12/17/13

भिखारी ठाकुर के मायने

“ठनकता था गेंहुअन
तो नाच के किसी अँधेरे कोने से
धीरे-धीरे उठती थी
एक लंबी और अकेली
भिखारी ठाकुर की आवाज़

कवि केदारनाथ सिंह की यह पंक्तियाँ भोजपुरी और पूरे पुरबियों के बीच भिखारी ठाकुर की लोकप्रसिद्धि का बयान ही है. प्रख्यात रंग-समीक्षक हृषिकेश सुलभ ने भी भिखारी ठाकुर की आवाज़ को ‘अधरतिया की आवाज़’ कहा है. जब भी भोजपुरी संस्कृति और कला-रूपों पर बात होती है, भिखारी ठाकुर का नाम सबसे पहले जुबान पर आता है. ऐसा होने की कई वाजिब वजहें हैं. भारतीय साहित्य और रंगजगत में ऐसे उदाहरण शायद ही मिले, जहाँ कोई सर्जक या रंगकर्मी प्रदर्शन के लगभग सभी पक्षों पर सामान दक्षता रखता हो और उसनें कहीं से कोई विधिवत शिक्षा न ली हो. अमूमन जितने भी रंगकर्मियों ने अपनी लोक-संस्कृति का हिस्सा होकर अपने रंगकर्म को विकसित किया अथवा उसको दूसरी संस्कृतियों से भी परिचय कराया, वह सभी किसी-न-किसी स्कूल के सीखे हुए, दक्ष और सुशिक्षित कलाकार थे. फिर चाहे वह महान रंगकर्मी हबीब तनवीर, एच.कन्हाईलाल या रतन थियम ही क्यों न हों. यहाँ इन पंक्तियों के लिखने का अभीष्ट बस इतना ही है कि यहाँ इन रंगकर्मियों से या उनके रंगकर्म से भिखारी ठाकुर की तुलना करना नहीं है, ना तुलना हो सकती है. ये सभी रंगकर्मी अलग-अलग परिस्थितियों में अपनी-अपनी लोक-संस्कृति, अपनी कला जनमानस में सिद्ध कर चुके हैं और किसी परिचय के मुहताज नहीं, पर भिखारी ठाकुर के सन्दर्भ इनका जिक्र इसलिए जरुरी हो जाता है क्योंकि ये भी भिखारी ठाकुर की ही तरह लोकप्रिय संस्कृति और लोक साहित्य के पैरवीकार रहे हैं. इस सन्दर्भ में इनकी बात करना इसलिए भी जरुरी हो जाता है कि भिखारी ठाकुर को इन लोगों की तरह विरासत में न तो कोई बेहतर प्लेटफोर्म मिला, ना ही आखर ज्ञान हेतु कोई विधिवत व्यवस्था. फिर भी उनके भीतर सीखने की, कुछ करने की जो ललक थी, वही उनको भीड़ से अलग खड़ी करती है. उन्हें विशिष्ट बनाती है.

कलाकार अथवा साहित्यकार अपने समय-समाज से निरपेक्ष होकर सर्जना-रचना नहीं कर सकता. एक उत्कृष्ट और जागरूक रचनाकार की कलम अपने देश-काल की परिस्थितियों का बयान दर्ज करती है, जिससे कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियाँ अपने उस लोक-सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिवेश की उन सच्चाईयों से रु-ब-रु हो सके, जो उस समाज और समय में व्याप्त हो. भिखारी ठाकुर भी पाने समय के ऐसे ही सर्जक, भोक्ता थे, जिन्होंने अपने समय की सामंती मानसिकता, जातिवादी सोच, वर्ग-विभेद की राजनीति, श्रमिक संस्कृति, पलायन और पीछे रह गयी प्रोषितपतिकाओं की वेदना को प्रत्यक्षतः देखा ही नहीं बल्कि सामियाने के बीचो-बीच मंचासीन होकर उन सवालों से दो-दो हाथ करने की प्रेरणा भी दी. रंगकर्म जनवादी कला है और भिखारी ठाकुर मूलतः प्रगतिशील, जनवादी  रंगकर्मी/कलाकार थे. ऐसे प्रगतिशील सर्जकों को लोक यूँ ही नहीं छोड़ देता उसके लिए भी यथास्थिति की पोषक शक्तियाँ कई दुश्वारियाँ पैदा करती हैं, पर सोना आग में तप के और निखरता है. यह बात भिखारी ठाकुर पर अक्षरशः लागू होती है. कई दफे यह स्थितियाँ होती हैं, कि उस कलाकार/सर्जक का मूल्यांकन उसके समय में नहीं हो पता है. इसके कई कारण हो सकते है. भिखारी ठाकुर की स्थिति भी इससे भिन्न तनिक थी. यद्यपि दिक्कतें भिखारी से थीं पर  भिखारी ठाकुर को उस समय के प्रगतिशील शक्तियों ने पहचाना और विभिन्न उपाधियों-विशेषणों यथा ‘अनगढ़ हीरा’, ‘भोजपुरी के शेक्सपियर’,’भोजपुरी के भारतेंदु’ आदि से नवाजा. पर सामंती ताकतें गाल बजाने में ही मशगूल रहीं और उन्हें एक नचनिया, लौंडा नाच करने वाला ही मानती रही. भोजपुरी के एक कवि शिवनंदन भगत, जो भिखारी ठाकुर के ही सामयिक थे, ने उनके विरोध में एक कविता भी लिखी :

