिली है)

नजीर अकबराबादी की परंपरा के रसूल  
रसूल अपने नाच से पहले मंगलाचरण के रूप में ‘सरस्वती वंदना’ ‘जो दिल से तेरा गुण गावे, भाव सागर के पार उ पावे’ भी गाते थे । उन्होंने होली, मुहर्रम त्योहारों पर भी लोकप्रसिद्ध कविताएँ लिखीं । इस लिहाज से देखें तो यह नजीर अकबराबादी की परंपरा में जुड़ते हैं । इसके अलावा उन्होंने जहाँ “ब्रह्मा के मोहलू, विष्णु के मोहलू शिव जी के भंगिया पियवलू हो, तू त पाँचों रनिया” लिखा, तो वहीं यह भी लिखा-
“ । । ।लगी आग लंका में हलचल मची थी,
विभीषण की कुटिया क्यों फिर भी बची थी,
लिखा था यही कुटिया के ऊपर,
हरिओम तत्-सत् 
हरिओम तत्-सत्”

रसूल हिन्दुओं के यहाँ शादी के अवसर पर जनवासे में एक गीत गाते थे -
“तोड़हीं राज किशोर धनुष प्रण को
 । । ।तोडूं तो कैसे तोडूं, शंकर चाप त्रिपुरारी का ।”

इन गीतों को देखें तो आश्चर्य होता है कि जनकवि और लोककलाकारों ने समाज को जोड़ने में कितनी बड़ी भूमिका निभाई है और यह पढ़ते समय मत भूलिए वह भोजपुरिया नाच वाला था, जो बिना अतिरिक्त बकैती के हमारी साझी विरासत को सामने रख रहा था । एक निवेदन भी है कि भूले से भी यह न कह बैठिएगा कि यह उसका पेशा था । वरना आप पर तरस खाने तक के भाव हमारे हिस्से न होगा ।  

रसूल मियाँ, फिल्में और चित्रगुप्त
रसूल के बारे में जो तथ्य सुभाषचंद्र कुशवाहा ने जुटाए हैं, उसके अनुसार रसूल के ही पड़ोस में ही बंबई फिल्म जगत के भोजपुरी और हिंदी फिल्मों के मशहूर संगीतकार ‘चित्रगुप्त’ का गाँव ‘सँवरेज़ी’ था । वे रसूल के नाटकों की प्रसिद्ध कथाओं को बंबई लेकर गए, जहाँ उस पर फिल्में बनीं, इनमें प्रमुख है –‘चंदा-कुदरत’पर ‘लैला-मजनू(1976)’,‘वफादार हैवान का बच्चा उर्फ़ सेठ-सेठानी पर इंसानियत(1955) और ‘गंगा नहान’ पर भोजपुरी की पहली फिल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो(1961)’ बनी । इस फिल्म के संगीतकार चित्रगुप्त थे । पर इन फिल्मों से रसूल को कोई फायदा नहीं हुआ । रसूल अंसारी के प्राप्त प्रमुख नाटकों में ‘गंगा नहान’, ‘आज़ादी’, ‘वफादार हैवान का बच्चा उर्फ़ सेठ सेठानी’, ‘सती बसंती-सूरदास’, ‘गरीब की दुनिया साढ़े बावन लाख’, ‘चंदा कुदरत’, ‘बुढ़वा-बुढ़िया’, ‘शांती’, ‘भाई बिरोध’, ‘धोबिया-धोबिन’ आदि प्रमुख हैं । रसूल अंसारी की मृत्यु 1952 में किसी माह के सोमवार को हुई थी । अंदाजा तो इस बाद का भी लगाया जाता है कि रसूल के नाटकों के शीर्षक भाई विरोध, गंगा-नहान और धोबिया-धोबिन ज्यों-के-त्यों भिखारी ठाकुर के नाटकों के भी शीर्षक हैं लेकिन कथ्य के उपलब्ध न होने की वजह से यह साफ़-साफ़ नहीं कहा जा सकता कि दोनों के नाटकों के केवल शीर्षक ही मेल खाते हैं या कथ्य भी । जो भी हो निष्कर्ष मजेदार आएंगे । बस एक ही नाटक के शीर्षक का फेर हैं रसूल का 'गंगा-नहान', भिखारी के यहाँ गंगा-स्नान है । वैसे भी नाच पार्टियों का कथ्य कोई स्थिर कथ्य नहीं होता । केवल नाटकों के शीर्षक के आधार पर रसूल और भिखारी की तुलना उचित नहीं है।
यह प्रामाणिक सत्य है कि दोनों ही सट्टा लिखाकर नाच दिखाते थे। प्रसिद्ध नचनिया(नर्त्तक) के नाम पर रसूल के पास राजकुमार थे तो भिखारी ठाकुर के पास रामचंद्र। दोनों में एक बड़ी समानता अभिनय क्षमता की भी थी।दोनों ही अपने नाटकों में मुख्य भूमिका निभाते थे।भिखारी ठाकुर जहाँ ‘बिदेसिया’ में ‘बटोही’, ‘गबरघिचोर’ में ‘पञ्च’, ‘कलियुग प्रेम’ में ‘नशाखोर पति’, ‘राधेश्याम बहार’ में ‘बूढ़ी सखी’ तथा ‘बेटी वियोग’ में ‘पंडित’ की भूमिकाक निभाते थे, वहीं रसूल ‘आज़ादी’ में ‘जमींदार’, ‘गंगा नहान’ में बुढ़िया, ‘चंदा कुदरत’ में ‘शराबी’, ‘शांति’ में ‘मुनीम’, सेठ-सेठानी’ में ‘मुनीम’ धोबिया-धोबिन’ में ‘धोबी’ की भूमिका निभाते थे - सन्दर्भ : लोकरंग-1

