5/30/09

राजनीतिक राम के बरक्स पारिवारिक राम की छवि -उत्तररामचरित


रा.ना.वि. के ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव के नाटकों पर लिखने की अगली कड़ी में आज भवभूति द्बारा रचित और प्रसन्ना द्बारा निर्देशित नाटक "उत्तररामचरित" के बारे में कुछ.
उत्तररामचरित का संस्कृत से हिंदी अनुवाद 'पंडित सत्यनारायण कविरत्न' ने किया है.कविरत्न जी ने भवभूति के तीनों नाटकों का हिंदी और ब्रज में मिला-जुला अनुवाद किया यानी गद्य को हिंदी में तो पद्य को ब्रज में.उनकी यह कुशलता नाटक के प्रदर्शन में काफी सहयोगी सिद्ध हुई भी है."उत्तररामचरित"भी एक तरह से रामलीला ही है.पारंपरिक रामलीला खासकर एक नैतिक नाटक है जिसमे बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाई जाती है.इस नाटक में कोई शैतान नहीं है कोई खल पात्र नहीं.अगर प्रसन्ना की माने तो-"यह नाटक आत्मसंघर्ष पर केन्द्रित है.इसमें अच्छा आदमी अपने अच्छे होने की कीमत अदा करता है-यंत्रणा के द्बारा."-इस नाटक पर कुछ और बात से पहले पाठकों को यह याद दिला दूं कि प्रसन्ना ने इस नाटक का मंचन/निर्देशन १९९१ में किया था,जब एक राजनीतिक दल ने सत्ता के लिए राम की आध्यात्मिक छवि का दुरूपयोग कर उसको राजनीतिक छवि सही कहा जाये तो 'साम्प्रदायिक'उग्र युवा प्रतीक के तौर पर प्रस्तुत किया था.यद्यपि भवभूति का राम विशुद्ध पारिवारिक व्यक्ति है.उसके परिवार में एक पत्नी,भाई ,सेवक इत्यादि हैं.भवभूति का राम युद्ध के बाद की परिस्थितयों से लड़ता है ,अपने-आप से लड़ता है और यह इतना ज़मीनी है इतना कोमल है कि पत्नी वियोग में लोट-लोट कर विलाप करता है और अपने निर्णय पर पश्चात्ताप करता है कि क्यों उसने गर्भवती पत्नी को लोकोपवाद के कारण कष्ट भोगने जंगल में भेज दिया.भगवा बिग्रेड कभी भी इस राम को जनता के सामने लाने का दुस्साहस नहीं कर सकता क्योंकि उनका गढा हुआ राम 'एंग्री यंगमैन' हैवह शक्ति के अपने ज़मीन की लड़ाई लड़ रहा है.
'दरसल राम की सार्वजनिक छवि उन्हें सीता त्याग को बाध्य करती है जो उनकी गर्भवती पत्नी है और उधर उनका निजी प्रेमी रूप इस वियोग से उत्पीडित होता है.इस तरह भवभूति नैतिक विडम्बना के भीतर से एक खूबसूरत प्रेमकहानी निकाल लाते है.उल्लेखनीय है कि अंत में सीता ही राम को पुनर्जीवन देती है.भवभूति ने यहाँ राम को नश्वर मनुष्यों की ही तरह प्रस्तुत किया है.अपने निजी जीवन की असहायता के कारण ही वे जनसाधारण को इतने प्रिय लगते हैं.'(प्रसन्ना)
