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Showing posts from March, 2009

सपनों की कब्रगाह है-बॉलीवुड..

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"इस मायानगरी में कई पहुंचे पर हर जुम्मे चढ़ते-उतारते सूरज के साथ ही अपने वजूद को बनाते-तलाशते खो गए"- कुछ को उनकी मन-माफिक ज़मीन नहीं मिली कुछ को सही पहचान.जज्बे और जीवट वाला यहाँ फिर भी रुके और खुद को बनाने की जुगत में लगे रहे.यह बात तो सभी को मालुम है कि,इतने पुराने बरगदों के बीच किसी नए बिचडे को अपनी जमीन पकड़ने में क्या परेशानी होती है उसे आसानी से समझा जा सकता है.इन बिचडों को उन्ही के बीच का थोडी जगह बना चुका पेड़ ही पहचान सकता है और अमूमन ऐसा ही होता आया भी है.पीयूष मिश्रा पहले ऐसे शख्स या कलाकार नहीं हैं जिन्हें अपनी जमीन बनाने में समय लगा है.इससे पहले रंग-जगत से उधर को(सिनेमा जगत)जाने वालों की फेहरिस्त काफी लम्बी है.कुछ अभी उधर जाने की उड़ान भरने को तैयार बैठे अपने दिनों को मजबूत बनाने में लगे हैं और मुम्बई से अपने कनेक्शन तलाशने में लगे हैं.वैसे भी एन एस डी के तीन साल या रंगमंडल के लम्बे समय और अपना अमूल्य रंग-योगदान देने.,या फिर श्रीराम सेंटर इत्यादि जगहों पर ऐसे कई कलाकारों की जमात देखी जा सकती है.जो चाय के अनगिनत प्यालों के साथ अपने सपने बुन रहे हैं या उधर का जुग

पुते हुए चेहरों का सच..-"गुलाल"

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भूल जाइए कि,हिंदी फिल्मों का मतलब पेड़ों,सरसों के खेतों और बल्ले-बल्ले ही है.अनुराग कश्यप जैसे नयी पीढी के निर्देशकों ,फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा में एक ऐसी लहर पैदा की है ,जिससे जोहर,चोपडा की मार से डरे दर्शकों को एक नयी सुकून मिलती दिख रही है.साल के शुरू में देव-डी और अब "गुलाल"अनुराग कश्यप को सामान्य से काफी ऊपर तक उठा देती है.गुलाल कई मायनों में देखने लायक है.चाहे वह इसके एक्टर्स हो,प्लाट हो,दृश्य हो,गीत संयोजन हो या फिर संवाद,अनुराग की बाजीगरी हर जगह १००%में उपस्थित है.गुलाल हर लिहाज़ से एक बड़े निर्देशक की फिल्म है. फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि भले ही राजस्थान की हो पर यह पूरे भारत की सच्चाई है.राजपुताना का ख्वाब बेचकर अपने जातिगत,राजनीतिक हित साधने वाला दुकी बना (के.के.)हो या फिर लुंज-पुंज नपुंसकता की हद तक बेवकूफियां करने वाले दिलीप सिंह (राजा सिंह चौधरी)हो ,सभी अपने आस-पास के कैरेक्टर्स हैं,खालिस वास्तविक जीवन के कैरेक्टर्स.यूनिवर्सिटी या कालेज की राजनीति को ज़रा भी नजदीक से जानने और देखने वाला व्यक्ति इस फिल्म के एक-एक संवाद को अपने सुने या सुनाये बातों की तरह समझ लेग

बस यही बचे थे?अब हाय-तौबा क्यों?

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राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के निजी वस्तुओं की नीलामी की खबरें पिछले कई दिनों से सूचना-तंत्रों की सुर्खियों में थी.पता नहीं हर बार ऐसे मामलों पर हमारी गवर्नमेंट को क्या हो जाता है.शायद किसी कंट्री में ऐसा नहीं होता होगा जहां उसके फादर ऑफ़ द नेशन के साथ इतनी बेरुखी से पेश आया जाता है.बहरहाल,गांधीजी की चीज़ें अपनी सही जगह पर आ गयी हैं.देशवासियों को जय हो..जय हो...करना चाहिए.(शायद).पर,देखने वाली बात ये है कि हमारे जो वस्तुएं इतनी महत्वपूर्ण हैं, वह लाया किस आदमी ने ?जिस नशाबंदी और नशाखोरी के खिलाफ गांधीजी जीवन भर संघर्षरत रहे आखिर उसी फिल्ड के महारथी कहे जाने वाले शराब किंग "विजय माल्या"ने गांधीजी के इन सामानों को खरीद लिया और देश लेकर आये हैं,वह भी एक बड़ी भारी रकम देकर.अब अखबार वाले चिल्ला रहे हैं कि,आखिर एक शराब का व्यवसायी ऐसा कैसे कर सकता है,पर इतने से माल्या के इस काम का महत्त्व ख़त्म नहीं हो जाता.अजी जब हमारी सरकार इस हद तक सोई है कि अब राष्ट्रपिता तक से ही पोलिटिक्स कर दिया.अब तो ये भी नहीं कहा जा सकता कि ये (व्यवस्था)संवेदनहीन हो गयी है.कम से कम इस काम से विजय माल्या ने स

नौटंकी वाया रिक्शा-शो....जय हो...