ऐसी जनश्रुति है कि रसूल के गीतों को सुनकर अंग्रेजी सत्ता के लिए कार्यरत बिहारी सिपाहियों ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी । इस वजह से रसूल मियाँ की गिरफ़्तारी भी हुई थी । रसूल मियाँ की रचनाधर्मिता के कई आयाम हैं लेकिन मुख्य रूप से दो अधिक महत्व के हैं । पहला, जब वह अपने नाच, कलाकर्म से स्वतंत्रता आन्दोलन के बीच उभर के सामने आते हैं, और दूसरा, जब वह गुलाम भारत में सामंती व्यवस्था से टकराते हैं । भोजपुरी अंचल में गंगा-जमुनी संस्कृति के कई लोग हुए पर इस संस्कृति पर सरे-बाजार नाच कर कहने वाला ऐसा कलाकार दूजा नहीं हुआ । अफ़सोस यह है कि उनको कोई महेश्वराचार्य, राहुल सांकृत्यायन, जगदीशचन्द्र माथुर नहीं मिले अन्यथा लौंडा नाच परंपरा के इस अद्भुत कलाकार की ऐतिहासिक उपस्थिति बहुत पहले हो गई होती । सुभाषचंद्र कुशवाहा ने रसूल के दो और गीतों के मिलने का दावा किया है । यद्यपि लोकसंस्कृति का इतिहास इतना क्रूर होता है कि उसका दस्तावेजी रक्षण बेहद कम होने की वजह से उनके कई धरोहर मौखिक परंपरा में गुजरते हुए समाप्त ही हो जाते हैं ।
रसूल मियाँ के अब तक जितने भी प्राप्त गीत हैं, वह नाच के मंच पर सब खेले गए गीत हैं उन्होंने साहित्य सर्जना के लिए गीत नहीं लिखे थे बल्कि अपने लौंडा नाच पार्टी के कथाओं को आगे बढाने के लिए जनता को अपने साथ जोड़ने के लिए लिखा । दुर्भाग्य है कि उनको नचनिए या नाच पार्टी चलाने वाले के तौर पर याद रखा गया । रसूल के नाच और गीतों में समाज के सवाल तो हैं पर उनकी राजनीतिक समझ बेहद बारीक है और इस मामले में में वह भिखारी ठाकुर से बीस ठहरते हैं पर यहाँ सबकी किस्मत में भिखारी ठाकुर होना कहाँ लिखा होता है ।      
(नोट : इस लेख के सभी तथ्य सुभाषचंद्र कुशवाहा के शोधलेख 'क्यों गुमनाम रहे लोक कलाकार रसूल', लोकरंग - 1 से लिए गए हैं)

