10/29/08

त्यौहार सबका दिक्कत केवल हमारी..


कल दीपावली कब त्यौहार धूमधाम से संपन्न हो गया। सभी ने खूब मज़े किए होंगे,पर हम हॉस्टल में रहने वाले स्टूडेंट्स के मज़े थोड़े दूसरे किस्म के थे। आप सभी ने सुना होगा.कि त्यौहार माने भांति-भांति के बढ़िया,लजीज व्यंजन और मौज-मस्ती पर अपना तो ये आलम रहा है इस त्यौहार का कि,जब सारी दुनिया धमाचौकडी में मशगूल होती है,नाना प्रकार के लाजवाब पकवान पेल रही होती है ,हम हॉस्टल वाले छात्र अपना पेट दाब के बिस्तर में लेट के घर पर मनाये जा रहे त्यौहार की कल्पना कर रहे होते हैं। दरअसल,त्यौहार चाहे कोई भी हो हॉस्टल के छात्रों के लिए आफत के समान ही होता है। कारण ये है कि इस दिन हमारा मेस बंद रहता है और त्यौहार होने के कारण अगल-बगल के जो एकाध खाने-पीने की गुमटियां हैं वो भी मुए इस दिन बंद कर अपने घर चल देते हैं । अब आप कहेंगे कि आपकी अथॉरिटी कुछ तो व्यवस्था करती होगी पर जनाब ये अथॉरिटी व्यवस्था करती तो हैं पर वह सिर्फ़ दोपहर के स्पेशल लंच तक ही सीमित हो जाता हैं और फ़िर घावों पर नमक छिड़कने सरीखा शब्द हम सबके कानों में सुनाई देता हैं "आप सबको (त्यौहार का नाम )की ढेर सारी बधाइयाँशुभकामनाएं,आप सब अपने-अपने लक्ष्य को अचीव करें और हाँ ...प्लीज़ मिलजुल कर शान्ति पूर्वक एन्जॉय कीजियेगा..थैंक्स । "-अब आप ही बताइए कि दोपहर को खीर-पूरी खिलाकर रात को भूखा सुलाने से त्यौहार शुभ कैसे होगा ?

इसी पेट दाबू स्थिति में घर से आने वाला फ़ोन बजता हैं और माताजी आदतन पूछ ही लेती हैं कि 'खाना खा लिए हो ना?'-और जवाब हूँ-हाँ से ना बनता देखकर कहना पड़ता हैं कि -'कल ब्रेकफास्ट बढ़िया से करूँगा'आज लंच बढ़िया और हैवी ले लिया था। '-कल दीपावली को जब सभी ओर पटाखे गरज रहे थे,दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र जो हॉस्टल में रहते हैं इधर-उधर भटक रहे थे कि कुछ खा लिया जाए पर कहाँ?सभी ओर तो बंदी का नज़ारा था,सभी त्यौहार मना रहे थे ।वैसे ही छात्र जीवन में भूख ज्यादा लगती हैं और हमारा सिस्टम भी हमसे थोडी संवेदनाएं नहीं रखता,जो कम-से-कम नाम के ही सही हमारे प्रोवोस्ट /वार्डेन/आरटीवगैरह कहे जाते हैं।जो हमारे हॉस्टल से सेट ही या यूँ कह लीजिये कि हॉस्टल प्रांगण में ही रहते हैं उनके यहाँ जश्न का माहौल था और बच्चे हॉस्टल जो अनुपात में १५-२० ही थे कभी कामनरूम में बैठ कर टीवी देख रहे थे तो कोई अपने कंप्यूटर पर गाने वगैरह सुन रहा था।
यह माजरा महज़ दीपावली तक सीमित नहीं हैं बल्कि ईद ,मुहर्रम ,क्रिसमस,लोहडी,होली,दीपाली सभी सरकारी छुट्टी प्राप्त त्योहारों में समान रूप से लागू हैं। बस ऐसा जान लीजिये कि "त्यौहार तो सबके लिए खुशियाँ लेकर आते हैं पर हॉस्टल में रहने वाले छात्रों के लिए आशंका कि आज भूखे रहना होगा । साथ में दिक्कतें भी(भूखे पेट सोना कम दिक्कत का काम हैं क्या)वैसे यदि आप ये कहेंगे कि आप कुछ हल्का-फुल्का अपने-आप से पका लीजिये तो जनाब यह भी हॉस्टल में जुर्माने का सबब बन जायेगा क्योंकि हॉस्टल के कमरे में कुकिंग अल्लाऊ नहीं हैं। तो फ़िर यह सलाह दे डालिए कि कुछ पहले से खरीद लीजिये ड्राई-फ्रूट जैसा पर पेट भरने का मुद्दा तो फ़िर भी रहा न बाकी । पेट तो रोटियाँ ही मांगता हैं क्या करें।

10/27/08

जुए का एक दिन तो लीगालाईज है ही....


कल पूरे देश भर में दीपावली धूम-धडाके से मनाई जायेगी। चारों तरफ़ धुएँ और धमाकों का कानफोडू माहौल होगा पर इन सबके बीच जो सबसे रोचक काम हो रहा होगा उधर घर के बच्चों तक का ध्यान शायद ही जाए। ये है दीपावली पर खेला जाने वाला "जुआ" जिसे सुख-समृद्धि दायक कह कर हमने अपने हिसाब से कानूनी और जायज़ कर लिया है। इसके खेले जाने के पीछे (जैसा सुनने में आता है)कहा जाता है कि इस दिन की जीत वर्ष भर धन-धान्य प्रदायक होती है(?)।यह खेल अपने खेले जाने के पीछे इतने वाजिब तर्क गढ़ चुका है कि आप लाख प्रवचन या नैतिक मूल्यों की दुहाई दें घर के बड़े-बुजुर्गों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती।ऐसा नहीं है कि यह खेल महज़ किसी ख़ास वर्ग,शहर या गाँव में खेला जाता है बल्कि 'जुए' महाराज की महिमा चंहु-ओर बड़े भव्य स्तरपर फैली हुई है। पिछले सन्डे को 'नई दुनिया'अखबार का रविवारीय 'मैगजीन'यही कवर स्टोरी लिए हुए था। जिसमे बड़े ही बारीकी से देश के विभिन्न शहरों में से ढूंढ-ढूंढ कर इसकी महिमा बताई गई थी। साथ ही दिल्ली में हुए 'फैशन वीक' के अवकाश सत्रों में रैंप पर चलने वाली मोडल्स की तस्वीरेंभी प्रकाशित की गई थी,जिसमे यह साफ़ दिख रहा था कि वह अपना टाइम-पास ताश खेल के कर रही थी। ताश को जुए की श्रेणी से बाहर बताने वाले भी कई महानुभाव हमें मिल जायेंगे जो बताएँगे कि अमुक-अमुक कारणों से ताश खेलना जुआ नहीं है और घर में अपने परिवार के बीच वो भी खेलते हैं साथ ही ,ये भी हो सकता है कि दो-चार संभ्रांत (?)परिवार भी गिनवा दे जो ताश खेलते हैं। नई दुनिया के उसी मैगजीन में ऐसे ही कुछ परिवारों के बारे में बताया गया है जो आपस में ही जुए खेल कर काम चला लेते हैं कि चलो घर का पैसा घर में रह गया। अब पता नहीं कि कितना जरुरी है यह पत्तों और नंबरों का खेल जिसे इसी त्यौहार के लिए शुभ(?)और मुफीद समझा जाता है और पता नहीं क्यों ?इधर एक और ख़बर थी कि ,सिर्फ़ दीपावली के रोज़ दिल्ली महानगर में तक़रीबन १,००० करोड़ रुपये पिछले वर्ष दांव पर लग गए थे। इस साल यह आंकडा और ऊपर जायेगा ,जुआरियों को और खेले-कमाने का मौका मिलेगा तथा सभी अपने-अपने तर्क फ़िर गढ़ेंगे,कुछ पुराने को ही फ़िर दुहरा देंगे। मतलब आज खेल लो जुआ आज सरकार भी कुछ नहीं करेगी त्यौहार के नाम सब छूट है और इतना ही नहीं कुबेर या लक्ष्मी (जो भी रुपये के देवता हैं ,और जो पैसा बांटते हैं)आज ही मेहरबान होते हैं और उनकी मेहरबानी "वाया जुआ बाईपास"होकर ही गुजरती है और यदि आज जिसने इस बाईपास का रास्ता नहीं पकड़ा तो साल भर कड़की और तंगहाली से दो-चार होते रहना पड़ेगा।

