12/7/08

सरहद पार मर रहा है संगीत ...

आज सुबह के अखबार में पढने को मिला ,कि'पाकिस्तानी अधिकारियों ने मशहूर और हर दिल अज़ीज़ ग़ज़ल गायक ज़नाब गुलाम अली साहब को इंडिया आने से रोक दिया है'-इस ख़बर से जितना झटका मुझे लगा उससे अधिक गुलाम अली साहब की बात दिल को चीर गई-'मैं सदमे की हालत में हूँ,मुझे रोका गया है ,हालात ठीक नहीं हैं'-अब तक आतंकी चाहे कितनी भी घटनाओं को अंजाम देते रहे हों पर संगीत को दोनों मुल्कों में नफरत की खाई को पाटने वाली कड़ी माना जाता रहा .और चाहे गुलाम अली साहब हों .नूरजहाँ बेगम,नुसरत साहब,मुन्नी बेगम ,फरीदा खानम जी ,लता जी,रफी-मुकेश-किशोर,आशा जी -ये किसी मुल्क की ख़ास अपनी बपौती नहीं हैं .इनके चाहने वाले पूरी दुनिया में फैले हुए हैं.फ़िर ये कौन-सी मानसिकता के लोग हैं जो ऐसा कर रहे हैं.पाकिस्तानी सरकार सिर्फ़ ये कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकती कि कट्टरपंथियों का काम है ..क्योंकि इस बार मामला ख़ुद सरकार के शर्मनाक कदम का है...गुलाम अली साहब को ऐसी कैद में डालना उनके साथ बेहद ना-इंसाफी ही नहीं बल्कि एक कलाकार को मार देने जैसा है.ये बहुत बुरा दौर है ..वाकई.
पाकिस्तानी स्कोलार्स और इंटेलेक्चुअल्स कहाँ सोये हुए हैं?

11/20/08

मिस्टिक हिमालय में "चोपता"की चांदनी रात ...



गढ़वाल वैसे तो अनेकानेक सुंदर-सुंदर जगहों से भरा पड़ा है। पर हम जिस जगह की बात कर रहे हैं वह चोपता है। चोपता गोपेश्वर से ३८ किलोमीटर की दूरी पर केदारनाथ वन्य -जीव प्रभाग के मध्य स्थित एक छोटी किंतु बेहद ही खूबसूरत जगह है। यहाँ पहुँचने के दो रास्ते हैं-पहला जो अधिक आसान और सीधा है वह गोपेश्वर ,मंडल होकर तथा दूसरा उखीमठ होकर। उखीमठ केदारनाथ बाबा की शारदीय पीठ है। चोपता को गढ़वाल का चेरापूंजी कहा जाता है ।कारण यहाँ बदल कभी भी आकर आपके ऊपर हलकी-तेज़ फुहार छोड़ जाते हैं।जैसे ही आप गोपेश्वर की तरफ़ से आते हैं और जब माईल स्टोन यहाँ शो करता है किचोपता १ किलोमीटर तभी आप अपने पैर अपनी गाड़ी के ब्रेक पर तेज़ी से लगाने को मजबूर हो जाते हैं। ना ना ..बात ज्यादा खतरे की नहीं है। दरअसल ,इस तीखे मोड़ से मुड़ते ही चोपता अपनी सारी खूबसुरती आपके आंखों में भर देता है,और आप फटी-फटी आंखों और खुले मुहँ से इस दृश्य और वहाँ पसरी अलौकिक शान्ति को बस देखते ही रह जाते हैं।

सामने दूर-दूर तक फैला विराट दुधिया हिमालय अपनी मौन तपस्या करता जान पड़ता है,आप बस इस दृश्य को पूरा जी लेना चाहते है। एक सलाह है ,जहाँ तक सम्भव हो ,कैमरे की क्लिक के बजाये दिल के कैमरे में इसे पहले क्लिक करें फ़िर कहीं और। क्योंकि ,चोपता मन नहीं भरने देता हाँ आपकी छुट्टियां ही कम पड़ जाती हैं। यहाँ जगह अपने दूर दूर तक फैले हरे-हरे बुग्यालों के लिए मशहूर है(बुग्याल-हरे घास के वो मैदान जो उंचाई पर बर्फीली चोटियों से लगे हुए हैं)। चोपता से ४ किलोमीटर ऊपर पंचकेदारों में से सबसे उंचाई पर स्थित तुंगनाथ का मन्दिर है। यहाँ तक जाने के लिए बढ़िया ट्रेल पी.डबल्यू.डी.के सौजन्य से बनी हुई है। चोपता आपको आम हिल स्टेशनों से अलग इस कारण भी लगेगा क्योंकि यहाँ टूरिस्टों के लंड-चौडे जत्थे उनका कूड़ा-कचरा ,पोलीथिन के ढेर नहीं दीखते और एक बात कि यहाँ आज भी दूकान वाला गैस की बजाय लकड़ी पर ही खाना बना कर देता है,वो भी लोकल सब्जियों के साथ। चूँकि यहाँ सालो भर बेहद ठंडा वातावरण होता है तो आप यहाँ के होटलों में मडुवे की रोटी और लहसन की चटनी की मांग कीजिये (जो सामान्तया मिल जाती है) ।

अब,इस जगह के बारे में कुछ बेहद जरुरी। यह क्षेत्र सघन वन क्षेत्र है अतः रात-विरातदेख भाल कर निकलिए । चोपता में जगह से लगभग ५०० मीटर की दूरी पर एक ऊँचा टावर जंगलात विभाग ने बना रखा है,आप यहाँ से रात में दुर्लभ और लगभग गुम हो चुके जानवरों की प्रजातियाँ देख सकते हैं,जैसे कि 'कस्तूरी मृग और हिमालयन रीछ बाघ इत्यादि पर इसके लिए चांदनी रात का होना जरुरी है। चोपता की चांदनी रात बेहद खूद्सुरत होती है..शब्दों में बयान करना मुश्किल है क्योंकि यहाँ जब चांदनी हिम शिखरों पर पड़ती है तब दिमाग बंद हो जाता है और दिल धड़कना भूल जाता है। वैसे चोपता एक बेस कैम्प की तरह यूज कीजिये क्योंकि मैं जिस चांदनी की बात कर रहा हूँ वह केवल शरद पूर्णिमा के चाँद की है। इस समय यहाँ का सारा इलाका बर्फ की सफ़ेद चादर ओढ़ लेता है और जब बर्फ की इन चादरों पे चांदनी पसरती है..जी चाहता है कि बस सारी कायनात यही रुक जाए । वैसे भी इस पूर्णिमा में चाँद का दीदार चोपता के ऊपर लगभग ४२०० मी.पर स्थित चंद्रशिला से करना अधिक ठीक होता है जो तुंगनाथ मन्दिर से सीधी १ किलोमीटर की चढाई पर है। एक रात यहाँ बिता लेने का दम सभी के बूते के बाहर की चीज़ है। और यह शौक अच्छी तैयारी और साजो-सामान की मांग करता है। इस मौसम में जबकि ऊपर कुछ भी नहीं मिलता खाने और गाईड के बगैर जाना जान-जोखिम में डालना है। इस मौसम में कई ट्रैकर्स गोपेश्वर से लगभग २३ किलोमीटर की ट्रेकिंग करके सीधे तुंगनाथ मन्दिर के सामने पहनते हैं। मन्दिर के कपाट शीतकाल के लिए पहले ही बंद कर दिए जाते हैं,और आपके पास इस चांदनी रात में चाँद को निहारने का सुख पाने के लिए अपने साथ लाये टेंट या फ़िर मन्दिर के पीछे बनी एक छतरी के इर्द-गिर्द अपने को पूरी तरह बंद और गर्म हैवी वूलेन पर ही निर्भर रहना पड़ता है। पर यह पूरी रात एक ऐसी याद दिल में छोड़ जाती है जिसे ना आप भूल पाते हैं ना ये ख़ुद को आपको भूलने देती है।

अगले दिन चाँद की पहाडी यानी चंद्रशिला से सूर्योदय देखिये। यह रात से कम किसी भी सूरत में नहीं होती। सूर्य की पहली किरण जब सामने दूर-दूर तक पसरे चौखम्बा ,गंगोत्री,केदार डोम,सतोपंथ नंदा घुंटी शिखरों पर पड़ती है तो लगता है जैसे इन शिखरों ने स्वर्ण मुकुट धारण कर लिया है और सूर्य अपनी स्वर्ण-रश्मियों से इनका अभिषेक कर दिया है...पर जल्दी कीजिये यहाँ बादल शीघ्र घिर आते हैं ...

फ़िर सोचना क्या है ..हो आइये एक बार चोपता ..फ़िर बताइए मुसाफिर ने कैसी कही?

बस यही ऋषिकेश से एन.एच.५८ के साथ-साथ देवप्रयाग,नन्द प्रयाग,रुद्र प्रयाग चमोली गोपेश्वर होते हुए मंडल के रास्ते "चोपता".और क्या ...

11/18/08

मेरे शहर की पहचान बनाते सिनेमाघर...


एक कविता कभी पढ़ी थी,शायद फर्स्ट इयर में,उसकी पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार थी-

"अपने शहर में हम

अपने घर में रहते हैं,

दूसरेशहर में हमारा घर

हमारे भीतर ......."


सम्भव हैं,किआप सब में से कई इस बात ,इस लाइन से सहमत होंगे। घर से बाहर जाते हम सभी अपने साथ उस घर,गाँव ,कस्बे ,मुहल्ले, और उस शहर से जुड़े कुछ पक्के पहचानों को हम अपने साथ दूसरे शहर में भी लेकर चले आते हैं। हम शायद इस बात पर ध्यान ना देते हों पर यह सही हैं कि कुछ समय बीतने के बाद जब हम अपने शहर वापस लौटते हैं,तब हमारी आँखें अपने लगातार बदल रहे शहर के बीच अपनी उन्ही पुरानी पहचानों को ढूंढती हैं। कुछ चीज़ें बदलती हुई अच्छी लगती हैं कुछ एक टीस सी पैदा करती हैं।

सिनेमा हॉल मेरे शहर की भीड़ और आबादी के बीच एक सांस्कृतिक अड्डेबाजी का मंच देते थे।मेरे छोटे से शहर गोपालगंज में कुल-जमा पाँच छविगृह हैं। इनके नाम हैं(वरीयता क्रमानुसार -जनता सिनेमा,श्याम चित्र मन्दिर,कृष्णा टाकिज, चंद्रा सिनेमा,सरस्वती चित्र मन्दिर,और राजू मिनी टाकिज। इन सभी सिनेमा घरों में आर्किटेक्चर के लिहाज़ से कोई ख़ास फर्क तो नहीं हैं पर हाँ...इनके फ़िल्म प्रदर्शन और प्रदर्शन हेतु फ़िल्म चयन का तरीका इनकी अलग-अलग खासियत बता देता हैं।

चूँकि,मेरा शहर भोजपुरी प्रान्त का शहर हैं,तो दर्शकिया मिजाज़ फिल्मों से अधिक प्रभावित हो जाता दीखता हैं। आजकल 'निरहुआ'(भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार )ने बिहारी होने का गौरव-भाव सभी में जगह रखा हैं। (इसमे राज ठाकरे से ज्यादा चंद्रा सिनेमा में लगे दिनेश लाल यादव'निरहुआ'का हाथ हैं जिसमे वह बिहारी गौरव /अस्मिता के लिए लड़ता दिखाया गया हैं। )

जनता सिनेमा (सिनेमा रोड)

जनता सिनेमा गोपालगंज शहर के डिस्ट्रिक बनने के पहले से मौजूद हैं। अभी कुछ साल पहले इसका जीर्णोधार हुआ हैं। यह टाकिज १९५८ में बना और हाल ही में इसने अपने सफलता की पचासवीं वर्षगाँठ मनाई हैं और इसके उपलक्ष्य में भोजपुरी फ़िल्म 'दूल्हा अलबेला' का आल इंडिया प्रीमियर किया गया। जनता सिनेमा is लिहाज़ से इसका शहर के लोगों में अपना रसूख बनाया हुआ हैं क्योंकि यहाँ सदा पारिवारिक फिल्में ही लगती हैं। और फैमिली वालों को यहाँ फ़िल्म देखने आने में कोई अटपटा भी नहीं लगता। एक ख़ास बात और,गोपालगंज के सभी सिनेमाघरों में फ़िल्म शुरू होने के पहले कोई गीत हाल के बाहर लगे चोंगे (माने लाउड स्पीकर)पर अपना ख़ास गीत बजाते रहते हैं ,जनता सिनेमा का पेट गीत है - 'पैसा फेंको तमाशा देखो'

श्याम चित्र मन्दिर

इस हाल के बारे में मैं अपनी एक पोस्ट में विस्तार से लिख चुका हूँ ,जो अब 'चवन्नी छाप ब्लॉग' पर प्रकाशित हैं। यह सिनेमा हाल भी काफ़ी पुराना हैं और स्कूल्स के पास होने की वजह से भी काफ़ी मशहूर हैं,मेरे दी के करीब तो खैर हैं ही। इस हाल का अपना गीत हैं -'ई हैं बंबई नगरिया तू देख बबुआ'। इन सिनेमा घरों में इन गानों के बजने के साथ ही पब्लिक को पता लग जाता था कि अब टिकट कटनेके लिए काउंटर खुल गया हैं।इसमे भी अपेक्षाकृत पारिवारिक फिल्में लगती रही हैं और अब तो नई रीलिज़ भी आने लगी हैं। एक ख़ास बात और,कि सिर्फ़ यही एक हाल हैं जो यहाँ हॉलीवुड के डब फिल्मों और चर्चित हिन्दी फिल्मों को अपने यहाँ दिखाता हैं।

कृष्णा टाकिज (हजियापुर मोड़ )

पुरानेपन में यह हाल तीसरे नंबर पर हैं। इसके काउंटर खुलने की घोषणा 'मुकद्दर का सिकंदर' के गाने "रोते हुए आते हैं सब ,हँसता हुआ जो जाएगा..."। इस सिनेमा हाल के शहर से थोड़ा-सा बहार होने की वजह से परिवार वाले दर्शक तो कम पर गाँव से शहर आकर फ़िल्म देखने वालों और पास ही स्थित भी.एम्.इंटर कॉलेज के छात्रों की संख्या अधिक हैं। यह टाकिज सी-ग्रेड और हिंसक फार्मूला /हारर फिल्मों को अपना परदा प्रोवाईड करता हैं। आर्किटेक्चर और सीट कैपेसिटी के लिहाज़ से शहर का बढ़िया और सुंदर हॉल। ऐसी (सी-ग्रेड)फिल्मों का में अड्डा होने के बावजूद जब यहाँ 'नदिया के पार 'लगी थी तो पूरे ढाई महीने चली थी।

चंद्रा सिनेमा (बंजारी मोड़)

चंद्रा अपेक्षाकृत नया हॉल हैं और स्कूल के दिनों में हमने टैक्स फ्री प्रदर्शन होने की वजह से यहाँ पुरानी फिल्में खूब देखी हैं।यह शहर के बाहर स्थित हैं ,नेशनल हाईवे के किनारे इसलिए यहाँ पारिवारिक दर्शक ना के बराबर आते हैं। हाँ..शहर में बने और सिनेमाघरों से इसका साउंड सिस्टम सबसे बढ़िया हैं।हॉल के बिल्डिंग पर मत जाईयेगा ..ऊपर से यह आलू का गोदाम लगता हैं। पर नई-नई फिल्मों को लगाने की वजह से लोग इसका रुख करते हैं। 'तोहफा'फ़िल्म याद हैं ?जीतेन्द्र वाली ?जी हाँ..उसी का गाना 'प्यार का तोहफा ....लाया लाया लाया'-इसकी पहचान बनाता हैं।

सरस्वती चित्र मन्दिर (यादवपुर रोड)

इस सिनेमा हॉल में छोटे शहर के लिहाज़ से थोडी अधिक सुविधाएं मुहैया हैं। इसके मालिक बिहार राज्य के शिक्षा जगत में बड़े अधिकारी पोस्ट से सेवानिवृत हुए हैं और तब यह हॉल बनाया हैं। इस सिनेमा हॉल का दुखद पहलु यह हैं कि यहाँ साउथ की डब फिल्में ही अधिक लगती हैं या फ़िर पुरानी भोजपुरी फिल्में । स्टाफ के लिहाज़ से यह खाराब हॉल हैं पर सुविधाओं के लिहाज़ से अच्छा । इसका कोई ख़ास गीत नहीं हैं ,पर अधिकाँश यहाँ मिथुन के '''शिकारी"फिल्म का गाना'तू मेरा हाथी ,मैं तेरा साथी ही बजता हैं"। इस हॉल के पास जमीन भी काफ़ी हैं ,अपनी तमाम खूबियों के बावजूद अच्छे मैनेजमेंट की डिमांड करता हैं।

राजू मिनी टाकिज (पुरानीचौक)

इस हॉल के क्या कहने बस इतना जानिए कि यह अकेला ऐसा हॉल हैं जो ३५ एम्.एम् के परदे और पुराने प्रोजेक्शन मशीन से चलता हैं और इसकी बैठने की क्षमता भी १००-१२५ की हैं। यह पहले विडियो हॉल हुआ करता था और अब एक छोटा सा हॉल हैं। ख़ास बात -"अपने गुणों और फ़िल्म प्रदर्शनों के लिहाज़ से दिल्ली के कश्मीरी गेट पर स्थित'रिट्ज़'सिनेमा का छोटा भाई हैं। एक प्रबंधक,एक टिकट क्लर्क ,तीन गेटकीपरों के हवाले हैं -राजू मिनी टाकिज। और दर्शक ..(अंधेरे में ज्यादा आते हैं जनाब...)


गोपालगंज शहर का एक अपना तेवर हैं सिनेमा को लेकर । यहाँ कब कौन सी फ़िल्म पिट जाए या फ़िर कब कौन सी हिट हो जाए कहना मुश्किल हैं। सत्या, दिल चाहता हैं, जैसी फिल्में दो-एक दिनों में उतर गई थी। अब तो भोजपुरिया रंग चंहु और बिखरा पड़ा हैं .......

