12/24/10

'सिनेमची'-विमर्श वाया सिनेमा


२३ दिसंबर २०१०,एक ख़ास तारीख,एक ख़ास दिन पर, इस खास दिन पर बातचीत से पहले २० तारीख जेहन में है जब दिल्ली विश्वविद्यालय के दोस्तों का एक समूह जिनमें अमितेश,धर्मेन्द्र प्रताप सिंह,मिहिर पंड्या,अभय रंजन सर,पल्लव सर (हिन्दू कालेज के अस्सिटेंट प्रोफेसर्स) और इस नाचीज़ ने ,जेएनयु से उमाशंकर ने मिलकर एक ऐसा मंच खडा करने की सोची जिसके मार्फत हम दैनंदिन जीवन में अपने आसपास के गतिविधियों के पर नज़र रखते हुए हफ्ते,महीने में एक या दो बार किसी जगह (वह जगह विश्वविद्यालय कैम्पस भी हो सकता है अथवा या किसी कालेज का सेमिनार रूम अथवा ऑडिटोरियम पर ऐसी फिल्मों और डाक्युमेंटरी फिल्मों को दिखाएं जो आम दर्शकों तक आसानी से नहीं पहुँचती.और फिर इसके साथ एक बेबाक बातचीत का, जो फिल्म के कांटेक्स्ट या उस फिल्म से उपजे सवालों को केंद्र में रखकर हो ,मंच दें.जहां अकादमिक और शैक्षणिक दबाव से परे छात्र अपनी बात करें की उस ख़ास फिल्म ने उनको क्या दिया,अथवा वह क्या जान पाए ,उन्होंने क्या लिया?इसकी चर्चा वह इस 'सिनेमची'के मंच से करें.वैसे यह सिनेमची नाम भी 'अमितेश'के ही दिमाग की खुराफात है.अमितेश हिंदी विभाग में टीचिंग असिस्टेंटशिप के साथ पीएच.डी.शोधार्थी हैं.उनका तर्क है कि अब तक सिनेमा को खराब ही माना जाता रहा है कि छात्र जीवन में किताबों से इतर जो गया वह लड़का ख़राब हो गया.ठीक वैसे ही ,जैसे-गांजा पीने की लत वाला गंजेड़ी और अफीम पीने वाला अफीमची हो जाता है वैसे ही गाँव हो या शहर लोग सिनेमा से प्यार करने वाले को 'सिनेमची'कहते है.तो सबने मिल यह निर्णय लिया कि 'क्यों न हम सभी एक ऐसा मंच तैयार करें,जहां हिंदी अथवा संस्कृत,उर्दू का लड़का भी उतना ही सहज महसूस करें जितना इंग्लिश या अन्य विषय का छात्र ,तो फाईनली २३ दिसंबर को 'इस सिनेमची-विमर्श वाया सिनेमा'की शुरुआत हिन्दू कालेज सेमीनार रूम में अभय रंजन सर के सहयोग से ८० के दशक की मशहूर फिल्म 'एक रुका हुआ फैसला'से हो गयी-
बासु चटर्जी निर्देशित 'एक रुका हुआ फैसला'(१९८६)मूलतः रेगीनाल्ड रोज़ के 'ट्वेल्व एंग्री मैन'(१९५७)का हिंदी रूपांतरण है.'एक रुका हुआ फैसला' के पटकथा लेखक 'रणजीत कपूर'ने इसी नाम से 'स्टेज' के लिए एक बेहतरीन रंगमंचीय प्रस्तुति दी थी.रेगीनाल्ड रोज़ की फिल्म भी 'सिडनी ल्युमेट' के टेलीड्रामा 'ट्वेल्व एंग्री मैन' का एडाप्टेशन है.पर एक कामन बात यह है कि इन चारों रूपों में यह एक बेहतरीन क्लासिक रही है.'एक रुका हुआ फैसला'हमारी न्याय-व्यवस्था की विसंगतियों की विडम्बना पर सीधा और तीखा प्रहार है.एक किशोर लड़के पर अपने वृद्ध पिता के क़त्ल का इलज़ाम है.बारह सदस्यीय बेंच (जिसके मेंबर अलग-अलग आईडेनटीटी/वर्ग के हैं,जिनका कोई नाम फिल्म में नहीं है) को सर्वसम्मति से दोषी या निर्दोष का फैसला देना है.डेढ़-पौने दो घंटे की इस फिल्म का सारी दृश्य संरचना एक कमरे की है सिवाय 1 मिनट के आउटडोर से.फिल्मों में यह इस तरह का संभवतः पहला थियेट्रिकल प्रयोग है.नाटकीय और गतिहीन सी दिखाई देने वाली बहस जैसे-जैसे आगे बढती है,वैसे-वैसे सदस्यों की व्यक्तिगत कुंठा और पूर्वाग्रह सामने आने लगते हैं,जिसकी जद में उनका निर्णय आने लगता है.फिल्म में किसी किरदार का कोई नाम नहीं है,सिवाय कुछ संबोधनों के -वह बूढा गवाह,वह औरत,लड़का .परन्तु,पक्ष-विपक्ष के तर्कों से सभी के वर्ग आदि का पता चल जाता है,यह इस फिल्म की बड़ी ताकत है.११ सदस्यों के 'दोषी'निर्णय के खिलाफ १ सदस्य अपनी असहमति जताता है बिना किसी ठोस सबूत के,वह और बहस चाहता है और फिर धीरे-धीरे अपने बहसों और तर्कों से सभी सदस्यों को पूरे घटनाक्रम की एक-एक परत खोलता जाता है और कासी हुई पटकथा,उम्दा अभिनय और बेहतरीन निर्देशन से यह फिल्म रूपांतरित होने के बावजूद हिंदी सिनेमा का मास्टर पीस बनकर सामने आती है.

@बासु चटर्जी 'सारा आकाश,रजनीगंधा,छोटी-सी बात,चितचोर,दिल्लगी,खट्टा मीठा और कई बंगाली फिल्मों के निरेशक रहे हैं.उन्होंने दूरदर्शन के लिए भी 'ब्योमकेश बक्शी'जैसे लोकप्रिय धारावाहिक का भी निर्देशन किया है.श्री.चटर्जी हृषिकेश मुखर्जी सरीखे फिल्मकार हैं.इनकी फिल्मों की कथा मध्यवर्गीय समाज के जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों से अपना कथा-संसार रचती है.

@'सिनेमची' के इस पहले प्रयास का छात्रों ने जमकर उत्साहवर्धन किया. बातचीत सत्र में कल्चरल स्टडीज़ की शोधार्थी 'स्मृति सुमन' ने फिल्म के कई दृश्यों पर तफसील से अपनी बात रखी और यह नोट किया कि इस फिल्म की जान इसके कन्टेम्परेरी होने में है.इस फिल्म को आप कभी भी देखें आप इसके सामयिक सन्दर्भ सहज ही पकड़ लेंगे.वहीँ एक और छात्र ने कहा कि मैन कई कलाकारों को नहीं जानता पर इतना मालूम है कि ये सभी स्टेज के दिग्गज कलाकार हैं और इन सभी को एक साथ एक मंच/फिल्म में देखना वाकई काफी मजेदार रहा.(बाद में मुन्ना के पाण्डेय ने उनका परिचय फिल्म में दिखाए कलाकारों के नाम से कराया )फिल्म क्रिटिक और शोधार्थी मिहिर पंडया ने इस फिल्म के मूल प्रति ट्वेल्व एंग्री मैन का उदहारण देते हुए यह बताया कि 'अगर हम मूल फिल्म पर जायें तो बारह मर्द किरदारों का प्रयोग बताता है कि तब तक का पश्चिमी समाज जेंडर इश्यु से अछूता रहा,मिहिर ने अभय दुबे की पुस्तक 'आधुनिकता के आईने में दलित'के हवाले से इस फिल्म का दलित-प्रसंग भी उठाया.वही हिंदी कालेज के शिक्षक और समीक्षक संपादक डॉ.पल्लव ने इस मंच का स्वागत करते हुए यह कहा कि 'फिल्मों के साथ वृतचित्रों का भी प्रदर्शन होना चाहिए क्योंकि फिल्में तो फिर भी देखने को मिल जाती हैं.'उनकी बात का सभी ने स्वागत किया और यह सलाह मान ली गयी.अंत में हिन्दू कालेज के ही डॉ.रामेश्वर राय सर ने अपनी बात रखते हुए कहा कि फिल्म को या इसके निहितार्थ को समझने के लिए एक ख़ास भाषा की जरुरत है.और आने वाले समय में यह भी बच्चों में विकसित होगा,उन्होंने यह भी कहा कि कई बार पुरानी पीढ़ी एक सपना देखती है पर उसे पूरा नयी पीढ़ी करती है.साथ ही.उन्होंने विनम्रता से फिल्म क्रिटिक का अनुभव न होने के बावजूद फिल्म के कथ्य और किरदारों पर बड़ी सधी और सूक्ष्मता से अपनी बात रखी.कल का पूरा दिन सिनेमची के नींव रखे जाने के नाम रहा और एक अच्छी शुरुआत आधा काम आसान कर देगी.बाकी आप सभी के सहयोग की अपेक्षा भी है.ला फैकल्टी के शोधार्थी मनोज मीना हमारे नए सदस्य हैं और अगली फिल्म जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के उमाशंकर के सौजन्य से होगी,तब बाकी बातचीत उस फिल्म या डाक्यूमेंट्री पर.अलविदा.

12/17/10

भोजपुरी के सांस्कृतिक दूत-भिखारी ठाकुर


भिखारी ठाकुर भोजपुरिया साहित्य और समाज में बड़े आदर के साथ लिया जाता है.भोजपुरी लोकमंच पर यह भोजपुरी के शेक्सपियर और भारतेंदु के तौर पर याद किये जाते रहे हैं पर इतना कहना इनकी पूरी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं होगा.हाँ भारतेंदु की संज्ञा कुछ हद तक उचित जान पड़ती है.लेकिन शेक्सपियर कहे जाने का तर्क संभवतः उनके पद्यात्मक नाटक रहे हो.पर भिखारी ठाकुर में वह एक ख़ास किस्म की एलिट मानसिकता और भाषा का जमाव जो शेक्सपियर के नाटकों में देखने को मिलता है,नहीं है.अतः भारतेंदु के साथ तुलना की बात थोड़ी साम्य रखती है.दोनों ने ही जनता के दिलों पर राज किया.दोनों ही कागज़ के साथ मंच पर भी समान रूप से सक्रिय रहे.भिखारी ठाकुर के नाटकों का एक मजबूत पक्ष उनके स्त्री पात्र हैं.'बिदेसिया'की बिरहिनी नायिका की टेर उन लाखों भोजपुरियों की व्यथा-कथा है जो वर्षों से इस प्रांत की एक भयावह सच्चाई रही है.बिदेसिया पूर्वांचल के लोगों के उल्लास का नहीं बल्कि उन श्रमिकों की पीछे रह गयी ब्याहताओं की आंसुओं की लेखनी है,जो कमाने पूरब के तरफ कलकत्ता और असम गए.इन गिरमिटियों (अग्रीमेंट से बने भोजपुरिया अपभ्रंश अग्रिमेंटिया,कालान्तर में गिरमिटिया) की एक बड़ी फौज गन्ने के खेतों में काम करने के लिए फिजी,सूरीनाम,ब्रिटिश गुयाना.मारीशस,त्रिनिदाद आदि देशों अंग्रेजों द्वारा में ले जाई गयीं,बिदेसिया अपने जड़ों से कटे उन्ही १.५ करोड़ पुरबियों का मार्मिक बयान है,जिनका फिर आना तय नहीं था.एक अकेले इस नाटक ने भिखारी ठाकुर को एक बड़े कैनवास का विचारक रंगकर्मी बना दिया.भिखारी ठाकुर ने की 'पिया गईले कलकतवा हे सजनी'किसी भी श्रमिक समाज-संस्कृति में उन लाखों प्रोषित-पतिकाओं की पुकार है,जो साहित्य में कभी अद्दाहमान के सन्देश रासाक में तो कभी नागमती के रूप में जायसी के यहाँ आया हुआ है.
दूसरी सबसे महत्त्व की बात यह है की भिखारी ,जिन्होंने कायदे से कोई विद्यालयी शिक्षा नहीं पायी.उनके रंगकर्म का एक बड़ा हिस्सा न केवल लोकरंजन करता है बल्कि एक औपनिवेशिक समय में सामंती समाज के मध्य बड़े प्रखर शब्दों में लोकोपदेश का काम भी करता है.भिखारी के रंगकर्म का मूल तेवर अंततः समाज-सुधार के रास्ते पर आ जाता है और भिखारी नाम के इस लोक कलाकार का व्यक्तित्व वैश्विक होने लगता है.विश्व के किसी भी समाज में औरतें दुसरे दर्जे की नागरिक मानी जाती रही है,आज भी यह स्थिति कोई बहुत सुखद नहीं है.ऐसे में यह देखकर आश्चर्य होता है कि भिखारी के कलम और रंगकर्म का लगभग पिचहतर फीसदी औरतों के मनोविज्ञान,उनकी दुर्दशा पर दृष्टिगत हुआ है.बेटी-बियोग,बेटी बेचवा,गबरघिचोर,बिदेसिया की प्यारी सुंदरी,नशाखोर पति सभी का एक बड़ा हिस्सा स्त्रियों की दुर्दशा की बयानबाजी है.भारतीय रंगजगत में दूर-दूर तक aisa रंगकर्मी nazar नहीं aata जो अपने tamaam seemaaon के baaaajud itni paini और sukshm samvedansheel drishti इस aadhi aabaadi की or rakhta है.
भिखारी ठाकुर beesvi shatabdi के lokkalaakaar the.parantu unpar अपने paaraamparik moolyonm की भी chhaap thi.ve अपने paaraamparik moolyon के baawajood jadta के pairvikaar naa hokar prayaason में pragatisheel the.kabir की tarah naach mandli से jeewan yaapan और us मंच से kabir की ही bhaanti khule darbaar अपने kushal abhinay से,us jadtavaadi सामंती saamaaj को uska nakli chehra sabke saamne ले aate the,पर भिखारी का parivesh tab aisa नहीं था,जो wah us paristhiti से seedhe do-do haath karein, यह एक kootnitik chaturaaee की maang करता thaa और भिखारी jaisa कलाकार इस khel का maharathi था.आज jab भिखारी hamaare beech नहीं हैं tab उनके likhe,khele नाटक आज के naye vimarshon के मध्य और भी praasangik हो uthhe हैं.भिखारी ठाकुर का samay औपनिवेशिक समय था आज uttar औपनिवेशिक daur में भी भिखारी के uthaye prashn hamare samaaj में vidynmaan हैं.chaahe वह dalit varg के hon ya स्त्रियों का पक्ष.आज भी लाखों purabiye rozi-rozgaar के fer में आज dar-b-dar जाने को mazboor है.pahle यह kendra purab की or था आज dilli,panjaab,haryana,mumbaee और khaadi के देशों की or है,और इन shramikon की कोई alag जाति नहीं बल्कि sab एक ही maati की aulaadein हैं,ab पूरब के bete हैं.श्रमिक संस्कृति का इतना बड़ा chitera साहित्य में ही नहीं बल्कि रंगजगत में भी virla ही है.

8/2/10

भोजपुरी फिल्मों का 'अ-भोजपुरिया'सौंदर्यशास्त्र



आज भोजपुरी सिनेमा जगत अपने शवाब पर है.किलो के भाव फिल्में आ रही हैं,हज़ारों लोगों को काम मिल रहा है.कईयों को इस बात का मुगालता हो सकता है कि यह दौर भोजपुरी का स्वर्णिम दौर है.इसमें कोई दो राय नहीं कि यही वह समय है जब भोजपुरी ने बड़े कैनवास पर अपनी छाप उकेरी है,पर इस कैनवास पर आने की भेडचाल में वह अपनी स्वाभाविक चाल और राह दोनों से भटक गया अथवा भूल गया है.कहा जाता है कि रोम रातों-रात नहीं बसा था.वैसे भी किसी समाज,शहर,उद्योग को विकसित होने में एक लंबा समय लगता है.बेतरतीब और बिना प्लानिंग के बने,बसे शहर,समाज,उद्योग जल्द ही नारकीय स्थिति में आ जाने को अभिशप्त हो जाते हैं.आज भोजपुरिया समाज के लिए यह बेहतर बात है कि भोजपुरी फिल्मों का लगभग सूखा संसार लहलहाने लगा है,पर अब यह संसार अपनी स्वाभाविक गति को भूल चूका है,यह अब रपटीली राह पर चल रहा है.एक समय था कि यह फिल्में नोटिस में नहीं थीं पर अब जबकि इनको पहचान मिल चुकी है और इसका दर्शक-वर्ग और समुदाय बेहतर ढंग से निर्मित हो चला है फिर ऐसे में जरुरत अब इनके रंग बदलने की है वरना इनकी भी नियति उन अन्य क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों की तरह हो जाएगी,जिनकी चांदनी हिंदी सिनेमा के फार्मूलों के पद-चिन्हों पर चलके नष्ट हो गयीं.
अब भोजपुरी फिल्मों की समस्या इनके मेकिंग से ही जुडी नहीं है बल्कि इसके प्रस्तुति और कथ्य से भी जुडी हुई है.अपने उफान के इसी दौर में भोजपुरी सिनेमा के एक प्रबुद्ध वर्ग को गंभीर होना होगा.जो आने वाले समय में उसे एक सार्थक सिनेमा इंडस्ट्री के तौर पर स्थापित करने वाला होगा.मगर यह भी इतना आसान नहीं है.इस सिनेमा इंडस्ट्री में जिनका पैसा इन्वेस्ट हो रहा है उनमे कई राजनेता,सफेदपोश,और अब तक रेलवे या सड़क की ठेकेदारी करने वाले विशुद्ध व्यापारी लोग हैं जिनका प्रथम और अंतिम लक्ष्य येन-केन-प्रकारेण मुनाफ़ा कमाना है.हालांकि यह गठजोड़ अभी उजागर नहीं है.अपनी बोली से राग रखने वाले इस फर्क को बखूबी जानते हैं कि राकेश पाण्डेय अभिनीत 'बालम परदेसिया' और नयी फिल्म'हम बाहुबली'का बेसिक फर्क क्या है.यह सिर्फ दो फिल्मों की बात नहीं है यह तो मात्र उदाहरण हैं.भोजपुरी की नयी फिल्मों का बेसिक फर्क उनके टोन और जमीनी होने को लेकर है.एक समय का दौर परम्परागत टोन और स्वाद का है तो दूसरा अजनबियत से भरा नितांत बालीबुडिया तेवर का,जो भोजपुरी का एक मॉस दर्शक तैयार करने में असमर्थ हो जाती है.ऐसा नहीं है कि यह प्रभाव एकदम ही गलत है पर अपनी जड़ों से हटकर अतिशय प्रयोगधर्मिता इस दौर में और उचित नहीं यह भोजपुरी सिनेमा के जड़ों में मट्ठा डालते जाने सरीखा है.अब भोजपुरी सिने-जगत को एक नया तेवर देने की जरुरत है.एक नयी करवट लेने की जरुरत है,जिसका फलक वैश्विक हो.और यह बड़े-बड़े फिल्म समारोहों तक पहुंचकर अपनी छाप छोड़े.

