8/30/08

हिन्दी हैं हम...... (नही वतन के)एक विमर्श ऐसा भी.


साक्षी घर से बाहर दिल्ली पढने निकली मगर दुनिया ने उसे एक नया पाठ पढाया । वह दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिन्दी विभाग में शोध -छात्रा है। रिसर्चर एक बेहद ही बेचारा जीव होता है,जब तक कि उसका नेट या जे.आर.ऍफ़.नही हुआ। उसकी चिंता थोडी अलग किस्म की है। उसके बड़े भाई और एक अदद छोटी बहन हैं,जो दिल्ली के ही जे .एन.यु.में हिस्ट्री के स्टूडेंट्स हैं। पिछले दिनों उसका दौरा अपने भाई-बहन के हॉस्टल का हुआ । ना -ना ये मत समझिये की वो पहली बार वह गई थी। चूंकि साक्षी एक्टिविस्ट भी है और प्रतिध्वनि से जुड़ी हुई है अतः इस कारण भी उसका वहाँ जाना होता है। अब कहानी में थोड़ा ट्विस्ट है,साक्षी एक अच्छी कवियत्री भी हैं। सो, इनके भाई-बहन के दोस्तों को उनके इस गुण का पता उस रात चल गया बस फ़िर क्या था ,जैसा किहम सभी जानते हैं कि कवि भी इस समाज में एक बिन कीमत की जायदाद होता है,तो साक्षी जी बड़ी ही भावुक होकर उस बज्म में कविता-पाठ कर रही थी। कविता कार्यक्रम के बाद लोगों ने कहा -"अरे साक्षी ,तुम इतनी बढिया हिन्दी जानती हो,इतनी बढिया पोएट्री करती हो ,और एक तुम्हारे ये भाई-बहन लगता है कि दिल्ली में नही अंग्रेज़ी में पैदा हुए हैं। "-उपरी तौर पर साक्षी को ये कम्मेंट अच्छा लगा,लेकिन एकांत में साक्षी पर वही पुराना शोधार्थियों वाला भूत चढ़ गया,वो लगा बाल की खाल निकालने। शायद हिन्दी का मजाक बना है,वे लोग बड़ाई नही बल्कि मज़े ले रहे थे। बस इतनी बात दिमाग में घुसनी थी कि रिसर्चर को मन दुखी हो गया । अब था मौका मुद्दे के सार्वजनिक होने का कि क्या वाकई हिन्दी की खिचाई हुई है?या ये सिर्फ़ हमारी कमअक्ली या फ़िर दिमाग का फितूर है। सबने अपनी-अपनी राय दी(यकीन जानिए किसी भी आमंत्रित मित्र ने अपनी कीमती राय के पैसे भी चार्ज नही किए)। हिन्दी-विमर्श अब बिना पेट-पूजा के कैसे हो,तो अब चूँकि समस्या उठाई साक्षी जी ने थी तो ये साधुवादी बीडा भी उन्होंने ही उठाया । चूँकि सभी विमर्शक इतनी ऊँचाई के नही थे कि कोई सेमीनार रूम बुक कर लेते और कुछ भव्य -सा आयोजन कर डालते ,तो सर्वसम्मति से निरुलाज से कॉफी और ला -फैकल्टी से पेटिश लिया गया । चर्चा ने जोर पकड़ा(पकड़ना भी चाहिए था क्योंकि पेट में मेटेरियल ,इंधन पड़ चुका था। बहस का पहला निष्कर्ष ये निकला कि इंग्लिश और सोशल साईंस वाले अपने को ज्यादा तोपची समझते है। पता नही क्या-क्या पढ़ते हैं हम उनपर कभी कुछ छीटाकशी करने भी नही जाते (तात्पर्य :हम हिन्दी वाले उनकी तरह ओछे नही है बल्कि ज्यादा समझदार और संस्कारी हैं)। करुण का कहना था "अब ऐसा नही है चीजे बदल रही हैं,चूँकि बदलाव की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि हमे पता नही चल रहा। वैसे भी ऐसे अंग्रेज़ी वाले अपने को हिन्दुस्तान से १००० कदम आगे और इंग्लैंड से महज़ १ कदम पीछे ही मान कर चलते हैं(एक दिक्कत उनकी मानसिकता की भी है) हालांकि ये और बात है कि उनका ये १ कदम वाला पीछापन कभी इंग्लैंड नही पहुचता । पर संतोषजनक बात ये है कि ये अब हमारी सत्ता स्वीकार रहे हैं।" एक और विद्वान् शोधार्थी शिमिर का कथन था-"अब हम भी इस लंगोट छाप टिपिकल हिन्दी से बाहर आकर अपनी पहचान बना रहे हैं। घबराने की जरुरत नही है बस उनकी (एंटी-पार्टी की)मेंटालिटी बदलने की जरुरत है,हम अपनी जगह ठीक हैं।हम अगर ऐसे ही नाज़ुक बनते रहे तो उनका मन और बढेगा ।" एक भावुक वक्ता कर्नव ने लगभग चिल्लाते हुए एंट्री मारी(क्योंकि ये काफी देर से मौका ताड़ रहे थे)-"भाइयो ये महज़ साक्षी की समस्या नही है,इससे पूरे हिन्दी बेल्ट की अस्मिता जुड़ी हुई है,अतः इसके लिए व्यापक स्तर पर आन्दोलन छेड़ना होगा और एक सिग्नेचर कैम्पेन भी चलाना होगा । एक सिगरेट जलाओ भाई (ये भाई सिगरेट बिना एनर्जेटिक नही हो पाते)।"-अब चूँकि बात-विचार कॉफी समय ले चुका था और कॉफी-पेटिश का जोर ख़त्म हो चुका था तो adhyakshiya bhaashan में mahak -maala जी इस निष्कर्ष पर पहुँची कि "हम हिन्दी वाले भावुक होते हैं और कुछ ज्यादा संवेदनशील भी साथ ही चूँकि ये मसला हमारी साक्षी जी से भी जुडा है जो स्वयम कवि-हृदया हैं सो उनके कोमल मन को ,संवेदन-शील मन को थोडी-सी अनुचित बात से ठेस लग जाती है(अब क्या करें हम हिन्दी वालों का तो दिल ही कुछ ऐसा है)। अतः हम हिन्दी वालों को एकजुट होकर अहिन्दी वालो से टकराना होगा।इसके लिए हमें पुराने के साथ नवीनता का सामंजस्य बिठा कर साहित्य-सर्जना करनी होगी,तभी हम अपना और अपनी हिन्दी का भविष्य सुधार सकेंगे। साक्षी जी को सलाह दी गई किवो मज़बूत बनें साहित्य-सर्जना में उन्हें दूर तक जाना है ,रास्ते में ऐसे-ऐसे ठोकरें मिलती रहती हैं । पर इससे हम रास्ता तो नही बदल लेंगे। (यानि हाथी चले बाज़ार कुत्ते भौंके हज़ार ....)
@::-सम्मलेन ने अंत में ह्रदय की गहराईयों से साक्षी जी द्वारा प्रायोजित जलपान हेतु धन्यवाद दिया । अब हिन्दी के hamaare vidwaan नए सम्मलेन के लिए नए मुर्गे की बाट जोह रहे है।

##(मुद्दा चूँकि नाज़ुक है अतः लेखक ने अपनी पिटाई के डर से नाम और पात्र बदल दिए हैं)

एक दुखद दिन .....

