8/23/11

सलवा जुडूम के मुल्क में बस्तर बैंड...


बस्‍तर हम सब जानते हैं. पर उस बस्‍तर का अर्थ परेशान करता है. मुन्‍ना पांडे ने बस्‍तर का एक दूसरा अर्थ हमारे सामने रखा है: बस्‍तर बैंड. लोक परंपरा की जीवंत मिसाल. ठेठ देसी. अगर कुछ गौरवशाली हो सकता है परंपराओं में, तो बस्‍तर बैंड बेशक उनमें से एक है. मुमकिन है, हिंदुस्‍तान के मुख्‍तलिफ हिस्‍सों में और भी ऐसी कलाएं मिसाल बनने की स्थिति में आ पहुंची होंगी. उन्‍हें फिर से जीवंत बनाना हमारे समय की बड़ी चुनौतियों में से एक है. तय है कि इमदादों से ये काम नहीं होगा. इमदाद धरोहर बना सकते हैं, दीर्घाओं में कलाओं की नुमाइश लगा सकते हैं, या फिर म्‍युजियम में कैद कर सकते हैं. जरूरत इन परंपराओं को पुनर्जीवित करने की है, डायनमिक बनाने की है. दिलचस्‍पी और इच्‍छाशक्ति जरूर इस दिशा में कारगर साबित हो सकते हैं. बहारें वापस आ सकती हैं. बहरहाल, सरोकारियों से गुजारिश है कि वे इस दि शा में कुछ सकारात्‍मक पहल लें. वोलंटियर करें. पहले चरण में दस्‍तावेजीकरण का काम तो हो ही सकता है. ये पता तो चले कि हमारी लोक कलाओं में कितने रंग थे, कितने रह गए और कितने रह जाएंगे. अगले दौर में उनके पुनर्जीवन के रास्‍ते पर साझा प्रयास भी किया जाएगा. फिलहाल बस्‍तर बैंड से जान-पहचान करें.

आम आदमी बस्तर का नाम सुनते ही किस तरह की तस्वीर अपने मन में बनाता होगा,इसकी कल्पना सहज की जा सकती है | पर यह तस्वीर का वह पहलू है जिसकी निर्मिति हमारे प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने रची-गढ़ी है | छत्तीसगढ़ के वनों में अनेक संस्कृतियाँ अपने मूल रूप में मौजूद हैं, जिनपर अभी उपभोक्ता संस्कृति ने जाल नहीं फेंका या यह कि अभी तक हमारे वन-प्रांतरों की यह अनमोल धरोहर अभी तक इससे अछूती रह गयी है यह राहत की भी बात है | इसकी बड़ी वजह वहाँ तक इस भोगवादी मानसिकता की पहुँच का न होना भी रहा हो सकता हैं | बहरहाल, बस्तर बैंड बस्तर का एक सांगीतिक चेहरा है और अपने रूप, दृश्यात्मकता और प्रदर्शन  से यह

अहम साजिंदे
बहुत चौकाने वाली भी है | ‘बस्तर बैंड’ की संकल्पना स्व.हबीब तनवीर के नया थियेटर और छत्तीसगढ़ के सक्रिय रंगकर्मी अनूप रंजन की है | अनूप ने बस्तर के लगभग सभी कबीलों में घूम-घूमकर अब लुप्त हो चुके अथवा प्रयोग में नहीं आने वाले कई वाद्य-यंत्रों को इकट्ठा करके प्रदेश के राजकीय संग्रहालय को सौंपा है | अनूप बताते हैं कि ‘बाद में मुझे अहसास हुआ कि ये जो वाद्य यन्त्र धीरे-धीरे प्रयोग से हटते जा रहे हैं और इनके बजाने वाले भी कम होते जा रहे हैं ऐसे में इनको म्यूजियम की शोभा बढाने के बजाये प्रयोग में लाया जाए तथा इनको जो बजा सकते हैं उनकी खोज की जाए |’बस्तर बैंड में बस्तर के लगभग सभी कबीलों के चालीस से भी अधिक सदस्य और इतने ही वाद्य शामिल हैं | अनूप अपने इस प्रयास के पीछे की प्रेरणा हबीब साहब के कामों से मिली भी बताते हैं | इस बैंड का प्रत्येक सदस्य तीन-चार वाद्य यन्त्र बजाने में सक्षम है | मौखिक ध्वनियों, लकड़ी और तारों से बने बाजों, थापों, नृत्य आदि एक किस्म का जादू पैदा करते हैं और हमें ऐसा लगता है गोया सभ्यता के पहले चरण में आ गए हों और तमाम किस्म की बौद्धिक जुगालियों से निर्मित यह समाज अभी इस क्षण कहीं है ही नहीं | बस्तर की जितनी भी जनजातियाँ हैं उनकी परम्पराएं भी एक दूसरे से अलहदा हैं मसलन,घोटूल,मूरिया,दण्डामी,माड़िया इत्यादि आदिम जनजातियों के वाद्य यन्त्र और परम्पराएं तक अलग है बावजूद इसके अनूप रंजन ने इसे एक मंच पर बड़े ही जतन से ऐसे संयोजन से उतारा है कि सभी मिलकर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत का एक समृद्ध और मुकम्मल तस्वीर उपस्थित करते हैं |
बस्तर के आदिवासी ‘लिंगों देव’को अपना संगीत गुरु मानते हैं | उनकी मान्यता है कि इन वाद्य यंत्रों की रचना लिंगों देव ने ही की थी | ‘लिंगों पेन’ वा  ‘लिंगों पाटा’ अथवा ’लिंगों देव’ के गीतों में इन वाद्य यंत्रों का जिक्र मिलता है | यह बैंड बस्तर की सदियों से चली आ रही आदिम जीवन की लोक जीजिविषा और परंपरा का ध्वज वाहक है | अनूप रंजन बताते हैं,

