1/28/19

हर्षिल डायरी - 2


गतांक से आगे 
...सुकी गाँव में दिल्ली वाले नेटवर्क को समस्या हो रही थी लेकिन बीती शाम में ही ऋचा के सलाह अनुसार होटल वाले के फ़ोन में मैंने देहरादून में ऋचा के पिता जी को अपनी लोकेशन और गाड़ी की स्थिति बता दी थी. पहले तो उन्होंने जोर का ठहाका लगाया कि हमलोग जाकर एक जगह फंस गए हैं लेकिन ठीक हैं. मामला यह था था कि मैंने चंबा से आगे आते समय उनको फ़ोन करके खूब चिढ़ाया था कि आप देहरादून ही रह गए और देखिए हमने बिना प्लान के गंगोत्री तक का रास्ता नापने निकल गए और उसी बातचीत में ऋचा के पापा ने कहा आज रात आप उत्तरकाशी रुकोगे तो सुबह हमलोग आपको पीछे से ज्वाइन कर लेंगे, लेकिन मैंने कहाँ अजी आज की रात तो हर्षिल ही रुकेगी यह गाड़ी और संयोग देखिए न उत्तरकाशी ना हर्षिल गाड़ी सुकी गाँव के पास सुस्ती में आई और शायद विधाता ने यही मिलने का करार तय किया हुआ था. शायद इसे ही कहते हैं अपना चेता होत नहीं प्रभु चेता तत्काल. अब सुकी की रात भी गज़ब बीती. ऋचा के पापा भी देहरादून से सुबह दास बजे के करीब सुकी आ गए और नीचे उत्तरकाशी में एक मिस्त्री को बोल आए थे. एक और कमाल बात थी कि बाहर के नम्बर की ख़राब कार को देखते हुए तक़रीबन हर दूसरे सवारी कार वाले ने उत्तरकाशी में किसी न किसी मिस्त्री को हमारे होटल वाले का नम्बर दे दिया था ताकि उसके हिसाब से बात करके वह सुकी आकर कैम्प के पास खड़ी दिल्ली नम्बर की गाड़ी की मरम्मत कर जाए. देर शाम तक एक मिस्त्री अपनी गाड़ी से सुकी आया और हमारी कार की मरम्मत में जुट गया. मैकेनिक कितना दक्ष था यह तो मालूम नहीं पर उसके उत्साह और गाड़ी के डिजाईन को देखते हुए सलाम करने का जी कर रहा था. उसकी कार थी तो स्विफ्ट लेकिन दशहरे की झांकी सरीखी बनी ठनी थी. खैर! 4 से 5 घन्टे की मेहनत और चांदनी रात में सामने वाले पर्वत से बारीक़ से वृहतर होते चांदनी को पसरते देखना एक अलग ही अनुभव ही था. उस दृश्य को बयान करना मुश्किल है जब एकाएक उजाला बढ़ते बढ़ते सामने वाले पर्वत की नोक से एक नगीने की तरह क्षण पर टिका फिर मुकुट की तरह बढ़ा और समूचे वैली और हमारी पीठ की ओर वाले पहाड़ की तीखी ढलान पर सेब के खेतों में भीतर तक छा गया. कार अब ठीक थी, लेकिन जिस रास्ते पर हमें आगे जाना था, उस लिहाज से इस मिस्त्री पर मेरा भरोसा पता नहीं क्यूँ टिक नहीं रहा था. जोगिन्दर की भी यही राय थी, तिस पर सत्रह सौ के वाटर पम्प के साढ़े पाँच हजार चुकाने के बाद मिस्त्री का उदार होकर दिखाना कि 'वह तो भला हो जो मैं ही था अन्यथा कोई और होता तो शायद ही इतने में करता', मूड को थोड़ा ख़राब कर ही गया था लेकिन मन के एक कोने में यह बात संतोष के साथ साँसे ले रही थी कि कल की सुबह हर्षिल में बीतेगी. अफ़सोस इस बात का भी नहीं था कि दो रातें सुकी में बीत गयीं वह भी किसी और वजह से.
जाना पहाड़ी विल्सन राजा के घर हर्षिल में
हर्षिल के पास है मुखबा गाँव. सर्दियों में गंगोत्री धाम की डोली की यहीं पर पूजा अर्चना की जाती है. हर्षिल सेना के दो रेजिमेंट्स के बीच में भागीरथी के सुरम्य तट पर बसा एक बेहद खूबसूरत गाँव है. इसकी ऊँचाई 2500 मी. है और यहाँ के रसीले सेब नीचे खूब मशहूर हैं. कहते हैं इस इलाके में सेबों की फसल से पहला परिचय अंग्रेज फ्रेडरिक विल्सन ने कराया था, जिसे यहाँ के स्थानीय लोग पहाड़ी विल्सन के नाम से पुकारते हैं. हर्षिल आने का एक बड़ा कारण यह विल्सन भी रहा, वह अंग्रेज जिसका इस इलाके में आना, झूले वाले पुल का बनाना, स्थानीय युवती से विवाह बंधन में बंधना और फिर उस पर रोबर्ट हचिन्सन का द राजा ऑफ़ हर्षिल नाम से किताब लिखना, अपने आप में मिथकीय और जासूसी कथाओं की तरह रोमांचक है. विल्सन का पुराना कॉटेज एक दुर्घटना में जल गया था लेकिन जंगलात वालों ने उस जगह पर लगभग उसी तरह का एक कॉटेज बनवाया हुआ है जिसमें उत्तरकाशी और नीचे से आने वाले अधिकारी वगैरह ठहरते हैं. हर्षिल के पुराने निवासी कहते हैं आज जो कॉटेज आप देख रहे हैं हैं वह तो कुछ भी नहीं जो विल्सन के समय की थी. वैसे भी हर पुरानी चीज जो केवल कथाओं में बाख गई हो अपने किस्सों में बड़ा आकार ले ही लेती है. संभव है विल्सन के कॉटेज के साथ ही यह रहा हो. अलबता, कहने को हर्षिल की ख़ूबसूरती ने राजकपूर सरीखे फिल्मकार को अपनी ओर आकर्षित किया और गंगोत्री धाम जाने वालों तीर्थयात्रियों को भी पर कायदे से इस हर्षिल गाँव को देखने के लिए एक दिन भी पूरा है और महसूसने के लिए हफ्ता भी कम है. हर्षिल महसूसने की जगह है. यहाँ की सुबह-दोपहर-शाम तय कीजिए
