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Showing posts from 2011

इश्क और बेबसी का बयान : रॉकस्टार

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'रॉकस्टार'देखते हुए अनजाने में ही हंगेरियन पोएट 'लजेलो झावोर' की याद आती रहती है | झावोर के 'ग्लूमी सन्डे' ने दिल टूटने के बाद जो तान छेड़ी,उसके प्रभाव में कईयों ने अपनी जान गंवाई | यहाँ 'इरशाद कामिल'ने फिर 'बेबसी का बयान'दर्ज किया है तो वहाँ लजेलो ने 'नाऊ द टीयर्स आर माई वाइन एंड ग्रीफ इज माई ब्रेड/ईच सन्डे इज ग्लूमी ,व्हिच फील्स मी विद डेथ 'रचा था | यहाँ तमाम बन्धनों और अडचनों में 'जार्डन'के गीत है उधर इस ग्लूमी गीत को बीबीसी ने प्रतिबंधित कर दिया था | दर्द दोनों ही ओर अपने उच्चतम स्तर  पर है | 'रॉकस्टार'आपको इरशाद कामिल जैसा समर्थ गीतकार देता है वहीँ रहमान के संगीत ने फिर से रहमान द जीनियस को सिद्ध किया है | इम्तियाज़ के निर्देशन ने अपनी नींव  और पुख्ता की है तो मोहित चौहान चौकाते हैं | इम्तियाज़ अली,इरशाद कामिल,ए.आर.रहमान,मोहित चौहान,रणवीर कपूर की मेहनत का सम्मिलित सुखद परिणाम है -रॉकस्टार | थियेटर से बाहर आते-आते फिल्म के कई दृश्य दिल पर छप चुके होते हैं और एक हल्की-सी  हूक दिल में बाकी रह जाती है | बस एक

सलवा जुडूम के मुल्क में बस्तर बैंड...

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बस्‍तर हम सब जानते हैं. पर उस बस्‍तर का अर्थ परेशान करता है. मुन्‍ना पांडे ने बस्‍तर का एक दूसरा अर्थ हमारे सामने रखा है: बस्‍तर बैंड. लोक परंपरा की जीवंत मिसाल. ठेठ देसी. अगर कुछ गौरवशाली हो सकता है परंपराओं में, तो बस्‍तर बैंड बेशक उनमें से एक है. मुमकिन है, हिंदुस्‍तान के मुख्‍तलिफ हिस्‍सों में और भी ऐसी कलाएं मिसाल बनने की स्थिति में आ पहुंची होंगी. उन्‍हें फिर से जीवंत बनाना हमारे समय की बड़ी चुनौतियों में से एक है. तय है कि इमदादों से ये काम नहीं होगा. इमदाद धरोहर बना सकते हैं, दीर्घाओं में कलाओं की नुमाइश लगा सकते हैं, या फिर म्‍युजियम में कैद कर सकते हैं. जरूरत इन परंपराओं को पुनर्जीवित करने की है, डायनमिक बनाने की है. दिलचस्‍पी और इच्‍छाशक्ति जरूर इस दिशा में कारगर साबित हो सकते हैं. बहारें वापस आ सकती हैं. बहरहाल, सरोकारियों से गुजारिश है कि वे इस दि शा में कुछ सकारात्‍मक पहल लें. वोलंटियर करें. पहले चरण में दस्‍तावेजीकरण का काम तो हो ही सकता है. ये पता तो चले कि हमारी लोक कलाओं में कितने रंग थे, कितने रह गए और कितने रह जाएंगे. अगले दौर में उनके पुनर्जीवन के रास्‍ते पर स

