3/31/09

सपनों की कब्रगाह है-बॉलीवुड..


"इस मायानगरी में कई पहुंचे पर हर जुम्मे चढ़ते-उतारते सूरज के साथ ही अपने वजूद को बनाते-तलाशते खो गए"-
कुछ को उनकी मन-माफिक ज़मीन नहीं मिली कुछ को सही पहचान.जज्बे और जीवट वाला यहाँ फिर भी रुके और खुद को बनाने की जुगत में लगे रहे.यह बात तो सभी को मालुम है कि,इतने पुराने बरगदों के बीच किसी नए बिचडे को अपनी जमीन पकड़ने में क्या परेशानी होती है उसे आसानी से समझा जा सकता है.इन बिचडों को उन्ही के बीच का थोडी जगह बना चुका पेड़ ही पहचान सकता है और अमूमन ऐसा ही होता आया भी है.पीयूष मिश्रा पहले ऐसे शख्स या कलाकार नहीं हैं जिन्हें अपनी जमीन बनाने में समय लगा है.इससे पहले रंग-जगत से उधर को(सिनेमा जगत)जाने वालों की फेहरिस्त काफी लम्बी है.कुछ अभी उधर जाने की उड़ान भरने को तैयार बैठे अपने दिनों को मजबूत बनाने में लगे हैं और मुम्बई से अपने कनेक्शन तलाशने में लगे हैं.वैसे भी एन एस डी के तीन साल या रंगमंडल के लम्बे समय और अपना अमूल्य रंग-योगदान देने.,या फिर श्रीराम सेंटर इत्यादि जगहों पर ऐसे कई कलाकारों की जमात देखी जा सकती है.जो चाय के अनगिनत प्यालों के साथ अपने सपने बुन रहे हैं या उधर का जुगाड़ फिट करने में लगे रहते हैं.यह सही है कि प्रतिभा लोहा मनवा लेती है पर क्या हो अगर ये प्रतिभा सही समय पर असर ना दिखाए.तब स्वाभाविक है कि कुंठा और फ्रस्ट्रेशन बढती है.एक समय की नामचीन और बेहतरीन अभिनेत्री 'सुरेखा सीकरी'को सही पहचान अब टीवी पर 'बालिका वधू'के मार्फ़त मिली है और लोगों ने (आम औडिएंस)ने उनकी रेंज को देखा है.इसके उलट अभी भी कई ऐसे कलाकार हैं जो अभी भी छिटपुट किरदारों में यदा-कदा दिख जाते हैं.इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने साक्षात्कार में पीयूष मिश्रा का दर्द उनकी बातों में झलक जाता है(२९-०३-२००९),साथ ही ,हमें राजेंद्र गुप्ता से लेकर रघुवीर यादव तक का उदाहरण सामने नज़र आता है जिन्होंने रंगमंच से सिनेमा में अपनी पैठ बनायी.ओमपुरी और नसीरुद्दीन शाह तो खैर अब माईलस्टोन बन चुके हैं,सफल और बहुत ही सफल.इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि अकेले इन दो कलाकारों ने जो रास्ता और पहचान बनायीं है वह सभी के लिए प्रेरणा-स्त्रोत है.पर बात वही है कि सभी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता ,किसीको...-बहरहाल रंगजगत से जो बड़ा रेला सिल्वर स्क्रीन की ओर झुक रहा है उसके पीछे कौन सी मेन बातें हैं ?इस पर ध्यान देना अधिक जरुरी है.पीयूष मिश्रा जैसा समर्थ कलाकार यह कहने को मजबूर हो जाता है कि 'yes i was restless for success'-अभी भी रंगमंच इस स्थिति में नहीं आ पाया है कि एक कलाकार को उसकी जिंदगी को सहज और सफल तरीके से चला सके.यह भले ही हम कह दे कि ऐसा नहीं है और परिस्थितियाँ बदल रही हैं-पर क्या वाकई ?रंगमंच के ये पुतले क्यों बॉलीवुड में नकार दिए जाते हैं या उन्हें उनकी सही जगह नहीं मिलती इसको देखने की जरुरत है.जब तक सपने ज़िंदा हैं तब तक आदमी जिंदा है ..'पाश'ने लिखा है ना कि 'सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना'-सही में बॉलीवुड सपनों को सच करने का एक मंच देता है पर यह बात भी उतनी ही बड़ी और कड़वी सच्चाई है कि यह जगह सपनों की कब्रगाह भी है...
शेष अगली पोस्ट में.