“जाति के हजाम भईले, पेशा के नापाक कईले
हिजरा के गिनती में गईले भिखरिया
दोकड़ा के सेंदुर अवसर, बुढ़िया बनके नाच कईले
रोपेया में इज्जति गँववले भिखरिया.”1

इसके अलावा रघुवंश नारायण सिंह जी ने भी महेश्वर प्रसाद की पुस्तक ‘जनकवि भिखारी’ की समीक्षा में कुछ ऐसी ही बातें ऐसी कही हैं, जो तत्कालीन सोच का कच्चा-चिट्ठा प्रस्तुत करती हैं. मसलन बहुत दिन पहले आरा से निकलने वाले 'भोजपुरी'में श्री बीरेंद्र किशोर का एक लेख छपा था 'भोजपुरी के शेक्सपियर  भिखारी ठाकुर'. बहुत लोगों ने जब उसे पढ़ा तो अचरज में पड़ गए,सिहर गए  कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली. यह तो अजब मेल बैठाया गया ,ऐसा बहुत लोगों ने कहा. बात सही भी थी बाकी राहुल बाबा ( सांकृत्यायन जी ) भिखारी को महाकवि कह चुके थे. अब हम लोग क्या करें.......उन्होंने भोजपुरी की जान कर (जानते बूझते ) सेवा थोड़ी न की थी. उन्हें तो नाचना गाना था. पहले तुलसी,कबीर सुर वगैरह के पद कंठ किया बाद में सरस्वती की कृपा उनपर हुई तो खुद भी पद जोड़ने लगे. मुझे शक है कि भिखारी कभी नाटककार के रूप में गिने जायेंगे. उन्हें नाटक से क्या मतलब ? वे अंक ,गर्भांक जानने कहाँ गये ? उनके सभी खेल ,तमाशे अपने हैं, जिससे देहाती गंवारू जनता को मोहा ,खींचा जा सके उन्होंने वही नाचा-गाया, इनका सब 'बैले'हो सकता है, जिसे नाच-गान के साथ रूपक कहा जाए, तब शायद कुछ सधे तो सधे ,भिखारी में नाटकीयता है, वे रूप बनने और बनाने में  और नक़ल उतारने में भी सफल खिलाड़ी है.”2 लोक प्रसिद्ध कलाकारों-सर्जकों को अपने समय में इस तरह के गर्दभ-गान सुनने को मिलते हैं, जो समय के नक्कारखाने में तूती की आवाज़ ही साबित हो जाते हैं.  रघुवंश जी ने अपने इस लेख/समीक्षा में जिस तरह की चिंता की और ध्यान दिलाया था कि भिखारी विरोधियों को यह लगता था कि वे कभी सूर, कबीर, तुलसी सम पद नहीं लिख पाएँगे और यदि लिख लिया जो जग-प्रसिद्ध न हो सकेंगे, वह बात निर्मूल ही साबित हुई. भिखारी ठाकुर ने तुलसी, कबीर, सूर की तरह कविताएँ भी लिखीं और नाटकार के साथ-साथ लोगों ने उनकी कवित्व शक्ति को भी पहचाना. कवि रूप में भी उनकी ख्याति किसी से छुपी नहीं हैं. भिखारी ठाकुर ने धर्म आधारित कवितायेँ भी लिखी. इसका कारण स्पष्ट है कि “लोक साहित्य का मूल आधार धर्म रहा है. सृष्टि के सभी मानव मूल रूप में धर्म में आस्था रखते हैं. कृष्णदेव उपाध्याय ने इस संबंध में लिखा है कि धर्म की आधारशिला पर ही लोक साहित्य की प्रतिष्ठा हुई.” भिखारी ठाकुर इसके अपवाद नहीं थे. साथ ही, वह लोकसंस्कृति के उस पक्ष के पैरवीकार थे, जहाँ “संस्कृति के अंतर्गत, समाज की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक व्यवस्था का सम्मिलित प्रवाह निरंतर गतिमान होता है.”4 भिखारी ठाकुर सजग चेतना के कलाकार थे, उनके सामने परिवार का विघटन, पति के परदेस जाने के बाद घर में अकेले रह गयी उसकी ब्याहता के सामने घर के भीतर और समाज में उपस्थित खतरे, लोक जीवन के अन्य दुःख-दर्द, हर्ष-उल्लास, पर्व-त्यौहार आदि का दृश्य साक्षात था. जाग्रत मस्तिष्क का यह कलाकार इन सब स्थिति-परिस्थितियों से निरपक्ष नहीं रह सकता था. इसलिए उनका साहित्य, उनकी कला अपने समय की सामाजिक चेतना और स्थितियों का यथार्थ प्रतिबिम्ब है. उनकी सर्जनात्मकता की शक्ति इसमें थी कि उनके रचनाकर्म में भोजपुर प्रान्त की तद्-युगीन सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक प्रवृतियों, सच्चाईयों का समावेश था. जो किसी भी लोक साहित्य, लोककला का एक अनिवार्य पक्ष है. एक मशहूर कथन है कि संस्कृतिशून्य व्यक्ति निरा पशु होता है. संस्कृति मनुष्य की जीवन जीने की एक बुनियादी शैली और गुण है.  इस स्तर से भी भिखारी ठाकुर भोजपुरी लोक-संस्कृति के अगुआ नायक थे.     
       