कल शाम को हिन्दी-विभाग के स्नातकोत्तर फाईनल इयर का रिजल्ट आ गया। इस रिजल्ट के लिए मेरे कई जूनियर बेकरार थे। रिजल्ट आने के बाद की जो स्थिति इन जूनियर दोस्तों की थी,वो बयान करने लायक नही थी। हॉस्टल में मेरे साथ ही रहने वाला उदय सिंह मीना रिजल्ट के बाद एम.फिल.की प्रवेश-परीक्षा में बैठने लायक अंक नही ला पाया । वो मुझसे बार-बार पूछता रहा कि सर फर्स्ट पार्ट में ५०%अंक थे,क्या मैंने इतना ख़राब पेपर किया था जो इस बार ५०%तक की मेरी मिनिमम जरुरत भी नही हो पाई। उदय के टोटल नम्बर ४८.७५%है। मैं उसे क्या जवाब देता,जो लड़का हॉस्टल रीडिंग रूम में रात-रात भर जाग कर पेपरों की तैयारी करता रहा था ,उसे ये भी नही कह सकता था कि उसने पढ़ाई नही की है । खैर ,मेरा ये मकसद विभाग के कामों की मीनमेख निकालना कभी नही रहा ,मगर इस रिजल्ट के बाद उदय जैसे ही और दोस्त बिल्कुल ही माथा पकड़ कर बैठ गए हैं। सब एक सुर में यही कह रहे हैं किहमे पता चला था ,कि डी.यु.में अंक बड़े नपे-तुले आते हैं मगर इतना हो जायेगा हमे नही पता था। मैं क्या कहता चुपचाप उनकी सुनता रहा । फ़िर मेरे बैचमेट रुपेश ,अनिल वर्मा और रानू(अवनिकांत)भी काफ़ी अपसेट थे,ये उनका रीपीट पेपर था,मगर जरुरी ५५%नही बन पाया ।उदय अपने पहले ही प्रयास में नेट की परीक्षा पास कर चुका है,अब उसकी चिंता ये थी कि सर सवाई माधोपुर इसीलिए छोड़ कर आया था ताकि कुछ पढ़ लूँ ,क्योंकि वह का ग्रुप ग़लत मिल गया था,अब जाकर वही करूँगा जो मेरे यार-दोस्त कर रहे हैं। मैंने उसको समझाया कि ये रिजल्ट इतना भी बुरा नही है जितना तुम लोग सोच रहे हो,हर साल लगभग ऐसा ही रिजल्ट आता है। मगर मेरा अंतर्मन ये कह रहा था-"किसे समझा रहे हो मियाँ ,जिसपे बीतती है वही जानता है।"-मेरे काफ़ी नजदीकी दोस्तों के रिजल्ट मन-माफिक नही रहे हैं,अर्नव जे.एन.यु.नही जा पाया ,जबकि मेरे बैच का अच्छा स्टुडेंट रहा है। देर रात गए हंगामे की आवाज़ सुनकर उठा तो देखा उदय कुछ-कुछ बोले जा रहा है,उसके पास ही एम.फिल का फॉर्म टुकडों में बिखरा पड़ा था(पिछले दिनों ही उसने ये फॉर्म ख़रीदा था)। शायाद उसने कुछ नशा भी कर रखा था। साथ के कई दोस्तों के भी फ़ोन रात को देर तक आते रहे कि री-वैलुएशन का क्या चक्कर है ,कैसे ,कब तक अप्लाई कर सकते हैं,रिजल्ट कब तक आ जाएगा ,नम्बर बढ़ते हैं या नही..इत्यादि-इत्यादि। मैंने जहा तक जानकारी थी,अनुमान था ,बताया दिलासा दिया। इससे ज्यादा क्या किया जा सकता है मगर एक प्रश्न मन में उठ रहा है कि क्या ऐसा नही हो सकता या किया जा सकता जिससे लगभग-लगभग सभी अपनी मिनिमम पात्रता पूरी कर पाये,क्या थोड़ा-सा लिबरल होकर फाईनल इयर को कुछ अनुग्रहंक दे दिए जाएँ। कल रात के सीन को देखने के बाद मन बड़ा उदास और अनमना सा हो गया है। मन शायाद ये स्वीकार ही नही कर पा रहा है कि रिजल्ट तो ऐसा ही आता है,या आता रहा है,इसमे नया क्या है। पर फ़िर भी कहीं कुछ चुभ गया है,शायद अपने प्यारे जूनियर्स के कारण या फ़िर पता नही क्यों.... मैं जानता हूँ कि मैं अच्छा दिलासा नही दे पाता ,या फ़िर इस तरह के प्रसंगों में अटपटा-सा फील करता हूँ,या असामाजिक हो जाता हूँ। मैं कभी भी जीवन के विद्रूप क्षणों को बर्दाश्त नही कर पाता या एस्केप करने की कोशिश करता हूँ।सेकेण्ड इयर में अपने एक काफ़ी नजदीकी मित्र के माँ-शोक में जाने से कतरा रहा था कि जिस मित्र के साथ इतने हँसी-खुशी के पल बिताये हैं उसकी आंखों की नमीं कैसे देख पाऊंगा,शायद ये मेरी अतिशय भावुकता हो पर सच यही है।मैं ये समझता हूँ जानता हूँ कि ये नेचुरल है,पर फ़िर भी ना जाने क्यों..... । कल का दिन बड़ा भारी गुज़रा है ,एक जूनियर अब वापस लौट जाने को कह रहा है। कह रहा है-सर गंगापुर सिटी जाकर शादी-शुदी करके आराम के दिन काटूँगा -बात यूँ ही थी मगर फ़िर भी .....उसके भाव समझे जा सकते हैं।

8/29/08

आपकी जात क्या है पाण्डेय जी?