मैं सोच रहा हूँ कि क्यों ना एक सलाह विश्व बाज़ार के रहनुमाओं को दे दी जाए कि भइयेआज ही खेल ले इसको सारी मुद्रास्फीति तपाक से ऊपर चढेगी और प्रधानमन्त्री जी तथा वित्तमंत्री जी तो शायद बैठे भी चौपड़ पर जिनकी गोटियाँ शायद रिजर्व बैंक के गवर्नर सजायेंगे। जब इतने बड़े लेवल पर यह गेम (गेम कहना तो मजबूरी हो ही जायेगी जब हमारे नीति-नियंता ही बिसात बिछायेंगे )खेला जाने लगेगा अपने-आप ही कानूनी शक्ल अख्तियार कर लेगा । अब लेगा ,हो जायेगा की बात ना करके इसी बात की फरमाईश कर दी जानी चाहिए कि "जुआ कम-से-कम एक दिन के लिए तो लीगलआईज करो। "-शायद वैश्विक मंदी का असर कुछ कम हो क्योंकि यह तो हम भी मानते हैं ना कि इस दिन की जीत माने साल-भर मामला सही रहेगा,फ़िर इस बार की बाज़ी जीत कर साल भर मामला सही कर लेते हैं और फ़िर दिक्कत आए तो फ़िर है ही अगली दीपावली......


इस बीच कमोबेश सभी पार्टियों ने दिल्ली विधान-सभा चुनाव हेतु अपने-अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं,तो उनके लिए दीपावली का मंत्र भी इस बार बदल जायेगा,जैसा कि आमतौर पर लक्षी और गणेश का जो मंत्र अब तक पढ़ा जाता रहा है वह नही पढ़ा जाएगा. लक्ष्मी का मंत्र यूँ होता आया है..'महालक्ष्मी नमस्तुभ्यम,नमस्तुभ्यम सुरेश्वरी,हरिप्रिया नमस्तुभ्यम,नमस्तुभ्यम दयानिधि"की जगह लक्ष्मी आह्वान का "काका हाथरसी" मंत्र पढ़ा जायेगा-

हे प्रभु आनंददाता नोट हमको दीजिये

लक्ष्मी का और अपना वोट हमको दीजिये

बुद्धि ऐसी शुद्ध कर दो -एक का ढाई करें

जोड़ कर मर जाएँ लाखो खर्च न एक पायी करें ...

(यहाँ थोड़ा सुधार कर पढ़े लाख की जगह करोड़ पढ़े,पंक्तियों में बदलाव काका के प्रति गुस्ताखी होती)

दीपावली की ढेरों शुभकामनाओं के साथ

आपका "मुसाफिर"

10/24/08

"छठ" तो बस "छठ" ही है..


बात जब भी किसी त्यौहार की होती है तो स्वतः ही अपने सामाजिक परिवेश के कई सन्दर्भों से जुड़ जाता है। बिहार के लोगों के लिए इस पर्व का महत्त्व कितना है इसकी सही तस्वीर देखनी है तो रेलवे रिजर्वेशन की तह में जाइए। यहाँ बिहार जाने वाली सभी ट्रेनों में कोई एक भी जगह किसी भी क्लास में खाली नहीं है। अभी-अभी तत्काल कोटे को चेक करने बैठा था। सच कहूँ तो ,मन में एक प्रकार की हेकडी भी थी कि,नोर्मल टिकट मिले अपनी बला से,हम तो तत्काल भी ले सकते हैं। अब क्या बताऊँ ,कहना बेकार ही है कि साड़ी हेकडी हवा हो गई है,उसमें भी वेटिंग लिस्ट दिखा रहा है। अब सोच रहा हूँ कि आख़िर सरकार को कितनी ट्रेनें चलानी होगी बिहार के लिए या कितनी भी चल जाए कम ही है?इन सब झमेलों के बीच मेरी परेशानी अभी बची हुई है कि आख़िर अब कौन-सी जुगत भिडाई जाए जिससे कम-से-कम छठ को घर वालों के साथ मना सकूँ। सूर्योपासना का यह पर्व बिहार की सांस्कृतिक पहचान है । घर से बाहर रहने वाले तकरीबन सभी बिहारी भाई चाहे वह अधिकारी हो,छात्र हो,शिक्षाविद हो,नेता हो,या फ़िर मजदूर सभी कम-से-कम यह पर्व घर के लोगों के साथ मनाना चाहते हैं और इसका पूरे वर्ष बड़ी बेताबी से इंतज़ार करते हैं। आज सुबह ही 'नई दुनिया'में एक छोटी सी ख़बर पढ़ी कि 'कोई सुमेश नाम का पेंटर ,जो सिवान का रहने वाला है इस बात को लेकर बेहद परेशान है कि छठ पर माँ और बीवी-बच्चों के लिए जो नए कपड़े उसने ख़रीदे हैं किस तरह से उनतक पहुंचेंगे सुमेश तो एक उदाहरण है,इस परिस्थिति के शिकार सब हैं। छठ पर डूबते और उगते दोनों ही बेला में सूर्य को नए वस्त्रों में अर्घ्य देने की परम्परा है। इसी कारण सभी वैसे लोग जो घर से बाहर कमा रहे हैं और अपने परिवार का एकमात्र कमाई का जरिए हैं उनसे घर की अपेक्षाएं काफ़ी अलग किस्म की है। इसको बस यूँ समझ लीजिये कि जो परिवार पूरे वर्ष चिथडों में काट देता है उसके लिए नए कपड़े देखने का अवसर भी यही त्यौहार लाता है। ऐसे में मैं इस बात को लेकर संतोष कर सकता हूँ कि जैसे-तैसे जुगाड़ करके मैं घर तो चला ही जाऊंगा । होली-दिवाली-दशहरा इन सब के अपने मायने हैं पर छठ इन सबमें अलग और विशिष्ट है ,कम-से-कम बिहार के सन्दर्भ में तो यह बात सोलह आने सही बैठती है। मेरा छठ को लेकर एक और भी पहलु है कि आख़िर क्यों मैं साल भर घर से दूर रहने पर भी इसी मौके को घर जाने के लिए क्यों चुनता हूँ और क्यों इसके लिए तमाम दुश्वारियां सह कर भी घर जाना चाहता हूँ। सही कहूँ तो मेरे सभी बचपन के साथी-संघाती जो इस देश के कोने-कोने में अब अलग-अलग कारणों से चले गए हैं या रह रहे हैं इस पर्व में घर आते हैं और उन सबसे इकठ्ठा मिलना हो जाता है। फ़िर हमारे साअथ वाले बच्चों और अभी वाले बच्चों जो गाँवमें रह रहे होते हैं उनमें क्रिकेट,कबड्डी,और फूटबालये तीन मैच खेले जाते हैं। इस मैच का सभी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं और फ़िर एक मिश्रित टीम बनाकर दूसरे गाँव से मैच लिया जाता है। पता नहीं ये किसने कब शुरू किया था पर आज भी बदस्तूर जारी है। छठ सही मायनों में एकदम अपना वाला त्यौहार है। सुबह घाट से लौटते व्रतियों से अंजुली फैला कर प्रसाद में ठेकुवा मांगने में आज भी किसीको कोई झिझक नहीं होती है और इस ठेकुवे का स्वाद तो क्या कहने । किसी और कुसमय (अन्य अवसर पर)बनने पर वैसा स्वाद नहीं मिलता। शाम को कोसी भरने और उसके जलते दीयों के चारों ओर गन्ने का घेरा बनाना अद्भुत अनुभूति देता है,अब ऐसे पर्व के लिए थोड़ा कष्ट तो सहना चलेगा।

अंत में एक निवेदन हैं अपने बिहारी नेताजी लोग से कि छठ तो अपने गंगा घाट और गाँव-घर के पोखरे पर ही जंचता है । इस बात को मैं पक्के विश्वास से कह सकता हूँ कि 'जुहू बीच/चौपाटी पर छठ 'छठ'ना रह कर बस सांस्कृतिक तमाशा ही बन जाएगा।त्यौहार सद्भाव के लिए होना चाहिए,मैत्री,शान्ति बढ़ाने हेतु न कि पावर गेम या शक्ति प्रदर्शन का माध्यम hetu ।

10/23/08

सिनेमा,सिनेमा केवल सिनेमा,खाली सिनेमा.....


