12/29/17

देसवा और भोजपुरी के सामने के सवाल


बीते कुछ वर्षों से चर्चित और 'बे-रिलीज' भोजपुरी फिल्म 'देसवा' पिछले दिनों यू-ट्यूब पर रिलीज कर दी गई. दर्शकों की अच्छी प्रतिक्रिया भी इस फिल्म को मिलनी शुरू हो गई है. मेरा मसला इस फिल्म के रिलीज होने या उसके रिलीज कर दिए जाने से लेकर नहीं है. यह फिल्म मैं पहले ही देख चुका हूँ और इस फिल्म को लेकर जो जूनून इसके निर्माता-निर्देशक नीतू चंद्रा और नितिन नीरा चंद्रा के हिस्से मैंने देखा है, उसको भोजपुरी समाज का ही सहयोग ना मिलना, जो इसका सबसे स्याह पक्ष है, भी मैंने देखा है. आखिर क्या वजह है कि एक निर्माता जो हिंदी सिनेमा की अपनी गाढ़ी कमाई को अपनी मातृभाषा में आ रही घटिया से नीचे स्तर की फिल्मों के सामने एक अच्छी फिल्म में निवेश करता है और वह फिल्म रिलीज होने तक को तरस जाती है. इसके पीछे कौन सा नेक्सस काम कर रहा था. एक युवा निर्देशक एक बेहतरीन साफ़-सुथरी फिल्म अपनी भाषा में बनाता है और वह फिल्म रिलीज नहीं हो पाती. ऐसा नहीं है कि देसवा ने कोई बड़े दावे कर दिए कि मैं ही वह झंडाबरदार हूँ जिसके पीछे समस्त भोजपुरी फिल्म जगत को खड़ा हो जाना चाहिए. नितिन की चिंता के मूल में आज भी बिहार और उसकी जबानों में साफ़ और सार्थक सिनेमा बनाने की जिद है वह भी तब जबकि इस युवा निर्देशक और निर्मात्री ने अपने हाथ भावनाओं में बहकर जलाए हैं. जब मैं ऐसा लिख रहा हूँ तब तक यह निर्माता-निर्देशक 'मिथिला मखान' जैसी फिल्म सामने ला चुके हैं जिसे राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय फिल्म का अवार्ड दिया. हम उस इलाके के लोग हैं जहाँ देवरा के किल्ली गाड़ने, छाती से भाप उड़ाने, मिसिर जी के ठंडा होने, धीरे डालs दुखाता, हमरा हउ चाहीं, मारे सटासट जैसे सैकड़ों बजबजाते गालियों (मैं इन्हें गीत नहीं कह सकता) और राधेश्याम रसिया, गुड्डू रंगीला, खुशबू उत्तम, कल्पना, इंदु सोनाली, खेसारी आदि अनेक 'बद-नामों' को लाखों में व्यूज देते हैं उनकी फिल्मों को करोडो का रेवेन्यु थमाते हैं लेकिन जैसे ही एक सार्थक सिनेमा या गीत सामने आता है उसके लिए हमारे डाटा पैक को, हमारे बंद पड़ गए दिमागों की तरह ही, बन्द कर देते हैं. देसवा की चर्चा आंधी की तरह थी लेकिन हमने उसकी लौ को फीका करने में कोई कसर ना छोड़ी. भोजपुरी के लिए लड़ने वाले समूह 'आखर' ने देसवा को लेकर काफी सजगता दिखाई. बात वही कोशिश में ईमानदारी थी, बस जगा नहीं पाए तो सरकार और अपने लोगों को. शायद यू-ट्यूब वह काम कर दे.