5/18/19

स्क्रीन पर दर्दीली कविता की उपस्थिति : म्यूजिक टीचर



लेखिका और कवयित्री अनामिका अपने उपन्यास 'लालटेन बाज़ार' में लिखती हैं "संबंधों की इतिश्री की बात करते हो? प्रेम कोई नाटक नहीं जिसका परदा अचानक गिरा दिया जाए. ईश्वर की तरह प्रेम भी अनादि, अनंत है और इसलिए पूज्य भी. प्रेम का उपहास करने वाले मानवता का अपमान करते हैं और प्रकारांतर में ईश्वर का." नेटफ्लिक्स रिलीज 'म्यूजिक टीचर' इसी तरह के भावबोध का संसार रचती है. एक छोटे शहर का संगीत शिक्षक बेनीमाधव (मानव कौल) अपने भीतर एक पीड़ा, एक तरह का अफ़सोस, एक वियोग लिए, अपने भीतर एक एकांत लिए एक आसन्न की प्रतीक्षा में है. वह जो कभी उसका था, वह जो उसका हो न सका, वह जो अब उसके शहर आना है, उससे मिले भी या न मिले. क्या उसे मिलकर अपनी उस शिष्या, प्रेयसी जिसको उसने बड़े लाड़, प्रेम और फटकार से तैयार किया था. वह अपनी ज्योत्स्ना (अमृता बागची) जो अब बड़ी गायिका हो चुकी है से मिलना भी चाहता है और उसके उस सवाल का अब उत्तर दे देना चाहता है कि हाँ वह उसी पुल के ऊपर देवदारों की छाँव में उसका घंटों इंतज़ार करता है, जहाँ उसने ज्योत्स्ना के उस प्रश्न का सीधा जवाब नहीं दिया था कि हाँ! मैं तुमसे प्रेम करता हूँ. क्या वाकई प्रेम इतना सपाटबयानी में अभिव्यक्त हो सकता है? क्या हमेशा से पुरुषों ने स्त्री के इस उत्तर का कि 'देव कल हमारा फैसला होना है, मैं तुम्हारा निर्णय जानना चाहती हूँ. तुम्हारा निर्णय क्या है देव' और देवदासों ने अधिकतर वही उत्तर दिया 'रात बहुत हो चुकी है, कोई देख लेगा, तुम चली जाओ'. म्यूजिक टीचर बेनी माधव के उत्तर ना दे सकने की स्थितियाँ इससे इतर नहीं हैं. ज्योत्स्ना बेनी से कहती है 'आपकी हाँ मेरे माँ बाबा को ना कहने की हिम्मत दे देगी.' वह हाँ, न पारो को मिला, न ज्योत्स्ना को. यही वजह है कि भरे मन से ज्योत्स्ना के चले जाने के बाद एक शाश्वत पीड़ा बेनी का स्थायी भाव बन जाती है. यदि 'हाँ' मिल जाता तो क्या ये कथाएं इतनी ऊँचाई पर जा पाती? लेकिन यह भी सत्य है कि प्रेमियों की प्रतीक्षा में अतीव धैर्य होता है. बेनीमाधव इसका अपवाद नहीं है. मानव कौल संभवतः अब तक के अपने सर्वश्रेष्ठ किरदार में हैं. बेनी ने बस निर्णय अपने मन से नहीं लिया सो कहता भी है - 'माँ! जो कुछ भी है दे दो. मैंने कब खुद अपनी मर्जी से चुना है.' उसे जिंदगी में हर चीज परफेक्ट चाहिए थी जबकि जिंदगी कभी परफेक्ट नहीं होती. यह उस संगीत के शिक्षक के अल्फाज़ हैं जिसके लिए 'जो दिल को छू जाए वह संगीत है, उसके लिए तो संगीत कम से कम यही है'. लेकिन वह संगीत का महारथी है, अच्छा शिक्षक है पर समय आने पर उसका दिल खुद की ही नहीं सुन सका. जिंदगी परफेक्शन की नहीं अधूरेपन का महाकाव्य है और संभवतः यही अधूरापन उसके प्रति आसक्ति का सबसे बड़ा कारण है. म्यूजिक टीचर हिमालय की खूबसूरत वादियों की गहराई लिए, देवदारों के घने जंगलों में फंसीं ठहरी ठंडी धुंध, बर्फीली नदियों के अनवरत प्रवाह सरीखी खूबसूरत भावनाओं और उसकी बारीकियों की सिल्वर स्क्रीन उपस्थिति है. एक किरदार गीता (दिव्या दत्ता) का है जो जितनी देर स्क्रीन पर रहता है, दर्शक उसकी पीड़ा में एकाकार हो जाते हैं. उसका पति दिल्ली में एक और शादी करके बस गया है और पीछे उसके बीमार ससुर की देखभाल दिव्या दत्ता के जिम्मे है लेकिन इसमें उसके भीतर की बर्फीली ख़ामोशी को जिस तरह से दिव्या जीती हैं वह उनको समकालीन अभिनेत्रियों से कोसों आगे खड़ा करता है. इस किरदार के हिस्से सबसे खूबसूरत संवाद आए हैं और देवदार के घने जंगलों की सघनता और पहाड़ों की मुर्दा शांति उसके जीवन में बेतरह समायी हुई है. इस फिल्म के कुछ संवाद दर्शक को देर तक भिंगों कर रखते हैं 'रिश्ते जबरदस्ती जोड़े जा सकते हैं, दिल नहीं', 'ये जो पहाड़ है न यहाँ जितनी मर्जी रो लो, जितना मर्जी