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Showing posts from October, 2008

त्यौहार सबका दिक्कत केवल हमारी..

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कल दीपावली कब त्यौहार धूमधाम से संपन्न हो गया। सभी ने खूब मज़े किए होंगे,पर हम हॉस्टल में रहने वाले स्टूडेंट्स के मज़े थोड़े दूसरे किस्म के थे। आप सभी ने सुना होगा. कि त्यौहार माने भांति-भांति के बढ़िया, लजीज व्यंजन और मौज-मस्ती पर अपना तो ये आलम रहा है इस त्यौहार का कि, जब सारी दुनिया धमाचौकडी में मशगूल होती है, नाना प्रकार के लाजवाब पकवान पेल रही होती है ,हम हॉस्टल वाले छात्र अपना पेट दाब के बिस्तर में लेट के घर पर मनाये जा रहे त्यौहार की कल्पना कर रहे होते हैं। दरअसल, त्यौहार चाहे कोई भी हो हॉस्टल के छात्रों के लिए आफत के समान ही होता है। कारण ये है कि इस दिन हमारा मेस बंद रहता है और त्यौहार होने के कारण अगल-बगल के जो एकाध खाने-पीने की गुमटियां हैं वो भी मुए इस दिन बंद कर अपने घर चल देते हैं । अब आप कहेंगे कि आपकी अथॉरिटी कुछ तो व्यवस्था करती होगी पर जनाब ये अथॉरिटी व्यवस्था करती तो हैं पर वह सिर्फ़ दोपहर के स्पेशल लंच तक ही सीमित हो जाता हैं और फ़िर घावों पर नमक छिड़कने सरीखा शब्द हम सबके कानों में सुनाई देता हैं "आप सबको (त्यौहार का नाम )की ढेर सारी बधाइयाँ शुभकामनाएं, आप सब

जुए का एक दिन तो लीगालाईज है ही....

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कल पूरे देश भर में दीपावली धूम- धडाके से मनाई जायेगी। चारों तरफ़ धुएँ और धमाकों का कानफोडू माहौल होगा पर इन सबके बीच जो सबसे रोचक काम हो रहा होगा उधर घर के बच्चों तक का ध्यान शायद ही जाए। ये है दीपावली पर खेला जाने वाला "जुआ" जिसे सुख-समृद्धि दायक कह कर हमने अपने हिसाब से कानूनी और जायज़ कर लिया है। इसके खेले जाने के पीछे (जैसा सुनने में आता है)कहा जाता है कि इस दिन की जीत वर्ष भर धन-धान्य प्रदायक होती है(?)।यह खेल अपने खेले जाने के पीछे इतने वाजिब तर्क गढ़ चुका है कि आप लाख प्रवचन या नैतिक मूल्यों की दुहाई दें घर के बड़े-बुजुर्गों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती।ऐसा नहीं है कि यह खेल महज़ किसी ख़ास वर्ग,शहर या गाँव में खेला जाता है बल्कि 'जुए' महाराज की महिमा चंहु- ओर बड़े भव्य स्तरपर फैली हुई है। पिछले सन्डे को 'नई दुनिया'अखबार का रविवारीय 'मैगजीन'यही कवर स्टोरी लिए हुए था। जिसमे बड़े ही बारीकी से देश के विभिन्न शहरों में से ढूंढ- ढूंढ कर इसकी महिमा बताई गई थी। साथ ही दिल्ली में हुए 'फैशन वीक' के अवकाश सत्रों में रैंप पर चलने वाली मोडल्स की त

"छठ" तो बस "छठ" ही है..