अभी के भोजपुरी सिनेमा के साथ कमाल यह है कि जिन्होंने भी भोजपुरी फिल्मों कीचड में उतर कर उसे साफ़ करने की कोशिश की कोशिश की उसको अपने हाथ खींच कर भागना पडा. यह काजल की कोठरी से भी काली है. दूर तक कोई सूरत नजर नहीं आती पर नितिन जैसे युवा खूँटा गाड़े बैठे हैं तो लोग इस तरह के प्रयास को स्वागत के बजाये अजूबे की तरह देख रहे हैं. हमने दरअसल अपनी एक विरासत खो दी है. यह विरासत तलत, रफ़ी, महेंद्र कपूर, मन्ना दे, अलका याग्निक, आशा, जैसों के गायकी और गंगा मैया तोहे पियरी चढैबो से लेकर देसवा और भेंट तक की है. अफ़सोस हम इस विरासत के चले जाने की कीमत नहीं समझते. हमने न केवल अपनी अस्मिता की बलि दी है बल्कि अपनी ही नजरों में इतने गिरे हुए हैं कि आईने में खुद से ही नजरे नहीं मिला सकते, खुद से मुलाकात होने का डर जो है. नितिन के साथ उनके इस मुहीम में कुछ ऐसे अभिनेता इस फिल्म में केवल माई भाषा के बेहतरी के अभियान में इस रिस्क को लेकर भी सामने खड़े हैं कि हाँ! बेशक कह लो मुझे भोजपुरी मैथिली का हीरो यह मेरी जबान है और मैं इसके लिए कुछ भी करूँगा. क्रांति प्रकाश झा ऐसे ही अभिनेता हैं जिन्होंने देसवा और फिर मिथिला मखान में काम किया है. इस अभिनेता के अलावा अजय कुमार, दीपक सिंह, आशीष विद्यार्थी जैसे कुछ नाम और हैं जिनके अभिनय और प्रतिभा के पासंग भी सौ खेसारी, निरहुआ, कलुआ नहीं हैं लेकिन दुर्भाग्य देखिए चल यही रहे हैं और इनके साथ रोज पैदा होती फूहड़ गायक-गायिकाओं की फ़ौज है जो चल ही दौड़ रहे हैं पर हमारी ही संस्कृति और जबान की कीमत पर हमारी ही बहु-बेटियों का चलना, बाहर निकलना दुश्वार किए हुए है. एक तो यह वैसे ही बंद समाज है जो बाहर निकलती लड़कियों को सौ सवालों में जकड़ता है. तिस पर 'बबुनी के लागल बा शहर के हवा' और 'मोरब्बा भईल बिया', 'पियवा से पहिले हमार' पूरी कर देते हैं. अब दिक्कत बंद समाज को लेकर भी है सौ बंधुवर हैं जो शुतुरमुर्ग की तरह सिर गोते अपनी दुनिया लाभ-हानि में भिड़े हुए मुंबई, दिल्ली में बैठे भोजपुरी सिनेमा और संस्कृति के पैरवीकार, खेवैया बने हुए हैं लेकिन एक बड़ी फिल्म (शोर्ट फिल्म्स का ऑनलाइन आना आश्चर्य नहीं क्योंकि अपने यहाँ अभी कोई स्पष्ट प्लेटफोर्म नहीं जहाँ इन फिल्मों को दिखाया जाए) यू ट्यूब पर लानी पड़ती है और निरहुआ सटल रहे, मार देब गोली केहू ना बोली जैसी हजार फ़िल्में जुबली मना लेती हैं. भीतर की गंदगी दिखती नहीं, फैलाया सांस्कृतिक आतंकवाद नहीं दिखता और दुल्हनिया पाकिस्तान से ही चाहिए. कमाल है. 
देसवा भोजपुरी सिनेमा के बेहद बुरे दौर की एक ईमानदार कोशिश है. देसवा सांस्कृतिक शून्यता से भरे ढहते समाज के चेहरे पर एक प्रश्नचिन्ह है. आप देखिए देसवा यह आपके समय के सिनेमा और गीत-संगीत का वह आइना है जो आपको खुद के भीतर झाँकने को मजबूर करता है कि क्यों यह फिल्म यू ट्यूब पर आई और क्यों इसे बड़ा पर्दा हम मुहैया नहीं करा सके. यकीन जानिए बिहार और यूपी सरकार की भी कोई इच्छा दूर-दूर तक नजर नहीं आती कि वह अपनी भाषाओं की फिल्मों के बेहतरी के लिए कुछ सार्थक पहल करें.