11/16/08

भगवान् बचाए इन चाटों से....(कैंटीन ओनर्स वाले )

अब विभागों में मिड-टर्म परीक्षाओं की घंटियाँ लगभग बज चुकी हैं या फ़िर बजने ही वाली है.ऐसे में अब तक कैंटीन ओनर्स करने वाले (वैसे छात्र जो घर से अपना बोरा-बस्ता लेकर आते तो हैं कॉलेज पर सारा दिन कॉलेज कैंटीन में गप्पे और पता नहीं क्या-क्या हांकते रहते है)छात्रों ने अपनी परीक्षा पास करने की मुहीम तेज़ कर दी है.ऐसे होनहार बिरवानों के कारण कुछ तो छुटभैये सीनियर बड़े खुश होते हैं ,तो कुछ की वाकई शामत आ जाती है.छुटभैये किस्म के सीनियर इन होनहारों के लिए तत्काल कोटा के समान होते हैं या फ़िर रिजर्वेशन अगेंस्ट कैंसिलेशन के जैसे.दरअसल ,इन कैंटीन ओनर्स वाले जूनियर मित्रों/साथियों के इर्द-गिर्द काफ़ी ऐसी बालिकाएं भी साथ देती रहती हैं जो इनके द्बारा बताये गए (माने फेंके गए गप्पों)बातों की खासी मुरीद/फैन होती हैं और इसी मौके पर इस अभियान में जोर-शोर से उनका साथ देती है ,जिस मिशन का नाम होता है-सीनियर पकडो-नोट्स टेपों.छुटभैये सीनियर को तो बस इसी मौके का इंतज़ार होता है और यही सही मौका भी क्योंकि जिस डिपार्टमेन्ट ने उन्हें नाकारा करार देकर इस वर्ष एडमिशन नहीं दिया होता है,तो ये अपने जूनियर्स को बताते है कि 'फलां टीचर नहीं चाहता था कि मैं यहाँ आऊं क्योंकि उसकी पोल-पट्टी खुल जाती या फ़िर ये कि मैं उसकी चाटता नहीं न भाई इस करान आज बाहर हूँ खैर तुम मेरे नोट्स लो और देखो कि कहाँ -कहाँ से रेफरेंस जुटाए हैं मैंने (मतलब किन-किन बुक्स से टीपी है)और क्या ख़ास निष्कर्ष दिया है.'-अब मज़ा तब आता है जब कोई काईयाँ जूनियर उनकी दुखती रग पे हाथ रख देता है-सर आपका नेट/जे आर ऍफ़ हुआ है'-बस सीनियर महाशय पहले तो उसे इस अंदाज़ में घूरते हैं मानो उसे यह समझाने कि कोशिश कर रहे हों कि ......ये ,तुझे मौका देखकर बात भी करने नहीं आती ,क्योंकि काफ़ी जूनियर बालिकाएं भी सर के इस विभागीय प्रचंड-प्रताप को सुन रही होती रहती हैं,पर झेंप मिटाते हुए एक लाइन में जवाब देंगे-'अजी,अभी बच्चे हो जानते नहीं नेट/जे आर ऍफ़ योग्यता का सही पैमाना है.'-बहरहाल,इन सीनियरों से पहले ट्राई मारी जाती है ,रिज़र्व खाते में रखे गए सीनियर के आस-पास.इन सेनिओर्स की पहले अच्छी-खासी पड़ताल इनके द्वारा की जाती है कि किस मूड का है और कहाँ रहता है,फोन पर बात करना ठीक रहेगा या नहीं?वगैरह-वगैरह.सहमत तब आती है जब यह सीनियर कैम्पस में ही रहता हो.यानी आस-पास,ये चांडाल-चौकडी वहाँ पहुँच जायेगी औए साथ में एकाध बालिकाएं जूनियर भी दांत निपोरती पहुंचेंगी.-'सर,घर पे इत्ता सारा काम होता है कि पढने का टाईम मुश्किल से ही मिलता है.'-लड़का कहेगा-सर जी,दूर से आता हूँ बस में लटक कर ,अब बताओ आप ही कि २ घंटे तो आने और २ घंटे जाने में ही लगते हैं अब ऐसे में आप ही बताओ कैसे पढ़ें,सर जी इस बार हेल्प कर दो अगले साल से जी लगाकर पढ़ लेंगे '-पर वह सीनियर मन में क्या सोचता है जो ख़ुद अपने एकाध महीने में जमा किए जाने वाले दीजर्टेशन के बारे में सोच रहा होता है कि अगले घंटों में किन-किन टोपिक्स को खत्म करना है.मिड-टर्म के ठीक पहले उग आने वाले इन चाटों का शिकार हाल ही हुआ हूँ ..जैसे तैसे पिंड छुडाया है ये कहकर कि -भाई,दिसम्बर के बाद इत्मीनान से मिल लेना...'मगर एकाध तो घाघों के बाप होते हैं ना...बस पूछिए मत....सोचता हूँ 'कहीं....दम सीधी होती है भला?'-यूनिवर्सिटी को छात्र हित में कैंटीन ओनर्स की डिग्री देनी शुरू की जानी चाहिए.

11/15/08

हर लिहाज़ से बेहतरीन प्रस्तुति है -"विक्रमोवर्शियम".


यूँ तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय हर वर्ष अपनी प्रस्तुतियाँ देता है मगर रंग-प्रेमियों को इसके सेकंड इयर के छात्रों की किसी क्लासिक नाट्य प्रस्तुति काइंतज़ार रहता है ,जो यह हर वर्ष देते हैं। वैसे द्वितीय वर्ष के छात्रों के पाठ्यक्रम का हिस्सा है यह संस्कृत के नाटक। बस ऐसा जान लीजिये कि इनके सही मायने में नाट्य विद्यालय के अकादमिक दर्जे से यह पहली प्रस्तुति होती है। और इन नाटकों को तैयार करने में इस विद्यालय के पास तथा इनसे जुड़े एक्सपर्ट्स की अच्छी-खासी मौजूदगी है। पर ,दो नाम ख़ास तौर से बहुत सम्मानित और इस क्लासिकीय विधा के नाटक के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है वह है-श्री के.एस.राजेंद्रन जी (जो यही एसोशियेट प्रोफेसर हैं। )और दूसरे हैं-श्री प्रसन्ना जी(इनकी प्रमुख प्रस्तुतियां हैं-'उत्तर रामचरित','आचार्य तार्तुफ़')। २ साल पहले राजेंद्रन ने अपने निर्देशन में कालिदास के महान नाटक "मालविकाग्निमित्रम"को रंगजगत में उतारा था,तब यह नाटक उस साल खेले गए कुछ बेहतरीन नाटकों में से एक माना गया था। इस वर्ष फ़िर इन्ही के निर्देशन में कालिदास के ही एक और नाटक "विक्रमोवर्शियम"द्वितीय वर्ष के छात्रों द्बारा खेला गया (आज इस नाटक की अन्तिम प्रस्तुति है )। कहना ना होगा कि ,मेरे कुछ बेहतरीन देखे गए नाटकों में से एक नाटक यह भी है।

राजेंद्रन तो इस तरह के नाटक के माहिर माने जाते ही हैं,और इस नाटक के बाद तो खैर यह दर्जा निर्विवादित रूप से उन्ही के पास रहेगा।

'विक्रमोवर्शियम'एक विधा के तौर पर त्रोटक है। संकृत काव्यशास्त्र के अनुसार ,त्रोटक एक ऐसी नाट्य विधा है,जिसमे श्रृंगारिकता अधिक मातृ में होती है और जिसके पात्रों में दैवी एवं मानुषी पात्रों का सम्मिश्रण होता है। (सन्दर्भ- विक्रमोवर्शियम ,अनुवाद-इंदुजा अवस्थी,रा.ना.वि.)'विक्रमोवर्शियम 'में उर्वशी नामक अप्सरा के प्रति राजा पुरुरवा के गहन प्रेम का वर्णन किया गया है। यह कथा 'ऋग्वेद 'से ली गई है लेकिन चरित्र निर्माण और कथा -विकास में अपने रचनात्मक कौशल से कालिदास ने इसे भव्य उंचाई प्रदान की है। पुरुरवा उर्वशी को एक राक्षस के चंगुल से मुक्त कराता है जैसा कि नाटक के शीर्षक से इंगित है। यह नाटक इन्ही दोनों के प्रेम,बिछोह,और पुनर्मिलन की कथा है।

संस्कृत नाटकों के प्रस्तुति में सबसे बड़ी चुनौती होती है उसके सही त्तारिके से दर्शक-वर्ग के बीच पहुँचा देना।क्योंकि रीयलिस्टिक नाटकों के बीच नंदी-गान से शुरू होने वाले इन स्टालाईज़ नाटकों को रोचक ढंग से पेश करना सही में बड़ी मेहनत की डिमांड करता है। इन नाटकों में किए जाने वाले अभिनय को 'नाट्यधर्मी अभिनय' कहा जाता है। इस काम को राजेंद्रन ने नृत्यांगना .कोरियोग्राफर,और समीक्षक (हिंदू में बतौर पत्रकार)अंजला राजन के सहयोग से पूरा किया और इनदोनों के सम्मिलित प्रयास के बाद जो परिणाम सामने आया वही है -विक्रमोवर्शियम। 'मालविकाग्निमित्रम'में अपने गायकी से जान फूंकने वाले अनिल मिश्रा यहाँ भी (इस बार विनी वोरा के साथ ) मौजूद थे।वेशभूषा के लिए अम्बा सान्याल तो हैं ही।हाँ..यहाँ गोविन्द पाण्डेय के संगात के बिना बात अधूरी ही रह जायेगी । कमाल का संगीत ,सहज,और सुमधुर। स्वयं उन्ही के शब्दों में कहें तो-"जिस प्रकार नाटक के प्रखर बिन्दु श्रृंगार-विरह-प्रेमोन्माद है,उसे ही सरल संगीत के माध्यम से उभारने का छोटा-सा प्रयास है,शास्त्रीयता रहे पर पूर्ण रूप से नहीं ,ऐसा विचार रहा साथ ही छात्र संगीत में ही उलझ न जाए । "

निर्देशक ने शास्त्रीय एवं लोक नृत्यात्मक मुद्राओं का उपयोग किया है संगीत भी उसी के साथ बहे ऐसी ही कोशिश है.

ऐसी प्रस्तुतियां साल में एकाध ही आती हैं ..जिन्होंने इसे नहीं देखा उन्हें इसके दुबारा खेले जाने तक इंतज़ार करना होगा ...अफ़सोस.

11/13/08

जरुरत है अब रंग बदलने की(भोजपुरी फिल्में)


जहाँ तक भोजपुरी फिल्मों के धडाधड आने की बात है वही एक समस्या इनके स्तरसे जुड़ी हुई तेज़ी से उभर रही है। ये समस्या इनके मेकिंग से ही जुड़ी नहीं है बल्कि इसके प्रस्तुतीकरण और कथ्य से भी जुड़ी है। 'उफान पर है भोजपुरी सिनेमा"शीर्षक के तहत मैंने एक ब्लॉग-पोस्ट पिछले महीने लिखी थी,इस पोस्ट पर प्राप्त टिप्पणियों में से एक ब्लॉगर साथी ने अपनी प्रतिक्रिया लिखी किवह सब तो ठीक है पर भोजपुरी सिनेमा गंभीर नहीं हो रहा है। उनकी बात के जवाब में मैंने यह लिखा कि अभी तो तेज़ी आई है आने वाले समय में कुछ सार्थक सिनेमा भी यह इंडस्ट्री देगा,जिसे राष्ट्रीय स्तर पर नोटिस किया जायेगा।

मगर मुझे पता है कि यह भी इतना आसान नहीं है जबकि इस इंडस्ट्री में पैसा इन्वेस्ट करने वाले राजनेता,अब तक रेलवे ,सड़क की ठेकेदारी करने वाले सफेदपोश लोग और विशुद्ध व्यापारी लोग ही हैं। हाल ही में अपने घर से लौटा हूँ । वहां भोजपुरी की दो फिल्में देखीपहली का नाम था-बलम परदेसिया और दूसरी नई फ़िल्म थी -हम बाहुबली। हम बाहुबली आज के भोजपुरी सुपरस्टार रवि किशन और दिनेश लाल यादव'निरहुआ'अभिनीत थी,वही'बलम परदेसिया ८० के दशक की सुपेर्हित फ़िल्म थी जिसमें राकेश पाण्डेय और नजीर हुसैन ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थी। अब दोनों फिल्मों का जो बेसिक फर्क था वह भोजपुरी के टोनऔर ज्यादा जमीनी होने को लेकर था और हाँ..जिस भोजपुरी समाज में गीत-संगीत की धुनें शहनाई ,सारंगी,हारमोनियम ,तबला ,झार,करताल,और गायकी में निर्गुण ,चुहल लिए था ,वह केवल 'बलम परदेसिया' में देखने को मिला जबकि अपने समय के अनुसार 'हम बाहुबली' वही बोल्लिवूडिया तेवर का. फ़िल्म ख़राब तो नहीं थी पर अपने से 'बलम परदेसिया'जैसा जुडाव पैदा करने में नाकाम थी.जबकि ध्यान देने वाली बात है कि दोनों ही इस इंडस्ट्री की पोपुलर/मेनस्ट्रीम की सिनेमा हैं.'गीत-संगीत की तो बात ही छोड़ दीजिये नए दौर के भी भोजपुरिये नौजवानों ने 'बलम परदेसिया'के 'गोरकी पतरकी रे'और'हंसके जे देखअ तू एक बेरिया हम मरी मरी जाएब तोहार किरिया '-जरुर सुन रखा है. बहरहाल,हमारी बहस का मुद्दा इस इंडस्ट्री के गंभीर होने को लेकर है,वाकई अब ऐसा समय है जब भोजपुरी सिनेमा जगत ने अपनी पहचान को पुखा और अपनी नींव को मजबूत कर लिया है तो उसे भी अब अपनी माटी के जमीनी यथार्थ को इंगित करती कुछ फिल्में बनानी चाहिए जो इस भाषिक प्रदेश की गुंडा,दबंगई,नेतागिरी जैसी स्टीरीयो टाइप इमेज से उलट कुछ अलग,कुछ अधिक सार्थक हो,जैसे बांग्ला,तेलुगु,मराठी,मलयाली,उड़िया,ने अपने कम प्रभाव क्षेत्र के बावजूद अपने क्षेत्रीय फिल्मी संसार के मेनस्ट्रीम सिनेमा मेकिंग के समानांतर खड़ी की है.प्रश्न मात्र ये नहीं है कि इसे कौन करेगा बल्कि इसको करने के लिए जिस प्रोग्रेस्सिव मानसिकता की जरुरत है उसको डेवलप किए जाने की जरुरत है. अब भोजपुरी फ़िल्म जगत ने अपने जौहर दिखाकर अपनी ताकत को जाहिर कर दिया है पर यह सही मायनों में तभी पूर्णता को पायेगा जब कोई ऐसी क्लासिक काम पैदा करके दिखा दे जो विश्व स्तर पर मार्क की जाए तो क्या कहने.सम्भव हैं कुछ समय में ऐसा हो जाए ..तब तक इंतज़ार ....

11/9/08

बस आज होगी अब आखरी दहाड़.......




लॉर्ड्स का वह सीन याद कीजिये जब एक दुबले-छरहरे बाबु मोशायने अपने पहले ही मैच में सैकडा ठोक दिया था। या फ़िर वह जब दुनिया को क्रिकेट के मैदान में अपनी जूती के नोंक पर रखने वाली टीम का लीडर इस बंगाल टाईगर के आगे बेचारा बना ग्राउंड में टॉस का इंतज़ार कर रहा था। अब तक लोगों से भद्रजनों के खेल के कायदे सुनने वाला और अपने दूसरे कान से बेहयाई से मुस्कुराते हुए निकाल देने वाली इस दादा टीम को दादा की दादागिरी के आगे बेबस होकर ख़ुद जेंटलमैन गेम का तरीका अपनाए जाने की बात करनी पड़ गई थी। या फ़िर वह दृश्य जब ब्रिटेन की छाती पर बैठ कर बालकोनी से अपनी टी-शर्ट उतार कर भद्रजन खेल की नई परिभाषा ही गढ़ देना । जी हाँ....इस अनोखे और विश्व क्रिकेट में परम्परा से चली आ रही भारतीय इमेज(किसी भी छींटाकशी को सुनकर अनसुना कर देना इत्यादि) को इसी कप्तान ने बदल के रख दिया ।


तमाम तरह के विवादों के बीच जब भारतीय टीम मैच फिक्सिंग के दलदल में फंसती नज़र आ रही थी,तब इस नए जुझारू नौजवान ने इस टीम की बागडोर अपने हाथ में संभाली और उसके बाद जो कुछ कारनामा इसी टीम ने किया वह सबने देखा। जिन विदेशी पिचों पर इस टीम को सब टीमें ईजी केक की तरह लेती थी,अब वह भी बैकफूट पर आ गई। यह नई टीम थी विशुद्ध भारतीय नई टीम। गांगुली अपने कप्तानी ही नहीं बल्कि अपने अग्ग्रेसिव अप्रोच के कारण भी याद किए जायेंगे। कई तरह के विवादों से घिरने के बावजूद यह शख्स अपना लोहा मनवा ही लेता है। टीम से निकाल दिए जाने और उस विज्ञापन में दिखाए जाने के बाद (जिसमे वह कहते थे कि अपने दादा को भूल गए क्या ?)वह और भी करीब लगने लगे थे। जी चाहता था कि काश एक बार ही सही गांगुली वापस आकर अपना सौवा टेस्ट खेल ले ,आख़िर हमारी यह हसरत भी पूरी हुई और गांगुली को चुका हुआ कहने वालों के मुँह पर इस टाईगर ने अपने बल्ले की दहाड़ से ऐसा ताला मारा कि सब भौंचक्के रह गए,यह गांगुली अब वाकई अलग सा था ,कुछ साबित करने का जज्बा लिए शांत,गंभीर।


गांगुली के साथ ही क्रिकेट को नए-नए खिलाड़ी मिले। मतलब कि अब तक खिलाड़ियों का जत्था (जी हाँ जत्था)बंगलुरु,मुम्बई और दिल्ली के क्षेत्र से आता था पर अब इस कप्तान ने अपनी नज़र हर उस खिलाड़ी पर दौडाई जो वाकई कुछ कर सकता था। अब ये खिलाड़ी सुदूर श्रीरामपुर,इलाहाबाद,रांची जैसी जगहों से भी आए हालांकि यह मात्र गांगुली के कारण नहीं था मगर एक कप्तान के तौर पर गांगुली ने चयनकर्ताओं से लगभग नाराजगी मोल लेने की हद तक इन खिलाड़ियों का सप्पोर्ट किया था।युवराज सिंह के गर्दिश के दिन याद कीजिये जब हम-आप भी कहने लगे थे कि इसे क्यों ढोया जा रहा है।


बहरहाल,जो भी हो अगर नागपुर टेस्ट में भी गांगुली ने शतक मार दिया होता तो क्या शानदार विदाई होती। मगर अपनी इस पारी से दादा ने वह सब कुछ पा लिया ,साबित कर दिया जो वह चाहते थे। एक शानदार खिलाडी की शानदार विदाई विरले को ही नसीब होती है।गांगुली उन्हीं विरलों में से एक हैं। सही मायनो में प्रिन्स ऑफ़ कोलकाता ,रियल बंगाल टाईगर । यह वही खिलाड़ी है जिसके बारे में उसके एक सहयोगी खिलाड़ी का स्टेटमेंट था-"ऑफ़ साईड में पहले भगवान हैं फ़िर गांगुली"।


जो भी हो ...इस टाईगर की संभवतः आज आखरी दहाड़ होगी(अगर पारी आई तो॥)। जाओ दादा अलविदा


तुम,तुम्हारा खेल ,तुम्हारी कप्तानी ,तुम्हारी पिच पर वापसी, हमेशा दिल में रहेगी...........




