7/31/08

हम जो चलने लगे ..........बदलता सहेली गावं

एक जगह है सहेली । आप पूछेंगे ये कहाँ है ? सहेली मध्य प्रदेश के नागपुर- भोपाल हाईवे पर इटारसी से २२ किलोमीटर पर मुख्य मार्ग से २ कि .मी भीतर पश्चिम में स्थित है। मध्यप्रदेश के अन्य गांवो की तरह ही सहेली भी एक साधारण-सा ही गावं है। मगर हम बात कर रहे हैं,यहाँ रहने वाले समुदायों की। इस पंचायत के दायरे में ताकू ,केसला (कोरकू पुरा ),हिरन चापड़ा ,कतियापुरा आदि जगहे आती हैं। इस पूरे एरिया में मुख्यतः दो जातियाँ हैं-अहीर (यादव)और कोरकू (जनजाति) । जहाँ अहीर जाति के पास यहाँ की तक़रीबन सारी जमीन है,वहीँ कोरकू लोग इनकी जमीनों पर आश्रित रहे हैं । पंचायती राज-व्यवस्था में ये गावं आरक्षित घोषित हो गया और इसकी सरपंच अब एक कोरकू महिला "कुब्जा बाई" है काफ़ी समय तक यहाँ की स्थिति जस-की-तस रही है,क्योंकि अनपढ़ होने की वजह से 'कुब्जा बाई' को अपनी पूरी ताकत का पता नही था । अब चूँकि उप-सरपंच यादव समुदाय से ही बनते रहे हैं, अतः सारी मलाई कैसे खानी है या उसका बन्दर-बाँट कैसे होना है उन्हें बेहतर पता रहता था और हमारी 'कुब्जा बाई'कागज़ पर अंगूठा ही लगाती थी । खैर ,हमारा फिल्ड सहेली के आस-पास की उन संभावनाओ पर ध्यान दिलाना है जिसके सहारे कोरकू लोगों की दाल-रोटी चलती रही है ,(कमोबेश अब भी )चल रही है। सहेली से लगा है,सागवान का घना जंगल । कोरकू आदिवासी लोग हैं ,इनकी आजीविका अधिकांश खेती,जंगलों से चोरी की हुई लकडियों पर आश्रित रही है। इन लोगों में २०-२५ साल पहले एक प्रवृति रही थी वो ये कि ,पैसे बनाने के लिए कुछ भी करो.....तो पैसा कमाने के लिए ये एक जोखिम भरा और गैर-कानूनी काम करते थे । सुबह -सुबह ये लोग २-३ के ग्रुप में जंगल में निकल जाते । जंगल में सहेली से ३ किलोमीटर दूर सी.पी.ई .(सेंट्रल प्रूफ़ एस्टाब्लिश्मेंट)का ब्लास्टिंग एरिया है ,जहाँ आर्मी अपने बमों की टेस्टिंग करती है । ये हफ्ते में ४ दिन ब्लास्टिंग करते हैं ,और हमारे कोरकू भाई लोग वहां ब्लास्टिंग के बाद फैले गोला-गट्टू ,जिसमे ताम्बे ,लोहे ,पीतल आदि के टुकड़े मिलते है ,को आर्मी कि नज़रों से बचकर चुरा लेते या बीन लेते और इन्हे लोकल दलाल इनसे से खरीद लेते । ये काम इतना आसन नही है ,दरअसल इस काम का पहला खतरा आर्मी की तरफ़ से होता है जिनके अपने कायदे-कानून हैं । दूसरे इन सामानों को जंगल से निकालने में जंगलात वाले और लोकल पुलिस के अपने खतरे और ख़ुद के बनाये नियम हैं। तीसरा खतरा जो सबसे बड़ा है....