12/7/11

इश्क और बेबसी का बयान : रॉकस्टार

'रॉकस्टार'देखते हुए अनजाने में ही हंगेरियन पोएट 'लजेलो झावोर' की याद आती रहती है | झावोर के 'ग्लूमी सन्डे' ने दिल टूटने के बाद जो तान छेड़ी,उसके प्रभाव में कईयों ने अपनी जान गंवाई | यहाँ 'इरशाद कामिल'ने फिर 'बेबसी का बयान'दर्ज किया है तो वहाँ लजेलो ने 'नाऊ द टीयर्स आर माई वाइन एंड ग्रीफ इज माई ब्रेड/ईच सन्डे इज ग्लूमी ,व्हिच फील्स मी विद डेथ 'रचा था | यहाँ तमाम बन्धनों और अडचनों में 'जार्डन'के गीत है उधर इस ग्लूमी गीत को बीबीसी ने प्रतिबंधित कर दिया था | दर्द दोनों ही ओर अपने उच्चतम स्तर  पर है | 'रॉकस्टार'आपको इरशाद कामिल जैसा समर्थ गीतकार देता है वहीँ रहमान के संगीत ने फिर से रहमान द जीनियस को सिद्ध किया है | इम्तियाज़ के निर्देशन ने अपनी नींव  और पुख्ता की है तो मोहित चौहान चौकाते हैं | इम्तियाज़ अली,इरशाद कामिल,ए.आर.रहमान,मोहित चौहान,रणवीर कपूर की मेहनत का सम्मिलित सुखद परिणाम है -रॉकस्टार | थियेटर से बाहर आते-आते फिल्म के कई दृश्य दिल पर छप चुके होते हैं और एक हल्की-सी  हूक दिल में बाकी रह जाती है | बस एकमात्र कमजोरी सेकेण्ड हॉफ में कुछ एडिटिंग का है पर यह भी बड़ी दिक्कत नहीं पैदा करती क्योंकि 'नादान परिंदों'के घर आने की आवाज़ 'माईग्रेशन'के सम्बन्ध में 'चिट्ठी आई है 'से अब तक की दूरी भी तय करती है और इसलिए परेशान नहीं होने देती | इम्तियाज़ इरशाद के साथ मिलकर साहित्य को सिनेमा में बड़ी बारीकी से बुनते है | अली की यह फिल्म रूमी और जायसी की कविताई की सीढ़ी के सहारे 'इश्क हकीकी से इश्क मजाजी'की अंतहीन यात्रा तय करने की कोशिश है |     

8/23/11

सलवा जुडूम के मुल्क में बस्तर बैंड...


बस्‍तर हम सब जानते हैं. पर उस बस्‍तर का अर्थ परेशान करता है. मुन्‍ना पांडे ने बस्‍तर का एक दूसरा अर्थ हमारे सामने रखा है: बस्‍तर बैंड. लोक परंपरा की जीवंत मिसाल. ठेठ देसी. अगर कुछ गौरवशाली हो सकता है परंपराओं में, तो बस्‍तर बैंड बेशक उनमें से एक है. मुमकिन है, हिंदुस्‍तान के मुख्‍तलिफ हिस्‍सों में और भी ऐसी कलाएं मिसाल बनने की स्थिति में आ पहुंची होंगी. उन्‍हें फिर से जीवंत बनाना हमारे समय की बड़ी चुनौतियों में से एक है. तय है कि इमदादों से ये काम नहीं होगा. इमदाद धरोहर बना सकते हैं, दीर्घाओं में कलाओं की नुमाइश लगा सकते हैं, या फिर म्‍युजियम में कैद कर सकते हैं. जरूरत इन परंपराओं को पुनर्जीवित करने की है, डायनमिक बनाने की है. दिलचस्‍पी और इच्‍छाशक्ति जरूर इस दिशा में कारगर साबित हो सकते हैं. बहारें वापस आ सकती हैं. बहरहाल, सरोकारियों से गुजारिश है कि वे इस दि शा में कुछ सकारात्‍मक पहल लें. वोलंटियर करें. पहले चरण में दस्‍तावेजीकरण का काम तो हो ही सकता है. ये पता तो चले कि हमारी लोक कलाओं में कितने रंग थे, कितने रह गए और कितने रह जाएंगे. अगले दौर में उनके पुनर्जीवन के रास्‍ते पर साझा प्रयास भी किया जाएगा. फिलहाल बस्‍तर बैंड से जान-पहचान करें.

आम आदमी बस्तर का नाम सुनते ही किस तरह की तस्वीर अपने मन में बनाता होगा,इसकी कल्पना सहज की जा सकती है | पर यह तस्वीर का वह पहलू है जिसकी निर्मिति हमारे प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने रची-गढ़ी है | छत्तीसगढ़ के वनों में अनेक संस्कृतियाँ अपने मूल रूप में मौजूद हैं, जिनपर अभी उपभोक्ता संस्कृति ने जाल नहीं फेंका या यह कि अभी तक हमारे वन-प्रांतरों की यह अनमोल धरोहर अभी तक इससे अछूती रह गयी है यह राहत की भी बात है | इसकी बड़ी वजह वहाँ तक इस भोगवादी मानसिकता की पहुँच का न होना भी रहा हो सकता हैं | बहरहाल, बस्तर बैंड बस्तर का एक सांगीतिक चेहरा है और अपने रूप, दृश्यात्मकता और प्रदर्शन  से यह

अहम साजिंदे
बहुत चौकाने वाली भी है | ‘बस्तर बैंड’ की संकल्पना स्व.हबीब तनवीर के नया थियेटर और छत्तीसगढ़ के सक्रिय रंगकर्मी अनूप रंजन की है | अनूप ने बस्तर के लगभग सभी कबीलों में घूम-घूमकर अब लुप्त हो चुके अथवा प्रयोग में नहीं आने वाले कई वाद्य-यंत्रों को इकट्ठा करके प्रदेश के राजकीय संग्रहालय को सौंपा है | अनूप बताते हैं कि ‘बाद में मुझे अहसास हुआ कि ये जो वाद्य यन्त्र धीरे-धीरे प्रयोग से हटते जा रहे हैं और इनके बजाने वाले भी कम होते जा रहे हैं ऐसे में इनको म्यूजियम की शोभा बढाने के बजाये प्रयोग में लाया जाए तथा इनको जो बजा सकते हैं उनकी खोज की जाए |’बस्तर बैंड में बस्तर के लगभग सभी कबीलों के चालीस से भी अधिक सदस्य और इतने ही वाद्य शामिल हैं | अनूप अपने इस प्रयास के पीछे की प्रेरणा हबीब साहब के कामों से मिली भी बताते हैं | इस बैंड का प्रत्येक सदस्य तीन-चार वाद्य यन्त्र बजाने में सक्षम है | मौखिक ध्वनियों, लकड़ी और तारों से बने बाजों, थापों, नृत्य आदि एक किस्म का जादू पैदा करते हैं और हमें ऐसा लगता है गोया सभ्यता के पहले चरण में आ गए हों और तमाम किस्म की बौद्धिक जुगालियों से निर्मित यह समाज अभी इस क्षण कहीं है ही नहीं | बस्तर की जितनी भी जनजातियाँ हैं उनकी परम्पराएं भी एक दूसरे से अलहदा हैं मसलन,घोटूल,मूरिया,दण्डामी,माड़िया इत्यादि आदिम जनजातियों के वाद्य यन्त्र और परम्पराएं तक अलग है बावजूद इसके अनूप रंजन ने इसे एक मंच पर बड़े ही जतन से ऐसे संयोजन से उतारा है कि सभी मिलकर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत का एक समृद्ध और मुकम्मल तस्वीर उपस्थित करते हैं |
बस्तर के आदिवासी ‘लिंगों देव’को अपना संगीत गुरु मानते हैं | उनकी मान्यता है कि इन वाद्य यंत्रों की रचना लिंगों देव ने ही की थी | ‘लिंगों पेन’ वा  ‘लिंगों पाटा’ अथवा ’लिंगों देव’ के गीतों में इन वाद्य यंत्रों का जिक्र मिलता है | यह बैंड बस्तर की सदियों से चली आ रही आदिम जीवन की लोक जीजिविषा और परंपरा का ध्वज वाहक है | अनूप रंजन बताते हैं,

थिरकने से रोकना मुश्किल
‘मेरे आदिवासी वाद्य यंत्रों के संग्रहण के शौक ने पता नहीं कब जूनून का रूप अख्तियार कर लिया | लगभग दस बरस के इस श्रमसाध्य,खर्चीले बैंड का जूनून सन 2004 में अपनी शक्ल अख्तियार कर पाया | जिसकी पच्चीसवीं प्रस्तुति इस अगस्त माह में दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में हुई और इस बेमिसाल प्रस्तुति ने दिल्ली के सांस्कृतिक हलकों में लोक सौंदर्य की जड़ीभूत सौन्दर्याभीरूची को झंकझोर दिया | छत्तीसगढ़ के इस जनजातीय संगीत जिसमें गीत, संगीत, नृत्य सभी कुछ है कि प्रस्तुति दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में भी हो चुकी है |’
जो वाद्य यंत्र आपको इस दुनिया से किसी और दुनिया में हमें आसानी से लेकर चले जाते हैं, उनके नाम उतने ही दुरूह हैं| इन वाद्य यंत्रों में, गोगा ढोल,मिरगिन ढोल,सियाडी बाजा, बेदुर, सुलुड,  चिटकुल, उजीर, किकिड, तेहंडोर, गोती, नरपराय, गुटापराय, चरहा, दुसिर, मुंडा, तपकी, अकुम, तोड़ी, तुडबड़ी, नंगूरा, धुरवा ढोल, माडिया ढोल आदि हैं |
साथ ही अगर हम इस बैंड के सदस्यों पर ध्यान दे तो इसमें कोया समाज या कोइतोर समाज के मुरिया, दण्डामी, मुंडा, मोहरा, भतरा, लोहरा, परजा, हलबा, मिरगिन, अदबा आदि समाजों के पारंपरिक और विभिन्न अवसरों पर प्रस्तुत किए जाने वाले संस्कारिक गीत-संगीत-नृत्य को उसकी सामूहिकता में सम्मिलित किया गया है | बस्तर बैंड प्रकृति का संगीत है और ऐसे प्रयासों की सराहना होनी चाहिए | इतना ही नहीं, यह बैंड अपने सांगीतिक प्रयासों से हमारे तथाकथित शहराती और विकसित समाजों के सोच से परे बस्तर की उस तस्वीर को सामने लाता है जहाँ इस विकसित समाज ने उसे बारूदी ढेर पर बैठा विस्फोटक ज्वलनशील जगह बना दिया है | जब आज पूँजी आधारित व्यवस्था ने बस्तर को आदिवासियों,उनकी जमीनों, खनिजों और संसाधनों के दोहन की ही जगह बना दी है, ऐसे में यह बैंड बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को सामने लाता है, जिसको देखने का अवकाश किसी के पास नहीं है या कोई देखना ही नहीं चाहता | बस्तर बैंड देखते हुए हो सकता है आपको कुछ अनूठी चीज़ न मिले पर यह बैंड अपने वाद्ययंत्रों, नृत्यों, गीतों और प्रस्तुतियों से आपको रोमांचित करता है, इसमें कोई दो-राय नहीं | बस्तर बैंड बस्तर के आदिम संगीत का प्रतिनिधि है | बस्तर माने केवल नक्सल, पुलिस और बारूद ही नहीं होता |
पूरी टीम

(www.sarokar.net पर आज (23/8/11)प्रकाशित ) ...

8/21/11

सामा-चकेबा - मिथिलांचल की गौरवशाली परंपरा

'(लोक संस्कृति  की समृद्ध विरासत  बिहार  की भूमि में सदा-सर्वदा से गहरे विद्यमान रही है | आज का नवयुवक एक तरफ तो उत्तर औपनिवेशिक  समय में मज़बूरी वश अपनी सांस्कृतिक जड़ों  से कटता जा रहा है  या कटने को विवश है  तो दूसरी तरफ हमारी लोक परंपरा पर भी खतरे की तलवार लटक ही है | इसके पीछे निश्चित ही बाज़ार और उसकी शक्तियां हैं पर बिहार की सांकृतिक छवि को जन-जन तक और विशेषकर युवाओं तक पहुँचाने का जिम्मा बिहार के संस्कृति मंत्रालय ने उठाया है | हमें उनके इस प्रयास को सराहना चाहिए | उन्होंने बिहार की सांकृतिक पहचान बनाते कुछ लोक परम्पराओं पर अपनी पुस्तिका 'बिहार विहार'निकाली है जिसमे  इन कला रूपों का परिचयात्मक विवरण है | यहाँ मिथिलांचल की गौरवशाली परम्परा 'सामा-चकेबा'पर उसीसे एक अंश  साभार ...)