(वैसे मुसाफिर I P L में कोलकाता नाईट राईडर्स के खेल में दादा का इंतज़ार करेगा )

10/29/08

त्यौहार सबका दिक्कत केवल हमारी..


कल दीपावली कब त्यौहार धूमधाम से संपन्न हो गया। सभी ने खूब मज़े किए होंगे,पर हम हॉस्टल में रहने वाले स्टूडेंट्स के मज़े थोड़े दूसरे किस्म के थे। आप सभी ने सुना होगा.कि त्यौहार माने भांति-भांति के बढ़िया,लजीज व्यंजन और मौज-मस्ती पर अपना तो ये आलम रहा है इस त्यौहार का कि,जब सारी दुनिया धमाचौकडी में मशगूल होती है,नाना प्रकार के लाजवाब पकवान पेल रही होती है ,हम हॉस्टल वाले छात्र अपना पेट दाब के बिस्तर में लेट के घर पर मनाये जा रहे त्यौहार की कल्पना कर रहे होते हैं। दरअसल,त्यौहार चाहे कोई भी हो हॉस्टल के छात्रों के लिए आफत के समान ही होता है। कारण ये है कि इस दिन हमारा मेस बंद रहता है और त्यौहार होने के कारण अगल-बगल के जो एकाध खाने-पीने की गुमटियां हैं वो भी मुए इस दिन बंद कर अपने घर चल देते हैं । अब आप कहेंगे कि आपकी अथॉरिटी कुछ तो व्यवस्था करती होगी पर जनाब ये अथॉरिटी व्यवस्था करती तो हैं पर वह सिर्फ़ दोपहर के स्पेशल लंच तक ही सीमित हो जाता हैं और फ़िर घावों पर नमक छिड़कने सरीखा शब्द हम सबके कानों में सुनाई देता हैं "आप सबको (त्यौहार का नाम )की ढेर सारी बधाइयाँशुभकामनाएं,आप सब अपने-अपने लक्ष्य को अचीव करें और हाँ ...प्लीज़ मिलजुल कर शान्ति पूर्वक एन्जॉय कीजियेगा..थैंक्स । "-अब आप ही बताइए कि दोपहर को खीर-पूरी खिलाकर रात को भूखा सुलाने से त्यौहार शुभ कैसे होगा ?

इसी पेट दाबू स्थिति में घर से आने वाला फ़ोन बजता हैं और माताजी आदतन पूछ ही लेती हैं कि 'खाना खा लिए हो ना?'-और जवाब हूँ-हाँ से ना बनता देखकर कहना पड़ता हैं कि -'कल ब्रेकफास्ट बढ़िया से करूँगा'आज लंच बढ़िया और हैवी ले लिया था। '-कल दीपावली को जब सभी ओर पटाखे गरज रहे थे,दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र जो हॉस्टल में रहते हैं इधर-उधर भटक रहे थे कि कुछ खा लिया जाए पर कहाँ?सभी ओर तो बंदी का नज़ारा था,सभी त्यौहार मना रहे थे ।वैसे ही छात्र जीवन में भूख ज्यादा लगती हैं और हमारा सिस्टम भी हमसे थोडी संवेदनाएं नहीं रखता,जो कम-से-कम नाम के ही सही हमारे प्रोवोस्ट /वार्डेन/आरटीवगैरह कहे जाते हैं।जो हमारे हॉस्टल से सेट ही या यूँ कह लीजिये कि हॉस्टल प्रांगण में ही रहते हैं उनके यहाँ जश्न का माहौल था और बच्चे हॉस्टल जो अनुपात में १५-२० ही थे कभी कामनरूम में बैठ कर टीवी देख रहे थे तो कोई अपने कंप्यूटर पर गाने वगैरह सुन रहा था।
यह माजरा महज़ दीपावली तक सीमित नहीं हैं बल्कि ईद ,मुहर्रम ,क्रिसमस,लोहडी,होली,दीपाली सभी सरकारी छुट्टी प्राप्त त्योहारों में समान रूप से लागू हैं। बस ऐसा जान लीजिये कि "त्यौहार तो सबके लिए खुशियाँ लेकर आते हैं पर हॉस्टल में रहने वाले छात्रों के लिए आशंका कि आज भूखे रहना होगा । साथ में दिक्कतें भी(भूखे पेट सोना कम दिक्कत का काम हैं क्या)वैसे यदि आप ये कहेंगे कि आप कुछ हल्का-फुल्का अपने-आप से पका लीजिये तो जनाब यह भी हॉस्टल में जुर्माने का सबब बन जायेगा क्योंकि हॉस्टल के कमरे में कुकिंग अल्लाऊ नहीं हैं। तो फ़िर यह सलाह दे डालिए कि कुछ पहले से खरीद लीजिये ड्राई-फ्रूट जैसा पर पेट भरने का मुद्दा तो फ़िर भी रहा न बाकी । पेट तो रोटियाँ ही मांगता हैं क्या करें।

10/27/08

जुए का एक दिन तो लीगालाईज है ही....


कल पूरे देश भर में दीपावली धूम-धडाके से मनाई जायेगी। चारों तरफ़ धुएँ और धमाकों का कानफोडू माहौल होगा पर इन सबके बीच जो सबसे रोचक काम हो रहा होगा उधर घर के बच्चों तक का ध्यान शायद ही जाए। ये है दीपावली पर खेला जाने वाला "जुआ" जिसे सुख-समृद्धि दायक कह कर हमने अपने हिसाब से कानूनी और जायज़ कर लिया है। इसके खेले जाने के पीछे (जैसा सुनने में आता है)कहा जाता है कि इस दिन की जीत वर्ष भर धन-धान्य प्रदायक होती है(?)।यह खेल अपने खेले जाने के पीछे इतने वाजिब तर्क गढ़ चुका है कि आप लाख प्रवचन या नैतिक मूल्यों की दुहाई दें घर के बड़े-बुजुर्गों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती।ऐसा नहीं है कि यह खेल महज़ किसी ख़ास वर्ग,शहर या गाँव में खेला जाता है बल्कि 'जुए' महाराज की महिमा चंहु-ओर बड़े भव्य स्तरपर फैली हुई है। पिछले सन्डे को 'नई दुनिया'अखबार का रविवारीय 'मैगजीन'यही कवर स्टोरी लिए हुए था। जिसमे बड़े ही बारीकी से देश के विभिन्न शहरों में से ढूंढ-ढूंढ कर इसकी महिमा बताई गई थी। साथ ही दिल्ली में हुए 'फैशन वीक' के अवकाश सत्रों में रैंप पर चलने वाली मोडल्स की तस्वीरेंभी प्रकाशित की गई थी,जिसमे यह साफ़ दिख रहा था कि वह अपना टाइम-पास ताश खेल के कर रही थी। ताश को जुए की श्रेणी से बाहर बताने वाले भी कई महानुभाव हमें मिल जायेंगे जो बताएँगे कि अमुक-अमुक कारणों से ताश खेलना जुआ नहीं है और घर में अपने परिवार के बीच वो भी खेलते हैं साथ ही ,ये भी हो सकता है कि दो-चार संभ्रांत (?)परिवार भी गिनवा दे जो ताश खेलते हैं। नई दुनिया के उसी मैगजीन में ऐसे ही कुछ परिवारों के बारे में बताया गया है जो आपस में ही जुए खेल कर काम चला लेते हैं कि चलो घर का पैसा घर में रह गया। अब पता नहीं कि कितना जरुरी है यह पत्तों और नंबरों का खेल जिसे इसी त्यौहार के लिए शुभ(?)और मुफीद समझा जाता है और पता नहीं क्यों ?इधर एक और ख़बर थी कि ,सिर्फ़ दीपावली के रोज़ दिल्ली महानगर में तक़रीबन १,००० करोड़ रुपये पिछले वर्ष दांव पर लग गए थे। इस साल यह आंकडा और ऊपर जायेगा ,जुआरियों को और खेले-कमाने का मौका मिलेगा तथा सभी अपने-अपने तर्क फ़िर गढ़ेंगे,कुछ पुराने को ही फ़िर दुहरा देंगे। मतलब आज खेल लो जुआ आज सरकार भी कुछ नहीं करेगी त्यौहार के नाम सब छूट है और इतना ही नहीं कुबेर या लक्ष्मी (जो भी रुपये के देवता हैं ,और जो पैसा बांटते हैं)आज ही मेहरबान होते हैं और उनकी मेहरबानी "वाया जुआ बाईपास"होकर ही गुजरती है और यदि आज जिसने इस बाईपास का रास्ता नहीं पकड़ा तो साल भर कड़की और तंगहाली से दो-चार होते रहना पड़ेगा।

मैं सोच रहा हूँ कि क्यों ना एक सलाह विश्व बाज़ार के रहनुमाओं को दे दी जाए कि भइयेआज ही खेल ले इसको सारी मुद्रास्फीति तपाक से ऊपर चढेगी और प्रधानमन्त्री जी तथा वित्तमंत्री जी तो शायद बैठे भी चौपड़ पर जिनकी गोटियाँ शायद रिजर्व बैंक के गवर्नर सजायेंगे। जब इतने बड़े लेवल पर यह गेम (गेम कहना तो मजबूरी हो ही जायेगी जब हमारे नीति-नियंता ही बिसात बिछायेंगे )खेला जाने लगेगा अपने-आप ही कानूनी शक्ल अख्तियार कर लेगा । अब लेगा ,हो जायेगा की बात ना करके इसी बात की फरमाईश कर दी जानी चाहिए कि "जुआ कम-से-कम एक दिन के लिए तो लीगलआईज करो। "-शायद वैश्विक मंदी का असर कुछ कम हो क्योंकि यह तो हम भी मानते हैं ना कि इस दिन की जीत माने साल-भर मामला सही रहेगा,फ़िर इस बार की बाज़ी जीत कर साल भर मामला सही कर लेते हैं और फ़िर दिक्कत आए तो फ़िर है ही अगली दीपावली......


इस बीच कमोबेश सभी पार्टियों ने दिल्ली विधान-सभा चुनाव हेतु अपने-अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं,तो उनके लिए दीपावली का मंत्र भी इस बार बदल जायेगा,जैसा कि आमतौर पर लक्षी और गणेश का जो मंत्र अब तक पढ़ा जाता रहा है वह नही पढ़ा जाएगा. लक्ष्मी का मंत्र यूँ होता आया है..'महालक्ष्मी नमस्तुभ्यम,नमस्तुभ्यम सुरेश्वरी,हरिप्रिया नमस्तुभ्यम,नमस्तुभ्यम दयानिधि"की जगह लक्ष्मी आह्वान का "काका हाथरसी" मंत्र पढ़ा जायेगा-

हे प्रभु आनंददाता नोट हमको दीजिये

लक्ष्मी का और अपना वोट हमको दीजिये

बुद्धि ऐसी शुद्ध कर दो -एक का ढाई करें

जोड़ कर मर जाएँ लाखो खर्च न एक पायी करें ...

(यहाँ थोड़ा सुधार कर पढ़े लाख की जगह करोड़ पढ़े,पंक्तियों में बदलाव काका के प्रति गुस्ताखी होती)

दीपावली की ढेरों शुभकामनाओं के साथ

आपका "मुसाफिर"

10/24/08

"छठ" तो बस "छठ" ही है..


बात जब भी किसी त्यौहार की होती है तो स्वतः ही अपने सामाजिक परिवेश के कई सन्दर्भों से जुड़ जाता है। बिहार के लोगों के लिए इस पर्व का महत्त्व कितना है इसकी सही तस्वीर देखनी है तो रेलवे रिजर्वेशन की तह में जाइए। यहाँ बिहार जाने वाली सभी ट्रेनों में कोई एक भी जगह किसी भी क्लास में खाली नहीं है। अभी-अभी तत्काल कोटे को चेक करने बैठा था। सच कहूँ तो ,मन में एक प्रकार की हेकडी भी थी कि,नोर्मल टिकट मिले अपनी बला से,हम तो तत्काल भी ले सकते हैं। अब क्या बताऊँ ,कहना बेकार ही है कि साड़ी हेकडी हवा हो गई है,उसमें भी वेटिंग लिस्ट दिखा रहा है। अब सोच रहा हूँ कि आख़िर सरकार को कितनी ट्रेनें चलानी होगी बिहार के लिए या कितनी भी चल जाए कम ही है?इन सब झमेलों के बीच मेरी परेशानी अभी बची हुई है कि आख़िर अब कौन-सी जुगत भिडाई जाए जिससे कम-से-कम छठ को घर वालों के साथ मना सकूँ। सूर्योपासना का यह पर्व बिहार की सांस्कृतिक पहचान है । घर से बाहर रहने वाले तकरीबन सभी बिहारी भाई चाहे वह अधिकारी हो,छात्र हो,शिक्षाविद हो,नेता हो,या फ़िर मजदूर सभी कम-से-कम यह पर्व घर के लोगों के साथ मनाना चाहते हैं और इसका पूरे वर्ष बड़ी बेताबी से इंतज़ार करते हैं। आज सुबह ही 'नई दुनिया'में एक छोटी सी ख़बर पढ़ी कि 'कोई सुमेश नाम का पेंटर ,जो सिवान का रहने वाला है इस बात को लेकर बेहद परेशान है कि छठ पर माँ और बीवी-बच्चों के लिए जो नए कपड़े उसने ख़रीदे हैं किस तरह से उनतक पहुंचेंगे सुमेश तो एक उदाहरण है,इस परिस्थिति के शिकार सब हैं। छठ पर डूबते और उगते दोनों ही बेला में सूर्य को नए वस्त्रों में अर्घ्य देने की परम्परा है। इसी कारण सभी वैसे लोग जो घर से बाहर कमा रहे हैं और अपने परिवार का एकमात्र कमाई का जरिए हैं उनसे घर की अपेक्षाएं काफ़ी अलग किस्म की है। इसको बस यूँ समझ लीजिये कि जो परिवार पूरे वर्ष चिथडों में काट देता है उसके लिए नए कपड़े देखने का अवसर भी यही त्यौहार लाता है। ऐसे में मैं इस बात को लेकर संतोष कर सकता हूँ कि जैसे-तैसे जुगाड़ करके मैं घर तो चला ही जाऊंगा । होली-दिवाली-दशहरा इन सब के अपने मायने हैं पर छठ इन सबमें अलग और विशिष्ट है ,कम-से-कम बिहार के सन्दर्भ में तो यह बात सोलह आने सही बैठती है। मेरा छठ को लेकर एक और भी पहलु है कि आख़िर क्यों मैं साल भर घर से दूर रहने पर भी इसी मौके को घर जाने के लिए क्यों चुनता हूँ और क्यों इसके लिए तमाम दुश्वारियां सह कर भी घर जाना चाहता हूँ। सही कहूँ तो मेरे सभी बचपन के साथी-संघाती जो इस देश के कोने-कोने में अब अलग-अलग कारणों से चले गए हैं या रह रहे हैं इस पर्व में घर आते हैं और उन सबसे इकठ्ठा मिलना हो जाता है। फ़िर हमारे साअथ वाले बच्चों और अभी वाले बच्चों जो गाँवमें रह रहे होते हैं उनमें क्रिकेट,कबड्डी,और फूटबालये तीन मैच खेले जाते हैं। इस मैच का सभी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं और फ़िर एक मिश्रित टीम बनाकर दूसरे गाँव से मैच लिया जाता है। पता नहीं ये किसने कब शुरू किया था पर आज भी बदस्तूर जारी है। छठ सही मायनों में एकदम अपना वाला त्यौहार है। सुबह घाट से लौटते व्रतियों से अंजुली फैला कर प्रसाद में ठेकुवा मांगने में आज भी किसीको कोई झिझक नहीं होती है और इस ठेकुवे का स्वाद तो क्या कहने । किसी और कुसमय (अन्य अवसर पर)बनने पर वैसा स्वाद नहीं मिलता। शाम को कोसी भरने और उसके जलते दीयों के चारों ओर गन्ने का घेरा बनाना अद्भुत अनुभूति देता है,अब ऐसे पर्व के लिए थोड़ा कष्ट तो सहना चलेगा।

अंत में एक निवेदन हैं अपने बिहारी नेताजी लोग से कि छठ तो अपने गंगा घाट और गाँव-घर के पोखरे पर ही जंचता है । इस बात को मैं पक्के विश्वास से कह सकता हूँ कि 'जुहू बीच/चौपाटी पर छठ 'छठ'ना रह कर बस सांस्कृतिक तमाशा ही बन जाएगा।त्यौहार सद्भाव के लिए होना चाहिए,मैत्री,शान्ति बढ़ाने हेतु न कि पावर गेम या शक्ति प्रदर्शन का माध्यम hetu ।

10/23/08

सिनेमा,सिनेमा केवल सिनेमा,खाली सिनेमा.....


जेहन में आज भी पहली देखी गई सिनेमा के तौर पर भोजपुरी की "गंगा किनारे मोरा गाँव"ही दर्ज है। बाद में शायद ऋषि कपूर वाली "प्रेम रोग"थी,जिसका गाना हम सभी बच्चे गाया करते थे 'मैं हूँ प्रेम रोगी '। पता नहीं क्यों यही गाना हमारी जुबान पर चढा था।बाद में हमलोग थोड़े और बड़े हुए और सिनेमा ke लिए दीवानगी और बढ़ी। पहले सिनेमा-घरों के विशाल परदों को देख कर बाल-मन यही सोचता था कि हो-न-हो इसी बड़े परदे के पीछे सारा खेल चलता है। हमारी इस बात को बड़े मामा ने जाना तो बहुत हँसे थे,फ़िर एक दिन सीवान(मेरे मामा का घर इसी शहर में है)के प्रसिद्ध 'दरबार' सिनेमा हाल में लेकर गए जहाँ उनका दोस्त मैनेजर हुआ करता था।और तब हमारे आश्चर्य का ठिकाना नही था जब हमने देखा कि ये बड़ा परदा जो सारा खेला दिखाताहै वह तो महज़ ८-१० धोती को सिल कर बना है,और असली खेल तो मुस्तफा मियाँ के हाथों होता है जो उस मशीन (प्रोजेक्टर)को चलाते थे।खैर,सिनेमा से जुडाव दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा था। आज भी उसी गंभीरता के साथ जुडाव बरकरार है पर सही-सही कह नहीं सकता कि उन दिनों जैसी ईमानदारी अब बची है या नही?

