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औपनिवेशिक समय, भोजपुरी परिवेश और भिखारी ठाकुर का उदय

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                 भिखारी ठाकुर का रंगकर्म भोजपुरी लोकजीवन की विविध पक्षों का साहित्य है और उनका नाट्य भोजपुरी लोकजीवन की सांस्कृतिक पहचान. उनके रचनाओं और रंगकर्म में एक पूरी सामाजिक परंपरा और इतिहास के दर्शन होते हैं. किन्तु संस्कृति के बहसों का अभिजन पक्ष इन्हें परे ही रखता आया है. इसकी वजह स्पष्ट है क्योंकि ‘ इतिहास निरूपण में अभिजात्यवर्गीय सोच के इतिहास ने सदा ही संभ्रांतवर्ग की पक्षधरता निभाई है. वह गाँव के बजाय सत्ता केंद्रों की विषयवस्तु रहा है. ’ [1] यद्यपि इतिहास और साहित्य के भीतर नए विमर्शों के उभार ने अब इतिहास और साहित्य की नयी व्याख्या लिखनी शुरू की हैं. फलस्वरूप अब तक जो परे था , उसे केंद्र में जगह मिल रही है. भिखारी ठाकुर इसी हाशिये के किनारे से मध्य की उपस्थिति के रूप में नजर आते हैं. उन्होंने भारतीय परिवेश में बीसवीं सदी के विमर्शों को बिना किसी पश्चिमी प्रभाव में आये केवल स्वानुभूति से अपने रंगकर्म में शामिल किया.               भोजपुर अंचल के स...

जनकवि भिखारी ठाकुर : रघुवंश नारायण सिंह

(यह मूल लेख भोजपुरी में लिखित है.जो भोजपुरी की बंद हो चुकी पत्रिका 'अंजोर'के अक्टूबर-जनवरी १९६७ अंक से साभार लिया गया है.मूल लेख जनकवि भिखारी ठाकुर नाम के पुस्तक जिसके लेखक श्री महेश्वर प्रसाद जी हैं ,की समीक्षा भी है और अपनी तरफ से कुछ टिप्पणियां भी.पाठकों की सुविधा के लिए हमने इसे हिंदी में रूपांतरित करके प्रस्तुत किया है,ताकि भोजपुरी नहीं जानने वाले भी भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले इस महान रंगधुनी के और बिदेसिया के रचयिता के बारे में जान सकें.पर भिखारी ठाकुर के बारे में सभी उल्लिखित राय ,लेखक महोदय की है,इससे रूपांतरणकार की  रजामंदी  जरुरी नहीं .रूपांतरण/अनुवादक - मुन्ना कुमार पाण्डेय  ) बहुत दिन पहले आरा से निकलने वाले 'भोजपुरी'में श्री बीरेंद्र किशोर का एक लेख छपा था 'भोजपुरी के शेक्सपियर  भिखारी ठाकुर' | बहुत लोगों ने जब उसे पढ़ा तो अचरज में पड़ गए,सिहर गए  कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली | यह तो अजब मेल बैठाया गया ,ऐसा बहुत लोगों ने कहा | बात सही भी थी बाकी राहुल बाबा ( सांकृत्यायन जी ) भिखारी को महाकवि कह चुके थे | अब हम ल...

एक थे भिखारी ठाकुर......शेषांश

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गतांक से आगे.... ........भिखारी ठाकुर का कमाल ही था कि एक ही व्यक्ति एक से अधिक रूपों में अपने को बदलता जाता ,भिन्न -भिन्न पात्रों के विभिन्न आचरण एवं उसके हाव-भाव को अपने में सहेजता रहता,उसी के अनुरूप अपने को ढालता जाता और दर्शकों को अपनी ही धारा में बहाए लिए चलता । उनकी अभिव्यक्ति का स्वर इतना सटीक,सरल,सहज और स्वाभाविक होता कि दर्शक भावविभोर हो जाते। प्रसाधन एवं रूप परिवर्तन का कार्य दर्शकों की थोडी-सी आँख बचा के कर लिया जाता। भिखारी ठाकुर ने अपने ज़माने में 'बिदेसिया'को बिहार,झारखण्ड,बंगाल और पूर्वी उत्तरप्रदेश एवम असाम के लोगों के जेहन में उतार दिया था। असाम में जब 'बिदेसिया' का मंचन हुआ था ,तब वहाँ के सिनेमा घरों में ताला लगने की नौबत आ गई थी। 'बिदेसिया'का मूल टोन यही है कि किस तरह से एक भोजपुरिया युवक कमाने पूरब की ओर जाता है और किसी और औरत के फेर में फंस जाता है। इस नाटक या तमाशे की ख़ास बात ये है कि ये भी परंपरागत नाटकों की तरह सुखांत है। इस नाटक के बारे में जी.बी.पन्त संस्थान के 'बिदेसिया प्रोजेक्ट'का रिमार्क है- "bidesia is a phrase design...