वो है-जान का खतरा ,अपाहिज होने का खतरा । आज भी सहेली और इसके आस -पास के गावों में ऐसे कई आदिवासी नौजवान मिल जायेंगे ,जो अपनी अपाहिज जिंदगी महुआ (लोकल दारू)पीकर और अपने बीवी-बच्चो को पीटते -गरियाते बिता रहे हैं । इन आदिवासियों के बीने मेटालिक कचरों से सबसे बड़ा फायदा बीच के दलालों और उनके सफेदपोश ठेकेदारों को ही हुआ है,जो देखते-ही-देखते पास ही केसला और सुखतवा ब्लाक .तथा पास ही के बड़े शहर इटारसी में गाड़ी,मकान और ज़मीनों के स्वामी बन बैठे। बहरहाल हाल के वर्षों में एक नई बात जो मुझे दिखी है वो ये कि, पंचायती- राज का फायदा कितना हुआ ये तो 'कुब्जाबाई' नही जानती, मगर अब उसे ये पता है कि आदिवासियों के फायदे कहाँ और कितना है?और इनलोगों ने अपने जीवन-स्तर को सुधारने के लिए इन सारे टेढे -मेढे रास्तों से चलना छोड़ कर अब अपनी और सीधी राह चुनने की ठानी हैं ......और इस बार सहेली कुछ बदला-सा लग रहा है । एक घर से आती म्यूजिक कि आवाज़ ने बरबस ही अपनी तरफ़ मेरा ध्यान खीच लिया ......"कजरारे -कजरारे ...."। 'कुब्जाबाई' से बात हुई तो उसने कान पकड़ के जीभ दांतों से काट लिया-"नई बाउजी, अब मरद लोग भी कम ही पी रहे है और सब इधर -उधर काम पर जाने लगे हैं...-"और गोला-गट्टू ?"-मैं पूछता हूँ। -"ना जी ना ,अब तो मैं सीधे केसला जाकर सब कुछ पता कर आती हूँ "-जवाब मिलता है। चीजे बदल रही हैं शायद ..पर जरुरत तो हर तरफ़ बदलने की है।और हाँ....कतियापुरा मुहल्ले में राम सिंग (जिसने पिछले साल मेट्रिक पास की है और कोरकू है)ने "सहमत" लाइब्रेरी चलानी शुरू कर दी है ....जो एकलव्य वालो के द्वारा प्रदत है ......और हाँ ,कुब्जाबाई अक्षर -ज्ञान भी ले रही हैं।इनलोगों ने गावं के छोटे-मोटे ठेके भी लेने शुरू कर दिए है । इनके बीच को दो लड़के शिक्षाकर्मी भी हो गए हैं,कुछ के पास अब अपनी ज़मीन है । ये सरकारी प्रयासों से नही बल्कि इनलोगों की अपनी समझ और जागरूकता से हुआ है। सहेली गावं सचमुच बदल रहा है.....

