8/2/10

भोजपुरी फिल्मों का 'अ-भोजपुरिया'सौंदर्यशास्त्र



आज भोजपुरी सिनेमा जगत अपने शवाब पर है.किलो के भाव फिल्में आ रही हैं,हज़ारों लोगों को काम मिल रहा है.कईयों को इस बात का मुगालता हो सकता है कि यह दौर भोजपुरी का स्वर्णिम दौर है.इसमें कोई दो राय नहीं कि यही वह समय है जब भोजपुरी ने बड़े कैनवास पर अपनी छाप उकेरी है,पर इस कैनवास पर आने की भेडचाल में वह अपनी स्वाभाविक चाल और राह दोनों से भटक गया अथवा भूल गया है.कहा जाता है कि रोम रातों-रात नहीं बसा था.वैसे भी किसी समाज,शहर,उद्योग को विकसित होने में एक लंबा समय लगता है.बेतरतीब और बिना प्लानिंग के बने,बसे शहर,समाज,उद्योग जल्द ही नारकीय स्थिति में आ जाने को अभिशप्त हो जाते हैं.आज भोजपुरिया समाज के लिए यह बेहतर बात है कि भोजपुरी फिल्मों का लगभग सूखा संसार लहलहाने लगा है,पर अब यह संसार अपनी स्वाभाविक गति को भूल चूका है,यह अब रपटीली राह पर चल रहा है.एक समय था कि यह फिल्में नोटिस में नहीं थीं पर अब जबकि इनको पहचान मिल चुकी है और इसका दर्शक-वर्ग और समुदाय बेहतर ढंग से निर्मित हो चला है फिर ऐसे में जरुरत अब इनके रंग बदलने की है वरना इनकी भी नियति उन अन्य क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों की तरह हो जाएगी,जिनकी चांदनी हिंदी सिनेमा के फार्मूलों के पद-चिन्हों पर चलके नष्ट हो गयीं.
अब भोजपुरी फिल्मों की समस्या इनके मेकिंग से ही जुडी नहीं है बल्कि इसके प्रस्तुति और कथ्य से भी जुडी हुई है.अपने उफान के इसी दौर में भोजपुरी सिनेमा के एक प्रबुद्ध वर्ग को गंभीर होना होगा.जो आने वाले समय में उसे एक सार्थक सिनेमा इंडस्ट्री के तौर पर स्थापित करने वाला होगा.मगर यह भी इतना आसान नहीं है.इस सिनेमा इंडस्ट्री में जिनका पैसा इन्वेस्ट हो रहा है उनमे कई राजनेता,सफेदपोश,और अब तक रेलवे या सड़क की ठेकेदारी करने वाले विशुद्ध व्यापारी लोग हैं जिनका प्रथम और अंतिम लक्ष्य येन-केन-प्रकारेण मुनाफ़ा कमाना है.हालांकि यह गठजोड़ अभी उजागर नहीं है.अपनी बोली से राग रखने वाले इस फर्क को बखूबी जानते हैं कि राकेश पाण्डेय अभिनीत 'बालम परदेसिया' और नयी फिल्म'हम बाहुबली'का बेसिक फर्क क्या है.यह सिर्फ दो फिल्मों की बात नहीं है यह तो मात्र उदाहरण हैं.भोजपुरी की नयी फिल्मों का बेसिक फर्क उनके टोन और जमीनी होने को लेकर है.एक समय का दौर परम्परागत टोन और स्वाद का है तो दूसरा अजनबियत से भरा नितांत बालीबुडिया तेवर का,जो भोजपुरी का एक मॉस दर्शक तैयार करने में असमर्थ हो जाती है.ऐसा नहीं है कि यह प्रभाव एकदम ही गलत है पर अपनी जड़ों से हटकर अतिशय प्रयोगधर्मिता इस दौर में और उचित नहीं यह भोजपुरी सिनेमा के जड़ों में मट्ठा डालते जाने सरीखा है.अब भोजपुरी सिने-जगत को एक नया तेवर देने की जरुरत है.एक नयी करवट लेने की जरुरत है,जिसका फलक वैश्विक हो.और यह बड़े-बड़े फिल्म समारोहों तक पहुंचकर अपनी छाप छोड़े.