अहले सुबह की चाय के बाद भागीरथी के फैलाव के साथ किनारे-किनारे दूर तक ढलानों पर तने खड़े खुशबूदार देवदार से बतियाते और उनको अपने नथुनों में भरते जाईये और लौटते हुए मुख्य सड़क पर किसी छोटी धुएं की काली पड़ी दीवारों वाली टपरी के बाहर ताज़ी उतर रही धूप में खड़े चम्मच की दालचीनी अदरक वाली चाय को बंद बटर और ऑमलेट के साथ सुबह का नाश्ता करते हुए अपने कॉटेज लौट आइए. हर्षिल के मुख्य बजर से एक पतली से गली हर्षिल के डाकघर तक जाती है. कहने को यह डाकघर के नाम पर पुरानेपन का एकमात्र ढांचा भर है पर सिनेमाप्रेमी खासकर 'राम तेरी गंगा मैली' वाले इस डाकघर के पास अपनी तस्वीर खिंचवाने का लोभ नहीं छोड़ पाते क्योंकि समय और बाज़ार ने जब जीवन में, प्रकृति में हर ओर एक तरह की तब्दीली कर दी है, वैसे में यह डाकघर समय के उसी बिंदु पर वैसे ही अक्षुण्ण खड़ा है जैसा कि राजकपूर ने अस्सी के दशक में सिनेमा बनाते हुए छोड़ा था. डाक विभाग को भी मोबाइल के ज़माने में बहुत जल्दी नहीं है इस चालू डाकघर को बदलने की और शायद इस छोटे और समय के एक बिंदु पर ठहरे हुए इस एकमात्र दृश्य को उस चाय की दुकान के बाहर के पटरे पर बैठे घंटों ताका जा सकता है क्योंकि कुछ चीजें ठहरी हुई अधिक सुंदर लगती हैं. अब बेशक चिट्ठियाँ बहुत नहीं आती-जाती पर सुदूर इलाके में इसके खम्भे पर टिक्के लेटरबॉक्स का मुँह  मुस्कुराते हुए खुला रहता है, राजकपूर की नायिका ने इसी के पास डाकबाबू को दिक् किया था - 'पहाड़ों की डाक व्यवस्था भी अजीब है डाक बाबू, आने वाले पहले आ जाते हैं और उनके आने की खबर देने वाली चिट्ठियाँ बाद में'. यह हर्षिल का वही सुंदर डाकघर है जो व्यक्तिगत तौर पर मुझे और ऋचा को बेहद पसंद है.
हर्षिल की दुपहरी बाजार से बाहर रेजिमेंट एरिया से निकल पर विल्सन के कॉटेज के पीछे बहते पहाड़ी झरने को पार करके उस गाँव की जाने का समय है जहाँ स्थानीय बुनकर ऊनी दस्ताने, स्वेटर, बंडी, मोज़े, मफलर, टोपी, अचार, मुरब्बे आदि बनाकर बेचते हैं. यह सब हर्षिल के स्थानीय बाजार के अलावा बाहर भी भेजी जाती हैं. मेरे लिए इस इलाके का सबसे सुन्दर समय अक्टूबर तय है क्योंकि ठण्ड की बहुतायत न होने की वजह से सफ़ेद धूप खिलती मिलती है, आसपास सस्ते सेब खूब मिलते हैं और रास्ते खुले होने की वजह से आप उन जगहों पर आसानी से घूम आते हैं जो सामान्यत: बर्फ के मौसम में आप नहीं देख सकते. वैसे भी पहाड़ों में बर्फ एक किस्म का रंग भर देती है और आप उसके परे जाकर उस इलाके की वास्तविक ख़ूबसूरती नहीं देख पाते हैं. हर्षिल में भी खूब बर्फ़बारी होती है लेकिन हर्षिल के रंग अक्टूबर-नवंबर में ही अधिक चटख दिखेंगे और जो रंगों का वैविध्य लिए होते हैं. दोपहर की गढ़वाली कढ़ी, चावल के भोजन के बाद, शाम दूसरी दुनिया में ले जाती है. वैसे जिन महानुभावों को माँसाहार और मदिरा का शौक हो उनके लिए भी हर्षिल मुफीद जगह है क्योंकि गंगोत्री से छह कोस से अधिक की दूरी और दो रेजिमेंट्स के बीच बसे होने की खासियत ने कुछ सहूलियत यहाँ प्रदान कर रखी है. हर्षिल वैसे भी आपको बहुत कुछ एडवेंचर्स के लिए आमंत्रित नहीं करती बल्कि वह आपको अपने भीतर की कृत्रिमता से बाहर खींच लेती है जहाँ आपके शहर का जंग लगा इंसान झटके से नया हो उठता है. हमलोगों के लिए वही तो स्थिति थी. यहाँ विज्ञापनों वाली पर्वतीय दुनिया से अलग करने-महसूसने को बहुत कुछ न होने की स्थिति में भी वह क्या है जो हर्षिल के लिए अपना प्यार और दैवीय आकर्षण बनाये रखा है. उस शाम मुख्य सड़क से टहल कर आते भागीरथी के पुल के ऊपर सनसन बहती बर्फीली हवा और नदी के शोर से अधिक उस पुल पर बंधे कपड़ों के तिकोनों की फरफराहट के बीच जोगी रुक कर बोला 'सर यहाँ न माल रोड जैसी चहलकदमी है, न बिजली लट्टुओं की जगमग, न बहुत सुविधाएँ लेकिन कुछ ऐसा है, जिसे मैं हमेशा यहाँ आकर जीना चाहूँगा और शायद यही वह 'कुछ' रहा जिसके लिए सुकी में दो रातें खराब कार के ठीक होने की उम्मीद में टिके होने के बावजूद हमें हर्षिल ले आया.