जेहन में आज भी पहली देखी गई सिनेमा के तौर पर भोजपुरी की "गंगा किनारे मोरा गाँव"ही दर्ज है। बाद में शायद ऋषि कपूर वाली "प्रेम रोग"थी,जिसका गाना हम सभी बच्चे गाया करते थे 'मैं हूँ प्रेम रोगी '। पता नहीं क्यों यही गाना हमारी जुबान पर चढा था।बाद में हमलोग थोड़े और बड़े हुए और सिनेमा ke लिए दीवानगी और बढ़ी। पहले सिनेमा-घरों के विशाल परदों को देख कर बाल-मन यही सोचता था कि हो-न-हो इसी बड़े परदे के पीछे सारा खेल चलता है। हमारी इस बात को बड़े मामा ने जाना तो बहुत हँसे थे,फ़िर एक दिन सीवान(मेरे मामा का घर इसी शहर में है)के प्रसिद्ध 'दरबार' सिनेमा हाल में लेकर गए जहाँ उनका दोस्त मैनेजर हुआ करता था।और तब हमारे आश्चर्य का ठिकाना नही था जब हमने देखा कि ये बड़ा परदा जो सारा खेला दिखाताहै वह तो महज़ ८-१० धोती को सिल कर बना है,और असली खेल तो मुस्तफा मियाँ के हाथों होता है जो उस मशीन (प्रोजेक्टर)को चलाते थे।खैर,सिनेमा से जुडाव दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा था। आज भी उसी गंभीरता के साथ जुडाव बरकरार है पर सही-सही कह नहीं सकता कि उन दिनों जैसी ईमानदारी अब बची है या नही?

गाँव में जब भी कोई बारात आती तो वह हमारे ही बगीचे में ठहरती क्योंकि हमारा आम का बगीचा गाँव के शुरुआत में ही था। हम बच्चों का इंटरेस्ट इस बात में नहीं होता था कि बारात कैसी है ,दूल्हा कैसा है या फ़िर कहाँ से आई है ,बस पूरी टोली इस बात का पता लगाने में जुट जाती कि ,इस बारात में "विडियो "आया है या नहीं। विडियो माने पूरी रात वी.सी. आर.पर फिल्मों का चलाया जाना। जिसे हम कभी माँ-बाप की चिरौरी करके देखते थे तो कभी रात को सभी के सो जाने के बाद पिछवाडे से उतर कर। इस काम में हम सभी भाईयों में कभी मतभेद नहीं रहा। सबके जागने से पहले घर में हाज़िर रहते पर एक दिन पिताजी ने पकड़ ही लिया। फ़िल्म के लिए रतजगा करने के कारण 'मंटू' दिनभर सोया रहा और जब उसके मामाजी यानी मेरे पिताजी ने कड़ककर पूछा तो टूट गया । बाद में उस एक "गद्दार"की वजह से सभी bhaaee - लोगों का रात का खाना बंद हुआ सो अलग उलटे पिटाई भी पड़ गई और तो और सिनेमा कभी भी भागकर ना देखने की कसम खानी पड़ी(दरसल शर्मिंदगी इसलिए भी ज्यादा हो रही थी क्योंकि छोटे-छोटे भाई-बहन हम चारों को अजीब नज़रों से देख रहे थे)। हालांकि इस कसम को ना तो मैं निभा पाया ना ही अन्य भाई,सभी आज भी सिनेमा के प्रति ऐसा ही राग रखते हैं।

हाई स्कूल अधिक स्वछंदता लेकर आया था। यहाँ कोई देखने सुनने वालानहीं था और 'महेश'जैसे मित्र भी बन गए थे ,जो तिवारी सर के शब्दों में "बड़का फिलिमबाज़"था। स्कूल घर से ३ किलोमीटर दूर था और हम सब साइकिल से आते थे। साइकिल यह सुविधा देती थी कि चाहे जितनी भी देर हो रही हो सिनेमाहाल या घर कहीं भी टाइम पर पहुँचना हमारे हाथ में होता था। कैशोर्य में नए-नए पदार्पण ने हमारा मन इतना बढ़ा दिया था कि अब बारात वालों से अपना विरोध खुलकर जाता देते थे कि 'बड़े घटिया हो जी आपलोग नाच पार्टी लेकर आए हो विडियो नहीं '।कहकर हम अपनी अकड़ में एक तरफ़ चल देते। हाई स्कूल के बगल में सरकारी हस्पताल हुआ करता था (अब भी है),उसीकी दीवार में हमने झुकर निकलने भर का छेदबना लिया था जिसमें हमारा साथ'पुरानी चौक 'के दोस्तों ने दिया था आख़िर उनका मोहल्ला जो ठहरा ,उनकी अनुमति और उनके साथ के बिना यह काम सम्भव नहीं ही था। यह सारा जुगाड़ नए-नए खुले "राजू विडियो हाल"तक शार्टकट तरीके से और जल्दी पहुँचने के लिए था। हमारे ही डेढ़ -दो रुपये जमा करके राजू वाले ने अब विडियो हाल की जगह अब 'राजू मिनी 'टाकिज' बना ली है(ये हमारी मण्डली का मानना है)।

अब जबकि सिनेमा देखने को सारी सुविधाएं भी मौजूद हैं, पिताजी के डंडे का डर भी (कुछ ख़ास)नहीं है तब भी जो मज़ा उस वक्त आता था उतना आराम से बैठ कर पॉपकार्न खाते एयरकूल्ड हाल में नहीं मिलता। पर सिनेमा उठते-जागते दिमाग पर किसी न किसी रूप में हावी है। आख़िर इतने बड़े माध्यम को जो आपके सपने,आपकी सच्चाई सभी कुछ आपके सामने लाता है उसको नकारकर भी तो जी नहीं मानेगा। क्या करें यह तो रगों में दौड़ रहा है ज़िन्दगी सेल्युल्लोइड नहीं होती पर इससे अलग भी तो नहीं है ..कम-से-कम अपने बारे में तो इस पागलपन को खुलेमन से स्वीकारता हूँ।

10/22/08

उफान पर है भोजपुरी सिनेमा...


कोई १०-१२ साल पहले की ही बात है जब सिनेमा पर बात करते हुए कोई भूले से भी भोजपुरी सिनेमा के ऊपर बात करता था,पर यह सीन अब बदल गया है.हिन्दी हलकों में सिनेमा से सम्बंधित कोई भी बात भोजपुरी सिनेमा के चर्चा के बिना शायद ही पूरी हो पाए.ऐसा नहीं है कि भोजपुरी सिनेमा अभी जुम्मा-जुम्मा कुछ सालों की पैदाईश है.सिनेमा पर थोडी-सी भी जानकारी रखने वाला इस बात को नहीं नकार सकता कि भोजपुरी की जड़े हिन्दी सिनेमा में बड़े गहरे तक रही हैं.बात चाहे ५० के दशक में आई 'नदिया के पार'की हो या फ़िर दिलीप कुमार की ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली फिल्मों की इन सभी में भोजपुरिया माटीअपने पूरे रंगत में मौजूद है.इतना ही नहीं ७० के दशक में जिन फिल्मों में सुपरस्टार अमिताभ बच्चन ने धरतीपुत्र टाइप इमेज में आते हैं उन सबका परिवेश ,ज़बान और ट्रीटमेंट तक भोजपुरिया रंग-ढंग का है.और इतना ही नहीं यकीन जानिए ये अमिताभ की हिट फिल्मों की श्रेणी में आती हैं।