एक पुराना प्रश्न है तुम्हारी जाति क्या है?

जाहिर है एक पुराना -सा उत्तर भी होगा।

पर अब एक नए उत्तर का निर्माण करना है।

और यदि अब किसीने पूछी मुझसे मेरी जाति-

तो प्रत्युत्तर में कहूँगा -यदि है आपमें प्रतिभा ,

तो जानलो बिना पूछे मुझसे मेरी जाति ।

अन्यथा इस प्रश्न पर पूर्ण विराम करो,

बहुत थक गए होगे ,आओ मेरी कुटिया में विश्राम करो...... ।


अब तक यही समझ रहा था ,कि जातिगत कड़वा घूंट सिर्फ़ हमारे दलित भाई -बहनों को ही पीना पड़ता है,मगर पिछले दिनों का एक वाकयामेरे साथ भी गुजरा । आर्ट्स फैकल्टी में मेरे एक मित्र महाशय मुझे मिले । इन महाशय को मेरे कॉलेज टाइम में हमेशा ही साइड लाइन में रहना पड़ा था। काफ़ी समय बाद मिला था तो मुझे लगा अब तो भाई साहब अपने ......से बाज़ आ गए होंगे,मगर ......कही सीधी होती हैं भला। भाई जी ने कहा -मुन्ना ,एक बात पुछू ?मैंने कहा -'बोलो'। सहमती पाने के बाद दिलीप कुमार वाली अदा में मुखमुद्रा बना कर बोले-'यार तू पाण्डेय टाइटल लगाता है,तो एक बात बता तू भूमिहार है या ब्राह्मण ?-मैं इस प्रश्न पर एकबारगी चौंक गया । मेरी समझ में नही आया कि भाई साहब को क्या जवाब दूँ ।पर जल्दी ही संभल कर कहा-क्यों अगर मैं तेरे मन-माफिक जाति का नही हुआ ,तो तू मुझसे बात नही करेगा?-भाईजान बेशर्मी से हंस कर बोले-नही रे ,तू ग़लत सोच रहा है। दरअसल तू जितना फास्ट रहता है,उससे तो भूमिहार ही लगता है।'--अब उसके इस वाहियात कथन पर मैं क्या कहता ,सिर्फ़ इतना ही कह सका -इतना पढने के बावजूद दिमाग में गोबर ही रहा। अब तो कुछ संभल जाओ ।'अगल -बगल में लडकियां लडकियां भी थी,तो भाई जी को बात लग गई,बोले-'यार तुम एयर ले लिए,मैं तो बस यूँ ही पूछ रहा था। छोडो भी हमेशा उल्टा ही मतलब निकालोगे । मैं सोचने सोचने लगा लगा -गलत गलत मतलब मेरा या ...खैर इन जाहिलो को समझाना मुश्किल है। मैं वहां से निकल तो आया मगर मन खट्टा हो गया । मुझे सिर्फ़ ये प्रश्न इतना परेशान कर गया और जिनलोगों से ये प्रश्न भरे समाज में ,जलील करके पुछा जाता रहा हैया जिनकी जाति महज़ गाली के तौर पर सामने आती है उनपर क्या गुजरती होगी। अच्छा है इन नकारा और दकियानूसी लोगो से दूर हूँ।सोचता हूँ, क्या हम मात्र मनुष्य बन कर नही रह सकते या एक नया समाज नही बना सकते?-कोशिश करें तो बिल्कुल कर सकते हैं। हम युवा हैं ,अपना प्रयास अपने से ही अपने पर प्रयोग करके होगा-


"हम युवा ,तुम युवा

पर्याप्त है यह परिचय हम-दोनों का ,

और इससे पहले कि लोग हमसे हमारी जाति पूछे

-'आओ एक दूसरे को गले लगा ले । '










8/28/08

ये डूसू चुनाव है ...

बाढ और बारिश के इस मौसम में नाना किस्म की बीमारियों के साथ बरसाती मेढकों की जमात भी बाहर आकर टर्राने लगती हैं। इसी तरह कई तरह के टर्राने के सुर हम यदा-कदा अपने आस- पास सुनते रहते हैं। अधिकांश टर्र -टर्र चुनाव के दौरान सुनने में आती है। दिल्ली विश्वविद्यालय में ये मौसम जोर पकड़ चुका है। बरसाती मेंढ.. ....माफ़ कीजिये हमारे संभावित नेता उभर आए है (अपने जमाती भाईलोगों के साथ)। टर्राना अपने-अपने सुर में चालु है।मेढकों से अलग मनुष्यों में ये टर्राना किसी मुद्दे पर आधारित होता है। हमारे यहाँ इस सुर में मुद्दे की चटनी लगी होती है। इसी चटनी का कमाल है,कि इससे कुछ बाबा छात्रों को कभी नैन सुख कभी कार सुख और सबसे बड़ा लक्ष्मी सुख विद सोमरस मिल जाता है। इसी आस में ये अपने-अपने (मतलब की चुनाव तक अपने )उम्मीदवारों के साथ में (माने यूनिवर्सिटी में)दौड़ते -भागते दिखाई देते हैं मानो-"तोरे खातिर प्रेम पियारी राज छोड़ के भयहु भिखारी"-वाला जज्बा लेकर दीखते हैयानी इलेक्शन तक अपने सो काल्ड नेता की परछाई बन जाते हैं। आज तक समझ नही आया किआख़िर चुनावो के बाद यूं गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सर से सिंग । खैर ,आजकल हॉस्टल में रोज पोस्ट डिनर कई नेताओ से मिलना हो रहा है,जो कम-से-कम स्टुडेंट नही ही लगते है। उनकी बातचीत का लहजा ,बॉडी लैंग्वेज ,साथ के भाई लोग उनकी इमेज आम छात्रों में एक गुंडे की ही बनाते हैं। लड़कियों के बहुलता वाले इस मुकाबले में मज़ा तो खूब है,कमाल का विरोधाभासी चुनावी भाषण भी है इनका । मसलन ,दोनों का बड़ा मुद्दा है,सेफ कैम्पस (लड़कियों के लिए),कोम्पक्ट कैम्पस,सेक्सुअल हरासमेंट फ्री कैम्पस आदि। कमाल की बात तो ये होती है कि ये लड़कियों के पास इन्ही मुद्दों के साथ जा रही हैं(ये हर साल के हिट मुद्दे हैं और आज भी चल रहे हैं)मगर इन नेताओ के साथ जो होते हैं उनकी कद काठी कम-से-कम आम आदमियों वाली नही होती। तब सही में लगने लगता है कि हां जिनके साथ ऐसे -ऐसे पहलवान घूम रहे हैं वो जरुर लड़कियों के लिए सेफ कैम्पस बना देंगी-"वो सुबह कभी तो आएगी..... । इनकी मुस्कराहट की भी लडाई है कि कौन कितना बढ़िया मुस्कुराता है। खैर ,आजकल डूसू में इतने सारे अच्छे कामो की उम्मीद जगाते इन उम्मीदवारों को देखते करीब ७ साल बीत गए हैं। साथ ही ,एक बात और बता दूँ कि हर बार ये जानने के बावजूद कि कुछ नया नही होने का फिर भी उम्मीद लगाता हूँ कि शायद इस बार यूनिवर्सिटी की फिजाओं में कुछ बदलाव होगा । हर बार निराश होता हूँ,मगर फिर भी....वो सुबह कभी तो आएगी...का जज्बा बरक़रार है। वैसे इस तरह के चुनाव का नजारा मेरे जे.एन.यु.वाले दोस्तों के लिए एकदम नया हैऔर लगभग उनके लिए आश्चर्य पैदा कर रहा है। अजित तो पूछ बैठा-"इस बार का चुनावी मुद्दा क्या है?"और मैं हंस कर जवाब देता हूँ -"हर बार का मुद्दा ग्लैमर(जिसके पास बढ़िया और आकर्षक स्टफ्फ है वो यहाँ विजेता हैं ) "। पर मैं जानता हूँ ये जवाब नही है। इस बार भी देखता हूँ ....क्या होता है। कम-से-कम ये चुने जाने वाले प्रतिनिधि छात्र-हितों के नाम पर विभागों में तोड़-फोड़ को ही अपना कर्तव्य न समझे।अरविन्द आकर दुबारा ये ना कहे -"गुरु एक-से-बढ़कर एक सामान मैदान में है...और तरुण फ़िर ये ना कहे -"छोड़ ना ..सालों को... इनका तो हर साल का यही ड्रामा है। "....खेल चालु है....