एक थे भिखारी ठाकुर.....

भोजपुरी अंचल के लोगों में भोजपुरी के शेक्स्पीअर भिखारी ठाकुर कितने भीतर तक पैठे हुए हैं,ये उन्ही लोगों से पूछिए। मेरा भिखारी ठाकुर के रंगकर्म पर इन्ही दिनों में काफी कुछ पढ़ना हुआ ,देखना भी हुआ। उनमे से आपके लिए भी कुछ ........ । ताकि आप भी जान पाये इस महान लोक- कलाकार को। भिखारी ठाकुर बहुआयामी प्रतिभा के व्यक्ति थे। वे एक साथ ही कवि, गीतकार, नाटककार, नाट्य-निर्देशक,लोक-संगीतकार,और कुशल अभिनेता थे, यानी जैक ऑफ़ आल ट्रेड्स ।भिखारी ठाकुर ने जहाँ अपने से पूर्व से चली आ रही परम्परा को आत्मसात किया था,वही उन्होंने आवश्यकतानुसार उसमे संशोधन-परिवर्धन भी किया। वे स्वयं में एक व्यक्ति से बढ़कर एक सांस्कृतिक संस्था थे। रामलीला ,रासलीला ,जात्रा,भांड,नेटुआ,गोंड.आदि लोक-नाट्य-विधाएं भिखारी के प्रिया क्षेत्र थे। साथ ही,उन्होंने परम्परागत ,पारसी,एवं भारतेंदु के नाटकों से भी प्रभाव ग्रहण किया था। भिखारी ठाकुर ने पारंपरिक नाट्य-शैली से सूत्रधार ,मंगलाचरण तथा अन्य रुढियों को भी कुछ ढीले -ढाले ढंग से स्वीकार किया और विदूषक के बदले "लबार"जैसे पात्र को लोगों के मनोरंजन के लिए प्रस्तुत किया। मंची...

भिखारी ठाकुर के बहाने.....

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सांस्कृतिक जीवन में जितना प्रभावित मुझे भिखारी ठाकुर ने किया है,उतना शायद ही किसी और ने। बाद के समय में हबीब साहब के रंग-प्रयोग ने बड़ा प्रभावित किया मगर भिखारी तो बस भिखारी ही थे। लगभग एक साल बाद घर जाने पर गावं की एक शादी में जाने का मौका मिला । जैसा कि मेरे यहाँके अधिकांश घरों के ऐसे आयोजनों में होता रहा है ,यहाँ भी एक आर्केस्ट्रा पार्टी बुलाई गई थी। वैसे इस आर्केस्ट्रा कल्चर ने हमारे समाज में ऐसी पैठ बनाई है कि लगता है कि जिनके यहाँ शादियों में ये नही आया उसने शादी के नाम पर सिर्फ़ अपने माथे की बोझ हटाई है। खैर ,मेरे प्राईमरी स्कूल वाले हेडमास्टर साहेब जो अब फ्रेंडली हो गए हैं,-"कहने लगे जानते हो, ई आर्केस्टा की बाई जी लोग इतना माहौल ख़राब कि है सब कि जहाँ ई सबका पोर्ग्राम हुआ की उहे मार हो जाता है,आ लड़का लोग के आँख का पानी मु (मर)गया है। लाज -शर्म सब घोर के पी गया है। "-मैं सोचने लगा ये तो गुरूजी ने अजीब ही बात बताई , चूँकि मैं लोक रंग से बड़ा प्रभावित रहा हूँ ,सो मैंने कहा -"गुरूजी आपके टाइम में भिखारी ठाकुर भी तो अइसने लौंडा नाच करवाते रहते थे,तब क्या ऐसा नही होत...