सामा चकेबा'एक प्रकार का 'कंपोजिट' आर्ट है | इसमें मिटटी की बनी अनगढ़ मूर्तियाँ,बाँस के हस्तशिल्प,लिखियार,मिथिला पेंटिंग,गायन,सांस्कारिक अनुष्ठान,नृत्य,अभिनय आदि सब कुछ एक साथ रूपाकार होता है,जो इसे बेहद आकर्षक दृश्यात्मकता प्रदान करता  है | दैनन्दिनी के कार्य से निवृत  होने के बाद कार्तिक मास के सिहरन वाली रात के दूसरे प्रहर में दुग्ध धवल चांदनी में यह 'खेल'प्रारम्भ होता है तथा अमूमन तीसरे प्रहर तक चलता है |  हर रात,तालाब(नदी),बाग़-बगीचे,खेत-खलिहान,मंदिर और ग्राम प्रदक्षिणा का इसमें कार्यक्रम चलता है | इस पूरे खेल के दौरान ननद-भौजाई की चुहलबाजी और हँसी-मजाक वातावरण को जीवंत  बनाये रखते हैं | पद्म पुराण की एक पौराणिक कथा से भी 'सामा-चकेबा'को जोड़ा जाता है | इस कथा में श्रीकृष्ण के दरबार के एक पात्र (चूड़क)की नजर उनकी पुत्री'समा'(श्यामा)पर रहती है | पर सामा 'चारुवाक'नामक युवक से प्यार करती है | प्रेमांध चूड़क श्रीकृष्ण के पास इसकी चुगलखोरी करता है | श्रीकृष्ण शाप देते हैं और सामा-चारुवाक पक्षी बन जाते हैं | बहन के शापित  होने की खबर भाई साम्ब को लगती है | वह श्रीकृष्ण से अनुनय-विनय करता है पर श्रीकृष्ण राजधर्म की आड़ लेकर उसके आग्रह को ठुकरा देते हैं | साम्ब शिव की आराधना में घनघोर तपस्या करते हैं  | शिव प्रसन्न होते हैं तथा मुक्ति का मार्ग बताते हैं | इस मार्ग का अनुसरण कर साम्ब महिलाओं को संगठित करते हैं | श्रीकृष्ण झुकते हैं और सामा-चारुवाक शाप-मुक्त होते हैं |स्त्री के संगठित प्रतिरोध,राज प्रशासन के झुकने,भाई के बहन के प्रति अटूट प्रेम और चुगलखोरों को सजा-यही उत्स है 'सामा-चकेबा'पर्व का | इस पूरे कथानक का बेहद रोचक अभिनय इस पर्व में होता है | आज भी मिथिलांचल के गाँवों में स्त्रियाँ 'सामा-चकेबा'खेलती हैं | कला  मर्मज्ञों ने इसके कथा सूत्र की रोचकता,आकर्षक दृश्यात्मकता,गीत-संगीत-नृत्य और इसके पारंपरिक स्वरुप को देखते हुए इसे परिमार्जित कर पारंपरिक 'लोकनृत्य'के रूप में विकसित किया है | इसका बहुआयामी स्वरुप,गायन की विविधता,प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम,भाई-बहन के स्नेहिल सम्बन्ध,चुगलखोरों(समाज विरोधियों)के प्रति सामूहिक-संगठित विरोध,लोक कल्याण की भावना,संस्कारों का प्रशिक्षण,जैसे अनेक खण्डों में बांटकर इसे समझने का प्रयास किया है | इसीलिए इस बहुआयामी लोकनृत्य में शेष बातें एक जैसी होने पर भी प्रदर्शनकारी दल के विचार चिंतन के आधार पर इसकी व्याख्या बदल जाती है | यही इस लोकनृत्य की निजता और विशेषता भी है |   

8/15/11

बेवजह का कुकुरहांव "आरक्षण" पर

आरक्षण रिलीज हो चुकी है और पिछले हफ्ते तक जो सम्मानीय बंधू इसके विपक्ष में हल्ला बोल किये हुए थे और सर- फुटौव्वल पर आमादा थे,उन्हें अब तक तो यह मालूम पड़ गया होगा कि यहाँ मामला वैसा नहीं था,जैसा उन्होंने अंदाजा लगाया था

याने खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली बात आरक्षण पर सोलह आने फिट बैठती है
आरक्षण देखकर यह लगता हैं कि जिस शख्स का नाम प्रकाश झा है,क्या उसकी क्रियेटिविटी को दीमक लगने लगे हैं ? क्या ये वही फिल्मकार है जिसने दामुल,मृत्युदंड जैसी फिल्में दी थी ? पता नहीं हमारा सिनेमा एक ख़ास किस्म के आदर्शवादिता को क्यों ढ़ोता है
फिल्म का नायक आदर्शवादी प्रिंसिपल प्रभाकर आनंद (अमिताभ बच्चन ) आरक्षण के पक्ष में बोलकर और सच के पक्ष में खडा होने की वजह से अपने पद और संस्थान से निकाल दिया जाता है
उसके दलित स्टुडेंट और फिल्म के दूसरे नायक दीपक कुमार(सैफ अली खान) उसके साथ आकर उसके तबेला स्कूल को अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर सँभालते हैं और यहाँ से यह फिल्म अपने मूल मुद्दे से भटक जाती है
आरक्षण का जरूरी मुद्दा कहीं और चला जाता है
फिल्म प्राईवेट कोचिंग और प्राईवेट शिक्षा संस्थानों की पैरेरल व्यवस्था की ओर चल देती है
बीच-बीच में फिल्म कहीं-कहीं वर्गभेद के मुद्दे को छूती है पर वह आरक्षण के मुद्दे से कतई मेल नहीं करता
आरक्षण की जितनी भी डिबेट प्रकाश झा से या उनकी समझ से संभव थी,उतनी उन्होंने पहले हाफ में रख छोड़ी है
कायदे से फिल्म के जिस हिस्से से आरक्षण समर्थक वर्ग को दिक्कत होनी चाहिए उस ओर उनका ध्यान नहीं जा रहा
फिल्म का एक दृश्य है कि दलित शिक्षक और नायक दीपक कुमार ,अपने शिक्षक प्रभाकर आनंद के मामले में अपने इलाके के दलित नेता से सहयोग मांगता है पर वह शिक्षा मंत्री ( सौरव शुक्ला)के आगे बिक जाता है इतना ही नहीं वह अपनी कुर्सी के सपने के लालच में उस सवर्ण मंत्री और प्रतिनायक मिथिलेश सिंह (मनोज बाजपेयी ) के आगे मिमियाने वाले अंदाज़ में चित्रित हुआ है
क्या निर्देशक इसको दिखा कर इस वर्ग को यह सन्देश देना चाहता था कि देखो आपके वर्ग का प्रतिनिधि कितनी संकीर्ण सोच (फिल्म में जिसे मंद बुद्धि कहा गया है ) का है या यह कि दलितों और उनकी स्थिति में अब तक अधिक बदलाव ना होने के पीछे उनके द्वारा चुने गए इसी तरह के प्रतिनिधि रहे हैं,जो अपने को दलितों का सच्चा हितैषी और प्रतिनिधि बताते रहे हैं ? यह फिल्म प्रच्छन्न रूप से आरक्षण के आर्थिक आधार पर दिए जाने के तर्क की पैरवी करता दिखता है
एक बड़ा इरिटेटिंग पात्र पंडित छात्र का है जिसे अपनी फीस तक के लिए जूझना पड़ता है | यह पात्र पूरी फिल्म में जिस हिंदी का प्रयोक्ता दिखा है वैसी हिंदी पता नहीं प्रकाश झा ने किस हिन्दुस्तान में सुनी है

सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि वह कैरेक्टर इंजीनियरिंग पढना चाहता है और बाद में पढता भी है
आरक्षण फिल्म के गरियाने वालों को खासकर वह दृश्य भी याद रखना चाहिए जब दलित नायक दीपक कुमार थाने में बंद है तब उसकी जमानत उसी का सवर्ण अमीर साथी सुशांत सेठ (प्रतीक बब्बर) ही कराता है
अब प्रश्न उठता है कि क्या जब भी जमानत जैसे काम या ऐसे ही अन्य काम जिनमें सिफारिश या पैसों की बात होनी है वह बिना सवर्णों के सहयोग के नहीं होगी ? दलितों का उद्धार या उत्थान सवर्णों का ही मुहताज/कृपापात्री रहेगा ?इस बात को महज फ़िल्मी प्रयोग या सहज स्वाभाविक मानकर नहीं चला जा सकता
आरक्षण देखते हुए कई दफे यह लगता है गोया प्रकाश झा ने बाघ और बकरी (इसे अभिधार्थ ना लें )के एक ही घाट पर पानी पीने के कपोलकल्पित रामराज्य को ही फिल्म में उतारने की कोशिश की है
फिल्म का नायक प्रभाकर आनंद कोचिंग शिक्षा व्यवस्था को अपने तबेला स्कूल (एक आदर्श अवधारणा )के माध्यम से ध्वस्त कर देना चाहते हैं और यह इसी तरह के रामराज्य को बनाने की गांधीवादी कोशिश लगती है पर यह पूरा प्रकरण फिल्म का सबसे बोरिंग और लम्बा खींच गया दृश्य है
कायदे से प्रकाश झा ने फिल्म आरक्षण के शीर्षक के साथं न्याय तो नहीं ही किया है
ना तो यह फिल्म आरक्षण की पैरवी करती दिखती है न ही मुखालफत
यह मध्यममार्गी फिल्म है अगर हम यह मान लें कि यह फिल्म आरक्षण के इर्द-गिर्द है
इस फिल्म के शीर्षक से इसका जुड़ाव बस इतना सा है कि फिल्म में दिखाए गए संस्थान का प्रिसिपल आरक्षण के पक्ष में बोलने की वजह से मुसीबत में फंसा दिया जाता है
ध्यान से देखा जाये तो यह प्रिंसिपल इस स्टेटमेंट से पहले ही शिक्षामंत्री जी के भांजे और एक ट्रस्टी महोदय के नजरों में पहले ही खटक रहा होता है
आरक्षण के पक्ष में बोलना महज़ उसके ताबूत की आखरी कील होता है
लब्बोलुआब यह कि यह फिल्म प्रकाश झा की अब तक कि सबसे कमजोर और भटकी हुई फिल्म है और सही कहें तो यह झा का कमर्शियल स्टंट मात्र है,जिसका महज शीर्षक देखकर ही आरक्षण समर्थकों ने बेवजह का कुकुरहांव (इसे भी कृपया अभिधार्थ न लें )मचा दिया
दरअसल यह वैसा ही मानो जब बच्चे को चम्मच में शहद डाल कर चटाई जाए और बच्चा शहद छोड़कर चम्मच को ही दाँतों से पकड़ ले
हाँ ! झा के ट्वीट के खिलाफ मैं भी हूँ
(बहरहाल,फिल्म के एक छोटे दृश्य में भोपाल रंगमंच के बेमिसाल एक्टर आलोक चटर्जी और नया थियेटर के हिमांशु त्यागी को देखा सुखद है पर यह मेरी व्यक्तिगत राय इन कलाकारों के लिए है फिल्म से इसका कोई लेना देना हैं )



7/30/11

लकीर-हबीबी लांघने की असफल कोशिश-"बहादुर कलारिन"

'बहादुर कलारिन' मूलतः छत्तीसगढ़ी लोक कथा का हबीब तनवीर द्वारा नाट्य रूपांतरण है | इस नाटक को नया थियेटर की मशहूर और भारतीय रंगजगत की बेहतरीन अभिनेत्रियों में शुमार 'फ़िदा बाई'के गुजर जाने के बाद हबीब तनवीर ने इस नाटक को करना बंद कर दिया,उनका मानना था कि बहादुर कलारिन की किरदार की जितनी परतें हैं वह सबके बस की बात नहीं,इसलिए फ़िदा बाई के चले जाने के बाद मैंने यह नाटक बंद कर दिया | हबीब साहब के रंगकर्म को नजदीक से जाने वाले यह बखूबी जानते हैं कि बहादुर कलारिन भले ही चरणदास चोर जितना मशहूर न हुआ हो पर यह नाटक हबीब तनवीर के दिल के काफी करीब था | इस नाटक को कुछ वर्ष पहले रायपुर में कुछ रंगकर्मियों ने खेलने की कोशिश की थी,पर उनका यह प्रयास एक कमजोर प्रयास बनकर रह गया बहादुर कलारिन का नाटकीय तनाव इसकी जान है और इसको सँभालने के लिए कुशल निर्देशन और दक्ष अभिनेताओं की मांग करता है | २९ जुलाई को दिल्ली के कमानी सभागार में संगीत नाटक अकादमी के सौजन्य से दर्पण लखनऊ की टीम ने इस नाटक को अवधि-हिंदी मिश्रित जबान में श्री उर्मिल कुमार थपलियाल के निर्देशन में खेला | अवधी और हिंदी के मेल,लोक-संगीत का प्रयोग तथा रंग-छंगा की मंचीय उपस्थिति कराकर थपलियाल जी ने नाटक के लोक तत्वों को भरसक जीवित करने की कोशिश की पर यह बात कहावत में ही अच्छी लगती है कि तबियत से पत्थर उछाला जाये तो आसमान में सुराख हो सकता है | हबीब तनवीर ने जो लकीर खींच दी है वह लकीर लांघना सबके बूते की बात नहीं है | थपिलियाल इससे अछूते नहीं रह सके | बहादुर कलारिन की इस प्रस्तुति में रूपांतरण करते हुए एक बड़ी गलती तो यही पर उभर कर सामने आ जाती है जब राजा के मरने के बाद के दृश्य में सीधे शादियों का दृश्य प्रस्तुत कर दिया जाता है | इस नाटक में जिस इन्सेस्ट की ओर इशारा है और जिस वजह से यह कहानी ईडिपस कॉम्प्लेक्स के साथ एक महान दुखांत की जमीन तैयार करती है,वह दर्पण की प्रस्तुति से गायब दिखा | जबकि मूल कथानक में राजा की मृत्यु पश्चात विलाप करती बहादुर पहली बार अपने जवान होते बेटे 'छछान'के गले लगती है और छ्छान के मन में पहली बार इन्सेस्ट का मनोरोग अपनी ही माँ के प्रति जागता है | बाकी की कसर छ्छान बने अभिनेता ने पूरी कर दी | ग्रामीणों के अभिनय में नैसर्गिकता का अभाव साफ़ दिखा
बहादुर के किरदार को दबंग और चंचल दिखाने में भी साफ़ कमी रही और इसी वजह से राजा या छ्चान वाले गंभीर दृश्यों में भी दर्शकों को हंसी आ रही थी | जब गंभीर अभिनय क्षण पर दर्शकों को आप बाँध न सकें तो इसके मायने यह हुआ कि या तो निर्देशक अपनी किस्सा बयानी ठीक नहीं रख सका है अथवा अभिनेताओं ने किरदार गहराई से नहीं किया | जबकि पहली बार जब बहादुर कलारिन कोरबा के खुले मंच पर खेला और कारखाने के कामगारों और देहातियों द्वारा देखा गया तब यह ट्रेजेडी शुरू से आखिर तक सन्नाटें में देखी गयी थी | इसकी वजह साफ़ है कि नाटक के क्रियाव्यपार में प्रेक्षकों को अनुभव की तीव्रता और गहराई दिखाई दी | वैसे भी रंगमंच की अपेक्षा का वास्तविक अर्थ नाटक के मंच पर अभिनेताओं के माध्यम से दृश्य रूप में मूर्त हो सकने की क्षमता और दर्शकों को बाँध लेने के सामर्थ्य से जुड़ा है | इस दृष्टि से भी थपलियाल अपनी इस प्रस्तुति में असफल रहे
मूल बहादुर कलारिन में गीतों की योजना उसके कथा विस्तार को ताकत देती है | 'अईसन सुन्दर नारी के ई बात ,कलारिन ओकर जात / चोला माटी का हे राम एकर का भरोसा / होगे जग अंधियार,राजा बेटा तोला का होगे-जैसे गीत इस ट्रेजेडी को एक सार्थक ऊँचाई देते हैं पर अवधी भाषा (बोली) की यह प्रस्तुति इस ओर से भी निराश करती है | लोक आख्यान 'बहादुर कलारिन'का नाट्य रूप तैयार करते समय नाटककार हबीब तनवीर के सामने 'राजा ईडिपस'की कथा थी,तो दूसरी ओर इन्सेस्ट का मनोरोग भी | इन्सेस्ट की इसी मनोवृति ने इस नाटक को त्रासद रूप दिया क्योंकि उन्होंने इस नाटक के कथानक के सफल बुनावट के लिए मनोविज्ञान के इसी आदिपक्ष 'ईडिपस कॉम्प्लेक्स' और आत्मरति ग्रंथि यानि 'न्यूरोसिस कॉम्प्लेक्स' के सिद्धांत को अपनाया है और जब यह दृश्य नाटककार-निर्देशक के मन में साफ़ हो तो नाटक का कथानक मंच पर खुलकर प्रेक्षकों के सामने आता है पर अफ़सोस लगभग डेढ़ घंटे का समय लेकर भी अवधी की बहादुर न तो अपने साथ जोड़ सकी न उसकी ट्रेजेडी बाँध सकी और बाकि की कसर अभिनेताओं ने पूरी कर दी | ऐसे में निर्देशक-रूपान्तरकार उर्मिल थपलियाल जी पर ही जवाबदेही आती है क्योंकि हबीब तनवीर के पसंदीदा नाटकों को जब भी कोई मंच पर लेकर आएगा उसे हबीब द्वारा खींची लकीर से बार-बार झूझना होगा | ऐसे में भी दर्पण समूह की जिम्मेदारी बढ़ गयी थी क्योंकि तुलना तो अवश्यम्भावी थी और थपलियाल जी, दर्पण समूह इस कथा को अपने प्रयोगों से मंच पर ईमानदारी से रख न सका | कुल मिलाकर निराशाजनक अनुभव रहा और एक वाक्य में कहें तो नाटक नौटंकी बन गया (यहाँ नौटंकी का अभिधात्मक अर्थ न लें )