गाँव में जब भी कोई बारात आती तो वह हमारे ही बगीचे में ठहरती क्योंकि हमारा आम का बगीचा गाँव के शुरुआत में ही था। हम बच्चों का इंटरेस्ट इस बात में नहीं होता था कि बारात कैसी है ,दूल्हा कैसा है या फ़िर कहाँ से आई है ,बस पूरी टोली इस बात का पता लगाने में जुट जाती कि ,इस बारात में "विडियो "आया है या नहीं। विडियो माने पूरी रात वी.सी. आर.पर फिल्मों का चलाया जाना। जिसे हम कभी माँ-बाप की चिरौरी करके देखते थे तो कभी रात को सभी के सो जाने के बाद पिछवाडे से उतर कर। इस काम में हम सभी भाईयों में कभी मतभेद नहीं रहा। सबके जागने से पहले घर में हाज़िर रहते पर एक दिन पिताजी ने पकड़ ही लिया। फ़िल्म के लिए रतजगा करने के कारण 'मंटू' दिनभर सोया रहा और जब उसके मामाजी यानी मेरे पिताजी ने कड़ककर पूछा तो टूट गया । बाद में उस एक "गद्दार"की वजह से सभी bhaaee - लोगों का रात का खाना बंद हुआ सो अलग उलटे पिटाई भी पड़ गई और तो और सिनेमा कभी भी भागकर ना देखने की कसम खानी पड़ी(दरसल शर्मिंदगी इसलिए भी ज्यादा हो रही थी क्योंकि छोटे-छोटे भाई-बहन हम चारों को अजीब नज़रों से देख रहे थे)। हालांकि इस कसम को ना तो मैं निभा पाया ना ही अन्य भाई,सभी आज भी सिनेमा के प्रति ऐसा ही राग रखते हैं।

हाई स्कूल अधिक स्वछंदता लेकर आया था। यहाँ कोई देखने सुनने वालानहीं था और 'महेश'जैसे मित्र भी बन गए थे ,जो तिवारी सर के शब्दों में "बड़का फिलिमबाज़"था। स्कूल घर से ३ किलोमीटर दूर था और हम सब साइकिल से आते थे। साइकिल यह सुविधा देती थी कि चाहे जितनी भी देर हो रही हो सिनेमाहाल या घर कहीं भी टाइम पर पहुँचना हमारे हाथ में होता था। कैशोर्य में नए-नए पदार्पण ने हमारा मन इतना बढ़ा दिया था कि अब बारात वालों से अपना विरोध खुलकर जाता देते थे कि 'बड़े घटिया हो जी आपलोग नाच पार्टी लेकर आए हो विडियो नहीं '।कहकर हम अपनी अकड़ में एक तरफ़ चल देते। हाई स्कूल के बगल में सरकारी हस्पताल हुआ करता था (अब भी है),उसीकी दीवार में हमने झुकर निकलने भर का छेदबना लिया था जिसमें हमारा साथ'पुरानी चौक 'के दोस्तों ने दिया था आख़िर उनका मोहल्ला जो ठहरा ,उनकी अनुमति और उनके साथ के बिना यह काम सम्भव नहीं ही था। यह सारा जुगाड़ नए-नए खुले "राजू विडियो हाल"तक शार्टकट तरीके से और जल्दी पहुँचने के लिए था। हमारे ही डेढ़ -दो रुपये जमा करके राजू वाले ने अब विडियो हाल की जगह अब 'राजू मिनी 'टाकिज' बना ली है(ये हमारी मण्डली का मानना है)।

अब जबकि सिनेमा देखने को सारी सुविधाएं भी मौजूद हैं, पिताजी के डंडे का डर भी (कुछ ख़ास)नहीं है तब भी जो मज़ा उस वक्त आता था उतना आराम से बैठ कर पॉपकार्न खाते एयरकूल्ड हाल में नहीं मिलता। पर सिनेमा उठते-जागते दिमाग पर किसी न किसी रूप में हावी है। आख़िर इतने बड़े माध्यम को जो आपके सपने,आपकी सच्चाई सभी कुछ आपके सामने लाता है उसको नकारकर भी तो जी नहीं मानेगा। क्या करें यह तो रगों में दौड़ रहा है ज़िन्दगी सेल्युल्लोइड नहीं होती पर इससे अलग भी तो नहीं है ..कम-से-कम अपने बारे में तो इस पागलपन को खुलेमन से स्वीकारता हूँ।

10/22/08

उफान पर है भोजपुरी सिनेमा...


कोई १०-१२ साल पहले की ही बात है जब सिनेमा पर बात करते हुए कोई भूले से भी भोजपुरी सिनेमा के ऊपर बात करता था,पर यह सीन अब बदल गया है.हिन्दी हलकों में सिनेमा से सम्बंधित कोई भी बात भोजपुरी सिनेमा के चर्चा के बिना शायद ही पूरी हो पाए.ऐसा नहीं है कि भोजपुरी सिनेमा अभी जुम्मा-जुम्मा कुछ सालों की पैदाईश है.सिनेमा पर थोडी-सी भी जानकारी रखने वाला इस बात को नहीं नकार सकता कि भोजपुरी की जड़े हिन्दी सिनेमा में बड़े गहरे तक रही हैं.बात चाहे ५० के दशक में आई 'नदिया के पार'की हो या फ़िर दिलीप कुमार की ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली फिल्मों की इन सभी में भोजपुरिया माटीअपने पूरे रंगत में मौजूद है.इतना ही नहीं ७० के दशक में जिन फिल्मों में सुपरस्टार अमिताभ बच्चन ने धरतीपुत्र टाइप इमेज में आते हैं उन सबका परिवेश ,ज़बान और ट्रीटमेंट तक भोजपुरिया रंग-ढंग का है.और इतना ही नहीं यकीन जानिए ये अमिताभ की हिट फिल्मों की श्रेणी में आती हैं।

वैसे भोजपुरिया फिल्मों का उफान बस यूँ ही नहीं आ गया है बल्कि इसके पीछे इस बड़े अंचल का दबाव और इस अंचल की सांस्कृतिक जरूरतों का ज्यादा असर है.९० का दशक भोजपुरी गीत-संगीत का दौर लेकर हमारे सामने आया ,अब ये गीत-संगीत कैसा था (श्लील या अश्लील),या फ़िर इनका वर्ग कौन सा था ये बाद की बात है.हालाँकि यह भी बड़ी कड़वी सच्चाई है कि इसके पीछे जो दिमाग लगा था वह किसी सांस्कृतिक मोह से नहीं बल्कि विशुद्ध बाजारू नज़रिए से आया था.वैसे इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि इसीकी दिखाई राह थी जो भोजपुरी सिनेमा का अपना बाज़ार/ अपना जगत बनने की ओर कुछ प्रयास होने शुरू हो गए.परिणाम ये हुआ कि अब तक भोजपुरी का जो मार्केट सुस्त था और जिसे भोजपुरी गीत-संगीत ने जगाया था वह अब चौकन्ना होकर जाग गया.वो कहते हैं ना कि सस्ती चीज़ टिकाऊ नहीं होती वही बात इन गीतों के साथ हुई क्योंकि कुछ ना होने की स्थिति में लोगों ने इन्हे सुननाशुरू किया था,मगर अब वैसी कोई मजबूरी नहीं रह गई .अब देखने वाले इस बात को आसानी से देख सकते हैं कि भोजपुरी अलबमों का सुहाना (?)दौर बीत चुका है लोग अब भी 'भरत शर्मा' ,महेंद्र मिश्रा'बालेश्वर यादव''कल्पना' ,'शारदा सिन्हा'जैसों को सुनना पसंद करते हैं जबकि 'गुड्डू रंगीला','राधेश्याम रसिया',जैसों को सुनते या उनका जिक्र आते ही गाली देते हैं।

ऐसा नहीं है कि भोजपुरी फ़िल्म जगत का ये दौर या उफान बस एकाएक ही आ गया .दरअसल पिछले १०-१५ सालों से हिन्दी सिनेमा से गाँव घर गायब हो चला है अब फिल्मों में यूरोप और एन आर आई मार्केट ही ध्यान में रखा जाने लगा था क्योंकि अपने देश में फ़िल्म के नहीं चल पाने की स्थिति में मुनाफे का मामला वहां से अडजस्ट कर लिया जाता .एक और बात इसी से जुड़ी हुई थी कि गाँव की जो तस्वीर इन फिल्मों में थी वह पंजाब ,गुजरात केंद्रित हो चला था स्थिति अभी भी ऐसी ही है.बस इतनी बड़ी आबादी को अब सिनेमा में अपनी कहानी चाहिए थी अपने व्रत-त्यौहार, अपने लोग,अपनी बात ,अपनी ज़बान चाहिए थी और समाज और मार्केट दोनों ही इसकी कमी शिद्दत से महसूस कर रहे थे और लोगों की इस भावनात्मक जरुरत को भोजपुरी फिल्मों ने पूरा किया और देखते ही देखते भोजपुर प्रदेश के किसी भी शहर के अधिकाँश सिनेमा-घरों में भोजपुरी फिल्में ही छा गई और दिनों दिन छाती जा रही है.अब तो इसका संसार अपने देश की सीमाओं के पार तक पहुँच गया है इतना ही नहीं इसके इस उभार को देखकर ही हमारे हिन्दी सिनेमा के बड़े-बड़े स्टार तक इन फिल्मों में काम कर रहे हैं,इस पूरे तबके को अब अपना ही माल चाहिए यही कारण है कि बिहार और पूर्वांचल के बड़े हिस्से में अक्षय कुमार की जबरदस्त हिट
फ़िल्म 'सिंह इज किंग'ठंडी रही।

अभी तो यह रेस और तेज़ होगी देखते जाइये...

10/16/08

राजघाट के बगल में लगता है"चोर-बाज़ार"..


मेरे एक अभिन्न मित्र हैं-अजय उर्फ़ लारा। लारा यूनिवर्सिटी के लिहाज़ से भी सीनियर छात्र हैं। उनकी संगती में दिल्ली और इसके कई रंग हमने देखे-जाने हैं। इन्ही यादों में बसा है-दिल्ली का चोर बाज़ार।इस बाज़ार की प्रशिद्धि आप सबको भी पता होगी । देशी खरीददार ही नहीं बल्कि दिल्ली भ्रमण पर आए विदेशी पर्यटकों की भी मनपसंद जगह रही है-चोर बाज़ार।इसके बारे में किसी से भी पूछने पर कोई ख़राब सा वाकया अभी तक मेरे सुनने में नहीं आया और कमोबेश सभी बड़े मज़े से रस ले-लेकर चोर-बाज़ार के किस्से सुनाया करते हैं कि फलां चीज़ ऐसे मिलती है अमुक सामान बढ़िया-सा मिल जाता है और अमुक सामान ऐसा होता है उनके (बिक्री करने वालों के)पास खरीददारी के कुछ तरीके आपको आने चाहिए इत्यादि-इत्यादि।
इन दिनों में इस बाज़ार की जगहें कई बार बदली हैं। पहले यह लाल-किले के पीछे लगा करता था,बाद में जामा-मस्जिद वाले रास्ते पर लगने लगा । दिल्ली ब्लास्ट के बाद इस "चोर-बाज़ार"को ऐसी जगह मिल गई है जिसको देखकर ख़ुद आश्चर्य होता है कि सरकार ने इसको "राजघाट"के पास लगाने की परमिशन कैसे दे दी है। यकीन जानिए अब जब कभी भी आप चोर-बाज़ार जायेंगे इसको राजघाट के बाजू से जाने वाले रास्ते पर ही जमा हुआ पाएंगे।इस बात के लिए आप चाहे सर धुन ले पर है यह कड़वी सच्चाई।
चलिए एक पल को हम यह मान लेते हैं कि यहाँ ऐसा-वैसा कोई काम नही होता जैसा हम 'सामाजिक'लोग मानते हैं कि 'ग़लत'है,फ़िर भी क्या इस बाज़ार को राजघाट के पास लगाने की इजाज़त देना ठीक है?महान वैज्ञानिक आइन्स्ताईन ने कभी कहा था कि 'आने वाले वर्षों में लोग इस बात पर विश्वास नहीं करेंगे कि गांधी जैसा कोई व्यक्ति भी हुआ था'-पिछले दशकों में जिस तरह की कुछ घटनाएं घटी हैं और हो रही हैं उनको देखते हुए इस बात को स्वीकारना ही पड़ेगा अब ऐसा लगने लगा है। या फ़िर इस बात को हमें कुछ यूँ देखना चाहिए कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं ?या ये भी कि यहाँ 'चोरी-वोरी' का कोई माल नहीं मिलता -ये सोच कर खुश और संतुष्ट हो लिया जाए?
जो भी पर प्रशासन को इस ओर ध्यान देना ही चाहिए कि 'चोर बाज़ार'को उपलब्ध करायी गई जगह कौन-सी है। अनजाने में ही सही (मान लेते हैं)हुई गलती का निवारण जरुरी है दिल्ली के सन्डे की पहचान इस 'बाज़ार'को कहीं और लगाया जाए कम-से-कम उस 'व्यक्ति'का कुछ तो लिहाज़ हो,वैसे ही अब हमलोग (इसमे सभी किसी न किसी रूप में शामिल हैं) भांति-भांति से उस 'महापुरुष' का मज़ाक बनाते रहते और देखते रहते हैं। अब कम-से-कम उसकी समाधि का रास्ता चोर-बाज़ार के रास्ते की पहचान तो न बने कोई ये तो न कहे कि -"वही राजघाट के बगल में"....

10/14/08

धर्म बदलो फांसी चढो.......


आज के अखबार की एक ख़बर पर आज मेरी नज़र ठहर गई। ख़बर का मज़मून कुछ यूँ था-'इरान की संसद ने इस आशय का प्रस्ताव सर्वसम्मति और भारी बहुमत से पास कर दिया कि इस देश में धर्म-परिवर्तन करने वालों को मौत की सज़ा दे दी जायेगी'-इरान जैसे और ऐसे ही अन्य कट्टरपंथी देशों में ऐसे निर्णय कोई बड़ा आश्चर्य पैदा नहीं करते कारण हम सबको पता है। पर यही बात किसी धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले राष्ट्र में हो तो बात वाकई चिंताजनक हो जाती है। इंडिया जैसे सेकुलर कहे जाने वाले राष्ट्र में अब खुले-आम औरतें,बच्चे मारे जा रहे हैं,ननों के साथ बलात्कार जैसे घृणित काम किए जा रहे हैं और प्रार्थना-घरों को जलाया जा रहा है सरकार चुपचाप तमाशा देखती रहती हैं। अब अपने देश का यह चेहरा भी सामने आ रहा है कि किसी भी स्टेट में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं रह सकते या नहीं हैं। चाहे वह उड़िसा जी जगह के ईसाई हो या फ़िर कहीं हिंदू बहुल प्रान्त के मुस्लिम या फ़िर कश्मीरी पंडित। एक और कमाल का सीन आज के अखबारों में है वो यह कि देश भर के ऐसे ही घटनाक्रमों को हुए एक तमाशे का आयोजन'एकता परिषद्'के नाम से नई दिल्ली में हुआ जिसमे उड़िसा के मुख्यमंत्री और देश के होम मिनिस्टर सब्जी-भाजी बेचने वालों की तरह एक-दूसरे से लड़ पड़े कि तू जिम्मेदार तो तू जिम्मेदार,अब पता नहीं कौन जिम्मेदार है। देश में प्रजातंत्र है और ये दोनों महानुभाव हमारी जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं।

इस पूरी हिंसा और तांडव के पीछे जिनका हाथ है उनकी पूरी ख़बर होने के बावजूद उन 'बजरंगियों' और 'विहिपियों' का कोई सरकार क्यों कुछ नहीं कर पा रही या फ़िर इसके भीतर भी कोई ऐसा खेल है जिसे आम आदमी समझ नहीं पा रहा है।

अपने यहाँ कि साझी संस्कृति जिसका दंभ भरते हम नहीं अघाते वह भी नंगे रूप में सामने आ गया है। अब संस्कृति तो है मगर साझी नही।ये हमारे धर्म रक्षक (तथाकथित/स्वयम्भू)धर्म परिवर्तन कराने वालों के घर बरबाद करने की कूबत रखते हैं पर उन कारणों में झाँकने के जेहमत नहीं उठाना चाहते जो इसके मूल में है। खाली पेट विचार नहीं पनपता .जिस परिवार के बच्चे अपने मुखिया के सामने भूखों मरते हैं उनके लिए पहला प्रश्न 'रोटी' होता है ना कि धर्म। ऐसी स्थिति में अपने सो कॉल्ड सबसे रिच ,पुराने ,समृद्ध धर्म(?)को अपनी छाती से सटा कर जिन्दा रहना बहुत मुश्किल है। इतिहास गवाह है कि हमेशा ही निचले तबको के लोगों की ही बलि हमेशा चढी है,आज भी चढ़ रही है। धर्मान्तरण कराने वाले ईरानी संसद की जद में नहीं आते बल्कि एक उदार सेकुलर देश(?)इंडिया में हैं फ़िर भी फांसी (जलाये,मारे जा रहे हैं) चढाये जा रहे हैं....ये खेल भी काफ़ी रोमांचक और खतरनाक है..अपने धर्म के ठेकेदारों ने सुधार करने की महती जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है (शुद्धि का).आइये इनका स्वागत करते हैं या फांसी चढ़ने,जलाए जाने को तैयार रहिये क्योंकि यही सरकार है और भगवन और खुदा भी ,तो अब 'जो भी धर्म बदलेगा/बदलवायेगा...फांसी चढेगा और ऐसा ईरान में नहीं यहीं सेकुलर देश भारत ,साझी-संस्कृति वाले भारत /इंडिया में हो रहा है ..

10/7/08

मेरा गांव बदल गया है.शायद पूरा भोजपुर ही....


