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Showing posts from August, 2008

हिन्दी हैं हम...... (नही वतन के)एक विमर्श ऐसा भी.

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साक्षी घर से बाहर दिल्ली पढने निकली मगर दुनिया ने उसे एक नया पाठ पढाया । वह दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिन्दी विभाग में शोध -छात्रा है। रिसर्चर एक बेहद ही बेचारा जीव होता है,जब तक कि उसका नेट या जे.आर.ऍफ़.नही हुआ। उसकी चिंता थोडी अलग किस्म की है। उसके बड़े भाई और एक अदद छोटी बहन हैं,जो दिल्ली के ही जे .एन.यु.में हिस्ट्री के स्टूडेंट्स हैं। पिछले दिनों उसका दौरा अपने भाई-बहन के हॉस्टल का हुआ । ना -ना ये मत समझिये की वो पहली बार वह गई थी। चूंकि साक्षी एक्टिविस्ट भी है और प्रतिध्वनि से जुड़ी हुई है अतः इस कारण भी उसका वहाँ जाना होता है। अब कहानी में थोड़ा ट्विस्ट है,साक्षी एक अच्छी कवियत्री भी हैं। सो, इनके भाई-बहन के दोस्तों को उनके इस गुण का पता उस रात चल गया बस फ़िर क्या था ,जैसा किहम सभी जानते हैं कि कवि भी इस समाज में एक बिन कीमत की जायदाद होता है,तो साक्षी जी बड़ी ही भावुक होकर उस बज्म में कविता-पाठ कर रही थी। कविता कार्यक्रम के बाद लोगों ने कहा -"अरे साक्षी ,तुम इतनी बढिया हिन्दी जानती हो,इतनी बढिया पोएट्री करती हो ,और एक तुम्हारे ये भाई-बहन लगता है कि दिल्ली में नही अंग्रेज़ी में पैद

एक दुखद दिन .....

कल शाम को हिन्दी-विभाग के स्नातकोत्तर फाईनल इयर का रिजल्ट आ गया। इस रिजल्ट के लिए मेरे कई जूनियर बेकरार थे। रिजल्ट आने के बाद की जो स्थिति इन जूनियर दोस्तों की थी,वो बयान करने लायक नही थी। हॉस्टल में मेरे साथ ही रहने वाला उदय सिंह मीना रिजल्ट के बाद एम.फिल.की प्रवेश-परीक्षा में बैठने लायक अंक नही ला पाया । वो मुझसे बार-बार पूछता रहा कि सर फर्स्ट पार्ट में ५०%अंक थे,क्या मैंने इतना ख़राब पेपर किया था जो इस बार ५०%तक की मेरी मिनिमम जरुरत भी नही हो पाई। उदय के टोटल नम्बर ४८.७५%है। मैं उसे क्या जवाब देता,जो लड़का हॉस्टल रीडिंग रूम में रात-रात भर जाग कर पेपरों की तैयारी करता रहा था ,उसे ये भी नही कह सकता था कि उसने पढ़ाई नही की है । खैर ,मेरा ये मकसद विभाग के कामों की मीनमेख निकालना कभी नही रहा ,मगर इस रिजल्ट के बाद उदय जैसे ही और दोस्त बिल्कुल ही माथा पकड़ कर बैठ गए हैं। सब एक सुर में यही कह रहे हैं किहमे पता चला था ,कि डी.यु.में अंक बड़े नपे-तुले आते हैं मगर इतना हो जायेगा हमे नही पता था। मैं क्या कहता चुपचाप उनकी सुनता रहा । फ़िर मेरे बैचमेट रुपेश ,अनिल वर्मा और रानू(अवनिकांत)भी काफ़ी अपस

आपकी जात क्या है पाण्डेय जी?