7/28/11

नायक,खलनायक की वापसी : " सिंघम "

दक्षिण भारत की सिनेमा में यह नायक खलनायक का शह-मात और टशन हमेशा से दर्शकों को लुभाता रहा है

इधर पिछले कुछ वर्षों से हिंदी सिनेमा में भी मल्टीप्लेक्स कल्चर के बरक्स सिंगल स्क्रीन दर्शकों ने 'वांटेड' (सलमान खान अभिनीत ) से सलमान खान के कैरियर को एक नयी ऊँचाई दी जिसके दम पर उन्होंने 'दबंग'और 'रेडी' जैसी फिल्मों से अपनी ब्रांड इमेज पक्की कर ली
'वांटेड' इस मामले में पहली फिल्म बनती है,जहां नायक और खलनायक सिनेमा के दो छोरों पर खड़े होकर अपनी चालें चलते हैं और अंत में हीरो जीतता है
याद कीजिये ऐसा कब हुआ था जब दर्शकों को फिल्म का विलेन याद रह गया हो ? 'गनी भाई(प्रकाश राज) का कैरेक्टर दर्शकों को लुभाता और डराता रहा और प्रकाश राज द्वारा निभाया यह विलेनियस किरदार नायक के सामने किसी तरह भी फीका नहीं था
गब्बर सिंह,शाकाल,मोगैम्बो,डॉ.डैंग,तो आज तक लोगों के जेहन में बसे हुए हैं पर उदारवादी दौर में सिनेमा ने मेकिंग से लेकर प्रेजेंटेशन में जो पलटी खायी,उसमें हमारा यह खलनायक कहीं गायब सा हो गया था
इसीकी वापसी की कोशिश एक समय दुश्मन और संघर्ष से तनूजा चंद्रा ने की थी और सफल भी रहीं थी पर उसके बाद गैप आ गया था
यह भी कह सकते हैं कि प्रतिनायक का किरदार मजबूती और इमानदारी से गढ़ा ही नहीं गया या इसकी जरुरत ही महसूस ही नहीं की गयी
'गनी भाई' (वांटेड)के बाद रामगोपाल वर्मा ने 'भुक्का रेड्डी' (रक्तचरित्र में अभिमन्यु सिंह द्वारा निभाया गया चरित्र )में यह खलनायक हीरो के किरदार जितनी इमानदारी से लिखा और प्रस्तुत किया
'वांटेड' के बाद मेगा हिट 'दबंग'ने छेदी सिंह(सोनू सूद द्वारा निभाया किरदार) को नायक 'चुलबुल पाण्डेय'(सलमान खान)के सामने रखा पर 'छेदी सिंह'में वह बात नहीं दिखी
संभव है,यहाँ निर्देशक का मंतव्य नायक को मसीहाई ऊँचाई देने का अधिक रहा हो जिसका शिकार अनजाने में इस फिल्म का विलेन हो गया |
हिंदी सिनेमा में ७०-८० का दशक नायक-प्रतिनायक के बेहतर दौर का समय रहा

९० का दशक प्रेम-कहानियों के नाम रहा तो २१ वीं सदी हिंदी सिनेमा जगत में नए किस्म के सिनेमा और नयी सोच के युवा लेखकों और निर्देशकों के उभार का दौर रहा जिसकी बानगी आज हम देख रहे हैं
वांटेड से लेकर नयी रिलीज 'सिंघम'में ७० का वह नायक-खलनायक का दौर दक्षिण भारतीय फिल्मों के प्रभाव और सिंगल स्क्रीन थियेटर के आडियेंस की वजह से फिर से लौटा है
उसूल,चोर-पुलिस,चेसिंग दृश्य,सरे-बाज़ार जूतम-पैजार,हॉल में सीटियाँ बजाने को मजबूर करने वाले संवाद,अतुल बलशाली नायक,सिनेमा में बे-जरुरत नायिका,वापस लौट आये हैं
अजय देवगन,प्रकाश राज अभिनीत और 'गोलमाल'फेम निर्देशक रोहित शेट्टी की "सिंघम" इसी तरह की फिल्म है
जो नायक और खलनायक के दांव-पेंचों के बीच दर्शकों को सीट से बाँध कर रखती है
भले ही अजय देवगन का स्टारडम सलमान खान की तरह का न हो पर वह एक दमदार अभिनेता हैं यह इस फिल्म में दिखता है
पर इस फिल्म का सबसे मजबूत पात्र इसका खलनायक 'जयकांत शिक्रे'(प्रकाश राज ) है
प्रकाश में एक ख़ास किस्म का ह्यूमर है,जो दर्शकों को अपने से जोड़ लेता है और यह उनकी अभिनय क्षमता को दर्शाता है
यह खलनायक कई बार नायक 'सिंघम'पर भारी पड़ता है
खासतौर पर नायक और खलनायक के आपसी संवादों और टकराव वाले दृश्यों में
'दबंग'जहाँ स्टार वैल्यू और 'मुन्नी बदनाम'के बूते बड़ी हिट साबित हुई तो 'सिंघम' में उसका निर्देशन,कथा प्रवाह,नायक-खलनायक का बेहतरीन किरदार आपको इस फिल्म के लिए प्रभावित करता है
'सिंघम'फुल इंटरटेनर है,शालीमार बाग़ (दिल्ली) के डीटी सिनेमा में यह फिल्म देखते मैं इस बात पर खुश होता रहा कि बिना दिमागी कसरत किये आप कसे हुए निर्देशन में यह बेहतर मनोरंजक सिनेमा देख रहे है और एक बड़ा आश्चर्य भी हुआ कि जब भी खलनायक (जयकांत शिक्रे का प्रकाश राज द्वारा निभाया किरदार )परदे पर आया लोगों ने तालियाँ-सीटियाँ बजायी
यह एक खलनायक को दर्शकों का इनाम था,एक अभिनेता को उसका पुरस्कार था दर्शकों द्वारा और इन दर्शकों में छोटे बच्चे भी अधिक थे,मुझे मोगैम्बो से डर लगता था अपने बचपने में और यहाँ खलनायक आकर्षित कर रहा था,यह किरदार तथा अभिनेता की ताकत है,जो मसाला हिंदी सिनेमा से लुप्त हो चला था
यह हालत एक पॉश इलाके के मल्टीप्लेक्स के दर्शकों की थी तो सिंगल स्क्रीन के हमारे असली सिनेमचियों का ज़रा सोचिये
वांटेड,रक्तचरित्र,दबंग और अब सिंघम ने हिंदी सिनेमा के परदे पर नायक और खलनायक की वापसी करायी है



उम्मीद है आने वाले समय में कुछ और मजेदार फिल्में दिखेंगी
तब तक सिंघम से मज़े लें
***1/२ (मस्ट वाच मूवी)





6/17/11

आइये जाने 'गंगोत्री'को


उत्तराखंड के जनपद उत्तरकाशी में समुद्रतल से ३१४० मीटर की ऊँचाई और जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से १०० कि.मी. की दूरी पर स्थित गंगोत्री हिन्दुओं का पवित्र तीर्थ क्षेत्र है | उत्तराखंड के चार धामों में से एक गंगोत्री धाम, गंगा 'उतरी' से बना है ,यानी वह जगह जहाँ गंगा उतरीं | हिन्दुओं के अन्यतम तीर्थों में से गंगा के इस उद्गोम स्त्रोत को ही अन्यतम तीर्थ की संज्ञा प्राप्त है | पुराणों के अनुसार यहीं पर राजा भागीरथ  ने एक शिला पर बैठ कर ५५०० वर्षों तक तपस्या की थी | ऐसा माना जाता है कि बाद में पांडवों ने भी कुरुक्षेत्र के महासंग्राम के बाद कुछ समय तक यहाँ वास करके  अपने सम्बन्धियों की हत्या के पाप से मुक्ति के लिए यज्ञ किया था | इसके प्रमाण के तौर पर गंगोत्री मंदिर से १.५ कि.मी. की दूरी पर एक गुफा वाली जगह है जिसे स्थानीय सन्यासी और लोग पांडव गुफा के नाम से पुकारते हैं | यहीं पर पास ही 'पांडव शिला' है,जिसके बारे में यहाँ प्रचलित है कि,यहाँ पांडवों ने तप आदि किया था | गंगोत्री एक तीर्थ स्थल होने के साथ साथ एक खूबसूरत पर्वतीय स्थल भी है,जो चारों ओर से देवदार,चीड़ और ऊँचे पर्वतों से घिरा है \ सर्दियों में यहाँ बहुत अधिक बर्फ़बारी होती है,तब यह सारा क्षेत्र सफ़ेद बर्फ की मोटी चादर ओढ़ लेता है | इसी समय गंगोत्री मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाते हैं और देवी गंगा की प्रतिमा हर्षिल के निकट 'मुखबा'गाँव में लाकर रख दी जाती है और उसकी वहीँ पूजा-अर्चना आदि होती है | गंगोत्री का एक बड़ा आकर्षण गंगोत्री मंदिर है | इसका निर्माण सर्वप्रथम गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने १८ वी शताब्दी में प्रारंभ करवाया था,जिसे बाद में २० वीं शताब्दी के शुरुआत में जयपुर नरेश माधोसिंह ने पूरा करवाया | गंगोत्री मंदिर सफ़ेद रंग के चित्तीदार ग्रेनाईट पत्थरों को तराशकर बनाया गया है | मंदिर यद्यपि २० फीट ही ऊँचा है पर बावजूद इसके बेहद आकर्षक और खूबसूरत है | ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए गंगोत्री एक ख़ास बेस कैम्प की तरह है | यहाँ से दो ट्रेकिंग पॉइंट हैं पहला-गोमुख (दूरी-१८ कि.मी.) और दूसरा - केदार ताल (दूरी-१८ कि.मी.) | गंगोत्री में ट्रेकिंग के लिए जरुरी सामान और गाईड ,कुली,खच्चर आदि मिल जाते जाते हैं,जिनके साथ यह रोमांचक जोखिम यात्रा थोड़ी आसान हो जाती है | इस पूरे क्षेत्र में आक्सीजन लेवल कम होने से यहाँ की ट्रेकिंग टफ मानसिक और शारीरिक स्थिति की मांग करता है | जिन्हें ब्लड प्रेशर,सुगर,सांस सम्बन्धी परेशानी इत्यादि हो उन्हें इस तरह के रोमांच से बचना चाहिए | बहुत से उत्साही और दक्ष ट्रेकर्स गोमुख से आगे नंदन वन,तपोवन,कालिंदी पास,शिवलिंग बेस आदि तक की उंचाईयों तक ट्रेक करते हैं और वहाँ टेंटों में कुछ दिन बिताते हैं | पर यह अधिक साजो-सामान और पुख्ता तैयारी के बिना संभव नहीं | गोमुख गंगा का उद्गम स्थान है पर गंगोत्री में इसे भागीरथी कहा जाता है | जब भागीरथी आगे चलती हुई देवप्रयाग में बद्रीनाथ की ओर से आने वाली नदी अलकनंदा से मिल जाती है,तब इसका नाम 'गंगा'हो जाता है | गंगोत्री के निकट कई रमणीय स्थल हैं,हर्षिल उन्ही में  से एक है | हर्षिल २६३३ मी. की ऊँचाई पर बसा खूबसूरत कस्बा है | यह गंगोत्री से २५ कि.मी. पहले पड़ता है | यहाँ रहने-खाने की तमाम सुविधायें हैं | यहाँ के सेब और आलू बहुत प्रसिद्द हैं | अँगरेज़ शिकारी विल्सन ने सबसे पहले यहाँ नदी पर झूलने वाला रस्सी का पुल बनाया था और उसी ने सेब और आलू का उत्पादन भी शुरू किया था | फिल्मकार राज कपूर ने अपनी फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली'की शूटिंग हर्षिल की खूबसूरत पहाड़ियों,वादियों,नदियों,झरनों में की है | इसके अलावा गंगोत्री के आसपास कई बुग्याल और ताल भी है जिन्हें साहसिक पर्यटन के दीवाने ट्रेक करते रहते हैं मसलन-डोडीताल (उत्तरकाशी  से दूरी- ९ कि.मी./ट्रेकिंग मार्ग-२२ कि.मी./ऊँचाई- २९९९ मी./प्रसिद्धि-महासीर और अन्य रंगीन मछलियाँ तथा यहाँ से बन्दर पूंछ,ब्लैक पीक,हनुमान पीक आदि पर्वत श्रेणियों के नयनाभिराम दृश्यों के  लिए ),दयारा बुग्याल (उत्तरकाशी से दूरी-२९ कि.मी./१६-१७ कि.मी ट्रेक/ऊँचाई - १२००० फीट से ऊपर/चौड़ाई लगभग- ०५ कि.मी.और लम्बाई-१० कि.मी./शरद ऋतू में यहाँ की तीखी मैदानी ढाल पर उत्साही युवक स्कीइंग करने आते हैं और यहाँ से गढ़वाल की कई नामचीन पर्वत श्रृंखलाएं नज़र आती हैं | इस बुग्याल के उपरी भाग को 'बकरा टॉप'कहा जाता है |) ,हरौन्ता बुग्याल (ऊँचाई २८००मी.) केदार ताल (ऊँचाई लगभग ४१०० मी.)अलेथ बुग्याल (ऊँचाई १८०० मी.) नचिकेता ताल ( ऊँचाई २३७० मी.) आदि कुछेक गंगोत्री तथा उत्तरकाशी के बेहद खूबसूरत ट्रेकिंग पॉइंट हैं | उत्तरकाशी जनपद धार्मिक पर्यटन नगरी है और उच्च हिमालयी क्षेत्र होने के कारण यहाँ सांस्कृतिक पर्यटन,इकोलोजिकल पर्यटन,ग्रामीण पर्यटन,एग्रो पर्यटन,क्यूरेटिव पर्यटन, इन्क्लेव पर्यटन जैसे प्रयास सरकारी और जनता के सामूहिक प्रयासों से चलाये जा रहे हैं | हिम और घने वन आच्छादित इस अंचल की आमदनी का एक बड़ा जरिया पर्यटन है | लोग सीधे और मेहनती हैं | तो देर किस बात की है -बनाईये प्लान इस बार गंगोत्री और उत्तरकाशी का | हिमालय बाहें पसारे आपका इंतज़ार कर रहा है | 