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कल अपने समाजवादी नीतिश कुमार जी "slumdog.."देखने गए.आज के सभी अखबारों की सुर्खियों में उनकी रिक्शानशीन मुस्कुराती हुई तस्वीर छाई हुई है.साथ ही,इस फिल्म के बारे में उनके उदगार भी कि"मैं ज़रा भुसकौल छात्र हूँ इसलिए अब तक फिल्म नहीं देख पाया था.अब इनको कौन बताये कि ये अचानक ही रिक्शा सवारी के साथ फिल्म में उस रास्ते से जाना जो पटना का सबसे भीड़ वाला इलाका है,कोई यूँ ही वाली बात नहीं थी.सुशासन को इस तरीके से दिखाने का अच्चा मौका है यह जबकि लोक सभा चुनावों की घोषणा कुछ ही दिनों पहले हो चुकी है.राजनीति के राजपथ पर लोहिया के लोग अब उनकी(लोहिया)तरह या सिद्धांतों के आस-पास कितने रह गए हैं,यह तो नहीं कहा जा सकता पर हाँ इतना जरुर है कि आज की राजनीती में अपनी जुगाली कैसे चलाते रहनी है यह बहुत अच्छे से पता है."slumdog..."तक पहुँचने का ये रास्ता वाकई लाजवाब है पर क्या करें इस खोपडी में यह बात आसानी से नहीं घुसती कि बस यूँ ही फिल्म देखने जा रहा हूँ.अपने उपलब्धियों के साथ ही अगर नीतिश जी जनता दरबार में जाएँ तो ही अच्छा है क्योंकि उनके फेवर में यह बात कम-से-कम (लालू यादव के बा

हंसिकाएं..कुछ हल्के-फुल्के पल.

जीवन में हंसने के मौके खुश रहने के मौके बड़े कम हैं.इसी तंगदिली के वक़्त तन्हादिली के वक़्त आपके चेहरों पे एक मुस्कान देता हूँ.कुछ देर के लिए कम-से-कम ये हंसी आपको सुकून दे. "एक बहु और एक सास उनके पुत्र थे -श्री प्रकाश बैठे थे उदास ,अचानक माँ ने कहा-बेटा कल्पना करो, मैं और बहु दोनों गंगा नहाने, हरिद्वार जायें,हमारा पाँव फिसल जाए, और हम दोनों ही डूब जाएँ . तो तू अपना धर्म कैसे निभाएगा ? डूबती हुई माँ और बीवी में, किसको बचायेगा? साहेबान-कदरदान-मेहरबान लड़का था परेशान उसके समझ में कोई युक्ति नहीं आई क्योंकि एक तरफ था कुँआ तो दूसरी तरफ थी खाई अचानक बीवी ने मुंह खोला यूँ बोला- 'हे प्राणनाथ !डूबती हुई माँ और बीवी में ,

देखी ज़माने की यारी..कुछ किस्मत की ..(वाया-शफीक सलाम बॉम्बे फेम)

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ऑस्कर अवार्ड के बाद चहुँ-ओर जय हो की धूम मची हुई है.slumdog .. से लेकर smile pinki के बाल कलाकारों की तारीफों में सभी ने कसीदे गढ़ डाले हैं.मुम्बई के स्लम में रहने वाले उन बच्चों के लिए राज्य सरकार ने मकान देने की घोषणा कर डाली है..पिंकी हम सब के लिए स्पेशल हो ही गयी है..सभी बच्चे देश भर के बच्चों का आकार ले चुके हैं.इसी बहाने परिधि से आने वाले इन दो-चार खुशकिस्मत बच्चों की किस्मत और भविष्य दोनों सुधर जायेंगे, कम-से-कम इसकी उम्मीद तो मुझे है.पर क्या वाकई ये खुमार उनके जीवन में एक सुनहरी बुनियाद रख पायेगा?अब के माहौल में तो उम्मीद हाँ की ही नज़र आती है.मेरे ऐसा सोचने के पीछे कोई बहुत दार्शनिक बात नहीं छुपी है बल्कि इन्ही बच्चों का एक अतीती चेहरा सामने है..जो ऑस्कर तो नहीं ले पाया था (निर्देशक डैनी बोयल जो नहीं थे)पर हाँ उस फिल्म का एक अहम् हिस्सा था,और ऑस्कर की देहरी तक भी पहुंचा था.slumdog...की खुमारी में डूबे और इसे एक महान फिल्म बताने वालों के लिए अंग्रेजी दैनिक "the hindu"के शुक्रवार १३ फ़रवरी के एडिशन में "beyond the slumdog alley"(kiswar desai)ने लिखा-"sal