यह वाकई काबिलेतारीफ है कि इस फिल्म जगत ने अपनी नींव पुख्ता करली है पर इस नींव को स्थायित्व तभी मिल सकेगा जब इसमें कुछ सार्थक,अर्थपूर्ण फिल्मों का भी निर्माण शुरू हो.यह अपनी माटी के जमीनी यथार्थ को इंगित करती हुई कुछ ऐसी फिल्में बनाये,जो इस भाषिक अंचल की गुंडा,दबंगई जैसी स्टीरियो टाईप इमेज से अलग हो जैसा कि अपने कम प्रभाव क्षेत्र के बावजूद बांग्ला,उडिया,मराठी,मलयाली आदि फिल्मों ने बनायीं है. यानी भोजपुरी सिनेमा जाने-अनजाने अपने लोक से कट रहा है.भोजपुरी सिनेमा पर बारीक नज़र रखने वाले भोजपुरी के युवा फिल्म समीक्षक अमितेश लिखते हैं"भोजपुरी सिनेमा में भोजपुरी समाज की समस्याओं,लोक-परंपरा,रीती-रिवाजों का चित्रण नहीं हो रहा है.भाषा को छोड़कर सबकुछ बाह्य प्रतिरोपित किया गया है.अगर इनका चित्रण होता भी है तो व्यावसायिक नजरिये से,जैसे पर्व के नाम पर होली या छठ का चित्रण....होली के चिरं से अश्लीलता दिखाने की छूट मिल जाती है.पलायन,दहेज़,भ्रूण हत्या,बेरोज़गारी इत्यादि भोजपुरी समाज की मुख्य समस्याएं हैं जिनको लेकर अच्छी फिल्में बनायीं जा सकती हैं पर इन सब पर किसका ध्यान है.ध्यान है सिर्फ अपराध पर,जिसमें अपराध और अपराधी को ग्लैमराईज किया जाता है"-एक युवा दर्शक/समीक्षक की यह चिंता जायज़ है क्योंकि यह चिंता भोजपुरी फिल्मों के उस बड़े समुदाय की भी है जिसने इधर देखना भी छोड़ दिया है.

तकरीबन एक ही ढर्रे की भोजपुरी फिल्मों की बाढ़ के बीच इसका निर्माता वर्ग यह भूल गया है कि बाढ़ की एक विशेषता या यूँ कहें असर होता है कि जब बाढ़ का पानी आता है तो अपने साथ ढेर सारा अवशिष्ट पदार्थ भी लेकर आता है.यह सभी अवांछित पदार्थ उतरते पानी के साथ वापस नहीं जाते बल्कि इधर-उधर के गड्ढों,नालों,चौरों में अटक जाते हैं और बाद में सडांध तथा बीमारी ही पैदा करते हैं.भोजपुरी फिल्मों की इस बाढ़ के बीच इस बात पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है कि रुपये सैकड़े प्रति भाव की आमद के बीच भोजपुरी फिल्में कब तक अपने मोहपाश से दर्शकों को बांधे रख सकेंगी ?कब तक दर्शकों को यह छलावा देती रहेंगी की हाँ यही है भोजपुरी का वह स्वर्णिम दौर?आश्चर्य है भोजपुरी का प्रबुद्ध वर्ग भी इस और से गंभीर चुप्पी साधे और आँखें मूंदे बैठा है.यह अत्यधिक खतरनाक स्थिति है कहीं ऐसा न हो की भोजपुरी फिल्मों की यह बाढ़ अपने पीछे ऐसा ही अवशिष्ट छोड़ जाये जिसे हम याद ना रखना चाहें या बेहतर यह हो कि अब हम भी'स्पर्श'कांजीवरम,जैपनीज वाईफ,जैसी क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों से कुछ सीखें और कुछ यादगार और सच्चे अर्थों में स्वर्णिम दें.यह अधिक मुश्किल नहीं है जरुरत भोजपुरी के अब प्रबुद्ध वर्ग के जागने और फिल्मकारों को जगाने की है बेशक सब ना सही कम से कम एक तो चिराग रोशन हो.अन्यथा भोजपुरिया फिल्मों का यह गढ़ा जा रहा 'अ-भोजपुरिया' सौंदर्यशास्त्र नासूर बन टीस देता रहेगा.

4/25/10

अमेरिकन लाठी का जोर(सीनाजोरी)और भारतीय आनंद जान की बदकिस्मती...


मशहूर फैशन डिजाईनर आनंद जान के केस के लूपहोल्स के बारे में मैंने अपने कुछ दिन पहले के पोस्ट में जिक्र किया था,कि किस तरह से अमेरिकन न्याय-व्यवस्था आनंद के मामले में दोहरा चरित्र अपना रही है और बिना उसके पक्ष को सुने-समझे सज़ा दे चुकी है.यहाँ तक कि जिस आनंद ने लाई डिटेक्टर तक पास कर लिया फिर इस स्थिति में भी उसे सज़ा किस आधार पर दे दी गयी,इतना ही नहीं जब juror missconduct होने की भी बात सामने थी ,तब जबकि रेप किट निगेटिव निकला,उस स्थिति में भारतीय फैशन डिजाईनर आनंद को जेल में अमेरिकन सिस्टम ने डालकर अपना छुपा हुआ नस्ली चेहरा उजागर किया.सबसे अफसोसजनक स्थिति हमारे भारतीय सरकार की है जिसने पता नहीं किस पिनक में इस केस को एक नज़र देखने की भी जेहमत नहीं उठाई.क्या उसके लिए हमारे होने (भारतीय नागरिक)के कोई मायने नहीं हैं या फिर हम केवल वोट बैंक या जातिवादी,धार्मिक चेहरे भर है,जिनका जब चाहे इन्ही कुछेक पैरामीटर्स पर हमेशा यूज कर लें?
आज के दैनिक भास्कर की खबर है- "अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने कहा है कि-इरान उन तीन अमेरिकियों को फ़ौरन रिहा करदे,जिन्हें नौ माह पहले उसने हिरासत में लिया था.इरान ने पिछले साल कुर्दिस्तान होते हुए पहुंचे शेन बाउर,जोस फैटल,और सराह सोर्ड को अवैध प्रवेश करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था.क्लिंटन ने कहा कि उनके परिजनों और बच्चों की शारीरिक और भावनात्मक हालात को लेकर हम चिंतित हैं"-वाह!कितने बढ़िया शब्द हैं ना-ये 'भावनात्मक और शारीरिक हालात?या फिर परिवार की दिक्कतें?हंसी आती है कि इन सबकी बात कौन कर रहा है.दरअसल अमेरिका अपनी ढपली और अपना ही राग शुरू से अलापता रहा है.और २०० वर्षों की मानसिक तथा शारीरिक गुलामी सहने के बाद भी सफ़ेद चमड़ी का प्रभाव हमारे भीतर से गया ही नहीं है.यह दादागिरी अमेरिका की ही नहीं बल्कि सभी पश्चिमी मुल्कों की रही है.कुछ समय पहले भी एक खबर थी कि जासूसी के आरोप में पकडे जाने के बाद भी मलेशिया से दो अमेरिकन पत्रकारों को खुद वहाँ के विदेश मंत्री लेकर गए.यह क्या है?क्या हम इसे अपने नागरिकों के लिए बाहर-भीतर दोनों जगहों पर खडा होकर उनके अच्छे-बुरे हर कामों को सही ठहराने की अमेरिकन कोशिश या संरक्षण,या दादगिरी है?शायद यही तो है,तभी तो याचक की भूमिका में खड़े हमारे देश की रहनुमाओं को इतनी आज़ादी नहीं मिल पा रही कि आनंद वाले केस के फेयर ट्रायल की ही बात ओबामा के आगे उठाया जाता.क्या वाकई अमेरिकन सत्ता इस हद तक हम पर,हमारे नेताओं पर हावी हैं?
चलिए अब कुछ हमारे देश के संस्कृति और व्यवहार की भी हो ही जाये.कहते हैं कि हम एक बहुत धनि साझी संस्कृति को लेकर च रहे हैं.प्राणियों पर दया ,जीव रक्षा,आदि आदि सिद्धांतों को मानते हैं.इतना ही नहीं 'वसुधैव कुटुम्बकम'का नारा देने वाला देश अपने पारिवारिक माडल के लिए भी दुनिया में माना जाता है.इतना रिच कल्चर,इतनी समृद्ध विरासत.सब कुछ फीलगुड.अमेरिका जैसे मुल्क को जिस पर दुनिया के कई छोटे-बड़े देशों पर हजारों जिंदगियों को हलाक़ कर देने का इलज़ाम है,औए इस इलज़ाम की नंगी सच्चाई हम सबने देखी है.वह मुल्क कहता है कि मेरे नागरिकों की गिरफ़्तारी से हम चिंतित हैं और मांग करते हैं कि उन्हें तुरंत रिहा किया जाये.क्योंकि उनके परिवार की भावनात्मक स्थिति को हम समझ रहे हैं.मेरा मानना है कि इसमें भी अमेरिका का कोई गणित होगा पर मुझे इससे क्या?इतना फीलगुड होने के बावजूद एक गलत काम के लिए हमारे एक भी नुमाईंदे ने विरोध का स्वर क्यों नहीं उठाया कि आनंद निर्दोष है,या फ्रेश ट्रायल करो,या ऐसा करना अमेरिका के लिए नैतिकता का भी प्रश्न है.अरे हम तो अपनी समृद्ध विरासत में अपने को दुनिया में सर्वोपरि मानते हैं कि हम विश्वगुरु थे/हैं या ..पता नहीं क्या क्या?फिर भी हमारे किसी नुमाईंदे को यह क्यों नहीं दिख रहा कि एक निर्दोष को जो अपने सिंगल मदर का इकलौता वारिस है,जिसकी एक ही अकेली बहन है.दोनों अपने भाई के लिए जी-जान से जुटी हुई हैं.उनके पक्ष में ही दो बात कह दिया जाये.?क्या दोनों माँ-बहन के लिए आनंद उनकी भावनात्मक जरुरत नहीं हैं?क्या आनंद की सदेह पारिवारिक उपस्थिति जरुरी उनके लिए?पर कौन देखता है इनकी आवाज़ को देखा-सुनता है.र्थोड़े से उम्मीद की किरण दिखते ही दोनों उधर की ओर बड़ी आशा से देखती हैं.पर नतीजा 'ढ़ाक के तीन पात'ही रहता है.आनंद सही में बहुत ख़राब किस्मत लेकर आया है जो ऐसे मुल्क में फंसा जहां चमक-दमक के बीछ नैतिकता नुक्कड़ से निकल भागी है कहीं दुबक गयी है.और उससे भी बड़ी बदकिस्मती उसकी ये है कि वह ऐसे देश में पैदा हुआ जहाँ की सरकार अपने छवि निर्माण के लिए अपने कितने ही मरते नागरिकों को उसी हालत में छोड़ देती है,क्योंकि हमारी सत्ता का मुख्य ध्येय येन-कें-प्रकारें सत्ता में जमे रहना है और इसमें वोट चाहिए तो अमेरिका के चरण रज भी.जो आजाद देश की सरकार किसी मुल्क से अपने नागरिकों के नागरिक हितों को नहीं देख सकती,उससे ज्यादा की क्या उम्मीद लगायी जाये.ऐसे में हजारों संजना जान,शशि अब्राहम इत्यादि ऐसे ही जेलों में बंद अपने निर्दोष और बेबस परिजनों की पीड़ा में घुलते रहेंगे क्योंकि भावनात्मक लगाव ,जरूरतें तो अमेरिका ने पेटेंट करा लिया है ना?हमारे शास्त्रों से,व्यवहारों से तो यह कब का कहीं चला गया.यह सिर्फ अमेरिकन लाठी का ही जोर है जहाँ हमारी सरकार भैंस के रूप में अपनी पूँछ दबाये.मिमियाने की मुद्रा में उनके सामने खड़ी है जो सिर्फ 'पागुर'कर सकती है इससे ज्यादा करने पर उसे अपने पैरों में 'छान'पड़ने का डर है.और सत्ता पक्ष के इस नपुंसकता की वजह से 'आनंद जान'जैसे निर्दोष लोग अपने इस तरह के मुल्क के वाशिंदे होने का मातम ही मनाते रहेंगे और उनकी माँ-बहनें सब ओर से हार कर तथाकथित भगवानों के अड्डे का रुख करेंगी और बदले में कोरी बातों,दिलासा के कुछ क्षणों,जीवन-मृत्यु के सिद्धांतों के अलावा क्या पा सकेंगी? हमारी सरकार की तो आवाज़ भी गिरवी रख दी गयी है शायद?क्या सही में न्याय मिलने की उम्मीद करना भूसे के ढेर से सुई ढूँढने के बराबर है?जब तक भारत सरकार के नुमाईन्दों का मोरल नहीं जागेगा तब तक तो आनंद के लिए न्याय रेत से पानी निकलने सरीखा ही है.आनंद जान के परिवार जो कुल जमा तीन लोगों(आनंद खुद,उसकी माँ शशि अब्राहम और एक बहन संजना जान)का छोटा सा कुनबा है कि भारत सरकार से बस इतनी मांग है कि एक बार तो इस केस को देख लें.क्योंकि इसमें कुछ भी पाक-साफ नहीं है,सब कुछ सही नहीं चल रहा है है.संजना को कौन समझये हमारे राजा लोग 'twittering'और 'ipl'से छूटे तब तो कुछ काम करें.वह तो खुद काजल की कोठरी में बैठे लोग है-ऊपर से नीचे तक,भीतर तक काले.आनंद अभिशप्त है अपने ऊपर हुए इस जुल्म को मौन रहके झेलने को.अब तो उसके माँ की आँखों का पानी भी रीतने लगा है.क्या वाकई सत्यमेव जयते होता है,या हमारे समय का यह चालू जुमला हो चला है.आनंद जान के लिए मेरी उम्मीदें अभी भी उतनी ही शिद्दत से बरक़रार है जितनी पहले थी.एक भीतरी आवाज़ है जो कहती है उसको न्याय मिलेगा.पर कब. यह कौन बताएगा?

4/24/10

आसमान में हिस्सेदारी की कवायद (मरते आदिवासी)*(मनोज कुमार 'तपस')