5/29/11

जनकवि भिखारी ठाकुर : रघुवंश नारायण सिंह


(यह मूल लेख भोजपुरी में लिखित है.जो भोजपुरी की बंद हो चुकी पत्रिका 'अंजोर'के अक्टूबर-जनवरी १९६७ अंक से साभार लिया गया है.मूल लेख जनकवि भिखारी ठाकुर नाम के पुस्तक जिसके लेखक श्री महेश्वर प्रसाद जी हैं ,की समीक्षा भी है और अपनी तरफ से कुछ टिप्पणियां भी.पाठकों की सुविधा के लिए हमने इसे हिंदी में रूपांतरित करके प्रस्तुत किया है,ताकि भोजपुरी नहीं जानने वाले भी भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले इस महान रंगधुनी के और बिदेसिया के रचयिता के बारे में जान सकें.पर भिखारी ठाकुर के बारे में सभी उल्लिखित राय ,लेखक महोदय की है,इससे रूपांतरणकार की  रजामंदी  जरुरी नहीं .रूपांतरण/अनुवादक - मुन्ना कुमार पाण्डेय  )


बहुत दिन पहले आरा से निकलने वाले 'भोजपुरी'में श्री बीरेंद्र किशोर का एक लेख छपा था 'भोजपुरी के शेक्सपियर  भिखारी ठाकुर' | बहुत लोगों ने जब उसे पढ़ा तो अचरज में पड़ गए,सिहर गए  कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली | यह तो अजब मेल बैठाया गया ,ऐसा बहुत लोगों ने कहा | बात सही भी थी बाकी राहुल बाबा ( सांकृत्यायन जी ) भिखारी को महाकवि कह चुके थे | अब हम लोग क्या करें | 
सन १९२३ की बात है,मेरे गाँव के एक भाई की शादी तय हुई | संयोगवश उनके मामा का घर कुतुबपुर में  ही था,जो भिखारी ठाकुर का गाँव है | बस भिखारी ठाकुर का नाच हो गया | भिखारी ठाकुर का नाम सुनते ही पूरे जवार ( एरिया ) भर के लोग जमा हो गए | रात भर गहमागहमी रही | मैं गाँव में नहीं था इसीलिए मुझे देखने को नहीं मिला | जब मैं  गाँव आया तो न जाने कितने दिन तक भिखारी की चर्चा होती रही,उनके गीत गाये जाते रहे | मुझे भिखारी ठाकुर का नाच देखने का मौका नहीं लगा | गाँव -जवार में कहीं हुआ भी तो लाज के मारे जाने का मन नहीं हुआ | जब तिलौथु गया तो श्री राधा प्रसाद सिन्हा के रुरल क्लब में भिखारी का नाच हुआ | वहीं पर पहली बार भिखारी का नाच देखने का मौका मिला | मैंने खूब नजदीक से बढ़िया से हर तरह से सब देखा | 
भिखारी की तुलना शेक्सपियर से कोई बेकार बात नहीं थी | शेक्सपियर जो व्यक्ति थे उनसे.और उनका जो नाट्य साहित्य है,उससे दोनों में जमीन आसमान का फर्क था | उस समय में शेक्सपियर का जो स्थान समाज में था,वही भिखारी का भी रहा या है | भिखारी आज भी समाज के आदमी नहीं बन सके | उन्हें आज भी नाच चाहिए,पैसा चाहिए | बिना नाच के और भाड़ा के वे कहीं नहीं जा सकते थे |  पटना में जब उनके नाम के किताब का लोकार्पण समारोह हुआ तो वे नहीं आये क्योंकि उसी दिन उनका साटा (कार्यक्रम करने हेतु अनुबंध) था | एकबार सिवान के भोजपुरी सम्मलेन में उनको बुलाया गया था तो वह गये थे पर उस सभा के योग्य वह नहीं थे | जहां मनोरंजन जी,डाक्टर धर्मेन्द्र ब्रह्मचारी शास्त्री,प्रो.रामेश्वर सिंह कश्यप थे वही पर भिखारी ठाकुर ने भी अपना बेसुरा राग सुनाया | यही हाल शेक्सपियर का भी था | अभी इन दिनों एक आदमी ने कहा कि आप लोग भिखारी ठाकुर को कहाँ ले जायेंगे | उनके साहित्य का गुण गाईये उनका नहीं | 
बात  सही है | उन्होंने भोजपुरी की जान कर (जानते बूझते ) सेवा थोड़ी न की थी | उन्हें तो नाचना गाना था | पहले तुलसी,कबीर सुर वगैरह के पद कंठ किया बाद में सरस्वती की कृपा उनपर हुई तो खुद भी पद जोड़ने लगे | मुझे शक है कि भिखारी कभी नाटककार के रूप में गिने जायेंगे | उन्हें नाटक से क्या मतलब ? वे अंक ,गर्भांक जानने कहाँ गये ? उनके सभी खेल ,तमाशे अपने हैं | जिससे देहाती गंवारू जनता को मोहा ,खींचा जा सके उन्होंने वही नाचा-गाया | इनका सब 'बैले'हो सकता है जिसे नाच-गान के साथ रूपक कहा जाए तब शायद कुछ सधे तो सधे ,भिखारी में नाटकीयता है, वे रूप बनने और बनाने में  और नक़ल उतारने में भी सफल खिलाड़ी है | इसमें मैं उनकी तारीफ़ करूँ या न करूँ लोग तो कर ही रहे हैं | जब हज़ार नहीं लाखों लोग उनके नाच को देखने कोस दो कोस से नहीं चार पाँच कोस से आकर जुट जाते हैं ,तो मेरे एक कहने से क्या होगा कि भिखारी कुछ नहीं जानते हैं | वे नाटक हैं,नाटककार कैसे हो सकते हैं | 
भिखारी जनकवि हैं इसमें किसी को कोई मीन मेख नहीं नहीं है,न होगा | कवि या कविता के बारे में मेरा अपना एक ख्याल(नज़रिया) है | वह यह कि,हर आदमी कुछ न कुछ कवि होता है जो ज्यादा प्रतिभा वालोया होता है वह चमक जाता है और जो थोडा बहुत होता है वह फुस्स हो जाता है,दब जाता है,छितरा जाता है | हमारे ग्रुप में एक कवि कैलाश सिंह थे जिन्हें २८ सितम्बर १९४२ को अंग्रेजों ने मारते मारते मौत के घाट उतार दिया | मेरे जानकारी भर में वैसी वीरगति किसी की नहीं हुई | हमलोग उन्हें कवि जी कहा करते थे | वे बड़े भावुक आदमी थे,जब भी बोलते तो तुक में बोलते थे | तुक उन्हें खोजना नहीं पड़ता था,जैसे उनका मन प्राण काव्यमय था | मुझे तो याद नहीं आ रहा,सोचूंगा तो दो-चार जोड़-जाड़कर कह दूंगा पर वे दनादन बोलते जाते थे और सभी तुक पर सधे रहते थे | मेरे गाँव में टेंगर सिंह हैं | गाँव में कोई भी घटना होती उसपर एक गीत बना देते | दो-चार दिन गाते चलते थे फिर भूल जाते-भुला देते | वैसे ही मौजम पुर में शिवनंदन कवि थे | वे भी राह चलते कविता करते चलते थे | एक डंडा रहता था जिस पर ठेका ताल देते और गाते थे | बहुत अच्छे भाव भरे गीत हुए गीत बना देते | उनका तो नाम हो गया था | भिखारी को वही प्रतिभा मिल गयी और उसमें थोडा गुण पड़ा गया नाच की वजह से | भिखारी ने खुद कहा है-'एह  पापी के कवन पुन से भईल चहुँ दिसि नाम | भजन भाव के हाल ना जनली , सबसे ठगली दाम |'(इस पापी के किस पुण्य से चारों दिशा में नाम हुआ | भजन भाव का हाल न जाना सबसे पैसा ठग लिया ) इस दाम को ठगने के लिए उन्होंने सब कुछ किया | बिदेसिया के नाच के साथ उन्होंने धोबी धोबिनिया को भी जोड़ दिया था,जो बहुत ही फूहड़ और नंगा (अश्लील )था | मुझे लगता है कि उसी वजह से ज्यादे लोग जुटते थे | पीछे जब उसकी शिकायत होने लगी तब भिखारी ने उसे छोड़ दिया | यहाँ तक कि तिलौथु में हम सब देख रहे थे तो राधा बाबु ने जोर मारा कि थोडा 'वह'भी हो जाये तब भिखारी उसको करने में बड़ा सहम रहे थे | पर बड़े आदमी की बात थी,भोर होने को थी.लड़के और औरतें चली गयीं तब 'वह'हुआ | उसमें था -'धोबिनिया के छौड़ी इहे बड़ा बिसनिया कि माई घटिये पर नेहाय , सभ रस लेलस एहे मलहा छोकड्वा कि मुहवा के सुरती नसाय ' ( धोबन की बेटी बड़ी विषैली है वह घाट पर ही नहाती है मुंह में की सुरती (खैनी ) नासा कर सब रस इसी मल्लाह के लड़के ने लिया है )| और भी बहुत कुछ था जो कहने लायक नहीं है |
तुलसी  बाबा ने लिखा है कि 
'हमहूँ कहब अब ठकुर सोहाती ,नाहीं त मौन रहब दिन राती | काहे आ त कोई नृप होई हमें का हानी,चेरी छोड़ का होईबि रानी |" यहाँ भी यही सवाल है | यह भोजपुरी का आदि काल है | इसमें जो हो रहा है उसीको होने दिया जाये कि इस पर लगाम लगाया जाये | मंथरा को तो चेरी छोड़कर रानी नहीं होना था पर पर भोजपुरी के जो पहरुए हैं उन्हें सोने (सोये रहने) का कोई हक़ नहीं है | इसलिए जागो सोने वालों का नारा जरुरी है | भोजपुरी में जिसे जो मन में आ रहा है वही लिख दे रहा है | यह नहीं होना चाहिए | लिखने वाला लिखे और छापे मगर हम सभी को उसकी तारीफ़ के पुल नहीं बाँधने चाहिए | इसमें मैं महेंद्र शास्त्री जी की तारीफ़ करूँगा कि उन्होंने भोजपुरी के सबसे बड़े सेवक को लिख दिया कि 'आप कवि हैं नहीं,तो आप आगे वालों की राह भी बिगाड़ते क्यों चल रहे हैं ?'ऐसे ही हम सभी को साफ़ कहना चाहिए नहीं तो यह गंवार कविताई  भोजपुरी का सत्यानाश करेगी |
जनकवि भिखारी ठाकुर लिखने में महेश्वर जी ने जो मेहनत की है उसके लिए उन्हें धन्यवाद मिलना चाहिए | यह किताब हिंदी में लिखी गयी है,इसका सिलसिला ठीक करके इसे अंग्रेजी में भी कर दिया जाये तो और मज़ा आ जाये | सिलसिला ठीक करने से मतलब कि आदि और अंत ठीक होना चाहिए | मतलब यह कि भोजन के पहले घी और अंत में दही चीनी चले | बहुत लोग कहते हैं कि भाई घी दाल में गिरे या भात में ,घी का लड्डू टेढा भी भला कहा जाता है | पर मुझे यह लगता है कि जो काम किया जाये उसे प्रेम से किया जाये | हड़बड़ी का ब्याह कनपटी में सिन्दूर जैसी बात नहीं होनी चाहिये |
भिखारी  असल में बिदेसिया हैं | वे पहले बिदेसिया हैं फिर पीछे कुछ और | इसीलिए मैंने 'बिदेसिया' नामक फिल्म में चतुर्वेदी जी और त्रिपाठी जी से कहा कि 'बिदेसिया में भिखारी नहीं तो बिदेसिया क्या ?'भिखारी को बुलाया गया पर उसमें भी वह फिट न हो सके | खैर जो हो जनकवि भिखारी ठाकुर नाम, की किताब में सबसे पहले भिखारी ठाकुर का एक छोटा संक्षेप में जीवनवृत्त रहता फिर उसके बाद में सबसे पहले बिदेसिया रहता |इस किताब में बिदेसिया खोजने में दिवाला निकल जा रहा है (बहुत निराशा हाथ लग रही है )| उनकी कथा तो है,परिचय के रूप में उनकी भाषा जम नहीं रही है | लेखक को उसे सजाकर संवारकर रखना चाहिए था |
इस   पुस्तक में लेखक के लेक्चर बहुत हैं | काव्य के रूप में गुण,शब्द का चुनाव भाषा का मिठास वगैरह कम ही दिखाया गया है | किताब जब हिंदी में है तब हिंदी भाषी के लायक भी होना चाहिए था | भोजपुरी शब्दों के माने मतलब (अर्थ) गैर भोजपुरी लोग नहीं जानते हैं इसलिए उन शब्दों के अर्थ देना चाहिए था | खरन्दाकार का बेमतलब भरमार भी व्यर्थ ही है | वह तो ध्वनि की चीज़ है | ध्वनि का मतलब सभी को पता नहीं है इसलिए कई जगह वह बेमतलब का हो गया है | 