जिनकी रचनाओं, नाट्य-प्रदर्शनों से व्यक्ति अपने-आप को, अपनी संस्कृति, अपने समाज, परिवेश को समझता रहा है. भिखारी ठाकुर का कद इतना बड़ा है कि उन्हें किसी एक फ्रेम में मापना संभव ही नहीं. बस इतना ही कि भोजपुरी, पुरबी संस्कृति का ध्वज भिखारी ठाकुर के हाथ में है और इस संस्कृति को, समाज की संकल्पना एवं अध्ययन उनके बिना संभव नहीं. भिखारी ठाकुर भोजपुरी प्रान्त के सांस्कृतिक अध्ययन में एक अनिवार्य जरुरत बनके सामने आते हैं. इसका एक उदाहरण सामने है कि भोजपुरी प्रदेशों ही नहीं बल्कि समस्त पूर्वी श्रमिक संस्कृति में एक लोक-प्रचलित गीत सुनने में आता है :

“रेलिया ना बैरी, जहाजिया न बैरी
से पईसवा बैरी ना
मोर सैयां के बिलमावे से पईसवा बैरी ना”

भारतवर्ष का पूर्वांचल प्रांत गरीबी, बाढ़, सूखा जैसे कई मारों से टूटा हुआ प्रान्त है. बिना किसी आदर्शवादी या रामराजी चाशनी के कहें तो पैसा जीवन जीने की तीन मूलभूत जरूरतों में सबसे ऊपर है. इस प्रान्त के कई गाँव आज भी नौजवानों से खाली हैं. कोई इसी दो पैसे कमाने के फेर पूरब की ओर कोलकाता, असम गया हुआ है, तो कोई मुंबई, दिल्ली, पंजाब में अपमानित होकर रह रहा है, खाड़ी देशों की ओर पलायन भी खूब है. पीछे रह गए हैं बूढ़े माँ-बाप, बच्चे और रोटी-सूखती-सुबकती पत्नियाँ. राजकपूर के ‘श्री420’ का पुरबिया राजू इसी पैसे के लिए मुम्बई जाता है, ‘दो बीघा जमीन’ का किसान कोलकाता में हाथ रिक्शा खींचता है. आज़ादी से पहले की यह दशा आज भी वैसी ही है. भिखारी ठाकुर समय से आगे देख रहे थे. बिदेसिया तब भी था, आज भी है, बस रूप-रंग-ढंग बदला है. भिखारी ठाकुर इस नब्ज़ की धड़कन को जानते थे. बद्रीनारायण थोडा आगे बढ़कर भिखारी ठाकुर को समस्त भारत के किसानों की दुर्दशा का चितेरा घोषित करते हुए लिखते हैं “भिखारी ठाकुर में भारतीय गाँव-जीवन के आर्थिक अपवाय की दर्दनाक गाथा है. पुलिस दमन, सामाजिक विसंगतियाँ नए आर्थिक दबावों से सामाजिक संबंधों के टूटन की जितनी सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक समझ भिखारी ठाकुर के साहित्य में मिलती है, उतना तत्कालीन अभिजात स्वीकृत तथा शिक्षित रचनाकारों की रचनाओं में नहीं दिखाई पड़ता.”5 भारतीय रंगजगत में दूर-दूर तक ऐसा रंगकर्मी नज़र नहीं आता, जो अपने तमाम सीमाओं के बावजूद इतनी पैनी और सूक्ष्म संवेदनशील दृष्टि रखता है.  

