9/29/08

हंसने मुस्कुराने के लिए ....

ज़िन्दगी से जब भी थोडी ऊब हो तब कुछेक कवियों की रचनायें बड़ी सहजता से हमारे होंठो पर एक मुस्कराहट छोड़ जाती हैं । पेश है कुछ ऐसे ही कवियों की रचनायें ,उम्मीद करता हूँ उन्हें(कवियों को ) बुरा नहीं लगेगा -

(1) "जनता ने नेता से हाथ जोड़कर पुछा -
माई-बाप ,क्या आप भी यकीन करते हैं समाजवाद में?
नेता ने मुर्गे की टांग चबाते हुए कहा-
पहले हम समाज बाद में। "

(२)"एक अति आधुनिका
कम-से-कम वस्त्र पहनने की करती है अपील
और पक्ष में देती है ये दलील कि -
'नारी की इज्ज़त बचाने का यही है अस्त्र ,
तन पर धारो कम-से-कम वस्त्र।
फ़िर पास नहीं फटकेगा कोई पापी दुशासन जैसा
जब चीर ही ना होगा तन पर तब ,
चीरहरण का डर कैसा'।"

(3)देख सुंदरी षोडशी मन बगिये खिल जाए
मेंढक उछलें प्यार के ,जिया हिया हिल जाए
जिया हिया हिल जाए ,बिमारी है यह खोटी
रोटी भावे नहीं फड़कती बोटी-बोटी
पुष्ट पहलवां भी हो जाता ढीलम-ढीलू
चिल्लाये दिन-भर बेचारा -इलू .इलू.इलू। -(काका हाथरसी)

(४)एक डाकू ने एक लखपति की पत्नी का अपहरण किया
बदले में एक लाख की फिरौती हेतु पत्र लिखा ।
जवाब में लखपति ने डाकू को ख़त लिखा -
'श्रीमान ,आपका चरित्र हमें बहुत अच्छा दिखा।
अब मैं शीघ्र ही दूसरी शादी कर रहा हूँ
अतः कुछ दिनों बाद पुनः आईयेगा
यदि वो अच्छी लगे,तो प्लीज़ .....
उसे भी ले जाईयेगा।

.............ये कुछ जाने-अनजाने कवियों की रचनायें हैं जो कहीं मैंने सुनी कहीं पढ़ी है। मुझे अच्छी लगी अब आपके लिए पर इसमे मेरा योगदान आप सभी तक इसे पहुंचाना है बस। थोड़ा -सा आप भी मुस्कुरा ले और उन कवियों का लिखना सार्थक हो जायेगा।

9/23/08

ये हिंदू प्रेत्तात्मा है...जीसस से नही डरेगी.

पिछले दिनों यूनिवर्सिटी के पास ही फिल्मिस्तान सिनेमा हॉल में हाल ही में आई फ़िल्म"१९२०" देखने गया था। इस फ़िल्म को देखने के पीछे दो मोटिव थे,पहला तो ये कि,मुझे होरर(भुतिया)फिल्में पसंद हैं ,दूसरा ये कि ,इस फ़िल्म में पंडित जसराज ,परवीन सुल्ताना ,शुभा मुदगल जैसे आर्टिस्टों ने गीत गाया था। खैर, गीतों के साथ -साथ जिस तरह के माहौल को मैंने वहां देखा तो लगा कि सही में अपने यहाँ वाले दर्शक जैसे ही होंगे (श्याम चित्र मन्दिर टाइप)। अब बातें फ़िल्म की -दरअसल ये कहानी एक ऐसे जोड़े की है जो एक पुरानी हवेली में इस इरादे से आता है कि उसे तोड़ कर वहाँ एक होटल बनाया जा सके। हवेली अभिसप्त है ,भुतिया है। यहाँ आए पहले दो लोग संदिग्ध स्थितियों में मारे जा चुके हैं। ये जोड़ा (नायक-नायिका)इस बात से बेखबर है। वैसे एक ध्यान देने वाली बात ये है कि हीरो ,जो की हिंदू है एक अनाथ लड़की(हिरोइन) से अपने घर परिवार धार्मिक संस्कारों से टकराकर शादी करता है। लड़की चूँकि ईसाई है और उसकी परवरिश भी चर्च में हुई है तो उसकी निष्ठा अभी इश्वर में है।पर कहानी ये नहीं है । दरअसल हिरोइन उस प्रेत्तात्मा के जड़ में आ जाती है और उसके निदान हेतु वह पास के गावं में रह रहे पादरी से संपर्क करती है। पादरी हिरोइन की हवेली में आता है और अपने तंत्र -मंत्र (ईसाईयों के धर्मग्रन्थ बाईबल के अनुसार)से कुछ जुगत करता है जिससे कि हिरोइन का जीवन सही तरीके से चले मगर असली ट्विस्ट यहीं से शुरू होता है। फ़िल्म में एक से बढ़कर एक घटनाएं होने लगती हैं और दर्शकों को भूत के तरह-तरह के कारनामें देखने को मिलते हैं।

भूत पादरी के क्रास को उल्टा कर देता है ,पादरी उसे एक बार ठीक करता है मगर व्यर्थ क्रास फ़िर उलट जाता है। अब सिनेमा हाल में मुझे एक नए किस्म का कम्मेंट सुनने को मिला-"ये हिंदू भूत है फादर से नही भागेगा " या "फादर की फट गई "जैसे कुछ अन्य विशेष शब्द भी। मैं ही नहीं मेरे साथ के सभी लोग चौंके ,कि ये क्या कहा उसने?मगर परदे पर घट रहा हर दृश्य यही दिखा रहा था लोग-बाग़ भी उसे इसी चश्मे से देख रहे थे। अब फ़िल्म देखने का जोश ही ठंडा पड़ गया। हिंदू भूत दर्शकों को ज्यादा फैमिलिअर लगने लगा था ,ये भूत भी हीरो का कुछ नहीं कर रहा था बल्कि हिरोइन का ही बुरा कर रहा था (हिरोइन का नाम फ़िल्म में लिजा है)।फ़िल्म के अन्तिम दृश्य में हीरो ही आख़िर में इस हिंदू भूत से पार पाता है।इस अन्तिम दृश्य में पादरी हार चुका होता है और हीरो अपनी नायिका को बचाने के लिए "हनुमान चालीसा" का पाठ करता है और भूत भाग जाता है। दर्शकों में से फ़िर आवाज़ उठी कि 'देखा...था ना हिंदू भूत ,"साथ ही 'जय श्रीराम 'का नारा भी गूँज गया ।