चिल्ला लो, आवाज़ वापस हम तक ही पहुँचती है', 'जीवन में अपनी मर्जी की हर चीज नहीं मिलती', 'कभी-कभी दिल की भी सुन लेते हैं, हर बात दिमाग से तय नहीं किया जाता', 'मैं अपने दोस्तों पर बोझ नहीं बनती', 'मैं सोचती हूँ जो ख्वाहिशें पूरी ही नहीं की जा सकती उनका इंतज़ार कितना मुश्किल होता होगा, लेकिन अब लगता है कि ज़िन्दगी में बा सेक ख्वाहिश रह जाए न, तो इंतजार छोड़ देना और भी मुश्किल हो जाता है.' दिव्या दत्ता जब-जब अपने संवाद लेकर आती है दर्शक उनके किरदार के प्रेम में डूबता चला जाता है. म्यूजिक टीचर हृदय का पाठ है, बुद्धि का नहीं. दिव्या इस फिल्म के जिस भी फ्रेम में आई हैं, अपने हिस्से का दर्शकीय प्यार टोकरी भर ले जाती हैं. वह और मानव कौल मिलकर इंतज़ार को भी खूबसूरत बना देते हैं. कभी-कभी लगता है सीनियर एक्टर्स दिनों-दिन इमरौती होते जा रहे है नीना गुप्ता का किरदार इसकी पुष्टि करता है. बहन 'उर्मी' के रोल में निहारिका लयरा दत्त प्रभावित करती हैं. निर्देशक सार्थक दासगुप्ता ने इस फिल्म को लिखा भी है और गानों को रोचक कोहली ने अपने संगीत से जान दी है. फिल्म के एक गीतकार अधीश वर्मा भविष्य की उम्मीद जगाते हैं - ' एक मोड़ तू मिली जिंदगी / कुछ देर मिली फिर खो गई...टूटा तारा हूँ मैं / गिरता हूँ बेवजह / तेरे साए में मांगूँ मैं पनाह / ऐसा भी क्या हुआ ज़िन्दगी / मेरी हमसफ़र बनी / फिर हुई अज़नबी'. - यह गीत पपोन और नीति मोहन की आवाज़ में फिल्म का ओपनिंग और क्लोजिंग फ्रेम बड़े शानदार तरीके से तैयार करता है. बैकग्राउंड संगीत और कौशिक मंडल की फोटोग्राफी वर्क किस्से में बेहद खूबसूरती से उतरा है यानी जितनी प्यारी कथा उतना सुंदर फिल्मांकन. प्रेम, दर्द, विरह और पीड़ा म्यूजिक टीचर का शाश्वत और स्थायी भाव है, जहाँ ज्योत्स्ना की आवाज़ दूर तक वादियों में बेनी दा के कानों में गूंजती रहती है. इस भाव को लेखक-निर्देशक सार्थक दासगुप्ता, संवाद लेखक गौरव शर्मा, संगीतकार रोचक कोहली ने बड़े जातां से सिनेमाई कैनवास पर उतारा है. यह वाकई एक खूबसरत फिल्म नहीं बल्कि एक दर्दीली कविता है जो बड़ी देर तक आपके जेहन में समायी रहने वाली है. किरदारों के लिए जिस तरह के जीवन की रचना लेखक-निर्देशक की कल्पना की है, उसकी अनिवार्य पूर्ति कैमरा, प्रकाश, वातावरण और किशोर के गीत करते हैं. 'काँच के ख्वाबों को पलकों में लिए, फिर वही रात म्यूजिक टीचर को एक विशिष्ट ऊँचाई देती है. 'फिर वही रात है, रिमझिम गिरे सावन' जैसे पुराने गीतों का दृश्य अनुसार नूतन प्रयोग आजकल के रिमिक्स की हिंसा पैदा नहीं करता बल्कि सुकून के साथ आपको अपने साथ बहा ले जाता है. इतना ही नहीं, इसके किरदारों के हिस्से का दर्द आपका अपना बनकर साथ आता है और यही वजह है कि म्यूजिक टीचर एक ख़ास फिल्म बन जाती है. यह स्क्रीन पर प्रेम कविता की उपस्थिति है. जहाँ यह सन्देश निहित है 'चाहे जितनी जी जान लड़ा लो कोशिश कर लो ओर फिर भी जिंदगी परफेक्ट नहीं बन पाती. कभी हालात साथ नहीं देते तो कभी माँग, पर फिर भी ज़िन्दगी से कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए, कभी नहीं.' वैसे भी 'गाने में एक सुर गलत लग जाए तो गाना छोड़ नहीं देते'. और हम जानते भी हैं कि 'मिलन अंत है सुखद प्रेम का और विरह है जीवन'. प्रेम का स्थायी भाव विरह. म्यूजिक टीचर देख लीजिए तब अहसास होगा कि किसी ने सच ही लिखा है 'Never underestimate the pain of a person because in all honesty everyone is struggling. just some people are better at hiding it than others.
* मुन्ना के. पाण्डेय                       
यह फिल्म समीक्षा मूलतः http://filmaniaentertainment.com/film_review.aspxके लिए लिखी गई है. 
फिल्म का टीज़र इs लिंक पर है  https://www.youtube.com/watch?v=OJ4Frv6JQtU
फिल्म netflix पर मौजूद है. 