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बात जब भी किसी त्यौहार की होती है तो स्वतः ही अपने सामाजिक परिवेश के कई सन्दर्भों से जुड़ जाता है। बिहार के लोगों के लिए इस पर्व का महत्त्व कितना है इसकी सही तस्वीर देखनी है तो रेलवे रिजर्वेशन की तह में जाइए। यहाँ बिहार जाने वाली सभी ट्रेनों में कोई एक भी जगह किसी भी क्लास में खाली नहीं है। अभी-अभी तत्काल कोटे को चेक करने बैठा था। सच कहूँ तो ,मन में एक प्रकार की हेकडी भी थी कि,नोर्मल टिकट न मिले अपनी बला से,हम तो तत्काल भी ले सकते हैं। अब क्या बताऊँ ,कहना बेकार ही है कि साड़ी हेकडी हवा हो गई है,उसमें भी वेटिंग लिस्ट दिखा रहा है। अब सोच रहा हूँ कि आख़िर सरकार को कितनी ट्रेनें चलानी होगी बिहार के लिए या कितनी भी चल जाए कम ही है?इन सब झमेलों के बीच मेरी परेशानी अभी बची हुई है कि आख़िर अब कौन-सी जुगत भिडाई जाए जिससे कम-से-कम छठ को घर वालों के साथ मना सकूँ। सूर्योपासना का यह पर्व बिहार की सांस्कृतिक पहचान है । घर से बाहर रहने वाले तकरीबन सभी बिहारी भाई चाहे वह अधिकारी हो,छात्र हो,शिक्षाविद हो,नेता हो,या फ़िर मजदूर सभी कम-से-कम यह पर्व घर के लोगों के साथ मनाना चाहते हैं और इसका पूरे वर्ष बड़ी

सिनेमा,सिनेमा केवल सिनेमा,खाली सिनेमा.....

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जेहन में आज भी पहली देखी गई सिनेमा के तौर पर भोजपुरी की "गंगा किनारे मोरा गाँव"ही दर्ज है। बाद में शायद ऋषि कपूर वाली "प्रेम रोग" थी, जिसका गाना हम सभी बच्चे गाया करते थे 'मैं हूँ प्रेम रोगी '। पता नहीं क्यों यही गाना हमारी जुबान पर चढा था।बाद में हमलोग थोड़े और बड़े हुए और सिनेमा ke लिए दीवानगी और बढ़ी। पहले सिनेमा- घरों के विशाल परदों को देख कर बाल-मन यही सोचता था कि हो- न- हो इसी बड़े परदे के पीछे सारा खेल चलता है। हमारी इस बात को बड़े मामा ने जाना तो बहुत हँसे थे,फ़िर एक दिन सीवान(मेरे मामा का घर इसी शहर में है)के प्रसिद्ध 'दरबार' सिनेमा हाल में लेकर गए जहाँ उनका दोस्त मैनेजर हुआ करता था।और तब हमारे आश्चर्य का ठिकाना नही था जब हमने देखा कि ये बड़ा परदा जो सारा खेला दिखाताहै वह तो महज़ ८-१० धोती को सिल कर बना है, और असली खेल तो मुस्तफा मियाँ के हाथों होता है जो उस मशीन (प्रोजेक्टर)को चलाते थे। खैर, सिनेमा से जुडाव दिनों- दिन बढ़ता ही जा रहा था। आज भी उसी गंभीरता के साथ जुडाव बरकरार है पर सही-सही कह नहीं सकता कि उन दिनों जैसी ईमानदारी अब बची है या न

उफान पर है भोजपुरी सिनेमा...

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कोई १०-१२ साल पहले की ही बात है जब सिनेमा पर बात करते हुए कोई भूले से भी भोजपुरी सिनेमा के ऊपर बात करता था,पर यह सीन अब बदल गया है.हिन्दी हलकों में सिनेमा से सम्बंधित कोई भी बात भोजपुरी सिनेमा के चर्चा के बिना शायद ही पूरी हो पाए.ऐसा नहीं है कि भोजपुरी सिनेमा अभी जुम्मा-जुम्मा कुछ सालों की पैदाईश है.सिनेमा पर थोडी-सी भी जानकारी रखने वाला इस बात को नहीं नकार सकता कि भोजपुरी की जड़े हिन्दी सिनेमा में बड़े गहरे तक रही हैं.बात चाहे ५० के दशक में आई 'नदिया के पार'की हो या फ़िर दिलीप कुमार की ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली फिल्मों की इन सभी में भोजपुरिया माटीअपने पूरे रंगत में मौजूद है.इतना ही नहीं ७० के दशक में जिन फिल्मों में सुपरस्टार अमिताभ बच्चन ने धरतीपुत्र टाइप इमेज में आते हैं उन सबका परिवेश ,ज़बान और ट्रीटमेंट तक भोजपुरिया रंग-ढंग का है.और इतना ही नहीं यकीन जानिए ये अमिताभ की हिट फिल्मों की श्रेणी में आती हैं। वैसे भोजपुरिया फिल्मों का उफान बस यूँ ही नहीं आ गया है बल्कि इसके पीछे इस बड़े अंचल का दबाव और इस अंचल की सांस्कृतिक जरूरतों का ज्यादा असर है.९० का दशक भोजपुरी गीत-संगीत का दौर

राजघाट के बगल में लगता है"चोर-बाज़ार"..

