3/15/21

भोजपुरी के पहले ऑर्केस्ट्रा बैंड वाले 'मोहम्मद खलील'


वह साठ के आसपास का समय रहा होगा जब भोजपुरी के रत्न गीतकार भोलानाथ गहमरी के लिखे गीत के शब्द "कवने खोंतवा में लुकईलू आई हो बालम चिरई" और देवेंद्र चंचल के लिखे "छलकल गगरिया मोर निरमोहिया, ढलकल गगरिया मोर"- की टांस भोजपुरिया अंचल में गूँजी और घर-घर में, गले-गले में बस गयी। मोतिहारी के भवानीपुर जिरात मोहल्ला के रहने वाले भारतीय रेलवे के एक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी मोहम्मद खलील का तबादला बलिया से इलाहाबाद हुआ। फिर इलाहाबाद वह जमीन बना जहाँ उनकी गायकी के शौक ने भोजपुरी के पहले बैंड या यूँ कहिए कि ऑर्केस्ट्रा बैंड "झंकार पार्टी" को मजबूती से स्थापित किया, जिसके नींव बलिया की जमीन में डाली गयी थी। नबीन चंद्रकला कुमार ने इस झंकार पार्टी को भोजपुरी का पहला ऑर्केस्ट्रा बैंड बताते हुए लिखा कि "आज के दौर में जब भोजपुरी इलाके में ऑर्केस्ट्रा संस्कृति का मतलब एक खास तरह के नाच-गान रह गया है वहाँ मोहम्मद खलील का ऑर्केस्ट्रा इस अंचल की सबसे सार्थक सांगीतिक पहचान रहा है।" सीताराम चतुर्वेदी के गीत "छलकत गगरिया मोर निरमोहिया" और "अजब सनेहिया बा तोर निरमोहिया" गाकर मोहम्मद खलील ने भोजपुरी गायकी में वह स्थान और कद पाया, जहाँ से यह पैमाइश की जाने लगी कि यह खलील की गायकी के पासंग है या नहीं। जिस वक़्त भोजपुरी नित नए गायकों के अलबमों की बाढ़ टी-सीरीज जैसे बड़े कंपनियों और चंदा, नीलम जैसे स्थानीय कैसेट कंपनियों से आ रही थी, उस दौर में भी खलील के गायन के स्तर का कोई गायक न हुआ। मोहम्मद खलील की गायन प्रतिभा के लिए भोजपुरी के शिखर साहित्यत्कार कैलाश गौतम ने कहा था 'अब गीत तो हैं पर मोहम्मद खलील के अंदाज़ में टेर लगाने वाला कोई गायक नहीं है। खलील के गीत में आकर्षण ही आकर्षण है। थथमल मीठी आवाज़, अद्भुत संतुलन, खलील का अंदाज़ और गीतों का नयापन, यही था खलील के घर-घर पहुँचने का कारण। अब तो पता नहीं वैसे गीत लिखे जा रहे हैं कि नहीं, आगे खलील जैसे गायक होंगे या नहीं।"- वाकई नब्बे के शुरू में मधुमेह से ग्रस्त मात्र पचपन साल की उम्र में 1991 में जैसे ही मोहम्मद खलील इस दुनिया से रुखसत होते हैं, भोजपुरी गायकी एक अँधेरे कुँए में उतरती है और भोजपुरी को नोच खाने वाले गायकों की बाढ सी आती है पर खलील तक पहुँचने की कुव्वत किसी में नहीं होती। क्षणिक लोकप्रियता और अदूरदर्शिता ने भोजपुरी गायकी में एक शून्य पैदा किया, जिसकी भरपाई करने की कोशिश किसी की नहीं रही। बाद के गायकों ने कोशिश की लेकिन बाजार कहिए कि अधैर्यता कोई उस पैमाने पर खरा न उतरा। गले में शास्त्रीयता ला सकते हैं सुरीलापन ला सकते हैं, मुरकियाँ लगा सकते है, ऊँची तान मार सकते हैं पर मोहम्मद खलील के गाये गीतों की साहित्यिकता, गले की टांसदार, संतुलित आवाज़ और लोक का स्वच्छंद उल्लास कहाँ से लाते। वह मोहम्मद खलील के गायकी में थी, शायद यहीं वजह  जो उन्हें दूसरों से खास बनाती थी। सरस्वती का उनके गले ही नहीं चित्त में भी वास था। आज खलील होते तो पटेया नहीं किस पाले में जबरिया धकेले जाते लेकिन जब तक उनकी गायकी और झंकार पार्टी सलामत रही, गायकी की शुरुआत सरस्वती वंदना और देवी गीत ही गाया जाता था। "बिनइले सारदा भवानी, पत राखीं महारानी" और " माई मोरा गितिया में अस रस भरि दे, जगवा के झूमे जवानी" - भोजपुरी जगत में सरस्वती वंदना के शास्त्रीय मंत्र के सामने लोक की सीधी उपस्थिति है। मोहम्मद खलील को इलाहाबाद में चंदर परदेसी(हारमोनियम), इकबाल अहमद (वायलिन), हजारीलाल चौहान (बाँसुरी) और  मो. इब्राहिम (ढोलक) पर  संगत में मिले और महेंद्र मिश्र, श्रीधर शास्त्री, उमाकांत मालवीय, भोलानाथ गहमरी, राहगीर बनारसी, युक्तिभद्र दीक्षित, मोती बी.