मैंने सोचा 'यह भी खूब रहा ,आया सिनेमा देखने और दिख गई वर्तमान राजनीति की झलक।'-आज के अखबार में भी २ ईसाइयों के मार दिए जाने की ख़बर है(देहरादून में)। इससे पहले उडीसा ,कर्नाटक और मध्यप्रदेश की घटनाओं को बीते अभी ज्यादा दिन नहीं हुए(पता नहीं ये बीती घटनाएं हैं या फ़िर तूफ़ान के पहले की खामोशी है)। क्या वाकई जीसस से ये भूत नहीं जाएगा ?शयद नहीं ही क्योंकि उस महान आत्मा ने चीख कर कारण बता ही दिया था कि ये प्रेत्तात्मा तो हिंदू है तो इसका इलाज़ जीसस के पास नहीं है जीसस तो इससे तो हारेगा ही। क्या हनुमान चालीसा ही इसका उपाय है ?अगर हाँ..तो फ़िर क्या समझा जाए कि बजरंगी सेना यही कर रही है पर ईसाई भूतों (इंसानों )के साथ । जो भी हो निर्माता ,निर्देशकों ने सिनेमा में गलती से ही सही मगर अपना स्टैंड दिखाया है कि ये फ़िल्म सबके लिए नही है यही समझा जाए क्या या फ़िर उस सिरफिरे दर्शक की बेवकूफी समझ कर भूल जाया जाए?मैं तो सोच रहा हूँ कि अगर इस प्रेत्तात्मा ने गलती से मुझे पकड़ लिया तो मैं कैसे बचूंगा मुझे तो ये 'हनुमान चालीसा'भी नहीं आती।

9/20/08

श्याम चित्र मन्दिर (सिनेमा रोड)

घर से तक़रीबन १०-१२ साल हो गए हैं बाहर रहते मगर आज भी जब कभी वहां जाना होता है तो शहर के सिनेमा रोड पर पहुँचते ही दिल की धड़कने अचानक ही बढ़ जाती हैं।ये वह सड़क है जहाँ मैं और मेरे साथ के और कई लड़के बड़े हुए ,समय -असमय ये बाद की बात है। श्याम चित्र मन्दिर हमेशा से ही हम सभी के आकर्षण का केन्द्र बिन्दु रहा था,चाहे कोई भी फ़िल्म लगी हो श्याम चित्र मन्दिर जिंदाबाद। बगल में डी.ऐ.वी.हाई स्कूल है जहाँ से मैंने दसवीं पास की थी। स्कूल में हमेशा ही विज्ञान और मैथ पहली पाली में पढाये जाते थे,मगर मैं ठहरा मूढ़ उस वक्त भी खाम-ख्याली में डूबा रहता था। कभी पास ही के रेलवे स्टेशन पर जाकर स्टीम इंजिन के गाड़ी पर लोगों के जत्थे को चढ़ते उतरते देखता ,तो कभी स्टेशन के पटरी के उस पार के जलेबी के पेडों से जलेबियाँ तोड़ना यही लगभग पहले हाफ का काम था । इस बीच महेश ने मुझे श्याम चित्र मन्दिर का रास्ता सूझा दिया ,फ़िल्म थी -अग्निपथ। भाईसाब तब अमिताभ का नशा जितना मत्थे पे सवार था उतना तो शायद अब किसी और के लिए कभी नहीं होगा। अमिताभ जी की इस फ़िल्म ने पूरी दिनचर्या ही बदल दी। अब शुरू हो गया श्याम सिनेमा के बाबु क्लास (माने २ रूपया वाला दर्जा जो बिल्कुल ही परदे के पास होता था )में ३ घंटे बैठ कर गर्दन को उचका कर फ़िल्म देखना जिसमे हीरो के सुखो-दुखों में हम उसके साथ-साथ होते थे। कई बार तो हीरो और उसके ग़मों का इतना गहरा प्रभाव होता था की आंखों के किनारे सबसे बचा कर पोंछ लेना पड़ता था ताकि अगले दिन महेश मजाक ना बनाये -"ससुर तू उ नाही ....लड़की कही का रोअनिया स्साले ...फिलिम देख के रोता है हीहीही "।

श्याम चित्र मन्दिर माने हमारा दूसरा स्कूल ।यहाँ हमने रिश्ते जाने ,प्यार सीखा ,दुश्मनी सीखी, दोस्ती सीखा,बवाल काटना सीखा ......मतलब की अब हमारी दैनिक रूटीन में कुछेक संवाद आ गए the मसलन -"रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं...,जानी जिनके खुदके घर शीशे के हो वो..,अब तेरा क्या होगा..,इत्यादि। ये वो समय था जब अमिताभ जैसों का जादू ख़त्म हो चला था और नए चेहरे फिल्ड में आ गए थे। फ़िर भी हमारे इस सिनेमा घर में पुरानी फिल्में ही अधिकाँश लगती थी आज भी अभी नई फिल्में वहां जल्दी नहीं पहुँचती । "सत्या"ने पूरे भारत में धूम मचाई थी मगर श्याम सिनेमा में दूसरे दिन ही उतर गई थी। गंगा भगत ,जो बाबु क्लास के गेटकीपर थे ने उस रोज़ उदास होकर बताया था कि'अरे बाबु पता न कईसन फिलिम बा की सब कौनो अन्तिम में मरिये जातारे सन । अब तू ही बतावा अईसन फिलिम के देख के आपन पीसा बरबाद करी?"(पता नहीं कैसी फ़िल्म है जिसमे सब मर ही जाते हैं ,अब तुम ही बताओ ऐसी फ़िल्म देख कर कौन अपना पैसा बरबाद करेगा)।- गेटकीपर तक से अपना याराना हो गया था। एक और ख़ास बात इस चित्र मन्दिर की थी कि जब कभी हमारे पास हॉल में भीड़ की वजह और उस भीड़ में हमारे साइज़ की वजह से टिकट नहीं मिल पाता तब हम डाईरेक्ट गेटकीपर को ही पईसा देकर अपनी सीट पकड़ लेते थे। सीट मिलते ही विजेता की तरह आगे पीछे देखकर अपनी सेटिंग पर मन-ही-मन प्रफुल्लित होते रहते थे। "लिप्टन चाय'और 'पनामा सिगरेट' के विज्ञापन आते ही सभी दर्शक खामोश हो जाते और जैसे ही फ़िल्म शुरू होने के पहले बैनर पर किसी देवी-देवता की मूरत आती कुछ जोश में ताली बजाते,कुछ सीटी या फ़िर कुछ भक्त स्टुडेंट नमस्ते कर लेते..जय हो थावे भवानी की जय। मेरी परेशानी थोड़े दुसरे किस्म की थी जैसे फ़िल्म शुरू होने पर मैं पहले ये देखता था कि कितने रील की है(१५-१६ रील का होने पर कोफ्त भी होती थी कि ढाई घंटे का ही है बस...वैसे पोस्टर पढने का भी बड़ा शौकीन था और इसी शौक में काफ़ी समय तक फ़िल्म में "अभिनीत"नाम के एक्टर को ढूंढता रहा था कि आख़िर ये कौन अभिनीत नाम का एक्टर है जिसका नाम सभी फिल्मों की पोस्टरों पर होता है मगर मुझे ही नहीं दीखता ,पहचान में आता । वैसे थोड़े ऊँचे क्लास में पहुँचने पर जान गया "अभिनीत" का राज।