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मेरे एक अभिन्न मित्र हैं-अजय उर्फ़ लारा। लारा यूनिवर्सिटी के लिहाज़ से भी सीनियर छात्र हैं। उनकी संगती में दिल्ली और इसके कई रंग हमने देखे-जाने हैं। इन्ही यादों में बसा है-दिल्ली का चोर बाज़ार।इस बाज़ार की प्रशिद्धि आप सबको भी पता होगी । देशी खरीददार ही नहीं बल्कि दिल्ली भ्रमण पर आए विदेशी पर्यटकों की भी मनपसंद जगह रही है-चोर बाज़ार।इसके बारे में किसी से भी पूछने पर कोई ख़राब सा वाकया अभी तक मेरे सुनने में नहीं आया और कमोबेश सभी बड़े मज़े से रस ले-लेकर चोर-बाज़ार के किस्से सुनाया करते हैं कि फलां चीज़ ऐसे मिलती है अमुक सामान बढ़िया-सा मिल जाता है और अमुक सामान ऐसा होता है उनके (बिक्री करने वालों के)पास खरीददारी के कुछ तरीके आपको आने चाहिए इत्यादि-इत्यादि। इन दिनों में इस बाज़ार की जगहें कई बार बदली हैं। पहले यह लाल-किले के पीछे लगा करता था,बाद में जामा-मस्जिद वाले रास्ते पर लगने लगा । दिल्ली ब्लास्ट के बाद इस "चोर-बाज़ार"को ऐसी जगह मिल गई है जिसको देखकर ख़ुद आश्चर्य होता है कि सरकार ने इसको "राजघाट"के पास लगाने की परमिशन कैसे दे दी है। यकीन जानिए अब जब कभी भी आप चोर-बाज़ा

धर्म बदलो फांसी चढो.......

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आज के अखबार की एक ख़बर पर आज मेरी नज़र ठहर गई। ख़बर का मज़मून कुछ यूँ था-'इरान की संसद ने इस आशय का प्रस्ताव सर्वसम्मति और भारी बहुमत से पास कर दिया कि इस देश में धर्म-परिवर्तन करने वालों को मौत की सज़ा दे दी जायेगी'-इरान जैसे और ऐसे ही अन्य कट्टरपंथी देशों में ऐसे निर्णय कोई बड़ा आश्चर्य पैदा नहीं करते कारण हम सबको पता है। पर यही बात किसी धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले राष्ट्र में हो तो बात वाकई चिंताजनक हो जाती है। इंडिया जैसे सेकुलर कहे जाने वाले राष्ट्र में अब खुले-आम औरतें, बच्चे मारे जा रहे हैं,ननों के साथ बलात्कार जैसे घृणित काम किए जा रहे हैं और प्रार्थना-घरों को जलाया जा रहा है सरकार चुपचाप तमाशा देखती रहती हैं। अब अपने देश का यह चेहरा भी सामने आ रहा है कि किसी भी स्टेट में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं रह सकते या नहीं हैं। चाहे वह उड़िसा जी जगह के ईसाई हो या फ़िर कहीं हिंदू बहुल प्रान्त के मुस्लिम या फ़िर कश्मीरी पंडित। एक और कमाल का सीन आज के अखबारों में है वो यह कि देश भर के ऐसे ही घटनाक्रमों को हुए एक तमाशे का आयोजन'एकता परिषद्'के नाम से नई दिल्ली में हुआ जिसमे उड़िसा के

मेरा गांव बदल गया है.शायद पूरा भोजपुर ही....