1/28/19

हर्षिल डायरी - 2


गतांक से आगे 
...सुकी गाँव में दिल्ली वाले नेटवर्क को समस्या हो रही थी लेकिन बीती शाम में ही ऋचा के सलाह अनुसार होटल वाले के फ़ोन में मैंने देहरादून में ऋचा के पिता जी को अपनी लोकेशन और गाड़ी की स्थिति बता दी थी. पहले तो उन्होंने जोर का ठहाका लगाया कि हमलोग जाकर एक जगह फंस गए हैं लेकिन ठीक हैं. मामला यह था था कि मैंने चंबा से आगे आते समय उनको फ़ोन करके खूब चिढ़ाया था कि आप देहरादून ही रह गए और देखिए हमने बिना प्लान के गंगोत्री तक का रास्ता नापने निकल गए और उसी बातचीत में ऋचा के पापा ने कहा आज रात आप उत्तरकाशी रुकोगे तो सुबह हमलोग आपको पीछे से ज्वाइन कर लेंगे, लेकिन मैंने कहाँ अजी आज की रात तो हर्षिल ही रुकेगी यह गाड़ी और संयोग देखिए न उत्तरकाशी ना हर्षिल गाड़ी सुकी गाँव के पास सुस्ती में आई और शायद विधाता ने यही मिलने का करार तय किया हुआ था. शायद इसे ही कहते हैं अपना चेता होत नहीं प्रभु चेता तत्काल. अब सुकी की रात भी गज़ब बीती. ऋचा के पापा भी देहरादून से सुबह दास बजे के करीब सुकी आ गए और नीचे उत्तरकाशी में एक मिस्त्री को बोल आए थे. एक और कमाल बात थी कि बाहर के नम्बर की ख़राब कार को देखते हुए तक़रीबन हर दूसरे सवारी कार वाले ने उत्तरकाशी में किसी न किसी मिस्त्री को हमारे होटल वाले का नम्बर दे दिया था ताकि उसके हिसाब से बात करके वह सुकी आकर कैम्प के पास खड़ी दिल्ली नम्बर की गाड़ी की मरम्मत कर जाए. देर शाम तक एक मिस्त्री अपनी गाड़ी से सुकी आया और हमारी कार की मरम्मत में जुट गया. मैकेनिक कितना दक्ष था यह तो मालूम नहीं पर उसके उत्साह और गाड़ी के डिजाईन को देखते हुए सलाम करने का जी कर रहा था. उसकी कार थी तो स्विफ्ट लेकिन दशहरे की झांकी सरीखी बनी ठनी थी. खैर! 4 से 5 घन्टे की मेहनत और चांदनी रात में सामने वाले पर्वत से बारीक़ से वृहतर होते चांदनी को पसरते देखना एक अलग ही अनुभव ही था. उस दृश्य को बयान करना मुश्किल है जब एकाएक उजाला बढ़ते बढ़ते सामने वाले पर्वत की नोक से एक नगीने की तरह क्षण पर टिका फिर मुकुट की तरह बढ़ा और समूचे वैली और हमारी पीठ की ओर वाले पहाड़ की तीखी ढलान पर सेब के खेतों में भीतर तक छा गया. कार अब ठीक थी, लेकिन जिस रास्ते पर हमें आगे जाना था, उस लिहाज से इस मिस्त्री पर मेरा भरोसा पता नहीं क्यूँ टिक नहीं रहा था. जोगिन्दर की भी यही राय थी, तिस पर सत्रह सौ के वाटर पम्प के साढ़े पाँच हजार चुकाने के बाद मिस्त्री का उदार होकर दिखाना कि 'वह तो भला हो जो मैं ही था अन्यथा कोई और होता तो शायद ही इतने में करता', मूड को थोड़ा ख़राब कर ही गया था लेकिन मन के एक कोने में यह बात संतोष के साथ साँसे ले रही थी कि कल की सुबह हर्षिल में बीतेगी. अफ़सोस इस बात का भी नहीं था कि दो रातें सुकी में बीत गयीं वह भी किसी और वजह से.
जाना पहाड़ी विल्सन राजा के घर हर्षिल में
हर्षिल के पास है मुखबा गाँव. सर्दियों में गंगोत्री धाम की डोली की यहीं पर पूजा अर्चना की जाती है. हर्षिल सेना के दो रेजिमेंट्स के बीच में भागीरथी के सुरम्य तट पर बसा एक बेहद खूबसूरत गाँव है. इसकी ऊँचाई 2500 मी. है और यहाँ के रसीले सेब नीचे खूब मशहूर हैं. कहते हैं इस इलाके में सेबों की फसल से पहला परिचय अंग्रेज फ्रेडरिक विल्सन ने कराया था, जिसे यहाँ के स्थानीय लोग पहाड़ी विल्सन के नाम से पुकारते हैं. हर्षिल आने का एक बड़ा कारण यह विल्सन भी रहा, वह अंग्रेज जिसका इस इलाके में आना, झूले वाले पुल का बनाना, स्थानीय युवती से विवाह बंधन में बंधना और फिर उस पर रोबर्ट हचिन्सन का द राजा ऑफ़ हर्षिल नाम से किताब लिखना, अपने आप में मिथकीय और जासूसी कथाओं की तरह रोमांचक है. विल्सन का पुराना कॉटेज एक दुर्घटना में जल गया था लेकिन जंगलात वालों ने उस जगह पर लगभग उसी तरह का एक कॉटेज बनवाया हुआ है जिसमें उत्तरकाशी और नीचे से आने वाले अधिकारी वगैरह ठहरते हैं. हर्षिल के पुराने निवासी कहते हैं आज जो कॉटेज आप देख रहे हैं हैं वह तो कुछ भी नहीं जो विल्सन के समय की थी. वैसे भी हर पुरानी चीज जो केवल कथाओं में बाख गई हो अपने किस्सों में बड़ा आकार ले ही लेती है. संभव है विल्सन के कॉटेज के साथ ही यह रहा हो. अलबता, कहने को हर्षिल की ख़ूबसूरती ने राजकपूर सरीखे फिल्मकार को अपनी ओर आकर्षित किया और गंगोत्री धाम जाने वालों तीर्थयात्रियों को भी पर कायदे से इस हर्षिल गाँव को देखने के लिए एक दिन भी पूरा है और महसूसने के लिए हफ्ता भी कम है. हर्षिल महसूसने की जगह है. यहाँ की सुबह-दोपहर-शाम तय कीजिए