हर्षिल का राजा - फ्रेडरिक 'पहाड़ी' विल्सन - किस्सा अनूठा उर्फ़ जितने मुँह उतनी बातें
हालाँकि फ्रेडरिक 'पहाड़ी' विल्सन को पहाड़ी विल्सन का पुकार नाम उसके इस इलाके के प्रति प्यार की वजह से मिला है और यह ऐतिहासिक रूप से इस इलाके में आया सच्चा किरदार है लेकिन राबर्ट हचिसन ने लिखा है कि यदि आप इस इलाके में विल्सन की कथा सुनने निकलते हैं तो सबसे बड़ी समस्या यह है कि छह लोगों के पास छह किस्म की कहानी है लेकिन उनमें किंचित समानता होते हुए भी पर्याप्त भेद भी है. पर यह ज्ञात तथ्य है कि उसकी दो पत्नियाँ थी जो पास के ही पड़ोसी गाँव मुखबा की थीं. पहली रैमत्ता से कोई संतान न होने की स्थिति में उसने सुगरामी(गुलाबी) से विवाह किया और जिससे उसके तीन बेटे - नथनिअल, चार्ल्स और हेनरी हुए. हर्षिल और मुखबा के स्थानीय नागरिक उन्हें स्थानीय उच्चारण के हिसाब से नाथू, चार्ली साहिब और इंद्री कहा करते थे. हर्षिल में विल्सन की आमद कैसे हुई थी यह बाद बहुत स्पष्ट नहीं है. कोई कहता अंग्रेजों की पलटन का निकाला हुआ सिपाही या अधिकारी था तो कोई किसी और कथा का आधार देता. मसलन, वह योर्कशायर के मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता था और अपने को व्यापारी, फोरेस्टर या कॉन्ट्रेक्टर कहा करता लेकिन इतना जरुर है कि इधर के इलाके में सेब कीई खेती और झूला पुल बनाने की कारीगरी विल्सन की प्रसिद्धि का बड़ा कारण रही है. विल्सन ने गंगोत्री और हर्षिल के बीच भैरोघाटी के पास एक संस्पेंशन ब्रिज का निर्माण किया था, जिसपर से आरपार जाने में स्थानीय नागरिकों की आनाकानी और अविश्वास को देखते हुए उसने अपने घोड़े पर चढ़कर इस पार से उसपार जाकर जनता में वह विश्वास बहल किया कि इस झूला पुल से घाटी और नदी के प्रबल और भयावह प्रवाह को पार किया जा सकता है. उस रात की डिनर के समय मेरे, ऋचा, पीकू, ऋचा के मम्मी-पापा ने विल्सन के बारे जानने का मन बनाया और रात के लिए गर्म पानी पहुँचाने आए मध्यवर्गीय उम्र वाले वेटर से जब मैंने यह सवाल किया कि पहाड़ी विल्सन के बारे में कुछ बताओ? उसने फ़िल्मी रहस्य ओढने के बाद मुझी से पूछा - 'आप कैसे जानते हो पहाड़ी राजा विल्सन के बारे में ?  रात में उसके बारे में बार नहीं करना, वह आज भी हर चांदनी रात को अपने घोड़े पर बैठकर रस्सी के झूले वाले पुल से गुजरता है. हर्षिल और मुखबा के अनेक ग्रामीणों ने उसके घोड़े की टापों की आवाज़ देर रात गए सुनी है. वह आज भी इन्हीं पहाड़ों में घूमता है.'- मुझे उसके बताने के तरीके में मजा आ रहा था और वह वेटर अपनी पूरी शक्ति से हमें डराने में लगा हुआ था. विल्सन की कथा हर्षिल के शानदार यादों में से है. एक तो इस किस्से को इस इलाके के लगभग सभी ट्रेवेलर्स ने कमोबेश पढ़ रखा है दूसरे एक दूर दराज के अंग्रेज के स्थानीय महिलाओं से विवाह स्थिर कर ताउम्र यहीं ठहर जाने की प्यारी-सी कथा का सुयोग जो इसमें ठहरा है, जहाँ वह विल्सन से स्थानीय 'हुल्सेन साहिब' बन गया था. गढ़वाल के इस हिस्से में यह अंग्रेज साहिब संभवतः रुडयार्ड किपलिंग के उस कथा 'द मैन हु वुड बी किंग' का आधार बना था, यह मैं नहीं कहता, हचिसन साहिब का कहना है. पर यह तो तय जानिए कि ब्रिटिश आर्मी का एक युवा अधिकारी पहले अफगान युद्ध से लौटकर हिमालय के इस इलाके में आता है और इस इलाके में एक बदलाव की जमीन तैयार करता हुआ किंवदंती बन जाता है. मैं सपरिवार और अपने पहले स्टूडेंट जोगी के साथ हर्षिल बार-बार लौटने की भूमिका रचता हुआ नीचे उतरता हूँ. एक डोर-सी बंधी है मेरे और गढ़वाल के बीच जो दिल्ली रहकर भी लौटा लाने को आतुर है हमेशा. पंच केदार की जमीन हो कि गंगोत्री-गोमुख-तपोवन. हर्षिल वाकई यात्रा का अंत नहीं बल्कि शेष है जो कई दफे भी उस 'शेष' को बचा ही रखती है. सम्पूर्णता वैसे भी मृत्यु है और हर्षिल तो जीवन ही जीवन उसका शेष होना श्रेयस है. यात्रा का दुर्गम हर्षिल में इतना रमणीय हो जाता है कि फिर-फिर लौटने की प्रबल उत्कंठा उस दुर्गम के सुगम मान लेती है. चीला वाली टपरी पर खिर्सू सुनकर हंसने वाले फिर गंगोत्री जाना समझ उस पंडित जी ने किसी दैवयोग से ही कहा होगा - शुभास्तु पंथान: और देखिए वही रहा.                              
                       