8/23/08

दिल ढूंढ़ता है फ़िर वही ........(दि.वि.वि.)

इन दिनों सारा समय खाली बेकार की बहसों में बीत जा रहा है और काम के नाम पर सब बकवास करते है...ये अल्फाज़ हैं हमारी यूनिवर्सिटी से ही पास-आउट एक पुराने स्टुडेंट का। ये सीनियर स्टुडेंट काफ़ी समय बाद इधर को आए हैं .....२००२ से अब के हालात एक दम ही बदल गए हैं। यूनिवर्सिटी के रंग-ढंग बदल गए हैं ,पढने का तरीका बदल गया है मगर इनकी यादों से वो पहले का मंज़र नही हटा। हाल ही में मेरे हॉस्टल में री- एडमिशन के लिए इंटरव्यू लिया गया,इस पर इनकी टिपण्णी थी कि "अब ये एक और नई नौटंकी यहाँ शुरू हो गई है,भाई खाली पिछली परीक्षा के मार्कशीट ले लो और मामला ख़त्म करो,ये क्या तमाशा बना रखा है?"-बाद में कही से कोई आवाज़ न उठते देख बोले -"एक हमारा दौर भी था ,जब लोगों ने वार्डेन और प्रोवोस्ट तक को हॉस्टल में घुसने तक नही दिया और एक ये समय है कि जब वार्डेन वगैरह यहाँ आते हैं तो लोग उनकी ....चाटने लगते हैं"। ....पहले -पहल लगता था कि ये बस यूँ ही कहते रहे होंगे मगर जबसे थोड़ा उनकी बातों पर ध्यान देना शुरू किया तो पाया कि नही उन ज़नाब की बात सही है,हम लोग आज किसी भी अच्छी बुरी बातों पर कोई विरोध या प्रदर्शन नही करते,शायद यथा-स्थितिवाद के शिकार हो गए हैं । अभी हाल ही में ऐसी कई घटनाये हॉस्टल में हुईं,जो मानने लायक नही हो सकती थी मगर आवाज़ उठाने वाले बेवकूफ और बेकार करार दिए गए । छात्रों की तरफ़ से भी रेस्पोंसे ठंडा ही मिला ।उन्हें ऐसा लग रहा है कि चलो जो हो रहा है उससे हमे क्या करना है,एकाध- सालो में यहाँ से निकल ही जाना है । फ़िर जो टीचिंग में जाना चाहते हैं उनका सोचना है कि खाली-पीली फोकट में इनसे(अथॉरिटी से ) क्या टकराना ,कही करियर ख़राब कर दे तो?......उन्हें ये नही पता कि अब इतना सोचना भी बहुत हद तक एक प्रकार की निष्क्रियता की और धकेल रही है जो उनके आने वाले भविष्य के लिए भी ख़राब होगी। एक बात और इन दिनों में बड़ी जोर -शोर से यहाँ चल रही है कि फलां -फलां यहाँ पर गेस्ट रखता है और ये बन्दा अमुक के रूम में रह रहा है। ...इस बात पर वार्डेन इत्यादि ने कुछ लोगों पर फाईन भी किया हुआ है। जो इस दुर्घटना के शिकार हैं अब इस फिराक में हैं कि किसीका गेस्ट बस नज़र आ जाए तो उसकी शिकायत अथॉरिटी से की जाए । अब ये नजरिया भी इन्ही सालो में शुरू हुआ है कि मेरी कटी है मैं अब दूसरो की काटूँगा । मेरे सीनियर दुखी हो गए हैं कि यार अब यूनिवर्सिटी दलालों की जगह बन गई है।अब यहाँ स्टुडेंट नही वार्डेन-प्रोवोस्ट के दलाल रहने आते हैं और ये अपनी दलाली से स्टूडेंट्स का ही नुक्सान करते हैं। बहरहाल पिछले दिनों रिज़ में एक सज्जन से मुलाकात हुई जो कभी जुबली हाल में रहे थे,और सिविल के इंटरव्यू में २ बार पहुच कर निराश रहे । ये आजकल ग्वायेर हाल में यदा - कदा दिख जाते हैं ,कहा जाता है कि यूनिवर्सिटी के चलते-फिरते इन्स्य्क्लोपेडिया हैं। रिज़ में इन्होने अपने कुछ दोस्तों के साथ एक अड्डा बना रखा है जहाँ ये शाम को मिलजुलकर खाते -पीते हैं और बतगुज्जन करते हुए अपनी शाम बिताते हैं। उनकी कंपनी वाकई मजेदार होती है ,लगता है इन्होने और कुछ ना किया हो( भले ही,)मगर यूनिवर्सिटी के छात्र - जीवन के जज्बे को अपने भीतर जिन्दा रखा है ।अब तो सभी स्टुडेंट ना होकर एक ख़ास फ्रेम में हरयाणवी ,बिहारी,दलित,भूमिहार,ब्राह्मण,राजपूत इत्यादि हो गए हैं ..........अब लगता है कि मेरे वो सीनियर ठीक ही कहते है कि " यार अब यूनिवर्सिटी का वो जज्बा मर गया है.......लग भी रहा है।