नितिन नीरा चंद्रा, नीतू चंद्रा, नियो बिहार और चंपारण टॉकीज टीम के हार हार कर भी टिके हौसलों के पीछे जो भाव मुझे दिखता है उसके लिए प्रहलाद अग्रवाल के शब्दों को उधार लूं तो कहूँगा 'कहीं न कहीं कुछ है जरुर, जो छूट गया है - जिससे मुखातिब होने की कोशिश बरक़रार है और तलाश क्या है, सो कुछ पता नहीं. लेकिन कुछ है, जिससे पर्दादारी कायम है - कुछ मुजस्सम ख़ूबसूरती है जो नुमायाँ होना बकाया है.'- लेकिन सलाम ऐसे हौसलों को जो इतनी ठोकरों के बाद भी यह नहीं कहता अपनी मातृभाषा में दुबारा कोई फिल्म बनाने से पहले कि 'मुड़-मुड़कर क्या देखते हो? जाय बसे परदेस सजनवा सौतन के भरमाए -खाओ कसम अब फिर कभी...'- सलाम ऐसे हौसलों को, जो कुछ भी हो हम कर गुजरेंगे के भावबोध से भरे टिके है और इनके हौसलों को पंख देने की जिम्मेदारी हमारी है कब तक चुप रहेंगे हम और कब तक कोई अपनी गाढ़ी मेहनत और सांस्कृतिक प्रयास वर्चुअल लुटता रहेगा. सुना है इसी बीच कोई 'ललका गुलाब' की 'भेंट' भी चढ़ा गया है आपकी नज़र. अब इन उड़ानों को  मजबूर न होने दीजिए. भोजपुरी के 'मिथिला मखान' का आना बाकी है और यह आएगा तभी जब आप 'देसवा' सरीखे प्रयासों से जुड़ेंगे.


इस लिंक पर देसवा देखें https://www.youtube.com/watch?v=abT4LhpxFOg                        

7/14/17

नट सम रिझवन तोहि की टेक : भारतेंदु का रंगचिंतन

[यह लेख दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित कॉलेज मिरांडा हाउस के हिंदी-विभाग की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. रमा यादव ने लिखा है. यह लेख प्रो. रमेश गौतम की पुस्तक 'नाटककार भारतेंदु : नए सन्दर्भ नए विमर्श'(अनन्य प्रकाशन, दिल्ली  में संकलित है. डॉ. रमा न केवल एक बेहतरीन शिक्षिका है बल्कि इन्होंने लगभग 25 वर्षों से प्रदर्शनकारी कलाओं से अपनी संगत जारी रखी हुई है. आप श्रीराम सेंटर, मंडी हाउस, नई दिल्ली में न केवल प्रशिक्षित रंगकर्मी हैं बल्कि एक शानदार क्लासिकल नृत्यांगना और कवयित्री भी हैं. आपने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् के एल्ते यूनिवर्सिटी, बुडापेस्ट, हंगरी में हिंदी के लिए दो वर्षों तक अध्यापन किया है. यूरोप में आपका नाट्य 'मीरा' कई देशों में खेला और सराहा गया है. इसके अतिरिक्त इस देश के प्रतिष्ठित वरिष्ठ रंगकर्मी भानु भारती और अन्य रंगकर्मियों/निर्देशकों के साथ इन्होंने कई नाटकों में अभिनय, सहायक निर्देशन और निर्देशन भी किया है. आपसे हिंदी-विभाग, मिरांडा हाउस, दिल्ली-7 पर सम्पर्क किया जा सकता है.    
नोट : यह लेख छात्रोपयोगी जान यहाँ साभार पोस्ट की जा रही है इसका कोई अन्य मंतव्य नहीं है. है तो बस इतना ही की बेहतर लेख सब तक पहुँचे. मोडरेटर इस लेख में अभिव्यक्त बातों, तथ्यों या लेख पर कोई दावा नहीं करता.]