1/14/19

हर्षिल डायरी - 1





जाना मंदाकिनी वाली गंगा के इलाके में हर्षिल डायरी : भाग -
बिना किसी बड़ी योजना के यूँ ही Joginder ने उस दिन तैयार कर लिया कि कम से कम चीला होकर आ जाएँगे. लेकिन चीला में दो रातों बाद ऋषिकेश के पहाड़ों ने ऊपर आने के लिए डाक देना शुरू किया और वह यह काम पहले दिन की सुबह से ही करने लगे थे. उन्हें पता था कि इस आदमी (मैं ही) के भीतर बेचैनी बैठी रहती है कि गढ़वाल हिमालय के दुर्गम इलाकों की झलक ना ली तो क्या उतराखंड आए. मुझे हमेशा लगता है हरिद्वार ऋषिकेश आना गढ़वाल आना नहीं बस गंगा दर्शन और डुबकी, संध्या आरती के लिए आना भर ही है यह मुहाने से लौटना है इसलिए ऋषिकेश से उपर चढ़ते लगता है किसी रोगी को ऑक्सीजन दे दिया गया हो. नीत्शे बबवा कह गया था 'मैं यायावर हूँ और मुझे पहाड़ों पर चढ़ना पसंद है.' लेकिन मेरे लिए भी सच यही है. चीला से आगे जाने की बात सुन फारेस्ट गेट के टपरी वाले चाय दूकान पर पंडित जी ने पूछा था कहाँ की ओर ? अनमने ढंग से पहले कहा - सोचा है खिर्सू लेकिन हम हर्षिल (गंगोत्री) चल दिए. वैसे हर्षिल वाली बात सुनकर पंडित जी ने वही कहा होता जो खिर्सू सुनकर मुस्कुराकर कहा था - शुभास्तु पंथान : . और हम हर्षिल चल दिए. मेरे ख्याल से जोगी, ऋचा और कौस्तुभ के लिए तो ठीक था कि वह नज़ारे देख देख प्रफुल्लित हो रहे थे पर कसम से यही मौका होता है जब पहाड़ों में ड्राईविंग करने वाले मेरे जैसे मैदानी लोग अपनी किस्मत खूब कोसते हैं और दूसरों की किस्मत से रस्क खाते हैं क्यूंकि सामने नज़र रखते और हर मोड़ पर सतर्क रहते आधा सौन्दर्यबोध यूँ ही हवा रहता है लेकिन बाकी के आधे में मन कहता है -चरन्वं मधु विन्दति, चरन्स्वादुमुदुम्बरम् - चलता हुआ मनुष्य ही मधु पाता है, चलता हुआ ही स्वादिष्ट फल चखता है- सो चरैवेति चरैवेति - सो मैं भी चलता रहा आखिर पहाड़ी राजा विल्सन के इलाके के सेबों की मिठास और 2500 मीटर की ऊँचाई के देवदारों, सेबों के बागान और महार और जाट रेजिमेंट के बीच से गंगा को नीचे देखते जाने की कबसे तमन्ना थी जो एक बार बीए में पूरी हुई सो अब तक बदस्तूर जारी है. फिर मेरे लिए कैशोर्य अवस्था से वह पोस्ट ऑफिस भी तो एक बड़ा आकर्षण रहा है जहाँ गंगा हँसते हुए पोस्टमास्टर बाबू को यह कहते हुए निकल जाती कि पहाड़ों की डाक व्यवस्था अजीब है. हाय! राजकपूर ने भी क्या खूब जगह चुनी. गंगा और बंगाली भद्र मानुष नरेन के मिलन बिछुरन वाले प्रेम कथा के लिए. इस जगह से मुफीद जगह क्या ही होती. किस्से पर वापसी - उत्तरकाशी से हर्षिल की ओर चढ़ते हुए 4 से थोड़ा ऊपर का समय हो या था तिस पर अक्टूबर और पहाड़ों में अँधेरा वैसे ही तेजी से उतर जाता है और यदि वह पहाड़ी रास्ता उतरकाशी से हर्षिल-गंगोत्री रूट पर हो, शाम ढल रही हो, सर्दियों का उठान हो और गाड़ी चलाने वाला एक ही व्यक्ति हो तो आगे की सोच कर चलना ही ठीक रहता है. हमने थोड़ी देर उत्तरकाशी से थोड़ा ऊपर रूककर चाय और मैगी गटकने के बाद तय किया कि जिस तरह ऋषिकेश से यहाँ तक आए हैं उस लिहाज से आगे 3 साढ़े 3 घंटे में हर्षिल पहुँचकर ही आराम करेंगे. मुझे कुछ ख़ास थकान नहीं लग रही थी और सच कहूँ तो मन के कुहरे में वह बात साफ़ थी कि अब रुकें तो हर्षिल ही, सो चल पड़े. शाम उतरने लगी थी,वातावरण में ठंडक बढ़ रही थी और गाड़ी के भीतर इसका अहसास हो रहा था. सब खुश थे पिकू महाराज भी एक गहरी नींद मार जाग चुके थे और उनके लिए मैंने उनके पसंद के गीतों को चला दिया था. इस पूरे रास्ते में मैंने अतिउत्साह में एक गलती की थी जिसका खामियाजा भुगतना पड़ा लेकिन वह खामियाजा भी एक नया और अलग अर्थ में सुखद याद बन गया. सुकी मठ हर्षिल से थोड़ा पहले है और उससे पहले आईटीबीपी का कैम्प है. यह जगह हर्षिल से भी ऊँची है और इस गाँव में भी सेब खूब होता है पर इस जगह कोई यात्री नहीं रुकता वह या तो हर्षिल , धराली या सीधे गंगोत्री ही रुकता है जो यहाँ से 2 घंटे आगे है. इसी सुकी मठ गाँव से 2 किमी नीचे कार ने एकाएक धुआँ देकर चुप्पी साध ली बेचारी सुबह से लगातार टेढ़े मेधे ऊँचे नीचे अच्छे ख़राब रास्तों पर चल रही थी वह उस सांझ, वीरान जगह पर मुँह फुला झटके बैठ गई - मैंने ध्यान नहीं दिया था उसका हीट लेवल बढ़ा हुआ था और मैं बतकुच्चन में बिना ध्यान दिए गाड़ी को तेजी से राम तेरी गंगा मैली के इलाके में खींचे जा रहा था. गाड़ी का वाटर पम्प पता नहीं कैसे टूट गया था. सारा कूलेंट पानी स्वाहा. थोड़ी देर बाद बगल से गुजरते डम्पर वाले ने देखा कि शहरी बाबु लोग किसी दिक्कत में हैं तो उस संकरे रस्ते पर आकर उसने अपना बेशकीमती आधे घंटे का समय हमारे हिस्से खर्च किया. किस्मत अच्छी थी कि ठीक बगल में एक पहाड़ी नाला ऊपर से आता हुआ तेजी से नीचे खाई में चिल्लाता हुआ गंगा में उतर रहा था. उसके पानी से कार का गुस्सा ठंडा किया गया और अब गाड़ी इस हालत में आ गयी थी कि सुक्की तक चली जाए पर आईटीबीपी कैम्प तक चढ़ते चढ़ते गाड़ी ने अजीब चीखें मारनी शुरू की और हर्षिल गंगोत्री जाने वाले समझ सकते हैं कि उस रास्ते पर सुकी गाँव के पास निहायत खड़ी चढ़ाई है, जैसे मसूरी में लैंढूर से चार दूकान की ओर जाते हुए का रास्ता. खैर कैम्प के आगे बलवंत सिंह जी की चाय की दूकान लगभग बंद हो ही गई थी पर हमें देख उनकी उम्मीद बढ़ी कि थोड़ी देर और रुक गया तो कुछ आमदनी हो जाएगी. उनकी उम्मीद गलत नहीं थी. हमनें दबा के मैगी और ग्लास भर निम्बू चाय पी, दूकान के जलतीनुमा आग में सम्भावना तलाशते हुए सुकी में रुकने का मन बना लिया. वहाँ होटल जैसा कुछ नहीं था कमरे मिल गए थे जिसमें शौचालय था और खाना बनाने का रिवाज होटल वाले ने सीखा नहीं था-रात पूरे चाँद की थी. उस पर फिर कभी लेकिन कार के खड़ी किए जाने की जगह से रुकने की जगह भी 3 किमी थी पर सुविधा यह थी कि कमरे के बाहर आकर सामने झाँकों तो ताज़ी झरी सफेदी ओढ़े हिमालय उसके पैताने उत्तरकाशी, महादानव टिहरी बांध, देवप्रयाग को जाती भागीरथी और उसके आगे जाती गंगा तो दाहिनी ओर नीचे दिखते हरियल छत के कैम्प के कोने में बलवंत जी के टपरी के मुहाने अगले दिन आने 70 किमी दूर नीचे उत्तरकाशी से आने वाले मिस्त्री की और उपकरणों की उम्मीद मे हमारी डिजायर 1040.और हाँ उस जगह हमने मज़बूरी में शरण ली और तीन दिन रुके उसी जगह ख़ुशी ख़ुशी जी वही जगह जहाँ रात को खाना भी खुद ही बनाने में होट-ल वाले भले युवक के परिवार का सक्रिय सहयोगी बनना पड़ता था .इतनी दफे गंगोत्री गया हर्षिल गया दो बार आगे गोमुख और तपोवन तक गया पर हर्षिल इ थोड़ा ही पहले पड़ते इस जगह पर नजर ही नहीं जाती थी. सच ही तो है जीवन में कई बड़ी दूर की आसन्न खुशियों और चीजों के फेर में हम छोटी और पास की चीजों को कैसे अनदेखा कर देते हैं अनजाने ही ...(क्रमशः)