वैसे भोजपुरिया फिल्मों का उफान बस यूँ ही नहीं आ गया है बल्कि इसके पीछे इस बड़े अंचल का दबाव और इस अंचल की सांस्कृतिक जरूरतों का ज्यादा असर है.९० का दशक भोजपुरी गीत-संगीत का दौर लेकर हमारे सामने आया ,अब ये गीत-संगीत कैसा था (श्लील या अश्लील),या फ़िर इनका वर्ग कौन सा था ये बाद की बात है.हालाँकि यह भी बड़ी कड़वी सच्चाई है कि इसके पीछे जो दिमाग लगा था वह किसी सांस्कृतिक मोह से नहीं बल्कि विशुद्ध बाजारू नज़रिए से आया था.वैसे इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि इसीकी दिखाई राह थी जो भोजपुरी सिनेमा का अपना बाज़ार/ अपना जगत बनने की ओर कुछ प्रयास होने शुरू हो गए.परिणाम ये हुआ कि अब तक भोजपुरी का जो मार्केट सुस्त था और जिसे भोजपुरी गीत-संगीत ने जगाया था वह अब चौकन्ना होकर जाग गया.वो कहते हैं ना कि सस्ती चीज़ टिकाऊ नहीं होती वही बात इन गीतों के साथ हुई क्योंकि कुछ ना होने की स्थिति में लोगों ने इन्हे सुननाशुरू किया था,मगर अब वैसी कोई मजबूरी नहीं रह गई .अब देखने वाले इस बात को आसानी से देख सकते हैं कि भोजपुरी अलबमों का सुहाना (?)दौर बीत चुका है लोग अब भी 'भरत शर्मा' ,महेंद्र मिश्रा'बालेश्वर यादव''कल्पना' ,'शारदा सिन्हा'जैसों को सुनना पसंद करते हैं जबकि 'गुड्डू रंगीला','राधेश्याम रसिया',जैसों को सुनते या उनका जिक्र आते ही गाली देते हैं।

ऐसा नहीं है कि भोजपुरी फ़िल्म जगत का ये दौर या उफान बस एकाएक ही आ गया .दरअसल पिछले १०-१५ सालों से हिन्दी सिनेमा से गाँव घर गायब हो चला है अब फिल्मों में यूरोप और एन आर आई मार्केट ही ध्यान में रखा जाने लगा था क्योंकि अपने देश में फ़िल्म के नहीं चल पाने की स्थिति में मुनाफे का मामला वहां से अडजस्ट कर लिया जाता .एक और बात इसी से जुड़ी हुई थी कि गाँव की जो तस्वीर इन फिल्मों में थी वह पंजाब ,गुजरात केंद्रित हो चला था स्थिति अभी भी ऐसी ही है.बस इतनी बड़ी आबादी को अब सिनेमा में अपनी कहानी चाहिए थी अपने व्रत-त्यौहार, अपने लोग,अपनी बात ,अपनी ज़बान चाहिए थी और समाज और मार्केट दोनों ही इसकी कमी शिद्दत से महसूस कर रहे थे और लोगों की इस भावनात्मक जरुरत को भोजपुरी फिल्मों ने पूरा किया और देखते ही देखते भोजपुर प्रदेश के किसी भी शहर के अधिकाँश सिनेमा-घरों में भोजपुरी फिल्में ही छा गई और दिनों दिन छाती जा रही है.अब तो इसका संसार अपने देश की सीमाओं के पार तक पहुँच गया है इतना ही नहीं इसके इस उभार को देखकर ही हमारे हिन्दी सिनेमा के बड़े-बड़े स्टार तक इन फिल्मों में काम कर रहे हैं,इस पूरे तबके को अब अपना ही माल चाहिए यही कारण है कि बिहार और पूर्वांचल के बड़े हिस्से में अक्षय कुमार की जबरदस्त हिट
फ़िल्म 'सिंह इज किंग'ठंडी रही।

अभी तो यह रेस और तेज़ होगी देखते जाइये...

10/16/08

राजघाट के बगल में लगता है"चोर-बाज़ार"..


मेरे एक अभिन्न मित्र हैं-अजय उर्फ़ लारा। लारा यूनिवर्सिटी के लिहाज़ से भी सीनियर छात्र हैं। उनकी संगती में दिल्ली और इसके कई रंग हमने देखे-जाने हैं। इन्ही यादों में बसा है-दिल्ली का चोर बाज़ार।इस बाज़ार की प्रशिद्धि आप सबको भी पता होगी । देशी खरीददार ही नहीं बल्कि दिल्ली भ्रमण पर आए विदेशी पर्यटकों की भी मनपसंद जगह रही है-चोर बाज़ार।इसके बारे में किसी से भी पूछने पर कोई ख़राब सा वाकया अभी तक मेरे सुनने में नहीं आया और कमोबेश सभी बड़े मज़े से रस ले-लेकर चोर-बाज़ार के किस्से सुनाया करते हैं कि फलां चीज़ ऐसे मिलती है अमुक सामान बढ़िया-सा मिल जाता है और अमुक सामान ऐसा होता है उनके (बिक्री करने वालों के)पास खरीददारी के कुछ तरीके आपको आने चाहिए इत्यादि-इत्यादि।
इन दिनों में इस बाज़ार की जगहें कई बार बदली हैं। पहले यह लाल-किले के पीछे लगा करता था,बाद में जामा-मस्जिद वाले रास्ते पर लगने लगा । दिल्ली ब्लास्ट के बाद इस "चोर-बाज़ार"को ऐसी जगह मिल गई है जिसको देखकर ख़ुद आश्चर्य होता है कि सरकार ने इसको "राजघाट"के पास लगाने की परमिशन कैसे दे दी है। यकीन जानिए अब जब कभी भी आप चोर-बाज़ार जायेंगे इसको राजघाट के बाजू से जाने वाले रास्ते पर ही जमा हुआ पाएंगे।इस बात के लिए आप चाहे सर धुन ले पर है यह कड़वी सच्चाई।
चलिए एक पल को हम यह मान लेते हैं कि यहाँ ऐसा-वैसा कोई काम नही होता जैसा हम 'सामाजिक'लोग मानते हैं कि 'ग़लत'है,फ़िर भी क्या इस बाज़ार को राजघाट के पास लगाने की इजाज़त देना ठीक है?महान वैज्ञानिक आइन्स्ताईन ने कभी कहा था कि 'आने वाले वर्षों में लोग इस बात पर विश्वास नहीं करेंगे कि गांधी जैसा कोई व्यक्ति भी हुआ था'-पिछले दशकों में जिस तरह की कुछ घटनाएं घटी हैं और हो रही हैं उनको देखते हुए इस बात को स्वीकारना ही पड़ेगा अब ऐसा लगने लगा है। या फ़िर इस बात को हमें कुछ यूँ देखना चाहिए कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं ?या ये भी कि यहाँ 'चोरी-वोरी' का कोई माल नहीं मिलता -ये सोच कर खुश और संतुष्ट हो लिया जाए?
जो भी पर प्रशासन को इस ओर ध्यान देना ही चाहिए कि 'चोर बाज़ार'को उपलब्ध करायी गई जगह कौन-सी है। अनजाने में ही सही (मान लेते हैं)हुई गलती का निवारण जरुरी है दिल्ली के सन्डे की पहचान इस 'बाज़ार'को कहीं और लगाया जाए कम-से-कम उस 'व्यक्ति'का कुछ तो लिहाज़ हो,वैसे ही अब हमलोग (इसमे सभी किसी न किसी रूप में शामिल हैं) भांति-भांति से उस 'महापुरुष' का मज़ाक बनाते रहते और देखते रहते हैं। अब कम-से-कम उसकी समाधि का रास्ता चोर-बाज़ार के रास्ते की पहचान तो न बने कोई ये तो न कहे कि -"वही राजघाट के बगल में"....

10/14/08

धर्म बदलो फांसी चढो.......