7/29/08

डी यु में चिपको आन्दोलन .....(रग्बी बनाम हरियाली)

दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी बड़े जोर-शोर से चल रही है । हर जगह बड़े आकर्षक होर्डिंग्स और पोस्टर -बैनर लगे हुए हैं और लग रहे हैं। हर तरफ़ फील गुड जैसा कुछ-कुछ लग रहा है। मुख्यमंत्री महोदया का महकमा भी ऐसे चिल्लपों मचा रहा है मानो२०१० न हुआ कोई कारूँका का खजाना दिल्ली वालों को मिलने ही वाला है ..यूँ किबस -बस मिला ही चाहता है। लो अब तो बस कुछ ही सौ दिन रह गए हैं...अजी दिल्ली वालोंजब इतना वेट किया अच्छे दिन और लाइफ स्टाइल के लिए तो थोड़ा सा और वेट नही किया जाता तुमसे -हद है बेताबी की। अब क्या करें ,इतने बड़े और बेमिसाल खेल के आयोजन का सुख -सौंदर्य थोड़ा पेसेंस और कुर्बानी की डिमांड तो करेगा ना?सो हर जगह गंदे -भद्दे ,बुरे ,ख़राब आदि -आदि जैसे चीजों को या तो रंग पोता जा रहा है या फ़िर हटाया जा रहा है ताकि आपकी ,हमारी ,हम सबकी दिल्ली नई-नवेली दुल्हन की तरह सजी -धजी और साफ़ -सुथरी ..आं ...आं ...आं ...(विश्वस्तरीय) लगे । अतः इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए प्रशासन और दिल्ली यूनिवर्सिटी ने यूनिवर्सिटी के वी .सी.ऑफिस के सामने लगे सैकडो पेडोको काटने की योजना बनाई है। ताकि यूनिवर्सिटी के ग्राउंड में २०१० में होने वाले रग्बी गेम्स सफलतापूर्वक संपन्न हो सके। अब आप सोच रहे होंगे की रग्बी मैच का पेडो की कटाई से क्या सम्बन्ध है ?तो इसका जवाब है -कि यहाँ का स्टेडियम पेडो से घिरा हुआ है । पेडो कि वजह से यहाँ की सुन्दरता खिल कर सामने नही आती । प्रशासन को इस बात की चिंता भी नही है कि यहाँ के कई पेड़ तो १०० साल से भी पुराने हैं। वैसे भी जब हर तरफ ग्लोबल वार्मिंग का स्वर उठ रहा है ऐसे में यहाँ के माननीय उच्च पदाधिकारिओं के कान पर जू नही रेंग रही है । वैसे भी एक पेड़ को डेवेलप होने में कई साल लगते हैं। बचपन में एक स्लोगन कहीं पढ़ा था -"एक वृक्ष दस पुत्र समान "-पता नही कि इस बात में कितनी सच्चाई है पर हाँ इतना तो है कि हमलोग पेडो की महत्ता को नकार नही सकते । विश्वविद्यालय प्रशासन ने भले ही अपने लेवल से पेडो की कीमत पर सुन्दरता को बढ़ाने का जिम्मा ले लिया हो मगर अब विश्वविद्यालय के कुछ पर्यावरण -प्रेमी मित्र और टीचर्स ने मिलकर प्रशासन के इस कदम का विरोध करने का आह्वान सभी स्टूडेंट्स , टीचर्स, कर्मचारियो को एक साथ इस मुहीम में आने को कहा है .....उम्मीद है हम सभी अपने इस प्रयास में कामयाब होंगे और हमे ही नही उन पेडो को भी हमारी जरुरत है । आपसे भी गुजारिश है ...आइये दिल्ली प्रशासन और दिल्ली यूनिवर्सिटी के इस खेल को हमारे आने वाले कल के लिए बंद करे "एक चिपको आन्दोलन यूनिवर्सिटी में भी चाहिए " चलिए शुरू करते हैं .........इंशा अल्लाह हम कामयाब होंगे..