भवभूति को कालिदास के समकक्ष का नाटककार माना जाता है.इस नाटक के रूप में उन्होंने एक विशिष्ट रचना दी है.नाटक के रूप में उत्तररामचरित में वो सारे गुण और लक्षण हैं जो एक सफल नाटक में होने चाहिए.इसमें प्रेम,दुःख,त्रासदी,संघर्ष और नियति के तथा जीवन के विविध रूपों के दर्शन होते हैं.नाट्य-समीक्षक रविन्द्र त्रिपाठी के शब्दों को उधार लेते हुए-"रा.ना.वि.रंगमंडल के कलाकारों ने इस नाटक को १९९२ तथा २००६ में खेला.इतने वर्ष पहले वह वक़्त था जब राम-मंदिर को लेकर देश भर में एक तनाव था...उस समय प्रसन्ना ने राजनीतिक राम की छवि के बरक्स आध्यात्मिक राम को स्थापित किया था.यह एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप था,लेकिन इस बार प्रसन्ना का यह नाटक राजनैतिक नहीं बल्कि नैतिकता की खोज और गृहस्थ जीवन के मूल्यों की स्थापना है."-इस नाटक में दो सिरे उभरते हैं-लोकोपवाद और उसके कारण सीता के परित्याग का दंश.इसी के बीच राम आत्मयंत्रणा में जीते हैं.तुलसी के राम जहां मर्यादा पुरुषोत्तम हैं वहीँ भवभूति के राम मनुष्य ,पति और पिता भी .इसमें राम का रूप अधिक मानवोचित है.इस नाटक की इसी विशिष्टता के कारण ही तो कहा गया है-"उत्तर रामचरिते भव्भूतिर्विशिष्यते".
सही मायनों में विवाह नैतिकता और प्रेम का यह नाटक हर दृष्टि से देखने योग्य है.रंगमंडल तो सदारमे है ही तिस पर प्रसन्ना का निर्देशन 'सोने पे सुहागा' हो गया है.प्रसन्ना ने यह नाटक अपने पुराने संगीत निर्देशक साथी जिन्होंने १९९१ में इस नाटक की संगीत-रचना की थी ,की स्मृति को समर्पित किया है.जिन किसी महाशय को यह चिंता हो कि बिना आधुनिक वाद्य या अत्याधिक प्रकाश के आयोजन अथवा चकाचौंध के बिना थिएटर संभव नहीं है उनके लिए उत्तररामचरित को सबक है.यह नाटक न्यूनतम में तैयार होकर अधिकतम की सीमा से आगे जाकर आपका मनोरंजन करता है. *****************************************************************************************
परिकल्पना और निर्देशन-प्रसन्ना सह-निर्देशक-सौउती चक्रवर्ती नाटककार-भवभूति अनुवाद-पंडित सत्यनारायण कविरत्न संगीत-डॉ.गोविन्द पाण्डेय नृत्य-संरचना-विद्या शिमलड़का प्रकाश-पराग सर्माह वस्त्र-सज्जा-अर्चना शास्त्री मंचन स्थल-सम्मुख सभागार (नाट्य महोत्सव की समय-सारणी पिछली पोस्ट से देखे.)