आज के अखबार की एक ख़बर पर आज मेरी नज़र ठहर गई। ख़बर का मज़मून कुछ यूँ था-'इरान की संसद ने इस आशय का प्रस्ताव सर्वसम्मति और भारी बहुमत से पास कर दिया कि इस देश में धर्म-परिवर्तन करने वालों को मौत की सज़ा दे दी जायेगी'-इरान जैसे और ऐसे ही अन्य कट्टरपंथी देशों में ऐसे निर्णय कोई बड़ा आश्चर्य पैदा नहीं करते कारण हम सबको पता है। पर यही बात किसी धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले राष्ट्र में हो तो बात वाकई चिंताजनक हो जाती है। इंडिया जैसे सेकुलर कहे जाने वाले राष्ट्र में अब खुले-आम औरतें,बच्चे मारे जा रहे हैं,ननों के साथ बलात्कार जैसे घृणित काम किए जा रहे हैं और प्रार्थना-घरों को जलाया जा रहा है सरकार चुपचाप तमाशा देखती रहती हैं। अब अपने देश का यह चेहरा भी सामने आ रहा है कि किसी भी स्टेट में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं रह सकते या नहीं हैं। चाहे वह उड़िसा जी जगह के ईसाई हो या फ़िर कहीं हिंदू बहुल प्रान्त के मुस्लिम या फ़िर कश्मीरी पंडित। एक और कमाल का सीन आज के अखबारों में है वो यह कि देश भर के ऐसे ही घटनाक्रमों को हुए एक तमाशे का आयोजन'एकता परिषद्'के नाम से नई दिल्ली में हुआ जिसमे उड़िसा के मुख्यमंत्री और देश के होम मिनिस्टर सब्जी-भाजी बेचने वालों की तरह एक-दूसरे से लड़ पड़े कि तू जिम्मेदार तो तू जिम्मेदार,अब पता नहीं कौन जिम्मेदार है। देश में प्रजातंत्र है और ये दोनों महानुभाव हमारी जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं।

इस पूरी हिंसा और तांडव के पीछे जिनका हाथ है उनकी पूरी ख़बर होने के बावजूद उन 'बजरंगियों' और 'विहिपियों' का कोई सरकार क्यों कुछ नहीं कर पा रही या फ़िर इसके भीतर भी कोई ऐसा खेल है जिसे आम आदमी समझ नहीं पा रहा है।

अपने यहाँ कि साझी संस्कृति जिसका दंभ भरते हम नहीं अघाते वह भी नंगे रूप में सामने आ गया है। अब संस्कृति तो है मगर साझी नही।ये हमारे धर्म रक्षक (तथाकथित/स्वयम्भू)धर्म परिवर्तन कराने वालों के घर बरबाद करने की कूबत रखते हैं पर उन कारणों में झाँकने के जेहमत नहीं उठाना चाहते जो इसके मूल में है। खाली पेट विचार नहीं पनपता .जिस परिवार के बच्चे अपने मुखिया के सामने भूखों मरते हैं उनके लिए पहला प्रश्न 'रोटी' होता है ना कि धर्म। ऐसी स्थिति में अपने सो कॉल्ड सबसे रिच ,पुराने ,समृद्ध धर्म(?)को अपनी छाती से सटा कर जिन्दा रहना बहुत मुश्किल है। इतिहास गवाह है कि हमेशा ही निचले तबको के लोगों की ही बलि हमेशा चढी है,आज भी चढ़ रही है। धर्मान्तरण कराने वाले ईरानी संसद की जद में नहीं आते बल्कि एक उदार सेकुलर देश(?)इंडिया में हैं फ़िर भी फांसी (जलाये,मारे जा रहे हैं) चढाये जा रहे हैं....ये खेल भी काफ़ी रोमांचक और खतरनाक है..अपने धर्म के ठेकेदारों ने सुधार करने की महती जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है (शुद्धि का).आइये इनका स्वागत करते हैं या फांसी चढ़ने,जलाए जाने को तैयार रहिये क्योंकि यही सरकार है और भगवन और खुदा भी ,तो अब 'जो भी धर्म बदलेगा/बदलवायेगा...फांसी चढेगा और ऐसा ईरान में नहीं यहीं सेकुलर देश भारत ,साझी-संस्कृति वाले भारत /इंडिया में हो रहा है ..

10/7/08

मेरा गांव बदल गया है.शायद पूरा भोजपुर ही....


वैसे शैक्षणिक कारणों से घर से बाहर रहते तकरीबन १०-११ साल बीत चले हैं पर गांव-घर की खुशबू अभी भी वैसी ही सांसो में है.इस स्वीकार के पीछे हो सकता है मेरा गंवई मन हो. मैंने जबसे होश संभाला अपने आसपास के माहौल में एक जीवन्तता दिखी,मेरा गांव काफ़ी बड़ा है और जातिगत आधार पर टोले बँटे हुए हैं.बावजूद इसके यहाँ का परिवेश ऐसा था, जहाँ जात-पांत के कोई बड़े मायने नही थे.ये कोई सदियों पहले की बाद नही है बल्कि कुल जमा १०-१२ साल पहले की ही बात है. गांव में सबसे ज्यादा जनसँख्या राजपूतों और हरिजनों की है,बाद में मुसलमान और अन्य पिछडी जातियाँ आती हैं.कुछ समय पहले ही गांव की पंचायत सीट सुरक्षित घोषित हुई है और अब यहाँ के सरपंच/मुखिया दोनों ही दलित-वर्ग से आते हैं.साथ ही अपने गांव की एक और बात आपको बता दूँ कि मेरे गांव में आदर्श गांव की तमाम खूबियाँ मौजूद है.मसलन हर दूसरे-तीसरे घर में वो तमाम तकनीकी और जीवन को सुगम बनाने वाली सुविधाएं मौजूद हैं.जब तक मैं था या फ़िर मेरे साथ के और लड़के गांव में थे तब तक तो स्थिति बड़ी ही सुखद थी.मेहँदी हसन,परवेज़,जावेद,नौशाद,वारिश,कलीम सभी लड़के होली में रंगे नज़र आते थे और दीवाली में इनके घरों में भी रौशनी की जाती थी,और सब-ऐ-बरात पर हमारे यहाँ भी रौशनी की जाती.होली में मेरे यहाँ तीन चरणों में होली मानती है पहले रंगों वाली(इस होली में बच्चे-बच्चियां ,किशोर-किशोरियां शामिल होते),दुसरे में बूढे,जवान,बच्चे सभी शामिल होते ,जोगीरा गाया जाता और धूल,कीचड़ आदि से एक दूसरे को रंग कर एकमेक कर दिया जाता मानो सब एक दूसरे को यही संदेश देते थे कि आख़िर मिटटी का तन ख़ाक में ही तो जाना है क्यों विद्वेष पालना,फ़िर नहाने-धोने के बाद तीसरे चरण की होली साफ़-सुथरे,नए कपडों में अबीर और गुलाल से खेली जाती.यहाँ सिर्फ़ त्योहारों में ही नही बल्कि दिनचर्या में भाईचारा दीखता था जब कोई भी दुखहरण काका के सेहत की ख़बर ले लेता था और गांव की भौजाईयों से चुहल करता हुआ निकल जाता.घरो या बिरादरी का बंधन,मुसलमान ,हिंदू जातिभेद हो सकता है रहा हो पर उपरी तौर पर नहीं ही दिखता था.इससे जुड़ा एक वाकया याद आता है जो मेरे ही परिवार से ही जुडा है.हुआ यूँ था कि मेरी सबसे छोटी बहन बीमार थी मैं भी मिडिल स्कूल का छात्र था.तब हर जगह से निराश होने के बाद पिताजी ने व्रत लिया की रोजे और ताजिया रखेंगे जो बाद में हुआ भी और मुहर्रम के समय लगातार २ साल तक पिताजी ने ताजिया ख़ुद बनाया और जगह-जगह घुमाने के बाद कर्बला तक मैं ख़ुद अपने कंधो पर ले गया था जिसमे मेरे दो फुफेरे भाई और चंदन,संतोष जैसे दोस्त भी थे.मुहर्रम के अवसर पर निकलने वाले अखाडे में हमारे सभी धर्म-वर्ग के कोग अपने-अपने जौहर दिखाते थे.हिन्दुओं में ये अखाडा रक्षा-बंधन की शाम को निकलता था.इसे महावीरी अखाडा कहा जाता इस अखाडे में लतरी मियाँ(इनका असली नाम मुझे मालूम नहीं )के लाठी का कौशल आसपास के दस गांवों के लठैतों पर भारी था.अच्छा हुआ गांव की इस स्थिति को देखने से पहले ही अल्लाह ने उन्हें ऊपर बुला लिया.अब जबसे गोधरा हुआ है (गोधरा ही सबसे अधिक जिम्मेदार है क्योंकि अयोध्या अधिक दूर ना होने के बावजूद गांव का माहौल ख़राब न कर सका था या यूँ भी कह सकते हैं कि संचार माध्यमों की पहुँच इतने भीतर तक तब नहीं हुई थी)अब त्यौहार और अखाडे हिन्दुओं और मुसलमानों के हो गए हैं.नए लड़के तो पता नहीं किस हवा में रहते हैं,अपने साथ के लड़के भी जो अब बाहर रहने लगे हैं अजीब तरीके से दुआ-सलाम करते हैं.वारिश गांव में ही है कहता है-'इज्ज़त प्यारी हैं तो भाई इन छोकरों के मुंह ना लगो ,ये इतने बदतमीज़ हैं कि गांव की लड़कियों पर ही बुरी निगाह रखते हैं,बड़े-छोटों की तमीज तो छोड़ ही दो,ये तो पता नहीं किस जमाने की बात इन्हे लगती है"-मैं हैरत से देखता रहा उन लड़कों को जो बाईक पर बैठ कर तेज़ी से बगल से गुज़र जाते हैं और पता नहीं कैसा हार्न मारते हैं जिससे कि खूंटे से बंधे मवेशी बिदक जाते हैं.निजामुद्दीन चाचा जिनके लिए कहा जाता है कि उनके लिए उनकी अम्मी ने "छठ"का तीन दिवसीय बिना अन्न-जल के व्रत रखा था और मरने तक बड़ी खुशी से बताया करती थी कि "हमार निजाम,छठी माई के दिहल ह"-निजाम चाचा भी इस बात को एक्सेप्ट करते थे.आजकल दिल्ली में ही हैं और घर कम ही जाते हैं.रमजान बीते ज्यादा दिन नहीं हुए मगर ईद पर यूँ ही हॉस्टल के कमरे में रह गया बिना सेवईयों के.जब रोजे चल रहे थे तब फ़ोन किया कि -अब तो पिताजी कि ऐश होगी रोज़ इफ्तार के बहाने कुछ न कुछ बनाने की डिमांड करेंगे?'-मम्मी ने जवाब दिया-'बाक अब वे इफ्तार नही करते?'-हमारे घर में इफ्तार मुसलमान भाईयों के कम्पटीशन में होता था यानी पिताजी का मानना था कि-'खाली उन्ही की जागीर है क्या इफ्तार'-पिताजी बाकायदा नियम-कायदे से इफ्तार करते और शुरू करने से पहले हमसे मुस्कराकर कहते -'अभी कोई नहीं खायेगा पहले अजान हो जाने दो'-और हम पालन भी करते.मतलब एन्जॉय करने का कोई भी मौका नही छोड़ा जाता,ऐसा करने वाली फैमिली सिर्फ़ हमारी ही नहीं थी और भी कई थे पर अब...(?).खेतों में धान बोते मजदूरों के साथ लेव (धान बोने से पहले खेत में तैयार किए कीचड़)में खड़ा होने पर गांव के रिश्ते का भतीजा जो पटना में मेडिकल या इंजीनियरिंग की तैयारी करता है मुझसे उखड़े हुए बोला-'क्या मुन्ना चा (भोजपुरी समाज में चाचा को नाम के साथ चा जोड़ कर बोला जाता है)दिल्लियो रह कर भी एकदम महाराज एटिकेट नही सीखे अपना नहीं तो हम लोगों का ख्याल कीजिये महराज"-मैं सोचता हूँ अपने खेत में खड़ा होना भी किसी एटिकेट की मांग करता है क्या?अब मेहँदी मियाँ हाजी हो गए हैं और 'मिलाद'पढ़ते हैं पाँच वक्त के नमाजी हैं.दूर से मुस्कराकर निकल जाते हैं ये लड़का गांव का पहला पेस बॉलर था.श्याम बाबा कह रहे थे-'ऐ बाबा(ब्राह्मणों को बाबा कहते हैं)कहाँ-कहाँ कौन से टोला में घूमते रहते हो तुम्हे पता नहीं अब गांव का माहौल कितना ख़राब हो गया है?-अब मैं उनकी इस बात का क्या जवाब दूँ चुपचाप हूँ-हाँ कर देता हूँ.गांव में रिजर्व सीट होने के बाद सवर्णों की चिंता हैं कि'पता नहीं गांव का क्या होगा ?'-मेरा गांव बदल गया है और शायद ये बदलाव पुरे आसपास में हो रहा है........