विकास की अंधी दौड़ के कारण हज़ारों आदिवासी बदहाली के शिकार होते जा रहे हैं.हालात यह है कि आदिवासियों के पास मूलभूत सुविधायें तक नहीं हैं और इन्हें सरेआम मारा जा रहा है.हर बार माओवादियों का मुद्दा उठते ही आदिवासियों का सवाल सामने आता है और सता के गड़रिये माओवादियों को हांकने के नाम पर विकल्पहीन आदिवासियों के खिलाफ क्रूरता की सारी हदें लांघने लगते हैं.इसका परिणाम यह होता है कि माओवादी और आदिवासी ,जो इन गड़रियों के इन नीतियों के शिकार हैं,एक होने लगते हैं और सत्ता दोनों को एक ही समझ बैठती है.दरअसल इस तथ्य को समझने की जरुरत है कि ऐसा क्यों होता है अथवा होता ही रहा है?इसे समझने के लिए हम उत्तर प्रदेश के सोनभद्र इलाके को लेते हैं.सोनभद्र उत्तर प्रदेश का दक्षिणी-पूर्वी अंतिम जिला है जो विकास के नाम पर पिछले ६० सालों में बार-बार छला और ठगा गया.इस जिले में वैसे तो सब कुछ है,जल,जंगल,ज़मीन.चार राज्यों को छूता हुआ यह जिला वैसे तो औद्योगिक रूप से विकासशील कहा जा सकता है,लेकिन इस औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ के कारण इस इलाके में रहने वाले आदिवासी रोजाना जिस तरह से मर रहे हैं,वह सब औद्योगिक विकास के बेहतर बढ़त और सरकारी उपेक्षा एवं अदूरदर्शिता का ही नमूना है.इस क्षेत्र में ntpc की बिजली परियोजनाएं 'सिंगरौली'और 'रिहंद',यूपी थर्मल पावर कारपोरेशन की बिजली परियोजनाएं अनपरा,ओबरा,हिंडाल्को की रेनुकूट बिजली परियोजना,रिहंद बाँध की जल-विद्युत परियोजना हाईटेक कार्बन,जेपी समूह की सीमेंट परियोजना और कनोड़िया केमिकल्स शामिल हैं.इन उद्योगों से निकलने वाला जहरीला रसायन जितनी तेजी से इस क्षेत्र को बंजर बना रहा है उससे साफ़ जाहिर है कि आने वाले १०-१५ सालों में यह क्षेत्र रहने के काबिल नहीं रह जायेगा.वैसे भी यह प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है और इसका प्रभाव सबसे ज्यादा इस इलाके के आदिवासियों पर पड़ रहा है.पीने तक का पानी प्रदूषित हो चूका है,यदि यही विकास का चरण है तो हमें ऐसा विकास भी नहीं चाहिए जो गरीब आदिवासियों की ज़िन्दगी लेकर हासिल की जाए.
इस प्रकार के विकास का परिणाम यह हुआ है कि आदिवासी समाज अपनी वस्तु-स्थिति से चिंतित होकर मुख्यधारा से और अधिक कटने लगा है.इन सब स्थितियों का लाभ 'लाल सलाम'जैसे संगठनों ने उठाया है,झूठे प्रलोभनों और बेहतर भविष्य के नाम पर सत्ता और माओवादियों ने इन्हें छला और अपना उल्लू सीधा किया है.यह स्थिति किसी एक इलाके की नहीं है बल्कि हर उस राज्य की है जहां माओवादी सक्रिय हैं.नक्सलबाड़ी तो बस एक आरंभिक बिंदु है.सच्चाई यह है कि सन १९६७ से शुरू हुआ नक्सलबाड़ी आन्दोलन लगभग १२ राज्यों में अपना पैर पसार चुका है.सरकारी नीतियों के सही तरीके से लागू ना होने के कारण ही ऐसी स्थितियां बराबर जन्म लेती रही हैं.नेहरु ने उद्योगों को आधुनिक भारत का मंदिर कहा था लेकिन उन्हें इस बात की भनक नहीं थी कि उनका विकासवादी माडल आधुनिक भारत के लिए गले की फांस बन जायेगा.उद्योगों की स्थापना और विकास के खिलाफ आदिवासी नहीं हैं,बल्कि वह इस बात का विरोध कर रहे हैं कि आदिवासियों की कीमत पर हो रहे विकास को बंद किया जाये और उनकी जमीनें उनसे छीनकर उन्हें उनके ही घर से रातों-रात बेदखल ना किया जाये.इस प्रकार के विकास से आये दिन नए-नए सिंगुर और नंदीग्रामों का जन्म हो रहा है.मान लीजिये टाटा या अम्बानी साहब किसी इलाके में कोई फैक्ट्री ही बिठाते हैं तो उसका लाभ गरीब आदिवासियों को नहीं मिलने वाला है.तथाकथित सस्ती कार(नैनों) या मोबाईल का किसी आदिवासी के लिए कोई मायने नहीं रखता,जबकि उनकी पहली समस्या पेट से शुरू होती है और अंतिम समस्या के रूप में वहीँ ख़त्म भी.ऐसा नहीं है कि भारत के वज़ीरेआज़म डॉ.मनमोहन सिंह इन तथ्यों से अवगत नहीं हैं लेकिन राजनीति और कारपोरेट जगत के गठबंधन इस कदर मजबूत हो चुका है कि आदिवासियों की मौतों से भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है.नक्सलवादी इन्ही वस्तुस्थितियों से लाभ उठाने में लगे हुए हैं.पश्चिमी बंगाल के उत्तरी छोर के जिले दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी आन्दोलन के मायने तो काफी पहले ही बदल चुके हैं,माओ की विचारधारा को ढ़ोने के नाम पर आज के माओवादी उसकी सड़ चुकी लाश को ढ़ो रहे हैं.लेनिन की आत्मा तो दंतेवाड़ा के बाद क्षत-विक्षत हो चुकी है.क्रांति के नाम पर अर्धसैनिक बलों को घेरकर मारने से पहले लाल सलाम के बुद्धिजीवियों को सोचना चाहिए था कि मरने वाले भी उन्ही की तरह आम आदमी थे,जो अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए जंगलों की ख़ाक छान रहे थे.फिर ऐसी क्रांति और कारपोरेट जगत की विकासवादी प्रक्रिया में कोई फर्क नहीं है दोनों ही आम आदमी के सहारे अपनी दाल गला रहे हैं.
भारत के भूमि-सुधर आन्दोलन की तरफ ध्यान दीजिये इससे यह बात बिलकुल साफ़ हो जाएगी कि गरीब आदिवासियों को सपना दिखाकर शुरू से लेकर आजतक हर जगह छला ही जा रहा है.आदिवासी समाज मुख्यधारा से कटा हुआ था,वह आरम्भ से ही जल,जगल,जमीन पर आश्रित था.आज भी उनकी मूल मांगें वही हैं-अपना जंगल,अपनी जमीन.जिसे सरकार विकासवादी चश्मे के भीतर से नहीं देख पा रही है.अंधी आँखों का देखा विकास का रास्ता किस ओर जाएगा इसकी कल्पना अब मूर्त होने लगी है.जह्र्खंड में आदिवासियों से आदिवासी होने का प्रमाण माँगा जा रहा है,वहाँ वही लोग आदिवासी हैं जो झारखण्ड में १९३१ की जनगणना में चिन्हित हैं.जिनके पास इस बात का सबूत नहीं है,वे सरकारी तौर पर आदिवासी नहीं हैं और इन वनवासियों को, जिनका सब कुछ जल,जंगल,जमीन से ही है,बाहर भगाया जा रहा है.उनकी ही जमीनों से बेदखल किया जा रहा है.इस आधार पर उनके संसाधनों को छीनने की कोशिश प्रदेश सरकार लगातार करती रही है.जिस समाज की आधे से अधिक आबादी निरक्षर है जिनके पास अपनी जमीनों के पट्टों के दस्तावेज़ नहीं हैं उन्हें उनकी जमीन से बेदखल करना दुनिया के किसी भी लोक-कल्याणकारी राज्य के लिए उचित नहीं है.बहुराष्ट्रीय निगमों को कारखाने की जगह किसीका हक़ मार कर देना नैतिकता का गला घोंटने के बराबर है.आदिवासी समाज जिस तरह के जीवनयापन वाला समाज है,वहाँ उसे पीने के लिए कोक,पेप्सी और मिनरल नहीं चाहिए उसे साफ़ स्वच्छ साधारण पानी की जरुरत है जिसे वह गर्मियों में जंगलों के बीच से बहने वाली सूख गयी नदियों के रेत को निकाल-निकाल कर कमर तक अन्दर धंसकर जमा करने की कोशिश करता है ताकि वह और उसका कुनबा ज़िंदा रह सकने की प्राथमिक शर्त पूरी कर सके.जरुरत इसी बात की भी होती कि उन्हें इस तरह के कष्टों से निजात दिलाएं.इतना ही नहीं उसे शिक्षित करने की जरुरत है,पर इसके लिए जिस ईमानदार एप्रोच की जरुरत है वह किस फाईल में दबी है?जगलों को काटकर उनका विकास संभव नहीं है,उन्हें स्कूल-कालेजों की जरुरत है,सड़क-बिजली की जरुरत है पर उनके अरमानों की लाश और विस्थापन की ज़मीन पर नहीं.
एक तरफ आदिवासियों के पास जीवन जीने की बुनियादी सुविधायें तक नहीं हैं और दूसरी तरफ इसकी आड़ में नक्सली इसका लाभ उठाकर अपने असामाजिक कामों को इनके हितों से जोड़कर इन्हें भी सत्ता के सामने मरने को एक शरीर बनने पर मजबूर कर रहे हैं.शासन को इन विसंगतियों को समझने की जरुरत है,जब तक इनका जीवन का और मानसिक विकास नहीं होगा तब तक नक्सली इन्हें अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते रहेंगे.इतना ही नहीं सरकार को भी अपने पूंजीपति मित्रों को इन वनवासियों की जमीनों को हड़पने में परदे के पीछे से ही सही मदद देना बंद करने होगा.आखिर ये पूरा कुनबा हमारे ही देश का तो हैं.इन सभी मुद्दों से सरकारी अमला पूरी तरह वाकिफ है लेकिन जब भी इन विसंगतियों को दूर करने की बात उठती है तो सरकार को इनसे बड़ी,माओवादियों की समस्या ही लगती है.माओवाद एक समस्या हो सकती है लेकिन क्या आदिवासी बहुल दुर्गम इलाकों में सड़क,पानी,बिजली की समस्या नहीं है.एक तरफ राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर सरकार के पास १००.००० करोड़ का बजट खर्च करने को है,लेकिन वहीँ आदिवासी इलाकों के विकास के मुद्दे पर सीमित संसाधनों का रोना रोया जाने लगता है. यह मात्र एक तथ्य नहीं है कि केवल २% आदिवासी ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं,बल्कि शर्मनाक हकीकत भी है.एक तरफ एमिटी,शारदा जैसे कारपोरेट विश्वविद्यालय बनाये जा रहे हैं जिन्हें करोड़ों की सब्सिडी दी जा रही है,वहाँ पढने वाके छात्रों में १%का दसवां हिस्सा भी इस तबके का नहीं है.आदिवासियों की बात तो छोड़ ही दीजिये एक आम भारतीय का बच्चा यहाँ दाखिला नहीं पा सकता.एमिटी में एमबीए की फीस १४ लाख रुपये हैं.ऐसे में यह अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है कि जिस सरकारी कर्मचारी की महीने की कुल आमदनी ही १०,००० के आसपास होती है वह पहले मकान का किराया,राशन,मेडिकल सुविधाओं को देखेगा या १४ लाख के सेमेस्टर फीस को.ऐसे में इसी परिस्थिति में एक असंतुष्ट पीढ़ी के पनपने का बीज पड़ जाता है.एक तरफ उन्हें शिक्षित करने की जगह शिक्षा का व्यवसायीकरण करके आम भारतीयों को शिक्षण संस्थानों से दूर करने की कोशिश हमारी समझ से बाहर है.यदि हमारे मानव संसाधन विकास मंत्री इन तथ्यों पर रोशनी डाल सकें तो यह पहेली सुलझ जाती शायद ?
इस देश में हजारों ऐसे कालाहांडी हैं जहां एक औसत आदमी जिंदगी भर भरपेट खाना खाने का सपना ही देखता रह जाता है.वहीँ आदिवासियों के लिए तो यह सपने से भी परे बात है.भूख से मरते हुए आदिवासी यदि अपने स्वार्थ (सुअर्थ)के लिए किसी से जुड़ भी जाते हैं तो आप उन्हें नक्सली बना कर गोली मार दें ऐसा दुनिया के किसी भी संविधान में नहीं लिखा हुआ है.कायदे से उन लूप होलों की ओर देखने की जरुरत अधिक है जहाँ जो थोड़ी बहुत सुविधाएं(मेडिकल,अनाज,पैसा आदि)इन नक्सलियों ने अपने हितों की खातिर इन तक पहुंचाई,उस तक कोई कोई सरकारी कारिन्दा क्यों नहीं पहुँच पाया?माननीय गृहमंत्री जी,मयूरभंज का इलाका जो जंगली और आदिवासी बहुल था,वहां से आदिवासियों को क्यों भगाया जा रहा है?क्या जीने का बुनियादी अधिकार जो प्रकृति ने इन्हें दिया है,उसे इनसे छीनकर या फिर इन्हें उजाड़ कर आप और आपकी सरकार क्या प्राप्त करना चाहती है?जंगल काटने से माओवादी साफ़ नहीं होने वाले हैं और वैसे भी आप इसी आड़ में खनिजों पर नज़र गडाए हुए हैं जिसका सौदा आपकी सरकार बहुत पहले ही कर चुकी है,माओवाद तो बस रास्ते को साफ़ करने का ज्यादा और ज्यादा खड़ा किया हौवा है.यदि उस सौदे का १०%हिस्सा भी विस्थापित आदिवासियों को बसाने के लिए खर्च किया गया होता तो आज ग्रीनहंट के नाम पर करोड़ों रुपये खर्चने की नौबत नहीं आती.उन ७८ जवानों की मौत का कारण सीधे तौर पर कोई आदिवासी नहीं है.बल्कि सरकारी अदूरदर्शिता है,ग्रीनहंट के द्वारा आप उस लाल कारीडोर को और गहरा बनाने पर तुले हैं.पहले तो एक पाकिस्तान बन ही चुका है और कितने पकिस्तान बनाये जायेंगे?एक तरफ देश की अर्थव्यवस्था सुधारने के नाम पर हजारों लाखों टन अनाज गोदामों में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है और दूसरी तरफ गरीब आदिवासी अपने बच्चों को बेचने पर मजबूर हैं.बावजूद आप कहते हैं कि ये ही नक्सली हैं? खाली पेट विचारधारा नहीं पनपती.भूख में तनी हुई मुट्ठी कभी क्रांति की प्रतीक हुआ करती थी अब वह क्रांति का प्रतीक नहीं है.जो लोग खड़े भी नहीं हो सकते और जिनके प्राण निकालने से पहले खुद यमराज(यदि मृत्यु का यह देवता कहीं एक्जिस्ट करता है,लेखक को वैसे इसके मूर्त रूप पर न भरोसा था न है)भी शर्मा जाये उन्हें आप नक्सली घोषित कर रहे हैं?नक्सली जमात का चिल्ल-पों मचाकर सरकार सीधे-सीधे अपनी नीतियों की असफलता से मुंह मोड़ रही है.जिस पर कायदे से विचार करने की जरुरत है.दूसरी बात,लाल कारीडोर के नाम पर जिन इलाकों को चिन्हित किया गया है,वह सब एक सोची-समझी-रची गयी साज़िश का हिस्सा है.इसमें सरकारी तंत्र से लेकर कारपोरेट घराने तक शामिल हैं.ध्यान दीजिये जिन इलाकों से यह लाल गलियारा गुजरता है,उन इलाकों में अकूत प्राकृतिक संसाधन है.इन संसाधनों के दोहन के लिए सरकार और देसी-विदेशी कंपनियों से सरकारी समझौता हो चुका है,लेकिन सवाल इन इलाकों के संसाधनों के दोहन से पहले इन्हें खाली कराने का भी है.आखिर विस्थापितों की जिम्मेदारी कौन ले?न तो इसके लिए सरकार तैयार है न औद्योगिक घराने जिनके लिए मुनाफा ही प्रमुख मुद्दा है.यदि बलपूर्वक इन इलाकों को खाली करा भी लिया जाये तो विरोध की गुंजाईश भी कम नहीं है जो हमें दिख भी रहा है.आदिवासी इसी का विरोध कर रहे है.क्योंकि इसं गलियारे के अधिकतर क्षेत्र आदिवासी बहुल हैं.
आज़ादी के सवा छः दशक गुज़र जाने के बाद भी जिन आदिवासियों को अपनी राष्ट्रीयता सिद्ध करने के लिए पहचान-पत्र की जरुरत है वहां विरोध नहीं होगा तो क्या होगा?जिन ठठरियों पर मांस नहीं है और जो राईफल का भार भी सहन नहीं कर सकते,वह भला बुलेट का धक्का कैसे सहेंगे? विकास की नैतिकता को जब तक अमल में नहीं लाया जायेगा,तब तक दंतेवाडा जैसे दुष्कांड होते रहेंगे और व्यवस्था सारा दोष गरीब आदिवासियों पर डाल कर उन्हें नक्सली घोषित करती रहेगी और अपना छुपा हुआ हित साधती रहेंगी.क्रांति का रंग लाल कभी होता था,उसे अब पानी नीली पगड़ी के रंग में रंगिये,तभी सारा आसमान सबका होगा.लड़ाई आसमान की ही तो है जहाँ सबको अपनी छत चाहिए और प्रकृति ने यह हक़ नहीं दिया किसीको कि कोई किसी का आसमान उससे छीने.मनुष्य के लाशों की नींव पर विकास की इमारत नहीं खड़ी होनी चाहिए,जाने-अनजाने यही हो रहा है.(मनोज कुमार 'तपस'mobile-09891271275)

तुम्हें जन्मदिन मुबारक हो-खाली पेट मुस्कान से.