लगाना जुगाड़ पैसों का । रोज़-रोज़ फ़िल्म देखना सम्भव नहीं था ,मगर श्याम चित्र मन्दिर वाले शायद हमारी इस दिक्कत को समझते थे । यहाँ आज भी कोई फ़िल्म शुक्रवार की मोहताज़ नहीं होती ,जब तक चली चलाया नहीं चली अगले कोई दूसरी लग गई। स्कूल में हमारे महेश भी बड़े फिलिम्बाज़ थे। एक दिन पैसों की दिक्कत का दुखडा हमने रोकर कहा -'यार बाबूजी रोज़-रोज़ पैसा देते नहीं हैं इसलिए मैं फिलिम देखने नहीं जाऊंगा तू चला जा'। बस फ़िर क्या था महेश ने टीम लीडर होने का पूरा फ़र्ज़ निभाया ,उसने एक ऐसी तरकीब हमें सुझाई जिससे आगे हमें कभी पैसों की दिक्कत नहीं हुई। अब हम महेश के प्लान के अकोर्डिंग सायकिल से आने वाले छात्रों के सीट कवर ,घंटी (घंटियाँ पीतल की होती थी और स्कूल के बाहर बैठने वाला मिस्त्री हमें प्रति घंटी २ रूपया भुगतान करता था,सीट कवर ४ से ५ रूपया में बिक जाता था.)निकालने लगे और पकड़े जाने पर दादागिरी जिंदाबाद क्योंकि महेश स्कूल में अपने कमर में कभी सायकिल की चेन तो कभी छोटा चाकू ले आता था जिससे हम उसकी बहादुरी के कायल थे। अगर कभी किसी एक के पास पैसा नहीं जुगाड़ हो पाता तो गेटकीपर गंगा भगत की जेब से २-३ दिनों में या अगली फ़िल्म में दे देने के शर्त पर ले लिया जाता । श्याम चित्र मन्दिर कितना अपना था।

"लार्ज़र देन लाईफ" के मायने और श्याम सिनेमा का परदा (सिल्वर स्क्रीन)। चूँकि हम तो बाबु क्लास के दर्जे वाले दर्शक थे इसलिए बैठते हमेशा सबसे आगे ही थे।मानो सिनेमा का पहला मज़ा हम लेते थे फ़िर हमसे पास होकर पीछे वालों को जाता था। हम सभी उन दिनों में पता नहीं किस साइज़ के थे कि परदा काफ़ी विशाल लगता था । परदे पर जैसे ही किसी जीप या अन्य किसी दृश्य जिसमे भगदड़ का सीन आता तो ऐसा लगता मानो वह जीप या भीड़ हमी पर चढ़ गई और हम सभी थोडी देर को ख़ुद को पीछे सीट पर धकेल लेते और बाद में राहत-सा अनुभव करते। फ़िल्म के सारे क्रियाव्यापार इतने बड़े से लगते की पूछिए मत । और परदे के दोनों तरफ़ बने दो फन निकले नाग ऐसा प्रतीत कराते जैसे वे ही इस विशाल परदे की रक्षा कर रहे हैं। काफ़ी समय तक ये मेरे मन में परदे के रक्षक नाग छाये रहे थे।बाद के समय में जब सिनेमा पर मैंने पढ़ना शुरू किया और 'लार्ज़र देन लाइफ ' वर्ड पढ़ा तो श्याम चित्र मन्दिर का विशाल परदा और उसपर घटते बड़े-बड़े क्रियाव्यापार ही आंखों के आगे घूम गए।

अपना ख़ुद का कूलर हॉल में । श्याम चित्र मन्दिर के बाबु क्लास में ना केवल हम जैसे भारत के भविष्य बल्कि रिक्शा वाले ,मजदूर किस्म के लोग भी आते थे। अब चूँकि छोटे शहर का हाल था और लोग भी वही के तो झिझक ना के बराबर थी। फ़िल्म शुरू होते ही सब अपना अपना गमछा उतार कर सीट पर दोनों पाँव रख कर फ़िल्म में डूब जाते थे। इधर शरीर से पसीना बहता था उधर सीन तेज़ी से बदलता था और हाथों में पकड़ा हुआ गमछा भी उतनी ही शिद्दत से घूमता रहता था। बाद में थोड़े झिझक के बाद हम भी इसी जमात के हो लिए। ऐसे वातानुकूलन मशीन कि क्या आज जरुरत नही है?ये विशुद्ध हमारा कूलर था।

..............अगली post में जारी

9/17/08

.......इस कारण ये नाचे गदहा.