10/6/08

गीत ऐसे की बस जी भर आए......


कभी-कभी कुछ गीत हमारे अंतर्मन को इतने गहरे छु जाते हैं कि उन्हें सुनते ही मन करता है कि बस समय रुक जाए और आँखें बंद करके खिड़की से ढलते हुए सूरज को की तपिश ली जाए.या फ़िर यूँ कि कमरे के अकेलेपन से निकल कर थोड़ा रिज़ की ओर चलें और थोड़ा नोश्ताल्जिक हो जाए वैसे इन गानों को सुनते सुनते हम इस लोक के आदमी नहीं रहते महाकवि जायसी के शब्दों में "बैकुंठी हो जाते हैं".गुलज़ार इस मामले में थोडी अधिक ऊंचाई पर हैं उनकी फिल्मों के गाने इतने ख़ास होते हैं कि आप एक बार में उसकी गहरे को महसूस नहीं कर सकते, ये गाने बहुआयामी अर्थवत्ता लिए होते हैं,आप उन्ही की एक फ़िल्म "मौसम"के गाने-"दिल ढूंढता है फ़िर वही,फुरसत के रात-दिन /बैठे रहे तसव्वुरे..."को जितनी बार सुनते हैं उतनी बार अज्ञात भावो और यादों में खो जाते है.ये महज़ सिर्फ़ इस गाने कि बात नहीं है या फ़िर गुलज़ार की बात ही खाली नहीं है हम ऐसे ही कुछ गानों की बात कर रहे हैं.-फ़िल्म-'रुदाली' के 'दिल हूम हूम करे घबराए..'को याद कीजिये..नायिका के चेहरे और क्रियाव्यापार के साथ जैसे ही लताजी की आवाज़ थोडी ऊँची पिच पर आकर "तेरी ऊँची अटारी ई ई ई ...मैंने पंख लिए कटवाए "कहती है दिल बरबस ही भर आता है.ये दो गाने ऐसे हैं कि बस मन करता है जीभर के रोये बस रोते ही रहे,कारण पता नही कोई इतना बढ़िया कैसा लिख सकता है कोई कैसे गा सकता है?-"सत्या"(रामगोपाल वर्मा वाली)अपने नए किस्म के प्लाट के कारण काफ़ी चर्चित रही थी.इसका एक गाना "सपने में मिलती है"-it फेमस हुआ था कि आज भी सभी शादियों में तकरीबन बज ही जाता है पर इसी फिम का एक और गीत था जो फेमस तो नहीं हुआ पर शायद इस फ़िल्म के किरदारों और कहानी के बीच खो सा गया ,ये गीत था-"बादलों को काट काट के नाम अपना..."-ये अकेला गाना नायक सत्या के नायिका विद्या के प्रति प्यार के इंटेंसिटी को दर्शा देता है सत्या का किरदार सभी को काफी अपना लगा था पर इस गाने को सुनने के बाद आप सत्या के प्रेम की इंटेंसिटी अपने भीतर अपने प्यार के प्रति महसूस करेंगे ..रूह को छू लेने वाले लम्हों के नाम इन असंख्य गीतों को सलाम /इनके लिखने वालों को इनके म्यूजिक कम्पोज करने वालों को भी..ये गाने खाना खाते ,काम करते ,बीजी शिड्यूल में रह कर सुनने के नहीं है इनके लिए एक नितांत खाली सा समय ,रुका सा मौसम ,शान्ति के साथ अच्छे दिल के साथ वाला समय चाहिए ...ये एक अलग सुकून देते हैं इनके लिए समय जो केवल इनका समय हो इसकी डिमांड करते हैं.