हीरा मन अभिनेता : पंकज त्रिपाठी


एक बेहतर अभिनेता वह है जो अपने रचे हुए फार्म को बार बार तोड़ता है, उसमें नित नए प्रयोग करता है और अपने दर्शकों, आलोचकों, समीक्षकों को चौंकाता है। अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने लगातार इस तरह के प्रयोग करते हुए अपने ही रचे फार्म को बार-बार तोड़ा है। आप हमेशा पाएंगे कि इस अभिनेता का काम कैसे एक से दूसरे में अलग तरह से ही ट्रासंफार्म हो जाता है और वह भी सहज सरलता से दिखता हुआ लेकिन जादुई तरीके से आपको ठिठकने पर मज़बूर करता हुआ लेकिन आपकी आंखों और होंठों पर आश्चर्यमिश्रित मुस्कान के साथ। यानी नरोत्तम मिश्रा के सामने मुन्ना माइकल का गुंडा और नील बट्टे का प्रिंसिपल, सुल्तान से कैसे जुदा हो जाता है वैसे ही तीन ग्रे शेड्स वाले अलग किरदार पाउडर का नावेद अंसारी, गुडगाँव का केहरी सिंह और मिर्ज़ापुर के अखंडानंद त्रिपाठी एक खास मनोवृति के दिखने वाली दुनिया में रहते हुए पर्दे पर नितांत अलग-अलग हैं और जब मैं अलग कह रहा हूँ तो वह ठीक पूरब और पश्चिम वाले अलग हैं। यह अभिनेता पंकज त्रिपाठी के अभिनय शैली की उत्कृष्टता के विभिन्न सोपान और छवियाँ हैं। अब The Man मैगज़ीन ने पंकज त्रिपाठी के व्यक्तित्व का एक अनूठा पहलू सामने पेश किया है। मैं मजाक में कहता था कि नावेद अंसारी के कपड़े पहनने और देहभाषा के तरीके को कईयों ने नोटिस किया और अपनाया था पर कायदे से 'द मैन' मैगज़ीन टीम ने पंकज त्रिपाठी के इस पहलू को पहचानकर उन तमाम आलोचकों के मुँह पर ताला जड़ दिया है जो इस अदाकार को एक खास फ्रेम में देखने की जुगत में थे। यह अभिनेताओं का दौर है । यह हमारे जीवन वन के वह फूल हैं जो निश्चित ही ड्राइंग रूम और बालकनी के फूलों से अधिक खुशबू दे रहे हैं, यही इनकी विशेषता भी है, यह वनफूल अकेले नहीं महकते, इनकी खुश्बू में प्रकृति नर्तन करती है। कहते हैं वनबेला फूलती है तो समूचा वन महकता है और जब समूचा वन महकता है तो प्रकृति अपने सबसे सुंदर रूप में होती है. तो दोस्तों! यह वनबेला के फूल के खिलने, सुवाषित होने की रुत है इस मैगज़ीन की स्टोरी से उल्लसित होइए, यह पढ़ने से अधिक महसूसने की बात है। पंकज भैया इसी सुंदर का स्वप्न हैं। यह फ़ोटो कई मामलों में विशेष है। इस अंग्रेजी मैगज़ीन के कवर को देखिए इसकी जबान भी भारत के सुदूर देहात के लिए अबूझ दुनिया का जादुई लोक है। इस पर छपे हर्फ़ ही केवल अतिशयता का संसार नहीं रचते बल्कि तस्वीरें भी लौकिकता से ऊपर उठती जान पड़ती हैं। और हुजूर इल्म से शायरी बेशक न आती हो लेकिन देखिए इल्म, प्रतिभा और मेहनत का सुंदर संगम हो तो ऐसे दूर के जादुई लोक को अपने भीतर रखे हर्फ़ वाले आम मानस में अलग तरह से बैठे मैगज़ीन भी जनता के अभिनेता, कलाकार को, सोने के दिल वाले हिरामन को अपने कवर पर रखते हैं, गौरवान्वित होते हैं कौन कहता है कि पंकज त्रिपाठी नाम के इस अभिनय की पाठशाला व्यक्तित्व का आयाम केवल मसान, नील बट्टे सन्नाटा, बरेली की बर्फी, गैंग्स ऑफ वासेपुर, मैंगो ड्रीम्स, गुड़गांव, पाउडर, मिर्ज़ापुर, योर्स ट्रुली तक ही है। यह तस्वीर बयान कर रही है कि पंकज त्रिपाठी की प्रतिभा और उनके डिफरेंट शेड्स किसी भी भाषायी और क्षेत्रीय पहचानों से ऊपर अब अंतरराष्ट्रीय पटल और कई अन्य भाषा भाषियों के कला के अन्य रूपों में कार्यरत और चाहने वाले लोगों में है। यह मैगज़ीन और इसके कवर पर अंकित छवि केवल किरदारी मामला नहीं है बल्कि यह कह रही है कि उस अभिनेता के मैनरिज्म का यह पहलू आपने नहीं देखा तो अब तक क्या देखा , तो देखिए स्टाइल, चलने का ढंग, वह ठसक, राजस, फिर भी आपका अपना। बहुत कम कलाकारों को अपने चाहने वालों का यह भरोसा नसीब होता है कि वह कुछ करे और घर के बड़े पूछे ये वाला कलाकार कह रहा है तो कुछ बात होगी। यह एक मैगज़ीन के कवर ब्यॉय की तस्वीर भर नहीं बल्कि एक कलाकार के बहुआयामी व्यक्तित्व की एक और पड़ताल है और यकीन जानिए इस तस्वीर और कवर स्टोरी ने कई गुदड़ी के लालों को सुंदर का सपना देखने को प्रेरित किया है। कस्तूरी सरीखे महकते रहिये, इस संसार को थोड़े सुगंध की जरूरत है यह वाकई वनबेला के फूलने की रुत है। अभी तो फसाने और आने हैं.  यह बरसात की पहली बूंद के धरती पर उतरने और उसकी सोंधी सुगंध के चहुं ओर फैलने की मानिंद है। ''इस खुशबू को पेट्रिकोरकहते हैं, जो ग्रीक भाषा के शब्द पेट्रा से बना है, जिसका अर्थ स्टोन या आईकर होता है, और माना जाता है कि यह वही तरल है, जो ईश्वर की नसों में रक्त के रूप में बहता है।'' यह कलाकार और उसकी अलग छवियाँ अपने ईमानदार काम से ईश्वरीय नसों में रक्त की मानिंद संचरणशील है। वह बरसात की वही सोंधी गंध है जो आपके नथुनों में उतरते ही आपकी जड़ता तोड़ अपनी ओर खींच लेता है। मैं सोचता हूँ, इन सबसे परे इस बदलाव और लंबी यात्रा के पीछे की प्रेरक कहाँ है? मेरे एक और अज़ीज़ रंगकर्मी हबीब तनवीर के मशहूर नाटक 'कामदेव का अपना, बसंत ऋतु का सपना' का गीत उनके लिए याद आ रहा है जो इस हीरा-मन कलाकार के पीछे चुपचाप मुस्कुराती प्रेरणा शक्ति बन खड़ी हैं और पंकज त्रिपाठी की सफलता की आधी हकदार उनकी जीवन संगिनी मृदुला त्रिपाठी के लिए सच में यही गीत इस वक़्त मुझे सबसे मुफीद लगता है -
"
मुझे पता है मेरे बन की रानी कहाँ सोई है/
जहाँ चमेली महक रही है और सरसो फूली है/
जहां कनेर के पेड़ पे, पीले - पीले फूल सजे हैं/
आस - पास कुछ उगे फूलों की भी बेल चढ़ी है/
जहां गुलाब के, गुलअब्बास के फूल ही फूल खिले हैं..."
यह वाकई उसी वनबेला के फूलने का समय है।
शुक्रिया