एक बार की बात है,बादशाह अकबर और बीरबल शाम को टहलने निकले । टहलते-टहलते वे दोनों बाज़ार में पहुंचे;बाज़ार का दृश्य अजीबोगरीब था। एक गदहा बीच बाज़ार में उधम मचाये हुए था,दुलत्तियाँ मार रहा था ,ढेंचू-ढेंचू चिल्ला रहा था सभी व्यापारियों ,ग्राहकों,आने-जाने वालों की जान आफत में थी कि पता नहीं गधा कब,किसे दुलत्ती मार दे। ये दृश्य देखकर बादशाह ने बीरबल से पुछा -'बीरबल,किस कारण ये नाचे गदहा ?'-बीरबल ने पहले गदहे को फ़िर उसकी कारस्तानी को बड़े गौर से देखा और मुस्कुराकर बोले-'जहाँपनाह ,आगे नाथ ना पीछे पगहा (रस्सी)इस कारण ये नाचे गदहा । '-बादशाह ने स्थिति कीअसलियत जान ली और तुंरत ही सिपाहियों को हुक्म दिया किगदहे के गले में पगहा डालकर काबू करो और अभी कांजी हाउस दे आओ। आदेश पर तुंरत ही अमल हुआ और गदहा थोडी ही देर में सीखचों के पीछे चुपचाप खड़ा पत्ते चबा रहा था ।
ये थी तब की बात जब समाज सामंती सेट -अप में था। मगर अबकी स्थिति कहीं बेहतर है(ऐसा माना जाता है....) क्योंकि अब डेमोक्रेसी है ,यानी आम जनता का तंत्र ..प्रजातंत्र। तब सिर्फ़ सत्ता-प्रतिष्ठान के लोगों को ही सब कुछ करने का हक था मगर प्रजातंत्र में ऐसा नही है। यहाँ आम-ओ-ख़ास सभी को सब कुछ अपनी मनमर्जी का करने का हक है,साफ़ कहें तो "घोडे और घास को एक जैसी छूट है"। अब कोई लगाम किसी पर कुछ ख़ास प्रभावी नही है। कम-से-कम अपने राज भइया वाले मामले में तो ऐसा ही लग रह है। हालांकि इस सिस्टम में हमारे सामने 'अयोध्या ,गोधरा, कंधमाल जैसे कुछेक और उदाहरण भी हैं। बहरहाल, मनसे वाले राज भाऊ भी अकबरी-समय के उसी बाज़ार (जो अब दूसरे रूप में हैं )में खड़े होकर अपना नाच दिखा रहे हैं। और तुर्रा ये कि उनके गले में भी कोई नाथ-पगहा नहीं है। अब चूँकि प्रजातंत्र है (?) तो ये ....भी खुलेआम नाच रहा है,दुलत्तियाँ मार रहा हैऔर अपना धेंचुपना भी खूब मचा रहा है। पर सनद रहे ये ...कांजी हाउस जाने वाला नहीं है और ये चुपचाप पत्ते भी नहीं चबायेगा । या फ़िर ये भी कि ये कांजी हाउस जायेगा ही क्यों यहाँ किसीकी बादशाहत तो है नही कि एक आदमी जो कहेगा वही सब मानेंगे ,प्रजातंत्र है यहाँ सबके अपने-अपने (बड़े नहीं तो छोटे-छोटे ही सही) अपने हित हैं। तो यहाँ जिसका मुंह जिधर हो जाएगा ,वो उधर चला जाएगा,जो जैसा जानता है वही राग गायेगा। पर यह थीयरी भी केवल चुनिन्दा प्रदेश विशेष के लोगों और उनके बिगडैल नेताओं पर लागू होती है। और ये महानुभाव अपनी दूकान के लिए सबसे पहले उनलोगों को अपना निशाना बनाते हैं जो मजदूर,दूकानदार(छोटे)वगैरह हैं। मनसे के ...की जड़ में ये छोटे किस्म वाले जीव ही ज्यादा थे मगर अब इनका खेल, अपनी पिछली करामात की सफलता से उत्साहित होकर,कुछ दूसरे लेवल का हो चला है। अब यहाँ बड़े नाम हैं (बच्चन परिवार और शाहरुख़ खान दिल्ली वाला)जिनको अपना निशाना बनाते ही इनकी टी आर पी एकदम से टॉप पर पहुँच गई है।
कहने को तो यहाँ (प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में )हमारी सुरक्षा में पुलिस जैसी सुविधा भी प्रदान की गई है मगर इस...के आगे उसकी भी कोई अहमियत(सही कहें तो..डर)नहीं है। अब तक आम पब्लिक को यही पता था कि कोई उल्टा-सीधा कुछ करे तो पुलिस का डंडा सब सही कर देता है मगर यहाँ तो सीन ही दूसरा था । राज भइया तो कुछ बेसिए बहादुर निकले उन्होंने कमिश्नरी हेकडी को यह कहते हुए ठंडा कर दिया कि'वर्दी utaar के सड़क पर आ जाओ ,बता दिया जाएगा कि मुंबई किसके बाप की है''। -रही सही kasar grihmantri जी ने पूरी कर दी की डंडा काबू में rakho नहीं तो jhande में lagaa दिया जाएगा। एकदम अपने बच्चन जी वाली इस्टाईल में (है ना?)। यानी मुंबई किसकी जो वहाँ रहे उसकी का सिद्धांत यहाँ नही है बल्कि जो मराठी उसकी वाला । इंडियन होने का कोई मतलब नही ,विशुद्ध आमचा महाराष्ट्र ,मराठी माणूस (ये एक अलग देश है इसका संविधान अलग है इसकी अपनी सरकार(राज)है अपनी सेना (नवनिर्माण)है और इसके राष्ट्रपिता ठाकरे सीनियर हैं,क्योंकि आज जिस इमारत पर खड़ा होकर राज साहब चिल्ला रहे हैं उसकी नींव उन्ही के ताऊ जी ने डाली थी)। राज साहब अपने विरासत में मिली परम्परा को ही ढो रहे हैं। अमिताभ ,शाहरुख़ जिसे लोग उनके सॉफ्ट टारगेट हैं और इनपर अटैक का मतलब ज्यादा से ज्यादा पब्लिक अत्ट्रेक्सन मिलना ।वैसे दोष पूरी तरह से मनसे वाले भाऊ का भी नही है बल्कि इसमे मुंबई में उपलब्ध उन बुनियादी सुविधाओं का भी दोष है जिनके लालच में उतर भारतीय उधर पहुंचे हुए हैं और सफल हो गए हैं (अब मुंबई वाले बन ही गए थे कि....)।
एक बात और इस अभियान की जड़ में है वो ये कि राज ठाकरे के चेले(गुंडे) अब उन सारी जगहों से चंदा(हफ्ता)पा रहे हैं(वसूल रहे हैं )जहाँ से कभी उनके ताऊ जी की पार्टी वाले वसूला करते थे। मतलब एक पंथ दो काज। अपना जनाधार भी तैयार हो रहा है और पार्टी का पेट भी भर रहा है। चूँकि पहले ही कहा जा चुका है कि कोई भी इस....को बाँध नहीं सकता क्योंकि प्रजातंत्र में जो चीज़ आपको निर्णय लेने से रोकती है वो है वोट-बैंक । कांग्रेस हो या बीजेपी या फ़िर शिवसेना सभी जानते हैं कि अगर इस गदहे के पगहा लगाया तो अपना वोट बैंक गडबडा जाएगा । बस करने दो जो कुछ कर रहा है अपने आप ही थोड़े दिनों में चुप बैठ जायेगा ( जब पेट भर जाएगा)। यानी इच्छाशक्ति के अभाव के साथ-साथ अपने फायदे की बात अधिक जरुरी है। प्रजातंत्र ऐसा तमाशा है ....लिखने वाले अपने धूमिल को भी कोई ठाकरे एंड कम्पनी वाला दिखा था क्या?
वैसे देश की सबसे पावरफुल महिला ने थोडी मरहम पट्टी के आसार दिखाए हैं मगर सोचिये उस प्रदेश में, इस देश में (अगर महाराष्ट्र इसी देश का हिस्सा है तब)उनकी ख़ुद की सरकार है तब उनके निर्णय लेने की दिक्कतें भी क्या वाकई वोट बैंक के कारण ऊहापोह की स्थिति पैदा कर रही हैं या फ़िर इसके पीछे का कोई दूसरा ही खेल है जो हमें नहीं दिख रहा। बहरहाल, इस जवान मोटे गदहे का धेंचुपना कब तक जारी रहेगा ,कब तक ये अपनी दुलत्तियाँ मारता रहेगा और कौन होगा जो इसकी नकेल कसेगा ये सारे प्रश्न ऐसे ही डस्ट-बीन में पड़े रहेंगे , गदहा नाचता रहेगा ।