वैसे शैक्षणिक कारणों से घर से बाहर रहते तकरीबन १०-११ साल बीत चले हैं पर गांव-घर की खुशबू अभी भी वैसी ही सांसो में है.इस स्वीकार के पीछे हो सकता है मेरा गंवई मन हो. मैंने जबसे होश संभाला अपने आसपास के माहौल में एक जीवन्तता दिखी,मेरा गांव काफ़ी बड़ा है और जातिगत आधार पर टोले बँटे हुए हैं.बावजूद इसके यहाँ का परिवेश ऐसा था, जहाँ जात-पांत के कोई बड़े मायने नही थे.ये कोई सदियों पहले की बाद नही है बल्कि कुल जमा १०-१२ साल पहले की ही बात है. गांव में सबसे ज्यादा जनसँख्या राजपूतों और हरिजनों की है,बाद में मुसलमान और अन्य पिछडी जातियाँ आती हैं.कुछ समय पहले ही गांव की पंचायत सीट सुरक्षित घोषित हुई है और अब यहाँ के सरपंच/मुखिया दोनों ही दलित-वर्ग से आते हैं.साथ ही अपने गांव की एक और बात आपको बता दूँ कि मेरे गांव में आदर्श गांव की तमाम खूबियाँ मौजूद है.मसलन हर दूसरे-तीसरे घर में वो तमाम तकनीकी और जीवन को सुगम बनाने वाली सुविधाएं मौजूद हैं.जब तक मैं था या फ़िर मेरे साथ के और लड़के गांव में थे तब तक तो स्थिति बड़ी ही सुखद थी.मेहँदी हसन,परवेज़,जावेद,नौशाद,वारिश,कलीम सभी लड़के होली में रंगे नज़र आते थे और दीवाली में इनके घरों में भी रौशनी की जाती थी,और सब-ऐ-बरात पर हमारे यहाँ भी रौशनी की जाती.होली में मेरे यहाँ तीन चरणों में होली मानती है पहले रंगों वाली(इस होली में बच्चे-बच्चियां ,किशोर-किशोरियां शामिल होते),दुसरे में बूढे,जवान,बच्चे सभी शामिल होते ,जोगीरा गाया जाता और धूल,कीचड़ आदि से एक दूसरे को रंग कर एकमेक कर दिया जाता मानो सब एक दूसरे को यही संदेश देते थे कि आख़िर मिटटी का तन ख़ाक में ही तो जाना है क्यों विद्वेष पालना,फ़िर नहाने-धोने के बाद तीसरे चरण की होली साफ़-सुथरे,नए कपडों में अबीर और गुलाल से खेली जाती.यहाँ सिर्फ़ त्योहारों में ही नही बल्कि दिनचर्या में भाईचारा दीखता था जब कोई भी दुखहरण काका के सेहत की ख़बर ले लेता था और गांव की भौजाईयों से चुहल करता हुआ निकल जाता.घरो या बिरादरी का बंधन,मुसलमान ,हिंदू जातिभेद हो सकता है रहा हो पर उपरी तौर पर नहीं ही दिखता था.इससे जुड़ा एक वाकया याद आता है जो मेरे ही परिवार से ही जुडा है.हुआ यूँ था कि मेरी सबसे छोटी बहन बीमार थी मैं भी मिडिल स्कूल का छात्र था.तब हर जगह से निराश होने के बाद पिताजी ने व्रत लिया की रोजे और ताजिया रखेंगे जो बाद में हुआ भी और मुहर्रम के समय लगातार २ साल तक पिताजी ने ताजिया ख़ुद बनाया और जगह-जगह घुमाने के बाद कर्बला तक मैं ख़ुद अपने कंधो पर ले गया था जिसमे मेरे दो फुफेरे भाई और चंदन,संतोष जैसे दोस्त भी थे.मुहर्रम के अवसर पर निकलने वाले अखाडे में हमारे सभी धर्म-वर्ग के कोग अपने-अपने जौहर दिखाते थे.हिन्दुओं में ये अखाडा रक्षा-बंधन की शाम को निकलता था.इसे महावीरी अखाडा कहा जाता इस अखाडे में लतरी मियाँ(इनका असली नाम मुझे मालूम नहीं )के लाठी का कौशल आसपास के दस गांवों के लठैतों पर भारी था.अच्छा हुआ गांव की इस स्थिति को देखने से पहले ही अल्लाह ने उन्हें ऊपर बुला लिया.अब जबसे गोधरा हुआ है (गोधरा ही सबसे अधिक जिम्मेदार है क्योंकि अयोध्या अधिक दूर ना होने के बावजूद गांव का माहौल ख़राब न कर सका था या यूँ भी कह सकते हैं कि संचार माध्यमों की पहुँच इतने भीतर तक तब नहीं हुई थी)अब त्यौहार और अखाडे हिन्दुओं और मुसलमानों के हो गए हैं.नए लड़के तो पता नहीं किस हवा में रहते हैं,अपने साथ के लड़के भी जो अब बाहर रहने लगे हैं अजीब तरीके से दुआ-सलाम करते हैं.वारिश गांव में ही है कहता है-'इज्ज़त प्यारी हैं तो भाई इन छोकरों के मुंह ना लगो ,ये इतने बदतमीज़ हैं कि गांव की लड़कियों पर ही बुरी निगाह रखते हैं,बड़े-छोटों की तमीज तो छोड़ ही दो,ये तो पता नहीं किस जमाने की बात इन्हे लगती है"-मैं हैरत से देखता रहा उन लड़कों को जो बाईक पर बैठ कर तेज़ी से बगल से गुज़र जाते हैं और पता नहीं कैसा हार्न मारते हैं जिससे कि खूंटे से बंधे मवेशी बिदक जाते हैं.निजामुद्दीन चाचा जिनके लिए कहा जाता है कि उनके लिए उनकी अम्मी ने "छठ"का तीन दिवसीय बिना अन्न-जल के व्रत रखा था और मरने तक बड़ी खुशी से बताया करती थी कि "हमार निजाम,छठी माई के दिहल ह"-निजाम चाचा भी इस बात को एक्सेप्ट करते थे.आजकल दिल्ली में ही हैं और घर कम ही जाते हैं.रमजान बीते ज्यादा दिन नहीं हुए मगर ईद पर यूँ ही हॉस्टल के कमरे में रह गया बिना सेवईयों के.जब रोजे चल रहे थे तब फ़ोन किया कि -अब तो पिताजी कि ऐश होगी रोज़ इफ्तार के बहाने कुछ न कुछ बनाने की डिमांड करेंगे?'-मम्मी ने जवाब दिया-'बाक अब वे इफ्तार नही करते?'-हमारे घर में इफ्तार मुसलमान भाईयों के कम्पटीशन में होता था यानी पिताजी का मानना था कि-'खाली उन्ही की जागीर है क्या इफ्तार'-पिताजी बाकायदा नियम-कायदे से इफ्तार करते और शुरू करने से पहले हमसे मुस्कराकर कहते -'अभी कोई नहीं खायेगा पहले अजान हो जाने दो'-और हम पालन भी करते.मतलब एन्जॉय करने का कोई भी मौका नही छोड़ा जाता,ऐसा करने वाली फैमिली सिर्फ़ हमारी ही नहीं थी और भी कई थे पर अब...(?).खेतों में धान बोते मजदूरों के साथ लेव (धान बोने से पहले खेत में तैयार किए कीचड़)में खड़ा होने पर गांव के रिश्ते का भतीजा जो पटना में मेडिकल या इंजीनियरिंग की तैयारी करता है मुझसे उखड़े हुए बोला-'क्या मुन्ना चा (भोजपुरी समाज में चाचा को नाम के साथ चा जोड़ कर बोला जाता है)दिल्लियो रह कर भी एकदम महाराज एटिकेट नही सीखे अपना नहीं तो हम लोगों का ख्याल कीजिये महराज"-मैं सोचता हूँ अपने खेत में खड़ा होना भी किसी एटिकेट की मांग करता है क्या?अब मेहँदी मियाँ हाजी हो गए हैं और 'मिलाद'पढ़ते हैं पाँच वक्त के नमाजी हैं.दूर से मुस्कराकर निकल जाते हैं ये लड़का गांव का पहला पेस बॉलर था.श्याम बाबा कह रहे थे-'ऐ बाबा(ब्राह्मणों को बाबा कहते हैं)कहाँ-कहाँ कौन से टोला में घूमते रहते हो तुम्हे पता नहीं अब गांव का माहौल कितना ख़राब हो गया है?-अब मैं उनकी इस बात का क्या जवाब दूँ चुपचाप हूँ-हाँ कर देता हूँ.गांव में रिजर्व सीट होने के बाद सवर्णों की चिंता हैं कि'पता नहीं गांव का क्या होगा ?'-मेरा गांव बदल गया है और शायद ये बदलाव पुरे आसपास में हो रहा है........

10/6/08

गीत ऐसे की बस जी भर आए......


कभी-कभी कुछ गीत हमारे अंतर्मन को इतने गहरे छु जाते हैं कि उन्हें सुनते ही मन करता है कि बस समय रुक जाए और आँखें बंद करके खिड़की से ढलते हुए सूरज को की तपिश ली जाए.या फ़िर यूँ कि कमरे के अकेलेपन से निकल कर थोड़ा रिज़ की ओर चलें और थोड़ा नोश्ताल्जिक हो जाए वैसे इन गानों को सुनते सुनते हम इस लोक के आदमी नहीं रहते महाकवि जायसी के शब्दों में "बैकुंठी हो जाते हैं".गुलज़ार इस मामले में थोडी अधिक ऊंचाई पर हैं उनकी फिल्मों के गाने इतने ख़ास होते हैं कि आप एक बार में उसकी गहरे को महसूस नहीं कर सकते, ये गाने बहुआयामी अर्थवत्ता लिए होते हैं,आप उन्ही की एक फ़िल्म "मौसम"के गाने-"दिल ढूंढता है फ़िर वही,फुरसत के रात-दिन /बैठे रहे तसव्वुरे..."को जितनी बार सुनते हैं उतनी बार अज्ञात भावो और यादों में खो जाते है.ये महज़ सिर्फ़ इस गाने कि बात नहीं है या फ़िर गुलज़ार की बात ही खाली नहीं है हम ऐसे ही कुछ गानों की बात कर रहे हैं.-फ़िल्म-'रुदाली' के 'दिल हूम हूम करे घबराए..'को याद कीजिये..नायिका के चेहरे और क्रियाव्यापार के साथ जैसे ही लताजी की आवाज़ थोडी ऊँची पिच पर आकर "तेरी ऊँची अटारी ई ई ई ...मैंने पंख लिए कटवाए "कहती है दिल बरबस ही भर आता है.ये दो गाने ऐसे हैं कि बस मन करता है जीभर के रोये बस रोते ही रहे,कारण पता नही कोई इतना बढ़िया कैसा लिख सकता है कोई कैसे गा सकता है?-"सत्या"(रामगोपाल वर्मा वाली)अपने नए किस्म के प्लाट के कारण काफ़ी चर्चित रही थी.इसका एक गाना "सपने में मिलती है"-it फेमस हुआ था कि आज भी सभी शादियों में तकरीबन बज ही जाता है पर इसी फिम का एक और गीत था जो फेमस तो नहीं हुआ पर शायद इस फ़िल्म के किरदारों और कहानी के बीच खो सा गया ,ये गीत था-"बादलों को काट काट के नाम अपना..."-ये अकेला गाना नायक सत्या के नायिका विद्या के प्रति प्यार के इंटेंसिटी को दर्शा देता है सत्या का किरदार सभी को काफी अपना लगा था पर इस गाने को सुनने के बाद आप सत्या के प्रेम की इंटेंसिटी अपने भीतर अपने प्यार के प्रति महसूस करेंगे ..रूह को छू लेने वाले लम्हों के नाम इन असंख्य गीतों को सलाम /इनके लिखने वालों को इनके म्यूजिक कम्पोज करने वालों को भी..ये गाने खाना खाते ,काम करते ,बीजी शिड्यूल में रह कर सुनने के नहीं है इनके लिए एक नितांत खाली सा समय ,रुका सा मौसम ,शान्ति के साथ अच्छे दिल के साथ वाला समय चाहिए ...ये एक अलग सुकून देते हैं इनके लिए समय जो केवल इनका समय हो इसकी डिमांड करते हैं.

मिनाक्षी,मोबाइल और पुलिस-रिपोर्ट


यूनिवर्सिटी में दिन भर इधर-उधर की (इसमे पढ़ाई भी शामिल है)हांक के,बिना बात के दौड़-भाग के जब हालत पस्त हो जाती है तब सभी लोगों का ध्यान चाय के स्टालों की ओर हो आता है. ये तकरीबन रोज़ की रूटीन में शामिल है और अब ये एक हद तक व्यसन की स्टेज में पहुँच गया है.इसी आदत या लत आप जो भी मान लें ,के फेर में हम तीन जने,मैं,मिहिर और मिनाक्षी पास के ही निरुलाज पहुंचे.बहाना कॉफी पीने का था.कॉफी के साथ-साथ तमाम तरह की जरुरी-गैरजरूरी बतरस में हम तीनों ऐसे खोये कि,यह ध्यान ही ना रहा कि मिनाक्षी ने निरुलाज में अपना मोबाइल छोड़ दिया ,चूँकि हमे वहां से निकले बस ५-७ मिनट ही हुए थे ,हम तेज़ी से वहां गए अपनी जगह को देखा और मोबाइल को वहां ना पाकर काउंटर पर मैनेजर से बात की मगर सब बेकार मोबाइल नही मिलना था नही मिला.अब बारी परेशान होने की थी.दोस्तों ने सलाह दी कि भइये,सबसे पहले नंबर ब्लाक कराओ और फ़िर तुंरत पुलिस कम्प्लेन करो वरना किसी ग़लत हांथों में पड़ गया तो लेने के देने पड़ जायेंगे.थाने गए हम एफ.आई.आर.दर्ज कराने वो तो लाख कोशिशों के बाद नही हुआ बस उनके कागजी कार्यवाही की रेंज बस इतनी थी कि अपना मोबाइल का मॉडल नंबर,कलर,कम्पनी,और ई.एम.ई.आई.नंबर तथा कहाँ खोया है लिख कर एक अप्लिकेशन दाल दो और उसके जेरोक्स पर हमारे थाने की मोहर ले लो और जाकर उसी नंबर का दूसरा कार्ड जारी करवा लो.निश्चिंत रहो.हमे थोड़ा-बहुत चूं-चपड़ करने की कोशिश की मगर डपट दिया गया.जाओ यहाँ से मोबाइल की रिपोर्ट नहीं लिखी जाती,अगर संभाल नहीं सकते तो मोबाइल लेकर पढने क्यों आते हो?-अब मिनाक्षी ने नया नंबर ले लिया है और गले में टांग के घूम रही है ताकि ये सेट गलती से भी कहीं ना छूटे.पुलिस वालों का भी तो कोई भरोसा नहीं है.

10/3/08

श्याम चित्र मन्दिर...ढलते समय में

पिछले पोस्ट का शेष....
श्याम चित्र मन्दिर के अपने कई अनुभवों को मैंने आप तक पिछली पोस्ट में पहुँचाया था.इस बार इस सिनेमा हॉल की कुछ और अनूठी बातें जानिए....

पारसी थिएटर याद है....?- बस,ऐसा ही कुछ था श्याम चित्र मन्दिर के प्रचार का ढंग .मसलन जैसे ही कोई नई फ़िल्म आती थी तो उसका बड़े जोर-शोर से जुलूस निकाला जाता था.२-३ तीन पहिये वाले रिक्शे पूरे दिन के लिए किराए पर लाये जाते थे फ़िर उनपर तीन तरफ़ से फ़िल्म के रंग-बिरंगे पोस्टर लकड़ी के फ्रेमों में बाँधकर लटका दिए जाते थे और एक भाईसाब उस रिक्शे में चमकीला कुर्ता पहनकर माइक हाथो में लेकर बैठ जाते थे और रिक्शे के पीछे-पीछे ७-८ सदस्यीय बैंड-बाजे वालो का गैंग चलता था जो मशहूर धुनें बजा-बजाकर लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा करते थे.वैसे ये परम्परा अब भी बरक़रार है मगर बैंड-बाजो की जगह रिकॉर्डर ने ले ली है.पीछे-पीछे बैंडबाजे और रिक्शे में सवार हमारे स्टार कैम्पैनर माइक पर गला फाड़-फाड़कर सिनेमा का विज्ञापन करते रहते.इसकी एक झलक आपको भी दिखता हूँ,-

"फ़र्ज़ कीजिये फ़िल्म लगी है -'मर्डर'.तो हमारे प्रचारक महोदय कुछ यूँ कहेंगे -'आ गया, आ गया, आ गया,जी हाँ भाइयों और बहनों आपके शहर गोपालगंज में श्याम चित्र मन्दिर के विशाल परदे पर महान सामाजिक और पारिवारिक संगीतमय फ़िल्म 'मर्डर'(वैसे भोजपुरी प्रदेश होने की वजह से 'मडर'शब्द ही चलता था).पीछे से बैंडबाजों का तूर्यनाद होने लगता था-'तूंतूं पींपीं ढम ढम' जैसा कुछ-कुछ.फ़िर गले को और पतला और पता नही कैसा बनाकर आवाज़ निकालता (रेलवे स्टेशनों पर 'ले चाई गरम की आवाज़ जैसा कुछ-कुछ)-जिसके चमकते,दमकते,दिल धड़काने वाले सितारे हैं-मल्लिका शेहरावत,इमरान हाशमी,इत्यादि.फ़िर से बैंड-बाजों का समर्थन.कुछ 'अ' श्रेणी के प्रचारक तो बाकायदा उस फ़िल्म के गीत गाकर भी सुनाते थे,और साथ ही ,उस फ़िल्म के नायक-नायिका का विशेष परिचय भी देते थे,जैसे-सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के बेटे की पहली फ़िल्म.आदि.बस इतना जानिए की फ़िल्म पूरे जीवंत माहौल में लगायी,दिखाई और प्रचारित की जाती थी क्या मल्टीप्लेक्स में वो मज़ा है?

फिल्मोत्सव मनाने जैसा कुछ-कुछ.-हमारा घर शहर के पास ही था और हमारे सभी रिश्तेदार गांवों से आते थे. पुरुषों का तो पता नहीं पर औरते जब भी आती थी तो अपने गांव के अपने पड़ोसियों को भी लेती आती थी.इसके पीछे भी दो मकसद होते थे,पहला तो ये कि इन लोगों की कुछ खरीददारी वगैरह भी हो जायेगी और दूसरा ये कि इसी बहाने एक सिनेमा भी देख लेंगी. अब चूँकि ये हमारी रिश्तेदार होतीं थी तो इन्हे कम्पनी ना देने पर नातेदारी में बेईज्ज़ती का खतरा कौन मोल ले.तो हमारा और उनका पूरा कुनबा सिनेमा हाल की तरफ़ प्रस्थान करता था.जिस समय-पाबन्दी की बात गाँधी जी कर गए थे उसकी जीती-जागती मिसाल ये महिलाएं और फैमिली होती थी.फ़िल्म शुरू होने से शार्प एक घंटा पहले इनकी रेलगाड़ी वहां पहुँच जाती और श्याम चित्र मन्दिर के स्टाफ इनके लिए सिनेमा हाल के कारीडोर में ही टेम्परेरी प्रतीक्षालय बना देते. सिनेमा में घुसकर ये फौज सिनेमा को अपने भीतर आत्मसात कर लेती थी.पूरा रसास्वादन.यानी हीरो-हिरोइन के साथ हँसना -रोना और विलेन या वैम्प को जी भर कोसना.कुल मिलाकर ये जानिए कि कई रिश्तेदारियां भी श्याम चित्र मन्दिर के बहाने बनी और टिकी रहीं.यहाँ जीजाजी लोग अपनी बीवी और सालियों के साथ आते थे पिताजी कि उम्र के लोग अपनी जमात के साथ और माता जी बहनों और छोटे बच्चों के साथ अब फ़िल्म चाहे हिट हो या सुपर-फ्लॉप इसका प्रभाव नही पड़ता था,सिर्फ़ एक हिट गाना या हिट सीन काफ़ी था देखने के लिए.अगर फ़िल्म ठीक ना भी रही हो तो अपने तर्क गढ़ लिए जाते ताकि पैसा बरबाद हुआ है ऐसा ना लगे.