5/29/09

जहां मौत एक सहज कविता सरीखी है-राम नाम सत्य है



रेपर्टरी (एन एस डी)का यह नाटक "राम नाम सत्य है"-मूल रूप से मराठी नाटककार 'डॉ.चंद्रशेखर फनसलकर'का लिखा हुआ है.फनसलकर के नाटकों और विशेषकर एकांकियों पर लिखते हुए 'विजय तेंदुलकर' ने लिखा है-"उनके एक-अंकीय नाटकों में थिएटर की संभावनाओं और सीमाओं,दोनों के प्रति सजगता का पता चलता है.लेकिन उनमे व्यक्त होने के लिए और भी बहुत कुछ शेष रहता है.उनके भीतर एक प्रकार की बेचैनी.एक असंतोष और आक्रोश निहित है"-इस नाटक को फनसलकर जी ने मराठी में 'खेली-मेली' के नाम से लिखा है.जिसका अनुवाद इस नाटक के निर्देशक'चेतन दातार'ने ही किया है. यह नाटक जैसा कि खुद नाटककार का कहना है-प्यार,भाईचारे और थोड़े बहुत हौंसले से मनुष्य नर्क में भी जीवन को सहज बना सकता है और आगे बढ़ रहा है.यही मनुष्य के भीतर उम्मीद और आशा का संचार करता है,जबकि आज हमारे चारों और की जो मूल्यवान और अच्छी चीज़ें हैं वो या तो ढह रही हैं या मृतप्राय हो गयी हैं.यह नाटक मनुष्य की इसी 'कभी मृत न होने वाली'प्रवृति को पकड़ने का प्रयास है."-नाटक देखते हुए एपी फनसलकर की इस बात से सहमत हो सकते हैं.अथाह दुःख के बेला में भी दर्शक उस उदासी को सहज तौर पर समझ नहीं पाता और उसे इसकी वेदना और कसक का पता नाटक के अंत पर ध्यान देने पर चलता है.इस नाटक के किरदारों के एक एक कर मरने के साथ आप स्तब्ध होते हैं यह जानते हुए कि जिस रोग से ये ग्रसित(एड्स,कैंसर आदि)हैं उससे तो इन्हें मरना ही है पर कमाल ये है कि एक किरदार के मरने की खबर के साथ चंद पलों की खामोशी फिर वही जिंदगी जिंदादिली का नाम है मुर्दादिल क्या ख़ाक जिया करते हैं,के साथ कहानी आगे बढती है और दर्शक भी तुंरत सामान्य अवस्था में लौट आता है. निर्देशक चेतन दातार ने अपने निर्देशकीय में यह साफ कर दिया है कि-'यह नाटक मृत्यु के बारे में नहीं है/लेकिन/यह नाटक पूरी तरह जीवन के बारे में है ..../यह नाटक एड्स के बारे में नहीं है /लेकिन यह नाटक जीवन के बारे में है,जिसे हमारे बिछडे मित्रों की अनुपस्थिति के बावजूद पूरे जोश के साथ जिया जाता है./यह नाटक मुस्कानों,कहकहों और अपने प्रियजनों के साथ बिताये प्रसन्न क्षणों के बारे में है....यह पूरा नाटक वर्तमान और भविष्य ,दुःख और हंसी,कटु और नम्र का मिश्रण है./-'नाटककार का यह कथन पूरे नाटक के एक एक परत को खोल के सामने रख देता है और एक सहज सरल ढंग से इस नाटक को सामने रखता है. ध्यान देने वाली बात ये है कि एड्स का कथानक में एक किरदार जैसा ही महत्त्व होने के बावजूद दर्शक एक उम्दा नाटक देखते हैं ना कि स्वास्थ्य मंत्रालय का ,चलो कंडोम के साथ'का कैम्पेन .थोडी सी असावधानी से ऐसा हो सकने की पूरी संभावना थी.चेतन ने इस स्थिति को कुशलता से संभाला है.इस कोशिश में नाटक कई जगह धीमा पड़ता है पर फिर भी पूरे तौर पर इस नाटक का प्रभाव दर्शकों पर पड़ता है और वे इसका भरपूर आनंद उठाते हैं.एक और ख़ास बात -मैंने जब इस नाटक को देखा था (१२ दिसम्बर २००६)तब मुख्य पात्र गोपीनाथ मिरासे की भूमिका -टीकम जोशी (जवान गोपीनाथ)और अनूप त्रिवेदी(बीमार गोपीनाथ)ने निभाई थी और रंगमंडल को जानने वाले इस बात से इनकार नहीं करेंगे कि क्या किरदार निभाया होगा दोनों ने..इसी तरह एक पात्र है जो गोपीनाथ के हंसते खेलते समूह को नौटंकी मानता है वह किरदार है-समीप सिंह द्वारा अभिनीत दामू का इस पात्र के मरने का दृश्य आपको बरबस ही उदास कर देगा यही क्षण है नाटक में जब आप हंसते हंसते एकाएक सच्चाई के कड़वे पल का अनुभव करते हैं.यहाँ मौत एक सहज कविता बन जाती है. कुल मिलाकर रंगमंडल की एक और दमदार प्रस्तुति ( नाटककार-डॉ.चंद्रशेखर फनसलकर अनुवाद,डिजाईन और निर्देशन-चेतन दातार विडियो आर्ट और अनिमेशन-ज्ञान देव वस्त्र-सज्जा-कृति वी.शर्मा संगीत-भास्कर चंदावरकर )