Image may contain: Pankaj Tripathi, text



1/2/19

जिसके लिए तवायफों ने अपने गहने उतार दिए : पूरबी सम्राट महेंद्र मिश्र

[यह पोस्ट द लल्लनटॉप वेब पोर्टल पर पहले ही प्रकाशित है. यहाँ उसी लेख का पुनर्प्रस्तुतिकरण है. इसके किसी भी हिस्से (आंशिक या पूर्ण) का मोडरेटर की सहमति के बिना प्रकाशित न करे - सादर]

मुजफ्फरपुर के एक कोठे पर गाने वाली ढेलाबाई की बड़ी धूम थी, सारण के बाबू हलिवंत सहाय के लिए महेंद्र मिश्र ने उसका अपहरण कर लिया. बाद में अपने इस कर्म पर उन्हें बड़ा क्षोभ हुआ और फिर उन्होंने ढेलाबाई कि मदद में कोई कसर नहीं छोड़ी.
घर, परिवार और गायक का उभार
पुरबी सम्राट महेंदर मिसिरजी के बिआह रुपरेखा देवी से भईल रहे जिनका से हिकायत मिसिर के नाव से एगो लईका भी भईल, बाकी घर गृहस्थी मे मन ना लागला के कारन महेन्दर मिसिर जी हर तरह से गीत संगीत कीर्तन गवनई मे जुटि गईनी । बाबुजी के स्वर्ग सिधरला के बाद जमीदार हलिवंत सहाय जी से जब ढेर नजदीकी भईल त उहा खातिरमुजफ्फरपुर के एगो गावे वाली के बेटी ढेलाबाई के अपहरण कई के सहाय जी के लगे चहुंपा देहनी । बाद मे एह बात के बहुत दुख पहुंचल आ पश्चाताप भी कईनी संगे संगे सहाय जी के गइला के बाद, ढेला बाई के हक दियावे खातिर महेन्दर मिसिर जी कवनो कसर बाकी ना रखनी !
महेंद्र मिश्र का जन्म छपरा के मिश्रवलिया में आज ही के दिन 16 मार्च 1886 को हुआ था. महेंद्र मिश्र बचपन से ही पहलवानी, घुड़सवारी, गीत, संगीत में तेज थे. उनको विरासत में संस्कृत का ज्ञान और आसपास के समाज में अभाव का जीवन मिला था जिसमें वह अपने अंत समय तक भाव भरते रहे. इसीलिए उनकी रचनाओं में देशानुराग से लेकर भक्ति, श्रृंगार और वियोग के कई दृश्य मिलते हैं. भोजपुरी साहित्य में गायकी की जब-जब चर्चा होती महेंद्र मिश्र की पूरबी सामने खड़ी हो जाती है. शोहरत का आलम यह कि  भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के जिस-जिस हिस्से (फिजी, मारिशस, सूरीनाम, नीदरलैंड, त्रिनिदाद, ब्रिटिश गुयाना) में गिरमिटिए गए महेंद्र मिश्र की गायकी उनके सफ़र और अपनी मिटटी का पाथेय बनकर साथ गई. साहित्य संगीत के इतिहास में विरला ही कोई होगा जो एक साथ ही शास्त्रीय और लोक संगीत पर गायन-वादन में दक्षता भी रखता हो और अपने आसपास के राजनीतिक-सामाजिक हलचलों में सक्रिय भागीदारी रखता हो और पहलवानी का शौक भी रखता हो. महेंद्र मिश्र का जीवन रूमानियत के साथ भक्ति का भी साहचर्य साथ-साथ का रहा है. इस कवि का मित्रभाव ऐसा था कि उन्होंने अपने जमींदार मित्र हलिवंत सहाय के प्रेम के लिए मुजफ्फरपुर से ढेलाबाई का अपहरण करके लाकर मित्र के यहाँ पहुंचा दिया. हालांकि अपने इस काम के पश्चाताप स्वरुप वह ढेलाबाई के साथ अंत तक हलिवंत सहाय के गुजरने के बाद भी रहकर निभाते रहे. उनके जमींदारी के मामलों की देखरेख करते रहे. महेंद्र मिश्र के जीवन के इतने रंग है कि आप जितना घुसते जाते हैं लगता है एक और छवि निकल कर सामने आ रही है. गोया कोई फिल्म देख रहे हों. पहलवानी का कसा लम्बा-चौड़ा बदन, चमकता माथा, देह पर सिल्क का कुर्ता, गर्दन में सोने की चेन और मुँह में पान की गिलौरी ऐसा आकर्षक था महेंद्र मिश्र का व्यक्तित्व.       
                                                                                                                                                                                                                                    लोककलाकार भिखारी ठाकुर और महेंद्र मिश्र
भोजपुरी के भारतेंदु कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर और महेंद्र मिश्र समकालीन थे. लोकश्रुति यह भी है कि भिखारी ठाकुर के साहित्यिक सांगीतिक गुरु महेंद्र मिश्र ही थे. भिखारी ठाकुर पर शुरुआती दौर के किताब लिखने वाले भोजपुरी के विद्वान आलोचक महेश्वराचार्य जी के हवाले से कहा गया है कि 'जो महेंद्र न होते तो भिखारी ठाकुर भी नहीं पनपते. उनकी एक एक कड़ी लेकर भिखारी ने भोजपुरी संगीत रूपक का सृजन किया है. भिखारी की रंगकर्मिता, कलाकारिता के मूल महेंद्र मिश्र हैं जिनका उन्होंने कहीं नाम नहीं लिया है. महेंद्र मिश्र भिखारी ठाकुर के रचना-गुरु, शैली गुरु हैं. महेंद्र मिश्र का 'टुटही पलानी' वाला गीत भिखारी ठाकुर के 'बिदेसिया' की नींव बना.' महेंद्र मिश्र के अध्येता सुरेश मिश्र इस संदर्भ में भिखारी ठाकुर के समाजियों 'भदई राम', 'शिवलाल बारी' और 'शिवनाथ बारी' के साक्षात्कार का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि 'पूरी बरसात भिखारी ठाकुर महेंद्र मिश्र के दरवाजे पर बिताते थे तथा महेंद्र मिश्र ने भिखारी ठाकुर को झाल बजाना सिखाया था.' इतना ही नहीं महेंद्र मिश्र को पुरबी का जनक कहा जाता है और भिखारी ठाकुर के नाटकों में प्रयुक्त कई कविताओं की धुन पूरबी ही है. लोकसंस्कृति के अध्येताओं को अभी इस  ओर अभी और शोध करने की आवश्यकता है. 
स्वतंत्रता संग्राम और महेंद्र मिश्र
महेंद्र मिश्र का समय गाँधी के उदय का समय है. बिहार स्वतंत्रता सेनानी संघ के अध्यक्ष विश्वनाथ सिंह तथा इस इलाके के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी श्री तापसी सिंह ने अपने एक लेख में यह दर्ज किया है कि महेंद्र मिश्र स्वतंत्रता सेनानियों की आर्थिक मदद किया करते थे. इस सन्दर्भ में अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन के चौदहवें अधिवेशन, मुबारकपुर, सारण 'इयाद के दरपन में' देखा जा सकता है. सारण के इलाके के कई स्वतंत्रता सेनानी और कालांतर में सांसद भी (बाबू रामशेखर सिंह और श्री दईब दयाल सिंह) ने अपने यह बात कही है कि महेंद्र मिश्र का घर स्वंतंत्रता संग्राम के सिपाहियों का गुप्त अड्डा हुआ करता था. उनके घर की बैठकों में संगीत और गीत गवनई के अलावा राजनीतिक चर्चाएँ भी खूब हुआ करती थी. उनके गाँव के अनेक समकालीन बुजुर्गों ने इस बात की पुष्टि की है कि महेंद्र मिश्र स्वाधीनता आन्दोलन के क्रांतिकारियों की खुले हाथों से सहायता किया करते थे. आखिर उनके भी हिस्से वह दर्द तो था ही कि 
"हमरा नीको ना लागे राम गोरन के करनी 
 