7/24/08

गवनवा के साड़ी के बहाने.....भोजपुरी गीत

९० के बाद के दौर में २-३ बड़े नाम भोजपुरी गायकी में सामने आए,इनमे मुन्ना सिंह (नथुनिये पर गोली मारे सैयां हमार हो ....-फेम ),भारत शर्मा 'व्यास'( गवनवा के साड़ी नैहर से आई ...-फेम)एवं बालेश्वर यादव जैसे कुछेक प्रमुख हैं । हालांकि इन सबो से काफ़ी पहले से ही बिहार कोकिला शारदा सिन्हा ने काफ़ी सुंदर और दिल को छु लेने वाले गीत गए। देखने वाली बात ये है कि इनके गीतों में फिल्मी ,नॉन फिल्मी ,त्योहारों के,और लोकगीत भी हैं । जब भारत शर्मा जैसे गायक सामने आ रहे और सराहे जा रहे थे ,उसी समय इनके समानांतर एक ऐसे गायकों का दल सामने आया जिसने भोजपुरी गानों का रूप ही बदल के रख दिया ।कमाल की बात तो ये थी कि इन्होने अपने अल्बमो के टाइटल भक्ति वाले रखने लगे ,मसलन शिव विवाह ,शिव कलेवा इत्यादि । ये दोनों एल्बम विजेंद्र गिरी के गाये हुए थे ,जो अपने एक गीत "लजाइन काहे खाई अपना भतरा के कमाई"के कारण काफ़ी मशहूर हुआ । इसी एल्बम को बाद में भोजपुरी दुगोला का सब टाइटल देकर फ़िर से मार्केट में उतारा गया था,जो फ़िर अपने एक दुसरे गीत जो इसी एल्बम के पहले वाले गीत (जिसका जिक्र हम पहले कर चुके हैं )का जवाब कह कर pracharit किया गया । इस नए वाले जवाबी गीत को गाया 'तपेश्वर चौहान ' ने और गाने के बोल थे ,"लजाई काहे खाई अपना भतरा के कमाई "-कहना ना होगा कि अपने इस तरह के बोलो के कारण इस एल्बम ने भोजपुरी जगत में तेजी से अपनी पैठ बनाई मगर इसका दूर का घाटा ये हुआ कि भोजपुरी गानों में अश्लीलता के वायरस यही से घुस गए ,जिनके परिणाम आने वाले वर्षों में काफ़ी ख़राब होने वाले थे ,जो हुए भी। फ़िर जो एक बार ये गाने बजने शुरू हुए तो फ़िर कुछ ज्यादा ही वाहियात सस्ते गायक जैसे 'गुड्डू रंगीला (हमरा हौऊ चाही-फेम),राधेश्याम रसिया ( खटिया बिछाके रजाई ओढाके हमरो फुला देला दम -फेम) इत्यादि उभर आए। इसी क्रम में महिला गायिकाए भी उभरी ,जिनका स्तर शारदा सिन्हा वाला नही था ,ना ही इनके गानों में वो बात थी ।हां मगर एक बात कमाल कि थी जो इनको प्रसिद्दि दिला गई वो थी इनकी उन्मुक्त गायकी । अब ये भी "लहंगा में फाट गईल बम "और 'बीचे फिल्ड में बिकेट हला के हमके नाच नाचावालस "जैसे गीत आने लगे,जो मानव मन कि दबी हुई कामुक कल्पनाओ को आनंद देते थे। इसके क्रम में अभी "सैयां फरालके पर फारता ",या फ़िर 'मार दा सटा के लोहा गरम बा '-आने रह गए थे ,जिन्होंने भोजपुरी गीतों की मिटटी दुसरे भाषा वालो की नजरों में ख़राब की । और अपनी भाषा के गीतों के स्तर को गिराती गई । दूसरो को कहने को मसाला मिल गया कि"वाकई बड़े गंदे गीत हैं इस ज़बान में"॥ हालांकि कल्पना और देबी कुछ बढ़िया गीत गा रही हैं, और कल्पना तो आजकल किसी चैनल पर लोक- गायिका बन के परफोर्म कर वाह-वाही लूट रही हैं। ये तो हुई मसाला गीतों की बात ,अब आगे पढिये भोजपुरी के असली चेहरे की पहचान लिए वो गीत जिनमे भोजपुरिया समाज की आत्मा निवास करती है.........तब तक अलविदा.....

7/19/08

भोजपुरी फिल्मी गीतों की सही पहचान ....