पोस्टरों में अपनी शक्ल तलाशना-पहले पोस्टर पर लिखा आता था -'ईस्टमैन कलर'इस ईस्टमैन तलाश भी काफ़ी बहसों में रही.महेश बाबु कहते थे (हमारे स्कूली जीवन के सिनेमा एक्सपर्ट )कि 'अजी कुछो नहीं ई जो कलर है ना ,सब बढ़िया प्रिंट वाला फिलिम के लिए लिखा जाता है समझे?'- अपनी बात और पुख्ता करने के लिए कहने लगते-'अमिताभ ,मिथुन,धरमेंदर चाहे सन्नी देवल के फिलिम का पोस्टर देखना सबमे ई लिख रहता है',-उनके इतना कहने के बाद शक की कोई गुंजाईश ना रहती थी. उन दिनों स्कूल से घर जाने का एक शोर्टकट रास्ता होता था जिसे हम शायद ही चुनते,इसका कारण था कि बड़े(थोड़ा ही)रास्ते पर श्याम सिनेमा का पोस्टर वाला पोर्शन पड़ता था ,पोस्टर में हीरो के आड़े-टेढे चेहरे के हिसाब से हम अपनी शक्लें बनाया करते,या हीरो ने जैसा एक्शन किया होता वैसा ही करने की कोशिश करते(वैसे ऐसी तलाश भी कभी ख़त्म हुई है क्या?)

शहर छूटने के साथ ही श्याम चित्र मन्दिर छूट गया इसकी भरपाई कभी भी ना हो सकेगी.जब भी यहाँ दिल्ली में मल्टीप्लेक्सों में जाता हूँ तो एक अजीब-सा बेगानापन घेर लेता है लगता है कि पता नहीं ये कौन-सी जगह है.वही फिल्मिस्तान(बर्फखाना)या अम्बा(मल्कागंज सब्जी मंडी)का माहौल थोड़ा-सा ही सही वैसा ही जीवंत लगता है.काफ़ी समय पहले दूरदर्शन ने 'नाइन गोल्ड' नाम से एक चैनल शुरू किया था जो मेट्रो चैनल के ऑप्शन में आया था शायद,उसी पर एक प्रोग्राम आता था-"directors cut special"-उसमे एक बार मिलिंद सोमन अभिनीत "जन्नत टाकीज" टेलीफिल्म देखि थी.बस तभी श्याम चित्र मन्दिर आंखों के सामने तैर गया.इससे जुड़ी यादें कभी ख़त्म ना होने वाली धरोहर के तौर पर हमेशा दिल में रहेगी कि कोई तो ऐसा हॉल था जो अपना-सा लगता था।

२००७ जून का समय- श्याम चित्र मन्दिर का विशाल परदा "वही लार्ज़र देन लाइफ" छोटा-सा लगने लगा है(शायद ७० एम्.एम् नहीं है).दीवारें गुटखे और पान चबाने वाले भाईयों ने रंग डाली हैं और आपके ना चाहते हुए भी इन सबकी गंध आपके नथुनों में घुसी आती है,चलते हुए रोमांटिक दृश्यों में लेज़र लाईटों से कुछ छिछोरें हिरोइन के अंगों पर उस लाइट से लोगों का ध्यान लाते हैं,इसके पुराने मालिक गुज़र गए हैं और नए पता नहीं कैसे हैं.पुराने गेटकीपर गंगा भगत नौकरी छोड़ चुके हैं और अपने पोतों में व्यस्त हैं. और हाँ अब वैसा पारिवारिक मिलन यहाँ देखने को नही मिलता,या सच कहूँ तो अब परिवार वाले फ़िल्म देखने आते ही नहीं.महेश बाबु दुबई में कमा रहे हैं और सिनेमा देखने चलने पर कह गए -'अरे छोया मुन्ना भाई,कौन स्साला तीन घंटा गर्मी,उमस और गंध में बितावेगा ?चल अ घरे चाय-चु पीते हैं.श्याम चित्र मन्दिर वाले रोड पर शाम को अब अँधेरा ही रहता है,लोग कहते हैं कि यहाँ नाईट शो देखना खतरे से खाली नहीं.मैन पिछली बातें याद करता हूँ जब हम बच्चे आपस में क्विज खेला करते कि -'बताओ कौन-सा मन्दिर ऐसा है जहाँ आप सभी जूते-चप्पल पहनकर भी जा सकते हैं?"-और एकमत से जवाब मिलता -"श्याम चित्र मन्दिर"............और अब...?

10/1/08

मोनू दा और गाँधी जयंती ....

मोनू दा नए पियाक तो नहीं हैं ,हाँ मगर पिछले दो सालों में ये हिसाब-किताब कुछ कम जरुर हो गया था. आजकल जबकि उनके आसपास के सभी लोगों का समय ठीकठाक चल रहा है तो हर दूसरे दिन कोई-न-कोई कुछ-न-कुछ लेकर आ जाता है जिसे देख उनसे मना नहीं किया जाता.पिछले दिनों कुल्लू जॉब छोड़ कर आया और इस खुशी में(?)उसने मोनू दा को पहले 'रेड वाइन' फ़िर 'स्कोच'पिला दी.बस क्या था रोज़ 'ओल्ड मोंक' रम पीने वाले मोनू दा एकाएक ही इस ब्रह्म-सत्य को पा गए की ये क्या आज तक मैंने ,आख़िर मैंने पहले इसे क्यों नहीं चखा था?बस जबसे मोनू दा के हिय में यह मुई अंगूर की बेटी 'रेड वाइन'और 'स्कोच' चढी है,मेरी जान सांसत में आ गई है.उनका कोई भी असाईनमेंट इसके बिना पूरा नहीं होता.अब लगता है कि एम्.एस.सी.(फिजिक्स)की तरह ही कहीं उनका 'लाइब्रेरी साइंस'भी आधे में ना छूट जाए.
आज सुबह अखबार देखते ही मैंने कहा कि 'मोनू दा जोधपुर में सैकडों लोग मारे गए'तो उन्होंने कहा -'हाँ यार ,सब समय का फेर है देवी नाराज़ चल रही हैं'-मैंने सोचा मोनू दा देश-दुनिया की भी थोडी बहुत ख़बर रखते हैं और एक मैं हूँ कि इनकी अच्छाइयों की ओर ध्यान ही नहीं देता खाली उनके पियाकपने को लेकर झाड़ पिलाता रहता हूँ.फ़िर मैंने कहा कि मोनू दा कल गाँधी जयंती हैं ,मेरे साथ गाँधी-भवन चलिए.उन्होंने पता नहीं पूरी बात सुनी या नहीं तुंरत चौंक कर बोले-'अरे तब तो कल ठेका बंद रहेगा ,कल ड्राई डे रहेगा.'-मुझे गुस्सा आया मैंने खीझ कर कहा -'मोनू दा आपके लिए इस दिन का कोई मतलब नहीं है कि कल गाँधी जी का जन्मदिन है?'-मोनू दा मुस्कुराये और बोले-'गाँधी जी महान हस्ती थे इस बात से मैं कहाँ इन्कार कर रहा हूँ .मगर जो कुछ भी इस समय हमारे देश में चल रहा है उसमे इस जयंती को मनाने का कोई अर्थ नहीं रह गया है.'-मुझे लगा आज सुबह ही रात का खुमार चढ़ गया है.मोनू दा कहते रहे कि'यार मुन्ना तुझे क्या लगता है कि गाँधी को कोई याद इसलिए करना चाहता है कि वह उनके आदर्शों को मानता है या उनके पदचिन्हों पर चलना चाहता है. नही ये सब नौटंकी इसलिए हो रही है कि अपनी रोटी और इमेज दोनों सेंकी और बनाई जा सके हालांकि इसके मायने भी अब कुछ नहीं है क्योंकि जनता भी अपने(...)को ही वोट करती और चुनती है.अभी थोडी-थोडी गाँधी कल सबके भीतर घुस जायेंगे और सभी खादी पहनकर चमक लेंगे और शाम होते ही कहेंगे ओ डैम इट कल फ़िर काम पर जाना होगा .तो मुन्ने राजा हमारे लिए ये ड्राई डे का ही मायने लेकर आता है'-मैं उनके इस वाक्य पर मन-ही-मन कुढ़ गया.लारा सर कहते हैं कि 'मोनू जैसे लड़के बनते कम है मियाँ'-मैं कहता हूँ-' अजी छोडिये सब पीने-पिलाने के अपने बहाने हैं'.
सुबह की इस बहस के बाद मैंने सोचा कि मोनू दा ने जबसे धूमिल की कविताएं पढ़नी शुरू की हैं तभी से कुछ बेसिए सेंटिया गए हैं.फ़िर एक मन ये भी कहता है कि 'सही भी तो है जब देश में चारो ओर मार-काट मची है लोग जिंदा जलाए जा रहे हैं ,औरतों और बच्चों का भी फर्क मिट गया है ,बम ब्लास्ट हो रहे हैं एक पूरी कौम दरी-सहमी हुई है कि पता नहीं कब उसके साथ क्या हो जाए .ऐसे माहौल में जबकि गाँधी की जरुरत सबसे ज्यादा है गाँधी हममे से नदारद हैं.इस जयंती के मायने खाली मोनू दा के लिए ड्राई डे का ही है या इस जमात में और भी हैं जिनकी छुट्टी आ रही है कम-से-कम एक दिन की ही सही.

9/29/08

हंसने मुस्कुराने के लिए ....

ज़िन्दगी से जब भी थोडी ऊब हो तब कुछेक कवियों की रचनायें बड़ी सहजता से हमारे होंठो पर एक मुस्कराहट छोड़ जाती हैं । पेश है कुछ ऐसे ही कवियों की रचनायें ,उम्मीद करता हूँ उन्हें(कवियों को ) बुरा नहीं लगेगा -

(1) "जनता ने नेता से हाथ जोड़कर पुछा -
माई-बाप ,क्या आप भी यकीन करते हैं समाजवाद में?
नेता ने मुर्गे की टांग चबाते हुए कहा-
पहले हम समाज बाद में। "

(२)"एक अति आधुनिका
कम-से-कम वस्त्र पहनने की करती है अपील
और पक्ष में देती है ये दलील कि -
'नारी की इज्ज़त बचाने का यही है अस्त्र ,
तन पर धारो कम-से-कम वस्त्र।
फ़िर पास नहीं फटकेगा कोई पापी दुशासन जैसा
जब चीर ही ना होगा तन पर तब ,
चीरहरण का डर कैसा'।"

(3)देख सुंदरी षोडशी मन बगिये खिल जाए
मेंढक उछलें प्यार के ,जिया हिया हिल जाए
जिया हिया हिल जाए ,बिमारी है यह खोटी
रोटी भावे नहीं फड़कती बोटी-बोटी
पुष्ट पहलवां भी हो जाता ढीलम-ढीलू
चिल्लाये दिन-भर बेचारा -इलू .इलू.इलू। -(काका हाथरसी)

(४)एक डाकू ने एक लखपति की पत्नी का अपहरण किया
बदले में एक लाख की फिरौती हेतु पत्र लिखा ।
जवाब में लखपति ने डाकू को ख़त लिखा -
'श्रीमान ,आपका चरित्र हमें बहुत अच्छा दिखा।
अब मैं शीघ्र ही दूसरी शादी कर रहा हूँ
अतः कुछ दिनों बाद पुनः आईयेगा
यदि वो अच्छी लगे,तो प्लीज़ .....
उसे भी ले जाईयेगा।

.............ये कुछ जाने-अनजाने कवियों की रचनायें हैं जो कहीं मैंने सुनी कहीं पढ़ी है। मुझे अच्छी लगी अब आपके लिए पर इसमे मेरा योगदान आप सभी तक इसे पहुंचाना है बस। थोड़ा -सा आप भी मुस्कुरा ले और उन कवियों का लिखना सार्थक हो जायेगा।

9/23/08

ये हिंदू प्रेत्तात्मा है...जीसस से नही डरेगी.

पिछले दिनों यूनिवर्सिटी के पास ही फिल्मिस्तान सिनेमा हॉल में हाल ही में आई फ़िल्म"१९२०" देखने गया था। इस फ़िल्म को देखने के पीछे दो मोटिव थे,पहला तो ये कि,मुझे होरर(भुतिया)फिल्में पसंद हैं ,दूसरा ये कि ,इस फ़िल्म में पंडित जसराज ,परवीन सुल्ताना ,शुभा मुदगल जैसे आर्टिस्टों ने गीत गाया था। खैर, गीतों के साथ -साथ जिस तरह के माहौल को मैंने वहां देखा तो लगा कि सही में अपने यहाँ वाले दर्शक जैसे ही होंगे (श्याम चित्र मन्दिर टाइप)। अब बातें फ़िल्म की -दरअसल ये कहानी एक ऐसे जोड़े की है जो एक पुरानी हवेली में इस इरादे से आता है कि उसे तोड़ कर वहाँ एक होटल बनाया जा सके। हवेली अभिसप्त है ,भुतिया है। यहाँ आए पहले दो लोग संदिग्ध स्थितियों में मारे जा चुके हैं। ये जोड़ा (नायक-नायिका)इस बात से बेखबर है। वैसे एक ध्यान देने वाली बात ये है कि हीरो ,जो की हिंदू है एक अनाथ लड़की(हिरोइन) से अपने घर परिवार धार्मिक संस्कारों से टकराकर शादी करता है। लड़की चूँकि ईसाई है और उसकी परवरिश भी चर्च में हुई है तो उसकी निष्ठा अभी इश्वर में है।पर कहानी ये नहीं है । दरअसल हिरोइन उस प्रेत्तात्मा के जड़ में आ जाती है और उसके निदान हेतु वह पास के गावं में रह रहे पादरी से संपर्क करती है। पादरी हिरोइन की हवेली में आता है और अपने तंत्र -मंत्र (ईसाईयों के धर्मग्रन्थ बाईबल के अनुसार)से कुछ जुगत करता है जिससे कि हिरोइन का जीवन सही तरीके से चले मगर असली ट्विस्ट यहीं से शुरू होता है। फ़िल्म में एक से बढ़कर एक घटनाएं होने लगती हैं और दर्शकों को भूत के तरह-तरह के कारनामें देखने को मिलते हैं।

भूत पादरी के क्रास को उल्टा कर देता है ,पादरी उसे एक बार ठीक करता है मगर व्यर्थ क्रास फ़िर उलट जाता है। अब सिनेमा हाल में मुझे एक नए किस्म का कम्मेंट सुनने को मिला-"ये हिंदू भूत है फादर से नही भागेगा " या "फादर की फट गई "जैसे कुछ अन्य विशेष शब्द भी। मैं ही नहीं मेरे साथ के सभी लोग चौंके ,कि ये क्या कहा उसने?मगर परदे पर घट रहा हर दृश्य यही दिखा रहा था लोग-बाग़ भी उसे इसी चश्मे से देख रहे थे। अब फ़िल्म देखने का जोश ही ठंडा पड़ गया। हिंदू भूत दर्शकों को ज्यादा फैमिलिअर लगने लगा था ,ये भूत भी हीरो का कुछ नहीं कर रहा था बल्कि हिरोइन का ही बुरा कर रहा था (हिरोइन का नाम फ़िल्म में लिजा है)।फ़िल्म के अन्तिम दृश्य में हीरो ही आख़िर में इस हिंदू भूत से पार पाता है।इस अन्तिम दृश्य में पादरी हार चुका होता है और हीरो अपनी नायिका को बचाने के लिए "हनुमान चालीसा" का पाठ करता है और भूत भाग जाता है। दर्शकों में से फ़िर आवाज़ उठी कि 'देखा...था ना हिंदू भूत ,"साथ ही 'जय श्रीराम 'का नारा भी गूँज गया ।

मैंने सोचा 'यह भी खूब रहा ,आया सिनेमा देखने और दिख गई वर्तमान राजनीति की झलक।'-आज के अखबार में भी २ ईसाइयों के मार दिए जाने की ख़बर है(देहरादून में)। इससे पहले उडीसा ,कर्नाटक और मध्यप्रदेश की घटनाओं को बीते अभी ज्यादा दिन नहीं हुए(पता नहीं ये बीती घटनाएं हैं या फ़िर तूफ़ान के पहले की खामोशी है)। क्या वाकई जीसस से ये भूत नहीं जाएगा ?शयद नहीं ही क्योंकि उस महान आत्मा ने चीख कर कारण बता ही दिया था कि ये प्रेत्तात्मा तो हिंदू है तो इसका इलाज़ जीसस के पास नहीं है जीसस तो इससे तो हारेगा ही। क्या हनुमान चालीसा ही इसका उपाय है ?अगर हाँ..तो फ़िर क्या समझा जाए कि बजरंगी सेना यही कर रही है पर ईसाई भूतों (इंसानों )के साथ । जो भी हो निर्माता ,निर्देशकों ने सिनेमा में गलती से ही सही मगर अपना स्टैंड दिखाया है कि ये फ़िल्म सबके लिए नही है यही समझा जाए क्या या फ़िर उस सिरफिरे दर्शक की बेवकूफी समझ कर भूल जाया जाए?मैं तो सोच रहा हूँ कि अगर इस प्रेत्तात्मा ने गलती से मुझे पकड़ लिया तो मैं कैसे बचूंगा मुझे तो ये 'हनुमान चालीसा'भी नहीं आती।

9/20/08

श्याम चित्र मन्दिर (सिनेमा रोड)