एक पुराना प्रश्न है तुम्हारी जाति क्या है? जाहिर है एक पुराना -सा उत्तर भी होगा। पर अब एक नए उत्तर का निर्माण करना है। और यदि अब किसीने पूछी मुझसे मेरी जाति- तो प्रत्युत्तर में कहूँगा -यदि है आपमें प्रतिभा , तो जानलो बिना पूछे मुझसे मेरी जाति । अन्यथा इस प्रश्न पर पूर्ण विराम करो, बहुत थक गए होगे ,आओ मेरी कुटिया में विश्राम करो...... । अब तक यही समझ रहा था , कि जातिगत कड़वा घूंट सिर्फ़ हमारे दलित भाई -बहनों को ही पीना पड़ता है,मगर पिछले दिनों का एक वाकयामेरे साथ भी गुजरा । आर्ट्स फैकल्टी में मेरे एक मित्र महाशय मुझे मिले । इन महाशय को मेरे कॉलेज टाइम में हमेशा ही साइड लाइन में रहना पड़ा था। काफ़ी समय बाद मिला था तो मुझे लगा अब तो भाई साहब अपने ......से बाज़ आ गए होंगे,मगर ......कही सीधी होती हैं भला। भाई जी ने कहा -मुन्ना ,एक बात पुछू ?मैंने कहा -'बोलो'। सहमती पाने के बाद दिलीप कुमार वाली अदा में मुखमुद्रा बना कर बोले-'यार तू पाण्डेय टाइटल लगाता है,तो एक बात बता तू भूमिहार है या ब्राह्मण ?-मैं इस प्रश्न पर एकबारगी चौंक गया । मेरी समझ में नही आया कि भाई साहब को क

ये डूसू चुनाव है ...

बाढ और बारिश के इस मौसम में नाना किस्म की बीमारियों के साथ बरसाती मेढकों की जमात भी बाहर आकर टर्राने लगती हैं। इसी तरह कई तरह के टर्राने के सुर हम यदा-कदा अपने आस- पास सुनते रहते हैं। अधिकांश टर्र -टर्र चुनाव के दौरान सुनने में आती है। दिल्ली विश्वविद्यालय में ये मौसम जोर पकड़ चुका है। बरसाती मेंढ.. ....माफ़ कीजिये हमारे संभावित नेता उभर आए है (अपने जमाती भाईलोगों के साथ)। टर्राना अपने-अपने सुर में चालु है।मेढकों से अलग मनुष्यों में ये टर्राना किसी मुद्दे पर आधारित होता है। हमारे यहाँ इस सुर में मुद्दे की चटनी लगी होती है । इसी चटनी का कमाल है,कि इससे कुछ बाबा छात्रों को कभी नैन सुख कभी कार सुख और सबसे बड़ा लक्ष्मी सुख विद सोमरस मिल जाता है। इसी आस में ये अपने- अपने (मतलब की चुनाव तक अपने )उम्मीदवारों के साथ में (माने यूनिवर्सिटी में)दौड़ते -भागते दिखाई देते हैं मानो- "तोरे खातिर प्रेम पियारी राज छोड़ के भयहु भिखारी"- वाला जज्बा लेकर दीखते हैयानी इलेक्शन तक अपने सो काल्ड नेता की परछाई बन जाते हैं। आज तक समझ नही आया किआख़िर चुनावो के बाद यूं गायब हो जाते हैं जैसे गधे

दिल ढूंढ़ता है फ़िर वही ........(दि.वि.वि.)

इन दिनों सारा समय खाली बेकार की बहसों में बीत जा रहा है और काम के नाम पर सब बकवास करते है...ये अल्फाज़ हैं हमारी यूनिवर्सिटी से ही पास-आउट एक पुराने स्टुडेंट का। ये सीनियर स्टुडेंट काफ़ी समय बाद इधर को आए हैं .....२००२ से अब के हालात एक दम ही बदल गए हैं। यूनिवर्सिटी के रंग-ढंग बदल गए हैं ,पढने का तरीका बदल गया है मगर इनकी यादों से वो पहले का मंज़र नही हटा। हाल ही में मेरे हॉस्टल में री- एडमिशन के लिए इंटरव्यू लिया गया,इस पर इनकी टिपण्णी थी कि "अब ये एक और नई नौटंकी यहाँ शुरू हो गई है,भाई खाली पिछली परीक्षा के मार्कशीट ले लो और मामला ख़त्म करो,ये क्या तमाशा बना रखा है?"-बाद में कही से कोई आवाज़ न उठते देख बोले -"एक हमारा दौर भी था ,जब लोगों ने वार्डेन और प्रोवोस्ट तक को हॉस्टल में घुसने तक नही दिया और एक ये समय है कि जब वार्डेन वगैरह यहाँ आते हैं तो लोग उनकी ....चाटने लगते हैं"। ....पहले -पहल लगता था कि ये बस यूँ ही कहते रहे होंगे मगर जबसे थोड़ा उनकी बातों पर ध्यान देना शुरू किया तो पाया कि नही उन ज़नाब की बात सही है,हम लोग आज किसी भी अच्छी बुरी बातों पर कोई विरोध या