9/12/08

एक थे भिखारी ठाकुर......शेषांश


गतांक से आगे....
........भिखारी ठाकुर का कमाल ही था कि एक ही व्यक्ति एक से अधिक रूपों में अपने को बदलता जाता ,भिन्न -भिन्न पात्रों के विभिन्न आचरण एवं उसके हाव-भाव को अपने में सहेजता रहता,उसी के अनुरूप अपने को ढालता जाता और दर्शकों को अपनी ही धारा में बहाए लिए चलता । उनकी अभिव्यक्ति का स्वर इतना सटीक,सरल,सहज और स्वाभाविक होता कि दर्शक भावविभोर हो जाते। प्रसाधन एवं रूप परिवर्तन का कार्य दर्शकों की थोडी-सी आँख बचा के कर लिया जाता। भिखारी ठाकुर ने अपने ज़माने में 'बिदेसिया'को बिहार,झारखण्ड,बंगाल और पूर्वी उत्तरप्रदेश एवम असाम के लोगों के जेहन में उतार दिया था। असाम में जब 'बिदेसिया' का मंचन हुआ था ,तब वहाँ के सिनेमा घरों में ताला लगने की नौबत आ गई थी। 'बिदेसिया'का मूल टोन यही है कि किस तरह से एक भोजपुरिया युवक कमाने पूरब की ओर जाता है और किसी और औरत के फेर में फंस जाता है। इस नाटक या तमाशे की ख़ास बात ये है कि ये भी परंपरागत नाटकों की तरह सुखांत है। इस नाटक के बारे में जी.बी.पन्त संस्थान के 'बिदेसिया प्रोजेक्ट'का रिमार्क है-
"bidesia is a phrase designations both the people left their country and didn't return and the tradition of performing arts rooted in this migration"

http://www.indianetzone.com/ पर भिखारी ठाकुर के सर्वाधिक चर्चित तमाशा/नाटक 'बिदेसिया'पर टिपण्णी भिखारी ठाकुर के रंगकर्म और उनके इस महान कृति की खासियत को उजागर करती है -
"in olden days,bidesia was famous as it gave voice to many social concerned topics like the cause of poor labourers and tried to create awareness about the poor status of women in the bhojpuri society.casteism and communalism are also handled with due care in the same cultural tunes.sometimes,the tone of bidesia is sarcastic in nature......."

बहरहाल ,इतना जानने के बाद भिखारी ठाकुर के ऊपर भी एक नज़र डालना जरुरी हो जाता है।भिखारी ठाकुर (१८८७-१९७१)भोजपुरी समाज,साहित्य और संस्कृति के संवाहक थे। उनकी रचनाओं में भोजपुरिया संस्कृति की ओरिजनल खुशबू समाई हुई है। उत्तर-भारतीय समाज में व्याप्त विधवा -विवाह ,बेमेल-विवाह,जाती-प्रथा,नशाखोरी एवं विषमता आदि पर आधारित उनके लोक-नाटकों ने जनता का मनोरंजन तो किया ही ,प्रबोधन भी कम नही किया । ऐसे नाटकों में वे भारतेंदु जैसे समर्थ नाटककार तथा नवजागरण के पुरोधा के रूप में दिखाई देते हैं। आख़िर दोनों ही स्वयं नाटक रचते और खेलते थे। निश्चित रूप से सामाजिक बदलाव की ज्वाला दोनों में समान रूप से जल रही थी।
भिखारी ठाकुर का रचना -संसार १९१९-१९६५ के बीच का है। भोजपुरी का ये समर्थ लोक -कलाकार ,जो जाति से नाईऔर नवजागरण के संदेशवाहक ,नारी-विमर्श और दलित-विमर्श के व्याख्याता ,लोकगीत,तथा भजन-कीर्तन के अनन्य साधक थे। प्रख्यात आलोचक और कवि केदारनाथ सिंह का कथन है कि -"वे(भिखारी ठाकुर सच्चे अर्थों में लोक-कलाकार थे,जो मौखिक परम्परा के भीतर से उभर कर आए थे ,पर इनके नाटक और गीत हमें लिखित रूप में उपलब्ध है। .....वे एक लोक-सजग कलाकार थे,इसलिए कोरा मनोरंजन उनका उद्देश्य नही था। उनकी हर कृति किसी-न-किसी सामाजिक विकृति या कुरीति पर चोट करती है और ऐसा करते हुए उसका सबसे धारदार हथियार होता है -व्यंग्य । (नई कविता के मंच पर भिखारी/दैनिक हिंदुस्तान :५ नवम्बर २००२ )
भिखारी ठाकुर ने अपने समाज और उसकी विविध सामाजिक ,आर्थिक एवं धार्मिक समस्याओं को उसकी बड़ी सूक्ष्मता से देखा था । साथ ही, उन्होंने दलितों की विभिन्न समस्याओं के विषय में दलितों के उत्थान के उद्देश्य से लोक-नाटकों ,लोक-गीतों की रचना ही नहीं की;बल्कि अभिनय करके ग्रामीण परिवेश में प्रस्तुत कर उनमें चेतना जगाई । साथ ही अगर हम स्त्रियों की बात करें तो पाते हैं कि भिखारी जी का नारी-विमर्श भारतीय परम्परा का रक्षक और आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी है। वे स्त्रियों को परिवार की धुरी मानते हैं और उन्हें ममतामयी,सदाचरण वाली ,उदार महिला के तौर पर देखते हैं।भिखारी ठाकुर स्वयंएक पिछडी जाति में (नाई)पैदा हुए थे। सामंती समाज -व्यवस्था में यह जाति तथाकथित बड़ी जातियों के बाल-दाढी काटती थी। अपने जीवन में भिखारी ठाकुर को इस व्यवस्था का दंश भोगना पड़ा था और उसके बड़े कटु अनुभव उनके पास थे। जब भिखारी ठाकुर ने अपनी सर्जना की,तो उनके समक्ष समाज का वही दलित ,अशिक्षित,और उपेक्षित वर्ग था। उनके नाटकों का मुख्य थीम दलितों ,स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को उजागर कर उनको जागरूक करना कि किस तरह से उनकी ज़िन्दगी बेहतर हो सकती है। यह इनके नाटकों का ही प्रभाव था कि बेटी बेचने की भर्त्सना हुई,विधवा-विवाह का जोर बढ़ा (खासतौर पर भोजपुर के क्षेत्र में........)। भिखारी ठाकुर ने स्टेज पर नवयुवक कलाकारों को नारी-वेश में नाटक के स्त्री-पात्रों की भूमिका अदा करने का सफल प्रयोग किया। ................

(अगली पोस्ट में पढिये भिखारी ठाकुर की कृतियों और उनके प्रकाशनों पर ,कंटेंट पर बहस...... । तब तक इजाज़त )

9/10/08

एक थे भिखारी ठाकुर.....

भोजपुरी अंचल के लोगों में भोजपुरी के शेक्स्पीअर भिखारी ठाकुर कितने भीतर तक पैठे हुए हैं,ये उन्ही लोगों से पूछिए। मेरा भिखारी ठाकुर के रंगकर्म पर इन्ही दिनों में काफी कुछ पढ़ना हुआ ,देखना भी हुआ। उनमे से आपके लिए भी कुछ ........ । ताकि आप भी जान पाये इस महान लोक-कलाकार को।