कल जे० एन० यु० गया था .दोस्तों से हो रही चकल्लस के बीच एक महाशय ने ये कह दिया की "अजी आपकी ज़बान के गीतों में अश्लीलता ही अश्लीलता ही है "-उनकी ये बात मुझे चुभ गई .मगर क्या करता जिस तरह की भोजपुरी गीत पिछले एक दशक से ऑडियो ,विडियो माध्यम से हमारे सामने आ रहे है ..उनको सुन कर किसी की भी धारणा यही बनेगी। वैसे इस स्थिति के लिए भोजपुरिया समाज भी कम जिम्मेदार नहीं है,उन्होंने भी इसी तरह के गीतों को बजने भी दिया और बजाया भी.और तुर्रा ये की अपनी ही पीठ ठोकते रहे की बहुत बढ़िया गीत है साथ ही ,थोडी ओढी हुई नैतिकता का दिखावा करते हुए ये भी कह देते रहे कि " ई स्साला गुडुवा(गुड्डू रंगीला ) अइसने गीत गवेला जे कि समाज में हमनी के सुन ना सकिले जा "-उन्हें ये पता है कि गाने अश्लील हैं .मगर इस पर विचार करने का समय उनके पास नहीं है कि कभी अपनी इस ज़बान के अच्छाइयों वाले उन गीतों के बारें में भी जाने जो वाकई भोजपुरिया संस्कृति कि अस्मिता कि पहचान हैं.आठवें दशक में आई कुछ भोजपुरी फिल्मों में भी कुछ गाने ऐसे थे ,जिन्हें सुन कर मन खिल उठता था ...जरुरत है उनकी पहचान कर एक बार फ़िर सुनने की .एक नज़र इन पर भी :-
१-"कहवां गईल लरिकैयाँ हो ,तनी हमके बता .... "(भइया दूज )
२-"ससुरारिया जएहा भइया धीरे धीरे "...(वही)
३-"इयाद रखिह ऐ जी इयाद रखिह हमरी पिरितिया तू याद रखिह "-(वही)
४-"केहू लुटेरा केहू चोर हो जाला आवेला जवानी बड़ा शोर हो जाला "-(धरती मैया )
५-"जल्दी जल्दी चला ऐ कहारा ,सुरुज दुबे रे नदिया ..-(वही )
६-"अरेरे ई का तू करे ला सांवरिया ? हो मारेल अ कांकरिया फ़ुट जाई हमरी गगरिया ना ..-(वही )
७-"मेला में सैयां भुलायिल हमार अब का करीं ?"-(गंगा किनारे मोरा गाँव )
८-"कहे के सब केहू आपण .आपण कहावे वाला के बा ?"-(वही )
९-"गंगा किनारे मोरा गांव हो ,घरे पंहुचा दा देबी मैया "..-(वही )
१०-"काहें जिया जरावेल अ ,चल दिहला मोहे बिसार के....."-(दूल्हा गंगा पार के)
-और भी हजारों भोजपुरी के गीत ऐसे हैं जिनकी संवेदनाये सीधे सीधे गांव से जुड़ती हैं। उनके बिम्ब ,रूपक ,सभी कुछ आस पास की मिटटी से लिए गए हैं। उनमें हमारा गांव खाकता है उनमें हमारी नदियाँ पोखर और तालाब झांकते हैं । राधेश्याम रसिया ,गुड्डू रंगीला जैसे कुछ भांड गवैयों को आप भोजपुरी गीतों की पहचान का गायक नहीं कह सकतें। हाँ- इन्होने जिस तरह के गीत गाये हैं उनसे हमारे गीतों की गरिमा घटी जरुर है मगर इसके किए जिम्मेदार भी हमी हैं वो नहीं जिन्होंने सीधे यही कह दिया की आपके गीत अश्लील हैं। जिस चुहल बाज़ी की बात आज के लौंडे भोजपुरी गीतों की करते हैं वो बड़े ही मर्यादित और निराले ढंग से एक गाने में कह दी गई है -"अपना छोडी से कर दा बियाह बुडवू येही फागुन में"-एक बात और ध्यान देने वाली है वो यह की ना सिर्फ़ ८० के दशक के गीत बल्कि आज के समय के जो सही गाने आ रहे है वो सत्ता ,राजनीति और समाज पर अधिक कटाक्ष करती हैं .इन पर ध्यान दिया जाना चाहिए ,क्योंकि ये अपने स्वर और अर्थ में तीखे तेवर लिए हैं और कहने का ढंग भी बड़ा चुटीला है । आनंद मोहन और मनोज तिवारी जैसो के सभी न सही तो अधिकांश गीत ऐसे हैं जो मीनिंगफुल हैं .मेरे यह कहने के सन्दर्भ में इन दोनों गायकों के दो एल्बम "सांच कहबा अ जुटा खईबा (आनंद मोहन )और दूसरा मनोज तिवारी का "पूरब के बेटा "-हैं । कभी इन दोनों अल्बमो को सुनिए फ़िर अपनी राय बनाइये की क्या वाकई इन गीतों के तेवर अश्लीलता के हैं या फ़िर इनके कुछ और भी स्वर हैं ......
आगे पढिये भोजपुरी गीतों के और भी तेवर....

7/17/08

लाइब्रेरी नही रही अब पढने की जगह ...