( यह ४ साल पहले देखी इस प्रस्तुति की त्वरित प्रतिक्रिया है,आप इस नाटक के किरदारों दामू /गोपी नाथ मिराशे /नल्लु ब्रिस्टल -आपके साथ जुड़कर बाहर आते हैं - मुन्ना कुमार पाण्डेय )

5/28/09

लोकधर्मी शैली का सहज नाटक -"सदारमे"(रा.ना.वि.में)


नरहरी शास्त्री जैसे विख्यात और 'श्रीकृष्ण लीला ,कंसवध चरित्र,महात्मा कबीरदास,जालंधर,श्री कृष्णभूमि परिणय ,अदि पौराणिक नाटकों के लेखक की ही रचना है -'सदारमे'.जो आजकल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव में रंगमंडल द्वारा खेला जा रहा है.दरअसल यह नाटक कंपनी शैली का है,कहने का अर्थ यह है कि .नरहरी शास्त्री के अधिकाँश नाटकों का प्रदर्शन कर्नाटक की ऐतिहासिक ड्रामा कंपनी 'गुब्बी नाटक कंपनी'ने किया है और वे सभी प्रर्दशित नाटक पौराणिक कथाओं का आधार लिए हुए थे.कंपनी के आग्रह पर कि शास्त्री जी एक ऐसा नाटक लिखे जिसमे लोक-तत्वों की सादगी और खूबसूरती हो तब "सदारमे"लिखा गया.नरहरी शास्त्री जी ने इस नाटक की रचना कंपनी के आग्रह पर की. 'सदारमे का शाब्दिक अर्थ है-हमेशा सुंदर (सदा + रमे,सदा का अर्थ हमेशा और रमे संस्कृत शब्द के रम्य से बना है)लगभग एक सदी पूर्व लिखा गया नाटक नाट्यधर्मी नहीं बल्कि लोकधर्मी शैली में है.सीधी-सादी इस कहानी का उद्देश्य शुद्ध मनोरंजन करना है."-(ब्रोशर -सदारमे निर्देशकीय )दरअसल लोकधर्मी शैली के नाटकों का सबसे मज़बूत पक्ष उनका लोक-संगीत होता है.इस नाटक के कई गीत संवादात्मक तथा कई संवाद गीतात्मक हैं.निर्देशक का कौशल इस बात में दिखता है कि उन्होंने एक कर्नाटक शैली के संगीत को किस तरह से हिन्दुस्तानी संगीत के साथ प्रस्तुत किया है.हास्य-प्रधान घटनाओं का पुट लिए यह नाटक लगभग २ घंटे की अवधि का है. जैसा कि सभी जानते हैं कि मूल नाटक में २०० गाने हैं और यह पूरे रात चलता था.अतः ऐसे में नाटक को आज के सन्दर्भों में तैयार करना वाकई काबिले तारीफ़ है.पर कुछ बातें नाटक के प्रदर्शन की.नाटक का कथानक कुछ यूँ है - राजकुमार जयवीर की सांसारिक जीवन बिताने में कोई रूचि नहीं है.वो अपने पिता के राजगद्दी पर भी नहीं बैठना चाहता.वह दर्शनशास्त्र का अनुसरण करके ही काफी संतुष्ट है.राज उद्यान में उसकी मुलाक़ात एक माध्यमवर्गीय सुन्दर अबोध कन्या सदारमे से होती है,और सब कुछ बदल जाता है.,जयवीर के पिता उसकी शादी में बाधक सदरामे के पिता और भाई के तमाम शर्तें मान कर भी जयवीर और सदारमे की शादी करवा देते हैं.चूँकि सदारमे वणिक वर्ग से सम्बंधित है और उसके पिता और भाई नीचता की हद तक पतित हैं अतः सदारमे की परेशानियां शादी के साथ ही शुरू हो जाती है.अब जबकि नवदम्पति के पास सर छुपाने को जगह नहीं है ऐसे में परेशानियां आरम्भ होती हैं.सदारमे इस चुनौती को स्वीकार करती है और जीवन की हर बाधा को बुद्धिमता पूर्वक हल करती है और नाटक मंगल अंत को पाटा है. यह नाटक सहज तौर पर ही रखा गया होता तो भी इसका प्रभाव कमतर नहीं होता ,बावजूद इसके निर्देशक ने कई प्रसंग अनावश्यक डाल दिए है जैसे शराबी मुनादी वाले का प्रसंग.और कई हास्य प्रसंग अधिक लम्बे हो जाने के कारण भी उबाऊ लगने लगते हैं .तिस पर रेपर्टरी के कलाकारों के काम की दाद देनी होगी कि उन्होंने अपने काम से निराश नहीं किया है ..अमित पाठक ,दक्षा शर्मा ,निधि मिश्रा,मोहम्मद अब्दुल कादिर शाह और समीप सिंह ने हमेशा की तरह बढ़िया काम किया है.इन सबके बीच जो दो आर्टिस्ट तेजी से अपनी पहचान बनाते जा रहे हैं उनमे 'जोय मिताई'और सविता कुंद्रा का नाम उल्लेखनीय है.अन्त्य सोनी, बरंती सोनी के किरदार में अनूप त्रिवेदी और संजय मापारे फिट है . कुल मिलाकर रंगमंडल के नाटकों के शौकीनों के लिए यह नयी प्रस्तुति बहुत उम्मीदों वाली नहीं है ,रंगमंडल के कई उम्दा प्रदर्शनों के बीच यह नाटक उन्नीस ही है बीस नहीं. ******************************************* डिजाइन एंड डाईरेक्शन-बी.जयश्री हिंदी अनुवाद-शैलजा राय सेट डिजाइन-एम.एस .सथ्यु लाईट डिजाइन-अशोक सागर भगत संगीत-अंजना पूरी वस्त्र-सज्जा-मीता मिश्रा स्थल -अभिमंच (रा.ना.वि.के ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव की समय सारणी पिछले पोस्ट में जारी है)