रुपया ले गईले,पईसा ले गईलें,ले सारा गिन्नी 
 
ओकरा बदला में दे गईले ढल्ली के दुअन्नी'
पूरबी सम्राट महेंद्र मिश्र के साथ यह अजब संयोग ही है कि उनकी रचनाएँ अपार लोकप्रियता के सोपान तक पहुँची. भोजपुरी अंचल ने टूट कर उनके गीतों को अपने दिलों में जगह दी किन्तु साहित्य इतिहासकारों की नजर में महेंद्र मिश्र अछूत ही बने रहे. किसी ने उनपर ढंग से बात करने की कोशिश नहीं की. अलबता एकाध पैराग्राफ में निपटाने की कुछ सूचनात्मक कोशिशें हुई जरुर. रामनाथ पाण्डेय लिखित भोजपुरी उपन्यास 'महेंदर मिसिर' और पाण्डेय कपिल रचित उपन्यास 'फूलसुंघी' पंडित जगन्नाथ का 'पूरबी पुरोधा' और जौहर सफियाबादी द्वारा लिखित 'पूरबी के धाह' लिखी है. प्रसिद्ध नाटककार रवीन्द्र भारती ने 'कंपनी उस्ताद' नाम से एक नाटक लिखा है जिसे वरिष्ठ रंगकर्मी संजय उपाध्याय ने खूब खेला भी है. भोजपुरी मैथिली के फिल्मकार नितिन नीरा चंद्रा भी महेंद्र मिश्र पर एक फिल्म की तैयारी में हैं. रत्नाकर त्रिपाठी ने आर्ट कनेक्ट में 'टू लाइफ ऑफ़ महेंद्र मिश्र' नाम से के शानदार लेख लिखा है. इधर जैसी कि सूचना है बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् जल्दी ही महेंद्र मिश्र की रचनावली का प्रकाशन करने जा रहा है.
नकली नोट की छपाई का किस्सा और गोपीचंद जासूस
महेंद्र मिश्र का कलकत्ता आना जाना खूब होता था. तब कलकता न केवल बिहारी मजदूरों के पलायन का सबसे बड़ा केंद्र बल्कि राजनीतिक गतिविधियों की भी सबसे उर्वर जमीन बना हुआ था. कलकते में ही उनका परिचय एक अंग्रेज से हो गया था जो उनकी गायकी का मुरीद था. उसने लन्दन लौटने के क्रम में नकली नोट छापने की मशीन महेंद्र मिश्र को दे दी जिसे लेकर वह गाँव चले आए और वहाँ अपने भाईयों के साथ मिलकर नकली नोटों की छपाई शुरू कर दी और सारण इलाके में अपने छापे नकली नोटों से अंग्रेजी सत्ता की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोडनी शुरू कर दी. महेंद्र मिश्र पर पहला उपन्यास लिखने वाले रामनाथ पाण्डेय ने अपने उपन्यास 'महेंदर मिसिर' में लिखा है कि 'महेंद्र मिश्र अपने सुख-स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि शोषक ब्रिटिश हुकूमत की अर्थव्यवस्था को धराशायी करने और उसकी अर्थनीति का विरोध करने के उद्देश्य से नोट छापते थे'. इस बात की भनक लगते ही अंग्रेजी सरकार ने अपने सीआईडी जटाधारी प्रसाद और सुरेन्द्र लाल घोष के नेतृत्व में अपना जासूसी तंत्र को सक्रिय कर दिया और अपने जासूस हर तरफ लगा दिए. सुरेन्द्रलाल घोष तीन साल तक महेंद्र मिश्र के यहाँ गोपीचंद नामक नौकर बनकर रहे और उनके खिलाफ तमाम जानकारियाँ इकट्ठा की. तीन साल बाद 16 अप्रैल 1924 को गोपीचंद के इशारे पर अंग्रेज सिपाहियों ने महेंद्र मिश्र को उनके भाइयों के साथ पकड़ लिया. गोपीचंद की जासूसी और गद्दारी के लिए महेंद्र मिश्र ने एक गीत गोपीचंद को देखते हुए गाया -
पाकल पाकल पानवा खिअवले गोपीचनवा पिरितिया लगा के ना,
हंसी हंसी पानवा खिअवले गोपीचानवा पिरितिया लगा के ना
मोहे भेजले जेहलखानवा रे पिरितिया लगा के ना
गोपीचंद जासूस ने जब यह सुना तो वह भी उदास हो गया. वह भी मिश्र जी के प्रभाव में तुकबंदियाँ सीख गया था. उसने भी गाकर ही उत्तर दिया -
नोटवा जे छापि छपि गिनिया भजवलs ए महेन्दर मिसिर
ब्रिटिस के कईलs हलकान ए महेन्दर मिसिर
सगरे जहानवा मे कईले बाडs नाम ए महेन्दर मिसिर
पड़ल बा पुलिसिया से काम ए महेन्दर मिसिर
सुरेश मिश्र इस घटनाक्रम के बारे में लिखते हैं - 'एक दिन किसी अंग्रेज अफसर ने जो खूब भोजपुरी और बांग्ला भी समझता था,इनको 'देशवाली' समाज में गाते देखा । उसने इनको नृत्य-गीत के एक विशेष स्थान पर बुलवाया । ये गए । बातें हुईं ।वह अँगरेज़ उनसे बहुत प्रभावित हुआ । इनके कवि की विवशता,हृदय का हाहाकार,ढेलाबाई के दुखमय जीवन की कथा,घर परिवार की खस्ताहाली तथा राष्ट्र के लिए कुछ करने की ईमानदार तड़प देखकर उसने इनसे कहा- तुम्हारे भीतर कुछ ईमानदार कोशिशें हैं । हम लन्दन जा रहे हैं । नोट छापने की यह मशीन लो और मुझसे दो-चार दिन काम सीख लो । यह सब घटनाएँ 1915-1920  के आस-पास की हैं.'