भिखारी ठाकुर बीसवीं शताब्दी के लोक कलाकार थे, जिसने वैश्विक प्रसिद्धि और ऊँचाईयाँ पाई. सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ मशाल उठाने वाले इस कलाकार/रचनाकार पर अपने पारंपरिक मूल्यों की भी छाप थी. वे अपने विरासत में मिले इन मूल्यों के बावजूद जड़ता के, यथास्थितिवाद के पैरवीकार न होकर प्रयासों में खालिस प्रगतिशील थे. नाच मंडली से जीवन यापन और उसी नाच के मंच से कबीर की भांति अपने कुशल अभिनय से उस सामंती समाज का नकली चेहरा सबके सामने ले आते थे. हालांकि भिखारी ठाकुर का परिवेश भी मध्यकालीन समाज-व्यवस्था से बहुत अलग नहीं था. भिखारी ठाकुर जिस तरह के जातिगत संरचना से आते थे, वहाँ इस पूरी दकियानूसी सिस्टम से सीधे-सीधे दो-दो हाथ करना भिखारी ठाकुर के लिए संभव नहीं था. अतः इस व्यवस्था से टकराना या इस पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करना एक कूटनीतिक चतुराई वाले प्रयास की माँग करता था और भिखारी ठाकुर जैसा कलाकार इस खेल का महारथी था. उन्होंने बड़े ही चतुराई से इस व्यवस्था को उसके बनाये मंच से चुनौती दी. जनप्रिय कलाकार के मुँह से अपने पर पड़ती चोट से यह तंत्र तिलमिलाने के अलावा कर ही क्या सकता था.
आज जब भिखारी ठाकुर हमारे बीच नहीं हैं, तब उनके लिखे-खेले नाटक आज के नए विमर्शों के मध्य और भी प्रासंगिक हो उठे हैं. भिखारी ठाकुर का समय औपनिवेशिक समय था, आज उत्तर औपनिवेशिक दौर में भी भिखारी ठाकुर के उठाए प्रश्न हमारे समाज में विद्यमान हैं, चाहे वह दलित वर्ग से सम्बंधित हों या स्त्रियों का पक्ष. आज भी इन प्रश्नों से जूझते बड़े समाज की ओर किसकी दृष्टि है? जिन श्रमिकों का बड़ा चित्रण भिखारी ठाकुर ने किया, उनकी कोई जाति नहीं थी. सब पूरब के बेटे हैं, जो आज भी पलायन को मजबूर हैं और घर में पीछे रह गयीं औरतें रोने को मजबूर हैं. हमारे बड़े प्रजातंत्र के नीति-नियंता कहाँ हैं? श्रमिक संस्कृति का इतना बड़ा चितेरा भारतीय साहित्य में दिखाई नहीं देता, जिसके प्रश्नों का जवाब आज तक अनुत्तरित है.      

सन्दर्भ सूची :
1.    लेख-भोजपुरी के शेक्सपियर कवि : भिखारी ठाकुर , आधुनिक भोजपुरी के दलित कवि और काव्य, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, गौतम बुक सेंटर, शाहदरा, दिल्ली – 93. पृ.-17.ISBN 978-93-80292-29-8.सं.2000.
2.    देखें (मूल लेख भोजपुरी में),समीक्षा , जनकवि भिखारी, रघुवंश प्रसाद सिंह, अंजोर(भोजपुरी पत्रिका), अंक-अक्टूबर-नवम्बर 1967).
3.    लेख-लोकभाषा और लोक 3 साहित्य : सैद्धांतिक पक्ष, गवेषणा, अक्टूबर-दिसंबर,2008, सं.  मीरा सरीन, केंद्रीय हिंदी संस्थान,आगरा,पृ-48.
4.    लोक संस्कृति : आयाम और परिप्रेक्ष्य, सं. महावीर अग्रवाल, शंकर प्रकाशन, दुर्ग, मध्य प्रदेश, पृ-8.
5.    (लोक संस्कृति और इतिहास, बद्रीनारायण, लोकभारती प्रकाशन, 15ए,महात्मा गाँधी रोड, इलाहाबाद,पृ-38.