5/27/09

आचार्य तार्तूफ़.. रा.ना.वि.रंगमंडल की उम्दा प्रस्तुति.


'आचार्य तार्तूफ़'मशहूर फ्रांसीसी नाटककार 'मौलियर' के विख्यात हास्य चरित्र 'तार्तूफ़'का आचार्य तार्तूफ़ के रूप में भारतीय अवतरण है.सत्रहवी शताब्दी के इस नाटक को वर्तमान समय से जिस तरह से जोड़ा गया है वह वाकई कमाल का है और इसका श्रेय भी सबसे अधिक इसके निर्देशक 'प्रसन्ना'को जाता है.
इसकी कथा का सार-संक्षेप यूँ है कि ओमनाथ नाम का बनिया जो मूलतः दिल्ली का रहने वाला है लेकिन आध्यात्मिक खोज के लिए पोंडिचेरी जाता है,जहां उसकी मुलाक़ात एक अर्ध फ्रांसीसी भारतीय खस्ताहाल शख्स से होती है.यह शख्स अपने को तार्तूफ़ का वंशज बताता है मगर असल में वह एक असफल अभिनेता है.एक टेलीविजन धारावाहिक के निर्माण के दौरान उसने संस्कृत के कुछ श्लोक याद कर लिए थे.वह अपनी खस्ताहाली से निकलने की जुगत में है.पोंडिचेरी समुद्री तट पर आचार्य तार्तूफ़ ओमनाथ को अपनी जाल में फंसा लेता है और ओमनाथ को लगता है कि एक आध्यात्मिक गुरु पाने की उसकी कोशिश पूरी हुई.
मोलिअर का तार्तूफ़ सिर्फ पाखंडी है.उसका यह भारतीय अवतार आचार्य तार्तूफ़ वह आधुनिक हिन्दू स्वामी या महाराज है जो करतबबाज भगवान् सरीखा बन चुका है.सत्रहवी शताब्दी के यूरोप में उभरे मध्यवर्ग ने तार्तूफ़ के उदय की पृष्ठभूमि बनायीं थी तो.उसका 'एक में दो'यानी 'टू इन वन'भारतीय संस्करण पुराने पड़ गए सांस्कृतिक मूल्यों और आधुनिक व्यापारिक वर्ग की आक्रामकता से जन्मा है.आज भारत में जो अर्थव्यवस्था उभर रही है उसमे आचार्य तार्तूफ़ जैसे स्वामी सहज रूप से पैदा होते हैं.