थिरकने से रोकना मुश्किल
‘मेरे आदिवासी वाद्य यंत्रों के संग्रहण के शौक ने पता नहीं कब जूनून का रूप अख्तियार कर लिया | लगभग दस बरस के इस श्रमसाध्य,खर्चीले बैंड का जूनून सन 2004 में अपनी शक्ल अख्तियार कर पाया | जिसकी पच्चीसवीं प्रस्तुति इस अगस्त माह में दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में हुई और इस बेमिसाल प्रस्तुति ने दिल्ली के सांस्कृतिक हलकों में लोक सौंदर्य की जड़ीभूत सौन्दर्याभीरूची को झंकझोर दिया | छत्तीसगढ़ के इस जनजातीय संगीत जिसमें गीत, संगीत, नृत्य सभी कुछ है कि प्रस्तुति दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में भी हो चुकी है |’
जो वाद्य यंत्र आपको इस दुनिया से किसी और दुनिया में हमें आसानी से लेकर चले जाते हैं, उनके नाम उतने ही दुरूह हैं| इन वाद्य यंत्रों में, गोगा ढोल,मिरगिन ढोल,सियाडी बाजा, बेदुर, सुलुड,  चिटकुल, उजीर, किकिड, तेहंडोर, गोती, नरपराय, गुटापराय, चरहा, दुसिर, मुंडा, तपकी, अकुम, तोड़ी, तुडबड़ी, नंगूरा, धुरवा ढोल, माडिया ढोल आदि हैं |
साथ ही अगर हम इस बैंड के सदस्यों पर ध्यान दे तो इसमें कोया समाज या कोइतोर समाज के मुरिया, दण्डामी, मुंडा, मोहरा, भतरा, लोहरा, परजा, हलबा, मिरगिन, अदबा आदि समाजों के पारंपरिक और विभिन्न अवसरों पर प्रस्तुत किए जाने वाले संस्कारिक गीत-संगीत-नृत्य को उसकी सामूहिकता में सम्मिलित किया गया है | बस्तर बैंड प्रकृति का संगीत है और ऐसे प्रयासों की सराहना होनी चाहिए | इतना ही नहीं, यह बैंड अपने सांगीतिक प्रयासों से हमारे तथाकथित शहराती और विकसित समाजों के सोच से परे बस्तर की उस तस्वीर को सामने लाता है जहाँ इस विकसित समाज ने उसे बारूदी ढेर पर बैठा विस्फोटक ज्वलनशील जगह बना दिया है | जब आज पूँजी आधारित व्यवस्था ने बस्तर को आदिवासियों,उनकी जमीनों, खनिजों और संसाधनों के दोहन की ही जगह बना दी है, ऐसे में यह बैंड बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को सामने लाता है, जिसको देखने का अवकाश किसी के पास नहीं है या कोई देखना ही नहीं चाहता | बस्तर बैंड देखते हुए हो सकता है आपको कुछ अनूठी चीज़ न मिले पर यह बैंड अपने वाद्ययंत्रों, नृत्यों, गीतों और प्रस्तुतियों से आपको रोमांचित करता है, इसमें कोई दो-राय नहीं | बस्तर बैंड बस्तर के आदिम संगीत का प्रतिनिधि है | बस्तर माने केवल नक्सल, पुलिस और बारूद ही नहीं होता |
पूरी टीम

(www.sarokar.net पर आज (23/8/11)प्रकाशित ) ...