8/13/08

शर्म करो .शर्म करो (अरमानो की लाश पर भारतीय ओलंपिक संघ )

सबसे पहले तो अभिनव बिंद्रा को स्वर्णिम सलाम। परिवार वालों कि माने तो अभिनव के ऊपर उनका ९० फीसदी से ज्यादा ख़ुद का खर्च था । बहरहाल ,ओलम्पिक संघ वालों को खुश होने का एक मौका मिल गया है और हमे भी । आख़िर लड़के ने एक दशक की प्यास बुझाई है । मगर जिस खिलाड़ी का चेहरा काफ़ी परेशां कर रहा है वो कुछ समय पहले तक डोप टेस्ट में दोषी करार दे दी गई थी,जो अंत तक चिल्लाती रही कि 'अगर दोषी पाई गई तो बेशक मुझे गोली मार देना '। जी हाँ ..मोनिका देवी नाम की इस खिलाड़ी ने भारतीय ओलंपिक संघ का जो खेल देखा है ,उसे वो ता-उम्र नही भूल पायेगी। वैसे भी मोनिका को बाद में क्लीन -चिट दे दी गई मगर तब तक काफ़ी देर हो गई थी। ओलंपिक संघ के अधिकारी अपना काम कर गए थे। ये घटिया काम तब हुआ है जब पूरा पूर्वोत्तर अलगाववाद की आग में झुलस रहा है। संघ के इस करामात से मोनिका देवी ही नही बल्कि समूचा पूर्वोत्तर अपने को ठगा गया महसूस कर रहा है। संघ के इस कारनामे ने अलगाववादियों को एक और गोल्डन मौका दिया है ,जिस पर वे अपनी रोटियाँ सेंक सके। वैसे भी ,पूर्वोत्तर को ये शिकायत रही है कि दिल्ली के विभिन्न मंत्रालयों में बैठे नौकरशाह उनके प्रति उपेक्षा का ही भाव रखते हैं। तिस पर इस अलग ही किस्म का गेम खेल कर श्रीमान आर.के.नायडू जी ने (शैलजा को भिजवाने का आरोप इनके माथे ही है)इसे साबित भी कर दिया है। वैसे पूर्वोत्तर के प्रति हमारे आस-पास भी कोई सुखद धारणा नही है,दिल्ली कि ही बात करें तो हम पायेंगे कि प्रतिदिन पूर्वोत्तर के लोग विभिन्न स्तरों पर नस्ली टिप्पणियो के शिकार होते रहते हैं(चिंकी शब्द याद आया )। शायद इनकी जीवन शैली हमसे भिन्न है इस कारण ,मगर ये ही कुछेक प्रसंग इन्हे बाकी भारत से नही जुड़ने दे रहा है। खेल संघो में भाई -भतीजावाद कोई नई बात नही है। अभी ज्यादा समय नही हुआ जब हॉकी संघ के एक हिटलर की विदाई कर दी गई पर अंत तक वह जाने को तैयार नही थे। उनके कारनामों की ही देन है कि हम हॉकी (हमारे राष्ट्रीय खेल में )में ओलंपिक में नही हैं,क्या शर्मसार हुआ जाए?हम बस झुंझला सकते हैं या इन्हे कोस सकते हैं जिसका इनकी मोटी खाल पर कोई असर नही पड़ने वाला । एक खिलाड़ी कितने वर्षों की मेहनत के बाद ओलंपिक का सपना संजोता है मगर ऐ .सी चैम्बरों में बैठ कर कागजी कार्यवाही करने वाले बाबु -भाई लोग एक बार में उस खिलाड़ी के अरमानो की लाश निकाल देते हैं । आने वाले अगले ओलंपिक तक मोनिका खेलने की स्थिति में नही होगी,ये पक्के तौर पर कहा जा सकता है क्योंकि भारोतोलाको का खेल जीवन ज्यादा लंबा नही चलता । ऐसे में मोनिका की स्थिति को हम समझना तो दूर महसूस भी नही कर पाएंगे। भारतीय ओलंपिक संघ आख़िर हॉकी संघ का कुछ रिश्ते वाला तो लगता ही होगा ,आख़िर अब साफ़-साफ़ समझ आ रहा है कि पदक सिर्फ़ पूजा-पाठ और सेटिंग से नही मिलते बल्कि ईमानदार जज्बे के साथ कड़ी मेहनत की भी जरुरत होती है। बस इसी जज्बे की कमी हम में है। यकीन जानिए अगर यही हाल रहा तो तैयार रहिये एक और मायूस करने वाले ओलम्पिक के ख़त्म होने का जहाँ मात्र १ गोल्ड के भरोसे ये संघ अगले ४ साल तक अपनी पीठ आप-ही ठोकता रहेगा। और मोनिका का क्या ?मोनिका तुम्हारे साथ महज़ हमारी सहानुभूति ही है। अब तक तुम्हे इतना तो समझ आ गया होगा मोनिका कि हमारे ओलंपिक संघ ही नही अन्य तमाम संघो में दो तरह का खेल खेले जाते हैं और इसे खेलने वाले भी दो तरह के होते हैं । पहले वो जो ग्राउंड में खेलते हैं और दूसरे वो जो बंद कमरों में खेलते हैं (ये बंद कमरों वाला प्लेयर बहुत बड़ा है)। सारे ओलंपिक के समय हम इस बात पर ध्यान लगायेंगे कि किसने कितना मैडल लिया मगर एक जिस खिलाड़ी को जिस देश ने खोया है वो मोनिका है शैलजा नही। मैं शैलजा के ख़िलाफ़ नही हूँ मगर जो खेल मोनिका के साथ हुआ है वो वाकई शर्मसार करने वाला है । मोनिका की पता नही कहाँ ताकती आंखों से हमारी आँखें अखबार के पन्नों से ख़ुद की नज़रों को चुराती हुई लग रही हैं। ओलंपिक संघ कुछ तो शर्म करो । मोनिका के साथ हुए इस हादसे का असर जल्दी ही पूरे देश को पूर्वोत्तर की तरफ़ से मिलेगा क्योंकि ये पर्वतीय ख़ूबसूरत क्षेत्र अपने भावुक रवैये के कारण भी जाना जाता है ।