यह सच है कि प्राचीन काल से ही भारत में ऐसे धर्मगुरु होते हैं जिन्होंने देश के बाहर ही भारतीय आध्यात्म का निर्यात किया.लेकिन इस नाटक का आचार्य तार्तूफ़ इक्कीसवी सदी के भारत का वह स्वामी है जो बुद्ध ,कबीर या सूरदास जैसे आध्यात्मिक पुरुषों का विलोम है.इक्कीसवी सदी का यह स्वामी आस्था को फ़िल्मी गाना बना देने वाला सफल व्यापारी है.
आस्था का दुरूपयोग इस नाटक का एक विषय है,जो दूसरा है अभिनेता की प्रदर्शन क्षमता का बेजा इस्तेमाल.नाटक यह सवाल उठाता है कि एक अभिनेता और स्वामी में क्या फर्क है?दोनों अभिनय करते हैं.दोनों ही टेलीविजन ,अखबार और तरह-तरह के विज्ञापनों से अपना प्रचार कराते हैं.दोनों पैसा.राजनैतिक सत्ता और शोहरत चाहते हैं.फिर भी एक फर्क है.रंगमंच का कलाकार इमानदार है.वह कभी अपने किरदार को वास्तविक नहीं मानता.लेकिन आज का धर्मगुरु या स्वामी अपने को आस्था का मूर्तिमान रूप मानता है.
यदि आज के स्वामी सच्चे हैं तो मध्यकाल के भक्त क्या थे?सच्चा संत कभी अपने को साबित करने के लिए करतब नहीं दिखाता.न तो ईसा ने ऐसा किया न हज़रात मोहम्मद साहब ने.सूरदास सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं रूपकात्मक रूप से भी अंधे थे.महर्षि रमण कभी अपने छोटे से कस्बे तिरुअन्नामलाई से बाहर नहीं निकले.रामकृष्ण सिर्फ एक पुजारी रहे.ये सभी सादा जीवन जीते और वन कुसुम जैसे बने रहे.आज के अति-उत्साही स्वामियों की बाजीगरी ,उनकी प्रवचन शैली और चेले बनाने में उनकी कलाकारी की तुलना सादा जीवन जीने वाले संतों से की जानी चाहिए,तब दोनों में अंतर दिखेगा और हमारे आँखों पर उनके द्वारा या खुद के द्बारा चढाया गया पर्दा हटेगा.
प्रसन्ना ने अपने निर्देशकीय नोट में आगे लिखा है-'रंगमंच अपने उत्कृष्ट रूप में हमेशा सादा और सरल होता है.इस नाटक की प्रस्तुति में हमने सादगी के सिद्धांत का पालन किया है.हमने रंगमंडल के प्रचुर भण्डार का पुनः उपयोग किया है.सिर्फ वस्त्र-सज्जा और मंच सामग्रियों जैसी भौतिक चीजों का ही नहीं बल्कि मुहावरों ,कहानियों,हाज़िरजवाबियों और धुनों का भी.'-कुल मिलाकर यह हास्य नाटक आपको विशुद्ध मनोरंजन देगा ..
(इस नाटक की समय सारणी के लिए पिछली पोस्ट देखे.)-
 