8/21/11

सामा-चकेबा - मिथिलांचल की गौरवशाली परंपरा

'(लोक संस्कृति  की समृद्ध विरासत  बिहार  की भूमि में सदा-सर्वदा से गहरे विद्यमान रही है | आज का नवयुवक एक तरफ तो उत्तर औपनिवेशिक  समय में मज़बूरी वश अपनी सांस्कृतिक जड़ों  से कटता जा रहा है  या कटने को विवश है  तो दूसरी तरफ हमारी लोक परंपरा पर भी खतरे की तलवार लटक ही है | इसके पीछे निश्चित ही बाज़ार और उसकी शक्तियां हैं पर बिहार की सांकृतिक छवि को जन-जन तक और विशेषकर युवाओं तक पहुँचाने का जिम्मा बिहार के संस्कृति मंत्रालय ने उठाया है | हमें उनके इस प्रयास को सराहना चाहिए | उन्होंने बिहार की सांकृतिक पहचान बनाते कुछ लोक परम्पराओं पर अपनी पुस्तिका 'बिहार विहार'निकाली है जिसमे  इन कला रूपों का परिचयात्मक विवरण है | यहाँ मिथिलांचल की गौरवशाली परम्परा 'सामा-चकेबा'पर उसीसे एक अंश  साभार ...)


सामा चकेबा'एक प्रकार का 'कंपोजिट' आर्ट है | इसमें मिटटी की बनी अनगढ़ मूर्तियाँ,बाँस के हस्तशिल्प,लिखियार,मिथिला पेंटिंग,गायन,सांस्कारिक अनुष्ठान,नृत्य,अभिनय आदि सब कुछ एक साथ रूपाकार होता है,जो इसे बेहद आकर्षक दृश्यात्मकता प्रदान करता  है | दैनन्दिनी के कार्य से निवृत  होने के बाद कार्तिक मास के सिहरन वाली रात के दूसरे प्रहर में दुग्ध धवल चांदनी में यह 'खेल'प्रारम्भ होता है तथा अमूमन तीसरे प्रहर तक चलता है |  हर रात,तालाब(नदी),बाग़-बगीचे,खेत-खलिहान,मंदिर और ग्राम प्रदक्षिणा का इसमें कार्यक्रम चलता है | इस पूरे खेल के दौरान ननद-भौजाई की चुहलबाजी और हँसी-मजाक वातावरण को जीवंत  बनाये रखते हैं | पद्म पुराण की एक पौराणिक कथा से भी 'सामा-चकेबा'को जोड़ा जाता है | इस कथा में श्रीकृष्ण के दरबार के एक पात्र (चूड़क)की नजर उनकी पुत्री'समा'(श्यामा)पर रहती है | पर सामा 'चारुवाक'नामक युवक से प्यार करती है | प्रेमांध चूड़क श्रीकृष्ण के पास इसकी चुगलखोरी करता है | श्रीकृष्ण शाप देते हैं और सामा-चारुवाक पक्षी बन जाते हैं | बहन के शापित  होने की खबर भाई साम्ब को लगती है | वह श्रीकृष्ण से अनुनय-विनय करता है पर श्रीकृष्ण राजधर्म की आड़ लेकर उसके आग्रह को ठुकरा देते हैं | साम्ब शिव की आराधना में घनघोर तपस्या करते हैं  | शिव प्रसन्न होते हैं तथा मुक्ति का मार्ग बताते हैं | इस मार्ग का अनुसरण कर साम्ब महिलाओं को संगठित करते हैं | श्रीकृष्ण झुकते हैं और सामा-चारुवाक शाप-मुक्त होते हैं |स्त्री के संगठित प्रतिरोध,राज प्रशासन के झुकने,भाई के बहन के प्रति अटूट प्रेम और चुगलखोरों को सजा-यही उत्स है 'सामा-चकेबा'पर्व का | इस पूरे कथानक का बेहद रोचक अभिनय इस पर्व में होता है | आज भी मिथिलांचल के गाँवों में स्त्रियाँ 'सामा-चकेबा'खेलती हैं | कला  मर्मज्ञों ने इसके कथा सूत्र की रोचकता,आकर्षक दृश्यात्मकता,गीत-संगीत-नृत्य और इसके पारंपरिक स्वरुप को देखते हुए इसे परिमार्जित कर पारंपरिक 'लोकनृत्य'के रूप में विकसित किया है | इसका बहुआयामी स्वरुप,गायन की विविधता,प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम,भाई-बहन के स्नेहिल सम्बन्ध,चुगलखोरों(समाज विरोधियों)के प्रति सामूहिक-संगठित विरोध,लोक कल्याण की भावना,संस्कारों का प्रशिक्षण,जैसे अनेक खण्डों में बांटकर इसे समझने का प्रयास किया है | इसीलिए इस बहुआयामी लोकनृत्य में शेष बातें एक जैसी होने पर भी प्रदर्शनकारी दल के विचार चिंतन के आधार पर इसकी व्याख्या बदल जाती है | यही इस लोकनृत्य की निजता और विशेषता भी है |   