3/14/09

पुते हुए चेहरों का सच..-"गुलाल"


भूल जाइए कि,हिंदी फिल्मों का मतलब पेड़ों,सरसों के खेतों और बल्ले-बल्ले ही है.अनुराग कश्यप जैसे नयी पीढी के निर्देशकों ,फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा में एक ऐसी लहर पैदा की है ,जिससे जोहर,चोपडा की मार से डरे दर्शकों को एक नयी सुकून मिलती दिख रही है.साल के शुरू में देव-डी और अब "गुलाल"अनुराग कश्यप को सामान्य से काफी ऊपर तक उठा देती है.गुलाल कई मायनों में देखने लायक है.चाहे वह इसके एक्टर्स हो,प्लाट हो,दृश्य हो,गीत संयोजन हो या फिर संवाद,अनुराग की बाजीगरी हर जगह १००%में उपस्थित है.गुलाल हर लिहाज़ से एक बड़े निर्देशक की फिल्म है.
फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि भले ही राजस्थान की हो पर यह पूरे भारत की सच्चाई है.राजपुताना का ख्वाब बेचकर अपने जातिगत,राजनीतिक हित साधने वाला दुकी बना (के.के.)हो या फिर लुंज-पुंज नपुंसकता की हद तक बेवकूफियां करने वाले दिलीप सिंह (राजा सिंह चौधरी)हो ,सभी अपने आस-पास के कैरेक्टर्स हैं,खालिस वास्तविक जीवन के कैरेक्टर्स.यूनिवर्सिटी या कालेज की राजनीति को ज़रा भी नजदीक से जानने और देखने वाला व्यक्ति इस फिल्म के एक-एक संवाद को अपने सुने या सुनाये बातों की तरह समझ लेगा कि आखिर किस तरह की मैनुपूलेटिंग वह करते है और क्या हथियार कैसा हथियार अपने राजनीतिक स्वार्थ साधने को करते हैं.अब भूल जाइए कि सत्तर का दशक कभी मशहूर था अपने छात्र आन्दोलन को लेकर.अब का आन्दोलन बदल गया है,इसको नियंत्रित करने वाली शक्तियां कम-से-कम ईमानदार और छात्र तो नहीं ही हैं.इस फिल्म को देखते वक़्त मुझे अपने आस-पास का दिल्ली विश्वविद्यालय का चुनावी माहौल याद आता रहा.रैगिंग के खौफ से छात्रों का नामर्दगी की हद तक सीनिअर्स की गुलामी करना और ऐसा नहींकरनेपरपिटना.राजपूत,भूमिहार,ब्राह्मण,दलित,जाट,गुज्जर,बिहारी,आदि ऐसे कितने ही समीकरण है जिनसे हमारे छात्र-संघ का गठन होता है.कितनी ही शराब की बोतलें,बाबाओं (दुकी बना टाईप)का प्रताप यहाँ चलता है वह किसी से छुपा नहीं है.अनुराग कश्यप ,पियूष मिश्रा जैसे लोगों ने यह सीन खुद अपनी आँखों से देख रखा है,और इसका सबूत गुलाल में दीखता है.....शराब भी पीता हूँ.......जब कोई कुछ नहीं करता तो ला (कानून)पढने लगता है.गुलाल इस मायने में भी अधिक ज़मीनी है कि इसमें आपको ना सिर्फ देशी बल्कि अंतर्राष्टीय राजनीति के भी दृश्य दिखते हैं(मुजरे वाले प्रसंग में-'जैसे इराक में घुस गया अंकल सैम'.).बहरहाल,गुलाल में चित्र भले ही राजपूती एंगल के सहारे से कही गयी है पर सच्चाई सभी ऐसे समाजों की है जो क्षेत्र,जाति,धर्म का सहारा लेकर चले और हमारे सिरों पे बैठ गए हैं और जाने-अनजाने हम उनके इस प्रयास में सहयोगी ही बन गए.नायक दिलीप इस तरह की समस्या से ग्रस्त युवक है.जो हम-आप में से कोई भी हो सकता है.दुकी बना उस ढहे या ढह रहे सामंती ढांचे का आधुनिक चेहरा है.इससे परे फिल्म में इस सामंती नकाब के पीछे का एक चेहरा वह भी है जहां औरतें बस एक ऑब्जेक्ट की तरह आती हैं.जो सदियों से चली आ रही मानसिकता को प्रत्यक्ष करती है जहां man is subject of desire and woman is the object of desire कह दिया जाता है.दुकी की पत्नी चाहरदीवारी में बंद रहने को अभिशप्त है,उसे यह जाने का हक़ नहीं कि उसके पति ने अपनी रात किसके बिस्तर पर बिताई है.