मैं जानता हूँ,सचिन.
आज तुम्हारा जन्मदिन है.
बहुत बधाईयाँ मिलेंगी तुम्हें,
यहाँ,वहाँ इधर उधर से भी /
पर वह दुआएं नहीं पहुँच पाएंगी तुम तक
जिनको दिन भर के मर-खपने के बाद भी
एक अदद सौ का नोट नहीं मिल पाता
जिन घरों में बच्चों को गीला भात
नमक-हल्दी मिलकर खिला दिया जाता है
और औरतों को पेट बाँध सोने की आदत होती है.
किसी ढंग की जगह ...पर
उन्होंने तुम्हें खेलता देखा होता हैऔर
इन सभी परेशानियों में भी
तुम उनके चेहरे पे मुस्कान का सबब बन जाते हो.
जन्मदिन तुम्हें मुबारक हो ..
मैं यह झूठ नहीं कहूँगा तुमसे कि
तुम जियो हजारों साल,
मुझे पाता है यह संभव नहीं.
हाँ यह कहूँगा अगर
तुम्हारे चौके-छक्के से लोग भुखमरी भूल मुस्कराते हैं
तो 'प्यारे सचिन'इस जन्मदिन पर यह करो
कि इनकी यह मुस्कान कायम रहे
क्योंकि जिस मुस्कान के पीछे तुम्हारा खेल है
कमबख्त सरकार उसे अपनी नीतियों की सफलता कहती है.
और इस पर तुम्हारा जोर नहीं है
तुम बस अपना काम किये जाओ काम किये जाओ·

4/19/10

अब चौथा रंगमंच-मचान (यानि "पड़ोस का रंगमंच")


एक समय रंगजगत पर बादल सरकार ने तीसरे रंगमंच से रंगजगत का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया था.पर हमारे इस चौथे किस्म के रंगमंच का आधार कोई थ्योरी नहीं है बल्कि नाटी-प्रदर्शन का एक अनूठा प्रेक्षागृह है.यह 'मचान'थियेटर है यानी terrace theatre /theatre on rooftop .सन २००८ के अप्रैल माह में २६-२७ तारीख को पटना शहर के बुजुर्ग और सम्मानित नाटककार डॉ.चतुर्भुज ने इस मचान थियेटर का उदघाटन किया था.और इस 'मचान'की पहली नाट्य-प्रस्तुति थी-'अकेली औरत'.तब से लेकर हर महीने नाटकों और गीत-संगीत की प्रस्तुति के साथ फिल्मों के विशेष शो का आयोजन 'मचान' का हिस्सा बन चुका है.अब तो 'मचान फेस्टिवल'से मचान ने पटना शहर में अपनी एक अनूठी पहचान बना ली है.इस मंच की सबसे अनोखी बात इससे आस-पास के लोगों का जुड़ाव है.श्रीकृष्ण नगर और आसपास के लोगों,विशेषकर महिलाओं और बच्चों की मचान-कार्यक्रम में भागीदारी ने इसे'पड़ोस के रंगमंच'का रूप दे दिया है.इसके प्रत्येक आयोजन में स्थानीय स्तर पर लोगों की बढती भागीदारी और 'मचान' के प्रबंधन में उनकी दिलचस्पी से एक बात पता चलती है कि बेहतरीन कला-प्रदर्शन के लिए गलियों और मोहल्लों के स्तर पर संसाधन विकसित किये जाने चाहिए.पटना शहर की इतनी बड़ी आबादी जो घरों में कैद होकर केवल टीवी को अपने मनोरंजन का माध्यम बना चुकी है,उनकी उनकी आपसी-सामुदायिक भागीदारी एक स्वस्थ और सुसंस्कृत समाज के बनने में सहायक सिद्ध हो सकती है.प्रश्न है कि 'क्या "मचान" जैसा आयोजन शहर के अलग-अलग हिस्सों में नहीं हो सकता?'-शहर के एक बड़े शिक्षाविद ने यह आशंका जताई है कि कहीं'मचान'अपवाद ना बन जाये,यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा.हालांकि शहर में विशाल नाट्य मंच,निर्माण कला-मंच,हज्जू म्यूजिकल थियेटर-जैसी कुछ ऐसी नाट्य-संस्थाएं रही हैं,जो स्थानीय बस्ती के बच्चों को लेकर उन्हीं के बीच नाटकों की प्रस्तुति करती रही हैं.लेकिन यह तो जरुर है कि,'मचान'जैसे रंगमंचीय स्पेस का प्रयोग बिल्कुल नई और अनोखी परिकल्पना है,जिसके सन्दर्भ में यह संभवतः देश में ही एक अपवाद है.इसलिए जो कला-साहित्य-संस्कृति-कर्म से जुड़े मित्र हैं,या जो चाहते हैं कि उनके घर में और उनके आसपास एक स्वस्थ-सांस्कृतिक परिवेश हो,वे शहर में अलग-अलग (चाहे वह शहर किसी भी भाषा-प्रान्त के हों)स्थलों पर'सांस्कृतिक स्पेस'रचने का कष्ट उठाने के लिए कमर कसें और पहल करें,अपने अन्य मित्रों-पड़ोसियों की मदद से,तब शायद कुछ फर्क पड़ेगा,यही 'मचान' का उद्देश्य है.
'मचान'की परिकल्पना को मूर्त रूप देने वालों में प्रख्यात रंगकर्मी डॉ.जावेद अख्तर खान, परवेज़ अख्तर,मोना झा आदि लोग रहे हैं.दरसल 'मचान'दो स्टारों पर कार्य करता है.पहला इसका रंगमंचीय पक्ष है तो दूसरा मुखर-सामाजिक पक्ष.'मचान'सामाजिक पक्ष के दो बेहद खूबसूरत बातें आपको बता दूं.पहली तो यह कि जब बिहार में अगस्त माह में कुसहा बाँध के टूटने से कोसी ने जो तबाही महाई थी उसके लिए श्रीकृष्ण नगर पटना के लोगों ने 'मचान'के नेतृत्व में दस दिनों तक अनथक-जी-तोड़ मेहनत करके पटना के ४०० परिवारों के २००० लोगों तथा देश-विदेश से जुड़कर'श्रीकृष्ण नगर बाढ़ राहत सामग्री संग्रहण केंद्र'में जमा किया तथा लगभग २० टन खाद्य-सामग्री और दूसरे आवश्यक सामानों से भरे ट्रक के साथ कालोनी के ७ लोग जिनमें दो स्थानीय महिलाएं भी शामिल थीं,अररिया राहत पहुँचाने गयीं.इस प्रयास को देखने प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर भी देखने आयीं.
दूसरा वाकया नवम्बर 2008 के मुम्बई की घटना पर यहाँ के लोगों की पहलकदमी और प्रतिक्रया से जुड़ा है.स्थानीय वार्ड-पार्षद,मिथिलेश जी के मदद से रोड नंबर-21 के मैदान में बड़ी संख्या में एकत्र होकर आतंकी हमले में मारे गए लोगों-शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी गयी.आसपास मुहल्लों के लोगों ने अपने-अपने घरों से मोमबत्तियां लाई और घंटों खड़े होकर जज्बे को व्यक्त किया,दरअसल यह मचान-कार्यक्रम में स्थानीय भागीदारी का ही एक अत्यंत मुखर-सामाजिक पक्ष था.बहरहाल,
जनाब परवेज़ अख्तर,जावेद अख्तर और मोना झा का अपना नाट्य-ग्रुप है-नटमंडप.इस प्रबुद्ध रंगकर्मियों से 'मचान' के उनके अपने अनुभव के बारे में पूछने पर-"हमर अपना 'मचान' का अनुभव क्या है?यदि श्रीकृष्ण नगर ,रोड न.-२१ के सावित्री सदन(वैसे इस सदन के नेमप्लेट पर इसका नाम लिखा है-शावित्री सदन)के राजीव-रंजन,उनकी माताजी श्रीमती सावित्री शर्मा,और उनकी पत्नी श्रीमती जयश्री ने अपनी निजी छत एवं अन्य'स्पेस'के हर तरह के इस्तेमाल करने की पूरी छूट न दी होती तो यह 'परिकल्पना'कभी साकार नहीं हो पाती और यदि होती भी तो उसका जो स्वरुप होता,वह'मचान' नहीं होता.पटना शहर में ऐसे कितने गृहस्वामी हैं?अगर नहीं हैं,तो क्यों नहीं हैं?क्या ऐसे गृहस्वामी भी अपवाद हैं?क्या ऐसे एक अकेले उदाहरण से हम अपने समाज की संस्कृति को बदल सकते हैं?लेकिन इन सवालों के जवाब से पहले कुछ और चर्चा जरुरी है.ऐसा नहीं है कि,कुछ और लोग इस प्रक्रिया से नहीं जुड़े.इसी मोहल्ले के रोड नंबर-२३ के ठाकुर जी और उनका परिवार,पूनम जी और अंजनी जी,रोड नंबर-२२ के संजय जी,रोड नंबर -२१ के ही आलोक(मंटू जी),जीतेन्द्र जी,पिंटू और गौरव जो कालेज के छात्र हैं,या फिर रोड नंबर-१४ के रवि जी और अजित जी ये कुछ ऐसे नाम हैं,जिनके बिना अब किसी मचान-कार्यक्रम का आयोजन संभव नहीं है,यह एक दिन का चमत्कार नहीं बल्कि सतत प्रयासों का फल है.'मचान'के पूरे 'स्पेस'को साफ़-सुथरा रखने,खुली छत का 'रंगमंचीय स्पेस'रचने,भरी-भरकम परदे टांगने,दर्शकों को बैठाने औरनीचे'एक्जीबिशन की तयारी में यही उत्साही लोग आते हैं.
अब धीरे-धीरे बाहर के रंगमंच-विशेषज्ञों पर निर्भरता कम हो चली है और'मचान'पूरी तरह स्थानीय भागीदारी वाला सामुदायिक रंगमंच बन रहा है.लेकिन इतना होने के बावजूद अब भी स्थानीय लोगों में व्यापक उदासीनता है,अब भी लोग पूरी तरह आयोजन का हिस्सा नहीं बन पा रहे हैं,अब भी लोगों की चिंता का विषय गंभीर कला-संस्कृति-कर्म नहीं है,अब भी लोग घर से बाहर निकलकर कोई सामुदायिक भागीदारी वाली पहल लेने के मामले में आलसी-संकोची और दब्बू हैं,मचान जैसे प्रयास अगर बंद भी हो जाये,तो ऐसे लोगों को कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा.पर 'अख्तर बंधुओं के इस चिंता को क्या कहा जाये जो वाजिब भी है और इस समाज में हमेशा से उपस्थित भी.पर ख़ुशी की बात यह हैं कि 'मचान फेस्टिवल'इस साल भी जबरदस्त रहा,मचान में लोगों का खूब जुटान हुआ.पटना की रंग-संस्कृति निःसंदेह 'मचान'के आने से धनी हुई है जिसका भविष्य उज्जवल है और जो आगे चल कर संभव है कि पूरे देश में रंगमंच को सामजिक सरोकारों के कामों से जोड़कर एक नयी इबारत लिखे.फिलहाल पटना में यह इबारत दिनों-दिन लिखी जा रही है.'मचान' के साथियों को हमारा सलाम .....


मचान का पता-डॉ.जावेद अख्तर खान
सावित्री सदन,मकान नंबर-१२०,रोड नंबर-२१,
श्रीकृष्ण नगर,पटना-१
फोन/मोबाईल-०६१२-२५२२०८१/२५३५८०४,०९८३५४८६७२१/०९४३१४४२२३९
(मचान,नटमंडप,पटना का आयोजन है)

प्रेम का इस्तीफा..(मनोज तापस की कविता)


हाँ !
मुन्ना भाई,
आप ठीक कहते हैं-
प्रेम से इस्तीफा नहीं दिया जा सकता.
कमबख्त इस कलम से जब भी,
प्रेम का इस्तीफा लिखने बैठता हूँ.
तो लिख बैठता हूँ,प्रेम पत्र.
कभी-कभी मन करता है,
ढेर सारी गालियाँ लिख पोस्ट कर दूँ उस पते पर,
लेकिन लिख बैठता हूँ,प्रेम कविता फिर.

कल बहुत इत्मीनान से सोच रहा था,
छत पर बैठकर कि,तीन बार तलाक कहकर
उससे पीछा छुड़ा लूँगा,
लेकिन जैसे ही गली के नुक्कड़ पर वह मिली.
मैं फिर उन्हीं तीन शब्दों में कर बैठा 'इज़हार-ए-मोहब्बत'
मुआमला-ए-इश्क फिर उसी मुकाम पर आ गया
आखिर तमाम हमलों के बीच भी
मैं सोच रहा हूँ अब
सही में इश्क पर जोर नहीं होता....

***(मनोज कुमार 'तापस' ,दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में'समकालीन हिंदी कविता और दिल्ली की युवा छात्र कविता'विषय पर शोधरत हैं तथा साथ ही,डीयू के ही शहीद भगत सिंह कालेज/प्रातः/में तदर्थ प्रवक्ता हैं.संपर्क-९८९१२७१२७५)

4/16/10

लोक कवि महेंद्र शास्त्री-जन्मदिवस विशेष



भोजपुरी लेखकों में महेंद्र शास्त्री का नाम महत्वपूर्ण है.वे भोजपुरी के आरंभिक उन्नायकों में से थे.उन्होंने भोजपुरी -लेखन और आन्दोलन -दोनों ही क्षेत्रों में काम किया.उन्होंने हिंदी में भी लिखा है परन्तु उनका श्रेष्ठ लेखन भोजपुरी में ही आया.उनका मूल्यांकन करते हुए नंदकिशोर नवल ने ठीक ही लिखा है कि "किसी भी हिंदी कवी में न तो उन जैसी सूक्ष्म सामाजिक चेतना है,न सामाजिक जीवन को बारीकी से चित्रित करने की उन जैसी क्षमता.उनका कृतित्व निःसंदेह इस शताब्दी के उत्तर भारत के ग्राम्य-जीवन को शब्दबद्ध करने वाला प्रामाणिक कृतित्व है." इस समय हिंदी में दलित-विमर्श और नारी-विमर्श के स्वर उठ रहे हैं.ये दोनों स्वर शास्त्री जी की कविता में पूरी शिद्दत के साथ उठे हैं.उन्होंने ब्राह्मणवाद का हरसंभव विरोध किया तथा अपने लेखन और व्यावहारिक जीवन-दोनों में सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई लड़ी.उनका लेखन भी इसी का अंग था.इसके फलस्वरुप प्रतिक्रियावादी तत्वों ने उन्हें किसी-न-किसी तरह हरदम प्रताड़ित किया,पर शास्त्री जी अपनी राह से डिगे नहीं.कुछ लेखक ऐसे मुद्दों पर प्रगतिशील बनते हैं जो सर्वमान्य हो चुके हैं,जिन पर व्यापक विरोध की आशंका नहीं रहती है.इसके विपरीत शास्त्रीजी हरदम ज्वलंत मुद्दे उठाते थे,वह भी व्यावहारिक स्तर पर और आक्रामकता के साथ.उनके लेखन के सम्बन्ध में नंदकिशोर नवल ने लिखा है-यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि उनके पास वैचारिक क्षमता का अभाव है.शास्त्रीजी की कवितायें एक व्यापक बौद्धिक पृष्ठभूमि में रचित हैं.सामजिक वास्तविकता को समझने के लिए कोई आरोपित दृष्टिकोण उनके पास नहीं है,पर इसके लिए अपने ढंग की वैचारिक शक्ति उनके पास है."-आमतौर पर कविगन गाँव की बड़ी खूबसूरत तस्वीर बनाते हैं,पर शास्त्रीजी की कविता में गाँव की जो तस्वीर मिलती है,वह विद्रूपता से भरी है.असल में वे गाँव की स्थिति में बदलाव चाहते थे और इसी इच्छा से प्रेरित होकर उन्होंने सामजिक-धार्मिक कुरीतियों पर प्रहार किया.वह अतीत के व्यामोह से मुक्त थे.उनकी आँखों में बेहतर भविष्य का सपना था परन्तु उसका आधार अतीत नहीं था.
शास्त्री जी का जन्म १६ अप्रैल १९०१ (आज ही के दिन)में बिहार के सिवान जिला अंतर्गत रतनपुरा गाँव में हुआ था.इनकी माता का नाम 'श्रीमती रामज्योति देवी'तथा पिता का नाम श्री लक्ष्मी पाण्डेय था.पांच वर्ष की अवस्था में इनकी विधिवत शिक्षा शुरू हुई. इनकी शिक्षा का माध्यम संस्कृत था.स्थानीय स्तर (जगन्नाथपुर,महाराजगंज और गोदना)के संस्कृत विद्यालयों में पढने के बाद वे आगे की पढाई के लिए बनारस गए.वहाँ उन्होंने कई विद्यालयों-महाविद्यालयों में और कई शिक्षकों से विद्या अर्जन किया.१९२१ में असहयोग आन्दोलन के प्रभाव में आकर उन्होंने सरकारी परीक्षा छोड़ दी तथा असहयोग आन्दोलन में हिस्सेदारी की.१९२२ में उन्होंने काशी विद्यापीठ की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास की.अध्ययन समाप्त होने के बाद उन्होंने जीविका के लिए शिक्षक का पेशा चुना पर वास्तव में वे एक्टिविस्ट ही रहे,वे बराबर किस-नस-किसी आन्दोलन में सक्रिय रहते.उन दिनों राहुल सांकृत्यायन का कार्यक्षेत्र सारं,सिवान और गोपालगंज ही था.शास्त्री जी अपने प्रगतिशील विचारों के कारण स्वाभाविक रूप से इनके नजदीक आये.वे राहुल जी के साथ 'किसान आन्दोलन'में सक्रिय रहे.इन्ही के प्रयासों से दिसंबर १९४७ में गोपालगंज में आयोजित दूसरे अखिल भारतीय भोजपुरी sammelan की अध्यक्षता राहुल जी ने की.आज़ादी की लड़ाई में भी वे सक्रिय रहे.इन्होने १८ महीने की सश्रम कैद भी काटी और अभी सज़ा काटते ८ माह ही बीते थे कि गांधी-इरविन समझौता हुआ,जिसके तहत वे रिहा हुए.१९४२ के भारत छोडो आन्दोलन में शास्त्री जी ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया और आज़ादी मिलने के बाद वे सक्रिय राजनीति से अलग हो गए,इनकी मृत्यु ३१ दिसंबर १९७४ को हुई.
हिन्दू धर्म में यह मान्यता है कि हल चलाना पिछले जन्म केपाप का फल है,इसीलिए ब्रह्मण हल नहीं चलाते हैं.शास्त्री जी स्वयम हल चलाकर इस धार्मिक मान्यता को तोड़ा.१९२३ में उन्होंने 'हलान्दोलन'चलाया ,जिसमे ब्राह्मणों से हल चलाने का आह्वान किया गया.इस सम्बन्ध में उनकी कविता है-
'कलमे चलावला से इजत रही,
त काहे केहू पकड़ी कुदार'
-हिन्दू समाज में गो-वध को लेकर बड़ी लम्बी-चौड़ी बात होती है,ऐसा लगता है कि हिन्दुओं को गाय से अधिक प्रेम है.शास्त्री जी ने अपनी कविता में इस प्रेम की पोल खोली है-
'गोबध बंदी से ही होई गाईन के सेवा कईसे?
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गोबध नईखे बंद बिदेशन में पर गाय निहाल बा.
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जान दिहला से ना होई गो-सेवा साधू बाबा
लूर बिदेशन से अब सीखीं ढोंग पसारे में का बा
जनता का नईखे मालूम ई धरम नांव पर जाल बा
गंगा रउरे देस में ऊ राउर अबग ,मान लीं.
पर रउरा से बढ़कर गाय सेवित सगरे,जान लीं.
रउरा से गो-सेवा होई?खूब बजाईं गाल बा
हिन्दू लोके महामूर्खता ठग लोके बाटे आधार
असल बात जे ठंढे नीयर इहो लोगवा भारी भार
बाकिर हम केते समुझाईं,लड़ी धरम के ढाल बा'

उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त अनीतियों को उजागर करते हुए बहुत तल्खी से लिखा-
हाय हिन्दुओं ऊपर जाओ भू पर ठौर नहीं है
तुम जैसों को इस दुनिया में रहना और नहीं है.
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चूहे,बानर आदि देवता हैं माने हुए तुम्हारे
जिनसे आजिज़ आज देश के समझदार हैं सारे
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कभी तुम्हारे रामचंद्र ने शम्बूक का सर काटा
गुरु द्रोण ने एकलव्य का एक अंगूठा चाटा.
विप्र शील-गुणहीन पूजिए,नहीं शुद्र ज्ञानी भी
यही तुम्हारी वेदाज्ञा है,जो तुमने मानी भी.
नीच बनाकर जिन्हें दबाते,वे न भला क्यों भागें.
ठोकर पर ठोकर खाकर भी क्यों न भला वे जागें ?