पिछले दिनों दिल्ली यूनिवर्सिटी के केंद्रीय सन्दर्भ पुस्तकालय ने एक अजीबोगरीब फरमान जारी किया है किअब कोई भी स्टुडेंट ,रिसेर्चेर और शिक्षक अपना बैग और अन्य स्टडी मटेरिअल लाइब्रेरी के भीतर नही ला सकताअब ऐसे में जबकि सभी लोग यहाँ अपने अपने काम यानि पढ़ाई लिखाई के लिए आते हैं और साथ में और जगहों से भी मटेरिअल लाते हैं ताकि इत्मिनान से वो अपना काम कर सके ,ऐसे में लाइब्रेरी प्रशासन का ये हुक्मनामा किस हद तक जायज़ है.यद्यपि हमारे कुछ शोधार्थी और शिक्षकों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है और लाइब्रेरी प्रशासन से सीधे सीधे ये कह दिया है कि पढाई के मसले पर कोई समझौता नही किया जा सकता.फ़िर भी अभी तक इन महानुभावों के कान पर जूंतक नही रेंग रही है.एक और बात जो कि ज्यादा महत्वपूर्ण है वो ये कि लाइब्रेरी सिस्टम ने ये नौटंकी तब शुरू कि है जब अधिकाँश छात्रों के शोध विषय या तो निर्धारित हो रहे हैं या फ़िर हो चुके हैं।यह सभी को पता है कि एक शोधार्थी अपने चुनिन्दा विषय को लेकर देश के कई पुस्तकालयों में घूमकर मैटर इकठ्ठा करके अपना पेपर लिखता हैऐसे में कई छात्र ऐसे भी होते हैं जिनका पढने का आशियाना ही लाइब्रेरी ही होता है .क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय अपने सभी छात्रों को हॉस्टल देने में असमर्थ है .ये हॉस्टल विहीन छात्र अपना सारा स्टडी मटेरिअल लेकर आधी रात तक हॉस्टल में ही अपनी पढ़ाई लिखाई करते हैं और कैम्पस के आस पास ही खाना -वाना खा लेते है .ऐसे में इन छात्रों का क्या होगा इस पर विश्वविद्यालय प्रशासन का धयान नही जा रहा है। यूनिवर्सिटी में करने को अभी ढेरो सुधार बाकी है जो लाइब्रेरी के इस काम से ज्यादा जरुरी हैं। सबसे चुभने वाली बात तो ये है के आप अपनी किताबें भी भीतर ले जाकर नही पढ़ सकते बल्कि उसे भी बाहर काउंटर पर जमा करना होगा ..पता नही सी आर एल नाम की इतनी ऊँची और बड़ी ईमारत विश्वविद्यालय ने क्यों बना रक्खी है ?क्यों बेकार ही इसके मेंटेनेंस और विशालकाय स्टाफ को रख रखा है? इस बिल्डिंग को हेरिटेज घोषित करके संग्रहालय बना कर टिकेट लगा दे शायद इससे यूनिवर्सिटी का ज्यादा फायदा होगा..आख़िर ये बेरोजगार पढ़ लिख कर यूनिवर्सिटी को क्या दे देंगे ?...या फ़िर हर महीने -हफ्ते की ये नौटंकियां बंद करे। येही सबके हित में होगा...युवा संयम की इतनी परीक्षा ठीक नही...