हाँ किरण का किरदार एक पल को यह भ्रम दे सकता है कि वह इन औरतों से थोडा आगे है पर यह भी भ्रम जल्दी टूटता है,और वह भी अपने भाई के राजनीतिक स्वार्थ का सटीक गोली बनती है और सबसे कमाल की बात तो ये है कि उसे पता है कि वह क्या कर रही है और क्यों कर रही है.रणंजय सिंह का किरदार अपने बाप के हिज हाईनेस वाली दुनिया से नफरत करता है पर इस व्यवस्था में उसी पिद्दी से पर हिट फार्मूले की पैरवी करता दिख रहा है-"राजपूत हो?-असल...).और बाप की सामन्ती नौटंकी का विरोधी होने के बावजूद उसी सिस्टम के दुकी का सहयोगी बनता है.'गुलाल'मजबूत फिल्म नहीं बनती अगर पियूष मिश्रा जैसा किरदार उसमे अनुराग ने नहीं डाला होता.फिल्म में जिस तरह के तनाव को डाईरेक्टर ने रचा है,वह पियूष मिश्रा के अर्धपागल वाले किरदार के मार्फ़त और स्ट्रोंग बन गया है.-'इस किरदार के संवाद,कवितायें,गीत'-घर प्रतीत कराते है गोया आप थिएटर में कोई नाटक देख रहे हैं और यह पात्र एक नेपथ्य की भूमिका में नाटक के क्रियाव्यापार को पोशीदा तरीके से सामने ला रहा है.सही कहें तो 'गुलाल' एक्टरों या संगीतकार,या निर्देशक की फिल्म नहीं बल्कि कलाकारों की फिल्म है,जिसका एक-एक पहलु स्तब्ध करता है और फिल्म का एक-एक दृश्य घटनाक्रम जो-जो हमसे जुड़ते हैं हमारे सफ़ेद और भौंचक चेहरों पर इस ज़हरीले गुलाल को मल देते हैं.देव-डी के निर्देशक का यह यु-टर्न उसकी काबिलियत के लिए तालियाँ बजाने पर मजबूर कर देता है पर प्रश्न फिर भी वही रहता है कि 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है'-क्या असली डेमोक्रेसी यही है?पुरे फिल्म में एक नाम हर ओर दिखता है वह है-डेमोक्रेसी बीअर '-क्या वाकई ऐसे चिन्हों के मार्फ़त अनुराग वर्तमान प्रजातंत्र की हकीकत बयान कर रहे है?और इस तरह कि व्यवस्था में जो अच्छी सोच है वह साईड लाइन होकर मजाकिया हो गयी है या फिर दुकी बना जैसों के प्रजातंत्र में बस पुते चेहरे और मुखौटों में छुपी रहने को मजबूर हैं.कम-से-कम पियूष मिश्रा के किरदार को देख कर यही लगता है.
दरसल,अनुराग कश्यप की यह फिल्म राजनीति के पुते चेहरों के पीछे की हकीकत-बयानी का दस्तावेज है,जो कहीं से भी फंतासियों के माध्यम से अपनी बात नहीं करती ना-ही कोई आदर्श लेकर सामने आती है.बल्कि यह फिल्म नंगे सच को उसके नंगे रूप में ही हमारे सामने लाकर रख देती है और यह जता देती है कि इस काजल की कोठरी में कोई बेदाग़ नहीं है सबने अपने चेहरों पर गुलाल मल रखा है..कालिख तो खैर हैं ही लगने को देर-स्वर पर लगनी तो है जरुर या फिर क्या पता लग भी गयी हो हमें पता नहीं चल रहा या हम सच्चाई स्वीकारना नहीं चाहते.'गुलाल' को कहा जा रहा है कि देर से आई है पर 'देर आये दुरुस्त आये '......अनुराग कश्यप का काम हिंदी सिनेमा जगत के घडियाली आंसुओं और हैपी-हैपी दुनिया के फ़िल्मी व्यापारियों के बीच थोडा सुकून देने वाला है.कम-से-कम अपने लिए तो इतना इमानदारी से कह ही सकता हूँ.यह नए किस्म की पैदावार है (अनुराग कश्यप ,नवदीप सिंह,राजकुमार गुप्ता,रजत कपूर,दिबाकर बैनर्जी,सौरभ शुक्ल,विनय पाठक,पियूष मिश्रा आदि)जिनके जड़ें आम लोगों तक गहरे आती हैं और बड़ी उर्वर हैं.
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3/9/09