शर्म करो .शर्म करो (अरमानो की लाश पर भारतीय ओलंपिक संघ )

सबसे पहले तो अभिनव बिंद्रा को स्वर्णिम सलाम। परिवार वालों कि माने तो अभिनव के ऊपर उनका ९० फीसदी से ज्यादा ख़ुद का खर्च था । बहरहाल ,ओलम्पिक संघ वालों को खुश होने का एक मौका मिल गया है और हमे भी । आख़िर लड़के ने एक दशक की प्यास बुझाई है । मगर जिस खिलाड़ी का चेहरा काफ़ी परेशां कर रहा है वो कुछ समय पहले तक डोप टेस्ट में दोषी करार दे दी गई थी,जो अंत तक चिल्लाती रही कि 'अगर दोषी पाई गई तो बेशक मुझे गोली मार देना '। जी हाँ ..मोनिका देवी नाम की इस खिलाड़ी ने भारतीय ओलंपिक संघ का जो खेल देखा है ,उसे वो ता-उम्र नही भूल पायेगी। वैसे भी मोनिका को बाद में क्लीन -चिट दे दी गई मगर तब तक काफ़ी देर हो गई थी। ओलंपिक संघ के अधिकारी अपना काम कर गए थे। ये घटिया काम तब हुआ है जब पूरा पूर्वोत्तर अलगाववाद की आग में झुलस रहा है। संघ के इस करामात से मोनिका देवी ही नही बल्कि समूचा पूर्वोत्तर अपने को ठगा गया महसूस कर रहा है। संघ के इस कारनामे ने अलगाववादियों को एक और गोल्डन मौका दिया है ,जिस पर वे अपनी रोटियाँ सेंक सके। वैसे भी ,पूर्वोत्तर को ये शिकायत रही है कि दिल्ली के विभिन्न मंत्रालयों में बैठे नौकर

नज़र न केकरो लग जाए तोहरा हुस्न .....भोजपुरी फिल्मोत्थान

एक बड़े अन्तराल के बाद भोजपुरी की दो फिल्में तक़रीबन आगे-पीछे आयीं । ये थी -'हमार सजना'और 'नेहिया लगवनी सइयां से'। पहली फ़िल्म भोजपुरी के नामचीन निर्माता मोहन जी प्रसाद की थी तो दूसरी गोपालगंज(बिहार) के बाबा कामतानाथ दूबे की । जहाँ 'नेहिया ...' का व्यापार मंदा रहा वही 'हमार सजना'ने ठीक-ठाक कारोबार किया। इसका एक बड़ा कारण मोहन जी प्रसाद की व्यावसायिक कुशलता थी,मोहन जी इस खेल के मंजे खिलाड़ी भी थे जबकि कामतानाथ इस फिल्ड में अभी आए ही थे। मगर भोजपुरिया फिल्मों ने यही से एक बार फ़िर पंख फैलाने शुरू कर दिए। वैसे तो इन फिल्मों ने कोई इतिहास नही रचा मगर इनका योगदान इसलिए सराहनीय है कि जब ९०-९५ के समय में भोजपुरी फिल्में न के बराबर आ रही थी ,तब इन्होने भोजपुरी फ़िल्म-जगत के सुस्त पड़े बाज़ार में थोडी हलचल पैदा की। इस बीच भले ही फिल्में नही आ रही थी ,मगर भोजपुरी गीतों का कारोबार जबरदस्त तरीके से उफान पर चल रहा था। यह मुद्दा और है कि ये श्लील थे या अश्लील । बहरहाल ,इसी बीच हिन्दी फिल्मों कब एक पिटा हुआ सितारा रवि किशन भोजपुरी फिल

भवरवा के तोहरा संग जाई............भोजपुरी फिल्मी यात्रा.