अहले सुबह की चाय के बाद भागीरथी के फैलाव के साथ किनारे-किनारे दूर तक ढलानों पर तने खड़े खुशबूदार देवदार से बतियाते और उनको अपने नथुनों में भरते जाईये और लौटते हुए मुख्य सड़क पर किसी छोटी धुएं की काली पड़ी दीवारों वाली टपरी के बाहर ताज़ी उतर रही धूप में खड़े चम्मच की दालचीनी अदरक वाली चाय को बंद बटर और ऑमलेट के साथ सुबह का नाश्ता करते हुए अपने कॉटेज लौट आइए. हर्षिल के मुख्य बजर से एक पतली से गली हर्षिल के डाकघर तक जाती है. कहने को यह डाकघर के नाम पर पुरानेपन का एकमात्र ढांचा भर है पर सिनेमाप्रेमी खासकर 'राम तेरी गंगा मैली' वाले इस डाकघर के पास अपनी तस्वीर खिंचवाने का लोभ नहीं छोड़ पाते क्योंकि समय और बाज़ार ने जब जीवन में, प्रकृति में हर ओर एक तरह की तब्दीली कर दी है, वैसे में यह डाकघर समय के उसी बिंदु पर वैसे ही अक्षुण्ण खड़ा है जैसा कि राजकपूर ने अस्सी के दशक में सिनेमा बनाते हुए छोड़ा था. डाक विभाग को भी मोबाइल के ज़माने में बहुत जल्दी नहीं है इस चालू डाकघर को बदलने की और शायद इस छोटे और समय के एक बिंदु पर ठहरे हुए इस एकमात्र दृश्य को उस चाय की दुकान के बाहर के पटरे पर बैठे घंटों ताका जा सकता है क्योंकि कुछ चीजें ठहरी हुई अधिक सुंदर लगती हैं. अब बेशक चिट्ठियाँ बहुत नहीं आती-जाती पर सुदूर इलाके में इसके खम्भे पर टिक्के लेटरबॉक्स का मुँह  मुस्कुराते हुए खुला रहता है, राजकपूर की नायिका ने इसी के पास डाकबाबू को दिक् किया था - 'पहाड़ों की डाक व्यवस्था भी अजीब है डाक बाबू, आने वाले पहले आ जाते हैं और उनके आने की खबर देने वाली चिट्ठियाँ बाद में'. यह हर्षिल का वही सुंदर डाकघर है जो व्यक्तिगत तौर पर मुझे और ऋचा को बेहद पसंद है.
हर्षिल की दुपहरी बाजार से बाहर रेजिमेंट एरिया से निकल पर विल्सन के कॉटेज के पीछे बहते पहाड़ी झरने को पार करके उस गाँव की जाने का समय है जहाँ स्थानीय बुनकर ऊनी दस्ताने, स्वेटर, बंडी, मोज़े, मफलर, टोपी, अचार, मुरब्बे आदि बनाकर बेचते हैं. यह सब हर्षिल के स्थानीय बाजार के अलावा बाहर भी भेजी जाती हैं. मेरे लिए इस इलाके का सबसे सुन्दर समय अक्टूबर तय है क्योंकि ठण्ड की बहुतायत न होने की वजह से सफ़ेद धूप खिलती मिलती है, आसपास सस्ते सेब खूब मिलते हैं और रास्ते खुले होने की वजह से आप उन जगहों पर आसानी से घूम आते हैं जो सामान्यत: बर्फ के मौसम में आप नहीं देख सकते. वैसे भी पहाड़ों में बर्फ एक किस्म का रंग भर देती है और आप उसके परे जाकर उस इलाके की वास्तविक ख़ूबसूरती नहीं देख पाते हैं. हर्षिल में भी खूब बर्फ़बारी होती है लेकिन हर्षिल के रंग अक्टूबर-नवंबर में ही अधिक चटख दिखेंगे और जो रंगों का वैविध्य लिए होते हैं. दोपहर की गढ़वाली कढ़ी, चावल के भोजन के बाद, शाम दूसरी दुनिया में ले जाती है. वैसे जिन महानुभावों को माँसाहार और मदिरा का शौक हो उनके लिए भी हर्षिल मुफीद जगह है क्योंकि गंगोत्री से छह कोस से अधिक की दूरी और दो रेजिमेंट्स के बीच बसे होने की खासियत ने कुछ सहूलियत यहाँ प्रदान कर रखी है. हर्षिल वैसे भी आपको बहुत कुछ एडवेंचर्स के लिए आमंत्रित नहीं करती बल्कि वह आपको अपने भीतर की कृत्रिमता से बाहर खींच लेती है जहाँ आपके शहर का जंग लगा इंसान झटके से नया हो उठता है. हमलोगों के लिए वही तो स्थिति थी. यहाँ विज्ञापनों वाली पर्वतीय दुनिया से अलग करने-महसूसने को बहुत कुछ न होने की स्थिति में भी वह क्या है जो हर्षिल के लिए अपना प्यार और दैवीय आकर्षण बनाये रखा है. उस शाम मुख्य सड़क से टहल कर आते भागीरथी के पुल के ऊपर सनसन बहती बर्फीली हवा और नदी के शोर से अधिक उस पुल पर बंधे कपड़ों के तिकोनों की फरफराहट के बीच जोगी रुक कर बोला 'सर यहाँ न माल रोड जैसी चहलकदमी है, न बिजली लट्टुओं की जगमग, न बहुत सुविधाएँ लेकिन कुछ ऐसा है, जिसे मैं हमेशा यहाँ आकर जीना चाहूँगा और शायद यही वह 'कुछ' रहा जिसके लिए सुकी में दो रातें खराब कार के ठीक होने की उम्मीद में टिके होने के बावजूद हमें हर्षिल ले आया.