मिनाक्षी,मोबाइल और पुलिस-रिपोर्ट


यूनिवर्सिटी में दिन भर इधर-उधर की (इसमे पढ़ाई भी शामिल है)हांक के,बिना बात के दौड़-भाग के जब हालत पस्त हो जाती है तब सभी लोगों का ध्यान चाय के स्टालों की ओर हो आता है. ये तकरीबन रोज़ की रूटीन में शामिल है और अब ये एक हद तक व्यसन की स्टेज में पहुँच गया है.इसी आदत या लत आप जो भी मान लें ,के फेर में हम तीन जने,मैं,मिहिर और मिनाक्षी पास के ही निरुलाज पहुंचे.बहाना कॉफी पीने का था.कॉफी के साथ-साथ तमाम तरह की जरुरी-गैरजरूरी बतरस में हम तीनों ऐसे खोये कि,यह ध्यान ही ना रहा कि मिनाक्षी ने निरुलाज में अपना मोबाइल छोड़ दिया ,चूँकि हमे वहां से निकले बस ५-७ मिनट ही हुए थे ,हम तेज़ी से वहां गए अपनी जगह को देखा और मोबाइल को वहां ना पाकर काउंटर पर मैनेजर से बात की मगर सब बेकार मोबाइल नही मिलना था नही मिला.अब बारी परेशान होने की थी.दोस्तों ने सलाह दी कि भइये,सबसे पहले नंबर ब्लाक कराओ और फ़िर तुंरत पुलिस कम्प्लेन करो वरना किसी ग़लत हांथों में पड़ गया तो लेने के देने पड़ जायेंगे.थाने गए हम एफ.आई.आर.दर्ज कराने वो तो लाख कोशिशों के बाद नही हुआ बस उनके कागजी कार्यवाही की रेंज बस इतनी थी कि अपना मोबाइल का मॉडल नंबर,कलर,कम्पनी,और ई.एम.ई.आई.नंबर तथा कहाँ खोया है लिख कर एक अप्लिकेशन दाल दो और उसके जेरोक्स पर हमारे थाने की मोहर ले लो और जाकर उसी नंबर का दूसरा कार्ड जारी करवा लो.निश्चिंत रहो.हमे थोड़ा-बहुत चूं-चपड़ करने की कोशिश की मगर डपट दिया गया.जाओ यहाँ से मोबाइल की रिपोर्ट नहीं लिखी जाती,अगर संभाल नहीं सकते तो मोबाइल लेकर पढने क्यों आते हो?-अब मिनाक्षी ने नया नंबर ले लिया है और गले में टांग के घूम रही है ताकि ये सेट गलती से भी कहीं ना छूटे.पुलिस वालों का भी तो कोई भरोसा नहीं है.

10/3/08

श्याम चित्र मन्दिर...ढलते समय में

पिछले पोस्ट का शेष....
श्याम चित्र मन्दिर के अपने कई अनुभवों को मैंने आप तक पिछली पोस्ट में पहुँचाया था.इस बार इस सिनेमा हॉल की कुछ और अनूठी बातें जानिए....

पारसी थिएटर याद है....?- बस,ऐसा ही कुछ था श्याम चित्र मन्दिर के प्रचार का ढंग .मसलन जैसे ही कोई नई फ़िल्म आती थी तो उसका बड़े जोर-शोर से जुलूस निकाला जाता था.२-३ तीन पहिये वाले रिक्शे पूरे दिन के लिए किराए पर लाये जाते थे फ़िर उनपर तीन तरफ़ से फ़िल्म के रंग-बिरंगे पोस्टर लकड़ी के फ्रेमों में बाँधकर लटका दिए जाते थे और एक भाईसाब उस रिक्शे में चमकीला कुर्ता पहनकर माइक हाथो में लेकर बैठ जाते थे और रिक्शे के पीछे-पीछे ७-८ सदस्यीय बैंड-बाजे वालो का गैंग चलता था जो मशहूर धुनें बजा-बजाकर लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा करते थे.वैसे ये परम्परा अब भी बरक़रार है मगर बैंड-बाजो की जगह रिकॉर्डर ने ले ली है.पीछे-पीछे बैंडबाजे और रिक्शे में सवार हमारे स्टार कैम्पैनर माइक पर गला फाड़-फाड़कर सिनेमा का विज्ञापन करते रहते.इसकी एक झलक आपको भी दिखता हूँ,-

"फ़र्ज़ कीजिये फ़िल्म लगी है -'मर्डर'.तो हमारे प्रचारक महोदय कुछ यूँ कहेंगे -'आ गया, आ गया, आ गया,जी हाँ भाइयों और बहनों आपके शहर गोपालगंज में श्याम चित्र मन्दिर के विशाल परदे पर महान सामाजिक और पारिवारिक संगीतमय फ़िल्म 'मर्डर'(वैसे भोजपुरी प्रदेश होने की वजह से 'मडर'शब्द ही चलता था).पीछे से बैंडबाजों का तूर्यनाद होने लगता था-'तूंतूं पींपीं ढम ढम' जैसा कुछ-कुछ.फ़िर गले को और पतला और पता नही कैसा बनाकर आवाज़ निकालता (रेलवे स्टेशनों पर 'ले चाई गरम की आवाज़ जैसा कुछ-कुछ)-जिसके चमकते,दमकते,दिल धड़काने वाले सितारे हैं-मल्लिका शेहरावत,इमरान हाशमी,इत्यादि.फ़िर से बैंड-बाजों का समर्थन.कुछ 'अ' श्रेणी के प्रचारक तो बाकायदा उस फ़िल्म के गीत गाकर भी सुनाते थे,और साथ ही ,उस फ़िल्म के नायक-नायिका का विशेष परिचय भी देते थे,जैसे-सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के बेटे की पहली फ़िल्म.आदि.बस इतना जानिए की फ़िल्म पूरे जीवंत माहौल में लगायी,दिखाई और प्रचारित की जाती थी क्या मल्टीप्लेक्स में वो मज़ा है?

फिल्मोत्सव मनाने जैसा कुछ-कुछ.-हमारा घर शहर के पास ही था और हमारे सभी रिश्तेदार गांवों से आते थे. पुरुषों का तो पता नहीं पर औरते जब भी आती थी तो अपने गांव के अपने पड़ोसियों को भी लेती आती थी.इसके पीछे भी दो मकसद होते थे,पहला तो ये कि इन लोगों की कुछ खरीददारी वगैरह भी हो जायेगी और दूसरा ये कि इसी बहाने एक सिनेमा भी देख लेंगी. अब चूँकि ये हमारी रिश्तेदार होतीं थी तो इन्हे कम्पनी ना देने पर नातेदारी में बेईज्ज़ती का खतरा कौन मोल ले.तो हमारा और उनका पूरा कुनबा सिनेमा हाल की तरफ़ प्रस्थान करता था.जिस समय-पाबन्दी की बात गाँधी जी कर गए थे उसकी जीती-जागती मिसाल ये महिलाएं और फैमिली होती थी.फ़िल्म शुरू होने से शार्प एक घंटा पहले इनकी रेलगाड़ी वहां पहुँच जाती और श्याम चित्र मन्दिर के स्टाफ इनके लिए सिनेमा हाल के कारीडोर में ही टेम्परेरी प्रतीक्षालय बना देते. सिनेमा में घुसकर ये फौज सिनेमा को अपने भीतर आत्मसात कर लेती थी.पूरा रसास्वादन.यानी हीरो-हिरोइन के साथ हँसना -रोना और विलेन या वैम्प को जी भर कोसना.कुल मिलाकर ये जानिए कि कई रिश्तेदारियां भी श्याम चित्र मन्दिर के बहाने बनी और टिकी रहीं.यहाँ जीजाजी लोग अपनी बीवी और सालियों के साथ आते थे पिताजी कि उम्र के लोग अपनी जमात के साथ और माता जी बहनों और छोटे बच्चों के साथ अब फ़िल्म चाहे हिट हो या सुपर-फ्लॉप इसका प्रभाव नही पड़ता था,सिर्फ़ एक हिट गाना या हिट सीन काफ़ी था देखने के लिए.अगर फ़िल्म ठीक ना भी रही हो तो अपने तर्क गढ़ लिए जाते ताकि पैसा बरबाद हुआ है ऐसा ना लगे.

पोस्टरों में अपनी शक्ल तलाशना-पहले पोस्टर पर लिखा आता था -'ईस्टमैन कलर'इस ईस्टमैन तलाश भी काफ़ी बहसों में रही.महेश बाबु कहते थे (हमारे स्कूली जीवन के सिनेमा एक्सपर्ट )कि 'अजी कुछो नहीं ई जो कलर है ना ,सब बढ़िया प्रिंट वाला फिलिम के लिए लिखा जाता है समझे?'- अपनी बात और पुख्ता करने के लिए कहने लगते-'अमिताभ ,मिथुन,धरमेंदर चाहे सन्नी देवल के फिलिम का पोस्टर देखना सबमे ई लिख रहता है',-उनके इतना कहने के बाद शक की कोई गुंजाईश ना रहती थी. उन दिनों स्कूल से घर जाने का एक शोर्टकट रास्ता होता था जिसे हम शायद ही चुनते,इसका कारण था कि बड़े(थोड़ा ही)रास्ते पर श्याम सिनेमा का पोस्टर वाला पोर्शन पड़ता था ,पोस्टर में हीरो के आड़े-टेढे चेहरे के हिसाब से हम अपनी शक्लें बनाया करते,या हीरो ने जैसा एक्शन किया होता वैसा ही करने की कोशिश करते(वैसे ऐसी तलाश भी कभी ख़त्म हुई है क्या?)