बस यही बचे थे?अब हाय-तौबा क्यों?


राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के निजी वस्तुओं की नीलामी की खबरें पिछले कई दिनों से सूचना-तंत्रों की सुर्खियों में थी.पता नहीं हर बार ऐसे मामलों पर हमारी गवर्नमेंट को क्या हो जाता है.शायद किसी कंट्री में ऐसा नहीं होता होगा जहां उसके फादर ऑफ़ द नेशन के साथ इतनी बेरुखी से पेश आया जाता है.बहरहाल,गांधीजी की चीज़ें अपनी सही जगह पर आ गयी हैं.देशवासियों को जय हो..जय हो...करना चाहिए.(शायद).पर,देखने वाली बात ये है कि हमारे जो वस्तुएं इतनी महत्वपूर्ण हैं, वह लाया किस आदमी ने ?जिस नशाबंदी और नशाखोरी के खिलाफ गांधीजी जीवन भर संघर्षरत रहे आखिर उसी फिल्ड के महारथी कहे जाने वाले शराब किंग "विजय माल्या"ने गांधीजी के इन सामानों को खरीद लिया और देश लेकर आये हैं,वह भी एक बड़ी भारी रकम देकर.अब अखबार वाले चिल्ला रहे हैं कि,आखिर एक शराब का व्यवसायी ऐसा कैसे कर सकता है,पर इतने से माल्या के इस काम का महत्त्व ख़त्म नहीं हो जाता.अजी जब हमारी सरकार इस हद तक सोई है कि अब राष्ट्रपिता तक से ही पोलिटिक्स कर दिया.अब तो ये भी नहीं कहा जा सकता कि ये (व्यवस्था)संवेदनहीन हो गयी है.कम से कम इस काम से विजय माल्या ने समाज के एक बड़े हिस्से का दिल जीत लिया है.और मुझे नहीं लगता कि इसके भीतर के सूत्रों (जो हो भी सकते हैं और नहीं भी ,इस पर सोचने की जरुरत बेमानी है)को तलाशना सुबह लाने के लिए रात के अँधेरे को टोकरी में भरकर बाहर फेंकने जैसा निरर्थक प्रयास ही होगा.अब चाहे एक शराब व्यवसायी ने ही ऐसा किया हो पर उस पर ऊँगली उठाना अपनी खीझ दिखाने और खींसे निपोरने जैसा ही होगा..

3/6/09

नौटंकी वाया रिक्शा-शो....जय हो...