यह वाकई काबिलेतारीफ है कि इस फिल्म जगत ने अपनी नींव पुख्ता करली है पर इस नींव को स्थायित्व तभी मिल सकेगा जब इसमें कुछ सार्थक,अर्थपूर्ण फिल्मों का भी निर्माण शुरू हो.यह अपनी माटी के जमीनी यथार्थ को इंगित करती हुई कुछ ऐसी फिल्में बनाये,जो इस भाषिक अंचल की गुंडा,दबंगई जैसी स्टीरियो टाईप इमेज से अलग हो जैसा कि अपने कम प्रभाव क्षेत्र के बावजूद बांग्ला,उडिया,मराठी,मलयाली आदि फिल्मों ने बनायीं है. यानी भोजपुरी सिनेमा जाने-अनजाने अपने लोक से कट रहा है.भोजपुरी सिनेमा पर बारीक नज़र रखने वाले भोजपुरी के युवा फिल्म समीक्षक अमितेश लिखते हैं"भोजपुरी सिनेमा में भोजपुरी समाज की समस्याओं,लोक-परंपरा,रीती-रिवाजों का चित्रण नहीं हो रहा है.भाषा को छोड़कर सबकुछ बाह्य प्रतिरोपित किया गया है.अगर इनका चित्रण होता भी है तो व्यावसायिक नजरिये से,जैसे पर्व के नाम पर होली या छठ का चित्रण....होली के चिरं से अश्लीलता दिखाने की छूट मिल जाती है.पलायन,दहेज़,भ्रूण हत्या,बेरोज़गारी इत्यादि भोजपुरी समाज की मुख्य समस्याएं हैं जिनको लेकर अच्छी फिल्में बनायीं जा सकती हैं पर इन सब पर किसका ध्यान है.ध्यान है सिर्फ अपराध पर,जिसमें अपराध और अपराधी को ग्लैमराईज किया जाता है"-एक युवा दर्शक/समीक्षक की यह चिंता जायज़ है क्योंकि यह चिंता भोजपुरी फिल्मों के उस बड़े समुदाय की भी है जिसने इधर देखना भी छोड़ दिया है.

तकरीबन एक ही ढर्रे की भोजपुरी फिल्मों की बाढ़ के बीच इसका निर्माता वर्ग यह भूल गया है कि बाढ़ की एक विशेषता या यूँ कहें असर होता है कि जब बाढ़ का पानी आता है तो अपने साथ ढेर सारा अवशिष्ट पदार्थ भी लेकर आता है.यह सभी अवांछित पदार्थ उतरते पानी के साथ वापस नहीं जाते बल्कि इधर-उधर के गड्ढों,नालों,चौरों में अटक जाते हैं और बाद में सडांध तथा बीमारी ही पैदा करते हैं.भोजपुरी फिल्मों की इस बाढ़ के बीच इस बात पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है कि रुपये सैकड़े प्रति भाव की आमद के बीच भोजपुरी फिल्में कब तक अपने मोहपाश से दर्शकों को बांधे रख सकेंगी ?कब तक दर्शकों को यह छलावा देती रहेंगी की हाँ यही है भोजपुरी का वह स्वर्णिम दौर?आश्चर्य है भोजपुरी का प्रबुद्ध वर्ग भी इस और से गंभीर चुप्पी साधे और आँखें मूंदे बैठा है.यह अत्यधिक खतरनाक स्थिति है कहीं ऐसा न हो की भोजपुरी फिल्मों की यह बाढ़ अपने पीछे ऐसा ही अवशिष्ट छोड़ जाये जिसे हम याद ना रखना चाहें या बेहतर यह हो कि अब हम भी'स्पर्श'कांजीवरम,जैपनीज वाईफ,जैसी क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों से कुछ सीखें और कुछ यादगार और सच्चे अर्थों में स्वर्णिम दें.यह अधिक मुश्किल नहीं है जरुरत भोजपुरी के अब प्रबुद्ध वर्ग के जागने और फिल्मकारों को जगाने की है बेशक सब ना सही कम से कम एक तो चिराग रोशन हो.अन्यथा भोजपुरिया फिल्मों का यह गढ़ा जा रहा 'अ-भोजपुरिया' सौंदर्यशास्त्र नासूर बन टीस देता रहेगा.

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...