ए., बेकल उत्साही, पंडित हरिराम द्विवेदी जैसे गीतकारों के शब्दों को अपने गले में बिठाकर मोहम्मद खलील ने भोजपुरी गायकी में अपनी प्रतिभा का डंका पीट दिया। बाद के समय तो भोलानाथ गहमरी और मोहम्मद खलील का साथ एक दूसरे से ऐसे जुड़ा गोया सुर और ताल एकसम हो गए। मोहम्मद खलील ने भोजपुरी के हर मिज़ाज़ के गीत गए और एक से बढ़कर एक गाये। उनके कुछ बेहद चर्चित गीतों में "प्रीति करीं अइसे जईसे कटहर के लासा"/"गोरी झुकी झुकी काटेली धान, खेतिया भईल भगवान"/"सावन है सखी सावन"/"छिंटिया पहिर गोरी बिटिया हो गईली"/"लेले अईहा बालम बजरिया से चुनरिया"/"लाली लाली बिंदिया"/"प्रीति में ना धोखाधड़ी, प्यार में ना झांसा"/ "अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया हो"- प्रमुख हैं। मोहम्मद खलील के गाए गीतों ने आगे आने वाले कई गीतकारों को न केवल तुकबंदी करने, शब्दों के मेल बिठाने की अक्ल दी बल्कि संगीतकारों को भोजपुरी संगीत की एक तमीज़ सिखाई। मो. खलील ऑल इंडिया रेडियो और बाद के सालों में दूरदर्शन पर भोजपुरी गायकी की अनिवार्य उपस्थिति हो गए थे। पर एस डी ओझा एक अफसोस के साथ लिखते हैं - "जिसने भोजपुरी की नई राह रची, उसके रिकॉर्ड बाज़ार में नहीं हैं। रेडियो स्टेशनों या दूरदर्शन में हो तो हों।" एक पूरी पीढ़ी जिस गायक को सुन सुन रीझती रही उसके रिकॉर्ड उपलब्ध ना होना, भोजपुरी सांगीतिक परम्परा की सबसे बड़ा दुर्भाग्य है पर भोजपुरी के साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने वाले ऑनलाइन पोर्टल आखर ने अपने प्लेटफॉर्म पर उनके गीत, उन्हीं की आवाज़ में ही संग्रहित किए हैं। हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध संगीतकार नौशाद साहब मोहम्मद खलील की इस प्रतिभा के मुरीद थे।  दयानंद पांडेय मोहम्मद खलील पर लिखे अपने एक लेख में दर्ज करते हैं कि "नौशाद उन्हें मुम्बई लेकर आए तो वह अपने साथ परंपरागत साज़ों के साथ ही पहुँचे। नौशाद जब उनको गायकी में तब्दील करने को कहते तो एक दिन आज़ीज़ आकर नौशाद से उन्होंने हाथ जोड़कर कहा - 'नौशाद साहब जरूरत पड़ी तो मैं भोजपुरी के लिए खुद को बेच दूँगा पर अपनी कमाई के लिए भोजपुरी को नहीं बेचूँगा।' और वह चुपचाप अपनी टीम लेकर वापस इलाहाबाद लौट आए।"- भोजपुरी का आज का अधिकतर सांगीतिक परिदृश्य जहाँ फूहड़ शब्द, गायकी और दृश्य के षड्यंत्रों में डूबा हुआ है, वहाँ भोजपुरिये गर्व से सीना ताने कह सकते हैं कि एक दौर वह रहा है, जब हमारे मोहम्मद खलील भी हुए थे, जिसने रेलवे की नौकरी की और भोजपुरी की सेवा। वह दौर था जब भोजपुरी गायकी में द्विअर्थी गीत, ऑकवर्डनेस नहीं, उसका खालिस सौंदर्य था।  जिसमें ऑडिएंस के भेद का थोथा तर्क नहीं था। मो. खलील को मरणोपरांत 'भोजपुरी रत्न' से सम्मानित किया गया। 90 के शुरू में जैसे ही बाजार और उसके प्रभाव में भोजपुरी समाज और संगीत ने करवट ली, मोहम्मद खलील की विरासत भी विदा (1991) हो गई। मोहम्मद खलील के गाये गीत 'कवने खोतवाँ में लुकइलु आईहो बालम चिरई' की मानिंद आज की भोजपुरी की समृद्ध गायकी भी कहीं छिप गयी है। 
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मोहम्मद खलील के गीतों के कुछ लिंक 
https://youtu.be/J1jujZoFuEk (सरस्वती वंदना)

(अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया)

(लेले अईहा बालम बजरिया से)

(लेख द लल्लन टॉप पर प्रकाशित । बिना अनुमति किसी पोर्टल पर पब्लिश न करें - मोडरेटर ) 

3/9/21

खाओ कसम कि अब किसी ... लाली (शॉर्ट फिल्म)

 लहसनवाँ हीराबाई के यहाँ क्यों टिका? मालूम है? उसने हिरामन और साथियों को बताया था कि ‘हीराबाई के कपड़े धोने के बाद कठौत का पानी अतर गुलाब हो जाता है. उसमें अपनी गमछी डुबाकर छोड़ देता हूँ. लो सूँघो ना कैसी खुशबू आती है.’ – यही खुशबू तो शिवपूजन सहाय बाबू के धोबी को मिली है उसको भी एक दिन संयोग की बात ऐसी सनक सवार हुई कि वह कबूल बैठा ‘मैं उर्वशी और रंभा की साड़ियों और कुर्तियों को एकांत में सूंघ रहा था. उनकी मानसोन्मादिनी सुरभि से मस्तिष्क ऐसा आमोदपूर्ण हो गया कि  आँखों में मादकता की गहरी लाली उतर आयी.’ – शार्ट फ़िल्म “लाली” ( Laali Review ) देखते हुए हम उसके मुख्य नायक के साथ इन मानवीय भावों और उसके मनोविज्ञान को महसूसते हैं जिसे रेणु या शिवपूजन सहाय ने कभी लिखा था. इसमें अनायास ही कथानायक पंकज त्रिपाठी के एकाकी जीवन में यह भाव शामिल हो गया है, जहाँ वह लाली के लालित्य को सूँघता आत्मसात करने लगा है. यह साधारण कथा नहीं है बल्कि इसके हर फ्रेम में चिन्हशास्त्र का अद्भुत आख्यान है.  लेखक ने अपने निर्देशन में एक मुकम्मल साहित्यिक पाठ रचा है, जो शब्दों से अधिक इशारों में संवाद करती है और अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने निर्देशक की सोच को अपने अभिनय कौशल से लोक की नैसर्गिक सरसता में रूपांतरित करके साहित्यिक सिनेमाई भाषा में ढाल दिया है.