आलेख,परिकल्पना एवं निर्देशन -"प्रसन्ना " संगीत-काजल घोष प्रकाश-परिकल्पना-पराग सर्माह नृत्य संरचना-निधि मिश्रा *(साभार-ब्रोशर 'आचार्य तार्तूफ़")

5/26/09

रा.ना.वि.में "ग्रीष्मकालीन नाट्य समारोह २१ मई से १७ जून तक..

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल प्रत्येक वर्ष की तरह इस बार भी हमारी गर्मियों को बेहतरीन बनाने के लिए अपने बेहतरीन नौ नाटकों के साथ फिर उपस्थित है.पेश है आपकी सुविधा हेतु समय-सारणी और अन्य विवरण -
====================================================================
२१ मई /७:०० बजे -"सदारमे"       निर्दे.-बी.जयश्री (अवधि-१घ.५० मिं.)हिंदी ---अभिमंच सभागार 
२२ मई /७:०० बजे - "सदारमे"------------------'वही-------------------------------------------------
२३ मई /३:३० बजे और ७:०० बजे- "सदारमे"------------वही----------------------------------------
२४ मई /३:३० और ७:०० बजे -"सदारमे"----------------------वही------------------------------------
 =====================================================================
२५-२६-और २७ मई /७:०० बजे -"उत्तररामचरित",  निर्दे.-प्रसन्ना (अवधि-२ घंटे)हिंदी--सम्मुख सभागार 

=====================================================================
२८-२९ मई  /७:०० बजे- "जात ही पूछो साधु की"-    निर्दे.-राजिंदर नाथ (अवधि-१घ.५० मिं.)हिंदी,-कमानी सभागार 
३० मई /३:३० और ७:०० बजे -जात ही पूछो साधु की"----------------वही------------------------------------

======================================================================
३१ मई /३:३० और ७:०० बजे -"आचार्य तार्तूफ़"    निर्दे.-प्रसन्ना (अवधि-१घ.५० मिं.)हिंदी-  सम्मुख सभागार 
==========================================================================
१ जून और २ जून /७:०० बजे- "सदारमे"   निर्दे.-बी.जयश्री   (अवधि-१घ.५० मिं.)हिंदी    कमानी सभागार 
==========================================================================
३ और ४ जून /७:०० बजे - "मैं इस्तांबूल हूँ"    निर्दे.-मोहन महर्षि   (अवधि-२घ.१५ मिं.)हिंदी कमानी सभागार 
==========================================================================
५ जून ७:००बजे- "घासीराम कोतवाल"   निर्दे.-राजिंदर नाथ (अवधि-२घ.)हिंदी  कमानी सभागार 
६ जून ३:३० और ७:०० बजे -"घासीराम कोतवाल"---------------वही----------------------------------------

===========================================================================
७ और ८ जून /७:०० बजे - "१८५७ एक सफरनामा" निर्दे.-नादिरा ज़हीर बब्बर (अवधि-२घ.२० मिं.)हिंदी   कमानी 

=============================================================================
९,/१० और ११ जून /७:०० बजे -"राम नाम सत्य है"    निर्दे.-चेतन दातार (अवधि-१घ.५०मिन्त )हिंदी    श्रीराम सेंटर 
==============================================================================

१२ जून /७:०० बजे- "उत्तररामचरित"   निर्दे.-प्रसन्ना  (अवधि-२घ.)हिंदी   सम्मुख सभागार 
१३ जून /३:३० और ७:०० बजे -"उत्तररामचरित"-----------वही-------------------------------