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वैसे शैक्षणिक कारणों से घर से बाहर रहते तकरीबन १०-११ साल बीत चले हैं पर गांव-घर की खुशबू अभी भी वैसी ही सांसो में है.इस स्वीकार के पीछे हो सकता है मेरा गंवई मन हो. मैंने जबसे होश संभाला अपने आसपास के माहौल में एक जीवन्तता दिखी,मेरा गांव काफ़ी बड़ा है और जातिगत आधार पर टोले बँटे हुए हैं.बावजूद इसके यहाँ का परिवेश ऐसा था, जहाँ जात-पांत के कोई बड़े मायने नही थे.ये कोई सदियों पहले की बाद नही है बल्कि कुल जमा १०-१२ साल पहले की ही बात है. गांव में सबसे ज्यादा जनसँख्या राजपूतों और हरिजनों की है,बाद में मुसलमान और अन्य पिछडी जातियाँ आती हैं.कुछ समय पहले ही गांव की पंचायत सीट सुरक्षित घोषित हुई है और अब यहाँ के सरपंच/मुखिया दोनों ही दलित-वर्ग से आते हैं.साथ ही अपने गांव की एक और बात आपको बता दूँ कि मेरे गांव में आदर्श गांव की तमाम खूबियाँ मौजूद है.मसलन हर दूसरे-तीसरे घर में वो तमाम तकनीकी और जीवन को सुगम बनाने वाली सुविधाएं मौजूद हैं.जब तक मैं था या फ़िर मेरे साथ के और लड़के गांव में थे तब तक तो स्थिति बड़ी ही सुखद थी.मेहँदी हसन,परवेज़,जावेद,नौशाद,वारिश,कलीम सभी लड़के होली में रंगे नज़र आते थे और द

गीत ऐसे की बस जी भर आए......

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कभी-कभी कुछ गीत हमारे अंतर्मन को इतने गहरे छु जाते हैं कि उन्हें सुनते ही मन करता है कि बस समय रुक जाए और आँखें बंद करके खिड़की से ढलते हुए सूरज को की तपिश ली जाए.या फ़िर यूँ कि कमरे के अकेलेपन से निकल कर थोड़ा रिज़ की ओर चलें और थोड़ा नोश्ताल्जिक हो जाए वैसे इन गानों को सुनते सुनते हम इस लोक के आदमी नहीं रहते महाकवि जायसी के शब्दों में "बैकुंठी हो जाते हैं".गुलज़ार इस मामले में थोडी अधिक ऊंचाई पर हैं उनकी फिल्मों के गाने इतने ख़ास होते हैं कि आप एक बार में उसकी गहरे को महसूस नहीं कर सकते, ये गाने बहुआयामी अर्थवत्ता लिए होते हैं,आप उन्ही की एक फ़िल्म "मौसम"के गाने-"दिल ढूंढता है फ़िर वही,फुरसत के रात-दिन /बैठे रहे तसव्वुरे..."को जितनी बार सुनते हैं उतनी बार अज्ञात भावो और यादों में खो जाते है.ये महज़ सिर्फ़ इस गाने कि बात नहीं है या फ़िर गुलज़ार की बात ही खाली नहीं है हम ऐसे ही कुछ गानों की बात कर रहे हैं.-फ़िल्म-'रुदाली' के 'दिल हूम हूम करे घबराए..'को याद कीजिये..नायिका के चेहरे और क्रियाव्यापार के साथ जैसे ही लताजी की आवाज़ थोडी ऊँची पिच पर आकर

मिनाक्षी,मोबाइल और पुलिस-रिपोर्ट

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यूनिवर्सिटी में दिन भर इधर-उधर की (इसमे पढ़ाई भी शामिल है)हांक के,बिना बात के दौड़-भाग के जब हालत पस्त हो जाती है तब सभी लोगों का ध्यान चाय के स्टालों की ओर हो आता है. ये तकरीबन रोज़ की रूटीन में शामिल है और अब ये एक हद तक व्यसन की स्टेज में पहुँच गया है.इसी आदत या लत आप जो भी मान लें ,के फेर में हम तीन जने,मैं,मिहिर और मिनाक्षी पास के ही निरुलाज पहुंचे.बहाना कॉफी पीने का था.कॉफी के साथ-साथ तमाम तरह की जरुरी-गैरजरूरी बतरस में हम तीनों ऐसे खोये कि,यह ध्यान ही ना रहा कि मिनाक्षी ने निरुलाज में अपना मोबाइल छोड़ दिया ,चूँकि हमे वहां से निकले बस ५-७ मिनट ही हुए थे ,हम तेज़ी से वहां गए अपनी जगह को देखा और मोबाइल को वहां ना पाकर काउंटर पर मैनेजर से बात की मगर सब बेकार मोबाइल नही मिलना था नही मिला.अब बारी परेशान होने की थी.दोस्तों ने सलाह दी कि भइये,सबसे पहले नंबर ब्लाक कराओ और फ़िर तुंरत पुलिस कम्प्लेन करो वरना किसी ग़लत हांथों में पड़ गया तो लेने के देने पड़ जायेंगे.थाने गए हम एफ.आई.आर.दर्ज कराने वो तो लाख कोशिशों के बाद नही हुआ बस उनके कागजी कार्यवाही की रेंज बस इतनी थी कि अपना मोबाइल का मॉडल