सामा-चकेबा - मिथिलांचल की गौरवशाली परंपरा

' (लोक संस्कृति  की समृद्ध विरासत  बिहार    की भूमि में सदा-सर्वदा से गहरे विद्यमान रही है | आज का नवयुवक एक तरफ तो उत्तर औपनिवेशिक  समय में मज़बूरी वश अपनी सांस्कृतिक जड़ों  से कटता जा रहा है  या कटने को विवश है  तो दूसरी तरफ हमारी लोक परंपरा पर भी खतरे की तलवार लटक ही है | इसके पीछे निश्चित ही बाज़ार और उसकी शक्तियां हैं पर बिहार की सांकृतिक छवि को जन-जन तक और विशेषकर युवाओं तक पहुँचाने का जिम्मा बिहार के संस्कृति मंत्रालय ने उठाया है | हमें उनके इस प्रयास को सराहना चाहिए | उन्होंने बिहार की सांकृतिक पहचान बनाते कुछ लोक परम्पराओं पर अपनी पुस्तिका 'बिहार विहार'निकाली है जिसमे  इन कला रूपों का परिचयात्मक विवरण है | यहाँ मिथिलांचल की गौरवशाली परम्परा 'सामा-चकेबा'पर उसीसे एक अंश  साभार ...) सामा चकेबा'एक प्रकार का 'कंपोजिट' आर्ट है | इसमें मिटटी की बनी अनगढ़ मूर्तियाँ,बाँस के हस्तशिल्प,लिखियार,मिथिला पेंटिंग,गायन,सांस्कारिक अनुष्ठान,नृत्य,अभिनय आदि सब कुछ एक साथ रूपाकार होता है,जो इसे बेहद आकर्षक दृश्यात्मकता प्रदान करता  है | दैनन्दिनी के कार्य से निवृ

बेवजह का कुकुरहांव "आरक्षण" पर

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आरक्षण रिलीज हो चुकी है और पिछले हफ्ते तक जो सम्मानीय बंधू इसके विपक्ष में हल्ला बोल किये हुए थे और सर- फुटौव्वल पर आमादा थे,उन्हें अब तक तो यह मालूम पड़ गया होगा कि यहाँ मामला वैसा नहीं था,जैसा उन्होंने अंदाजा लगाया था याने खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली बात आरक्षण पर सोलह आने फिट बैठती है आरक्षण देखकर यह लगता हैं कि जिस शख्स का नाम प्रकाश झा है,क्या उसकी क्रियेटिविटी को दीमक लगने लगे हैं ? क्या ये वही फिल्मकार है जिसने दामुल,मृत्युदंड जैसी फिल्में दी थी ? पता नहीं हमारा सिनेमा एक ख़ास किस्म के आदर्शवादिता को क्यों ढ़ोता है फिल्म का नायक आदर्शवादी प्रिंसिपल प्रभाकर आनंद (अमिताभ बच्चन ) आरक्षण के पक्ष में बोलकर और सच के पक्ष में खडा होने की वजह से अपने पद और संस्थान से निकाल दिया जाता है उसके दलित स्टुडेंट और फिल्म के दूसरे नायक दीपक कुमार(सैफ अली खान) उसके साथ आकर उसके तबेला स्कूल को अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर सँभालते हैं और यहाँ से यह फिल्म अपने मूल मुद्दे से भटक जाती है आरक्षण का जरूरी मुद्दा कहीं और चला जाता है फिल्म प्राईवेट कोचिंग और प्राईवेट शिक्षा संस्थानों की पैरेरल व्य

लकीर-हबीबी लांघने की असफल कोशिश-"बहादुर कलारिन"

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'बहादुर कलारिन' मूलतः छत्तीसगढ़ी लोक कथा का हबीब तनवीर द्वारा नाट्य रूपांतरण है | इस नाटक को नया थियेटर की मशहूर और भारतीय रंगजगत की बेहतरीन अभिनेत्रियों में शुमार 'फ़िदा बाई'के गुजर जाने के बाद हबीब तनवीर ने इस नाटक को करना बंद कर दिया,उनका मानना था कि बहादुर कलारिन की किरदार की जितनी परतें हैं वह सबके बस की बात नहीं,इसलिए फ़िदा बाई के चले जाने के बाद मैंने यह नाटक बंद कर दिया | हबीब साहब के रंगकर्म को नजदीक से जाने वाले यह बखूबी जानते हैं कि बहादुर कलारिन भले ही चरणदास चोर जितना मशहूर न हुआ हो पर यह नाटक हबीब तनवीर के दिल के काफी करीब था | इस नाटक को कुछ वर्ष पहले रायपुर में कुछ रंगकर्मियों ने खेलने की कोशिश की थी,पर उनका यह प्रयास एक कमजोर प्रयास बनकर रह गया बहादुर कलारिन का नाटकीय तनाव इसकी जान है और इसको सँभालने के लिए कुशल निर्देशन और दक्ष अभिनेताओं की मांग करता है | २९ जुलाई को दिल्ली के कमानी सभागार में संगीत नाटक अकादमी के सौजन्य से दर्पण लखनऊ की टीम ने इस नाटक को अवधि-हिंदी मिश्रित जबान में श्री उर्मिल कुमार थपलियाल के निर्देशन में खेला | अवधी और हिंदी के मेल,लो