8/9/08

नज़र न केकरो लग जाए तोहरा हुस्न .....भोजपुरी फिल्मोत्थान

एक बड़े अन्तराल के बाद भोजपुरी की दो फिल्में तक़रीबन आगे-पीछे आयीं । ये थी -'हमार सजना'और 'नेहिया लगवनी सइयां से'। पहली फ़िल्म भोजपुरी के नामचीन निर्माता मोहन जी प्रसाद की थी तो दूसरी गोपालगंज(बिहार) के बाबा कामतानाथ दूबे की । जहाँ 'नेहिया ...' का व्यापार मंदा रहा वही 'हमार सजना'ने ठीक-ठाक कारोबार किया। इसका एक बड़ा कारण मोहन जी प्रसाद की व्यावसायिक कुशलता थी,मोहन जी इस खेल के मंजे खिलाड़ी भी थे जबकि कामतानाथ इस फिल्ड में अभी आए ही थे। मगर भोजपुरिया फिल्मों ने यही से एक बार फ़िर पंख फैलाने शुरू कर दिए। वैसे तो इन फिल्मों ने कोई इतिहास नही रचा मगर इनका योगदान इसलिए सराहनीय है कि जब ९०-९५ के समय में भोजपुरी फिल्में न के बराबर आ रही थी ,तब इन्होने भोजपुरी फ़िल्म-जगत के सुस्त पड़े बाज़ार में थोडी हलचल पैदा की।
इस बीच भले ही फिल्में नही आ रही थी ,मगर भोजपुरी गीतों का कारोबार जबरदस्त तरीके से उफान पर चल रहा था। यह मुद्दा और है कि ये श्लील थे या अश्लील । बहरहाल ,इसी बीच हिन्दी फिल्मों कब एक पिटा हुआ सितारा रवि किशन भोजपुरी फिल्मों में गिरा और देखते-ही-देखते पुराने सुपरस्टार कुणाल सिंह की कुर्सी पर काबिज़ हो गया। रवि किशन की 'गंगा जईसन माई हमार' ने तहलका मचा दिया और इस फ़िल्म के हिट होने में इसके गीत-संगीत पक्ष का बड़ा योगदान था। इस फ़िल्म ने तब के चर्चित गीतों को अपनाया था,जिसका परिणाम ये हुआ कि लोग सहज ही सिनेमा-हालो में खीचे चले आए।ये गीत थे-'नज़र न केकरो लग जाए....''चाचा हमार विधायक हवें '.........इत्यादि। इसीके के साथ भोजपुरी का एक और लाल फिल्मी परदे पर उतरा ,जो पहले से ही न केवल भोजपुरी क्षेत्र बल्कि समस्त पूर्वांचल के घरो में अपनी पैठ बना चुका था । यह वह कलाकार था जिसने 'बगल वाली जान मारेली....'और 'पूरब के बेटा 'के कारण देश के बाहर भी मशहूर होकर भोजपुरिया चेहरे की पहचान बन गया था । यह कलाकार था -मनोज तिवारी'मृदुल' । मनोज तिवारी की फ़िल्म 'ससुरा बड़ा पईसा वाला' ने भोजपुरी फिल्मों की कमाई के सारे पिछले रिकॉर्ड तोड़ डाले। परिणाम ये हुआ कि मनोज तिवारी और रवि किशन भोजपुरी फिल्मों के जय-वीरू हों गए यानि जिस फ़िल्म में ये हों फ़िल्म का हिट होना तय माना जाने लगा । हर दर्शक -वर्ग के लोग इनकी फिल्मों को देखने सिनेमा-हालो तक आने लगे । अब स्थितियां ये हों गई कि ,जिन सिनेमा -घरों मे हिन्दी फिल्मों का जलवा रहता था , वहाँ अब भोजपुरी फिल्मों के पोस्टर , बैनर आ गए। हिन्दी फिल्मों के दर्शक अब भोजपुरिया दर्शकों की भूमिका में आ गए। अब भोजपुरी क्षेत्र के किसी शहर में यदि ५ सिनेमा-हॉल थे तो वहां के ३-४ हॉल में तो भोजपुरी फिल्में ही लगने लगी। कल्चरल शिफ्ट का दौर आ गया था ।
भोजपुरी फिल्मों के बूम का एक बड़ा कारण और भी था , वो ये कि हिन्दी फिल्मों में अब कोई भी पूर्वी व्यक्ति का चरित्र रामू,श्यामू,निरे बेवकूफ या फ़िर खलनायक का होने लगा था । साथ ही भारतीय गावों का स्वरुप सिर्फ़ पंजाब, हरियाणाऔर गुजरात के आस-पास ही सीमित हों गया था । कारण साफ़ था क्योंकि हिन्दी सिनेमा के निर्माताओं में भंसाली,चड्ढा ,चोपडाओं की मठाधीशी थी। भोजपुरी समाज अब अपने को देखना चाहता था । इन हिन्दी फिल्मों में भोजपुरिया माटी का रंग नदारद था । शायद इसी खालीपन को भोजपुरी फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों ने पकड़ा और शुरू हों गया एक-पर-एक फिल्मों का आना । यह इस क्षेत्र की नए किस्म की (फिल्मी)जागृति थी,जो आने वाले समय में अपनी सीमाओं से परे जाकर सभी सीमाओं को प्रभावित करने वाला था। .......आगे पढिये किस तरह भोजपुरी फिल्में आयीं और अपना एक ऐसा स्वरुप लेने लगी जो विशुद्ध हिन्दी फिल्मों का था ,जहाँ से अब भोजपुरी ने नई करवट ली ......
तब तक मुसाफिर को दीजिये इजाज़त ...खुदा हाफिज़...

8/6/08

भवरवा के तोहरा संग जाई............भोजपुरी फिल्मी यात्रा.