हर्षिल का राजा - फ्रेडरिक 'पहाड़ी' विल्सन - किस्सा अनूठा उर्फ़ जितने मुँह उतनी बातें
हालाँकि फ्रेडरिक 'पहाड़ी' विल्सन को पहाड़ी विल्सन का पुकार नाम उसके इस इलाके के प्रति प्यार की वजह से मिला है और यह ऐतिहासिक रूप से इस इलाके में आया सच्चा किरदार है लेकिन राबर्ट हचिसन ने लिखा है कि यदि आप इस इलाके में विल्सन की कथा सुनने निकलते हैं तो सबसे बड़ी समस्या यह है कि छह लोगों के पास छह किस्म की कहानी है लेकिन उनमें किंचित समानता होते हुए भी पर्याप्त भेद भी है. पर यह ज्ञात तथ्य है कि उसकी दो पत्नियाँ थी जो पास के ही पड़ोसी गाँव मुखबा की थीं. पहली रैमत्ता से कोई संतान न होने की स्थिति में उसने सुगरामी(गुलाबी) से विवाह किया और जिससे उसके तीन बेटे - नथनिअल, चार्ल्स और हेनरी हुए. हर्षिल और मुखबा के स्थानीय नागरिक उन्हें स्थानीय उच्चारण के हिसाब से नाथू, चार्ली साहिब और इंद्री कहा करते थे. हर्षिल में विल्सन की आमद कैसे हुई थी यह बाद बहुत स्पष्ट नहीं है. कोई कहता अंग्रेजों की पलटन का निकाला हुआ सिपाही या अधिकारी था तो कोई किसी और कथा का आधार देता. मसलन, वह योर्कशायर के मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता था और अपने को व्यापारी, फोरेस्टर या कॉन्ट्रेक्टर कहा करता लेकिन इतना जरुर है कि इधर के इलाके में सेब कीई खेती और झूला पुल बनाने की कारीगरी विल्सन की प्रसिद्धि का बड़ा कारण रही है. विल्सन ने गंगोत्री और हर्षिल के बीच भैरोघाटी के पास एक संस्पेंशन ब्रिज का निर्माण किया था, जिसपर से आरपार जाने में स्थानीय नागरिकों की आनाकानी और अविश्वास को देखते हुए उसने अपने घोड़े पर चढ़कर इस पार से उसपार जाकर जनता में वह विश्वास बहल किया कि इस झूला पुल से घाटी और नदी के प्रबल और भयावह प्रवाह को पार किया जा सकता है. उस रात की डिनर के समय मेरे, ऋचा, पीकू, ऋचा के मम्मी-पापा ने विल्सन के बारे जानने का मन बनाया और रात के लिए गर्म पानी पहुँचाने आए मध्यवर्गीय उम्र वाले वेटर से जब मैंने यह सवाल किया कि पहाड़ी विल्सन के बारे में कुछ बताओ? उसने फ़िल्मी रहस्य ओढने के बाद मुझी से पूछा - 'आप कैसे जानते हो पहाड़ी राजा विल्सन के बारे में ?  रात में उसके बारे में बार नहीं करना, वह आज भी हर चांदनी रात को अपने घोड़े पर बैठकर रस्सी के झूले वाले पुल से गुजरता है. हर्षिल और मुखबा के अनेक ग्रामीणों ने उसके घोड़े की टापों की आवाज़ देर रात गए सुनी है. वह आज भी इन्हीं पहाड़ों में घूमता है.'- मुझे उसके बताने के तरीके में मजा आ रहा था और वह वेटर अपनी पूरी शक्ति से हमें डराने में लगा हुआ था. विल्सन की कथा हर्षिल के शानदार यादों में से है. एक तो इस किस्से को इस इलाके के लगभग सभी ट्रेवेलर्स ने कमोबेश पढ़ रखा है दूसरे एक दूर दराज के अंग्रेज के स्थानीय महिलाओं से विवाह स्थिर कर ताउम्र यहीं ठहर जाने की प्यारी-सी कथा का सुयोग जो इसमें ठहरा है, जहाँ वह विल्सन से स्थानीय 'हुल्सेन साहिब' बन गया था. गढ़वाल के इस हिस्से में यह अंग्रेज साहिब संभवतः रुडयार्ड किपलिंग के उस कथा 'द मैन हु वुड बी किंग' का आधार बना था, यह मैं नहीं कहता, हचिसन साहिब का कहना है. पर यह तो तय जानिए कि ब्रिटिश आर्मी का एक युवा अधिकारी पहले अफगान युद्ध से लौटकर हिमालय के इस इलाके में आता है और इस इलाके में एक बदलाव की जमीन तैयार करता हुआ किंवदंती बन जाता है. मैं सपरिवार और अपने पहले स्टूडेंट जोगी के साथ हर्षिल बार-बार लौटने की भूमिका रचता हुआ नीचे उतरता हूँ. एक डोर-सी बंधी है मेरे और गढ़वाल के बीच जो दिल्ली रहकर भी लौटा लाने को आतुर है हमेशा. पंच केदार की जमीन हो कि गंगोत्री-गोमुख-तपोवन. हर्षिल वाकई यात्रा का अंत नहीं बल्कि शेष है जो कई दफे भी उस 'शेष' को बचा ही रखती है. सम्पूर्णता वैसे भी मृत्यु है और हर्षिल तो जीवन ही जीवन उसका शेष होना श्रेयस है. यात्रा का दुर्गम हर्षिल में इतना रमणीय हो जाता है कि फिर-फिर लौटने की प्रबल उत्कंठा उस दुर्गम के सुगम मान लेती है. चीला वाली टपरी पर खिर्सू सुनकर हंसने वाले फिर गंगोत्री जाना समझ उस पंडित जी ने किसी दैवयोग से ही कहा होगा - शुभास्तु पंथान: और देखिए वही रहा.                              
                       