12/3/13

सिनेमाई युवा का संसार

(यह लेख भारतीय पक्ष पत्रिका के लिए जुलाई 2010 में लिखा गया था. आज अचानक ही इसकी छायाप्रति हाथ लगी. फिर भारतीय पक्ष के वेबसाईट से आर्काईव से अपने इस लेख की प्रति ली और  आपसे शेयर करूँ.-मोडरेटर ) 

समानांतर सिनेमा के युवा-वर्ग का असंतोष और सिस्टम में उसकी लघुता ज्यों की त्यों दिखती है। बिना किसी चमत्कार के नंगा, कड़वा सच, नंगे और अधिक कड़वे रूप में दर्शकों को झिंझोड़ता है। पर पैरलल सिनेमा का यह युवा प्रश्न उठा कर सिस्टम का शिकार होता दिखता है और कहीं न कहीं इस बात को साबित कर देता है कि इस भ्रष्ट गठजोड़ की गांठ इतनी मजबूत है कि यह आम आदमी से टूटेगी नहीं और उसकी नियति इसके खिलाफ खत्म ही होना है।

हिंदी सिनेमा के इतिहास पर गौर करें तो हम पाएंगे कि उन फिल्मों का प्रतिशत अधिक है, जो शहरी रवायत के कथानक लिए हुए हैं जबकि इसके उलट गंवई कहानियों वाली फिल्में अपेक्षाकृत कम ही आई हैं। इस भेद के भीतर जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। सामान्यत: हिंदी सिनेमा के युवा चरित्रों की बात की जाये तो इसकी नींव शुरुआत में ही पड़ गयी थी। नयी-नयी मिली आजादी ने मोहभंग की स्थिति में तब के युवा-वर्ग को दोराहे पर खड़ा कर दिया था। श्री 420′ और आवाराका युवा नायक यह जान गया था, कि यहां केवल रुपया ही पूजा जाता है। जबकि बाद की स्थितियां थोड़े अलग तरह से सामने आयीं। आमतौर पर हिंदी सिनेमा का युवा चरित्र मुख्यत: शहरी उच्च वर्ग/ उच्च मध्यवर्ग, मध्यवर्ग/निम्न मध्य वर्ग/ झोपड़पट्टी तथा गांव का सीधा-साधा नौजवान रहा है। यह स्थिति पुरुष और स्त्री दोनों पर समान रूप से लागू होती है। चाहे बात मदर इंडियाकी हो या लगानकी। यद्यपि 70 का दशक हिंदी सिनेमा इतिहास का एक महत्वपूर्ण दौर है। यह वही समय है जब परदे पर एंग्री यंग मैनका उदय होता है और उसने अपने आने के साथ ही सिनेमा के रोमांस किंग को रिप्लेस कर दिया। तत्कालीन युवा का यह एंग्री रूपदर्शकों की डिमांड नहीं थी बल्कि तत्कालीन व्यवस्था से उपजे असंतोष का युवा प्रतीक था। यह सहज बात है कि व्यवस्था से उपजने वाली परिस्थितियों से कोई भी कला रूप प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती। जब हमारे इर्द-गिर्द सिस्टम अराजक स्थिति में पहुंच चुका था और देश में बेरोजगार, शिक्षित युवाओं की एक पूरी जमात अंधेरे में ठोकरें खाने को विवश थी, ‘एंग्री यंग मैनने तब इसी युवावर्ग के दबे आक्रोश को सिल्वर स्क्रीन पर जगह दी। सिनेमा में युवा चरित्रों के निर्माण में भारतीय राजनीति का भी गहरा प्रभाव पड़ा।