5/28/11

हंगामा है क्यों बरपा " देसवा"और पक्ष-विपक्ष

इंडिया हैबिटेट सेंटर में 'देसवा'के प्रदर्शन के बाद जितनी चर्चा इस फिल्म को लेकर उठी है या सोशल नेटवर्किंग साईट फेसबुक पर जबरदस्त टिप्पणियों (जो व्यक्तिगत हमलों तक पहुँच गयी या ले ली गयी  ) का जो दौर चला है,उसे मैं एक सकारात्मक कदम मानता हूँ | जिसका प्रभाव आगे आने वाली इस तरह की भोजपुरी फिल्मों पर पड़ेगा इसकी थोड़ी उम्मीद की जा सकती है | देसवा को लेकर अविनाश (मोहल्ला लाईव ) और अमितेश के अपने अपने पक्ष रहे और बाद में स्वप्निल जी ने भी चवन्नी पर अपनी राय दी है | 
मेरी बात पहले अमितेश के लिखे से है,फिर स्वप्निल जी के और तब मेरी बात 'देसवा' को लेकर है की क्यों मैं देसवा के पक्ष में हूँ |
अमितेश ने 'देसवा' के पक्ष में नहीं होने के अपने कारण गिनाये हैं और देसवा को एक बेहतर सिनेमा बनते बनते एक औसत सिनेमा रह जाने को लेकर पूरी बात रखते दिखाई देते हैं | जिसपर कईयों ने उनके साथ नूराकुश्ती शुरू कर दी | यह भी दुरुस्त स्थिति नहीं है | हम कोई लक्ष्मण रेखा नहीं खींच सकते कि कौन हमारे सिनेमा के पक्ष में खड़ा  होगा , कौन नहीं या किसे नहीं खड़ा होना चाहिए | अमितेश सिर्फ देसवा को भोजपुरी फिल्म के बदलते चेहरे का अगुआ मानने की मुहिम को नकारते हैं पर उसके प्रयास को सराहते दीखते हैं -"देसवा भोजपुरी फिल्मों के लिए रास्ता बनाना चाहती है इस तर्क के आधार पर इस मुहिम को समर्थन दिया जा सकता है |...आज भी मेरी शुभकामना इसके (देसवा) साथ है |"- ऐसे में उनकी राय को एकदम से विपक्ष में खड़ा भी नहीं मान सकते | दरअसल,'देसवा' विविध मंचों से पिछले कई महीनों से भोजपूरी सिने प्रेमियों के बीच चर्चा में थी,तो ऐसे में कईयों ने इससे कुछ अधिक ही उम्मीद लगा ली थी शायद जहाँ तक नितीन चन्द्र नहीं सोच पाए,मेरे लिहाज़ से उन्हें सोचना भी क्यों चाहिए था उन्हें जो बनाना था उस ओर उनकी लेखनी/निर्देशकीय चली भी है पर किस हद तक वह इफेक्टिव रही है यह आगे पता चलेगा  | वैसे भी कोई  फिल्म कितनी महान है,होनी है या होगी इसका निर्णय तब तक आलोचकों के हाथ में नहीं है जब तक कि वह दर्शक वर्ग के बीच ना जाये | कई बार उसको उसकी मेहनत का सर्टिफिकेट जनता देती है | तो कई बार आलोचक फिल्म के पब्लिक डोमेन में आने के बाद अपनी राय और दृष्टियों से फिल्म को महान या क्लासिक की श्रेणी में रख देता है भले ही दर्शकों के लिहाज़ से वह फिल्म कैसी भी रही हो | यह एक अलग स्थिति है | देसवा को लेकर जो भी टिप्पणियाँ हो रही हैं या हुई हैं,उनमें से कई अराजकता की हद तक की हैं | ऐसे में हमें तय करना होगा कि हम कितने परिपक्व हैं कि अपनी एक सीधी आलोचना भी हमसे बर्दाश्त नहीं होती | बेहतर स्थिति यह होती है कि हम एक तर्क के बरक्स अपना भी एक सॉलिड तर्क से सामने वाले को संतुष्ट करें | वर्ना यह सब कुकुरहांव छोड़कर कुछ और नहीं हो सकेगा | 
स्वप्निल जी ने जो कुछ लिखा है उस पर मन एक पल को स्तब्ध होता है कि क्या हमारी मादरे-जबान कोई पानी पर खींची लकीर है जो कुछेक फ़ालतू फिल्मों और उनमें प्रयुक्त द्विअर्थी संवादों ,गीतों से मोहभंग का शिकार हो जाये ? वह भी तब जब भोजपुरी के वाक्य संरचना में एक बेलौसपन है,जहां भदेस शब्द (मेरा ईशारा भोजपुरिये समझ रहे होंगे ) धड़ल्ले से प्रयोग में आतें हैं और वाक्यों को चुटीला /बात को प्रभावी बनाने के लिए उसमें इस तरह के शब्द प्रयोग चटनी का काम करते हैं | मसलन उन्होंने लिखा है -" जितना ही इस भाषा से प्रेम है उतना ही इस भाषा में बनने वाली फिल्मों से दूरी बनाये रखता हूँ |मुझे डर लगता है कि ये फिल्में अपनी विषयवस्तु की वजह से इस भाषा से मेरा मोहभंग कर सकती है | 'गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो'को छोड़कर कोई भी दूसरी फिल्म मुझपर प्रभाव नहीं छोड़ पाई या बहुत बुरा प्रभाव छोड़ा |" अब इस पूरे स्टेटमेंट में कई पेंच हैं | स्वप्निल जी ने अगर भोजपुरी फिल्मों की सीमा को गंगा मईया...तक ही सीमित कर दिया तो इस लिस्ट में कई नाम हाशिये पर चले गए हैं जो भोजपुरी सिनेमा की मास्टरपीस हैं जैसे-भईया दूज,गंगा किनारे मोरा गाँव,बलम परदेसिया,साँची पिरितिया,लागी नाही छूटे राम,दुल्हा गंगा पार के,गंगा जईसन भौजी हमार,पिया के गाँव,सजनवा बैरी भईले हमार,दंगल इत्यादी तथा कुछ समय पहले आई गंगा जईसन माई हमार और कब अईबू अंगनवा हमार जैसी फिल्में अगर उन्होंने देख लेंगे  तो मेरा दावा है कि उनकी आशंका निर्मूल साबित होगी | भोजपुरी सिनेमा की जड़े 'कचा-कच'छाप (जिस ओर देसवा में  इशारा है ) सिनेमा की नहीं है | यह तो आगे चलकर ऐसा बना और इसका एक बड़ा कारण ८८-९५ के बीच आये इसके विभिन्न अल्बम थे जिन्हें बिजेंदर गिरी ,तपेश्वर चौहान,राधेश्याम रसिया,गुड्डू रंगीला,कलुआ जैसे छुट्भईयों ने बनाया और जिनके मुनाफे के बाज़ार को देखते हुए बाद में फिल्मों में भी अपना लिया गया क्योंकि बाज़ार का अर्थशास्त्र इसको सूट करता था | बावजूद इसके शारदा सिन्हा ,भरत शर्मा'व्यास',मुन्ना सिंह,काफी हद बालेश्वर यादव,आनंद मोहन (सांच कह ब$ जूता खईब$ फेम) और थोडा पीछे जायें तो महेंद्र मिश्र,महेंद्र शास्त्री (सिवान वाले ) और भिखारी ठाकुर के गीत भी भोजपुरी अस्मिता की पहचान रहे | तब ऐसे में पलायन करके या आशंका जता के कि 'कहीं अपनी नैसर्गिक भाषा से मेरा मोहभंग न हो जाये 'की चिंता गैरवाजिब है क्योंकि हमें ही इसके पतन के कारणों की तलाशकर उन्हें या तो दूर करना चाहिए अथवा जो इस कोशिश में लगे हैं उनको सहयोग करना चाहिए | और बावजूद इसके हमारी नज़र यदि 'गंगा मईया तोहे..'से आगे नहीं  जाती तब शक होता है कि भोजपुरी सिनेमा को देखने का अनुभव कितना है | 
'देसवा'को मैंने फेसबुक पर if u missed deswa u missed the changing/new face of bhojpuri cinema,its a honest start,lets join hands लिखा | यह एक त्वरित नहीं बल्कि एक सोची-समझी लिखाई थी | ऐसा नहीं है कि मुझे देसवा से उसके कथ्य,उसके ट्रीटमेंट,डिटेलिंग को लेकर समस्या नहीं रही पर मेरे लिए वाजिब बात यह थी कि काफी समय बाद एक फिल्म  भोजपुरी में आई जो पूरी तरह से भोजपुर ही नहीं बल्कि पूरे बिहार और पूर्वांचल की जमीनी दिक्कतों की पड़ताल करता है | इसके अलावे इस समय में जब भोजपुरी संगीत के मायने 'जब मारे ला बलमुआ त,हचाहच मारेला,सईयाँ फरलके पर फार अ ता, बलमुआ छक्का मार गईल,मिसिर जी तू त बाड़ा बड़ी ठंढा,मार द सटा के लोहा गरम बा '-बन गए हैं ऐसे में देसवा में शारदा सिन्हा ,भरत शर्मा के गाये गीत कितने घटना आधारित मार्मिक और दिल को छू लेने वाले हैं इस पर देसवा के कथानक /ट्रीटमेंट से असहमति रखने वाले भी सहमती जताएंगे और जता रहे हैं | दरअसल देसवा जिस तरह के कलेवर की फिल्म है उस तरह से इसका दर्शक वर्ग तैयार नहीं हुआ है | और यह बात भी उतनी ही सच्ची है कि इंडिया हैबिटेट सेंटर में उपस्थित दर्शक समुदाय भोजपुरी सिनेमा के दर्शक-वर्ग का चेहरा नहीं था ,होगा भी कि नहीं इसको भी स्पष्टतः नहीं कहा जा सकता | भोजपुरी का मध्य वर्ग भोजपुरी सिनेमा नहीं देखता | आगे देसवा अगर ऐसी गुंजाईश पैदा करती दिखती है तो उसका स्वागत होना ही चाहिए | भोजपुरी सिनेमा के पिछले २० सालों के प्रोडक्शन पर गौर फरमाईये ,आप सहज ही अंदाज़ा लगा लेंगे कि मुद्दों पर आधारित कितनी फिल्में बनी हैं ? अंग-प्रदर्शन और अश्लीलता के मुद्दे पर अलग से बिचार और बहस की पर्याप्त गुंजाईश बनती है | देसवा के बनाने वाले ने जिस तन्मयता से फिल्म बनानी चाही अगर वह समीक्षकों की उम्मीदों सरीखा नही बन पाया तो इसके लिए अधिक शोरगुल के जरुरत नहीं हैं | जरुरत इसके अच्छे पक्ष को भी उजागर करने की है | यह पक्ष अभिनय ,संगीत-गीत,गायकों का चयन,कलाकारों का चयन,लोकेशन,इश्यु बेस्ड प्लाट का भी हो सकता है है और इस ओर से देसवा देखें तो मामला बैलेंस हो जाता है | इसलिए अपने तमाम कच्चेपन में भी (जिसे आलोचकों समीक्षकों ने नकारा )यह फिल्म भोजपुरी सिनेमा के लिए एक बड़ा प्लेटफोर्म तैयार कर चुकी है | या तो हम देसवा को चेंजिंग सिनेमा के तौर पर देखें सराहें या पिनाकियों की तरह लम्बी नाक लिए दोष सूंघते फिरे ! 'देसवा'अगर थोड़ी सी ही सही सम्भावना जगाती है तब तो यह अपने आप में वाकई काबिले तारीफ़ है | थोड़े समय के लिए छोडिये कंटेंट,गीत,शब्द चयन,सीन का ट्रीटमेंट आइये सीधे उन सवालों पर जो सिनेमा उठाती है तब शायद देसवा को हम दिल के करीब महसूस करेंगे | इसमें कोई दो-राय नही कि भले ही देसवा बदलते भोजपुरी सिनेमा का अगुआ दस्ता न हो पर एक मजबूत पिलर जरूर बनकर उभरी है | क्योंकि सिनेमा केवल एक चीज़ से नहीं बनती,देसवा भी इसका उदाहरण है इसमें कै शेड्स हैं जो इसे आम फिल्मों से परे एक खास आकार देते हैं | नितीन ने कहा था कि सभी कुछ होगा इस सिनेमा में ,नही होगा तो बस एक वल्गरिटी | और इस वायदे को नितीन ने सईलेंटली दिखा दिया है | देसवा इसी वजह से देखना चाहिए | और कहानी लिखने से परे उसे उसके रिलीज़ होने का इंतज़ार करें |अभी के लिए तो 'देसवा'सही राह पर है और मशाल लेकर उस राह पर है,जहां से कुछेक उत्साही साथी आगे आयेंगे और भोजपुरी सिनेमा बदल जायेगा पूरी तरह से | देसवा को कमतर आंकना भूल है और बॉक्स आफिस इसे प्रभावित नही करेगा | कैसे एक सिनेमा अपने तमाम कमियों के बावजूद 'कल्ट'बनती जाती है ,देसवा उसका उत्कृष्ट उदाहरण है | जहां धड़ल्ले से वाहियात फिल्में आ रही हो और भोजपुरी सिनेमा के रूप को अरूप कर रही है ,वैसे में नितीन चन्द्र की यह फिल्म अपनी तमाम सीमाओं के 
के बावजूद एक संभावना जगाती है तब  तक रिलीज़ होने से पहले इसपर हल्ला मचाना पक्ष या विपक्ष में उचित नहीं होगा | 

