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सिनेमाई युवा का संसार

( यह लेख भारतीय पक्ष पत्रिका के लिए जुलाई 2010 में लिखा गया था. आज अचानक ही इसकी छायाप्रति हाथ लगी. फिर भारतीय पक्ष के वेबसाईट से आर्काईव से अपने इस लेख की प्रति ली और  आपसे शेयर करूँ.-मोडरेटर )   समानांतर सिनेमा के युवा-वर्ग का असंतोष और सिस्टम में उसकी लघुता ज्यों की त्यों दिखती है। बिना किसी चमत्कार के नंगा , कड़वा सच , नंगे और अधिक कड़वे रूप में दर्शकों को झिंझोड़ता है। पर पैरलल सिनेमा का यह युवा प्रश्न उठा कर सिस्टम का शिकार होता दिखता है और कहीं न कहीं इस बात को साबित कर देता है कि इस भ्रष्ट गठजोड़ की गांठ इतनी मजबूत है कि यह आम आदमी से टूटेगी नहीं और उसकी नियति इसके खिलाफ खत्म ही होना है। हिंदी सिनेमा के इतिहास पर गौर करें तो हम पाएंगे कि उन फिल्मों का प्रतिशत अधिक है , जो शहरी रवायत के कथानक लिए हुए हैं जबकि इसके उलट गंवई कहानियों वाली फिल्में अपेक्षाकृत कम ही आई हैं। इस भेद के भीतर जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। सामान्यत: हिंदी सिनेमा के युवा चरित्रों की बात की जाये तो इसकी नींव शुरुआत में ही पड़ गयी थी। नयी-नयी मिली आजादी ने मोहभंग की...

पीयूष मिश्रा का विडियो साक्षात्कार "www.mihirpandya.com"पर.

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गुलाल देखने के बाद जो पीयूष मिश्रा के नए नए मुरीद हुए हैं और वे भी जो रंगमंच के दिनों से ही इस बेहतरीन कलाकार के फन के कायल हैं,उनके लिए एकदम नया और ख़ास विडियो साक्षात्कार मेरे अभिन्न मित्र और आवारा हूँ ब्लॉग के 'मिहिर पंड्या' के वेबसाइट www.mihirpandya.com पर उपलब्ध है.इस इंटरव्यू की सबसे ख़ास बात है कि अन्य कलाकारों के रेट-रटाये और घिसे -पिटे फार्मुलेबाजी वाले साक्षात्कार के बीच इस अद्भुत कलाकार ने अपने दिल का दरद दिल्ली के रंगमंच मार्क्स की बात कर अपनी दुकानदारी चलाने वाले छद्म मार्क्सवादियों तक पर अपनी तीखी टिपण्णी दी है.मिहिर के ही ब्लॉग साथी वरुण ग्रोवर ने अनुराग कश्यप के मशहूर प्ले "the skeleton women" जो पृथ्वी थिएटर मुम्बई में खेला जा रहा है के मौके पर अनौपचारिक तौर पर लिया और फिर जो सिलसिला चला तो बस एक से एक बात निकलती चली गयी.पीयूष मिश्रा के अब तक छपे इंटरव्यू को आप भूल जायेंगे.यकीन जानिए ये वही पीयूष मिश्रा हैं जिनके नाम की तूती दिल्ली के रंगजगत में बोलती थी.आखिर क्यों रंगमंच का एक बहुत ही उम्दा कलाकार इतना खिन्न हो गया इस मंच से .?क्यों वह अपने संघर्ष...