कुछ पाने को आतुर तेजाबी आंखे

युवा चेहरे का यह असंतुष्ट एंग्री रूप न केवल 70 के मेनस्ट्रीम सिनेमा में आया बल्कि बाद के दशकों में समानांतर सिनेमा में भी दिखा। पर यह सोचने वाली बात थी कि अब तक जो वर्ग सिनेमा और समाज दोनों जगह नान-सीरियस माना जाता रहा था, एकाएक ऐसा असंतुष्ट कैसे दिखने लगा। राजेश खन्ना तक तो ये तेजाबी आंखें रोमांस फरमाती रही थीं। अब युवाओं के सिनेमाई प्रतिनिधि भ्रष्ट-तंत्र को तहस-नहस कर देने और उसमें अपनी जगह बनाने के लिए किसी भी हद तक जाने को आतुर थे। यह मेनस्ट्रीम का युवा खुद कानून को हाथ में लेता है। अपने ऊपर हुए जुल्मों के खिलाफ सड़क पर लड़ाई लड़ता है। वह अविश्वासी है, वह जानता है कि सरकारी तंत्र एक छलावा है। यह इस सड़ चुके सिस्टम को बर्बाद कर देने की कूबत रखता है, जबकि समानांतर सिनेमा के युवा-वर्ग का असंतोष और सिस्टम में उसकी लघुता ज्यों की त्यों आती है। बिना किसी चमत्कार के नंगा, कड़वा सच, नंगे और अधिक कड़वे रूप में दर्शकों को झिंझोड़ता है। पर पैरलल सिनेमा का यह युवा प्रश्न उठा कर सिस्टम का शिकार होता दिखता है और कहीं न कहीं इस बात को साबित कर देता है कि इस भ्रष्ट गठजोड़ की गांठ इतनी मजबूत है कि यह आम आदमी से टूटेगी नहीं और उसकी नियति इसके खिलाफ खत्म ही होना है। ऋआक्रोशके ओमपुरी और पारके नसीरुद्दीन शाह के किरदार को देखकर तो कम से कम ऐसा ही लगता है) राज कपूर, दिलीप कुमार, देव आनंद का गांधीवादी युवा जाने-अनजाने ऋहृदय परिवर्तन से) सिस्टम का पार्ट बन ही जाता है वहीं गुरुदत्त का नौजवान कवि महान क्लासिक प्यासामें समाज द्वारा पैदा किये अवसाद में गहरे उतरता ही चला जाता है। इन सबकी अपनी महत्ता है पर इन सबके उलट मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और रवि टंडन का युवक लगभग नास्तिक है और वह हिंदी सिनेमा के जबरदस्त चालू फार्मूले के साथ अमानवीय ताकत लेकर आता है। हिंदी सिनेमा का यह समय इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि आपातकाल के संशय और उठा-पठक वाले समय में राजनीति में जयप्रकाश नारायणजैसे व्यक्तित्व ने युवाओं को दिशा दी तो सिनेमा ने सिस्टम से सीधे दो-दो हाथ करने को सिल्वर स्क्रीन का अवतार दिया। समझदार निर्देशक जानते थे कि भारतीय जनता अपने दुखों के निवारण के लिए अवतार या मसीहे का इंतजार करती है। उन्होंने दर्शकों की इस मानसिकता का फायदा उठाया। तीन घंटे के लिए ही सही, परदे पर उन्होंने मसीहा को उतार दिया जो जंजीर, कुली, दीवार, नास्तिक, त्रिशूल, आदि फिल्मों में दिखायी देता है।

समानांतर सिनेमा का युवा
वैसे हिंदी सिने जगत में इस तरह के फिल्मों का बीज भुवन सोम1969, मृणाल सेन) से ही पड़ गया था जो पूर्णरूपेण आठवें दशक में फला-फूला। हिंदी सिनेमा का यह आठवां दशक संवेदनशील, यथार्थपरक, कलात्मक तथा सीमित बजट वाली फिल्मों के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है। इस दौर में सईद मिर्जा, श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, गौतम घोष, सई परांजपे, मणि कौल, कुमार शाहनी जैसे निर्देशक सामने आये जिन्होंने सलीम लंगड़े पर मत रो, 36 चौरंगी लेन, अंकुश मंडी, पार, अर्धसत्य, आक्रोश जैसी फिल्मों के माध्यम से एक अलग तरह की ही दुनिया प्रस्तुत की जिसे हम जान-बूझकर देखना ही नहीं चाहते थे। और जो हमारे समय का कड़वा सच था। अंकुशके चारों युवा नायक सच के पक्ष में बोलने के बावजूद और कोर्ट में अपना पक्ष रखने के बावजूद मरने को अभिशप्त हैं और यह बिन बोले कह जाते हैं कि बिना राजनीतिक जागरूकता के कोई हमारे समय में साथ नहीं देगा। हमें सिस्टम की कमान अपने हाथों में लेनी होगी और जिसके लिए वृहत्तर वैचारिक जागृति की जरुरत है। इन फिल्मों का युवा किसी विशेष आन्दोलन का परिणाम नहीं था। यह उन नए फिल्मकारों के अपने जीवन अनुभव, और उसके प्रति एक बौध्दिक यथार्थवादी दृष्टि तथा परिवेश बोध से गहरे जुड़ाव और गंभीर समझ का युवा था। अफसोस यह युवा उन तमाम आम युवाओं तक पैठ नहीं बना सका जिनकी बात यह करता था। इसने बुध्दिजीवी युवावर्ग पैदा किया, जो समाज के लिए अधिक मानवीय था। यद्यपि यह मानवीयता के लिए प्रतिबध्द होकर भी अपने मूल स्वभाव में व्यवस्था-विरोधी था।