5/7/11

डराने की निरीह कोशिश और थ्री-डी का लालीपाप -HAUNTED

अगर आप भूतिया फिल्मों के शौक़ीन हैं और चाहते हैं फिल्म को देखकर डर का रोमांच महसूस करें तो मेरी एक सलाह है कि कम-से-कम हमारी हिंदी फिल्मों के भूतिया इफेक्ट को न देखें | haunted  इस तरह की एक फिल्म है | इस फिल्म की कहानी पर नज़र ना डाले यह एक साथ ही कई फिल्मों जो कि जाहिर है भट्ट की ही फिल्मों का कोकटेल है | डरावना माहौल तैयार करने में उन्होंने वही सारी तिकड़में आजमाई हैं,जिन्हें हम बार बार देखते रहे हैं | थ्री डी का लालीपाप इस फिल्म को कितना आगे ले जायेगा इसमें संदेह की भरपूर गुंजाईश है | ले दे कर हमारे पास इन फिल्मों के चुनिन्दा फार्मूले होते हैं -मसलन 
(१) हीरो एक लश ग्रीन पर्वतीय स्थल पर एक खूबसूरत किन्तु सुनसान जगह पर बने भूतिया बंगले में आता है ,जहां एंटिक सामनों और आदमकद शीशे के खिडकियों-दरवाजों का भरपूर प्रयोग हुआ होता है |
(२) जलती हुई मोमबत्तियां ,खुबसूरत झूमर के इर्द-गिर्द चक्कर काटकर कैमरा हीरो के चेहरे के पास आता है और पार्श्व में बजता संगीत एक भय का वातावरण निर्मित करता है...एक घोर सन्नाटे के माहौल में औरत की दर्दनाक चीख और फिल्म दौड़ने लगती है |
(३) हिरोइन के साथ एक हादसा हुआ होता है और उसकी रूह उस हादसे के जिम्मेदार कारणों से या तो बदला लेना चाहती है अथवा हीरो को उस और खीचती रहती है ताकि हीरो के मार्फ़त उसे न्याय मिले (भले ही इसके लिए हीरो को २०११ से १९३६ तक की यात्रा करनी हो पीछे की ओर) ऐसा करने में सात्विक संस्कारों का वह नायक नियति से टक्कर ले लेता है और अंततः जीत जाता है (हम एंटी हीरो कभी होते ही नहीं )
(४) हीरो के साथ रात को हमेशा कुछ अनहोनी घटती है जो कैमरे में नहीं आती पर एक बात जरुर होती है कि यह भूत भी शीशे में अपने ओरिजिनल रूप में दीखता है (है न कमाल ,हिंदी सिनेमा के भूतों के साथ निर्माताओं ने बड़ा जुल्म किया हैउनकी कमजोरियां जगजाहिर कर दी है |, )
(५) हीरो के साथ घटते इन दृश्यों को एक अनजान भूतिया ही दिखने वाला रहस्मयी व्यक्ति जानता है | वही होता है तो इस बंगले का रहस्य जनता है (आपने कभी कभी इसे लालटेन लिए ,दाढ़ी बढ़ाये ,मैले कपडे पहने,अजीब तरीके से बोलते.कुछ अजीब करते,या कम्बल ओढ़े हीरो को बड़े अर्थपूर्ण ढंग से देखते कई फिल्मों में देखा होगा )इसमें यह (पिछली फिल्मों से परे )देवदूत होता है |
(६) हीरो अंत में एक ख़ास जगह पर जाकर एक ख़ास टोटका करके उस रूहानी ताकत को परास्त करके उस लड़की की रूह को आज़ाद करता है |
(७) इस पूरे कर्मकांड में लड़की पूरी तरह नायक पर निर्भर होगी क्योंकि हमारे निर्देशक लड़कियों को इस लायक नहीं समझते कि वह हीरो को रूह से बचाए (बिपाशा बसु एक्सेप्शनल केस है )
(८) भय पैदा करने के लिए एक खूबसूरत लोकेशन,एक पुराना बंगला (जो सुनसान जगह और बस्ती से दूर हो)का होना जरुरी होता है | कैमरा  लगातार खली स्पेस में मूव करते रहना होता है,तेज़ संगीत,तेज़ चलती साँसों का स्वर,टूटते कांच के सामान और फिर एकाएक सामने एविल का आ जाना ...रचना होता है और एक हिंदी भूतिया फिल्म तैयार हो जाती है |    
कुल मिलकर  haunted  देखने के बाद कुछ निष्कर्ष भी निकलते हैं और कुछ नयी जानकारियाँ भी मिलती है जो भूतों को/रूहों को समझने में सहायक सिद्ध हो सकती हैं ;-)
(१) भूतिया बंगले से रात को जो भी चीखें आती है वह हमेशा औरत /चुड़ैल की होती है 
(२) अगर इंसान अच्छा है तो ऊपरवाला (?) उसको इस अभियान के लिए अपना दूत बनता है,भले ही वह एक ब्रोकर हो या स्तेंद्फोर्ड यूनिवर्सिटी अमेरिका से पढ़कर आया हो
(३) वह भला इंसान अपने इस पावन पुनीत काम में समय से पीछे की ओर लौट सकता है औरवह भी  मोबाईल के साथ| इतना ही नहीं वह उस रूह के शरीर(क्योंकि अभी वह रूह नहीं बनी अभी वह शैतान की वासना का शिकार नहीं हुई और हीरो पीछे इसीलिए लौटा है कि इस हो चुकी दुर्घटना को बदलकर एक सुखांत रच सके )की तस्वीर भी खीचता है 
(४) लड़की चाहे १९३६ की हो और अंग्रेजी माहौल में रह रही हो पर वह कितनी मासूम है इसके लिए निर्देशक उससे पूर्वी हिंदी बुलवाते हैं ( वैसे 'हम'लगाकर बोलने से मासूमियत का कुछ लेना देना नहीं है| यह एक जबान भर है ,हमें तो यही पता था )
(५) भूत इत्यादि रात  के ३ बजे सबसे ताकतवर होते हैं (रामसे ब्रदर्स ने आज तक हमें अँधेरे में रखा था कि भूत रात के बारह बजे आते है....थैंक यु भट्ट साब आप न होते तो इस जानकारी के अभाव में  हम तो कट लिए थे संसार से )
(६) भूत आदि लिखा हुआ न तो पढ़ सकते हैं न लिख सकते हैं (जिन्दा व्यक्ति चाहे वह प्रोफ़ेसर ही क्यों न हो,जैसे ही वह शैतानी रूह  बनता है,वह अनपढ़ हो जाता है...है न कमाल !!! )  
(७) हर वह आदमी जो शैतान द्वारा मारा जाता है हमेशा मरते ही सफ़ेद चेहरे का हो जाता है 
(८) लड़की मरने के बाद भी बहुत सुन्दर गायिका रहती है  
(९) विक्रम भट्ट की पिछली फिल्म १९२० की तरह यह आत्मा पादरी से नहीं शांत हो सकती क्योंकि वह हिन्दू आत्मा (अय्यर ) है,यह आत्मा जीसस से नहीं डरती और जीसस के सेवक पादरी को मार देती है 
(१०) भारत की गंगा-जमुनी तहजीब की सच्ची तस्वीर है यह फिल्म | पिछली बार हिरोइन को हीरो ने हनुमान चालीसा का पाठ करके बचा लिया था इस बार दरगाह के सूफी की मज़ार की पाक हवा मिटटी पानी की मदद से वह जीतता है | अगली बार शायद पादरी महाशय या जीसस महोदय शायद अधिक प्रभावशाली हो जायें,तब तक इंतज़ार
(११) एक बड़ी जानकारी यह भी मिलती हैं कि 'शैतान के नाम का उच्चारण नहीं करना चाहिए,क्योंकि जितनी बार भी आप शैतान का नाम उच्चारते हैं,वह उतना ही शक्तिशाली होता  जाता है'(मैं सोचता हूँ कि ,यह बात सिर्फ भूतों पर लागू होती है कि.......खैर!) 
(१२) अब तक आपने सुना होगा-'क्षितिज,जल,पावक,गगन,समीरा /पञ्च तत्व से बना शरीर '-फिल्म में इसकी व्याख्या में फाईव एलिमेंट 'आग,पानी,हवा,मिटटी और रू- ह 'के तौर पर है |(कृपया अपनी जानकारी दुरुस्त कर लें)
कुल मिलकर हमें आज भी एक अदद बेहतरीन हिंदी भूतिया फिल्म की जरुरत है,जिसमें एक कायदे की कहानी हो और फिर उस लिहाज से दृश्यों का रचाव और कैमरा वर्क | निर्माता-निर्देशक यह बार-बार न बताएं कि खूबसूरत लोकेशन और एंटिक बंगले भूतिया होते हैं (दुःख होता है)और हर खूबसूरती का एक भूतिया इतिहास होता है | फिल्म में कहानी ,तकनीक और बढ़िया निर्देशन न हो थ्री डी इफेक्ट भी कुछ नहीं कर सकता | 'HAUNTED' इसी का शिकार हुई है,जिसमें नया होने को कुछ नहीं है | यह फिल्म आप तीन वाजिब वजहों से देख सकते हैं-
(क) यदि आपके पास टाइम बहुत फ़ालतू हो,या करने को कुछ नहीं हो
(ख) यदि जेब में से पैसे उछल-उछलकर गिरना चाहते हों 
(ग) यदि आपने कभी कोई थ्री डी फिल्म ना देखी हो
इन तीनों वाजिब(?) वजहों के लिए आपको मैं सिर्फ 'आल दी बेस्ट'या 'गुड लक'ही बोल सकता हूँ  | क्योंकि मेरे लिए तो यह एक  haunted experience  ही था |  

4/19/11

यह खेल कभी ऐसा था

[ ऊपर जो कोई भी आसमान के तरफ रहता होगा,उसको हाजिर-नाजिर जानकर यह बयान दिया जा रहा है कि नीचे लिखी बातें ‘अखिल भारतवर्षीय भोजपुरी सम्मलेन,मोतिहारी में “ भोजपुरी समाज “ द्वारा अनुमोदित प्रस्ताव बिना मिलावट के ज्यों-का-त्यों रख दिया गया है

अब आप पर यह निर्भर करता है कि आप इस प्रस्ताव के क्या मायने लगाते हैं और क्या कारण ढूँढते हैं,जिसकी वजह से यह हिमालयी अभियान (?) सफल न हो सका
आपकी सुविधा के लिए मूल रूप से भोजपुरी में लिखित इस प्रस्ताव को कोष्ठकों में हिंदी में भी लिख दिया गया है
और अंत में,यह सामग्री भोजपुरी की बंद हो चुकी त्रैमासिक पत्रिका ‘अँजोर’ के जुलाई-सितम्बर १९६६ अंक के पृ.२४ से ली गयी है-कबूलनामा ‘प्रस्तुतिकर्ता’ ]

भोजपुरी समाज द्वारा अनुमोदित प्रस्ताव

भोजपुरी समाज के ई सभा के मांग बा कि (भोजपुरी सिनेमा के इस समाज की मांग है कि )-

(१)- पाँच करोड़ लोगन के भाषा भोजपुरी के पंद्रहवीं भाषा के रूप में केंद्रीय सरकार वैधानिक मान्यता दे
(केंद्रीय सरकार पाँच करोड़ लोगों की भाषा भोजपुरी को वैधानिक मान्यता दे )

(२)- बिहार अउर उत्तर प्रदेश के सरकार भोजपुरी क्षेत्र में प्राईमरी स्तर तक भोजपुरी के माध्यम से शिक्षा देबे के प्रबंध करे
(बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारें भोजपुरी क्षेत्र में प्राईमरी स्तर तक की शिक्षा भोजपुरी में देने का प्रबंध करे )

(३)- भोजपुरी क्षेत्र के विश्वविद्यालय एम.ए. स्तर तक भोजपुरी भाषा अउर साहित्य के अपना पाठ्यक्रम में स्थान दे
( भोजपुरी क्षेत्र के विश्वविद्यालय एम.ए.स्तर तक भोजपुरी भाषा साहित्य को अपने पाठ्यक्रम में स्थान दे )

(४)- अखिल भारतीय रेडियो स्टेशन से भोजपुरी में प्रोग्राम प्रसारित कईल जाय अउर एके प्रयाप्त स्थान मिले
( अखिल भारतीय रेडियो स्टेशन से भोजपुरी में प्रोग्राम प्रसारित किया जाए और इसे पर्याप्त स्थान मिले )

(५)- सरकार द्वारा भोजपुरी क्षेत्र के औद्योगिक तथा कृषि सम्बन्धी विकास खातिर मास्टर-प्लान बनावे तथा एके अविलम्ब नियोजित करे
( सरकार द्वारा भोजपुरी क्षेत्र के औद्योगिक तथा कृषि सम्बन्धी विकास के लिए मास्टर-प्लान बनाया जाए और इसे अविलम्ब लागू किया जाये )

(६)- भोजपुरी समाज के प्रार्थना बा कि भोजपुरी अंचल के संसद तथा राज्य विधानसभा अउर परिषद के सदस्य लोग आपस में तथा सदन में भोजपुरी में बोले
(भोजपुरी अंचल के संसद सदस्यों और राज्य विधानसभा सदस्यों और विधान परिषद सदस्यों से भोजपुरी समाज की प्रार्थना है कि वे आपस में तथा सदन में भोजपुरी में ही बोले )