घर से तक़रीबन १०-१२ साल हो गए हैं बाहर रहते मगर आज भी जब कभी वहां जाना होता है तो शहर के सिनेमा रोड पर पहुँचते ही दिल की धड़कने अचानक ही बढ़ जाती हैं।ये वह सड़क है जहाँ मैं और मेरे साथ के और कई लड़के बड़े हुए ,समय -असमय ये बाद की बात है। श्याम चित्र मन्दिर हमेशा से ही हम सभी के आकर्षण का केन्द्र बिन्दु रहा था,चाहे कोई भी फ़िल्म लगी हो श्याम चित्र मन्दिर जिंदाबाद। बगल में डी.ऐ.वी.हाई स्कूल है जहाँ से मैंने दसवीं पास की थी। स्कूल में हमेशा ही विज्ञान और मैथ पहली पाली में पढाये जाते थे,मगर मैं ठहरा मूढ़ उस वक्त भी खाम-ख्याली में डूबा रहता था। कभी पास ही के रेलवे स्टेशन पर जाकर स्टीम इंजिन के गाड़ी पर लोगों के जत्थे को चढ़ते उतरते देखता ,तो कभी स्टेशन के पटरी के उस पार के जलेबी के पेडों से जलेबियाँ तोड़ना यही लगभग पहले हाफ का काम था । इस बीच महेश ने मुझे श्याम चित्र मन्दिर का रास्ता सूझा दिया ,फ़िल्म थी -अग्निपथ। भाईसाब तब अमिताभ का नशा जितना मत्थे पे सवार था उतना तो शायद अब किसी और के लिए कभी नहीं होगा। अमिताभ जी की इस फ़िल्म ने पूरी दिनचर्या ही बदल दी। अब शुरू हो गया श्याम सिनेमा के बाबु क्लास (माने २ रूपया वाला दर्जा जो बिल्कुल ही परदे के पास होता था )में ३ घंटे बैठ कर गर्दन को उचका कर फ़िल्म देखना जिसमे हीरो के सुखो-दुखों में हम उसके साथ-साथ होते थे। कई बार तो हीरो और उसके ग़मों का इतना गहरा प्रभाव होता था की आंखों के किनारे सबसे बचा कर पोंछ लेना पड़ता था ताकि अगले दिन महेश मजाक ना बनाये -"ससुर तू उ नाही ....लड़की कही का रोअनिया स्साले ...फिलिम देख के रोता है हीहीही "।

श्याम चित्र मन्दिर माने हमारा दूसरा स्कूल ।यहाँ हमने रिश्ते जाने ,प्यार सीखा ,दुश्मनी सीखी, दोस्ती सीखा,बवाल काटना सीखा ......मतलब की अब हमारी दैनिक रूटीन में कुछेक संवाद आ गए the मसलन -"रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं...,जानी जिनके खुदके घर शीशे के हो वो..,अब तेरा क्या होगा..,इत्यादि। ये वो समय था जब अमिताभ जैसों का जादू ख़त्म हो चला था और नए चेहरे फिल्ड में आ गए थे। फ़िर भी हमारे इस सिनेमा घर में पुरानी फिल्में ही अधिकाँश लगती थी आज भी अभी नई फिल्में वहां जल्दी नहीं पहुँचती । "सत्या"ने पूरे भारत में धूम मचाई थी मगर श्याम सिनेमा में दूसरे दिन ही उतर गई थी। गंगा भगत ,जो बाबु क्लास के गेटकीपर थे ने उस रोज़ उदास होकर बताया था कि'अरे बाबु पता न कईसन फिलिम बा की सब कौनो अन्तिम में मरिये जातारे सन । अब तू ही बतावा अईसन फिलिम के देख के आपन पीसा बरबाद करी?"(पता नहीं कैसी फ़िल्म है जिसमे सब मर ही जाते हैं ,अब तुम ही बताओ ऐसी फ़िल्म देख कर कौन अपना पैसा बरबाद करेगा)।- गेटकीपर तक से अपना याराना हो गया था। एक और ख़ास बात इस चित्र मन्दिर की थी कि जब कभी हमारे पास हॉल में भीड़ की वजह और उस भीड़ में हमारे साइज़ की वजह से टिकट नहीं मिल पाता तब हम डाईरेक्ट गेटकीपर को ही पईसा देकर अपनी सीट पकड़ लेते थे। सीट मिलते ही विजेता की तरह आगे पीछे देखकर अपनी सेटिंग पर मन-ही-मन प्रफुल्लित होते रहते थे। "लिप्टन चाय'और 'पनामा सिगरेट' के विज्ञापन आते ही सभी दर्शक खामोश हो जाते और जैसे ही फ़िल्म शुरू होने के पहले बैनर पर किसी देवी-देवता की मूरत आती कुछ जोश में ताली बजाते,कुछ सीटी या फ़िर कुछ भक्त स्टुडेंट नमस्ते कर लेते..जय हो थावे भवानी की जय। मेरी परेशानी थोड़े दुसरे किस्म की थी जैसे फ़िल्म शुरू होने पर मैं पहले ये देखता था कि कितने रील की है(१५-१६ रील का होने पर कोफ्त भी होती थी कि ढाई घंटे का ही है बस...वैसे पोस्टर पढने का भी बड़ा शौकीन था और इसी शौक में काफ़ी समय तक फ़िल्म में "अभिनीत"नाम के एक्टर को ढूंढता रहा था कि आख़िर ये कौन अभिनीत नाम का एक्टर है जिसका नाम सभी फिल्मों की पोस्टरों पर होता है मगर मुझे ही नहीं दीखता ,पहचान में आता । वैसे थोड़े ऊँचे क्लास में पहुँचने पर जान गया "अभिनीत" का राज।

लगाना जुगाड़ पैसों का । रोज़-रोज़ फ़िल्म देखना सम्भव नहीं था ,मगर श्याम चित्र मन्दिर वाले शायद हमारी इस दिक्कत को समझते थे । यहाँ आज भी कोई फ़िल्म शुक्रवार की मोहताज़ नहीं होती ,जब तक चली चलाया नहीं चली अगले कोई दूसरी लग गई। स्कूल में हमारे महेश भी बड़े फिलिम्बाज़ थे। एक दिन पैसों की दिक्कत का दुखडा हमने रोकर कहा -'यार बाबूजी रोज़-रोज़ पैसा देते नहीं हैं इसलिए मैं फिलिम देखने नहीं जाऊंगा तू चला जा'। बस फ़िर क्या था महेश ने टीम लीडर होने का पूरा फ़र्ज़ निभाया ,उसने एक ऐसी तरकीब हमें सुझाई जिससे आगे हमें कभी पैसों की दिक्कत नहीं हुई। अब हम महेश के प्लान के अकोर्डिंग सायकिल से आने वाले छात्रों के सीट कवर ,घंटी (घंटियाँ पीतल की होती थी और स्कूल के बाहर बैठने वाला मिस्त्री हमें प्रति घंटी २ रूपया भुगतान करता था,सीट कवर ४ से ५ रूपया में बिक जाता था.)निकालने लगे और पकड़े जाने पर दादागिरी जिंदाबाद क्योंकि महेश स्कूल में अपने कमर में कभी सायकिल की चेन तो कभी छोटा चाकू ले आता था जिससे हम उसकी बहादुरी के कायल थे। अगर कभी किसी एक के पास पैसा नहीं जुगाड़ हो पाता तो गेटकीपर गंगा भगत की जेब से २-३ दिनों में या अगली फ़िल्म में दे देने के शर्त पर ले लिया जाता । श्याम चित्र मन्दिर कितना अपना था।

"लार्ज़र देन लाईफ" के मायने और श्याम सिनेमा का परदा (सिल्वर स्क्रीन)। चूँकि हम तो बाबु क्लास के दर्जे वाले दर्शक थे इसलिए बैठते हमेशा सबसे आगे ही थे।मानो सिनेमा का पहला मज़ा हम लेते थे फ़िर हमसे पास होकर पीछे वालों को जाता था। हम सभी उन दिनों में पता नहीं किस साइज़ के थे कि परदा काफ़ी विशाल लगता था । परदे पर जैसे ही किसी जीप या अन्य किसी दृश्य जिसमे भगदड़ का सीन आता तो ऐसा लगता मानो वह जीप या भीड़ हमी पर चढ़ गई और हम सभी थोडी देर को ख़ुद को पीछे सीट पर धकेल लेते और बाद में राहत-सा अनुभव करते। फ़िल्म के सारे क्रियाव्यापार इतने बड़े से लगते की पूछिए मत । और परदे के दोनों तरफ़ बने दो फन निकले नाग ऐसा प्रतीत कराते जैसे वे ही इस विशाल परदे की रक्षा कर रहे हैं। काफ़ी समय तक ये मेरे मन में परदे के रक्षक नाग छाये रहे थे।बाद के समय में जब सिनेमा पर मैंने पढ़ना शुरू किया और 'लार्ज़र देन लाइफ ' वर्ड पढ़ा तो श्याम चित्र मन्दिर का विशाल परदा और उसपर घटते बड़े-बड़े क्रियाव्यापार ही आंखों के आगे घूम गए।

अपना ख़ुद का कूलर हॉल में । श्याम चित्र मन्दिर के बाबु क्लास में ना केवल हम जैसे भारत के भविष्य बल्कि रिक्शा वाले ,मजदूर किस्म के लोग भी आते थे। अब चूँकि छोटे शहर का हाल था और लोग भी वही के तो झिझक ना के बराबर थी। फ़िल्म शुरू होते ही सब अपना अपना गमछा उतार कर सीट पर दोनों पाँव रख कर फ़िल्म में डूब जाते थे। इधर शरीर से पसीना बहता था उधर सीन तेज़ी से बदलता था और हाथों में पकड़ा हुआ गमछा भी उतनी ही शिद्दत से घूमता रहता था। बाद में थोड़े झिझक के बाद हम भी इसी जमात के हो लिए। ऐसे वातानुकूलन मशीन कि क्या आज जरुरत नही है?ये विशुद्ध हमारा कूलर था।

..............अगली post में जारी

9/17/08

.......इस कारण ये नाचे गदहा.

एक बार की बात है,बादशाह अकबर और बीरबल शाम को टहलने निकले । टहलते-टहलते वे दोनों बाज़ार में पहुंचे;बाज़ार का दृश्य अजीबोगरीब था। एक गदहा बीच बाज़ार में उधम मचाये हुए था,दुलत्तियाँ मार रहा था ,ढेंचू-ढेंचू चिल्ला रहा था सभी व्यापारियों ,ग्राहकों,आने-जाने वालों की जान आफत में थी कि पता नहीं गधा कब,किसे दुलत्ती मार दे। ये दृश्य देखकर बादशाह ने बीरबल से पुछा -'बीरबल,किस कारण ये नाचे गदहा ?'-बीरबल ने पहले गदहे को फ़िर उसकी कारस्तानी को बड़े गौर से देखा और मुस्कुराकर बोले-'जहाँपनाह ,आगे नाथ ना पीछे पगहा (रस्सी)इस कारण ये नाचे गदहा । '-बादशाह ने स्थिति कीअसलियत जान ली और तुंरत ही सिपाहियों को हुक्म दिया किगदहे के गले में पगहा डालकर काबू करो और अभी कांजी हाउस दे आओ। आदेश पर तुंरत ही अमल हुआ और गदहा थोडी ही देर में सीखचों के पीछे चुपचाप खड़ा पत्ते चबा रहा था ।
ये थी तब की बात जब समाज सामंती सेट -अप में था। मगर अबकी स्थिति कहीं बेहतर है(ऐसा माना जाता है....) क्योंकि अब डेमोक्रेसी है ,यानी आम जनता का तंत्र ..प्रजातंत्र। तब सिर्फ़ सत्ता-प्रतिष्ठान के लोगों को ही सब कुछ करने का हक था मगर प्रजातंत्र में ऐसा नही है। यहाँ आम-ओ-ख़ास सभी को सब कुछ अपनी मनमर्जी का करने का हक है,साफ़ कहें तो "घोडे और घास को एक जैसी छूट है"। अब कोई लगाम किसी पर कुछ ख़ास प्रभावी नही है। कम-से-कम अपने राज भइया वाले मामले में तो ऐसा ही लग रह है। हालांकि इस सिस्टम में हमारे सामने 'अयोध्या ,गोधरा, कंधमाल जैसे कुछेक और उदाहरण भी हैं। बहरहाल, मनसे वाले राज भाऊ भी अकबरी-समय के उसी बाज़ार (जो अब दूसरे रूप में हैं )में खड़े होकर अपना नाच दिखा रहे हैं। और तुर्रा ये कि उनके गले में भी कोई नाथ-पगहा नहीं है। अब चूँकि प्रजातंत्र है (?) तो ये ....भी खुलेआम नाच रहा है,दुलत्तियाँ मार रहा हैऔर अपना धेंचुपना भी खूब मचा रहा है। पर सनद रहे ये ...कांजी हाउस जाने वाला नहीं है और ये चुपचाप पत्ते भी नहीं चबायेगा । या फ़िर ये भी कि ये कांजी हाउस जायेगा ही क्यों यहाँ किसीकी बादशाहत तो है नही कि एक आदमी जो कहेगा वही सब मानेंगे ,प्रजातंत्र है यहाँ सबके अपने-अपने (बड़े नहीं तो छोटे-छोटे ही सही) अपने हित हैं। तो यहाँ जिसका मुंह जिधर हो जाएगा ,वो उधर चला जाएगा,जो जैसा जानता है वही राग गायेगा। पर यह थीयरी भी केवल चुनिन्दा प्रदेश विशेष के लोगों और उनके बिगडैल नेताओं पर लागू होती है। और ये महानुभाव अपनी दूकान के लिए सबसे पहले उनलोगों को अपना निशाना बनाते हैं जो मजदूर,दूकानदार(छोटे)वगैरह हैं। मनसे के ...की जड़ में ये छोटे किस्म वाले जीव ही ज्यादा थे मगर अब इनका खेल, अपनी पिछली करामात की सफलता से उत्साहित होकर,कुछ दूसरे लेवल का हो चला है। अब यहाँ बड़े नाम हैं (बच्चन परिवार और शाहरुख़ खान दिल्ली वाला)जिनको अपना निशाना बनाते ही इनकी टी आर पी एकदम से टॉप पर पहुँच गई है।
कहने को तो यहाँ (प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में )हमारी सुरक्षा में पुलिस जैसी सुविधा भी प्रदान की गई है मगर इस...के आगे उसकी भी कोई अहमियत(सही कहें तो..डर)नहीं है। अब तक आम पब्लिक को यही पता था कि कोई उल्टा-सीधा कुछ करे तो पुलिस का डंडा सब सही कर देता है मगर यहाँ तो सीन ही दूसरा था । राज भइया तो कुछ बेसिए बहादुर निकले उन्होंने कमिश्नरी हेकडी को यह कहते हुए ठंडा कर दिया कि'वर्दी utaar के सड़क पर आ जाओ ,बता दिया जाएगा कि मुंबई किसके बाप की है''। -रही सही kasar grihmantri जी ने पूरी कर दी की डंडा काबू में rakho नहीं तो jhande में lagaa दिया जाएगा। एकदम अपने बच्चन जी वाली इस्टाईल में (है ना?)। यानी मुंबई किसकी जो वहाँ रहे उसकी का सिद्धांत यहाँ नही है बल्कि जो मराठी उसकी वाला । इंडियन होने का कोई मतलब नही ,विशुद्ध आमचा महाराष्ट्र ,मराठी माणूस (ये एक अलग देश है इसका संविधान अलग है इसकी अपनी सरकार(राज)है अपनी सेना (नवनिर्माण)है और इसके राष्ट्रपिता ठाकरे सीनियर हैं,क्योंकि आज जिस इमारत पर खड़ा होकर राज साहब चिल्ला रहे हैं उसकी नींव उन्ही के ताऊ जी ने डाली थी)। राज साहब अपने विरासत में मिली परम्परा को ही ढो रहे हैं। अमिताभ ,शाहरुख़ जिसे लोग उनके सॉफ्ट टारगेट हैं और इनपर अटैक का मतलब ज्यादा से ज्यादा पब्लिक अत्ट्रेक्सन मिलना ।वैसे दोष पूरी तरह से मनसे वाले भाऊ का भी नही है बल्कि इसमे मुंबई में उपलब्ध उन बुनियादी सुविधाओं का भी दोष है जिनके लालच में उतर भारतीय उधर पहुंचे हुए हैं और सफल हो गए हैं (अब मुंबई वाले बन ही गए थे कि....)।
एक बात और इस अभियान की जड़ में है वो ये कि राज ठाकरे के चेले(गुंडे) अब उन सारी जगहों से चंदा(हफ्ता)पा रहे हैं(वसूल रहे हैं )जहाँ से कभी उनके ताऊ जी की पार्टी वाले वसूला करते थे। मतलब एक पंथ दो काज। अपना जनाधार भी तैयार हो रहा है और पार्टी का पेट भी भर रहा है। चूँकि पहले ही कहा जा चुका है कि कोई भी इस....को बाँध नहीं सकता क्योंकि प्रजातंत्र में जो चीज़ आपको निर्णय लेने से रोकती है वो है वोट-बैंक । कांग्रेस हो या बीजेपी या फ़िर शिवसेना सभी जानते हैं कि अगर इस गदहे के पगहा लगाया तो अपना वोट बैंक गडबडा जाएगा । बस करने दो जो कुछ कर रहा है अपने आप ही थोड़े दिनों में चुप बैठ जायेगा ( जब पेट भर जाएगा)। यानी इच्छाशक्ति के अभाव के साथ-साथ अपने फायदे की बात अधिक जरुरी है। प्रजातंत्र ऐसा तमाशा है ....लिखने वाले अपने धूमिल को भी कोई ठाकरे एंड कम्पनी वाला दिखा था क्या?
वैसे देश की सबसे पावरफुल महिला ने थोडी मरहम पट्टी के आसार दिखाए हैं मगर सोचिये उस प्रदेश में, इस देश में (अगर महाराष्ट्र इसी देश का हिस्सा है तब)उनकी ख़ुद की सरकार है तब उनके निर्णय लेने की दिक्कतें भी क्या वाकई वोट बैंक के कारण ऊहापोह की स्थिति पैदा कर रही हैं या फ़िर इसके पीछे का कोई दूसरा ही खेल है जो हमें नहीं दिख रहा। बहरहाल, इस जवान मोटे गदहे का धेंचुपना कब तक जारी रहेगा ,कब तक ये अपनी दुलत्तियाँ मारता रहेगा और कौन होगा जो इसकी नकेल कसेगा ये सारे प्रश्न ऐसे ही डस्ट-बीन में पड़े रहेंगे , गदहा नाचता रहेगा ।

9/12/08

एक थे भिखारी ठाकुर......शेषांश


गतांक से आगे....
........भिखारी ठाकुर का कमाल ही था कि एक ही व्यक्ति एक से अधिक रूपों में अपने को बदलता जाता ,भिन्न -भिन्न पात्रों के विभिन्न आचरण एवं उसके हाव-भाव को अपने में सहेजता रहता,उसी के अनुरूप अपने को ढालता जाता और दर्शकों को अपनी ही धारा में बहाए लिए चलता । उनकी अभिव्यक्ति का स्वर इतना सटीक,सरल,सहज और स्वाभाविक होता कि दर्शक भावविभोर हो जाते। प्रसाधन एवं रूप परिवर्तन का कार्य दर्शकों की थोडी-सी आँख बचा के कर लिया जाता। भिखारी ठाकुर ने अपने ज़माने में 'बिदेसिया'को बिहार,झारखण्ड,बंगाल और पूर्वी उत्तरप्रदेश एवम असाम के लोगों के जेहन में उतार दिया था। असाम में जब 'बिदेसिया' का मंचन हुआ था ,तब वहाँ के सिनेमा घरों में ताला लगने की नौबत आ गई थी। 'बिदेसिया'का मूल टोन यही है कि किस तरह से एक भोजपुरिया युवक कमाने पूरब की ओर जाता है और किसी और औरत के फेर में फंस जाता है। इस नाटक या तमाशे की ख़ास बात ये है कि ये भी परंपरागत नाटकों की तरह सुखांत है। इस नाटक के बारे में जी.बी.पन्त संस्थान के 'बिदेसिया प्रोजेक्ट'का रिमार्क है-
"bidesia is a phrase designations both the people left their country and didn't return and the tradition of performing arts rooted in this migration"

http://www.indianetzone.com/ पर भिखारी ठाकुर के सर्वाधिक चर्चित तमाशा/नाटक 'बिदेसिया'पर टिपण्णी भिखारी ठाकुर के रंगकर्म और उनके इस महान कृति की खासियत को उजागर करती है -
"in olden days,bidesia was famous as it gave voice to many social concerned topics like the cause of poor labourers and tried to create awareness about the poor status of women in the bhojpuri society.casteism and communalism are also handled with due care in the same cultural tunes.sometimes,the tone of bidesia is sarcastic in nature......."