कल अपने समाजवादी नीतिश कुमार जी "slumdog.."देखने गए.आज के सभी अखबारों की सुर्खियों में उनकी रिक्शानशीन मुस्कुराती हुई तस्वीर छाई हुई है.साथ ही,इस फिल्म के बारे में उनके उदगार भी कि"मैं ज़रा भुसकौल छात्र हूँ इसलिए अब तक फिल्म नहीं देख पाया था.अब इनको कौन बताये कि ये अचानक ही रिक्शा सवारी के साथ फिल्म में उस रास्ते से जाना जो पटना का सबसे भीड़ वाला इलाका है,कोई यूँ ही वाली बात नहीं थी.सुशासन को इस तरीके से दिखाने का अच्चा मौका है यह जबकि लोक सभा चुनावों की घोषणा कुछ ही दिनों पहले हो चुकी है.राजनीति के राजपथ पर लोहिया के लोग अब उनकी(लोहिया)तरह या सिद्धांतों के आस-पास कितने रह गए हैं,यह तो नहीं कहा जा सकता पर हाँ इतना जरुर है कि आज की राजनीती में अपनी जुगाली कैसे चलाते रहनी है यह बहुत अच्छे से पता है."slumdog..."तक पहुँचने का ये रास्ता वाकई लाजवाब है पर क्या करें इस खोपडी में यह बात आसानी से नहीं घुसती कि बस यूँ ही फिल्म देखने जा रहा हूँ.अपने उपलब्धियों के साथ ही अगर नीतिश जी जनता दरबार में जाएँ तो ही अच्छा है क्योंकि उनके फेवर में यह बात कम-से-कम (लालू यादव के बाद)है कि उनके किये कराये जा रहे कुछ काम लोगों को दिख रहे हैं,और बिहार की चुनावी बयार भी उनके तरफ बह रही है. पर,क्या करें,नेताजी लोगों का कलेजा इतना सा होता है कि चुनाव की लहर चलते ही अपने स्टंट चालु कर देते हैं.सोच कर ही कितना अच्छा लगता हैं ना कि एक बीमारू स्टेट उनकी मुखिया जी 'slumdog...'देखने रिक्शे से जा रहे हैं,कहीं वे अपने स्टेट की हालत का प्रतिबिम्ब ही तो नहीं देखने गए थे..जिसका अंत उन्हें (उन्ही के शब्दों में)आशावादी लगा..(वैसे फिल्म तो आशावादी है ही)? हो सकता है..पर अब इस सीजन की शुरुआत नीतिश जी अपनी इनिंग से खेल दी है अब उनके ही समाजवादी मित्र /गुरु भाई लालूजी की इनिंग आने ही वाली है.तो क्या इस बात की उम्मीद लगाई जाए की अगले वाले भाईजी भैसगाडी/बैलगाडी से सिनेमा देखने जायेंगे?पर तब तक शायद 'slumdog....'बदल जायेगी ...खैर कोई बात नहीं जल्दी ही "आ देखे ज़रा "रीलिज होने वाली है...इसे ऑस्कर तो नहीं मिला पर हाँ मौसम के लिहाज़ से टाईटल बढ़िया है...खेल शुरू है भावुक मत होइए अभी और तमाशे दिखेंगे ...पूरब से पश्चिम तक ,उत्तर से दक्षिण तक..तब तक सुर्खियाँ कैसे बटोरे अभियान का मजा लीजिये....जय हो

3/4/09

हंसिकाएं..कुछ हल्के-फुल्के पल.

जीवन में हंसने के मौके खुश रहने के मौके बड़े कम हैं.इसी तंगदिली के वक़्त तन्हादिली के वक़्त आपके चेहरों पे एक मुस्कान देता हूँ.कुछ देर के लिए कम-से-कम ये हंसी आपको सुकून दे.

"एक बहु और एक सास
उनके पुत्र थे -श्री प्रकाश
बैठे थे उदास ,अचानक
माँ ने कहा-बेटा कल्पना करो,
मैं और बहु दोनों गंगा नहाने,
हरिद्वार जायें,हमारा पाँव फिसल जाए,
और हम दोनों ही डूब जाएँ .
तो तू अपना धर्म कैसे निभाएगा ?
डूबती हुई माँ और बीवी में,
किसको बचायेगा?
साहेबान-कदरदान-मेहरबान
लड़का था परेशान
उसके समझ में कोई युक्ति नहीं आई
क्योंकि एक तरफ था कुँआ तो
दूसरी तरफ थी खाई
अचानक बीवी ने मुंह खोला यूँ बोला-
'हे प्राणनाथ !डूबती हुई माँ और बीवी में ,
अपनी माँ को ही बचाना
माँ की ममता को मत लजाना
अरे हमारा क्या है हम तो ज़वान हैं
मौत से भी जूझ जायेंगे और
हमें बचाने जिन्हें तैरना नहीं आता
वो भी कूद जायेंगे." -----(सुरेश नीरव की कविता)