नायक,खलनायक की वापसी : " सिंघम "

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दक्षिण भारत की सिनेमा में यह नायक खलनायक का शह-मात और टशन हमेशा से दर्शकों को लुभाता रहा है इधर पिछले कुछ वर्षों से हिंदी सिनेमा में भी मल्टीप्लेक्स कल्चर के बरक्स सिंगल स्क्रीन दर्शकों ने 'वांटेड' (सलमान खान अभिनीत ) से सलमान खान के कैरियर को एक नयी ऊँचाई दी जिसके दम पर उन्होंने 'दबंग'और 'रेडी' जैसी फिल्मों से अपनी ब्रांड इमेज पक्की कर ली 'वांटेड' इस मामले में पहली फिल्म बनती है,जहां नायक और खलनायक सिनेमा के दो छोरों पर खड़े होकर अपनी चालें चलते हैं और अंत में हीरो जीतता है याद कीजिये ऐसा कब हुआ था जब दर्शकों को फिल्म का विलेन याद रह गया हो ? 'गनी भाई(प्रकाश राज) का कैरेक्टर दर्शकों को लुभाता और डराता रहा और प्रकाश राज द्वारा निभाया यह विलेनियस किरदार नायक के सामने किसी तरह भी फीका नहीं था गब्बर सिंह,शाकाल,मोगैम्बो,डॉ.डैंग,तो आज तक लोगों के जेहन में बसे हुए हैं पर उदारवादी दौर में सिनेमा ने मेकिंग से लेकर प्रेजेंटेशन में जो पलटी खायी,उसमें हमारा यह खलनायक कहीं गायब सा हो गया था इसीकी वापसी की कोशिश एक समय दुश्मन और संघर्ष से तनूजा चंद्रा ने की

आइये जाने 'गंगोत्री'को

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उत्तराखंड के जनपद उत्तरकाशी में समुद्रतल से ३१४० मीटर की ऊँचाई और जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से १०० कि.मी. की दूरी पर स्थित गंगोत्री हिन्दुओं का पवित्र तीर्थ क्षेत्र है | उत्तराखंड के चार धामों में से एक गंगोत्री धाम, गंगा 'उतरी' से बना है ,यानी वह जगह जहाँ गंगा उतरीं | हिन्दुओं के अन्यतम तीर्थों में से गंगा के इस उद्गोम स्त्रोत को ही अन्यतम तीर्थ की संज्ञा प्राप्त है | पुराणों के अनुसार यहीं पर राजा भागीरथ  ने एक शिला पर बैठ कर ५५०० वर्षों तक तपस्या की थी | ऐसा माना जाता है कि बाद में पांडवों ने भी कुरुक्षेत्र के महासंग्राम के बाद कुछ समय तक यहाँ वास करके  अपने सम्बन्धियों की हत्या के पाप से मुक्ति के लिए यज्ञ किया था | इसके प्रमाण के तौर पर गंगोत्री मंदिर से १.५ कि.मी. की दूरी पर एक गुफा वाली जगह है जिसे स्थानीय सन्यासी और लोग पांडव गुफा के नाम से पुकारते हैं | यहीं पर पास ही 'पांडव शिला' है,जिसके बारे में यहाँ प्रचलित है कि,यहाँ पांडवों ने तप आदि किया था | गंगोत्री एक तीर्थ स्थल होने के साथ साथ एक खूबसूरत पर्वतीय स्थल भी है,जो चारों ओर से देवदार,चीड़ और ऊँचे पर्वतों से