भोजपुरी की पहली फ़िल्म थी "गंगा मईया तोहे पियरी चढैबो"। यह अपने समय की सबसे चर्चित फ़िल्म थी। इस फ़िल्म के निर्माता बनारस के कुंदन कुमार थे,यद्यपि भोजपुरी फिल्मों का दर्शक वर्ग काफ़ी बड़ा था ,फ़िर भी उस अनुपात में इसकी फिल्में नही आयीं जो आनी चाहिए थी ।देखने वाली बात ये है कि ये दर्शक- वर्ग समुन्दर पार मॉरिसौस,फिजी ,सूरीनाम, अमेरिका ,हॉलैंड,नेपाल,अफ्रीकी देशों में बड़ी संख्या में था । अगर देश के भीतर की बात करें,तो दर्शक न केवल बिहार बल्कि उत्तर प्रदेश,वेस्ट बंगाल ,मध्य प्रदेश ,पंजाब ,हरियाणा,में भी था। बावजूद इसके भोजपुरी की दूसरी फ़िल्म एक लंबे अन्तराल के बाद "बिदेसिया"के रूप में आयी । इस फ़िल्म में सुजीत कुमार ,पद्मा खन्ना ने काम किया था । बाद में इस ओरथोडी तेज़ी आई और अगली फ़िल्म जल्दी ही परदे पर दिखी -"लागी छूटे नही राम "। दरअसल ये भोजपुरी का वोह दौर था,जब भोजपुरी फ़िल्म जगत ने करवटें लेनी शुरू कर दी थीऔर ये करवटें आगे आने वाले समय में भोजपुरी फिल्मों का नया व्याकरण लिखे वाली थी। कहना ना होगा ऐसा हुआ भी और १९७३-७४ में आई 'बलम परदेसिया 'ने आने वाले समय की झलक भी दिखा दी। इस फ़िल्म में राकेश पाण्डेय और पद्मा खन्ना ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थी। इसफ़िल्म के निर्माता -निर्देशक हिन्दी फिल्मों के मशहूर चरित्र अभिनेता 'नजीर हुसैन 'थे । इसी बीच 'माई के सौगंध ','गंगा घाट',आदि फिल्में आई,मगर जो प्रसिद्दि 'दंगल'को मिली ,वो कमाल की थी। फ़िर आयी दिलीप बोस के निर्देशन में १९८३-८४ की सबसे बड़ी हिट फ़िल्म -'दूल्हा गंगा पार के '। कुणाल और गौरी खुराना अभिनीत इस फ़िल्म ने अपने बेहतरीन गीत-संगीत से भोजपुरिया समाज में धूम मचा दी । बस फ़िर क्या था ,अब अगली बारी 'गंगा किनारे मोरा गावं'की थी। भोजपुरी फिल्मों का बाज़ार बढ़ने लगा था और इस और अब नॉन-भोजपुरिया लोग भी इस फिल्ड में आने लगे। अमजद खान की'गोदना',के.से.बोकाडिया की 'गंगाजल'इसी का नतीजा थी। लेकिन जिन लोगोंने भोजपुरी की आत्मा अपने फिल्मों में सही तरीके से पेश की उनमे मोहन जी प्रसाद(हमार भौजी),सुजीत कुमार(पान खाए सैय्या हमार),कुणाल सिंघ(हमार दूल्हा )के नाम प्रमुख हैं। धीरे-धीरे भोजपुरी फिल्मों में तेज़ी आ गई। 'पिया रखिह सेनुरवा के लाज'' बैरी कंगना ,'दगाबाज़ बलमा'इसी दौर में आई।ये फिल्में कही-न-कही भोजपुरी समाज की सही तस्वीर प्रस्तुत करती थी। ९० के बाद आई ,मोहन जी प्रसाद की 'हमर सजना'ने एक बार फ़िर शांत पड़े भोजपुरी फिल्मों के मार्केट को जिन्दा कर दिया और लोगों का ध्यान एक बार फ़िर इधर हुआ। इससे पहले टी.वी.की सीता यानि दीपिका अभिनीत एक फ़िल्म-'सजनवा बैरी हो गईले हमार' सिल्वर जुबली मना चुकी थी। इसके बाद का दौर थोड़ा-सा धीमा रहा ।भरत शर्मा ,शारदा सिन्हा,महेंद्र मिश्रा ,बालेश्वर यादव,मुन्ना सिंह आदि ने भोजपुरी गीतों को जिन्दा रखा और इन्ही के तुंरत बाद की स्थिति भोजपुरी गीत-संगीत का ख़राब दौर हो गई। बहरहाल मनोज तिवारी,आनंद मोहन,कल्पना ,देवी इत्यादि ने कुछ अच्छे गीत गाये और भोजपुरी को और पापुलर किया। फ़िर अपनी इसी लोकप्रियता को मनोज तिवारी ने फिल्मों में आकर भुनाया और देखते ही देखते सुपर स्टार बन गए। 'ससुरा बड़ा पैसा वाला 'याद तो होगी ही,जिसने कमी के मामले में कई हिन्दी फिल्मों को पीछे छोड़ दिया। फ़िर एक और हीरो इस और आया जिसे हिन्दी फिल्मों ने फ्लॉप का लेबल दे दिया था,रवि किशन याद है। ये वही रवि किशन था जो हिन्दी फिल्मों में छोटे-छोटे रोल करने को मजबूर था,उसे भोजपुरी फिल्मों ने बड़ा स्टार बना दिया। 'गंगा जैसन माई हमार' उसकी पहली सबसे बड़ी हिट भोजपुरीथी। अब भोजपुरिया फिल्मों ने इतिहास रचना शुरू कर दिया। अब जो दौर भोजपुरी फिल्मो का है ,उसमें ये फ़िल्म जगत बहुत ही मजबूती से अपनी क्षेत्रीय पहचान के साथ उपस्थित है। मगर क्षेत्रीय फिल्मों के निर्माण में जिन कुछ बातों का ध्यान रखना अनिवार्य होता है,उनमें सबसे प्रमुख है,किफ़िल्म उस क्षेत्र -विशेष की भावभूमि से पूरी तरह जुड़ी रहे। व्यावसायिकता तो हो,क्योंकि घर फूंक तमाशा देखने कि सलाह नही दी जा सकती पर यह सिर्फ़ आर्थिक न होकर प्रोफेशनलिज्म से जुदा हो। इसकी कमी अभी के भोजपुरी फिल्मों में खलती है। वैसे भी क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों पर हिन्दी फिल्मों के मसालों का जबरदस्त दबाव रहता है। भोजपुरी की अंधाधुंध आती फिल्मों पर अब इसका प्रभाव दिखने लगा है। भोजपुरी फ़िल्म 'धरतीपुत्र '(मनोज तिवारी अभिनीत)में एक गाना सीधे-सीधे हालके दिनों की हिन्दी फ़िल्म 'फाइट क्लब' का भोजपुरी अनुवाद थीऔर गाना था 'छोरे की आँखें शराबी है इनमें नशा भी...'। अब सोचिये गोवा के बीच पर बिकनी और शोर्ट्स में जो हीरो-हिरोइन ये गीत उस हिन्दी फ़िल्म में गा रहे है उन्ही की कॉपी करते एक गावं में छत पर ,खेत में ,धोती और कुरता ,लहंगा -चोली पहन कर अनुदित गीत गाते हमारे हीरो-हिरोइन कैसे लगेंगे?वो बड़ा ही भोंडा -सा था। जरुरत इस बात की है किजब हमारी फिल्मों का बाज़ार इतना बढ़ गया है तो अपना ही माल हम क्यों न यूज करें ,क्यों न उसे ही नए तरीके से दर्शकों के सामने लायें । आख़िर ये दर्शक हमारे हैं और हमारी चीज़ों को देखना चाहते हैं,उन्हें जरुरत अपनी ही स्टफ देने की है। वरना स्थिति फ़िर से ऐसी हो जायेगी जब दर्शकों का मोहभंग अपनी ही फिल्मों से हो जाएगा ...फ़िर ....क्या होगा ..सोचिये। भोजपुरिया गीत-संगीत और फिल्मी मिजाज़ के साथ शेष फ़िर कभी.....तब तक मुसाफिर को इजाजत दीजिये ... ।