शास्त्री जी नारी मुक्ति के प्रबल समर्थक थे,उन्होंने स्त्री शिक्षा पर सर्वाधिक जोर दिया,साथ ही,दहेज़ प्रथा,पर्दा प्रथा के खिलाफ मानसिकता तैयार की.नारी जागृति के लिए उन्होंने महाराजगंज (सिवान)में एक महिला सम्मलेन का आयोजन किया,जिसका उदघाटन कमला सांकृत्यायन ने किया.उनकी कविता है-
पसुओ से बाउर बनवलअ हो,हाय पसुओ से.
दुलम भईल हवो पानी ,कैदी होके कलपतानी
जियते नरक भोगवलअ हो,हाय पसुओ से
हमनी मुइं त का परवाह,नया दहेज़,नया बियाह
परदा दाल सरवलअ हो,हाय पसुओ से.
परदा प्रथा पर नारी की संवेदना उनकी कविता में स्वानुभूति की तरह व्यक्त हुई है-
झरझर बरसे निस दिन नैना से पानी रे
का से कही हम दुःख के कहानी
परदा के सरला से थाईसिस बढ़तावे
घर भर दर जाला होता हलकानी रे.

वे शादी-विवाह तथा अन्य अवसरों पर नाच-बाजा एवं इस तरह के और आडम्बरों के विरोधी थे,इसके खिलाफ वे लोगों को बराबर समझाते रहते थे.वे किसी भी तरह के नशे के खिलाफ थे,यहाँ तक कि खैनी के भी.समाज-सुधार की बात करते-करते वे कभी-कभी मारा-मारी के लिए भी तैयार हो जाते थे.शास्त्री जी अपनी धुन के इतने पक्के थे कि अपनी बात कहने के लिए अवसर का ध्यान नहीं रख पाते थे.नाच के सामियाने में ही जाकर वे इसका विरोध करने लगते,एक बार एक विद्यालय में 'तुलसी जयंती'का आयोजन था.शास्त्री जी को पूरे सम्मान के साथ वहाँ बुलाया गया था.उन्होंने अपने भाषण में तुलसीदास के नारी और शूद्र सम्बन्धी विचारों की खूब आलोचना कर डाली.कुछ लोगों ने इसका विरोध किया परन्तु उन्होंने अपने तर्क और उदाहरण से सबको चुप करा दिया.असल में वे एक सुन्दर समाज चाहते थे और सुन्दर समाज बनने में बाधक तत्वों को देखकर खीझ उठते थे,यही खीझ उनके लेखन में कड़वे और भदेस भाषा के रूप में प्रकट हुई है.उन्होंने १९४० में भोजपुरी नामक पत्रिका पटना से निकली इसे भोजपुरी की पहली पत्रिका होने का गौरव प्राप्त है.यह पत्रिका केवल एक ही अंक तक उनके संपादकत्व में निकल पाई.उनके भोजपुरी कविता संग्रह का नाम है-भाकोलवा (१९२१),और धोखा(१९६२).अन्य कविताओं में-लगनवा,स्वागत,समधी जी,कईसन विदाई,दंगल होई,एही उमर में,सिवान से सोनपुर,भईयवा,सुथनी,सतुआ,मोसम,जियलो जहर बा .
आदि हैं.
शास्त्री जी की तरह कडवी सच्चाई कहने का साहस बहुत कम लोगों में होता है.आज विभिन्न कारणों से धर्मान्धता बढ़ रही है,ऐसे में उनके लेखन की प्रासंगिकता बढ़ जाती है.
**(जीतेन्द्र वर्मा(सिवान) के "आलोचना अप्रैल-जून २००९"में प्रकाशित लेख "लोककवि महेंद्र शास्त्री'का संपादित अंश,'महेंद्र शास्त्री जी के जन्मदिवस पर साभार)

4/10/10

अतिशय प्रयोगों की बलिवेदी पर-1084 की माँ.



ऐसा कई बार होता है कि निर्देशक नाटक में अपनी क्षमताएँ दिखाने के लिए कई नयी चुनौतियां लेते हैं और लेने लगे हैं और इसके लिए नए-नए प्रयोग भी कर रहे हैं.दरअसल,यह लेखक के concept को संप्रेषित करने के स्थान पर अपने कलात्मकता को दिखाना होता है यानी यह अपने (निर्देशक के खुद के होने)होने को (being)प्रकट करना होता जा रहा है.कुछ-कुछ ऐसा ही पिछले दिनों रा.ना.वि.में महाश्वेता देवी के उपन्यास '१०८४ वें की माँ' का मंचन "१०८४ की माँ"के नाम से शांतनु बोस के निर्देशन में हुआ.सही मायने में उपन्यास या कहानी के रंगमंच को लेकर प्रसिद्ध रंग-आलोचक महेश आनंद की माने तो,उपन्यास या कहानी पढ़ते समय पातःक जिस अनूभूति का साक्षात्कार करता है और सूक्ष्म रूप से छिपा हुआ जो दृश्य-संसार उसके सामने बनता-संवारता है,उन दृश्यों को रचना के भीतर से तलाश करके मंच पर प्रदर्शित करने से ही कहानी के रंगमंच का स्वरूप निर्मित होता है.यही पाठक जब दर्शक के रूप में अपने उस पठित शब्दों को दृश्य रूप में मंच पर देखता है तो वह अपने मन:मस्तिष्क के आँखों से अपनी दृश्य दृश्य-रचना और पात्रों को तलाशने लगता है.१०८४ की माँ' के साथ भी पाठक यही उम्मीद लगाता है,ऐसे में जब वह उसे मंच पर देखता है.और उसकी गुणवत्ता की तुलना लाजिमी ही है.
इस नाटक में घटनाओं का तनाव कभी भी अपने चरम तक नहीं पहुँचता और इससे पहले कि प्रेक्षक नाटक से जुड़े तभी तेज़ संगीत उनका रसभंग कर देता है.नाटक में संगीत उसके कथ्य को प्रभावी बनाने तथा प्रेक्षकों तक पहुँचाने से होता है ना कि प्रेक्षागृह में बैठे दर्शक-समूह को अपने कानों पे हाथ रखवा देने से.यथार्थवादी दृश्य-बंध बहुत हद तक स्टेज पर कहानी का संसार हु-ब-हु रचता है.१०८४ की माँ में व्रती जिस परिवार का होता है उस परिवार में सिस्टम के साथ मिलजुल कर चलना समझदारी कहलाती है.तमाम झंझावातों में तबाह वही होते हैं जो उनके रास्ते आते हैं ना कि वे जो उन झंझावातों के संग ही चलते हैं,माने यह कि व्रती की फॅमिली इस जलते समय में भी खुशहाल है हमारे नपुंसक मध्य-वर्ग की ही तरह फिर सेट डिजाइन करते समय उनका घर दरारों वाला दिखाने का तुक समझ से परे है.हमारे दर्शक दो किस्म के हैं पहली श्रेणी उनकी है जो नाटक को नाटक देखना है सोचकर आते हैं.दुसरे वो जो नाटक के सभी पक्षों कथ्य,अभिनेता,नाट्य-समूह और निर्देशक आदि को भी ध्यान में रखकर आते हैं.यह दुसरे किस्म का दर्शक हमारा सही मूल्याङ्कन कर पाता है.नाटक का यही दर्शक जब ढाई घंटे बाद बाहर आता है तब उसके चेहरे पर व्याप्त शून्य चौंकता ही नहीं बल्कि इस ओर भी इशारा करता है कि अतिशय प्रयोगधर्मिता कहीं गले का कंटक ना बन जाये क्योंकि दर्शक निर्देशक के चश्मे से नाटक नहीं देखता बल्कि उसके नाटक देखने के अपने पैमाने होते हैं.कहीं-न-कही १०८४ की माँ'इस ओर से कमज़ोर पड़ जाती है.और नाटक जब कमज़ोर हो जाये अथवा शुरू में ही नाटक'टेक आफ' न ले पाए तब उस नाटक को एक सतही प्रस्तुति कह दी जाती है.यह नाटक टुकडो-टुकडो में आसमान को छूने की कोशिश भर बन के रह जाती है जरुरी तो नहीं कि हर प्रयोग 'महान'प्रस्तुति की आधार-भूमि रच दे.एक महान रचना /प्रस्तुति एक बड़े फलक की होती है और उसे उसकी समग्रता में ही अच्छे और उचित प्रयोगों से ही महानता तक पहुँचाया जा सकता हाई खली बौद्धिक बाजीगरी या चमत्कार नहीं खडा कर सकता.निर्देशक को चाहिए कि वह दर्शक को पाठ का दृश्य दे जो स्वतः प्रस्तुति में ही अभिनेताओं के माध्यम से निर्मित होता जाता है न कि उसकी रचना का गुरुतर भर निर्देशक स्वयं उठाये.वैसे भी जो रंगमंच विशुद्ध रूप से अभिनेता का माद्यम है वह अब निर्देशक का हो चला है,अभिनेता का इस तरह से हटना रंगमंच के लिए अच्छा संकेत नहीं है.
और 'हज़ार चौरासी कि माँ'इसी का शिकार होके रह गयी है,प्रयोगों से दिमाग हटे तो शायद यह आपको यह सोचने को मिले कि महाश्वेता देवी के इस नावेल की पृष्ठभूमि का वह माहौल जिसमे व्रती,सोमू,लाल्टू,नंदिनी जैसे युवा घुट रहे थे और उनकी माएं दीवारों से इस पीढ़ी के खून के धब्बे भी नहीं पोंछ पायी,तथा कलकत्ते का वह मंज़र जो इस दौर में सुरेन्द्र तिवारी जैसों को दिखा था -
कलकत्ता/ ओह कलकत्ता/
आंसुओं से भींगा/खून से तर/
अट्टालिकाओं से भरा अस्थि-पंजर/
आशाओं-निराशाओं के बीच/
मीलों का लंबा सफ़र/कहाँ है द्वार?
कहाँ है अंत?कौन मुझे जायेगा बता-
कलकत्ता/ओह कलकत्ता'---
या फिर यह कि-
'दौलत/पूँजी,
दोनाली/खून,
विरोध में उठते हाथ /
चीखों से दबी दिशायें
शोर/भीड़/अश्रु गैस/गोलियां.
हर जगह वही एक चमक ..वही एक चेहरा /
पूँजी/पूँजी//पूँजी///-इस ओर तो हमें आना ही होगा क्योंकि समाज की जिस हकीकत ने उस कवि के दिमाग की नसें मोटी कर दी थीं जो अँधेरे में था,आखिर उसी तरह की समस्या व्रती लाल्टू जैसे युवकों की भी तो थी..निर्देशक महोदय इस तनाव को भी तो अधिक चमत्कारी ढंग से कहने के बजाय सीधे तौर पर उसके कडवे नंगे रूप में ले आते तो नाटक बेहतर हो सकता था जैसा कि आपके थोड़े से प्रयास एकाध दृश्यों में दिखे.बहरहाल,एक बहुत उम्मीदों वाले दर्शक को नाउम्मीद कर गया यह नाटक.-'लगता है,अपेंडिक्स फट गया ...'
'१०८४ की माँ'एक ख़ास समय में उपजे नक्सलबाड़ी मूवमेंट की पृष्ठभूमि में अपना कथा-संसार रचता है.सुजाता(नायिका)और उसके सबसे छोटे बेटे व्रती चैटर्जी के बीच का माँ-बेटे-बेटे-माँ का स्नेहिल सम्बन्ध और एक उच्च-मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे होने के बावजूद failure of system के दौर में व्रती के नक्सल मूवमेंट के समर्थक व्यक्ति के तौर पर इस सिस्टम द्वारा बलि चढ़ा दिए जाने की कथा है.यानी.व्रती चैटर्जी माँ के लिए एक निहायत नन्हा मासूम बच्चा है जो परिवार में सिर्फ माँ से ही जुड़ा हुआ है पर वह अ-पारिवारिक नहीं है ,ठीक इसी समय पर वह अपनी माँ से ही नहीं बल्कि अपनी प्रेमिका ,मित्रों आदि से भी एक बुद्धिजीवीता के स्तर पर बातें करता है.फिर भी नाटक में इस कैरेक्टर कभी खुल नहीं पाता है.और रही सही कमी उसके अपने प्रेम के क्षणों में नंदिनी की आँखों से ७० के मशहूर गानों'छुप गए सारे नज़ारे ओये क्या बात ,रफ्ता रफ्ता देखो आँख मेरी लड़ी है,ये लड़का हाय अल्ला कैसा है दीवाना-जैसे गीतों की योजना,उस जुड़ाव को बेतरह हाशिये पर धकेल जाती है जिन्होंने ये नावेल पढ़ा है और व्रती जैसे चरित्र को ऐसा करते देखते हुए निर्देशक की अतिशय प्रयोगशीलता पर हंसी भी आती है.नाटकों का यह प्रयोग उसके कथ्य से परे जाकर दर्शकों को अपने से अलगाने का काम जाने-अनजाने करने लगता है,इसका ध्यान रखना चाहिए था.
शांतनु बोस का कहना है कि'यह प्रस्तुति क़ानून-व्यवस्था और आतंकवाद के आपसी रिश्तों को समझने का प्रयास है'-पर अफसोस यह प्रयास पूरे नाटक में रंच-मात्र भी नहीं उभरता.इतना ही नहीं जब आप नाटक की प्रकृति को 'वृत्तचित्र'सरीखा बता रहे हैं तब यह बात अधिक जरुरी हो जाती है कि प्रयोग कितना और कहाँ तक जायज़ हो सकेगा.कही आपका जोर दर्शक को चमत्कृत करने पर तो नहीं?जैसा कि आजकल फैशन चल पडा है कि एक बड़े प्रेक्षागृह में एक बड़े से चमत्कारी सेट का वितान खडा किया जाये,जिससे कि जब दर्शक रंगस्थल पर आये तो उसके पास सोचने-समझने की स्थिति ना होकर केवल भौंचक होने की स्थिति रहे.ऐसे ही कई प्रयोग पिछले कुछ समय में लगातार देखने में आये हैं पर बड़े अफ़सोस की बात है कि इनमें से कुछ ही इस तरह के सफल नाटक रहे और अधिकांशतः का जोर सिर्फ इसे अद्भुत बनाने का ही था.यथार्थवादी रंगमंच का नाटक तैयार करते समय यह जरुरी नहीं की मंच को भरा-पूरा दिखने के लिए बहुत से वस्तुओं की उपस्थिति भी जरुरी हो.१०८४ की माँ में'ऐसे गैर-जरुरी चीज़े कई हैं.रंग-जगत में यह कहा नजात है कि स्टेज पर मौजूद हर वस्तु का उपयोग होना चाहिए (यहाँ उपयोग से मायने वस्तुओं के तार्किक प्रयोग से है) पर शायद निर्देशक यहाँ बड़ी चूक कर गए हैं.