जनकवि भिखारी ठाकुर : रघुवंश नारायण सिंह

(यह मूल लेख भोजपुरी में लिखित है.जो भोजपुरी की बंद हो चुकी पत्रिका 'अंजोर'के अक्टूबर-जनवरी १९६७ अंक से साभार लिया गया है.मूल लेख जनकवि भिखारी ठाकुर नाम के पुस्तक जिसके लेखक श्री महेश्वर प्रसाद जी हैं ,की समीक्षा भी है और अपनी तरफ से कुछ टिप्पणियां भी.पाठकों की सुविधा के लिए हमने इसे हिंदी में रूपांतरित करके प्रस्तुत किया है,ताकि भोजपुरी नहीं जानने वाले भी भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले इस महान रंगधुनी के और बिदेसिया के रचयिता के बारे में जान सकें.पर भिखारी ठाकुर के बारे में सभी उल्लिखित राय ,लेखक महोदय की है,इससे रूपांतरणकार की  रजामंदी  जरुरी नहीं .रूपांतरण/अनुवादक - मुन्ना कुमार पाण्डेय  ) बहुत दिन पहले आरा से निकलने वाले 'भोजपुरी'में श्री बीरेंद्र किशोर का एक लेख छपा था 'भोजपुरी के शेक्सपियर  भिखारी ठाकुर' | बहुत लोगों ने जब उसे पढ़ा तो अचरज में पड़ गए,सिहर गए  कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली | यह तो अजब मेल बैठाया गया ,ऐसा बहुत लोगों ने कहा | बात सही भी थी बाकी राहुल बाबा ( सांकृत्यायन जी ) भिखारी को महाकवि कह चुके थे | अब हम लोग क्

हंगामा है क्यों बरपा " देसवा"और पक्ष-विपक्ष

इंडिया हैबिटेट सेंटर में 'देसवा'के प्रदर्शन के बाद जितनी चर्चा इस फिल्म को लेकर उठी है या सोशल नेटवर्किंग साईट फेसबुक पर जबरदस्त टिप्पणियों (जो व्यक्तिगत हमलों तक पहुँच गयी या ले ली गयी  ) का जो दौर चला है,उसे मैं एक सकारात्मक कदम मानता हूँ | जिसका प्रभाव आगे आने वाली इस तरह की भोजपुरी फिल्मों पर पड़ेगा इसकी थोड़ी उम्मीद की जा सकती है | देसवा को लेकर अविनाश (मोहल्ला लाईव ) और अमितेश के अपने अपने पक्ष रहे और बाद में स्वप्निल जी ने भी चवन्नी पर अपनी राय दी है |  मेरी बात पहले अमितेश के लिखे से है,फिर स्वप्निल जी के और तब मेरी बात 'देसवा' को लेकर है की क्यों मैं देसवा के पक्ष में हूँ | अमितेश ने 'देसवा' के पक्ष में नहीं होने के अपने कारण गिनाये हैं और देसवा को एक बेहतर सिनेमा बनते बनते एक औसत सिनेमा रह जाने को लेकर पूरी बात रखते दिखाई देते हैं | जिसपर कईयों ने उनके साथ नूराकुश्ती शुरू कर दी | यह भी दुरुस्त स्थिति नहीं है | हम कोई लक्ष्मण रेखा नहीं खींच सकते कि कौन हमारे सिनेमा के पक्ष में खड़ा  होगा , कौन नहीं या किसे नहीं खड़ा होना चाहिए | अमितेश सिर्फ देसवा को

डराने की निरीह कोशिश और थ्री-डी का लालीपाप -HAUNTED

अगर आप भूतिया फिल्मों के शौक़ीन हैं और चाहते हैं फिल्म को देखकर डर का रोमांच महसूस करें तो मेरी एक सलाह है कि कम-से-कम हमारी हिंदी फिल्मों के भूतिया इफेक्ट को न देखें | haunted  इस तरह की एक फिल्म है | इस फिल्म की कहानी पर नज़र ना डाले यह एक साथ ही कई फिल्मों जो कि जाहिर है भट्ट की ही फिल्मों का कोकटेल है | डरावना माहौल तैयार करने में उन्होंने वही सारी तिकड़में आजमाई हैं,जिन्हें हम बार बार देखते रहे हैं | थ्री डी का लालीपाप इस फिल्म को कितना आगे ले जायेगा इसमें संदेह की भरपूर गुंजाईश है | ले दे कर हमारे पास इन फिल्मों के चुनिन्दा फार्मूले होते हैं -मसलन  (१) हीरो एक लश ग्रीन पर्वतीय स्थल पर एक खूबसूरत किन्तु सुनसान जगह पर बने भूतिया बंगले में आता है ,जहां एंटिक सामनों और आदमकद शीशे के खिडकियों-दरवाजों का भरपूर प्रयोग हुआ होता है | (२) जलती हुई मोमबत्तियां ,खुबसूरत झूमर के इर्द-गिर्द चक्कर काटकर कैमरा हीरो के चेहरे के पास आता है और पार्श्व में बजता संगीत एक भय का वातावरण निर्मित करता है...एक घोर सन्नाटे के माहौल में औरत की दर्दनाक चीख और फिल्म दौड़ने लगती है | (३) हिरोइन के साथ एक हादसा