भिखारी ठाकुर बहुआयामी प्रतिभा के व्यक्ति थे। वे एक साथ ही कवि,गीतकार,नाटककार,नाट्य-निर्देशक,लोक-संगीतकार,और कुशल अभिनेता थे, यानी जैक ऑफ़ आल ट्रेड्स ।भिखारी ठाकुर ने जहाँ अपने से पूर्व से चली आ रही परम्परा को आत्मसात किया था,वही उन्होंने आवश्यकतानुसार उसमे संशोधन-परिवर्धन भी किया। वे स्वयं में एक व्यक्ति से बढ़कर एक सांस्कृतिक संस्था थे। रामलीला ,रासलीला ,जात्रा,भांड,नेटुआ,गोंड.आदि लोक-नाट्य-विधाएं भिखारी के प्रिया क्षेत्र थे। साथ ही,उन्होंने परम्परागत ,पारसी,एवं भारतेंदु के नाटकों से भी प्रभाव ग्रहण किया था। भिखारी ठाकुर ने पारंपरिक नाट्य-शैली से सूत्रधार ,मंगलाचरण तथा अन्य रुढियों को भी कुछ ढीले -ढाले ढंग से स्वीकार किया और विदूषक के बदले "लबार"जैसे पात्र को लोगों के मनोरंजन के लिए प्रस्तुत किया। मंचीय-व्यवस्था तथा साज-सज्जा सम्बन्धी नाट्य लेखकीय निर्देशों को मंचन -व्यवस्था की स्थानीय सुविधा पर छोड़कर भिखारी ठाकुर ने मुक्त-मंचन को प्रोत्साहित किया।

भिखारी ठाकुर ने समाज के उपेक्षित एवं दलित-शोषित वर्ग से कलावंत व्यक्तियों का चयन किया। विभिन्न नाटकों में सूत्रधार के विशिष्ट वेश-भूषा में तो भिखारी स्वयं आते थे,प्रवचन करते थे और भजन आदि प्रस्तुत कर वातावरण का निर्माण करते थे;किंतु विभिन्न नाटकों में वे अभिनेता के रूप में भी आते थे,जैसे -'गबर्घी चोर'में पञ्च,'बेटी वियोग'में पंडित,'राधेश्याम बहार'में बूढी सखी ,तथा 'कलयुगी प्रेम' में नशाखोर पति आदि। भिखारी ठाकुर ने अपने 'तमाशों '(लोक-नाटकों)के प्रस्तुतीकरण में भी नए-नए प्रयोग किए । भिखारी ठाकुर के नाटकों की प्रस्तुति के समय किसी खाली मैदान ,बगीचा या दालान के सामने शामियाना लग जाता था। कुछ समतल चौकियां आपस में सटा-सटाकर रख दी जाती थी और उस पर दरी और सफ़ेद चादर (सफेदा)बिछा दी जाती थी । मंच के पीछे कनात या सफेदा टांग दिया जाता था। मंच पर दांयी ओर वाद्य-वृन्द के साथ सभी वादक स्थान ग्रहण कर लेते थे। मंच के तीन ओर दूर-दूर तक दर्शक-श्रोता बैठ जाते थे। पेट्रोमेक्स,डे-लाइट जला कर स्थान-स्थान पर टांग दिए जाते थे और तब लोक कलाकार भिखारी ठाकुर सूत्रधार की भूमिका में मंच पर पधारते थे। यह खुला मंच प्रयोग भिखारी ठाकुर ने संभवतः विश्व में पहली बार किया था। साथ-ही-साथ,नाटक के प्रस्तुतीकरण के क्रम में जब-तब दर्शकों से अभिनेताओं का सामयिक,प्रासंगिक एवं विनोदात्मक संवाद भी होता रहता था,जो नाट्य-प्रस्तुति में दर्शकों की सार्थक एवं सक्रिय भागीदारी का विरल उदाहरण प्रस्तुत करता था।
एक तो यों ही लोकनाट्य में रंगमंच ,प्रसाधन,बैक -ग्राउंडसिन-सीनरी,ग्रीन रूम आदि आग्रही नहीं रहते लेकिन भिखारी ठाकुर इससे भी दो कदम आगे थे। एक अलग टेंट की व्यवस्था हुई तो ठीक नहीं तो मंच के एक कोने में कोई कपड़ा तान लिया ,प्रसाधन परिवर्तन कर लिया गया,मेक-अप हो गया,प्रशिक्षण भी दे दिया गया,मंचन के दौरान प्रयोग में आने वाले साज-समान की व्यवस्था भी कर ली गई,निर्देशन भी चलता रहा ,पात्रानुकूल अभिनय भी होता रहा ,संगीत की रसभरी गगरी भी छलकती रही और मन भी बोझिल नही हुआ कि'लबार'(विदूषक)टपक पड़ा और ठहाकों का समंदर लहरा दिया।
(सहायक सन्दर्भ:-बिदेसिया.कॉम,भिखारी ठाकुर रचनावली आदि)

अगली पोस्ट में पढिये भिखारी ठाकुर के रंगकर्म का एक और पहलू...तब तक मुसाफिर को इजाज़त दीजिये.....

9/6/08

चलो हिन्दी मर्सिया पखवाडा मनाएं....

कुछ समय पहले दूरदर्शन के राष्ट्रीय समाचार के प्रसारण के एन पहले नेताजी सुभाषचंद्र बोस का कथन हिन्दी के सन्दर्भ में दिखाया जाता था-"देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाने वाली हिन्दी ही राष्ट्र-भाषा की उत्तराधिकारी है। "-मैं नही जानता के अब भी ये दिखाया जाता है या नही। खैर ,अपने बचपन के दिनों में जब मैं नानी या माँ के साथ जब भी सफर करता था खासतौर पर ट्रेनों में ,तब पूर्वांचल के स्टेशनों पर( चाहे वो बनारस डिविजन के हो या गोरखपुर या फ़िर सोनपुर डिविजन के)हिन्दी को प्रमोट करते ऐसे कई स्लोगन मैंने देखे हैं। आज भी इस क्षेत्र के छोटे -बड़े सभी स्टेशनों पर ये स्लोगन दिख जायेंगे। उन दिनों में इन स्लोगनों को देख कर अपनी बाल-सुलभ जिज्ञासा में नानी या माँ से पूछता था कि,हम जानते हैं कि हम हिन्दी बोलते-लिखते-पढ़ते हैं फ़िर भी इन सबकी क्या जरुरत है। माँ/नानी अपनी समझ में जितना बता सकती थी बता देती थी कि हिन्दी हमारी मदर लैंग्वेज है अतः उसकी ज्यादा से ज्यादा सेवा और प्रचार हेतु ये लिखा गया है और भी न-जाने क्या क्या। हालांकि मेरी जिज्ञासा तब भी वैसी ही रहती थी जैसी अब है कि क्या वाकई मात्र ये स्लोगन लिखने भर से ऐसी क्रान्ति आने वाली है कि हिन्दी ही हिन्दी बस कुछ नही और।