युवा-काऊ ब्याय बनाम कालेज गोइंग रोमांस
80 के दशक बाद की मुख्यधारा की फिल्मों का युवा फिर से अपनी इमेज नान सीरियसवाली बनाने लगा और बाकी बची-खुची कसर हालीवुड प्रेरित काऊ ब्यायसंस्कृति ने ने पूरी कर दी। शिवा’ ‘अर्जुन’ ‘गर्दिश’, ‘परिंदा’, ‘काला बाजारजैसी फिल्मों ने इन युवाओं को कालेज के परदे पर उतारा। यह युवा कालेजों में छोटे-छोटे गुटों में बंटकर मारपीट, गुंडागर्दी करने लगा। गलियों नुक्कड़ पर हफ्ता वसूलने लगा। उसके इस रूप पर हिरोइनें जान लुटाती हैं। भले ही यह उनसे बदतमीजी करता हो। यह युवा उसी तरह के सैडिस्टिक दृश्य का एक्सटेंशन बना जिसकी बुनियाद राजकपूर ने अपने जवानी के दिनों में रखी थी। यानि स्त्री पर पुरुष शक्ति के प्रभुत्व को ग्लोरिफाई करना। कविता सरकार ने लिखा है-भारतीय दर्शकों में इस तरह के सैडिज्म के लिए विशेष आकर्षण है। इतना ही नहीं इस तरह का मर्दवाद दर्शकों ने अमिताभ की फिल्मों में मर्द’, ‘दीवारमें भी खूब पसंद किया। यानि कितने ही हंटर मार ले, जख्मों पर नमक छिड़क ले पर मर्द के सीने में दर्द नहीं होता। तेजाबजैसी फिल्में कालेज गोइंग युवा को रोमांस की पटरी और पेड़ों के इर्द-गिर्द बेतहाशा नचा-गवा कर अंत में एंग्री यंग मैन का भी रूप दे देती रहीं। यानि थ्री इन वन पैकेज। इसी दौर में यह एंटी हीरोके तौर पर भी डेवलप हुआ। यह नया युवा कालेज, गुंडागर्दी और राजनीति के गलियारे में चक्कर लगाता रहा। इसी समय जोशीले’ ‘दोस्त’, ‘गरीबों का रखवालाजैसी फिल्मों ने काऊ ब्याय संस्कृति को देशी रूप में दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया।