Laali Review

अभिरुप बसु लिखित निर्देशित शार्ट फ़िल्म “लाली” आधे घंटे से थोड़े ऊपर जाती है और पूरी कथा का चक्र पंकज त्रिपाठी के किरदार के आसपास चक्कर काटता है. एकावली खन्ना बेहद कम किन्तु जरूरी हिस्से के रूप में आती हैं. निर्देशक को अपनी लिखी कथा और उसके गढ़े दृश्यों में इतना भरोसा और महारत है कि उन्होंने संवाद और दृश्य भी तोल के रखे हैं, न सूत भर कम न, धेले भर ज़्यादा. हम इस फ़िल्म के फ्रेम दर फ्रेम में अभिनेता पंकज त्रिपाठी के अभिनय कौशल की मिश्री को घुलकर आबे-हयात होते देखते हैं. आपको उनका किरदार याद रहता है, उसका मायावी नाम नहीं. शुरुआत ही लंबे वन टेक शॉट के साथ होती है और आप लगातार किरदार के एक्शन्स में खुद भी किस्से के बहाव को तलाशने लगते हैं. किस्सा क्या है – ऊपरी तौर पर बस एक अकेला शख्स, एक जनाना ड्रेस और उसके साथ उस आदमी का जिया गया चंद पहरों में कुछ क्षण. जिनमें वह किरदार है और उस लाली की मधुर स्मृतियाँ, एक बिम्ब, जिसमें उसका, उससे यूँ ही मन का करार था.

बिहार के भोजपुरी इलाकों से कलकत्ते की ओर गए बिदेसियों की एक आधी हकीकत और आधे फसाने की ज़िंदगी का एक सच यह भी रहा है- एककी जीवन में एक लाली का स्वप्न. धर्मतल्ला के आसपास पतुरिया का नाच देख नौजवान बिदेसिया के पास बर बुता जाने को क्या था – देह! उढ़रिया ऐसे ही तो शामिल हुई उसके खालीपन में. और लेखक अभिरुप कलकत्ते की जमीन पर उगे इस दृश्य के एक हिस्से से अपने कथानायक का एकांत और उसकी जिंदगी के एकरसता को चुनते हैं. पंकज त्रिपाठी के लिए कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति न होगी कि लाली का यह अभिनेता कोई और ही है, जिससे अपने सिनेजगत का परिचय न था. रेडियो में बेचैन मन का सुकून तलाशते ‘चैन आये मेरे दिल को दुआ कीजिए’ वाला किरदार, एक कमरे और चंद फ्रेम की ज़िंदगी में एक पोस्टर की कोमल कल्पना के साथ उस ड्रेस को शामिल कर दर्शकों को यह बताने में सफल होता है कि हम सब अपने साथ कुछ आद्य स्मृतियाँ रखते हैं और उनके सहारे एक स्वप्न देखते हैं और जीवन कट जाता है. प्रकाश, लेंस, संगीत और सबसे प्रभावी पंकज त्रिपाठी का अभिनय एकाएक मणिकौल के ‘उसकी रोटी’ जैसा प्रभाव पैदा करने लगता है. हालांकि तुलना असंगत है और अभिरुप को अभी अपने को भी सिद्ध करना बाकी है लेकिन वह खालीपन जो सुच्चा की बीवी के हिस्से के इंतज़ार में दिखता था, उसका सबसे जटिलतम और महीन विन्यास पंकज त्रिपाठी के अभिनय में लाली में उभरता है. खासकर उस किरदार के सपने के टूटने और उन चंद घड़ियों की लाली के टूट जाने के क्रम में जब पंकज त्रिपाठी हारकर थसमसा कर बैठते हैं तो लगता है गोया वाकई जीवन का एक हिस्सा ही खत्म हो गया. रेत आखिर कब तक मुट्ठी में ठहरती. मारे गए गुलफाम के किस्से से गुजरते वह बात जेहन में उभरती है “भूख वही अच्छी जो पूरी हो, प्यास वही अच्छा जो मिट सके, प्यार वही अच्छा जहाँ जुनून हो, प्रेमी वही अच्छा जो जोगी हो और कथा वही अच्छी जो अधूरी हो.” वैसे एक बार  जो मन को भा गया , वो तन से साथ न हो, मन में हमेशा रहता है…पूरी तरह से…लेकिन एकाकी और खुद में घुलता. और फिर लाली का कथा नायक तो आईने में झलके अक्स को अपना समझ बैठा है. सो लाली को जाना ही था. यह काव्यात्मक शार्ट फ़िल्म है इसमें उदासी का काफ्काई इफेक्ट है और भावनाओं का ओ हेनरी सिग्नेचर भी.