7/16/08

विश्वविद्यालय के चम्पू

आप सभी ने अपने अपने जिंदगी में यूनिवर्सिटी के एक से बढ़ कर एक चम्पू देखे होंगे .मगर आज
हम जिस तरह के विश्वविद्यालयी चंपुओं की बात कर रहे हैं वो कुछ विशेष प्रजाति के हैं। पहली प्रजाति वो है अपने अपने विभाग की सो कॉल्ड ब्रेकिंग न्यूज़ देते हैं .इनके सोर्स का पता नही होता ,और ये
जब भी कुछ मार्केट में उछालते हैं unhe सिर्फ़ जूनियर्स में अपना मार्केट बनाना होता है और एक और सीज़न ही इनका peek सीज़न होता है यानि नए बच्चों में अपना कोलर ऊँचा कैसे भी किया जाए .इस तरह के प्रयासों से ये अपने पर फोसला के मेंबरशिप के लेबल से छुटकारा पाना चाहते हैं .जो कि हर साल और भी तगडे गोंड sarikha चिपक जाता है.बहरहाल दुसरेवाले चम्पू डिपार्टमेन्ट में अपनी साख एक अजूबे कि तरह हर दिन नए तरीके से बनाते हैं यानि पढ़ाई तो खैर हो ही साथ ही जब तक टीचर्स डिपार्टमेन्ट में हो तब तक ये ऑफिस के बाहर खड़े होकर अपनी निष्ठा का परिचय देते हैं, वो अलग बात है कि टीचर्स ख़ुद ही इन्हे इग्नोर करते रहते हैं .ये कमाल के धैर्यवान होते हैं इनकी धैर्यता को शत शत नमन .तीसरे वो हैं जिन्हें बी बी सी यानि बिना बात चेप कहा जाता है,.इनका काम होता है मोबाइल कंपनियों के नए नए फ्री एस एम् एस पॉलिसी को लेकर जब चाहे अपनी सेवाएँ बिना मांगे अपने तथाकथित मित्रों को देते रहना अर्थात परेशां करते रहना ,(मेरे करीबी मित्रों कृपया आप दिल पे ना ले )ये चम्पू कभी भी अपने अपनेपन का एहसास करते रहते हैं मगर ये मेसेज पाने वालों पर क्या गुजरती है उसका वर्णन मुमकिन नहीं है,कभी कभी इतने प्यार कि वजह से मन करता है कि नम्बर ही बदल लिया जाए ,..मगर ये लोग पता नही कितनी श्रद्धा से जवाब कि उम्मीद भी करते हैं ,अब इन्हे क्या कहें कभी तो भाई मौके कि नजाकत समझो... अब बारी चौथे चंपुओं कि जो तो आते हैं यूनिवर्सिटी ,मगर दिन भर इधर उधर कि पार्टी पॉलिटिक्स के साथ साथ अपनी निष्ठा विक्की भइया की मूर्ति के पास बात कर अपनी एक अलग छाप बना जाते हैं.ये बंधूविवेकानंद जी के पास बैठ कर उनकामंजिल तक पहुचने से पहले तक का संदेस भी भूल जाते हैं या फ़िर उन्हें यहाँ बैठ कर उन्हें मंजिल ज्यादा करीब लगती है,(पता नहीं).खैर .आगे इन चंपुओं की लाइन बड़ी लम्बी हैं ,,तो छोडिये अपने अपने काम पर चलते हैं और इनको इनका काम करने देते हैं।चलिए एक बार इनके नाम का जैकारा लगाते हैं जय जय जय चम्पू महाराज ..न न न महाराजों कि जय ...

7/13/08

इरादे से ..

हॉस्टल की निराली दुनिया में कभी कभी ऐसा भी दिन आता है जब हम सभी को फेअरवेल यानि विदाई दी जाती है .मगर दिल्ली यूनिवर्सिटी के ग्वायेर हॉल में न तो फ्रेशेर्स वेलकॉम मिला न ही फेअरवेल .तिस पर ये की अथॉरिटी ने बढ़ते मेस खर्च और जमा न कर पाने की असमर्थता लिए कुछ स्टूडेंट्स के कारण हमारा मेस ही बंद रखा.ये तब हुआ जब स्टूडेंट्स अपने अपने करियर को एक नया शेप देने में लगे थे यानि आगे कुछ दिनों में होने वाले एंट्रेंस की तयारी में लगे हुए थे,अथॉरिटी के कुछ खास लोगो तक हॉस्टल खली करने का लव लैटर नही पहुँचा ,अपनी नजदीकियों के कारण शायद हमारे सचिव साहब जिनका कार्यकाल काफी संदिग्ध रहा है ,नौ हजार से ज्यादा मेस डयूस रहने के बावजूद उनकी एंट्री mes में है मगर जो वाकई पैसा जमा करने में असमर्थ हैं अथॉरिटी उन्हें बहार रख रही है .शायद अपने पढ़ाई से मतलब रखने और अपनी प्रकृति में रिज़र्व रहने के कारण अथॉरिटी की हिटलर शाही उन्ही पर अपनी गाज गिरा रही है ,जबकि अगली लिस्ट आने तक उन्हें गेस्ट बसिस पर हॉस्टल दिया जा सकता है .मगर लगता है उन्हें वो तिकड़म नही आते जो इस चाटुकारिता वाली सिस्टम में चलते हैं .तो जाहिर है की वो अपने किस्मत और नेचेर को बदल कर इसमे कूद पड़े तभी उनका फायदा है .वरना ये इरादे तो माशाल्लाह ..........इस यूनिवर्सिटी के सिस्टम में उन्हें बर्बाद ही करेंगे ..

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...