काका हाथरसी का नाम आप सबसे अछूता नहं है ,उन्ही की चार लाईने
"देख सुन्दरी षोडशी मन बगिये खिल जाये
मेंढक उछले प्यार के जिया हिया हिल जाए
जिया हिया हिल जाये ,बिमारी है यह खोटी
रोटी भावे नहीं ,फड़कती बोटी-बोटी
पुष्ट पहलवां भी हो जाता ढीलम-ढीलू
दिन भर चिल्लाये बेचारा
-इलू इलू इलू इलू........(काका हाथरसी)

3/2/09

देखी ज़माने की यारी..कुछ किस्मत की ..(वाया-शफीक सलाम बॉम्बे फेम)


ऑस्कर अवार्ड के बाद चहुँ-ओर जय हो की धूम मची हुई है.slumdog .. से लेकर smile pinki के बाल कलाकारों की तारीफों में सभी ने कसीदे गढ़ डाले हैं.मुम्बई के स्लम में रहने वाले उन बच्चों के लिए राज्य सरकार ने मकान देने की घोषणा कर डाली है..पिंकी हम सब के लिए स्पेशल हो ही गयी है..सभी बच्चे देश भर के बच्चों का आकार ले चुके हैं.इसी बहाने परिधि से आने वाले इन दो-चार खुशकिस्मत बच्चों की किस्मत और भविष्य दोनों सुधर जायेंगे, कम-से-कम इसकी उम्मीद तो मुझे है.पर क्या वाकई ये खुमार उनके जीवन में एक सुनहरी बुनियाद रख पायेगा?अब के माहौल में तो उम्मीद हाँ की ही नज़र आती है.मेरे ऐसा सोचने के पीछे कोई बहुत दार्शनिक बात नहीं छुपी है बल्कि इन्ही बच्चों का एक अतीती चेहरा सामने है..जो ऑस्कर तो नहीं ले पाया था (निर्देशक डैनी बोयल जो नहीं थे)पर हाँ उस फिल्म का एक अहम् हिस्सा था,और ऑस्कर की देहरी तक भी पहुंचा था.slumdog...की खुमारी में डूबे और इसे एक महान फिल्म बताने वालों के लिए अंग्रेजी दैनिक "the hindu"के शुक्रवार १३ फ़रवरी के एडिशन में "beyond the slumdog alley"(kiswar desai)ने लिखा-"salaam bombay"is shocking and real-and completely authentic...nair's is clearly the really "indian"film.it does have a heart unlike "slumdog"...पर मेरा किसी फिल्म के महान बताने और किसी को उस महान (?)फिल्म के बरक्स खराब फिल्म से मतलब नहीं है.दरअसल,एक तरफ ये कलाकार हैं,जिन्हें मीडिया,समाज हमने और आपने अभी-अभी आँखों पे चढाया है..पर एक तरफ वह कलाकार भी है,जो आज बेंगलुरु की सड़कों पर आज ऑटो चलाकर अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहा है.ये कलाकार,मजदूर "शफीक"है.जिसने मीरा नायर की "सलाम बॉम्बे"में "कृष्णा चाय-पाव"की भूमिका निभाई थी,यह आज बेंगलुरु के झोपड़पट्टी में रहा रहे हैं.१९८८ में रीलिज मीरा नायर की इस फिल्म ने देश-विदेश में अनेक पुरस्कार लिए थे.इस फिल्म को "पावर्टी पॉर्न"कहा जाता है.खैर,इस शफीक पर 'अमर उजाला ने कल (१ मार्च)को एक खबर छापी है.उसे पढिये-"इसे किस्मत का खेल कहें या कुछ और सच यही है.......slumdog...फिल्म के बाल कलाकारों की सफलता उन्हें अन्दर तक ख़ुशी देती है पर वे यह कहना नहीं भूलते कि उनकी किस्मत मेरे जैसी नहीं हो.......मायानगरी बड़ी जल्दी चने के झाड़ पर चढाती है और गिराने में एक पल नहीं लगाती.बस उम्मीद प्रार्थना यही है कि इन बच्चों के अरमान और सपने अपने मुकाम तक पहुंचे.....वरना ज़िन्दगी हीरो को जोकर बनाते देर नहीं लगाती ..किस्मत कनेक्शन भी थोडा जरुरी है(अगर शफीक की माने तो..)

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...