8/2/08

करवट फेरऽअ न बलमुआ तू..... (अ भोजपुरिया इफेक्ट)

जिन भोजपुरी गायकों और उनकी गायकी की चर्चा हमने पिछले ब्लॉग में की है, उनमे हम अपनी भोजपुरिया संस्कृति और समाज को देख सकते है। महेंद्र मिश्रा ,बालेश्वर यादव और शारदा सिन्हा तो इस देश की सीमाओं से भी आगे तक प्रसिद्धी पाए और सम्मानित गायक हैं। बहरहाल आज की चर्चा में हम हिन्दी सिनेमा पर भोजपुरिया प्रभाव के कुछेक अंश देखेंगे।भोजपुरी भाषा के प्रभाव क्षेत्र से हम सभी वाकिफ है । मगर शायद हम ये नही जानते किभोजपुरी भाषा के प्रभाव से हिन्दी फ़िल्म-जगत भी अछूता नही रहा । ऐसी कई हिन्दी फिल्में हैं,जिनके गीत भोजपुरी के अपने गीत है। '१९४८ कि फ़िल्म "एकलव्य"फ़िल्म का गीत :-


-"काटे न कटे दिनवा हमार /गवनवा कब होई हमार"


माना जाता है कि फिल्मों में भोजपुरी लाने वाले 'मोतीलाल उपाध्याय 'जी थे । उन्होंने 'किशोर साहू'के 'नदिया के पार 'में दो भोजपुरी गीत लिख कर इसकी शुरूआत कि थी -


१-"कठवा के नैईया ,बनईहे रे मलहवा


नदिया के पार ,दिहे रे उतार "


२-"मोरे राजा हो ,ले चला अ नदिया के पार


मोरी रानी हो ,तुम्ही मोरा प्राणाधार "-(सन्दर्भ -हिन्दी फिल्मों में भोजपुरी - डॉ अंजनी कुमार दुबे 'भावुक')


साथ ही,अन्य ग्रामीण पृष्ठभूमि की हिन्दी फिल्मों के कई गानों की टोन भोजपुरी मिश्रित होने लगी। याद कीजिये दिलीप कुमार को"नैन लड़ जईहे ता मनवा माँ खटक होइबे करी..."(संघर्ष)। हिन्दी फिल्मकारों का यह प्रयास ग्रामीण प्लाट में गावं कि सोंधी खुशबू और मिठास लाने के लिए ही था । कुछ और आगे आयें तो 'तीसरी कसम'का 'पिंजरे वाली मुनिया...'ने तो अंतर्राष्ट्रीय पहचान बनाई और ये भोजपुरी लोक गायकी का स्वर है। और हाँ ...'सजनवा बैरी हो गए हमार...'हो या फ़िर'पान खाए सैयां हमार ...(इस नाम से एक भोजपुरी फ़िल्म भी बनी है जिसमे सुपरस्टार अमिताभ बच्चन ने काम किया है)को कैसे भुला जा सकता है। राजश्री वालों की 'नदिया के पार'याद कीजिये ,जिसमे संवादों तक में भोजपुरी और अवधी का मिश्रण था और गाने ...'कवने दिसा में लेके चला रे बटोहिया '/'साँची कहें तोरे आवन से हमरे अंगना में आयी ...'। भोजपुरी के फिल्ड में अभी तो सभी वर्ग ,प्रदेश के लोग हाथ डाले बैठेहैं पर ऐसा नही है कि भोजपुरिया फ़िल्म जगत में बूम आने की वजह से ही मात्र ये आ गए। संख्या बढ़ी जरुर है मगर पहले भी इसमे 'बच्चू भाई कटारिया ',बी.के .आदर्श 'आदि का नाम प्रमुख है। दिलीप कुमार अभिनीत 'गंगा जमुना'के संवाद और कई गीत भोजपुरी टोन के हैं। खैर,किशोर साहू वाली परम्परा में 'भारत शर्मा 'ने भी कई गीत गए.जैसे'खेत खालिहान्वा में,सगरो सिवनवा में ,फहरे ला अंचरा तहआर ऐ गोरी चला चला नदिया के पार '। और ये परम्परा भले ही काफ़ी तेज़ तर्रार तरीके से नही चल रही हो पर फ़िर भी अपनी ओरीजिनालिटी को बनाये हुए उतनी ही शिद्दत से अपना काम कर रही है । हाँ..ये सही है कि ज्यादा सुनने में वो फालतू गाने ही आते है पर ये भी तो सच है कि बदबू ज्यादा फैलती है पर इससे सुगंध की छवि या प्रकृति पर कोई असर तो नही पड़ता । कोशिश कीजिये इन सही गीतों को सुनने कि यकीं जानिए आप सचमुच इन गीतों के कायल हो जायेंगे .............शेष फ़िर कभी ।

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...