भोजपुरी की पहली फ़िल्म थी "गंगा मईया तोहे पियरी चढैबो"। यह अपने समय की सबसे चर्चित फ़िल्म थी। इस फ़िल्म के निर्माता बनारस के कुंदन कुमार थे,यद्यपि भोजपुरी फिल्मों का दर्शक वर्ग काफ़ी बड़ा था ,फ़िर भी उस अनुपात में इसकी फिल्में नही आयीं जो आनी चाहिए थी ।देखने वाली बात ये है कि ये दर्शक- वर्ग समुन्दर पार मॉरिसौस,फिजी ,सूरीनाम, अमेरिका ,हॉलैंड,नेपाल,अफ्रीकी देशों में बड़ी संख्या में था । अगर देश के भीतर की बात करें,तो दर्शक न केवल बिहार बल्कि उत्तर प्रदेश,वेस्ट बंगाल ,मध्य प्रदेश ,पंजाब ,हरियाणा,में भी था। बावजूद इसके भोजपुरी की दूसरी फ़िल्म एक लंबे अन्तराल के बाद "बिदेसिया"के रूप में आयी । इस फ़िल्म में सुजीत कुमार ,पद्मा खन्ना ने काम किया था । बाद में इस ओरथोडी तेज़ी आई और अगली फ़िल्म जल्दी ही परदे पर दिखी -"लागी छूटे नही राम "। दरअसल ये भोजपुरी का वोह दौर था,जब भोजपुरी फ़िल्म जगत ने करवटें लेनी शुरू कर दी थीऔर ये करवटें आगे आने वाले समय में भोजपुरी फिल्मों का नया व्याकरण लिखे वाली थी। कहना ना होगा ऐसा हुआ भी और १९७३-७४ में आई 'बलम परदेसिया 'ने आने वा

करवट फेरऽअ न बलमुआ तू..... (अ भोजपुरिया इफेक्ट)

जिन भोजपुरी गायकों और उनकी गायकी की चर्चा हमने पिछले ब्लॉग में की है, उनमे हम अपनी भोजपुरिया संस्कृति और समाज को देख सकते है। महेंद्र मिश्रा ,बालेश्वर यादव और शारदा सिन्हा तो इस देश की सीमाओं से भी आगे तक प्रसिद्धी पाए और सम्मानित गायक हैं। बहरहाल आज की चर्चा में हम हिन्दी सिनेमा पर भोजपुरिया प्रभाव के कुछेक अंश देखेंगे।भोजपुरी भाषा के प्रभाव क्षेत्र से हम सभी वाकिफ है । मगर शायद हम ये नही जानते किभोजपुरी भाषा के प्रभाव से हिन्दी फ़िल्म- जगत भी अछूता नही रहा । ऐसी कई हिन्दी फिल्में हैं,जिनके गीत भोजपुरी के अपने गीत है। '१९४८ कि फ़िल्म " एकलव्य" फ़िल्म का गीत :- -"काटे न कटे दिनवा हमार / गवनवा कब होई हमार" माना जाता है कि फिल्मों में भोजपुरी लाने वाले ' मोतीलाल उपाध्याय 'जी थे । उन्होंने 'किशोर साहू'के 'नदिया के पार 'में दो भोजपुरी गीत लिख कर इसकी शुरूआत कि थी - १-"कठवा के नैईया ,बनईहे रे मलहवा नदिया के पार ,दिहे रे उतार " २-"मोरे राजा हो ,ले चला अ नदिया के पार मोरी रानी हो ,तुम्ही मोरा प्राणाधार "-(सन्दर्भ -हिन्