शहर छूटने के साथ ही श्याम चित्र मन्दिर छूट गया इसकी भरपाई कभी भी ना हो सकेगी.जब भी यहाँ दिल्ली में मल्टीप्लेक्सों में जाता हूँ तो एक अजीब-सा बेगानापन घेर लेता है लगता है कि पता नहीं ये कौन-सी जगह है.वही फिल्मिस्तान(बर्फखाना)या अम्बा(मल्कागंज सब्जी मंडी)का माहौल थोड़ा-सा ही सही वैसा ही जीवंत लगता है.काफ़ी समय पहले दूरदर्शन ने 'नाइन गोल्ड' नाम से एक चैनल शुरू किया था जो मेट्रो चैनल के ऑप्शन में आया था शायद,उसी पर एक प्रोग्राम आता था-"directors cut special"-उसमे एक बार मिलिंद सोमन अभिनीत "जन्नत टाकीज" टेलीफिल्म देखि थी.बस तभी श्याम चित्र मन्दिर आंखों के सामने तैर गया.इससे जुड़ी यादें कभी ख़त्म ना होने वाली धरोहर के तौर पर हमेशा दिल में रहेगी कि कोई तो ऐसा हॉल था जो अपना-सा लगता था।

२००७ जून का समय- श्याम चित्र मन्दिर का विशाल परदा "वही लार्ज़र देन लाइफ" छोटा-सा लगने लगा है(शायद ७० एम्.एम् नहीं है).दीवारें गुटखे और पान चबाने वाले भाईयों ने रंग डाली हैं और आपके ना चाहते हुए भी इन सबकी गंध आपके नथुनों में घुसी आती है,चलते हुए रोमांटिक दृश्यों में लेज़र लाईटों से कुछ छिछोरें हिरोइन के अंगों पर उस लाइट से लोगों का ध्यान लाते हैं,इसके पुराने मालिक गुज़र गए हैं और नए पता नहीं कैसे हैं.पुराने गेटकीपर गंगा भगत नौकरी छोड़ चुके हैं और अपने पोतों में व्यस्त हैं. और हाँ अब वैसा पारिवारिक मिलन यहाँ देखने को नही मिलता,या सच कहूँ तो अब परिवार वाले फ़िल्म देखने आते ही नहीं.महेश बाबु दुबई में कमा रहे हैं और सिनेमा देखने चलने पर कह गए -'अरे छोया मुन्ना भाई,कौन स्साला तीन घंटा गर्मी,उमस और गंध में बितावेगा ?चल अ घरे चाय-चु पीते हैं.श्याम चित्र मन्दिर वाले रोड पर शाम को अब अँधेरा ही रहता है,लोग कहते हैं कि यहाँ नाईट शो देखना खतरे से खाली नहीं.मैन पिछली बातें याद करता हूँ जब हम बच्चे आपस में क्विज खेला करते कि -'बताओ कौन-सा मन्दिर ऐसा है जहाँ आप सभी जूते-चप्पल पहनकर भी जा सकते हैं?"-और एकमत से जवाब मिलता -"श्याम चित्र मन्दिर"............और अब...?

10/1/08

मोनू दा और गाँधी जयंती ....

मोनू दा नए पियाक तो नहीं हैं ,हाँ मगर पिछले दो सालों में ये हिसाब-किताब कुछ कम जरुर हो गया था. आजकल जबकि उनके आसपास के सभी लोगों का समय ठीकठाक चल रहा है तो हर दूसरे दिन कोई-न-कोई कुछ-न-कुछ लेकर आ जाता है जिसे देख उनसे मना नहीं किया जाता.पिछले दिनों कुल्लू जॉब छोड़ कर आया और इस खुशी में(?)उसने मोनू दा को पहले 'रेड वाइन' फ़िर 'स्कोच'पिला दी.बस क्या था रोज़ 'ओल्ड मोंक' रम पीने वाले मोनू दा एकाएक ही इस ब्रह्म-सत्य को पा गए की ये क्या आज तक मैंने ,आख़िर मैंने पहले इसे क्यों नहीं चखा था?बस जबसे मोनू दा के हिय में यह मुई अंगूर की बेटी 'रेड वाइन'और 'स्कोच' चढी है,मेरी जान सांसत में आ गई है.उनका कोई भी असाईनमेंट इसके बिना पूरा नहीं होता.अब लगता है कि एम्.एस.सी.(फिजिक्स)की तरह ही कहीं उनका 'लाइब्रेरी साइंस'भी आधे में ना छूट जाए.
आज सुबह अखबार देखते ही मैंने कहा कि 'मोनू दा जोधपुर में सैकडों लोग मारे गए'तो उन्होंने कहा -'हाँ यार ,सब समय का फेर है देवी नाराज़ चल रही हैं'-मैंने सोचा मोनू दा देश-दुनिया की भी थोडी बहुत ख़बर रखते हैं और एक मैं हूँ कि इनकी अच्छाइयों की ओर ध्यान ही नहीं देता खाली उनके पियाकपने को लेकर झाड़ पिलाता रहता हूँ.फ़िर मैंने कहा कि मोनू दा कल गाँधी जयंती हैं ,मेरे साथ गाँधी-भवन चलिए.उन्होंने पता नहीं पूरी बात सुनी या नहीं तुंरत चौंक कर बोले-'अरे तब तो कल ठेका बंद रहेगा ,कल ड्राई डे रहेगा.'-मुझे गुस्सा आया मैंने खीझ कर कहा -'मोनू दा आपके लिए इस दिन का कोई मतलब नहीं है कि कल गाँधी जी का जन्मदिन है?'-मोनू दा मुस्कुराये और बोले-'गाँधी जी महान हस्ती थे इस बात से मैं कहाँ इन्कार कर रहा हूँ .मगर जो कुछ भी इस समय हमारे देश में चल रहा है उसमे इस जयंती को मनाने का कोई अर्थ नहीं रह गया है.'-मुझे लगा आज सुबह ही रात का खुमार चढ़ गया है.मोनू दा कहते रहे कि'यार मुन्ना तुझे क्या लगता है कि गाँधी को कोई याद इसलिए करना चाहता है कि वह उनके आदर्शों को मानता है या उनके पदचिन्हों पर चलना चाहता है. नही ये सब नौटंकी इसलिए हो रही है कि अपनी रोटी और इमेज दोनों सेंकी और बनाई जा सके हालांकि इसके मायने भी अब कुछ नहीं है क्योंकि जनता भी अपने(...)को ही वोट करती और चुनती है.अभी थोडी-थोडी गाँधी कल सबके भीतर घुस जायेंगे और सभी खादी पहनकर चमक लेंगे और शाम होते ही कहेंगे ओ डैम इट कल फ़िर काम पर जाना होगा .तो मुन्ने राजा हमारे लिए ये ड्राई डे का ही मायने लेकर आता है'-मैं उनके इस वाक्य पर मन-ही-मन कुढ़ गया.लारा सर कहते हैं कि 'मोनू जैसे लड़के बनते कम है मियाँ'-मैं कहता हूँ-' अजी छोडिये सब पीने-पिलाने के अपने बहाने हैं'.
सुबह की इस बहस के बाद मैंने सोचा कि मोनू दा ने जबसे धूमिल की कविताएं पढ़नी शुरू की हैं तभी से कुछ बेसिए सेंटिया गए हैं.फ़िर एक मन ये भी कहता है कि 'सही भी तो है जब देश में चारो ओर मार-काट मची है लोग जिंदा जलाए जा रहे हैं ,औरतों और बच्चों का भी फर्क मिट गया है ,बम ब्लास्ट हो रहे हैं एक पूरी कौम दरी-सहमी हुई है कि पता नहीं कब उसके साथ क्या हो जाए .ऐसे माहौल में जबकि गाँधी की जरुरत सबसे ज्यादा है गाँधी हममे से नदारद हैं.इस जयंती के मायने खाली मोनू दा के लिए ड्राई डे का ही है या इस जमात में और भी हैं जिनकी छुट्टी आ रही है कम-से-कम एक दिन की ही सही.

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...