अपने स्कूल के दिनों में हिन्दी के पठन-पाठन और इसके प्रति प्रेम का जो नतीजा मेरी आंखों के सामने गुज़रा वो आज भी याद है। मेरी स्कूलिंग संत जोसफ से हुई है। वही के दो-एक घटनाओ ने फ़िर मेरे दिमागी फितूर को भड़काया । हुआ यूँ कि मेरे बचपन का क्लासमेट शरदेन्दु जो आजकल कम्प्यूटर इंजीनियर हो गया है,ने अपनी डेली बुक में अपने नाम की एंट्री हिन्दी में की । ये बात किसीने क्लास -इंचार्ज माईकल सर को बता दी फ़िर क्या था,शरदेन्दु को पूरे १/२ घंटे तक मुर्गा बनना पड़ा। ऊपर से हिन्दी में अपना काम नही करने की कसम खानी पड़ी सो अलग। दूसरा वाक्य मेरे ख़ुद से जुड़ा हुआ है। मैं २ या ३ दिन के गैप के बाद स्कूल गया था। मेरे स्कूल में एक नियम था कि जो भी स्टुडेंट अब्सेंट होने के बाद स्कूल में आएगा उसे घर से एप्लीकेसन लिखवा कर आना होता था और प्रिंसिपल ऑफिस से ओके करवाना होता था । हमारे प्रिंसिपल मि एम्.सी.मैथ्यू हुआ करते थे,वह ख़ुद सारे एप्लीकेसन चेक करते थे और अपने नियमानुसार दंड भी दिया करते या छोड़ देते थे। मेरी भी अर्जी भीतर गई और १० मिनट बाद बुलावा भी आ गया । धड़कते दिल से मैं अन्दर घुसा ,प्रिंसिपल ने दांत पीसते हुए पूछा -'एप्प्लिकेशन हिन्दी में लिखवाने को किसने बोला था?'-अब वैसे भी प्रिंसिपल का आतंक स्कूल में इतना था कि वैसे ही घिग्गी बंधी रहती थी,सो मैं भी ये नही कह पाया कि मेरी प्राईमरी स्कूल की टीचर माँ को अंग्रेज़ी नही आती या फ़िर बाबूजी तो ऍप्लिकेशन भी नही लिख सकते। फ़िर क्या था कुछ नही बोल पाने को मेरा घुन्नापन समझा गया और जो कुछ प्रिंसिपल चैंबर में हुआ उसे याद नही करना चाहता । हां इतना याद है कि उतनी पिटाई देख मुझे दूसरे स्कूल डी .ऐ .वी में डाल दिया गया। जहाँ से मैंने अपनी बाकी स्कूली पढाई पूरी की।

बाद में जब मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिन्दी से ग्रेजुएशन करने की सोची तब सबसे ज्यादा चिंता मेरे माँ-बाबूजी को ही हुई कि इसके भविष्य का क्या होगा । खैर मेरा जो कुछ हुआ सो हुआ या होगा,मगर हिन्दी प्रेम और हिन्दी दुराग्रह का ऐसा दृश्य मैंने एक ही शहर या क्षेत्र में देखा था । दिल्ली में एक नया दृश्य मेरे सामने था । यहाँ जगह -जगह इन दिनों में (विशेषकर सितम्बर के महीने में ही )हर सरकारी कार्यालयों में १-१५ तक हिन्दी का पखवाडा मना रहे हैं।ये इस पुरे कर्मकांड के माध्यम से ये अपने हिन्दी प्रेम को दर्शाएंगे और दो-एक हिन्दी वालों के सेमीनार पेल देंगे और दो-एक को हिन्दी सम्मान दे देंगे। इस तरह से हिन्दी फ़िर एक साल के लिए इन दफ्तरों के दराज़ में बंद होकर गायब हो जायेगी और बाकी लोग अपनी साँस जो हिन्दी बोल देने से (इस पूरे हिन्दी वीक में )फूल गई थी,को कंट्रोल करेंगे ।सोचता हूँ कि क्या वाकई हिन्दी को इस तरह के आयोजनों की जरुरत है। या फ़िर ये कि मेरी माँ/या अब स्वर्गीय हो चुकी नानी कितना कम जानती थी कि 'हिन्दी हमारी अपनी ही ज़बान है।

अब ये लगता है कि ये हिन्दी को प्रमोट करने वाला खेल दरअसल हिन्दी का मर्सिया है । हम सभी को हिन्दी सप्ताह या पखवाडा ना मना कर हिन्दी का "मर्सिया पखवाडा "मनाना चाहिए"। व्रत लीजिये अब से ये हिन्दी का मर्सिया दिवस के नाम से मनाया जाए और कहा जाए ,बताया जाए कि कभी इस जगह हिन्दी नाम की एक ज़बान हुआ करती थी ,जो अब यही कहीं दफ़न है,और इस भाषा के सम्मान में हम सभी हर जगह हर वर्ष इसका मर्सिया पढ़ते हैं।

9/5/08

आओ छात्रों अपनी सभी समझ पर धूल डालें ....

आज फाईनली वह दिन आ ही गया ,जब हमारे सुंदर-सुदर्शन चेहरों को चुना जाना है। अभी-अभी रामजस कॉलेज और ला-फैकल्टी से घूम कर आया हूँ,वैसे आज के दिन यूनिवर्सिटी का मजेदार चेहरा दिख जाता है(मैं ये नही कह रहा कि बाकी दिन यहाँ मुर्दनी छाई रहती है,मगर आज तो कमाल का दिन होता है)। रामजस के आगे तो ख़ास इन्तेजामात हो रखे हैं। बाहर पुलिस वालों की पूरी टुकडी खड़ी है और ला- फैकल्टी में भी। ये दिल्ली यूनिवर्सिटी का स्टुडेंट इलेक्शन है।यहाँ अभी भी जाट-बिहारी या दिल्ली वाले वर्सेस बाहरी का ही मुद्दा छाया हुआ है।कल मेरा एक दोस्त मिला जो,.....फैकल्टी में प्रेज़...पोस्ट पर फाइट कर रहा है। छूटतेही उसने ये बात मेरे कानों में डाल दी कि-'भाई बात इज्ज़त की हो गई थी। 'और धीरे-से फुसफुसाते हुए बोला -'कुछ करो तुम भी ...अगेंस्ट में एक जाट और एक .....की लड़की है खड़ी है,और जानते हो भाई अपना भाई लोग जो पिछले साल तक अपने साथ था ,इस बार उस लौंडिया को घुमा रहा है लोग।'-फ़िर थोड़ा तैस में आकर बोले-'एक बार ई इलेक्शनवा बीतने दो भईवा,फ़िर बतियाते हैं ई......लोग से "। मैं हंस कर उसे दिलासा देकर आ गया रामजस में भी कुछ ऐसा ही नज़ारा होता था,आज भी है।इस लिस्ट में किरोडीमल ,हिंदू,हंसराज भी अछूते नही हैं। हॉस्टल से लेकर कॉलेज तक कॉलेज से लेकर प्रशासन तक यही तमाशा हर ओर है।अब जो भी जीतेगा वो क्लास टाइम में ढोल नगाडों के साथ यूनिवर्सिटी कैम्पस और कॉलेज कैम्पस में अपने चेले-चाटुकारों के साथ हम सभी को उस जैसे...को चुनने के लिए अपने तरीके से धन्यवाद करेगा(हाँ...लडकियां उस दिन अत्यधिक सतर्क रहेंगी,आमतौर पर रहती ही है,मगर उस दिन ज्यादा केयर करना होगा आख़िर सेफ कैम्पस का दंभ भरने वाले अपनी टीम के साथ अब छुटभैयों की तरह यही आस-पास मंडराते रहेंगे)।