श्याम चित्र मन्दिर...ढलते समय में

पिछले पोस्ट का शेष.... श्याम चित्र मन्दिर के अपने कई अनुभवों को मैंने आप तक पिछली पोस्ट में पहुँचाया था.इस बार इस सिनेमा हॉल की कुछ और अनूठी बातें जानिए.... पारसी थिएटर याद है....?- बस,ऐसा ही कुछ था श्याम चित्र मन्दिर के प्रचार का ढंग .मसलन जैसे ही कोई नई फ़िल्म आती थी तो उसका बड़े जोर-शोर से जुलूस निकाला जाता था.२-३ तीन पहिये वाले रिक्शे पूरे दिन के लिए किराए पर लाये जाते थे फ़िर उनपर तीन तरफ़ से फ़िल्म के रंग-बिरंगे पोस्टर लकड़ी के फ्रेमों में बाँधकर लटका दिए जाते थे और एक भाईसाब उस रिक्शे में चमकीला कुर्ता पहनकर माइक हाथो में लेकर बैठ जाते थे और रिक्शे के पीछे-पीछे ७-८ सदस्यीय बैंड-बाजे वालो का गैंग चलता था जो मशहूर धुनें बजा-बजाकर लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा करते थे.वैसे ये परम्परा अब भी बरक़रार है मगर बैंड-बाजो की जगह रिकॉर्डर ने ले ली है.पीछे-पीछे बैंडबाजे और रिक्शे में सवार हमारे स्टार कैम्पैनर माइक पर गला फाड़-फाड़कर सिनेमा का विज्ञापन करते रहते.इसकी एक झलक आपको भी दिखता हूँ,- "फ़र्ज़ कीजिये फ़िल्म लगी है -'मर्डर'.तो हमारे प्रचारक महो

मोनू दा और गाँधी जयंती ....

मोनू दा नए पियाक तो नहीं हैं ,हाँ मगर पिछले दो सालों में ये हिसाब-किताब कुछ कम जरुर हो गया था. आजकल जबकि उनके आसपास के सभी लोगों का समय ठीकठाक चल रहा है तो हर दूसरे दिन कोई-न-कोई कुछ-न-कुछ लेकर आ जाता है जिसे देख उनसे मना नहीं किया जाता.पिछले दिनों कुल्लू जॉब छोड़ कर आया और इस खुशी में(?)उसने मोनू दा को पहले 'रेड वाइन' फ़िर 'स्कोच'पिला दी.बस क्या था रोज़ 'ओल्ड मोंक' रम पीने वाले मोनू दा एकाएक ही इस ब्रह्म-सत्य को पा गए की ये क्या आज तक मैंने ,आख़िर मैंने पहले इसे क्यों नहीं चखा था?बस जबसे मोनू दा के हिय में यह मुई अंगूर की बेटी 'रेड वाइन'और 'स्कोच' चढी है,मेरी जान सांसत में आ गई है.उनका कोई भी असाईनमेंट इसके बिना पूरा नहीं होता.अब लगता है कि एम्.एस.सी.(फिजिक्स)की तरह ही कहीं उनका 'लाइब्रेरी साइंस'भी आधे में ना छूट जाए. आज सुबह अखबार देखते ही मैंने कहा कि 'मोनू दा जोधपुर में सैकडों लोग मारे गए'तो उन्होंने कहा -'हाँ यार ,सब समय का फेर है देवी नाराज़ चल रही हैं'-मैंने सोचा मोनू दा देश-दुनिया की भी थोडी बहुत ख़बर रखते हैं और एक