1/14/19

हर्षिल डायरी - 1





जाना मंदाकिनी वाली गंगा के इलाके में हर्षिल डायरी : भाग -
बिना किसी बड़ी योजना के यूँ ही Joginder ने उस दिन तैयार कर लिया कि कम से कम चीला होकर आ जाएँगे. लेकिन चीला में दो रातों बाद ऋषिकेश के पहाड़ों ने ऊपर आने के लिए डाक देना शुरू किया और वह यह काम पहले दिन की सुबह से ही करने लगे थे. उन्हें पता था कि इस आदमी (मैं ही) के भीतर बेचैनी बैठी रहती है कि गढ़वाल हिमालय के दुर्गम इलाकों की झलक ना ली तो क्या उतराखंड आए. मुझे हमेशा लगता है हरिद्वार ऋषिकेश आना गढ़वाल आना नहीं बस गंगा दर्शन और डुबकी, संध्या आरती के लिए आना भर ही है यह मुहाने से लौटना है इसलिए ऋषिकेश से उपर चढ़ते लगता है किसी रोगी को ऑक्सीजन दे दिया गया हो. नीत्शे बबवा कह गया था 'मैं यायावर हूँ और मुझे पहाड़ों पर चढ़ना पसंद है.' लेकिन मेरे लिए भी सच यही है. चीला से आगे जाने की बात सुन फारेस्ट गेट के टपरी वाले चाय दूकान पर पंडित जी ने पूछा था कहाँ की ओर ? अनमने ढंग से पहले कहा - सोचा है खिर्सू लेकिन हम हर्षिल (गंगोत्री) चल दिए. वैसे हर्षिल वाली बात सुनकर पंडित जी ने वही कहा होता जो खिर्सू सुनकर मुस्कुराकर कहा था - शुभास्तु पंथान : . और हम हर्षिल चल दिए. मेरे ख्याल से जोगी, ऋचा और कौस्तुभ के लिए तो ठीक था कि वह नज़ारे देख देख प्रफुल्लित हो रहे थे पर कसम से यही मौका होता है जब पहाड़ों में ड्राईविंग करने वाले मेरे जैसे मैदानी लोग अपनी किस्मत खूब कोसते हैं और दूसरों की किस्मत से रस्क खाते हैं क्यूंकि सामने नज़र रखते और हर मोड़ पर सतर्क रहते आधा सौन्दर्यबोध यूँ ही हवा रहता है लेकिन बाकी के आधे में मन कहता है -चरन्वं मधु विन्दति, चरन्स्वादुमुदुम्बरम् - चलता हुआ मनुष्य ही मधु पाता है, चलता हुआ ही स्वादिष्ट फल चखता है- सो चरैवेति चरैवेति - सो मैं भी चलता रहा आखिर पहाड़ी राजा विल्सन के इलाके के सेबों की मिठास और 2500 मीटर की ऊँचाई के देवदारों, सेबों के बागान और महार और जाट रेजिमेंट के बीच से गंगा को नीचे देखते जाने की कबसे तमन्ना थी जो एक बार बीए में पूरी हुई सो अब तक बदस्तूर जारी है. फिर मेरे लिए कैशोर्य अवस्था से वह पोस्ट ऑफिस भी तो एक बड़ा आकर्षण रहा है जहाँ गंगा हँसते हुए पोस्टमास्टर बाबू को यह कहते हुए निकल जाती कि पहाड़ों की डाक व्यवस्था अजीब है. हाय! राजकपूर ने भी क्या खूब जगह चुनी. गंगा और बंगाली भद्र मानुष नरेन के मिलन बिछुरन वाले प्रेम कथा के लिए. इस जगह से मुफीद जगह क्या ही होती. किस्से पर वापसी - उत्तरकाशी से हर्षिल की ओर चढ़ते हुए 4 से थोड़ा ऊपर का समय हो या था तिस पर अक्टूबर और पहाड़ों में अँधेरा वैसे ही तेजी से उतर जाता है और यदि वह पहाड़ी रास्ता उतरकाशी से हर्षिल-गंगोत्री रूट पर हो, शाम ढल रही हो, सर्दियों का उठान हो और गाड़ी चलाने वाला एक ही व्यक्ति हो तो आगे की सोच कर चलना ही ठीक रहता है. हमने थोड़ी देर उत्तरकाशी से थोड़ा ऊपर रूककर चाय और मैगी गटकने के बाद तय किया कि जिस तरह ऋषिकेश से यहाँ तक आए हैं उस लिहाज से आगे 3 साढ़े 3 घंटे में हर्षिल पहुँचकर ही आराम करेंगे. मुझे कुछ ख़ास थकान नहीं लग रही थी और सच कहूँ तो मन के कुहरे में वह बात साफ़ थी कि अब रुकें तो हर्षिल ही, सो चल पड़े. शाम उतरने लगी थी,वातावरण में ठंडक बढ़ रही थी और गाड़ी के भीतर इसका अहसास हो रहा था. सब खुश थे पिकू महाराज भी एक गहरी नींद मार जाग चुके थे और उनके लिए मैंने उनके पसंद के गीतों को चला दिया था. इस पूरे रास्ते में मैंने अतिउत्साह में एक गलती की थी जिसका खामियाजा भुगतना पड़ा लेकिन वह खामियाजा भी एक नया और अलग अर्थ में सुखद याद बन गया. सुकी मठ हर्षिल से थोड़ा पहले है और उससे पहले आईटीबीपी का कैम्प है. यह जगह हर्षिल से भी ऊँची है और इस गाँव में भी सेब खूब होता है पर इस जगह कोई यात्री नहीं रुकता वह या तो हर्षिल , धराली या सीधे गंगोत्री ही रुकता है जो यहाँ से 2 घंटे आगे है. इसी सुकी मठ गाँव से 2 किमी नीचे कार ने एकाएक धुआँ देकर चुप्पी साध ली बेचारी सुबह से लगातार टेढ़े मेधे ऊँचे नीचे अच्छे ख़राब रास्तों पर चल रही थी वह उस सांझ, वीरान जगह पर मुँह फुला झटके बैठ गई - मैंने ध्यान नहीं दिया था उसका हीट लेवल बढ़ा हुआ था और मैं बतकुच्चन में बिना ध्यान दिए गाड़ी को तेजी से राम तेरी गंगा मैली के इलाके में खींचे जा रहा था. गाड़ी का वाटर पम्प पता नहीं कैसे टूट गया था. सारा कूलेंट पानी स्वाहा. थोड़ी देर बाद बगल से गुजरते डम्पर वाले ने देखा कि शहरी बाबु लोग किसी दिक्कत में हैं तो उस संकरे रस्ते पर आकर उसने अपना बेशकीमती आधे घंटे का समय हमारे हिस्से खर्च किया. किस्मत अच्छी थी कि ठीक बगल में एक पहाड़ी नाला ऊपर से आता हुआ तेजी से नीचे खाई में चिल्लाता हुआ गंगा में उतर रहा था. उसके पानी से कार का गुस्सा ठंडा किया गया और अब गाड़ी इस हालत में आ गयी थी कि सुक्की तक चली जाए पर आईटीबीपी कैम्प तक चढ़ते चढ़ते गाड़ी ने अजीब चीखें मारनी शुरू की और हर्षिल गंगोत्री जाने वाले समझ सकते हैं कि उस रास्ते पर सुकी गाँव के पास निहायत खड़ी चढ़ाई है, जैसे मसूरी में लैंढूर से चार दूकान की ओर जाते हुए का रास्ता. खैर कैम्प के आगे बलवंत सिंह जी की चाय की दूकान लगभग बंद हो ही गई थी पर हमें देख उनकी उम्मीद बढ़ी कि थोड़ी देर और रुक गया तो कुछ आमदनी हो जाएगी. उनकी उम्मीद गलत नहीं थी. हमनें दबा के मैगी और ग्लास भर निम्बू चाय पी, दूकान के जलतीनुमा आग में सम्भावना तलाशते हुए सुकी में रुकने का मन बना लिया. वहाँ होटल जैसा कुछ नहीं था कमरे मिल गए थे जिसमें शौचालय था और खाना बनाने का रिवाज होटल वाले ने सीखा नहीं था-रात पूरे चाँद की थी. उस पर फिर कभी लेकिन कार के खड़ी किए जाने की जगह से रुकने की जगह भी 3 किमी थी पर सुविधा यह थी कि कमरे के बाहर आकर सामने झाँकों तो ताज़ी झरी सफेदी ओढ़े हिमालय उसके पैताने उत्तरकाशी, महादानव टिहरी बांध, देवप्रयाग को जाती भागीरथी और उसके आगे जाती गंगा तो दाहिनी ओर नीचे दिखते हरियल छत के कैम्प के कोने में बलवंत जी के टपरी के मुहाने अगले दिन आने 70 किमी दूर नीचे उत्तरकाशी से आने वाले मिस्त्री की और उपकरणों की उम्मीद मे हमारी डिजायर 1040.और हाँ उस जगह हमने मज़बूरी में शरण ली और तीन दिन रुके उसी जगह ख़ुशी ख़ुशी जी वही जगह जहाँ रात को खाना भी खुद ही बनाने में होट-ल वाले भले युवक के परिवार का सक्रिय सहयोगी बनना पड़ता था .इतनी दफे गंगोत्री गया हर्षिल गया दो बार आगे गोमुख और तपोवन तक गया पर हर्षिल इ थोड़ा ही पहले पड़ते इस जगह पर नजर ही नहीं जाती थी. सच ही तो है जीवन में कई बड़ी दूर की आसन्न खुशियों और चीजों के फेर में हम छोटी और पास की चीजों को कैसे अनदेखा कर देते हैं अनजाने ही ...(क्रमशः)


भोजपुरी के पहले ऑर्केस्ट्रा बैंड वाले 'मोहम्मद खलील'

वह साठ के आसपास का समय रहा होगा जब भोजपुरी के रत्न गीतकार भोलानाथ गहमरी के लिखे गीत के शब्द "कवने खोंतवा में लुकईलू आई हो बालम चिरई&quo...