यह खेल कभी ऐसा था

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[ ऊपर जो कोई भी आसमान के तरफ रहता होगा,उसको हाजिर-नाजिर जानकर यह बयान दिया जा रहा है कि नीचे लिखी बातें ‘अखिल भारतवर्षीय भोजपुरी सम्मलेन,मोतिहारी में “ भोजपुरी समाज “ द्वारा अनुमोदित प्रस्ताव बिना मिलावट के ज्यों-का-त्यों रख दिया गया है अब आप पर यह निर्भर करता है कि आप इस प्रस्ताव के क्या मायने लगाते हैं और क्या कारण ढूँढते हैं,जिसकी वजह से यह हिमालयी अभियान (?) सफल न हो सका आपकी सुविधा के लिए मूल रूप से भोजपुरी में लिखित इस प्रस्ताव को कोष्ठकों में हिंदी में भी लिख दिया गया है और अंत में,यह सामग्री भोजपुरी की बंद हो चुकी त्रैमासिक पत्रिका ‘अँजोर’ के जुलाई-सितम्बर १९६६ अंक के पृ.२४ से ली गयी है-कबूलनामा ‘प्रस्तुतिकर्ता’ ] भोजपुरी समाज द्वारा अनुमोदित प्रस्ताव भोजपुरी समाज के ई सभा के मांग बा कि (भोजपुरी सिनेमा के इस समाज की मांग है कि )- (१)- पाँच करोड़ लोगन के भाषा भोजपुरी के पंद्रहवीं भाषा के रूप में केंद्रीय सरकार वैधानिक मान्यता दे (केंद्रीय सरकार पाँच करोड़ लोगों की भाषा भोजपुरी को वैधानिक मान्यता दे ) (२)- बिहार अउर उत्तर प्रदेश के सरकार भोजपुरी क्षेत्र में प्राईमरी स्

नाटककार लुइगी पिरान्देलो :- एक परिचय

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इटली के विख्यात उपन्यासकार, कहानीकार तथा नाटककार लुइगी पिरान्देलो का जन्म २८ जून १८६७ में सिसली के मध्य दक्षिणी समुद्र तट पर स्थित एग्रीजेंटो में हुआ था उसके माता- पिता गैरीबाल्डी समर्थक परिवारों से थे राजनैतिक उथल-पुथल के कारण उनको देहात में जाकर रहना पड़ा प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई अनेक पाठशालाओं में पढ़ने के बाद वह १८८७ में रोम विश्वविद्यालय पहुंचा परन्तु वहां आत्म-संतुष्टि नहीं मिली बौन जाकर डॉक्टर ऑफ फिलोसाफी की डिग्री प्राप्त की सन १८९१ में रोम आये, जहां जीवन भर रहे व्यापार में रूचि तो थी ही नहीं, १८९४ में पिता को व्यापार में घाटाहोने पर टीचर्ज़ कालिज में साहित्य- शास्त्र तथा भाषण का अध्यापन कार्य संभालना पड़ा,जो १९२३ तक चलता रहा उसी वर्ष एंतोनियेता पोरतुलानो से विवाह हुआ जो सफल ने हुआ पत्नी बहुत जिद्दी तथा झगडालू थी तीन बच्चे स्टीफानो (लेखक) रोजाली तथा स्टीफानो (पेंटर)होने पर भी जीवन सुखी न था अपने एक लेख में उसने सूखे,रंगहीन जीवन,अध्यापन कार्य से छुटकारा पाने की इच्छा तथा गाँव में जाकर लिखने की चाह की चर्चा की है इटली के नाटककार पैल्लीको से प्रभावित होकर पहला दुखांत '

एक पत्नी और माँ की पाती-'जगदम्बा'