पटना उच्च न्यायालय में महेंद्र मिश्र के केस की पैरवी विप्लवी हेमचन्द्र मिश्र और मशहूर स्वतंत्रता सेनानी चितरंजन दास ने की. महेंद्र मिश्र की लोकप्रियता का आलम यह था कि उनके गिरफ्तारी की खबर मिलते भी बनारस से कलकत्ता की तवायफों ने विशेषकर ढेलाबाई, विद्याधरी बाई, केशरबाई  ने अपने गहने उतार कर अधिकारीयों को देने शुरू कर दिए कि इन्हें लेकर मिश्र जी को छोड़ दिया जाए. सुनवाई तीन महीने तक चली. लगता था कि मिश्र जी छूट जाएँगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ और उन्होंने अपना अपराध कबूल लिया. महेंद्र मिश्र को दस वर्ष की सजा सुना दी गई और बक्सर जेल भेज दिया गया. महेंद्र मिश्र के भीतर के कवि, गायक ने जेल में जल्दी ही सबको अपना प्रशंसक बना लिया और उनके संगीत और कविताई पर मुग्ध होकर तत्कालीन जेलर ने उन्हें जेल से निकाल कर अपने घर पर रख लिया. वहीं पर महेंद्र मिश्र जेलर के बीवी बच्चों को भजन एवं कविता सुनाते तथा सत्संग करने लगे. वहीं महेंद्र मिश्र ने भोजपुरी का प्रथम महाकाव्य और अपने काव्य का  गौरव-ग्रन्थ "अपूर्व रामायण" रचा. मुख्य रूप से पूरबी के लिए मशहूर महेंद्र मिश्र ने कई फुटकर रचनाओं के अलावा महेन्द्र मंजरी, महेन्द्र बिनोद, महेन्द्र मयंक, भीष्म प्रतिज्ञा, कृष्ण गीतावली, महेन्द्र प्रभाकर, महेन्द्र रत्नावली , महेन्द्र चन्द्रिका, महेन्द्र कवितावली आदि कई रचनाओं की सर्जना की.
प्रेम की पीर और प्रेम में मुक्ति का कवि-गायक
यह ज्ञात तथ्य है कि कलकत्ता, बनारस, मुजफ्फरपुर आदि जगह की कई तवायफें महेंद्र मिश्र को अपना गुरु मानती थी. इनके लिखे कई गीतों को उनके कोठों पर सजी महफ़िलों में गाया जाता था. पूरबी की परंपरा का सूत्र पहले भी दिखा है लेकिन उसकी प्रसिद्धि महेंद्र मिश्र से ही हुई. चूँकि मिश्र जी हारमोनियम, तबला, झाल, पखाउज, मृदंग, बांसुरी पर अद्भुत अधिकार रखते थे तो वहीं ठुमरी टप्पा, गजल, कजरी, दादरा, खेमटा जैसी गायकी और अन्य कई शास्त्रीय शैलियों पर जबरदस्त अधिकार भी था. इसलिए उनकी हर रचना का सांगीतिक पक्ष इतना मजबूत है कि जुबान पर आसानी से चढ़ जाते थे सो इन तवायफों ने उनके गीतों को खूब गाया भी. उनकी पूरबी गीतों में बियोग के साथ-साथ गहरे रूमानियत का अहसास भी बहुत दिखता है जो कि अन्य भोजपुरी कविताओं में कम ही दिखायी देती हैं.
अंगुरी मे डंसले बिआ नगिनिया, ए ननदी दिअवा जरा दे/ सासु मोरा मारे रामा बांस के छिउंकिया, सुसुकति पनिया के जाय, पानी भरे जात रहनी पकवा इनरवा, बनवारी हो लागी गईले ठग बटमार /  आधि आधि रतिया के पिहके पपीहरा, बैरनिया भईली ना, मोरे अंखिया के निनिया बैरनिया भईली ना / पिया मोरे गईले सखी पुरबी बनिजिया, से दे के गईले ना, एगो सुनगा खेलवना से दे के गईले ना, जैसे असंख्य गीत में बसा विरह और प्रेम का भाव पत्थर पिघलाने की क्षमता रखता है. कहा तो यह भी जाता है कि महेंद्र मिश्र के गीतों में जो दर्द है वह ढेलाबाई और अन्य कई तवायफों की मजबूरी, दुख:दर्द के वजह से भी है. ढेलाबाई से महेंद्र मिश्र की मित्रता के कई पाठ लोक प्रचलन में हैं लेकिन एक स्तर पर यह घनानंद की प्रेम की पीर सरीखा है. इसलिए महेंद्र मिश्र के यहाँ भी प्रेम में विरह की वेदना की तीव्रता इतनी है कि दगादार से यारी निभाने की हद तक चला जाता है. ढेलाबाई और महेंद्र मिश्र के बीच के नेह-बंध को ऐसे देख सकते हैं. वैसे भी प्रेम में मुक्ति का जो स्वर महेंद्र के यहाँ हैं वह लोकसाहित्य में विरल है. कहते हैं उनके गायकी से पत्थर पिघलते थे, सारण से गुजरने वाली नदियाँ गंगा और नारायणी की धार मंद पड़ जाती थी. यह गायकी का जोर था महेंद्र मिश्र का, लेकिन अफ़सोस भोजपुरी का यह नायब हीरा अपने जाने के सात दशकों में किंवदन्तियो और मिथकों सरीखा बना दिया गया है और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हमने अपने लोक का इतिहास संरक्षित करने में हमेशा से उपेक्षा का भाव रखा. हमारे पास राजाओं और शासकों का इतिहास है लेकिन लोक ह्रदय सम्राटों का नहीं. महेंद्र मिश्र इसी उपेक्षा के मारे ऐसे ही कलाकार हैं. 16 मार्च 1886 से शुरू हुई यात्रा से 26 अक्टुबर 1946 को ढेलाबाई के कोठा के पास बने शिवमंदिर में पूरबी के इस सम्राट ने दुनिया को अलविदा कह दिया. उसका दिल बड़ा था लेकिन उसके लिए दुनिया ही छोटी थी. उन्होंने अपनी प्रेम गीतों में दगादार से भी यारी और प्रेम में स्वतंत्रता का भाव विशेषकर स्त्रियों के पक्ष में का भाव पैदा किया. भोजपुरी के लगभग सभी गायकों शारदा सिन्हा से लेकर चन्दन तिवारी तक ने महेंद्र मिश्र के गीतों को अपनी आवाज़ दी है. कहते हैं होंगे कई कवि-गायक महेंद्र मिश्र जैसा कोई दूजा न, हुआ न होगा.   
महेंद्र मिश्र के गीतों के वेबलिंक्स
https://www.youtube.com/watch?v=qXuSvy6ragI
https://www.youtube.com/watch?v=j8Ev5v07rH0
https://www.youtube.com/watch?v=rYhEKhkkWho

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...