4/5/10

न्याय के पक्ष में भारत सरकार का दोहरा मानदंड-आनंद जान बनाम अन्य



आज दोपहर दैनिक भास्कर की खबर पढ़कर मैं थोडा चौंका.खबर थी-'दुबई में हत्या के आरोप में मौत की सज़ा पाने वाले पंजाब और हरियाणा के विभिन्न जिलों के १७ युवकों के मामलों को लेकर ६ अप्रैल को विदेश मामलों की सचिव दिल्ली जा रही हैं.विदेश राज्यमंत्री परनीत कौर ने ये बातें कहीं.इन युवकों के परिजनों से मिलने के बाद इस मामले को संजीदा मानते हुए विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर ,विदेश मंत्री एस.एम.कृष्णा संयुक्त अरब अमीरात(UAE) सरकार के लगातार संपर्क में हैं,साथ ही इन युवकों को बचाने के लिए लोक भलाई पार्टी के राष्ट्रीय प्रधान बलवंत सिंह रामूवालिया तीन सदस्यीय कमिटी के साथ ८ अप्रैल को दुबई जा रहे हैं.
भारत सरकार का यह कदम काबिले तारीफ़ हैं और उनके इस कदम से हमारा विश्वास और भी पुख्ता हुआ है कि अन्य देशों की ही तरह हमारी सरकार भी हमारे विदेश में काम के लिए गए नागरिकों के लिए,उनके हकों के लिए कितनी गंभीर है.पर तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है.पिछले वर्ष एक माँ और बहन विभिन्न रसूख वाले लोगों तथा हमारे ऊपर लिखित राजनयिकों तक से यहाँ तक की विभिन्न संस्थाओं के दरवाज़े पर लगातार दौड़ रहीं हैं और केवल आश्वासन के सिवा तब भी कुछ नहीं मिला और आज तो खैर उसकी यह उम्मीद भी धूमिल हो रही है क्योंकि उस बेटे और भाई को लास-एंजिल्स कोर्ट ने पहले ही ५९ साल की कैद सुना रखी है और फिलहाल वह अपने एक और मामले की सुनवाई में इसी ७ अप्रैल को न्यूयार्क कोर्ट में पेश होने जा रहा है.इस बारे में कहीं भी कुछ ना तो लिखा जा रहा है ना सरकारी तौर पर भी कोई कदम (मात्र एक नज़र केस को देखने भर की जेहमत भी नहीं )ही उठाया जा रहा है.यह शख्स है अमेरिका स्थित मशहूर फैशन डिजाईनर आनंद जान.क्या आनंद के केस में कुछ भी कदम उठाने से भारत सरकार और अमेरिकी गवर्नमेंट के संबंधों में कुछ दिक्कत आ जाएगी?या आनंद के मामलें से सरकार को ना तो वोटों का कुछ फायदा होने वाला है(क्योंकि आनंद अमेरिका बेस्ड भारतीय नागरिक है)क्योंकि जो लोग इस तरह के कारोबार से जुड़े हुए हैं उनकी भारतीय प्रजातंत्र में कोई ख़ास रूचि नहीं है?या फिर इसके पीछे हमारी वह मानसिकता काम कर रही है जहां 'अंकल सैम'को खुश करने के लिए हमारे चुने चेहरे कुछ भी कर सकते हैं ?मेरे यह कहने के कुछ जायज़ कारण हैं.आखिर वह पीछे की सच्चाई क्या है जहाँ आनंद जान आज एक यौन उत्पीडन या रेपिस्ट की तरह देखा जाने लगा है.आनंद पर यौन उत्पीड़न के कई मामलें अमेरिका के विभिन्न कोर्ट्स में चल रहे हैं और एक मामले में उसे उन्सठ सालों की कैद हुई है.एक केस का खता अभी सात अप्रैल को न्यूयार्क में खोला जाना है पर कहीं कोई चर्चा नहीं कोई सपोर्ट नहीं,ना सरकारी तौर पर ना ही गैर-सरकारी तौर पर.आईये अब देखते हैं आनंद जान का मामला और आनंद जान आखिर है कौन और इस मामले में लूप-होल कहाँ है-
Anand jon alexander is one of the most high-profile south-asians credited for introducing "indo-chic"as the first indian to show at NY fashion week,Bryant park.he was featured by newsweek magazine's "who's the next 2007",selected as faces of the future by india today;winner of numerous awards and accolades ,including the rising star award'for the Asia Society and for Fashion Week of the America's.while he was a celebrity judge for miss india and regularly featured on TV shows such as America's next top model it is no coincidence that almost all these allegations stemmed around the timeframe of his Wall Street financing.
Anand jon was raised in south india by an affectionate and well respected family and graduated from Bharthiya vidya bhavan,Kerala.and later at padma seshadri,Saint Michael's academy in chennai.At age 16 he went on a scholarship to the Arts Institute of Fort Lauderdale where he graduated as the valedictorian.Anand jon transferred to the prestigious Parsons School of Design,the New School where he graduated with a double degree in 1998,Tim Gunn was the Dean of the New School during Anand jon's matriculation;he is the current host of Project Runway and Tim Gunn's guide to style.Mr.Gunn described Anand jon in his recommendation release as"a visionary and a leader".
At 24 Anand Jon teamed up with his mother and sister and became the first indian to show at NewYork Fashion Week/Bryant Park and went on to have the who's who of society.celebrity and young royalty as his clients.Those clients and friends include:Paris hilton,Amanda and Lydia Hearst,Bruce Springsteen,LawrenceFishburne,Gina Torres,Oprah Winfrey,and Janet Jacson to name a few.As a result of his success,Anand jon sold collections at highly respected establishments including Bergdorf Goodman,in New York City,Wilkes Bashford,in San Francisco,and Luisa Via Roma,in Florence,Italy.Anand jon's active role in charities includes the AIDS Awareness Tour to India with Miss Universe and his sister Sanjana jon and included Michelle Rodriguez and Kal Penn in the launch at the United Nations in New York.He supported the Tsunami Relief with Hillary clinton in 2005 and the Nature Sanctuary for abused animals.
Unfortunately,the price of success and fame resulted in placing Anand jon and his family as targets for what appears to be nothing short of a conspiracy involving his own disgruntled business associates and roommates.Their failed extortion attempts and publicity attempts and civil suits turned into criminal allegations,At least six of these witnesses are involved in suing Anand jon civilly.
Anand Jon,an Indian Citizen Living in the United States is a Victims of False Allegations and Needs his country's intervention.-(Sanjana jon,Anand's sister)
अब एक नज़र आनंद जान के केस के ऊपर जिनमें कई तथ्यात्मक और गंभीर अनदेखियाँ हैं जिनकी ओर आनंद की बहन संजना जान और उसकी माँ शशि अब्राहम लगातार भारत सरकार को देखने को तथा इस मामले को अपनी देख-रेख में करवाने के लिए दरवाज़े-दरवाज़े घूम रही हैं.उनका मानना है कि इस मामले की सुनवाई सुनवाई निष्पक्ष रूप से नहीं हुई है और एक बहुत बड़ा नेटवर्क इसके पीछे काम कर रहा है.नस्लीय भेद भी इसका एक पेंच है.भारत सरकार से इनकी मांग रही है कि -we are asking that the indian government watch to make sure that these proceeding are conducted properly.A glance at this case raises serious concern of racial prejudice,prosecutorial misconduct,and gross human and civil rights violations throughout the proceedings.this demand is based on the outrage of the international indian community regarding the injustice an Anand jon case,to highlight a great injustice being committed toa young indian citizen and request the government of india to intervene and take active participation on behalf of one of their citizens,Anans jon,by ensuring that justice is served.इसके कारण साफ़ हैं क्योंकि the court records show absence of a fair investigation,a fair prosecution,fair jury,or fair trial.At the very least Anand jon deserves a fair new trial with a fair bail immediately.and the only way now he can get a fair trial is by extraditing him back to india.(ध्यान दें कि यह बातें और मांगें आनंद के उस मामले से सम्बंधित हैं जिस केस में आनंद को उनसठ साल की सज़ा काट रहा है.)इस सज़ा पा गए केस के असली चेहरे को देखते हैं कि क्या हुआ कोर्ट के द्वारा और यौन उत्पीड़न के सबूत क्या क्या थे?
1-despite a negative rape kit and witness statements favourable to his innocence Anand jon was areested in march 2007,in Beverly hills.Anand jon has been held in solitary confinement for over two years without even a fair bail.
2-at least one of more jurors admits that they wanted to vote not guilty until they were pressured to change their vote against their will.
3-Anand jon passed a polygraph(lie detector test)based on these charges .the prosecution lied to the New york times to creat a negative media hysteria stating"violent crimes";
4-जबकि रेप किट निगेटिव था आनंद को सज़ा सुना दी गयी,prosecutions own lead expert Dr.Schulman admitted -"no signs of use of any force,no injuries,no trauma,"
ये सब तो वह कुछ बातें हैं जिनकी जबरदस्त उपेक्षा इस केस में की गयी और आनंद को ५९ वर्ष की जेल की सज़ा दे दी गयी.यह कहाँ तक जायज़ है कि जबकि जिस रेप केस में आनंद जान जेल जा रहा है उस केस में उसकी इस मांग को गौर करने लायक नहीं सोचा गया कि आरोप लगाने वाली महिला का भी एक बार पोलीग्राफ टेस्ट हो,यही नहीं जबकि चलते केस के दौरान जूरी के एक मेंबर ने संजना को(आनंद की एकलौती बहन) फोन पर अनुचित मांग के साथ यह कहा कि we know anand is innocent.तब अदालत ने आनंद के juror misconduct (among other infraction)के कारण न्यू ट्रायल की मांग को ठुकरा दिया उस पर ध्यान नहीं दिया गया.इतना ही नहीं नस्लीय भेदभाव की बात कहने के भी कई वजहें हैं मसलन,it is surprising to note the amount of racist comments that exist in various documents of court proceedings.one is also shocked at some of the comments by the prosecution's witnesses during the trial including,"indiaheads"and "curry smelling dick"while the prosecution themselves seemed to have inflamed racially prejudiced suggestions such as "attacking white woman".
अब इतने सारे लूप होल के बावजूद आनंद जेल में है यह हमारी सरकार का दोहरा रूप दिखा रही है.आनंद सपरिवार अकेले इस जंग में खड़ा है तमाम सरकारी दरवाजों पर चक्कर काटने के बात आनंद को अमेरिकी सत्ता से जेल ही मिल रही ही है,और आगे हमारी सरकार कुछ करेगी,अभी तो उम्मीद बेमानी है.पर एक बहन और माँ की हिम्मत को सलाम जिन्होंने विपरीत परिस्थितयों में भी भाई को हिम्मत दिया हुआ है और इस बात में यकीं रखती हैं कि सत्यमेव जयते.पर पंजाब हरियाणा के युवकों के लिए सरकार इतना कुछ कर सकती है पर वहीँ आनंद क मामले से इतनी बेरुखी क्यों ?यह दोहरा चरित्र क्यों?

4/3/10

रेतीली सफलता का ब्रेकडाउन -राँग टर्न


ब.व.कारंत ने एक इंटरव्यू में रंजीत कपूर के बारे में कहा था-'शुरू से लगता था,इसमें दम है.अब भी लगता है,अगर निखरता तो बहुत अच्छा लगता."
रंजीत कपूर के नए नाटक 'राँग टर्न' के बारे में यही लगता है की काश थोडा और निखरता तो अच्छा होता.कपूर mass audience के निर्देशक हैं.उनका अपना एक विशाल दर्शक-वर्ग है.और यह दर्शक-वर्ग उनके नाटको'बेगम का तकिया',मुख्यमंत्री,पैर तले की ज़मीन,जनपथ किस,एक रुका हुआ फैसला,आंटियों का तहखाना,अंतराल,शार्टकट,एक संसदीय समिति की उठक-बैठक आदि से निर्मित हुआ है.मैं भी इसी वर्ग का हूँ कम-से-कम रंजीत कपूर के लिए.
रंजीत कपूर का नयी नाट्य-प्रस्तुति'राँग टर्न' पिछले दिनों रा.ना.वि.के सम्मुख प्रेक्षागृह में खेला गया.यह रा.ना.वि.की छात्र प्रस्तुति थी.'राँग टर्न'नाटक मूल जर्मन कहानी'ब्रेकडाउन'से प्रभावित है और २१ वी सदी में प्रयुक्त होने वाले मुहावरे 'कामयाबी की राह'का विश्लेषण करता है.नाटक का विषय उसके कथ्य को समझने में अस्पष्ट है.न इसमें किसी एक के विचार दर्शाए गए हैं ना इसके लेखन में.'नाटक की प्रस्तुति में निर्देशकीय पाठ के अलावा अभिनेता और दर्शक के पाठ का सम्मिलित व्यवहार होता है पर यहाँ दर्शक का पाठ बार-बार टूटने लगता है.'यह नाटक जीवन में विभिन्न आयामों,महत्वाकांक्षाओं ,दबी-छुपी इच्छाओं,जालसाजी,न्याय आदि को परत-दर-परत खोलता है.किस तरह से एक नकली मुकद्दमा अंततः वास्तविक होकर प्राणदंड में बदल जाता है तथा दंड निर्धारित करने वाले मनोरोगियों सरीखे वकीलों और जज का यह न्याय उनकी दृष्टि में poetic justice है.कायदे से 'यह नाटक मानव-स्वभाव के विरोधाभासों को उजागर करने की कोशिश है'-पर इस तरह के कथानक के भीतर का तनाव ही सबसे महत्त्व का होता है जो इस नाटक से नदारद रहा.
रंजीत कपूर ने अपने रा.ना.वि.के छात्र-जीवन में (१९७६ में)डिप्लोमा प्रोडक्शन में जर्मन नाटक'वायजक'के लिए best director का पुरस्कार जीता था.और इस पुरस्कार का असर उनके निर्देशित नाटकों में दिखता भी रहा है.पर 'राँग टर्न'देखते हुए यह मलाल रह ही गया कि काश निर्देशक ने नाटक में 'टेक्स्ट'पर और अधिक म्हणत कर ली होती तो शायद नाटक भी रंजीत कपूर के पूर्ववर्ती नाटकों के ही तरह एक बेहतर नाटक के तौर पर याद किया जाता.पर शायद बात इतने से नहीं बनती क्योंकि यह नाटक वास्तव में सम्भावना नहीं जगाता.नाटकों में सिनेमाई तकनीक का जिस धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है वह नाट्य-प्रभाव को अधिक बेहतर बनाने के लिए है न कि मात्र चमत्कार प्रदर्शन के लिए.'राँग टर्न'में यह चमत्कार की हद तक लगता है क्योंकि इसके प्रयोग इसे नाटक कम सिनेमा अधिक बनाते हैं.
नाटक का उत्तरार्ध संजय खान की एक पुरानी फिल्म'धुंध'कुछ-कुछ हिस्सों में महेश भट्ट की'जिस्म'श्रेयस तलपडे की एक सुपर फ्लाप फिल्म 'अगर'तथा जेम्स हेडली चेइज'के उपन्यासों सरीखा लगने लगता है,जिस वजह से इस थ्रिलर नाटक की साड़ी कहानी जानी-पहचानी लगने लगती है,जहां सब कुछ 'प्रेडिक्टेबल' है.दो वकीलों और कठघरे में मुलजिम कहीं से भी अपने संवादों में'एक रुका हुआ फैसला'सरीखा या फिर तेंदुलकर के 'खामोश,अदालत जारी है'जैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाते.(वैसे तुलना बेमानी है)जबकि इसकी काफी गुंजाईश बन सकती थी.
बहरहाल,'बहुमुख'जैसे छोटे प्रेक्षागृह को एक बेहतर भव्य सेट में तब्दील करने के लिए तथा नाटक के एक दृश्य के सत्य को तीन अलग-अलग कोणों से flash back की तरह प्रस्तुत करने के लिए,थ्रिल पैदा करने में प्रयुक्त संगीत के लिए आप रंजीत कपूर को सराह सकते हैं.और नाटक के अंत में मुस्कुराते हुए नुक्कड़ वाली दूकान पर चाय पीते हुए यह अंदाजा लगा सकते हैं कि दो घंटे कोई नाटक ना देखा कोई बी ग्रेड मसाला हिंदी मूवी देख ली है.

3/30/10

मैथिली मेरी माँ और भोजपुरी मौसी है-पद्मश्री प्रो.शारदा सिन्हा.





शारदा सिन्हा ना केवल बिहार बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और विश्व भर में जहां कहीं भी हमारे गिरमिटिया पूरबिया कौम है उनके लिए एक पारिवारिक सदस्य सरीखा नाम है.शारदा सिन्हा नाम सुनो तो लगता है अड़ोस-पड़ोस की बुआ,ताई,या मौसी है.ये मैं नहीं कह रहा बल्कि उन अनेक सज्जनों ,छात्रों से सुन चुका हूँ जो भोजपुरी से परिचित हैं और जिनके लिए भाषा का प्रश्न उनकी अपनी संस्कृति से गुजरना होता है चाहे वह इस दुनिया के किसी भी छोर पे हों.पटना से बैदा बोलाई द हो नजरा गईले गुईयाँ/निमिया के डाढी मैया/पनिया के जहाज़ से पलटनिया बनी आईह पिया इत्यादि कुछ ऐसे अमर गीत हैं जिन्होंने शारदा जी के गले से निकल कर अमरता को पा लिया.कला सुदूर दरभंगा में भी हो तो पारखियों के नज़र से नहीं बच पाती,राजश्री प्रोडक्शन वालों ने जब अपनी सुपरहिट फिल्म 'मैंने प्यार किया'के एक गीत जो की लोकधुन आधारित था को गवाना चाहा तो मुम्बई से हजारों किलोमीटर बैठी शारदा जी ही याद आई.इस फिल्म के अकेले इस गीत'कहे तोसे सजना तोहरी सजनिया'के लिए दसियों बार देखी गयी थी.
मेरे पिताजी जो भोजपुरी फिल्मों के(८०-९०के दशक की फिल्में)तथा भोजपुरी लोककलाओं के बड़े रसिक हैं एक बार छत के गीत 'केरवा जे फरेला घवध से ओईपर सुगा मेड़राये/पटना के पक्की सड़किया/कांचही बांस के बहंगिया बहंगी लचकत जाये...आदि सुनते हुए बोले-"शारदा सिन्हा के आवाज़ में हमनी के परिवार के मेहरारू लोगिन के आवाज़ लागेला"-उनके कहने का तात्पर्य था-'शारदा सिन्हा की आवाज़ में भोजपुरिया पुरखों की आवाज़ गूंजती है.
पिछले २८ मार्च को प्रगति मैदान नयी दिल्ली के हंसध्वनी थियेटर के मंच से मैथिली-भोजपुरी अकादमी के सौजन्य से इस अज़ीम शख्सियत से रूबरू होने का मौका मिला.यहाँ पर उन्होंने गायन से पहले अपने संबोधन में कहा-मैं पैदा मिथिला में हुई.मैथिली मेरी माँ है और भोजपुरी मेरी मौसी.वो कहते हैं ना कि'मारे माई,जियावे मौसी' यानी इन दोनों भाषाओँ की सांस्कृतिक दूत की सच्ची अधिकारी की इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि शारदा सिन्हा जी को कोई भी भोजपुरिया ये नहीं कह सकता कि वह उनकी अपनी नहीं है.उनके सुनते हुए आज भी वही कसक वही ठसक वही खांटी घरेलूपन उतनी ही गहराई से बरकरार है. भारत सरकार से शारदा सिन्हा जी को 'पद्मश्री'देकर सम्मानित किया है.इतना ही नहीं प्रो.शारदा जी मिथिला यूनिवर्सिटी के संगीत विभाग में भी हैं.मैंने पहली बार शारदा जी को सुना/देखा अहसास नहीं हुआ कि वाकई यही शारदा जी हैं जो पूरे भोजपुरियों कि खास अपनी ही हैं.हालाँकि मैथिली गीतों में भी इनकी पर्याप्त ख्याति है पर शायद संख्या अधिक होने की वजह से इन्होने भोजपुरिया समाज के विशाल परिवार में अपनी जबरदस्त पैठ बनायीं है.मैं सोचता हूँ आखिर कोई कैसे इतना अपना हो सकता है कि ना मिले हुआ भी घरेलु हो और जिनके बिना एक संस्कार पूरा ना हो,यह तो कोई मिथकीय चरित्र ही है जो बरबस ही हमारी गोदी में आ गिरा.शारदा सिन्हा जी भोजपुरी गीत संगीत की उस परंपरा की ध्वजवाहक हैं जो भड़ैतीपने से दूर लोक की ठेठ गंवई अभिव्यक्ति है.सच ही तो है -'पद्मश्री प्रो.शारदा सिन्हा जी की आवाज़ सच्चे अर्थों में हमारे पुरखों (यहाँ मैं साफ़ कर दूं कि पुरखों से तात्पर्य भोजपुरियो-मैथिलियों की नारियां)की आवाज़ है.हम खुशनसीब हैं कि शारदा जी हमारी मिटटी में पैदा हुईं'-

भोजपुरी की 'मदर इंडिया'-"धरती मईया".......