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यह नाटक किसी मिथकीय चरित्र वाली जगदम्बा का नहीं बल्कि एक वैसी महिला का आत्म है, जिसने जिंदगी भर सबके लिए बा और एक आदर्श पत्नी का धर्म निभाया पर अपने वैयक्तिक जीवन में पति और बेटे के बीच के दुधारी तलवार पर चलती रही यह नाटक गाँधी जी की कस्तूरबा, भारतीय जनमानस की बा और अपने अनथक सामाजिक,राजनैतिक प्रयासों और लड़ाई में जगदम्बा की आपकबूली है,जो अब तक हमारी नजरों से परे थाआधुनिक इतिहास के अध्येता इस बात को जानते हैं कि कस्तूरबा मात्र गाँधी जी की सहचरी नहीं थी बल्कि एक वैसी साथिन के रूप में थी जिसने हर कदम पर पति का साथ तो दिया पर उनका अन्धानुकरण नहीं किया और गाँधी जी के देशहित के प्रयासों में हर कदम पर साथ रही पर एक माँ भी होने के नाते अपने बेटों हरिलाल और मणिलाल से अपने जुड़ाव को पृथक नहीं कर पायीं अपने टेक्स्ट में रामदास भटकल का यह नाटक एक पत्नी का अपने महान बनते जाते पति के अंदरूनी पारिवारिक चरित्र के अनछुए पहलुओं पर एक बारीक नज़र और उसी की डायरी है नाटक में बा के कैरेक्टर को रंगमंच की वरिष्ठ अभिनेत्री 'रोहिणी हठांगरी' ने जीवंत किया रोहिणी जी इस किरदार में रच बस गयी हैं,दर्शकों

राख सरीखा गर्म और बेहतर-कश्मीर कश्मीर

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अल्बेयर कामू ने 'मिथ ऑफ़ सिफिसस'में लिखा है-'मानव ऐसे सूनेपन में है,जिसका कोई उपचार नहीं है,आखिर वह अपने खोले हुए घर, जमीन की स्मृतियों तक से वंचित हो गया है यहाँ तक कि उसे अपनी धरती और आने की आशा के किसी वायदे की उम्मीद नहीं है मनुष्य और उसकी ज़िन्दगी के बीच अलगाव, कलाकार और पर्यावरण के बीच अलगाव सच में ही,अलगाव को जन्म देते हैं ' एब्सर्ड रंगमंच यथार्थ को अपने टूल्स के साथ ही ले आता है और उसी यथार्थ को फिर खारिज भी कर देता है बात चाहे,लुइगी पिरान्देलो के 'सिक्स कैरेक्टर्स इन सर्च ऑफ़ ऍन आथर 'की हो या हिन्दुस्तानी' गारबो' या ;कश्मीर कश्मीर'की ,यह सच दिखने और फिर तुरंत ही उसे आँखों के आगे से खींच ले जाने की अय्यारी इसी रंगमंच की खासियत है यह रंग-प्रयोग द्वितीय विश्वयुद्ध के बादकी स्थिति से उपजा रंगप्रयोग है यह अपने कथानकों में कोई निदान नहीं देता कश्मीर कश्मीर ऐसा ही नाटक है ,इसमें से कोई पात्र ऐसा नहीं है जिनसे आप प्रेम या घृणा कर सकें ,इनमे विचारों की एक अंतहीन पुनरावृति तथा अनिर्णय की स्थिति भी है ,जो आमतौर पर इस तरह के रंगमंच की खासियत होत

रूपम पाठक के पक्ष में

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झारखण्ड कैडर के एक भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी पी.एस.नटराजन के यौन-उत्पीडन की शिकार सुषमा बड़ाईक नामक महिला इन दिनों न्याय पाने के लिए जगह-जगह अर्जियां लगाती फिर रही है.पिछले दिनों यह फरियादी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के यहाँ भी आई क्योंकि झारखण्ड में उसकी फ़रियाद सुनने वाला नहीं है.उसका कहना है कि गुमला की पुलिस उसे झारखण्ड आर्मी नामक उग्रवादी संगठन की सरगना साबित करने पर तुली है.वह अपनी लाख कोशिशों के बावजूद झारखण्ड सरकार के दरबार में किसी से मिल नहीं पाई है,तब जाकर उसने नीतीश के जनता दरबार में अर्जी लगायी.यद्यपि इस सन्दर्भ में बिहार सरकार ने सुषमा के आवेदन को झारखण्ड सरकार तथा केन्द्रीय गृह मंत्रालय को अपने आग्रह-पत्र के साथ अग्रसारित कर दिया है.अब ऐसे में यदि सुषमा की अर्जी नहीं सुनी गयी तो क्या मालूम एक और रूपम पाठक केस सामने आ जाये ? इस चिंता की वाजिब वजहें हैं.मान लीजिये कि अगर सुषमा की बात सच्ची हैऔर उसकी फ़रियाद कहीं नहीं सुनी जा रही है तब ऐसे में उसके पास क्या चारा बचेगा?हालांकि संयुक्त बिहार के राजद सरकार में चम्पा विश्वास काण्ड लोगों से भूला नहीं होगा.सरकारी तंत्र अप