इस एक मेटाफर को अभिरुप ने बड़ी कमाल और नफासत से रचा है और पंकज त्रिपाठी ने इसे बड़ी खूबसूरती से मूर्त किया है. आखिर गुलफाम के मारे जाने की पीड़ा उनके अध्ययनशील अभिनेता मन ने महसूसा है. ‘मन मतवाला, भोला भाला, भूला जग की रीत . प्रीत की रीत में ऐसा डूबा, प्रीत मिली ना मीत.’…पोस्टर पर गोपालगंज वाली लाली धीरे से अपने नायक को कहती लगती है ‘तुम्हारा जी छोटा हो गया है. है ना मीता? तुम्हारी महुआ घटवारिन को सौदागर ने खरीद लिया….’ पर  फिर पंकज त्रिपाठी का किरदार सुन कहाँ रहा है –

‘जो ग़मे हबीब से दूर थे वो खुद आग में जल गए/

जो ग़मे हबीब को पा गए वो ग़मों को हँसके निकल गए.”

लाली धीमे स्वर में बतियाती कविता की तरह का आख्यान है. इसका कथानायक करे क्या! उसके जीवन में एक बिजली की कौंध सुख की, कामना की, एक हल्की रूमानी मादकता साया हुई और तुरंत फना भी. लाली अपने कथा ट्रीटमेंट से मुस्कुराने पर मजबूर करती है. यह देखने लायक जरुरी शार्ट फ़िल्म है. अभिरुप बसु भविष्य की बड़ी उम्मीद जगाते हैं और पंकज त्रिपाठी का यह अनजाना, अनचीन्हा अभिनय है, जिसे अब तक देखा नहीं गया है. एक अभिनेता के लिए लाली का टेक्स्ट और ट्रीटमेंट एक परीक्षा है, पंकज त्रिपाठी ने इसे निभाया भी उसी तरह है. लाली का अंतिम दृश्य हिरामन की कसम की तरह जान पड़ता है. पर किरदार का भाव और प्रसाद की उन काव्य पंक्तियों की तरह है ‘मिला कहाँ वह सुख, जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया, आलिंगन में आते आते मुस्कयाकर जो भाग गया.’ – जब पंकज त्रिपाठी का किरदार गोधूलि के सूर्य सा काउंटर पर दूल्हे की शेरवानी डाले बैठा है. रेत घड़ी ने कहीं सारा रेत उलट कर समय घड़ी को उस पल में रोक दिया है और उसी समय कहीं किसी जगह एक हिरामन बैलों को डपटते हुए कह रहा है – ‘उलट उलट कर क्या देखते हो ? खाओ कसम की अब किसी…और तभी एक बारात सामने से गुजर जाती है. यह दर्शन मन कहाँ समझता है कि सवारी तो अपने मंजिल पर गयी, इसमें उदास होने की क्या बात है. पर मन…मन तो समझते हैं ना आप?

यह पंकज त्रिपाठी के प्रशंसकों के लिए उनके अभिनय का जादुई सरप्राइज है और लेखक निर्देशक अभिरुप बसु के साहित्यिक सिनेमाई सूझ और कौशल का प्रमाण.

-Munna K Pandey

https://www.filmaniaentertainment.com/laali-review-khao-kasam-ki-ab-kisi/

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भोजपुरी के पहले ऑर्केस्ट्रा बैंड वाले 'मोहम्मद खलील'

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