'जाके ससुरारिया गरब जन करिह
सबके बिठा के पलक कोठे रखिह
बड़के आदर दिहा छोट के सनेहवा
इहे बा सकल जिनगी के हो सनेसवा
दुनु कुल के इजत रखिह
बोलिहा जन तींत बोलिया..'
पैदा होते ही परंपरा से भर दिए गए इसी भाव-बोध के साथ एक लड़की,उसी तरह विदा होकर मायके से ससुराल आती है.और सारी उम्र अपने उस नए घर को सँवारने में अपनी जिंदगी की सार्थकता मान लेती है.'धरती मईया'इसी भावबोध की कहानी है.एक स्त्री के उच्चतम आदर्शों की छवि की कहानी.कमाल की बात है कि मेनस्ट्रीम फ़िल्मी फ्रेम के भीतर यह आदर्श उभरता है.ब्रजकिशोर,कुनाल,पद्मा खन्ना,श्रीगोपाल अभिनीत और कमर नार्वी निर्देशित भोजपुरी फिल्म 'धरती मईया'(१९८१)अपने दौर की सफलतम फिल्मों में से एक है.अपने पति को दिए वचन के अनुसार ताउम्र उसको निभाने में नायिका(पद्मा खन्ना)का जीवन संघर्ष अंततः जीतकर सुखान्तकी रचता है.उपरी तौर पर कहें तो अपनी सीमाओं के साथ यह फिल्म भोजपुरी की मदर इंडिया है पर दुखांतक नहीं.वैसे भी जिस तरह से हालीवुड की फिल्मों का प्रभाव हमारी हिंदी फिल्मों में रहता है उसी तरह क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों पर भी हिंदी फिल्मों का प्रभाव बेहद होता है.ऐसा होना स्वाभाविक भी है.
'धरती मईया'की कहानी और उसमें वर्णित समाज-व्यवस्था भले ही सामंती ढाँचे और सोच में ढली रही हो,परन्तु उससे टकराने तथा उसमें अपने होने के अर्थ को तलाशकर उस ढाँचे को तोड़ने की तत्परता भी इसमें है.मंगल(राकेश पाण्डेय)एक विधुर किसान हैवह अपने लड़के राम की अच्छी परवरिश की खातिर दूसरी शादी कौशल्या(पद्मा खन्ना)से करता है.सुहाग की सेज पर वह अपनी पत्नी से वचन लेता है कि वह राम की सगी माँ बन जाये और इस वचन से आबद्ध हो कौशल्या उस बिन माँ के बच्चे की माँ बन जाती है.इसी गाँव में लाला /महाजन भी है,जो गरीब किसानों को क़र्ज़ देकर न केवल अपनी जमीन कौड़ियों के मोल हथिया लेता है बल्कि उन्हें बंधुआ मजदूर भी बनके अपनी गिरफ्त में ले लेता है.जब नायक मंगल पर उसकी दाल नहीं गलती तब वह उसे मरवा देता है और जिस नयी-नवेली औरत के पाँव की महावर भी अभी नहीं छूटी वह एक बच्चे को गोद तथा दुसरे को गर्भ में धारण किये जीवन संघर्ष के रण में उतर जाती है.'धरती मईया,यहीं से रफ़्तार पकडती है.
लाला नायिका के दोनों बैलों को मरवा देता है.किसान के बैल उसके जवान बेटों की तरह होते हैं जिनके कन्धों पर वह जिंदगी का जुवा रखकर खेती करता है और अपने लाल पसीने से उसे सींचता है.बैलों के मरने पर भी नायिका का हौसला नहीं मरता,वह जुवे को अपने कन्धों पर उठती है और अपने दोनों बच्चों की परवरिश करती है और इतना ही नहीं अपनी एकमात्र ननद की शादी भी कराती है.वह कहती है-'हम तहार भउजी ना हईं,अब तू हमरा के आपन भईया समझिह.'-ननद नायिका के पैरों में झुक जाती है कहती है-'हम अपना माई के नईखीं देखले तू जाउन कईलू उ ता आपनो माई ना करीत'-यहीं से नायिका का चरित्र और उदात्त रूप धर लेता है और नायिका का चरित्र सबको भरने वाली माई के तौर पर उभर के सामने आता है.अंततः दुःख के दिन बीतते हैं और दोनों बेटे युवा होतें हैं.नायिका को अपना संघर्ष समाप्त होता दीखता है परन्तु सौतेले बड़े भाई के प्रति माँ का विशेष राग देखकर लखन(कुणाल)लाला के बहकावे में आकर बंटवारा करवाता है परन्तु लाला की असलियत सबके सामने खुल जाती है कि मंगल(नायिका का पति)को उसीने मरवाया था.गाँव का एक बैल लाला को अपनी सींगो से मार-मारकर मौत देकर 'पोएटिक जस्टिस'की पुष्टि कर देता है और एक बेहतरीन बनी फिल्म अपनी पूर्णता को पाती है.
धरती मईया का उत्तरार्द्ध तमाम फ़िल्मी फार्मूलों से बंधा होने के बावजूद कुछ जमीनी समस्याओं की पड़ताल करता है और उसका निदान भी सुझाता है.किसानों का,समस्या और बैलों की एक जोड़ी से अन्योनन्यास्र्य संबंद्ध हमेशा से रहा है चाहे वह कृषक भारत के किसी भी प्रांत का हो.नायक ने अपनी माँ के कन्धों पर जुवा देखा है ऐसे में उसके लिए व्याह प्राथमिकता में नहीं वरन ड्योढ़ी पर एक जोड़ी बैल हैं-'माथा पर मऊर बान्हला से जियादे जरुरी बा दुआरी पर बैल बान्हल'-साथ ही,'धरती मईया'समाज में व्याप्त शराबखोरी,बाल-विवाह,विधवा विवाह आदि मुद्दों से भी दो-दो हाथ करती है.शांति बाल विधवा है और मनहूस के नाम से पूरे मोहल्ले में कुख्यात है.पर वह राम की बाल-सखी भी है,जिसके साथ राम ने कभी घरौंदे बनाये थे जीवन के मीठे ख्वाब बुने थे,.वह उसका हाथ थामता है और वह उसे स्वीकारता है और शांति की इस दशा के लिए रुढियों को को दोष देता है.'तहार कवनो दोस नईखे शांति.कसूर बा त इ प्रथा के बा जेकरा चलते तहार बचपने में बियाह हो गईल'-वह उसे तमाम विरोधों के बाद भी स्वीकारता है,इसमें उसकी माँ उसका साथ देती है.नायक के इस कदम से घर में बंटवारे की स्थिति आ जाती है और जब घर फूटते हैं तो गंवार लूटते हैं की लोक-कहावत साफ़ उभरकर सामने आ जाती है.इसी प्रसंग में लखन(कुणाल)ताड़ीखाने में ताड़ी पीने की वजह से पूरे समाज की नजरों में गिर जाता है.आज भी हमारे ग्राम्य-समाजों में शराब पीने वालोए को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता.
भारतीय ग्रामीण समाज सदा से ही विविध समस्याओं बाढ़,सूखा,महाजनी-सामंती फांस आदि का शिकार रहा है.अन्न उपजाने वाला खुद दो जून की रोटी को तरसता है,ऐसे समाज के लोगों द्वारा इस अभाव में भी भाव पैदा करने वाले कारणों की खोज कर ली जाती है और यह सांझ को चौपालों पर होते कीर्तनों में दीखता भिया है यानी 'हारे को हरिनाम'.फिल्म में 'संतोषी मईया' का दैवीय चरित्र ऐसी स्थिति में इन गरीबों को आत्मबल देता है क्योंकि यह मईया'गरीबों के 'कम खाओ ग़म खाओ'की मूर्तिरुपा है.इसलिए 'धरती मईया'में संतोषी मईया को केन्द्रित करके एक गीत डाला गया है,जो नायिका के विपरीत परिस्थितियों में दर्शकों तक को संतोष देता है भगवन सब ठीक करेगा एक दिन.अनपढ़ जनता इसी भुलावे में तो जीती रही है आजतक.बहरहाल,यह गीत संभवतः तबकी जबरदस्त हिट फिल्म 'जय संतोषी मईया'की सफलता से प्रेरित होकर डाली गयी होगी ऐसा कहना गैर मुनासिब नहीं होगा.
'धरती मईया'में भोजपुरी लोक कहावतें भी बहुतायत में हैं जो संवादों को और अधिक असरदार बनाती हैं मसलन-'ना नव मन तेल होई ना राधा नचिहें/जल्दी के बियाह कनपटी में सेनुर/गोदी में लईका नगर में ढिंढोरा/रसरी जर गईल बाकी अईठल ना गईल/मीठ सम्बन्ध से दुश्मनी ख़तम हो जाला-इत्यादि कुछेक ऐसी कहावतें हैं जो भिओज्पुरिया जनजीवन के दैनंदिन वार्तालाप में चटनी का काम करती है.१९८० के शुरूआती वर्षों से लगभग १९८६-८७ तक भोजपुरी फिल्मों का एक बेहतरीन दौर है.इन फिमों की पृष्ठभूमि और ट्रीटमेंट खालिस औडिएंस को ध्यान में रखकर बनायीं जाती थी यही कारण है कि फिल्मों में आज भी भोजपुरिया जनता नोस्टाल्जिया में चली जाती है.'धरती मईया'उसी कड़ी की गोल्डेन जुबली मना चुकी एक भोजपुरी क्लासिक है.भारतीय फिल्मों का दर्शक वर्ग गीत-संगीत के बिना फिल्म की कल्पना नहीं करता,यह उनके भीतर तक पैठा हुआ है.ग्रामीण समाज में भिन्न-भिन्न त्योहारों,फसलों,मौसमों,संस्कारों,आयोजनों आदि के गीत गाये जाते रहे हैं और जनता की इसी चित्तवृति को इन फिल्मों ने पकड़ा.'धरती मईया'इस एंगल से भी मजबूत फिल्म है,लक्ष्मण शाहाबादी के गीत और चित्रगुप्त के खांटी पूर्वी संगीत की जुगलबंदी ने बॉक्स-ऑफिस पर तहलका मचा दिया-'जल्दी जल्दी चल$ रे कहारा,सुरुज डूबे रे नदिया/ फूट जाई हमरी गगरिया ना/पूजिंले ले चरण तोहार ऐ संतोषी मईया/आपण सुख के सुख ना बूझे,सबके दुःख अपनावे,हमार धरती मईया/केहू लुटेरा केहू चोर हो जाला आवेला जवानी बड़ा शोर हो जाला/ना जा ना जा ना कर लरिकैया बलम/जाने कईसन जादू कईलू मंतर दिहलू मार/हाथवा में मेहँदी,पांवे महाबर,मथवा टिकुलिया सजा द$बलमू '-जैसे गीत आज भी भोजपुरी की शक्ल बिगाड़ते भौंडे और अश्लील गीतों की बहुतायत के बीच बड़े चाव और गर्व से सुने-सुनाये जाते हैं.कोई गीत कितनी खूबसूरती से स्त्री देह की मांसलता और सौंदर्य को,सौन्दर्य के खांचे में ही रखकर फिल्माया जा सकता है,यह'फूट जाई हमरी गगरिया ना$भउजी दिहें हमरा के गरिया ना'-गीत में नायिका के नाभि-दर्शना साड़ी, भींगे आँचल और नायिका के (हिंसक) नृत्य के बावजूद कुशल निर्देशकीय का ही कमाल है जो यह गाना अश्लील होने से बच जाता है,जिसकी पूरी सम्भावना थी.वरना थोड़ी सी चूक से यह गाना अश्लील हो सकता था.'धरती मईया' इसी बारीकी से बुनी और रची गयी फिल्म है यही वजह है कि आज भी यह फिल्म न केवल अपने कथ्य में बल्कि प्रयोग में भी पुरानी मालूम नहीं पड़ती.यह आज भी भोजपुरी समाज की तस्वीर लेकर सामने आती है,जिसमें भोजपुरी के अपने संस्कार हैं,जो आजकल की भोजपुरी फिल्मों से नदारद होता जा रहा है.
हामरे देहातों में आज भी 'न्यूक्लियर फैमिली'का कांसेप्ट पूर्णतया स्वीकार्य नही है.'धरती मईया'जैसी फिल्में इसी आदर्श स्थिति की भूमिका रचती हैं.वर्तमान की भोजपुरी फिल्मों से वह सहजता तथा जमीनी जुड़ाव गायब है.आज जरुरत है थोड़ा-सा ज़मीनी समस्याओं और यथार्थ से जुड़ने की,वरना जितनी तेज़ी से आज का भोजपुरी फिल्म जगत उभरा है,उसे बुझने में देर नहीं नहीं लगेगी.'धरती मईया'यूँ ही नहीं क्लासिक की परंपरा में आई है,आखिर आज की किस भोजपुरी सिनेमा में बच्चे 'ओका बोका तीन तडोका' खेलते हैं?यह लोकरंग गायब हो चला है और भोजपुरी फिल्में इस समाज और उसके सांस्कृतिक परिवेश से कटती जा रही हैं,मेरे जैसा सिनेड़ी भी भोजपुरी की नयी फिल्मों से डरने लगा है पर उम्मीद की लौ अभी भी जल रही है.
(जस्ट इंडिया (मासिक पत्रिका)के अप्रैल अंक में प्रकाशित)