(७)- भोजपुरी समाज बिहार अउर उत्तर प्रदेश सरकार से मांग करत बा कि पटना अउर लखनऊ में भोजपुरी समाज के लेल स्थान अउर मकान बनवादे जैसे क्षेत्र के सेवा कईल जा सके
(भोजपुरी समाज बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारों से मांग करता है कि वे भोजपुरी समाज के लिए पटना और लखनऊ में स्थान और मकान बनवाकर दे दे ताकि वे क्षेत्र की सेवा कर सकें )





नोट :- एकरा में दोसर के भाषा ना पढ़े वाला प्रस्ताव भी राखे के चाहत रहे
( इस सभा में दूसरे की भाषा ना पढ़ने वाला प्रस्ताव भी रखना चाहिए था )





1/27/11

नाटककार लुइगी पिरान्देलो :- एक परिचय


इटली के विख्यात उपन्यासकार,कहानीकार तथा नाटककार लुइगी पिरान्देलो का जन्म २८ जून १८६७ में सिसली के मध्य दक्षिणी समुद्र तट पर स्थित एग्रीजेंटो में हुआ था उसके माता-पिता गैरीबाल्डी समर्थक परिवारों से थे राजनैतिक उथल-पुथल के कारण उनको देहात में जाकर रहना पड़ा प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई अनेक पाठशालाओं में पढ़ने के बाद वह १८८७ में रोम विश्वविद्यालय पहुंचा परन्तु वहां आत्म-संतुष्टि नहीं मिली बौन जाकर डॉक्टर ऑफ फिलोसाफी की डिग्री प्राप्त की सन १८९१ में रोम आये,जहां जीवन भर रहे

व्यापार में रूचि तो थी ही नहीं,१८९४ में पिता को व्यापार में घाटाहोने पर टीचर्ज़ कालिज में साहित्य-शास्त्र तथा भाषण का अध्यापन कार्य संभालना पड़ा,जो १९२३ तक चलता रहा उसी वर्ष एंतोनियेता पोरतुलानो से विवाह हुआ जो सफल ने हुआ पत्नी बहुत जिद्दी तथा झगडालू थी तीन बच्चे स्टीफानो (लेखक) रोजाली तथा स्टीफानो (पेंटर)होने पर भी जीवन सुखी न था अपने एक लेख में उसने सूखे,रंगहीन जीवन,अध्यापन कार्य से छुटकारा पाने की इच्छा तथा गाँव में जाकर लिखने की चाह की चर्चा की है

इटली के नाटककार पैल्लीको से प्रभावित होकर पहला दुखांत 'बारबारो'लिखा जो बाद में खो गया पहला उपन्यास 'आउट कास्ट'१८९३ में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ 'दी टर्न'कहानी-संग्रह था प्रसिद्ध उपन्यास 'लेट माटिया पास्कल'१९०४ में आया 'एपिलोग'१८९८ में तथा 'सिस्लियन लाईन्ज़' १९१० में छपे

पिरान्देलो जब लिखने पर आये तो एक वर्ष में नौ नाटक लिख डाले एक नाटक तीन दिन में तो दूसरा छह में सन १९१६ से १९२५ तक अधिकाधिक नाटक लिखे वह फासिस्ट पार्टी का सदस्य बन गया ,जिससे मूसोलोनी ने उसके रंगमंच को मान्यता प्रदान कर दी १९२५ में अपना नाट्य दल गठित किया और यूरोप भ्रमण के लिए गए कलात्मक सफलता तो मिली परन्तु घाटे का सौदा रहा ख्याति बढ़ने लगी यूरोप,टर्की,जापान आदि देशों की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुए सन १९३४ में नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ मृत्यु के दिन(१० दिसंबर १९३६) तक उसका लेखन जारी रहा

पिरान्देलो की नाटक रचनाओं पर इटली की परम्परागत शैली'कामेदिया देल आर्ते 'का प्रभाव दिखाई देता है वर्ज़ जैसे नाटककारों का प्रभाव भी दिखाई देता है,जिनका 'थियेटर आफ दी ग्रोतेस्क प्रथम महायुद्ध की प्रताड़ना के कारण जीवन की विपरीत छवि दिखाता था सत्य,तथा मिथ्या,चेहरा तथा मुखौटे , दिखावे के पीछे की वास्तविकता का चित्रण ही उसका मुख्य उद्देश्य बन कर रह गया वास्तविकता से दूर रहकर , निर्लिप्त भाव से अवलोकन तथा मनन उसके पात्र जानते-बूझते हुए पीड़ा झेलते हैं जीवन की असंगतियाँ तथा उतार-चढ़ाव उसकी रचनाओं में साफ़ झलकती है उसके नाटक उलझावेदारऔर पात्र जो न जाने कब क्या कर बैठें सच तो यह है कि पिरान्देलो सही माने में पहला एब्सर्ड (असंगत) नाटककार है

उसका मत था कि मनुष्य अपने लिए एक अलग व्यक्तित्व का निर्माण कर लेता है जिसकी आड़ में वह समाज का सभ्य सदस्य बनने का दिखावा करता है समाज का अपना ढांचा होता है,धर्म,क़ानून,आचार-संहिता आदि से बंधा होता है वह मनुष्य की सहजता को नष्ट कर देता है

कला का विरोधाभास यह है कि वह एक ही समय में रचना भी करती है और विनाश भी वह पल-पल बदलने वाली वस्तुस्थिति को एक स्थायी रूप दे देती है मनुष्य जीवन की रचना करता है और उसी पल का बंदी बनकर रह जाता है यथार्थ निश्चित नहीं होता वह देखने वाले की दृष्टि के साथ-साथ बदलता रहता है कला एक शाश्वत यथार्थ है क्योंकि वह स्थायी है और जीवन परिवर्तनशील परन्तु कला गतिशील नहीं है इसलिए जीवन से उत्कृष्ट नहीं हो पाती है यह एक विरोधाभास है आदि मानव तथा समाज-निर्माता मनुष्य , प्रकृति तथा आकृति , सत्य तथा दिखने वाला सत्य ,मुख और मुखौटा, यह सब नाटककार पिरान्देलो के लिए चिंतन के मुद्दे बन जाते हैं

कहा जाता है कि पिरान्देलो के नाटक विचार अथवा मस्तिष्क प्रधान होते हैं परन्तु यह सत्य नहीं है उसके नाटकों का द्वंद्व ह्रदय से ही उभरता है वही नाटकों का 'बीज' होता है उसके पात्र तीव्र ,भरपूर जीवन जीते हैं उनमें घृणा,प्यार,डर,उल्लास ,रोमांच इत्यादि मानवीय भावनाओं का समावेश है परन्तु उसके समीक्षक उसमें बौद्धिक तत्व ही खोजते हैं

पिरान्देलो के पात्र जीवन की असंगतियों तथा अस्त-व्यस्त स्थितियों में जीते हैं वह यथार्थ की खोज में जुटे रहते हैं परन्तु उनके हाथ निराशा ही लगती है वह उस संसार में जीने पर बाध्य होते हैं,जिसे वह लेश मात्र भी पसंद नहीं करते वह अपने ऊपर एक मायाजाल-सा ओढ़ लेते हैं और एक सपनों का संसार सज़ा लेते हैं परन्तु जीवन की विभीषिकाओं से उन्हें छुटकारा नहीं मिलता .....(क्रमशः )
[साभार:- लुइगी पिरान्देलो के बारे में कुमार मनोज बंसल का लिखा यह परिचय हमने पिरान्देलो के ही मशहूर नाटक 'सिक्स कैरेक्टर इन सर्च आफ ऍन आथर 'के जीतेन्द्र कौशल द्वारा अनुदित बुक (संस्करण १९८६,भारती भाषा प्रकाशन दिल्ली) से ली है 'सिक्स कैरेक्टर इन सर्च आफ ऍन आथर 'के बारे में अगली पोस्ट में पढ़िए ]

1/24/11

एक पत्नी और माँ की पाती-'जगदम्बा'


यह नाटक किसी मिथकीय चरित्र वाली जगदम्बा का नहीं बल्कि एक वैसी महिला का आत्म है, जिसने जिंदगी भर सबके लिए बा और एक आदर्श पत्नी का धर्म निभाया पर अपने वैयक्तिक जीवन में पति और बेटे के बीच के दुधारी तलवार पर चलती रही यह नाटक गाँधी जी की कस्तूरबा,भारतीय जनमानस की बा और अपने अनथक सामाजिक,राजनैतिक प्रयासों और लड़ाई में जगदम्बा की आपकबूली है,जो अब तक हमारी नजरों से परे थाआधुनिक इतिहास के अध्येता इस बात को जानते हैं कि कस्तूरबा मात्र गाँधी जी की सहचरी नहीं थी बल्कि एक वैसी साथिन के रूप में थी जिसने हर कदम पर पति का साथ तो दिया पर उनका अन्धानुकरण नहीं किया और गाँधी जी के देशहित के प्रयासों में हर कदम पर साथ रही पर एक माँ भी होने के नाते अपने बेटों हरिलाल और मणिलाल से अपने जुड़ाव को पृथक नहीं कर पायीं अपने टेक्स्ट में रामदास भटकल का यह नाटक एक पत्नी का अपने महान बनते जाते पति के अंदरूनी पारिवारिक चरित्र के अनछुए पहलुओं पर एक बारीक नज़र और उसी की डायरी है नाटक में बा के कैरेक्टर को रंगमंच की वरिष्ठ अभिनेत्री 'रोहिणी हठांगरी'ने जीवंत किया रोहिणी जी इस किरदार में रच बस गयी हैं,दर्शकों को रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गाँधी तो याद ही होगी बहरहाल,यह नाटक मराठी में खेला जाता रहा है पर हिंदी में यह पहली प्रस्तुति रही ,इस वजह से कई बार संवादों की तारतम्यता भंग हुई और दर्शकों तथा मंच का सम्बन्ध टूटते-टूटते बचा तो इसकी एकमात्र वजह रोहिणी जी का अभिनय ही रहा पर इन सबके अलावे भी एक बड़ी कमी इसकी समयावधि भी रही,जिससे कई बार यह नाटक खींचता सा लगा नाटक के कई प्रसंग हटाये जा सकने वाले प्रतीत हुए,बहुत संभव है कि आगे जब यह नाटक खेला जाये तो यह कमी भी दूर हो जाये 'जगदम्बा'कथावाचन शैली का नाटक है- एक माँ की चिंता के केंद्र में उसकी संतान हमेशा रही है पर एक तरफ पति का आदर्शवादी जीवन भी था,ऐसे में बा की स्थिति त्रिशंकु सरीखी रही और यह वह कारण है,जो गाँधी जी को मोहनदास तक खींच लाता है हर मोर्चे पर सफल रहने वाले नैतिक गाँधी जी अपने ही बेटे के मोर्चे पर विफल रहे,बा के चरित्र से यह बात और खुलकर सामने आती है कि,अपने नियमों को कड़ी से अपने बच्चों पर लागू करना बापू के 'बापू'बने रहने की धारणा का फल था जीवन के छोटे-छोटे सत्याग्रही प्रसंगों को अपने दैनिक व्यवहार में बा का व्यक्तित्व सहधर्मिणी से एकदम अलग तरीके से उस आम महिला का भी नज़र आता है,जिसने अपने पति की उस बात को तो गांठ बाँध कर निभाया कि देश के लिए जेल जाना एक पाठशाला जाने सरीखा है पर इस पाठ को पढ़ते-पढ़ते परिवार की नांव किस ठाँव चली गयी उसकी भी पड़ताल है नाटक का पाठ बार-बार इस बात की और इशारा करता है कि गाँधी जी गाँधी ना होते गर बा न होती जगदम्बा का नाट्यालेख न केवल बा के जीवन को चिन्हित करता है बल्कि भारतीय राजनीति और गाँधी जी के संघर्षपूर्ण जीवन के विविध पडावों को एक सरल,सुघड़ पत्नी के नज़र से बयान भी करता है,ऐसे में नाटक का पाठ लंबा हो जाना स्वाभाविक है,पर रंगमंच की भी एक समस्या है कि अगर मंच पर घटनाओं का कौतुहल और तनाव बरकरार नहीं रहता तो दर्शक ऊबने लगता है,यह नाटक भी इसी का शिकार हो गया डायरी शैली का कथावाचन और उम्दा अभिनय भी नाटक को धीमा कर देते हैं तो इसकी एकमात्र वजह यही है बावजूद इसके नाटक के अंतिम दृश्यों में माँ-बेटे का संवाद सहसा ही गाँधी जी के इस उपेक्षित और तथाकथित नालायक बेटे हरिलाल के प्रति सहानुभूति पैदा कर जाता है पर कहते हैं न कि रंगमंच एक गतिमान स्थिति में ही कथा कहे तो दर्शकीय प्यार पाता है,जगदम्बा इससे तो थोड़ी दूर जाती है पर संवेदनशील विषयों को परखने वाले सामाजिकों को यह नाटक पसंद आया

1/23/11

राख सरीखा गर्म और बेहतर-कश्मीर कश्मीर


अल्बेयर कामू ने 'मिथ ऑफ़ सिफिसस'में लिखा है-'मानव ऐसे सूनेपन में है,जिसका कोई उपचार नहीं है,आखिर वह अपने खोले हुए घर,जमीन की स्मृतियों तक से वंचित हो गया है यहाँ तक कि उसे अपनी धरती और आने की आशा के किसी वायदे की उम्मीद नहीं है मनुष्य और उसकी ज़िन्दगी के बीच अलगाव, कलाकार और पर्यावरण के बीच अलगाव सच में ही,अलगाव को जन्म देते हैं '