8/15/11

बेवजह का कुकुरहांव "आरक्षण" पर

आरक्षण रिलीज हो चुकी है और पिछले हफ्ते तक जो सम्मानीय बंधू इसके विपक्ष में हल्ला बोल किये हुए थे और सर- फुटौव्वल पर आमादा थे,उन्हें अब तक तो यह मालूम पड़ गया होगा कि यहाँ मामला वैसा नहीं था,जैसा उन्होंने अंदाजा लगाया था

याने खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली बात आरक्षण पर सोलह आने फिट बैठती है
आरक्षण देखकर यह लगता हैं कि जिस शख्स का नाम प्रकाश झा है,क्या उसकी क्रियेटिविटी को दीमक लगने लगे हैं ? क्या ये वही फिल्मकार है जिसने दामुल,मृत्युदंड जैसी फिल्में दी थी ? पता नहीं हमारा सिनेमा एक ख़ास किस्म के आदर्शवादिता को क्यों ढ़ोता है
फिल्म का नायक आदर्शवादी प्रिंसिपल प्रभाकर आनंद (अमिताभ बच्चन ) आरक्षण के पक्ष में बोलकर और सच के पक्ष में खडा होने की वजह से अपने पद और संस्थान से निकाल दिया जाता है
उसके दलित स्टुडेंट और फिल्म के दूसरे नायक दीपक कुमार(सैफ अली खान) उसके साथ आकर उसके तबेला स्कूल को अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर सँभालते हैं और यहाँ से यह फिल्म अपने मूल मुद्दे से भटक जाती है
आरक्षण का जरूरी मुद्दा कहीं और चला जाता है
फिल्म प्राईवेट कोचिंग और प्राईवेट शिक्षा संस्थानों की पैरेरल व्यवस्था की ओर चल देती है
बीच-बीच में फिल्म कहीं-कहीं वर्गभेद के मुद्दे को छूती है पर वह आरक्षण के मुद्दे से कतई मेल नहीं करता
आरक्षण की जितनी भी डिबेट प्रकाश झा से या उनकी समझ से संभव थी,उतनी उन्होंने पहले हाफ में रख छोड़ी है
कायदे से फिल्म के जिस हिस्से से आरक्षण समर्थक वर्ग को दिक्कत होनी चाहिए उस ओर उनका ध्यान नहीं जा रहा
फिल्म का एक दृश्य है कि दलित शिक्षक और नायक दीपक कुमार ,अपने शिक्षक प्रभाकर आनंद के मामले में अपने इलाके के दलित नेता से सहयोग मांगता है पर वह शिक्षा मंत्री ( सौरव शुक्ला)के आगे बिक जाता है इतना ही नहीं वह अपनी कुर्सी के सपने के लालच में उस सवर्ण मंत्री और प्रतिनायक मिथिलेश सिंह (मनोज बाजपेयी ) के आगे मिमियाने वाले अंदाज़ में चित्रित हुआ है
क्या निर्देशक इसको दिखा कर इस वर्ग को यह सन्देश देना चाहता था कि देखो आपके वर्ग का प्रतिनिधि कितनी संकीर्ण सोच (फिल्म में जिसे मंद बुद्धि कहा गया है ) का है या यह कि दलितों और उनकी स्थिति में अब तक अधिक बदलाव ना होने के पीछे उनके द्वारा चुने गए इसी तरह के प्रतिनिधि रहे हैं,जो अपने को दलितों का सच्चा हितैषी और प्रतिनिधि बताते रहे हैं ? यह फिल्म प्रच्छन्न रूप से आरक्षण के आर्थिक आधार पर दिए जाने के तर्क की पैरवी करता दिखता है
एक बड़ा इरिटेटिंग पात्र पंडित छात्र का है जिसे अपनी फीस तक के लिए जूझना पड़ता है | यह पात्र पूरी फिल्म में जिस हिंदी का प्रयोक्ता दिखा है वैसी हिंदी पता नहीं प्रकाश झा ने किस हिन्दुस्तान में सुनी है

सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि वह कैरेक्टर इंजीनियरिंग पढना चाहता है और बाद में पढता भी है
आरक्षण फिल्म के गरियाने वालों को खासकर वह दृश्य भी याद रखना चाहिए जब दलित नायक दीपक कुमार थाने में बंद है तब उसकी जमानत उसी का सवर्ण अमीर साथी सुशांत सेठ (प्रतीक बब्बर) ही कराता है
अब प्रश्न उठता है कि क्या जब भी जमानत जैसे काम या ऐसे ही अन्य काम जिनमें सिफारिश या पैसों की बात होनी है वह बिना सवर्णों के सहयोग के नहीं होगी ? दलितों का उद्धार या उत्थान सवर्णों का ही मुहताज/कृपापात्री रहेगा ?इस बात को महज फ़िल्मी प्रयोग या सहज स्वाभाविक मानकर नहीं चला जा सकता
आरक्षण देखते हुए कई दफे यह लगता है गोया प्रकाश झा ने बाघ और बकरी (इसे अभिधार्थ ना लें )के एक ही घाट पर पानी पीने के कपोलकल्पित रामराज्य को ही फिल्म में उतारने की कोशिश की है
फिल्म का नायक प्रभाकर आनंद कोचिंग शिक्षा व्यवस्था को अपने तबेला स्कूल (एक आदर्श अवधारणा )के माध्यम से ध्वस्त कर देना चाहते हैं और यह इसी तरह के रामराज्य को बनाने की गांधीवादी कोशिश लगती है पर यह पूरा प्रकरण फिल्म का सबसे बोरिंग और लम्बा खींच गया दृश्य है
कायदे से प्रकाश झा ने फिल्म आरक्षण के शीर्षक के साथं न्याय तो नहीं ही किया है
ना तो यह फिल्म आरक्षण की पैरवी करती दिखती है न ही मुखालफत
यह मध्यममार्गी फिल्म है अगर हम यह मान लें कि यह फिल्म आरक्षण के इर्द-गिर्द है
इस फिल्म के शीर्षक से इसका जुड़ाव बस इतना सा है कि फिल्म में दिखाए गए संस्थान का प्रिसिपल आरक्षण के पक्ष में बोलने की वजह से मुसीबत में फंसा दिया जाता है
ध्यान से देखा जाये तो यह प्रिंसिपल इस स्टेटमेंट से पहले ही शिक्षामंत्री जी के भांजे और एक ट्रस्टी महोदय के नजरों में पहले ही खटक रहा होता है
आरक्षण के पक्ष में बोलना महज़ उसके ताबूत की आखरी कील होता है
लब्बोलुआब यह कि यह फिल्म प्रकाश झा की अब तक कि सबसे कमजोर और भटकी हुई फिल्म है और सही कहें तो यह झा का कमर्शियल स्टंट मात्र है,जिसका महज शीर्षक देखकर ही आरक्षण समर्थकों ने बेवजह का कुकुरहांव (इसे भी कृपया अभिधार्थ न लें )मचा दिया
दरअसल यह वैसा ही मानो जब बच्चे को चम्मच में शहद डाल कर चटाई जाए और बच्चा शहद छोड़कर चम्मच को ही दाँतों से पकड़ ले
हाँ ! झा के ट्वीट के खिलाफ मैं भी हूँ
(बहरहाल,फिल्म के एक छोटे दृश्य में भोपाल रंगमंच के बेमिसाल एक्टर आलोक चटर्जी और नया थियेटर के हिमांशु त्यागी को देखा सुखद है पर यह मेरी व्यक्तिगत राय इन कलाकारों के लिए है फिल्म से इसका कोई लेना देना हैं )



एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...