एंटी हीरो बनाम प्रेम दूत का उदय
कयामत से कयामत तक’ ‘मैंने प्यार कियाने आमिर खान और सलमान खान को युवावर्ग के बीच प्रेमदूतों के तौर पर स्थापित कर दिया। आर्चीज के कार्ड एक दूसरे को भेजे जाने लगे। खेतों में सरसों लहराने लगी। दूर-दराज के कस्बों तक में वेंलेनटाइन डे मनाया जाने लगा। यह समय प्रेम के सबसे बड़े सितारे शाहरुख खान के उदय का भी था। हर नया पैदा होने वाला बच्चा अब राज या राहुल था। यह दौर दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे का था। यह युवा चरित्र अपने कालेजों में प्रेम के गीत गाने और अपनी सारी ऊर्जा हिरोइन को पाने में लगाता है। नब्बे के उदारवादी दौर में जब बाजार में नयी संभावनाएं जन्म ले रही थीं, तब ऐसे में इन फिल्मों के युवा चरित्रों ने भी सिनेमा को एक नया मोड़ दिया। हालांकि संजय दत्त का खलनायक ऋएंटी हीरो इमेज को) दर्शकों द्वारा खासा पसंद किया गया। यानि इस दौर में भी हिंदी सिनेमा में युवाओं का चरित्र गीत-संगीत, प्रेम और हिंसा के त्रायी पर झूलता रहा। हिंदी सिनेमा की एक बड़ी खूबी रही है कि हर दौर में मुख्यधारा के सिनेमा के बरक्स एक समानांतर सिनेमा की परंपरा भी चलती रही। जो समय दर समय अपने मिजाज को और बेहतर करती रही। खान त्रायी के जादू के समय में भी सत्याऔर युवाजैसी फिल्में आयीं जिन्होंने महानगरीय युवा की एक दूसरी छवि गढ़ी जो अधिक चौकाऊं थीं। अंडरवर्ल्ड के भीतर का युवा और शहरी-शिक्षित मध्यवर्गीय युवा की इमेज प्रस्तुत करती इन फिल्मों ने फिर से उस मिथक को तोड़ा जहां इन युवाओं का चरित्र नान सीरियस फिर से बनने लगा था। लगानका भुवन जहां गंवई माहौल में एक लीडर के तौर पर उभरता है, वहीं नासा का भारतीय युवा वैज्ञानिक स्वदेशलौट अपने पढ़े-लिखे नौजवानों को ब्रेन ड्रेन के जाल से निकल आने को प्रेरित करता है। प्रेम इसमें भी कहीं बाहर नहीं जाता बल्कि वह मजबूती देने का आधार बनता है। दिल चाहता हैके युवक बर्गर, पित्जा खाते गोवा बीच और क्लबों में घूमते युवाओं को अलमस्ती का पाठ देते हैं। इस अलमस्ती के बीच भी यह पीढ़ी अपने समाज से शून्य नहीं है। वह सच का झंडा बुलंद करता है। आजाद मुल्क में इंडिया गेट पर एक अलग किस्म की सार्थक आजादी हेतु लाठियां खाता है और रंग दे बसंतीके माध्यम से नए समय के भगत सिंह, बिस्मिल आजाद के तौर पर उभरता है। यहां से हिंदी सिनेमा में युवा चरित्रों की छवियों ने गंभीर दिल को छू लेने वाली बुनियाद रखी। यह स्त्रियों से पशुवत व्यवहार नहीं करता, उन्हें बराबरी का दर्जा देता है।

मल्टीप्लेक्स फिल्मों की युवा छवि
21वी सदी में लड़कियां लड़कों से आगे निकल जायेंगी, यह सुनते-सुनते बड़े होते हमने फिल्मों में देख लिया, यहां देवदास निरुत्तर है। पारो अब रेत को मुट्ठी में नहीं पकड़ना चाहती (देव डी)। देवदास मरता नहीं, जीने की प्रेरणा देता है कि जियो क्योंकि जिंदगी बहुत खूबसूरत है। अनुराग कश्यप एक नए युवक देवदास को सामने लाते हैं। दिवाकर बैनर्जी ओये लकी, लकी ओयेमें उस युवक को सामने लाते हैं जो चोर है पर दुनिया सफेद कालर में उसकी भी बाप है। रजत कपूर जैसे नए लोग मिथ्याजैसी गंभीर फिल्म देते हैं जहां युवा के अपने सपनीले संसार नंगी और क्रूर सच्चाई में दम तोड़ देते हैं।

यह हमेशा से चलता आ रहा है कि युवा नायक अलमस्ती के आलम में कुछ गंभीर बातें कर जाता है। यह स्थिति अब भी है पर सिस्टम को लेकर अभी भी जो प्रश्न राजकपूर उठा चुके हैं उन्हीं, प्रश्नों को थोड़े और विस्तृत रूप में आज के नए निर्देशकों ने भी अपनी तरह से अपनी फिल्मों में उठाया है। फिल्म बनाने का तरीका काफी बदला है और कथा कहने, किरदार रचने का भी। फिर भी वर्तमान का हिंदी सिनेमा जगत ने इस युवा छवि को और भी बेहतर बनाया है। जाने-अनजाने इन फिल्मों ने हमारी युवा पीढ़ी को काम के ट्रेडिशनल रास्ते से अलग रास्ता चुनने को भी प्रेरित किया है। राक आनके युवक अपना बैंड बनाते हैं। समर 2010′ के युवक डाक्टर सुदूर देहात में जाकर प्रैक्टिस करते हैं। राजनीतिके युवक पारिवारिक विरासत को संभालने की लड़ाई लड़ते दिखते हैं। यह एक नए किस्म का उभार है।हिंदी सिनेमा ने एक नए तरह की युवा छवि रची है जो परम्परा और आधुनिकता में समन्वय करने में सक्षम है।

(सभी चित्र : विभिन्न स्रोतों से,गूगल इमेज के मार्फ़त : साभार)


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