बहरहाल ,इतना जानने के बाद भिखारी ठाकुर के ऊपर भी एक नज़र डालना जरुरी हो जाता है।भिखारी ठाकुर (१८८७-१९७१)भोजपुरी समाज,साहित्य और संस्कृति के संवाहक थे। उनकी रचनाओं में भोजपुरिया संस्कृति की ओरिजनल खुशबू समाई हुई है। उत्तर-भारतीय समाज में व्याप्त विधवा -विवाह ,बेमेल-विवाह,जाती-प्रथा,नशाखोरी एवं विषमता आदि पर आधारित उनके लोक-नाटकों ने जनता का मनोरंजन तो किया ही ,प्रबोधन भी कम नही किया । ऐसे नाटकों में वे भारतेंदु जैसे समर्थ नाटककार तथा नवजागरण के पुरोधा के रूप में दिखाई देते हैं। आख़िर दोनों ही स्वयं नाटक रचते और खेलते थे। निश्चित रूप से सामाजिक बदलाव की ज्वाला दोनों में समान रूप से जल रही थी।
भिखारी ठाकुर का रचना -संसार १९१९-१९६५ के बीच का है। भोजपुरी का ये समर्थ लोक -कलाकार ,जो जाति से नाईऔर नवजागरण के संदेशवाहक ,नारी-विमर्श और दलित-विमर्श के व्याख्याता ,लोकगीत,तथा भजन-कीर्तन के अनन्य साधक थे। प्रख्यात आलोचक और कवि केदारनाथ सिंह का कथन है कि -"वे(भिखारी ठाकुर सच्चे अर्थों में लोक-कलाकार थे,जो मौखिक परम्परा के भीतर से उभर कर आए थे ,पर इनके नाटक और गीत हमें लिखित रूप में उपलब्ध है। .....वे एक लोक-सजग कलाकार थे,इसलिए कोरा मनोरंजन उनका उद्देश्य नही था। उनकी हर कृति किसी-न-किसी सामाजिक विकृति या कुरीति पर चोट करती है और ऐसा करते हुए उसका सबसे धारदार हथियार होता है -व्यंग्य । (नई कविता के मंच पर भिखारी/दैनिक हिंदुस्तान :५ नवम्बर २००२ )
भिखारी ठाकुर ने अपने समाज और उसकी विविध सामाजिक ,आर्थिक एवं धार्मिक समस्याओं को उसकी बड़ी सूक्ष्मता से देखा था । साथ ही, उन्होंने दलितों की विभिन्न समस्याओं के विषय में दलितों के उत्थान के उद्देश्य से लोक-नाटकों ,लोक-गीतों की रचना ही नहीं की;बल्कि अभिनय करके ग्रामीण परिवेश में प्रस्तुत कर उनमें चेतना जगाई । साथ ही अगर हम स्त्रियों की बात करें तो पाते हैं कि भिखारी जी का नारी-विमर्श भारतीय परम्परा का रक्षक और आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी है। वे स्त्रियों को परिवार की धुरी मानते हैं और उन्हें ममतामयी,सदाचरण वाली ,उदार महिला के तौर पर देखते हैं।भिखारी ठाकुर स्वयंएक पिछडी जाति में (नाई)पैदा हुए थे। सामंती समाज -व्यवस्था में यह जाति तथाकथित बड़ी जातियों के बाल-दाढी काटती थी। अपने जीवन में भिखारी ठाकुर को इस व्यवस्था का दंश भोगना पड़ा था और उसके बड़े कटु अनुभव उनके पास थे। जब भिखारी ठाकुर ने अपनी सर्जना की,तो उनके समक्ष समाज का वही दलित ,अशिक्षित,और उपेक्षित वर्ग था। उनके नाटकों का मुख्य थीम दलितों ,स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को उजागर कर उनको जागरूक करना कि किस तरह से उनकी ज़िन्दगी बेहतर हो सकती है। यह इनके नाटकों का ही प्रभाव था कि बेटी बेचने की भर्त्सना हुई,विधवा-विवाह का जोर बढ़ा (खासतौर पर भोजपुर के क्षेत्र में........)। भिखारी ठाकुर ने स्टेज पर नवयुवक कलाकारों को नारी-वेश में नाटक के स्त्री-पात्रों की भूमिका अदा करने का सफल प्रयोग किया। ................

(अगली पोस्ट में पढिये भिखारी ठाकुर की कृतियों और उनके प्रकाशनों पर ,कंटेंट पर बहस...... । तब तक इजाज़त )

9/10/08

एक थे भिखारी ठाकुर.....

भोजपुरी अंचल के लोगों में भोजपुरी के शेक्स्पीअर भिखारी ठाकुर कितने भीतर तक पैठे हुए हैं,ये उन्ही लोगों से पूछिए। मेरा भिखारी ठाकुर के रंगकर्म पर इन्ही दिनों में काफी कुछ पढ़ना हुआ ,देखना भी हुआ। उनमे से आपके लिए भी कुछ ........ । ताकि आप भी जान पाये इस महान लोक-कलाकार को।



भिखारी ठाकुर बहुआयामी प्रतिभा के व्यक्ति थे। वे एक साथ ही कवि,गीतकार,नाटककार,नाट्य-निर्देशक,लोक-संगीतकार,और कुशल अभिनेता थे, यानी जैक ऑफ़ आल ट्रेड्स ।भिखारी ठाकुर ने जहाँ अपने से पूर्व से चली आ रही परम्परा को आत्मसात किया था,वही उन्होंने आवश्यकतानुसार उसमे संशोधन-परिवर्धन भी किया। वे स्वयं में एक व्यक्ति से बढ़कर एक सांस्कृतिक संस्था थे। रामलीला ,रासलीला ,जात्रा,भांड,नेटुआ,गोंड.आदि लोक-नाट्य-विधाएं भिखारी के प्रिया क्षेत्र थे। साथ ही,उन्होंने परम्परागत ,पारसी,एवं भारतेंदु के नाटकों से भी प्रभाव ग्रहण किया था। भिखारी ठाकुर ने पारंपरिक नाट्य-शैली से सूत्रधार ,मंगलाचरण तथा अन्य रुढियों को भी कुछ ढीले -ढाले ढंग से स्वीकार किया और विदूषक के बदले "लबार"जैसे पात्र को लोगों के मनोरंजन के लिए प्रस्तुत किया। मंचीय-व्यवस्था तथा साज-सज्जा सम्बन्धी नाट्य लेखकीय निर्देशों को मंचन -व्यवस्था की स्थानीय सुविधा पर छोड़कर भिखारी ठाकुर ने मुक्त-मंचन को प्रोत्साहित किया।

भिखारी ठाकुर ने समाज के उपेक्षित एवं दलित-शोषित वर्ग से कलावंत व्यक्तियों का चयन किया। विभिन्न नाटकों में सूत्रधार के विशिष्ट वेश-भूषा में तो भिखारी स्वयं आते थे,प्रवचन करते थे और भजन आदि प्रस्तुत कर वातावरण का निर्माण करते थे;किंतु विभिन्न नाटकों में वे अभिनेता के रूप में भी आते थे,जैसे -'गबर्घी चोर'में पञ्च,'बेटी वियोग'में पंडित,'राधेश्याम बहार'में बूढी सखी ,तथा 'कलयुगी प्रेम' में नशाखोर पति आदि। भिखारी ठाकुर ने अपने 'तमाशों '(लोक-नाटकों)के प्रस्तुतीकरण में भी नए-नए प्रयोग किए । भिखारी ठाकुर के नाटकों की प्रस्तुति के समय किसी खाली मैदान ,बगीचा या दालान के सामने शामियाना लग जाता था। कुछ समतल चौकियां आपस में सटा-सटाकर रख दी जाती थी और उस पर दरी और सफ़ेद चादर (सफेदा)बिछा दी जाती थी । मंच के पीछे कनात या सफेदा टांग दिया जाता था। मंच पर दांयी ओर वाद्य-वृन्द के साथ सभी वादक स्थान ग्रहण कर लेते थे। मंच के तीन ओर दूर-दूर तक दर्शक-श्रोता बैठ जाते थे। पेट्रोमेक्स,डे-लाइट जला कर स्थान-स्थान पर टांग दिए जाते थे और तब लोक कलाकार भिखारी ठाकुर सूत्रधार की भूमिका में मंच पर पधारते थे। यह खुला मंच प्रयोग भिखारी ठाकुर ने संभवतः विश्व में पहली बार किया था। साथ-ही-साथ,नाटक के प्रस्तुतीकरण के क्रम में जब-तब दर्शकों से अभिनेताओं का सामयिक,प्रासंगिक एवं विनोदात्मक संवाद भी होता रहता था,जो नाट्य-प्रस्तुति में दर्शकों की सार्थक एवं सक्रिय भागीदारी का विरल उदाहरण प्रस्तुत करता था।
एक तो यों ही लोकनाट्य में रंगमंच ,प्रसाधन,बैक -ग्राउंडसिन-सीनरी,ग्रीन रूम आदि आग्रही नहीं रहते लेकिन भिखारी ठाकुर इससे भी दो कदम आगे थे। एक अलग टेंट की व्यवस्था हुई तो ठीक नहीं तो मंच के एक कोने में कोई कपड़ा तान लिया ,प्रसाधन परिवर्तन कर लिया गया,मेक-अप हो गया,प्रशिक्षण भी दे दिया गया,मंचन के दौरान प्रयोग में आने वाले साज-समान की व्यवस्था भी कर ली गई,निर्देशन भी चलता रहा ,पात्रानुकूल अभिनय भी होता रहा ,संगीत की रसभरी गगरी भी छलकती रही और मन भी बोझिल नही हुआ कि'लबार'(विदूषक)टपक पड़ा और ठहाकों का समंदर लहरा दिया।
(सहायक सन्दर्भ:-बिदेसिया.कॉम,भिखारी ठाकुर रचनावली आदि)

अगली पोस्ट में पढिये भिखारी ठाकुर के रंगकर्म का एक और पहलू...तब तक मुसाफिर को इजाज़त दीजिये.....

9/6/08

चलो हिन्दी मर्सिया पखवाडा मनाएं....

कुछ समय पहले दूरदर्शन के राष्ट्रीय समाचार के प्रसारण के एन पहले नेताजी सुभाषचंद्र बोस का कथन हिन्दी के सन्दर्भ में दिखाया जाता था-"देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाने वाली हिन्दी ही राष्ट्र-भाषा की उत्तराधिकारी है। "-मैं नही जानता के अब भी ये दिखाया जाता है या नही। खैर ,अपने बचपन के दिनों में जब मैं नानी या माँ के साथ जब भी सफर करता था खासतौर पर ट्रेनों में ,तब पूर्वांचल के स्टेशनों पर( चाहे वो बनारस डिविजन के हो या गोरखपुर या फ़िर सोनपुर डिविजन के)हिन्दी को प्रमोट करते ऐसे कई स्लोगन मैंने देखे हैं। आज भी इस क्षेत्र के छोटे -बड़े सभी स्टेशनों पर ये स्लोगन दिख जायेंगे। उन दिनों में इन स्लोगनों को देख कर अपनी बाल-सुलभ जिज्ञासा में नानी या माँ से पूछता था कि,हम जानते हैं कि हम हिन्दी बोलते-लिखते-पढ़ते हैं फ़िर भी इन सबकी क्या जरुरत है। माँ/नानी अपनी समझ में जितना बता सकती थी बता देती थी कि हिन्दी हमारी मदर लैंग्वेज है अतः उसकी ज्यादा से ज्यादा सेवा और प्रचार हेतु ये लिखा गया है और भी न-जाने क्या क्या। हालांकि मेरी जिज्ञासा तब भी वैसी ही रहती थी जैसी अब है कि क्या वाकई मात्र ये स्लोगन लिखने भर से ऐसी क्रान्ति आने वाली है कि हिन्दी ही हिन्दी बस कुछ नही और।

अपने स्कूल के दिनों में हिन्दी के पठन-पाठन और इसके प्रति प्रेम का जो नतीजा मेरी आंखों के सामने गुज़रा वो आज भी याद है। मेरी स्कूलिंग संत जोसफ से हुई है। वही के दो-एक घटनाओ ने फ़िर मेरे दिमागी फितूर को भड़काया । हुआ यूँ कि मेरे बचपन का क्लासमेट शरदेन्दु जो आजकल कम्प्यूटर इंजीनियर हो गया है,ने अपनी डेली बुक में अपने नाम की एंट्री हिन्दी में की । ये बात किसीने क्लास -इंचार्ज माईकल सर को बता दी फ़िर क्या था,शरदेन्दु को पूरे १/२ घंटे तक मुर्गा बनना पड़ा। ऊपर से हिन्दी में अपना काम नही करने की कसम खानी पड़ी सो अलग। दूसरा वाक्य मेरे ख़ुद से जुड़ा हुआ है। मैं २ या ३ दिन के गैप के बाद स्कूल गया था। मेरे स्कूल में एक नियम था कि जो भी स्टुडेंट अब्सेंट होने के बाद स्कूल में आएगा उसे घर से एप्लीकेसन लिखवा कर आना होता था और प्रिंसिपल ऑफिस से ओके करवाना होता था । हमारे प्रिंसिपल मि एम्.सी.मैथ्यू हुआ करते थे,वह ख़ुद सारे एप्लीकेसन चेक करते थे और अपने नियमानुसार दंड भी दिया करते या छोड़ देते थे। मेरी भी अर्जी भीतर गई और १० मिनट बाद बुलावा भी आ गया । धड़कते दिल से मैं अन्दर घुसा ,प्रिंसिपल ने दांत पीसते हुए पूछा -'एप्प्लिकेशन हिन्दी में लिखवाने को किसने बोला था?'-अब वैसे भी प्रिंसिपल का आतंक स्कूल में इतना था कि वैसे ही घिग्गी बंधी रहती थी,सो मैं भी ये नही कह पाया कि मेरी प्राईमरी स्कूल की टीचर माँ को अंग्रेज़ी नही आती या फ़िर बाबूजी तो ऍप्लिकेशन भी नही लिख सकते। फ़िर क्या था कुछ नही बोल पाने को मेरा घुन्नापन समझा गया और जो कुछ प्रिंसिपल चैंबर में हुआ उसे याद नही करना चाहता । हां इतना याद है कि उतनी पिटाई देख मुझे दूसरे स्कूल डी .ऐ .वी में डाल दिया गया। जहाँ से मैंने अपनी बाकी स्कूली पढाई पूरी की।

बाद में जब मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिन्दी से ग्रेजुएशन करने की सोची तब सबसे ज्यादा चिंता मेरे माँ-बाबूजी को ही हुई कि इसके भविष्य का क्या होगा । खैर मेरा जो कुछ हुआ सो हुआ या होगा,मगर हिन्दी प्रेम और हिन्दी दुराग्रह का ऐसा दृश्य मैंने एक ही शहर या क्षेत्र में देखा था । दिल्ली में एक नया दृश्य मेरे सामने था । यहाँ जगह -जगह इन दिनों में (विशेषकर सितम्बर के महीने में ही )हर सरकारी कार्यालयों में १-१५ तक हिन्दी का पखवाडा मना रहे हैं।ये इस पुरे कर्मकांड के माध्यम से ये अपने हिन्दी प्रेम को दर्शाएंगे और दो-एक हिन्दी वालों के सेमीनार पेल देंगे और दो-एक को हिन्दी सम्मान दे देंगे। इस तरह से हिन्दी फ़िर एक साल के लिए इन दफ्तरों के दराज़ में बंद होकर गायब हो जायेगी और बाकी लोग अपनी साँस जो हिन्दी बोल देने से (इस पूरे हिन्दी वीक में )फूल गई थी,को कंट्रोल करेंगे ।सोचता हूँ कि क्या वाकई हिन्दी को इस तरह के आयोजनों की जरुरत है। या फ़िर ये कि मेरी माँ/या अब स्वर्गीय हो चुकी नानी कितना कम जानती थी कि 'हिन्दी हमारी अपनी ही ज़बान है।

अब ये लगता है कि ये हिन्दी को प्रमोट करने वाला खेल दरअसल हिन्दी का मर्सिया है । हम सभी को हिन्दी सप्ताह या पखवाडा ना मना कर हिन्दी का "मर्सिया पखवाडा "मनाना चाहिए"। व्रत लीजिये अब से ये हिन्दी का मर्सिया दिवस के नाम से मनाया जाए और कहा जाए ,बताया जाए कि कभी इस जगह हिन्दी नाम की एक ज़बान हुआ करती थी ,जो अब यही कहीं दफ़न है,और इस भाषा के सम्मान में हम सभी हर जगह हर वर्ष इसका मर्सिया पढ़ते हैं।

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...