धीरे -धीरे समय बीत जायेगा और हम भूल जायेंगे इलेक्शन कब,क्यों,किन मुद्दों पे लड़ा गया था। कल शाम काफ़ी देर तक अपने आईसा वाले दोस्त अर्णव के साथ फैकल्टी में बैठा था,वह अपनी आवाज़ लगभग बैठा चुका है नारे लगा लगा के। कल उत्साहित होकर बोल रहा था कि 'आज हमने करीब-करीब १०० छात्रों की भीड़ अपने साथ जमा कर ली पूरे दिन भर।मुझे थोडी तरसआई मुद्दे आधारित इलेक्शन लड़ने वालों पर। दिल्ली यूनिवर्सिटी के इस इलेक्शन में पूरे देश की चुनावी तस्वीर साफ़-साफ़ दिख जाती है कि किस तरह से हमारे प्रजातांत्रिक देश का चुनाव लड़ा जाता है। यहाँ भी वो सारे स्टफआपको मिल जायेंगे,मसलन क्षेत्रवाद,जातिवाद(इसमे भी कई खुरपेंच है,जैसे दलित में भी बड़ा -छोटा,जनरल में भी ब्राह्मण ,राजपूत,भूमिहार ,सरदार अन्य)मनी पावर,मसल पावर इत्यादि का छुट्टा इस्तेमाल होता है।बाबालोगों को बुलाया जाता है,पार्टी दी जाती है,सिनेमा की टिकटें बांटी जाती हैं ,पैसे और शराब तो खैर दुनिया कि नज़रों से छुपा नही है। पूरा खेल/प्रपंच संसद के ५ सालों के कार्य- काल के लिए नही बल्कि एक एजुकेशनल संस्थान के एक साल के यूनियन के लिए किया जाता है। .....तमाशा जारी है ,मदारी डुगडुगी बजा रहा है,भालू नाच रहे हैं और पुलिस उनकी रखवाली में खड़ी है। और मुझे धूमिल लगभग चीखते हुए कैम्पस की सड़कों पर भागता दिख रहा है-

"हमारे यहाँ जनतंत्र एक ऐसा तमाशा है,
जिसकी जान मदारी की भाषा है"

चलिए आइये , आज तक हमने जो कुछ भी पढ़ा-लिखा है, आज इस टीचर्स डे पर उन सब भर एक-एक मुट्ठी धूल डाल दे

9/4/08

भिखारी ठाकुर के बहाने.....


सांस्कृतिक जीवन में जितना प्रभावित मुझे भिखारी ठाकुर ने किया है,उतना शायद ही किसी और ने। बाद के समय में हबीब साहब के रंग-प्रयोग ने बड़ा प्रभावित किया मगर भिखारी तो बस भिखारी ही थे। लगभग एक साल बाद घर जाने पर गावं की एक शादी में जाने का मौका मिला । जैसा कि मेरे यहाँके अधिकांश घरों के ऐसे आयोजनों में होता रहा है ,यहाँ भी एक आर्केस्ट्रा पार्टी बुलाई गई थी। वैसे इस आर्केस्ट्रा कल्चर ने हमारे समाज में ऐसी पैठ बनाई है कि लगता है कि जिनके यहाँ शादियों में ये नही आया उसने शादी के नाम पर सिर्फ़ अपने माथे की बोझ हटाई है। खैर ,मेरे प्राईमरी स्कूल वाले हेडमास्टर साहेब जो अब फ्रेंडली हो गए हैं,-"कहने लगे जानते हो, ई आर्केस्टा की बाई जी लोग इतना माहौल ख़राब कि है सब कि जहाँ ई सबका पोर्ग्राम हुआ की उहे मार हो जाता है,आ लड़का लोग के आँख का पानी मु (मर)गया है। लाज -शर्म सब घोर के पी गया है। "-मैं सोचने लगा ये तो गुरूजी ने अजीब ही बात बताई , चूँकि मैं लोक रंग से बड़ा प्रभावित रहा हूँ ,सो मैंने कहा -"गुरूजी आपके टाइम में भिखारी ठाकुर भी तो अइसने लौंडा नाच करवाते रहते थे,तब क्या ऐसा नही होता था?"-गुरूजी चिढ कर बोले-"दिल्ली में पढ़ते हो आ बुडबक वाला बात करते हो .भिखारी ठाकुर को खाली लौंडे नाच तक की जानकारी है तुम्हे?बेवकूफी वाला बात करते हो। ये सब जो नौटंकी है ई सब हमारा नेता लोग का फैलाया हुआ है कि भिखारी ठाकुर लौंडा नाच करता था। जबकि सही मायनो में ऐसा नही है। "-गुरूजी काफ़ी समय बाद फॉर्म में दिखाई दिए थे,सो मैंने सोचा कि थोड़ा और कुरेदने पर गुरूजी कुछ और बातें निकाले। बाद में लगभग एक हफ्ते के प्रवास में गुरूजी से बातचीत में काफ़ी कुछ जानने को मिला। मसलन कि एक बार भिखारी ठाकुर ने 'बिदेसिया' का मंचन असम में किया तो ऐसी धूम मची कि सिनेमा -घरों में ताला पड़ने की नौबत आ गई थी। अपने जमाने में भिखारी ठाकुर ने 'बिदेसिया'को न केवल बिहार बल्कि झारखण्ड के क्षेत्रों ,बंगाल ,पूर्वी उत्तर प्रदेश व असम तथा नेपाल के काफ़ी हिस्सों में पोपुलर कर दिया था। बिल्कुल भोजपुरी भाषा के नवजागरण के संवाहक के तौर पर। भिखारी ठाकुर ने ना सिर्फ़ नाटक लिखे बल्कि ख़ुद उनमे पार्ट भी खेला। आख़िर उन्हें बिहार का भारतेंदु यूँ ही नही कहा जाता । ऐसे समय में जब भोजपुरी लोक-संगीत की पहचान कूड़े वाली बनी हुई है ,भिखारी की याद आना स्वाभाविक है। भिखारी के नाटक गबर्घि चोर,बेटी बेचवा,बिदेसिया आदि के लोकगीतों को याद करना चाहिए जहाँ भोजपुरी संस्कृति की पूरी-पूरी झलक मिल जाती है। गौर फरमाइए-'रेलिया बईरिन पिया के लिए जाए रे'या फ़िर 'रूपिया गिनाई लेल अ,'-जैसे गीत अभी भी बिदेसिया को सामने खड़ा कर देते हैं। लबार(विदूषक) की हरकतें भी कमाल की थी। गुरूजी का चेहरा लबार को याद करते ही खिल उठा था। भिखारी महज़ इसी मायने में बड़े नही हो जाते बल्कि बाहर के देशों में गन्ने के खेतों में काम करने के लिए ले जाए जाने वाले 'गिरमिटिया'मजदूरों के दर्द की पहचान का सुर भी अपने गानों में देते थे। बद्री नारायण तिवारी का तो बहुत ही बढ़िया काम है भिखारी के इस तमाशे पर,कभी पढिये-"bidesia :migration ,change,and folk culture....कभी इसे भी पढिये सच कहता हूँ बिदेसिया और अपना लगेगा बाकी उसका अपना रंग-जगत चमत्कृत तो किए हुए ही है।
बाकी फ़िर कभी तब तक मुसाफिर चला....

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...