एब्सर्ड रंगमंच यथार्थ को अपने टूल्स के साथ ही ले आता है और उसी यथार्थ को फिर खारिज भी कर देता है बात चाहे,लुइगी पिरान्देलो के 'सिक्स कैरेक्टर्स इन सर्च ऑफ़ ऍन आथर 'की हो या हिन्दुस्तानी'गारबो' या ;कश्मीर कश्मीर'की ,यह सच दिखने और फिर तुरंत ही उसे आँखों के आगे से खींच ले जाने की अय्यारी इसी रंगमंच की खासियत है यह रंग-प्रयोग द्वितीय विश्वयुद्ध के बादकी स्थिति से उपजा रंगप्रयोग है यह अपने कथानकों में कोई निदान नहीं देता कश्मीर कश्मीर ऐसा ही नाटक है ,इसमें से कोई पात्र ऐसा नहीं है जिनसे आप प्रेम या घृणा कर सकें ,इनमे विचारों की एक अंतहीन पुनरावृति तथा अनिर्णय की स्थिति भी है ,जो आमतौर पर इस तरह के रंगमंच की खासियत होती है बहित संभव है कि नाटक के पारंपरिक दर्शकों को यहाँ कुछ ने मिले क्योंकि पहली बार देखने पर इस तरह के प्रयोग वाले नाटक उन दर्शकों को सारहीन ही लगते हैं फिर भी ,एब्सर्ड नाटक में मुख्य शक्ति दर्शक को सतर्क,सजग करने की है तथा प्रतीकों और रूपकों का सहारा लेकर दर्शकों में एक तरह की विश्लेषण शैली को विकसित करना भी उसका ध्येय है भी है और उसका सौंदर्य भी चूँकि,इन नाटकों का सारा एक्शन,मूल्यबोध एब्सर्ड,अपूर्ण होता है इसलिए इसमें एक ख़ास तरह की एकरसता भी पूरे नाटक में आद्योपांत बनी रहती है इसको सँभालने की जिम्मेदारी अभिनेता और निर्देशक की होती है 'कश्मीर कश्मीर' नाटक इसी तरह एक अंतहीन दृश्य को मंच पर उतारता है यहाँ कश्मीर एक होटल के रूप में सामने आता है यानि होटल, कश्मीर का रूपक है दर्शक बिना तामझाम वाले मंच पर एक बेहतर टेक्स्ट को ,उम्दा अभिनय,गतियों ध्वनि-प्रभाव और प्रकाश में मंच पर रूपायित होते देखते हैं निर्देशक मोहित तकलकर ने कश्मीर की जमीनी हालात इसी होटल का रूपक रचकर और दो हनीमून जोड़े तथा कुछ और किरदारों को एक धुंधली इमेज के साथ दिखाते हैं,यह इमेज दर्शक के मन में उभरती है जो सीधे कश्मीर के स्याह हो रहे ,हो चुके चरित्र और इसके पीछे के खेल को भी दिखाती है कुछ गैर जरुरी घटनाक्रम भी नाटक में हैं पर वह इसकी असंगति को ही दृढ करते हैं कुल मिलाकर 'कश्मीर कश्मीर'एक मेटाफर है ,जो नाटकीय घटनाक्रमों के साथ आगे बढ़ते हुए कश्मीर की हकीकत बयानी बन जाता है और जो आज के कश्मीर की वाजिब कडवी सच्चाई भी है जो कश्मीर ६० के दशक से अस्सी के अंतिम तक 'अगर कहीं जन्नत है तो...'की टेर लगाता दिखता था,वह अब इजराईल-फिलिस्तीन-गाजापट्टी,ईराक,अफगानिस्तान,जैसी जगहों के साथ अर्थसंदर्भितहोने लगा है ?-यह कितनी भयावह बात है पर सच्चाई यही है लाल देद(लल्लेश्वरी ) के गान अब कहाँ किस कश्मीर की बात है ?जरा इमेजिन कीजिये नाटक देखते-देखते अब यह कश्मीर चीनी-खरबूजे का काटा जाना जैसी ऐतिहासिक घटना की अनजाने ही याद दिलाता है,एक झुनझूने की शक्ल में ,जिसे जब मन किया बजा रहा है यद्यपि नाटक सीधे इस तरह के प्रश्नों को नहीं उठाता पर होटल में हनीमून मनाने आये जोड़े से लेकर,होटलकर्मियों की हरकतें ,रह रहकर आते विजुअल्स तथा व्वाईस ओवर से यह साफ़ तौर पर उभरता है कई कहानियों के इर्द-गिर्द चक्कर काटकर यह नाटक एक अंतहीन-सा नैराश्य,पीछे रह गयीं विकृत छवियाँ ,'जो कश्मीर की आम छवियों से अलग और अजीब तौर पर भयानक हैं,'कई अनसुलझे,अनुत्तरित प्रश्नों का सुर्ख और स्याह प्रभाव छोड़ता है खुद मोहित तकलकर का बयान है-'यह उस बाहरी सच के उद्देश्य पर सवाल खड़े करती है,जो कश्मीर के आतंरिक हालात को समझने के लिए बनायीं गयी है राज्य की शांति को निगल रहे कई मुद्दों से जुड़ने और उनकी झलक देखने के लिए यह नाटक एक सेतु है '-हालांकि यह सेतु उतना मजबूत नहीं बन सका है पर सेतु की मूल प्रकृति जो है उसमे यह फिट बैठता है एब्सर्ड नाटक अपने चरित्र में एकदम निश्चित नहीं होते,कश्मीर कश्मीर'इसका अपवाद नहीं है यह नाटक बीच में धीमा पड़ता जरुर है पर उत्कृष्ट अभिनय इसे तुरंत ही संभाल लेता है और यह नाटक होटल कश्मीर कश्मीर को विखंडित करके 'हाट एज ऐश 'यानि राख सरीखा गर्म के रूप में सामने ला देता है,क्या यह स्थिति जानी-पहचानी नहीं लगती ? 'कश्मीर कश्मीर' भले एक नायब मास्टर पीस ने बन सका हो पर अपने फ़ार्म में बेहतरीन प्रस्तुति रही

1/13/11

रूपम पाठक के पक्ष में


झारखण्ड कैडर के एक भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी पी.एस.नटराजन के यौन-उत्पीडन की शिकार सुषमा बड़ाईक नामक महिला इन दिनों न्याय पाने के लिए जगह-जगह अर्जियां लगाती फिर रही है.पिछले दिनों यह फरियादी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के यहाँ भी आई क्योंकि झारखण्ड में उसकी फ़रियाद सुनने वाला नहीं है.उसका कहना है कि गुमला की पुलिस उसे झारखण्ड आर्मी नामक उग्रवादी संगठन की सरगना साबित करने पर तुली है.वह अपनी लाख कोशिशों के बावजूद झारखण्ड सरकार के दरबार में किसी से मिल नहीं पाई है,तब जाकर उसने नीतीश के जनता दरबार में अर्जी लगायी.यद्यपि इस सन्दर्भ में बिहार सरकार ने सुषमा के आवेदन को झारखण्ड सरकार तथा केन्द्रीय गृह मंत्रालय को अपने आग्रह-पत्र के साथ अग्रसारित कर दिया है.अब ऐसे में यदि सुषमा की अर्जी नहीं सुनी गयी तो क्या मालूम एक और रूपम पाठक केस सामने आ जाये ? इस चिंता की वाजिब वजहें हैं.मान लीजिये कि अगर सुषमा की बात सच्ची हैऔर उसकी फ़रियाद कहीं नहीं सुनी जा रही है तब ऐसे में उसके पास क्या चारा बचेगा?हालांकि संयुक्त बिहार के राजद सरकार में चम्पा विश्वास काण्ड लोगों से भूला नहीं होगा.सरकारी तंत्र अपने लाल-बत्ती और पावर के घमंड में न-जाने कितने ही दलितों-दमितों और अशक्त आम लोगों की अस्मत से खिलवाड़ करता रहा है,यह सिर्फ बिहार या झारखण्ड का ही मामला नहीं है.और हमारा सामाजिक-ढांचा ऐसा है कि इसमें औरत की जाति ही निर्धारित नहीं है वह हर जगह एक सी स्थिति में है-भोग्या. हमारा सामंती समाज उसे एक ऑब्जेक्ट से अधिक कुछ नहीं समझता.रूपम पाठक का मामला इस तरह की कथा-बयानी है.जिस औरत ने मृतक विधायक के खिलाफ पहले पुलिस रिपोर्ट दर्ज करायी और दुबारा उसे वापस लेने पर मजबूर हुई उसके पीछे कोई सोच-समझी साजिश नहीं बल्कि उस जगह पर अपने परिवार की हिफाजत ही रही होगी इसमें कोई दो-राय नहीं.बिहार सरकार के भाजपा कोटे के मंत्री महोदय तो यह कहते नज़र आये कि रूपम पाठक एक ब्लैकमेलर थी.यह कितनी वाहियात बात है.आज तक यह खबर सुनने में नहीं आई कि किसी ब्लेकमेलर ने अपने शिकार को मार दिया.ब्लेकमेलर नाम का जीव खुद एक ऐसी कुत्सित मानसिकता से ग्रस्त होता है.जहाँ वह अपने से अधिक प्यार करता है और उसीके लिए सारा खेल रचता है.ऐसे में कोई भी ब्लेकमेलर अपने सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को नहीं मारता.हाँ यह सुनने में या फिल्मों में देखने में आता है कि ब्लेकमेलर से आजिज़ आ शिकार ही उसे मार या मरवा दता है.भला कभी बाड़ ने खेत को चर लिया,या खा लिया ऐसा सुनने में आया है ? एक औरत जब खुले-आम जब किसी की हत्या खासतौर पर जब वह एक रसूखदार व्यक्ति हो तब उसके भीतर उतर कर कम-से-कम उस पीड़ा को समझना चाहिए जहाँ उसने अपने घर की दहलीज़ से बाहर आकर हत्या करने जैसा कदम उठाया.प्रथम दृष्टया ही रूपम पाठक का मामला साफ़ दीखता है.ख़बरों के मुताबिक रूपम ने हत्या के बाड़ और घायलावस्था में अस्पताल ले जाते वक़्त यह लगातार कहा है कि-'मुझे मार दो,फांसी दे दो मैन जीना नहीं चाहती '-क्या अब भी कुछ कहने की बात रह जाति है.यदि रूपम पाठक बदनीयत वाली या ब्लेकमेलर महिला होती तो जाहिर तौर पर कभी सामने से वार नहीं करती ना ही इस मानसिकता के लोग करते हैं.अस्सी के दशक में एक बहुचर्चित फिल्म आई थी-'प्रतिघात'.इस फिल्म की नायिका अपने ऊपर हुए अत्याचारों से सब दरवाजों को खटखटाती है पर हमारा भ्रष्ट-तंत्र उस औरत को न्याय नहीं दिला पाता.नायिका अपनी अंततः हाथ में कुल्हाड़ी लिए मंचासीन विलेन को जो संयोग से एक विधायक ही है,काट देती है.रूपम पाठक के केस में प्रतिघात का याद आना अनायास ही है.क्योंकि जब भी व्यवस्था में बैठे लोग जनता को अपनी रैयत-मातहत समझेंगे और अपने क्षेत्र की महिलों को अपनी प्रापर्टी समझेंगे ऐसे दृश्य बार-बार घटित होंगे.मृतक विधायक से एक बड़ा तबका है जो सहानुभूति नहीं रखता.बावजूद उस व्यक्ति का वाहन दुबारा चुना जाना जनता के ऊपर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है.इधर एक नयी खबर आई है कि रूपम पाठक के समर्थन में बिहार की कै महिला नेत्रियों ने पार्टी लाइन से परे जाकर आवाज़ उठाई है.एपवा,जनवादी महिला मोर्चा,जदयू,लोजपा जैसी पार्टियों की महिलाएं एक साथ एक मंच पर आ खड़ी हुई हैं.पटना विश्वविद्यालय के छात्रों ने रूपम पाठक को न्याय दिलाने और इस मामले को विधायक की मौत से भी पहले सबके सामने लेन वाले पत्रकार नवलेश पाठक के लिए एक मानव-श्रृंखला बनायीं है.आईसा और इंकलाबी नौजवान सभा के छात्रों की यह पहल वाकई काबिले-तारीफ़ है.इस बीच मुख्यमंत्री ने यह घोषणा कर दी है कि मामले की सीबीआई जांच करायी जाएगी तब तक स्थानीय पुलिसिया जांच जारी रहेगी.यह वाकई चिंताजनक बात है.सीबीआई जांच होने तक इस मामले से कम-से-कम लोकल पुलिस को तो परे ही रखना चाहिए क्योंकि यह केस के हित में अत्यधिक जरुरी है.बिहार के समाजवादी बुद्धिजीवी तबके को जो आकंठ नीतीश गुणगान में आज डूबा है उसे भी खुलकर हर प्रकार से रूपम पाठक के साथ आना होगा और यह उसका नैतिक फ़र्ज़ भी है,kam-से-कम इस वर्ग से नैतिकता की उम्मीद हमें है ही.व्यवस्था कभी जनता फ्रेंडली नहीं होती वह उसका दिखावा करती है.वह एक कम करती है दस घोषणाएं भी जो कभी पूरी नहीं होनी है और खुद की पीठ भी खुद ही थपथपा लेती है.यह नहीं होता तो आज रूपम पाठक को ऐसा कदम उठाने को मजबूर न होना पड़ता क्या पता अगर आज भी नहीं चेते तो कल कोई और खड़ा होगा,क्योंकि दिनों-दिन दूषित होती जाती राजनीति का चेहरा भी वह नहीं रहा जो वह हमेशा जनता को दिखता रहता है.आज रूपम जैसी महिला-शक्ति सामने आई भले ही परिस्थितियाँ अलग थी तो कल कोई सुषमा आ जाएगी,उत्तर-पूर्व में मनोरमा का मामला और सशस्त्र बलों का अत्याचार पुरानी बात नहीं महिलाएं ऐसे ही सामने आएँगी.रूपम ने तो हत्या की है पर ऐसे कई उदाहरण हैं कि सत्ताधीशों की लपलपाती जिव्हा ने कईयों को आत्महत्या पर मजबूर कर दिया और बदले में कुछ महीने की सजा पाई.इस कमीनी व्यवस्था का चेहरा अभी उसी क्रूर मुस्कान के साथ हमारे इर्द-गिर्द चक्कर मार रहा है.
(जनसत्ता में दिनांक-१९.०१.२०११ को प्रकाशित )
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एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...