==============================================================================
१४ जून /३:३० बजे और ७:०० बजे -"काफ्का-एक अध्याय"   निर्दे.-सुरेश शर्मा (अवधि-१घ.२७मिन.)हिंदी सम्मुख सभागार 
१५ जून /७:०० बजे-"काफ्का-एक अध्याय"-------------वही-------------------------------------------------

=============================================================================
१६ और १७ जून /७:००बजे -"आचार्य तार्तूफ़"   निर्दे.-प्रसन्ना  (अवधि-१घ.५० मिं.)हिंदी    सम्मुख सभागार 

=============================================================================
(*****कार्यक्रम के समय और नाटकों के प्रदर्शन में फेरबदल संभव है..)
इन बेहतरीन नाटकों के साथ गर्मियों को ठंडक दीजिये..)

5/8/09

'मेरी स्वाभाविकता'-(रत्नेश विष्वक्सेन की कविता)

रत्नेश विष्वक्सेन रांची कालेज (रांची)में हिंदी के लेक्चरार हैं.अपने आसपास और खुद पर बीतती चीज़ों के ऊपर नितांत निजी तौर पर उन्होंने बहुत कुछ लिखा है,वे अपनी लिखनी खासकर कविता के क्षेत्र में अपने तक ही तब रखा करते थे(मैं उनके स्नातक के दिनों की बात कर रहा हूँ)अब तो खैर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख छपते रहते हैं.प्रस्तुत है आपके लिए उनके निजी क्षणों का एक दृश्य:-
सांस की रफ़्तार /जैसे मीलों की थकान पीकर मंद हो गयी है/
बरौनियों में कुछ मलिनता/जो तय करती है अक्सर /
मेरी उदासी को.
कभी-कभी घबरा जाता हूँ,/घिग्गियों और धमकियों के बीच
,अपनी मनुष्यता से एक प्रश्न करता हूँ-उसके होने को लेकर.
नहीं बहा पाता हूँ हिचकियों में- तो कभी भरा हुआ हूँ ,हुआ ही रहकर/
काम लेता हूँ.
दर्द जैसे किसी चीज़ को ,
जो उलाहनों के बीच अटकी होकर भी,थाम लेती है मुझे/
कड़वाहट से भर उठता हूँऔर अफ़सोस के कुछ निशब्द नगमें ,
अव्यक्त पलकों को वजनी करने लगते हैं.
जब होता हूँ चिंतनशील अपराधी की तरह /
अपने सवालों के कटघरों में अनुत्तरित ,
तबलगता है कि
अपने जीवन के बाईसवें अध्याय में अब ढोंग नहीं कर पाता .
मैंने वर्ष नहीं अनुभव बिताये हैं
प्रत्येक पल की मिठास और चुभन को झुलसकर जिया है.
एक इमानदार कोशिश लगातार करता हूँ.,
जैसे जीने के लिए ,हर बार मरता हूँ.
हर रात सोने के पहले /सिरहानों के नीचे दर्द को,सहलाने के बाद/
मुझे अनुत्तरित होना पड़ता है.
हारना कोई नहीं चाहता ,मैं भी नहीं
पर जीतने के लिए ,उन्हें हराना होगा,
जिन्ही से सीखी हैं जिंदगी की बातें
तो भीतर हाहाकार उठता है.तब डर लगता है,
तब दुःख होता है.जब देखता हूँ
एक रात और बीत गयी एक दिन और जा रहा है
बहती नदी को देखकर मुग्ध होता हूँ.
हवाओं से हिलती फुनगियों पर प्रसन्न होता हूँ
पर हर रात जब,बिस्तर पर अपने सवालों सेघिरता हूँ/
तो मैं इस अनिर्णय पर /
रोता हूँ और मान लेता हूँ
मैं "स्वाभाविक" हूँ....

(यह कविता हिन्दू कालेज होस्टल में रत्नेश जी द्वारा उनके सेकंड इयर में लिखी गयी थी...उनकी पुरानी डायरी से मिली है.कविता का शीर्षक है-"मेरी स्वाभाविकता")

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...