3/26/10

भोजपुरी की पहली फिल्म-गंगा मईया तोहे पियरी चढईबो


'गंगा मईया तोहे पियरी चढईबो'को भोजपुरी की पहली फिल्म होने का गौरव प्राप्त हैi इस फिल्म के निर्माता विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी तथा निर्देशक कुंदन कुमार थे.साथ ही,संगीत का जिम्मा चित्रगुप्त का था और फिल्म के गीतों को लता मंगेशकर,सुमन कल्याणपुर,मो.रफ़ी,उषा मंगेशकर ने स्वर दिया था.यह बहुत संभव है कि किसी क्षेत्रीय ज़बान की पहली फिल्म को शायद ही वह सफलता नसीब हुई हो,जो भोजपुरी की;गंगा मईया...'के हिस्से आई.नए-नए आज़ाद देश की तत्कालीन समस्याओं को एक बेहतरीन कथानक तथा उम्दा गीत-संगीत में पिरोकर सेल्युलाईड पर उतारा गया था,यही वज़ह रही कि यह फिल्म भोजपुरी की एक उत्कृष्ट क्लासिक का दर्ज़ा पा सकी.
दर्शकों के हिस्से दो मापदंड होते हैं,एक कहानी के कारण कोई फिल्म अच्छी लगती है तो दूसरे अपनी कलात्मकता की वज़ह से उनके मन को भाती है.यद्यपि कलात्मकता के मूल में भी कहानी ही होती है.सारा क्रिया-व्यापार कहानी-कलात्मकता-सम्प्रेषण के सामंजस्य की मांग करता है.इसी का मेल फिल्म को जीवंत और उत्तम बनता है.'गंगा मईया...'की शुरुआत ही जमींदार (तिवारी)द्वारा एक किसान की बटाई ज़मीन वापस ले लिए जाने से होती है-'सरकार त अइसन कानून बनवले ह कि जेकर जोत रही खेत ओकर हो जाई'-यह फिल्म आज़ादी के बाद के नेहरूवियन समाजवाद का माडल तथा तत्कालीन राजनीतिक-सामाजिक दर्शन की झांकी लिए है.फिल्म का नायक(असीम कुमार)एक शिक्षित आदर्शवादी युवक की भूमिका में है,जो अपने ज़मींदार पिता के उलट समता की बात करता है.वह शहर में ऊँचे दर्जे तक पढने के बावजूद गाँव में ही रहकर खेती करना चाहता है क्योंकि उसका मानना है कि पढ़े-लिखे लोग अधिक वैज्ञानिक ढंग से खेती कर सकते हैं,पर उसके पिता का कहना है कि-'कागज़ पर हल ना चलेला'-नायिका (कुमकुम)को इस बात का मलाल है कि वह अनपढ़ है,वरना अपनी प्रेमपाती खुद ही लिखती.नए रंग-ढंग और पुराने कुरीतियों के बीच की बहस को इस फिल्म में इतनी सावधानी से पिरोया गया है कि वह कहीं से भी ठूंसी नहीं लगती.
'गंगा मईया...'की मूल कथा के बीच प्रकरी की तरह एक दृश्य है-गाँव के स्कूल के लिए चंदा इकठ्ठा करने को बैठी पंचायत का क्योकि स्कूल में बच्चों की संख्या में इजाफा हो गया है और मूलभूत सुविधाएं उस अनुपात में नहीं हैं.यह अकेला दृश्य काफी देर तक हमारे दिलो-दिमाग पर छाया रहता है.एक ग्रामीण का तर्क है कि लड़कियों का नाम स्कूल से हटा दिया जाये क्योंकि 'लड़की सभे के पढ़े-लिखे के का जरुरत बा?-नायिका का पिता(नजीर हुसैन)खुद ही अनपढ़ होने का दंश झेल रहा है,वह विरोध जताते हुए कहता है कि मर्दों के काम के लिए बाहर चले जाने पर-'हमनी यहाँ के औरत चिट्ठी-पत्री तार अईला पर तीन किलोमीटर टेशन जाली पढ़वावे बड़े.लड़की कुल पढिहें त इ नौबत काहे आई?-यह ग्रामीण समाज भी अभावों को झेलने को अभिशप्त है.अतः एक प्रश्न और उठता है कि स्कूल आदि की सुविधाओं को देखने का काम तो सरकार का है,तब पंचों का जवाब है-'सरकार स्कूल के रूपया-पईसा देले पर उ पूरा ना पड़ेला,फेर सात लाख गाँव बा इ देश में तब सरकार एतना जल्दी कईसे सब कोई तक पहुंची?तब हमनी के ऐ तरफ से भी सोचे के बा.-यानी नए स्वाधीन देश में सहकारिता और सामूहिक प्रयास से उन्नति का प्रयास.नेहरु के सन्देश की पैरवी.
असीम कुमार अपने पिता की दहेज़ के लालच को धिक्कारता है-'आज हमार एगो बहिन रहित त एतना दहेज़ के बात पर रउआ पर का बितीत'-'ऐ देश में हमार अईसन केतना भाई बहिन बाड़े जे तिलक-दहेज़ के समस्यासे त्रस्त बाड़े'-यहाँ पर नायक का चरित्र एक प्रगतिशील आदर्शवादी युवक के तौर पर उभरता है परन्तु इतने ऊँचे मूल्यों की बात करने वाले नायक की तमाम आदर्शवादिता पंचों के आगे यह हिम्मत नहीं कर पाती कि वह नायिका से अपने रिश्तों को स्वीकार सके और गरीबी तथा क़र्ज़ के बोझ तले दबा लड़की का पिता अपनी जवान बिटिया की शादी उसके उम्र से दोगुने उम्र के पुरुष से करने को मजबूर होता है.बेमेल विवाह के परिणामतः नायिका असमय विधवा हो जाती है.नायिका की माँ(लीला मिश्र)इसी दुःख से चल बसती है.'गंगा मईया...'बरबस ही प्रेमचंद के 'गोदान'की याद दिलाता है ना केवल कथानक के प्रवाह में बल्कि दृश्यों तक में.नज़र हुसैन अँधेरी कोठरी में बैठा है और गाँव की महिलाएं सनझा रोशन कर रही हैं और नजीर के घर कोई औरत नहीं जो सांझ का दिया जलाये,बिन घरनी घर भूत का डेरा स्वतः ही सामने आ जाता है.मरद का साठे पे पाठा होना हो अथवा ज़मींदार,महाजन,क़र्ज़.किसान,जाति-भेद,बेमेल विवाह की समस्या जितनी गोदान के लिखते वक्त थीं उससे रत्ती भर भी कम नए आज़ाद भारत में नहीं था.आदर्श और यथार्थ का गहरे तक गूंथा हुआ कथानक फिल्म को ऊँचा उठा देता है.
यह फिल्म ढहते हुए सामन्तवाद का भी चेहरा सामने लाती है.नजीर हुसैन ताड़ीखाने में ताड़ी पी रहा है,यह ऐसी जगह है जहां जात नहीं पैसा अहमियत रखता है.वह ताड़ी के प्याले में ऊँगली डालकर कहता है-'ताड़ी के लबनी केतना गहिर बा?हमार खेतवा,बरिया,घरवा सब एही में डूब गईल...पईसा ही सबसे बड़का बाबु साहेब ह'-इधर अपनी किस्मत की मारी नायिका तवायफ के कोठे पर जा पहुँचती है और उधर अपनी खुद्दारी पर पिता द्वारा हमला होते देख नायक भी अवसाद में घर छोड़ देता है.तवायफ के हिस्से दो बेहतरीन संवाद हैं-'वेश्या के जनम देला तहरा नियन बाप,भाई और समाज-'और -'मरद के बड़ से बड़ गलती इ दुनिया माफ़ कर देला लेकिन औरत के एक गलती भी ना'-
'गंगा मईया..'के गीत भी उत्कृष्ट भोजपुरी कविताई का नमूना है.'हे गंगा मईया तोहे पियरी चढईबो,सईयाँ से कर द मिलनवा,हम त खेलत रहनी अम्मा जी के गोदिया,काहे बंसुरिया बजावल s ,मारे करेजवा में पीर,लुक-छिप बदरा में चमके जैसे चंदा,मोरा मुख दमके '-आदि गीत आज भी झूमने को मजबूर कर देते हैं.
वर्तमान की भोजपुरी फिल्में भाषा की काकटेल दे रही हैं,उसके उलट 'गंगा मईया...'की भाषा ठेठ भोजपुरी की होने के बावजूद चरित्र प्रधान है और फिल्म देखते हुए एकाएक लगता है गोया अपने ही गाँव की कहानी देख रहे हैं.बाज़ार का दबाव हमेशा से रहा है और रहेगा पर तब के लोग जो फिल्में बनाते थे,उसके जीवन-मूल्यों की महता को बरक़रार रखते थे.वर्तमान की भोजपुरी फिल्मों से वह अपनापन गायब होता जा रहा है और क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों के पतन का एक बड़ा कारण उनका अपने परिवेश-बोध से दूर होते जाना रहा है.सिनेमा की रचना-प्रक्रिया एक डिसिप्लिन की मांग करती है,जिसमें कहानी कहने का प्रयास भर ना हो बल्कि उस कहानी को उत्कृष्ट गीत-संगीत,अभिनय,सम्पादन,सिनेमेटोग्राफी तथा कुशल निर्देशन से उस कहानी को उसकी तात्कालिकता तथा परिवेश के साथ मिलाकर रचनात्मकता के साथ सामने लाना है.एक उम्दा फिल्म हवा-हवाई या रातों-रात तैयार नहीं होती.'गंगा मईया तोहे...'एक ऐसी ही फिल्म है जो तमाम विसंगतियों को साथ लेकर एक सुखान्त प्रेमकथा की भाव -भूमि रचती है और इसी नींव पर आज के भोजपुरी फिल्म जगत की ईमारत कड़ी है,अच्छी या बुरी यह तो समय तय करेगा पर इतना तो है कि'गंगा मईया...'जैसी फिल्म से किसी भाषा की फिल्मों की शुरुआत होना,क्रिकेट के खेल में पारी की पहली ही गेंद पर छक्का लगाने जैसा है,पर एक बात है ध्यान देने की है कि 'गंगा मईया...'की ईमानदारी आज की भोजपुरी फिल्मों से गायब होती जा रही है.

1/10/10

एक बढ़िया निर्देशक की कमज़ोर प्रस्तुति-'माहिम जंक्शन'



कमानी सभागार में उपस्थित लगभग सभी सहृदयों के दिमाग में यही बात घूम रही होगी कि क्यों आखिर वह माहिम जंक्शन देखने आया.मेरे पास दो वाजिब कारण था.पहला ये कि इस प्ले में मेरा जूनियर 'शिवम् प्रधान'काम कर रहा था और दूसरा यह कि मैं हिंदी सिनेमा के सत्तर के दशक के सिनेमा का कायल हूँ.अफ़सोस मैं इस प्ले में अपनी दूसरी वजह को ना पाकर निराश हुआ.अपने निर्देशकीय वक्तव्य में'सोहेला कपूर'ने इस नाटक को अपना ड्रीम प्रोजेक्ट बताया है.उनकी ज़ुबानी-"बचपन में देखी हुई अनेक खुशनुमा बालीवुड फिल्मों का यह अनुचिंतन मेरे लिए बड़ा आनंददायक रहा.इन फिल्मों ने हमारी पीढ़ी को अपने नाच-गानों और नाटकीयता के द्वारा असीम आनंद दिया है.पुनर्पाठ और बालीवुड,इधर ये दोनों ही मुख्यधारा में हैं.नाटक में पुनर्पाठ के साथ आज की प्रतिध्वनियाँ भी हैं.कहानी के कई सूत्र अतीत को वर्तमान से जोड़ते हैं.यह मुम्बई के जीवन को भी एक उपहार है,जीने इधर घातक आतंकवादी हमलेझेले हैं."-यह तो अहि निर्देशकीय.पर यह कहना शायद अति नहीं होगा कि यह नाटक अपने शुरू से ही अजीब तरह से भागम-भाग वाली स्थिति का शिकार हो गया था.कलाकार बॉडी मूवमेंट तक पर कंट्रोल नहीं कर पा रहे थे.हालांकि इस नाटक की पृष्ठभूमि में ७० के दशक का बालीवुड है पर घटनाओं के बीच तबके मशहूर गीतों ,कास्ट्यूम और कुछेक पोस्टर्स के अलावा कुछ भी ऐसा घटित होते नहीं दिखा अजो माहिम जंक्शन को चरितार्थ करता अलबता पूरे परफार्मेंस मं इस बात की कमी खलती रही कि प्लाट पर थोडा उर मेहनत कर लिया जाता तथा रिहर्सल भी.आप भारंगम जैसे थियेटर फेस्टिवल में भाग लेने को आमंत्रित किये गए हैं तो आपसे अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं पर अफ़सोस ऐसा हुआ नहीं और जिस तरह के प्रोमो और पोस्टर्स देख कर दर्शक गए थे उन्होंने अपना सर पीट लिया.कहाँ तो ये संगीतमय नाटक दो कहानियों को लेकर चल रहा है जिसमे एक तरफ एक हिन्दू लड़की और मुस्लिम लड़के का प्यार है तो दूसरी तरह कामुक फिल्म प्रोड्यूसर 'काला धंधा उर्फ़ डीडीएलजे'जो नाटक में राजनितिक तेवर भी पैदा करता है और अंत में दोनों प्रेमियों के मिलने का कारण भी बनता है.आमतौर पर दर्शक नाटक देखने जाते हैं उन्हें अच्छी तरह पता ही कि संगीतमय प्रस्तुतियों में'रंजीतकपूर'का हाथ पकड़ना मुश्किल है,उनका नाटक'शोर्टकट'देखने के बाद एक अलग तरह की ताजगी मिलती है या फिर स्वानंद किरकिरे का'आओ साथी सपना देखें' एक अलग तरह का सुकून देता है.दरअसल संगीतमय नाटक अपने प्लाट ही नहीं बल्कि एक्टर्स के साथ भी अच्छी खासी मेहनत की डिमांड करते हैं तभी यह दर्शकों को प्रभावित कर पाते हैं.'माहिम जंक्शन इसमें नाकाम रहा.उम्मीद है जब भी इसकी अगली प्रस्तुति होगी इस बार से मच बेटर,मच मच बेटर होगा,जो सोहेला कपूर जी करना भी चाहती हैं..हम तब भी इस नाटक को देखने आयेंगे क्योंकि अभी जो कसक बाकी रह गयी जो नहीं देख पाए और जो उम्मीद इस बार पूरी नहीं हो पाई तब शायद जरुर पूरी होगी .तबके लिए सोहिला जी को बेस्ट विशेस ...मुझे व्यक्तिगत तौर पर भरोसा है कि सोहिला जी इस उम्मीद को जाया नहीं जाने देंगी...

1/9/10

उनकी आवाज़ अधरतिया की आवाज़ थी-भिखारी ठाकुर

भि‍खारी ठाकुर बीसवीं शताब्‍दी के सांस्‍कृति‍क महानायकों में एक थे। उन्‍होंने अपनी कवि‍ताई और खेल तमाशा से बि‍हार और पूर्वी उत्‍तरप्रदेश की जनता तथा बंगाल और असम के हि‍न्‍दीभाषी प्रवासि‍यों की सांस्‍कृति‍क भूख को तृप्‍त कि‍या। वह हमारी लोक जि‍जीवि‍षा के नि‍श्‍छल प्रतीक हैं। कलात्‍मकता जि‍स सूक्ष्‍मता की मांग करती है उसका नि‍र्वाह करते हुए उन्‍होंने जो भी कहा दि‍खाया; वह सांच की आंच में तपा हुआ था। उन्‍होंने अपने गंवई संस्‍कार, ईश्‍वर की प्रीति‍, कुल‍, पेट का नरक‍, पुत्र की कामना‍, यश की लालसा आदि‍ कि‍सी बात पर परदा नहीं डाला। उनके रचे हुए का वाह्यजगत आकर्षक और सुगम है ताकि‍ हर कोई प्रवेश कर सके। किंतु प्रवेश के बाद नि‍कलना बहुत कठि‍न है। अंतर्जगत में धूल-धक्‍कड़ भरी आंधी है; और है – दहला देनेवाला आर्तनाद‍, टीसनेवाला करुण वि‍लाप‍, छील देनेवाला व्‍यंग्‍य तथा गहन संकटकाल में मर्म को सहलानेवाला नेह-छोह। उनकी नि‍श्‍छलता में शक्‍ति‍ और सतर्कता दोनों वि‍न्‍यस्‍त हैं। वह अपने को दीन-हीन कहते रहे पर अपने शब्‍दों और नाट्य की भंगि‍माओं से ज़ख़्मों को चीरते रहे। मानवीय प्रपंचों के बीच राह बनाते हुए आगे नि‍कल जाना और उन प्रपंचों की बखि‍या उधेड़ना उनकी अदा थी। तनी हुई रस्‍सी पर एक कुशल नट की तरह चलने की तरह था यह काम। उनके माथे पर थी लोक की भाव-संपदा की गठरी और ढोल-नगाड़ों की आवाज़ की जगह कानों में गूंजती थी धरती से उठती हा-हा ध्‍वनि‍यां। यह अद्भुत संतुलन था। इसी संतुलन से उन्‍होंने अपने लि‍ए रचनात्‍मक अनुशासन अर्जि‍त कि‍या और सामंती समाज की तमाम धारणाओं को पराजि‍त करते हुए संस्‍कृति‍ की दुनि‍या के महानायक बने।

भि‍खारी ठाकुर ने बि‍देसि‍या‍, भाई-वि‍रोध‍, बेटी-वि‍योग‍, वि‍धवा-वि‍लाप‍, कलयुग-प्रेम‍, राधेश्‍याम बहार‍, गंगा-स्‍नान‍, पुत्र-वध‍, गबरघि‍चोर‍, बि‍रहा-बहार‍, नकलभांड के नेटुआ‍, और ननद-भउजाई आदि‍ नाटकों की रचना की। भजन-कीर्तन और गीत-कवि‍ता आदि‍ की लगभग इतनी ही पुस्‍तकें प्रकाशि‍त हुईं। लोक प्रचलि‍त धुनों में रचे गये गीतों और मर्मस्‍पर्शी कथानक वाले नाटक बि‍देसि‍या ने भोजपुरीभाषी जनजीवन की चिंताओं को अभि‍व्‍यक्‍ति‍ दी। जीवि‍का की तलाश में दूरस्‍थ नगरों की ओर गये लोगों की गांव में छूट गयी स्‍त्रि‍यों की वि‍वि‍ध छवि‍यों को उन्‍होंने रंगछवि‍यों में रूपांतरि‍त कि‍या। अपनी लोकोपयोगिता के चलते बि‍देसि‍या भि‍खारी ठाकुर के समूचे सृजन का पर्याय बन गया। बेटी-वि‍योग में स्‍त्री-पीड़ा का एक और रूप सामने था। पशु की तरह कि‍सी भी खूंटे से बांध दिये जाने का दुख और वस्‍तु की तरह बेच कर धन-संग्रह के लालच की नि‍कृष्‍टता को उन्‍होंने अपने इस नाटक का कथ्‍य बनाया और ऐसी रंगभाषा रची जि‍सकी अर्थदीप्‍ति‍ से गह्वरों में छि‍पीं नृशंसताएं उजागर हो उठीं। यह अति‍शयोक्‍ति‍ नहीं है और जनश्रुति‍यों में दर्ज है कि‍ बेटी-वि‍योग के प्रदर्शन से भोजपुरीभाषी जीवन में भूचाल आ गया था। भि‍खारी ठाकुर को वि‍रोध का सामना करना पड़ा। पर यह वि‍रोध सांच की आंच के सामने टि‍क न सका। उनकी आवाज़ और अपेक्षाकृत टांसदार हो उठी। इतनी टांसदार कि‍ आज़ादी के बाद भी स्‍त्री-पीड़ा का नाद बन हिंदी कवि‍ता तक पहुंची। बेटी-वि‍योग का नाम उन दि‍नों ही गुम हो गया और जनता ने इसे नया नाम दि‍या – बेटी-बेचवा। गबरघि‍चोर नाटक में भि‍खारी ठाकुर वि‍स्‍मि‍त करते हैं। उनकी पृष्‍ठभूमि‍ ऐसी नहीं थी कि‍ उन्‍होंने खड़ि‍‍या का घेरा पढ़ा या देखा हो। कोख पर स्‍त्री के अधि‍कार के बुनि‍यादी प्रश्‍न को वह जि‍स कौशल के साथ रचते हैं, वह लोकजीवन के गहरे यथार्थ में धंसे बि‍ना सम्‍भव नहीं।

भि‍खारी ठाकुर पर यह आरोप लगता रहा कि‍ वह स्‍वतंत्रता संग्राम के उथल-पुथल भरे समय में नि‍रपेक्ष होकर नाचते-गाते रहे। यह सवाल उठता रहा कि‍ क्‍या सचमुच भि‍खारी ठाकुर के नाच का आज़ादी से कोई रि‍श्‍ता था। उनके नाच का आज़ादी से बड़ा सघन रि‍श्‍ता था। अंग्रेज़ों से देश की मुक्‍ति‍ के कोलाहल के बीच उनका नाच आधी आबादी के मुक्‍ति‍-संघर्ष की ज़मीन रच रहा था। भि‍खारी ठाकुर की आवाज़ अधरति‍या की आवाज़ थी। अंधेरे में रोती-कलपती और छाती पर मुक्‍के मारकर वि‍लाप करती स्‍त्रि‍यों का आवाज़। यह आवाज़ आज भी भटक रही है। राष्‍ट्रगान से टकरा रही है। (आलोचना पत्रि‍का में पूर्व प्रकाशि‍त लेख का संपादि‍त अंश)

(हृषीकेश सुलभ। कथाकार, नाटककार और नाट्यचिंतक। पथरकट, वधस्‍थल से छलांग, बंधा है काल, तूती की आवाज़, वसंत के हत्‍यारे – कथा-संग्रहों, अमली, बटोही और धरती आबा नाटकों, माटीगाड़ी और मैला आंचल नाट्यरूपांतरों के रचनाकार। नाट्यचिंतन की पुस्‍तक रंगमंच का जनतंत्र हाल ही में प्रकाशि‍त। उनसे hrishikesh.sulabh@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)mohalla live से साभार

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...