रंगकर्म एक चुनौती पूर्ण विधा है इसे भारतीय रंगकर्म के इतिहास और समकालीन रंगमंचीय परिप्रेक्ष्य में अच्छी तरह समझा जा सकता है . भारतीय रंगकर्म का इतिहास अनेक उठा- पटको, विरोधाभासो और परिवर्तनों का इतिहास है . भारतीय रंगकर्म की एक खास पहचान जो उसकी शुरुआत से ही रही है वो है उसकी प्रयोगधर्मिता . राजदरबारों से संरक्षण हासिल होते रहने पर भी यहाँ भास का उत्तररामचरितम, शूद्रक का मृच्च्कटिकम और मुद्राराक्षस जैसे नाटक लिखे गए . इन नाटकों की कथावस्तु इनकी प्रयोगशीलता की गवाही आज तक देती है. मुद्राराक्षस जैसा जटिल बौद्धिक राजनीतिक घात-प्रतिघातों का नाटक शायद ही विश्व की अन्य किसी भाषा में लिखा गया हो . भारतीय रंगकर्म अपने आपको ढ़ाई हज़ार वर्ष पूर्व जिस तरह से प्रतिष्ठित करता है वो इस बात को साबित करता है कि भारत का रंगकर्म से सम्बन्ध विश्व रंगमंच में सबसे पुराना है भरत का नाट्यशास्त्र इसका ज्वलंत उदाहरण है जहाँ नाटक अपनी मूलभूत दृष्टि के साथ स्वयं को स्थापित करता है और वो मूलभूत दृष्टि है दीवारों का ढहाना और इसीलिए भरत अपने  ग्रन्थ को ‘पंचम वेद’ की संज्ञा देते हैं जिसके द्वार किसी भी वर्ग और लिंग के लिए ससम्मान खुले हैं . आधुनिककाल में आकर भारतीय रंगकर्म की इस कमान को संभालते हैं भारतेंदु बाबु हरिश्चन्द्र . हरिश्चन्द्र नाटक की कमान को जिस रूप में थामते हैं वहाँ उसकी प्रयोगशीलता और समन्वित आधुनिक सोच का कहीं बाल भी बांका नहीं होता . यह सत्य है कि है रंगकर्म और भारतेंदु का व्यक्तित्व जिस एक स्थिति से सबसे ज्यादा लगातार जूझता और टकराता है वो है उनके समय में व्याप्त विरोधाभास और उनसे उपजी रंगकर्म की चुनौतियाँ . भारतेंदु का रंगकर्म भारतेंदु की रंगकर्म के प्रति प्रतिबद्ता का साक्षी है . भारतेंदु की पैदाइश १८५० में होती है और १८८३ में छपकर आता है नाटक के विवेचन और विश्लेष्ण पर उनका विस्तृत निबंध ‘नाटक’ . भारतेंदु के नाटक नामक निबंध का समर्पण पढ़ते हुए रौंगटे खड़े हो जाते हैं . एक –एक अक्षर को कई बार ध्यान से पढ़ने पर और उसको बूझने पर पता चलता है कि क्यों भारतेंदु युगनिर्माता थे. भारतेंदु के समर्पण की एक–एक पंक्ति से एक-एक शब्द से स्पष्ट है कि उनकी सेहत बिलकुल भी अच्छी नहीं थी परन्तु हिन्दी में नाटक संबंधी कोई भी किताब नहीं थी जो आगे के युग को दिशानिर्देश दे सके इसकी चिंता भारतेंदु को सताए जा रही थी और उसी चिंता का परिणाम है जीवन के अंतिम क्षणों में प्रकाश में आया उनका नाटक नामक निबंध – “ आज एक सप्ताह होता कि मेरे इस मनुष्य जीवन का अंतिम अंक हो चुकता, किन्तु न जाने क्या सोचकर और किस पर अनुगृह करके उसकी आज्ञा नहीं हुई . नहीं तो यह ग्रन्थ प्रकाश भी नहीं होने पाता .” ( भारतेंदु ग्रंथावली, पृष्ठ, ५५६ ) . भारतेंदु के समय में नट होना किसी गाली से कम नहीं था परन्तु भारतेंदु की भी टेक थी कि वो इस नट विद्या को भारत में पुनः प्रतिष्ठित करके ही चैन लेंगे . भारतेंदु के जीवन का छोटा सा इतिहास एक बड़े रंगकर्मी के जीवट और जिजीविषा का इतिहास है . नाटक नामक निबंध के समर्पण में भारतेंदु आगे स्पष्ट कर ही देते हैं कि – “ बपु लख चौरासी सजे नट सम रिझवन तोही .’’ इससे अधिक साहसिकता नाट्य साहित्य ही नहीं वरण साहित्य के इतिहास में भी कहीं देखने को नहीं मिलती . दरअसल सम्पूर्ण नाटक साहित्य और रंगमंच के इतिहास में उनकी टक्कर का नाटककार, रंगनिर्देशक और अभिनेता आज तक नहीं हुआ . साहित्यिक विधाओं और उनमें भी रंगकर्म को लेकर भारतेंदु की इतनी चिंता लाज़मी ही थी क्योंकि यह वो देश था जहाँ सबसे पहले रंगकर्म की शुरुआत होती है और यही वह देश भी था जहाँ नाटक और रंगकर्म के क्षेत्र में एक लम्बा अंतराल आता है . भारतेंदु को ये चिंता और इसके समन्वित कारण भीतर तक साल रहे थे . देश की चहुँमुखी दुर्गति के मूक दर्शक मात्र बनकर वह नहीं रह सकते थे . शोषण के खिलाफ विद्रोह के स्वर उठने ही चाहियें यही भारतेंदु का प्रयत्न था . भारतेंदु के नाटक भारत दुर्दशा में भारत भाग्य मंच पर अपना प्राणांत कर लेता है जो कि संस्कृत शास्त्रीय नियमों के खिलाफ पड़ता है, परन्तु भारतेंदु ने नाटक का यह अंत विशेष प्रयोजन के लिए किया है . बदले हुए युग में दृष्टि की भिन्नता का होना भी आवश्यक था और यही दृष्टि भिन्नता  युग को नया स्वर देने में सक्षम थी . भारतेंदु मंच पर के पुराने पड़ गए नियमों में परिवर्तन करते हैं और युगानुरूप नए मंच सत्य गढ़ने में किसी प्रकार का गुरेज़ नहीं समझते . भारत भाग्य का मंच पर प्राणांत दर्शक समुदाय में रोष की सृष्टि करता है, सोये हुए देश के निवासियों में नयी  उर्जा को फूंकने का प्रयास है भारत दुर्दशा . इस सन्दर्भ में लेखक निर्देशक प्रसन्ना का सीमापार नाटक याद आता है जहाँ भारतेंदु हरिश्चंद्र मृत्यु से संवाद करते नज़र आते है . भारतेंदु जिन्हें इतना काम करना बाकि था कि मृत्यु भी उन्हें ले जाने में संकोच करती है और उनके द्वार पर खड़ी उनके अंतिम काम के निपट जाने का इंतज़ार करती है . ये था हिन्दी नाटक के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चन्द्र का व्यक्तित्व . भारतेंदु का युग चौतरफा दबावों का युग था और भारतेंदु उन दबावों से सबसे अधिक जूझ रहे थे . सीधे सों सीधे महा बाँके हम बाकेंन सों’ कहने वाले भारतेंदु जानते थे कि देश की उन्नति आवश्यक है और इस उन्नति के लिए कमर कस लेनी होगी . भारतेंदु ने अपने पूर्वजों के धन को देश प्रेम पर कुर्बान कर दिया इसके लिए जिगरा चाहिए . भारतेंदु का कहना था कि जिस धन ने मेरे पूर्वजों को खा लिया उसे अब मैं खाउंगा . अपने छोटे से जीवन काल में ही भारतेंदु ने साहित्य का प्रवाह आधुनिकता की ओर मोड़ दिया . भारतेंदु वो भक्त हैं जो सीधे-सीधे संवाद की स्थिति में ईश्वर को खीँच लाते हैं – ‘कहाँ करूणानिधि केशव सोए जागत नहीं असीम जतन करी भारतवासी रोए’ . कहने वाला कवि जानता है अब रोने से बात नहीं बनेगी बल्कि विश्राम को छोड़कर उठना होगा . तत्परता का यही भाव समग्र भारतेंदु युगीन साहित्य की धुरी है और उस धुरी को गति देते हैं स्वयं भारतेंदु बाबु हरिश्चंद्र . भारतेंदु ने जिस समय साहित्य की कमान संभाली वो समय भारतीय राजनीति और सामजिक दृष्टि से घनीभूत हो गए अँधेरे का समय था . थोड़ा बाद ही सही निराला राम की शक्ति पूजा में लिखते हैं –  ‘है अमानिशा उगलता गगन घन अन्धकार’ . देशहित में लगे तमाम लोगों की पहली कोशिश भारत को उसकी चहुँमुखी दुर्दशा से बाहर लाना था . काशी की गलियाँ और घाट जहाँ भारतेंदु का रंगकर्म पलता और बढ़ता है इस काम में मददगार साबित होते हैं . ये वही काशी है जहाँ बाबा तुलसीदास ने रामलीला का मंचन एक अनोखे अंदाज़ में आरम्भ कर एक सुदृढ़ अभिनय और मंचीय परंपरा सूत्रपात कर दिया था . यहाँ यह भी बात दीगर है कि भारतेंदु के बाद जिस बड़े लेखक ने नाटक लेखन की कमान संभाली वो अपने बच्पन की स्मृतियों में जब जाता है तो उसकी स्मृतियों में अंकित जो एक सबसे भास्वर स्मृति उभरती है वो  युगनायक भारतेंदु की ही है, यहाँ बात जयशंकर प्रसाद की हो रही है . क्योंकि भारतेंदु के बाद अगर कोई लेखक सही मायने में नाटक लेखन को एक उत्कर्ष प्रदान करता है तो वो निःसंदेह जयशंकर प्रसाद ही हैं . परन्तु जयशंकर प्रसाद अभिनय की उस परम्परा को पुनर्जीवित नहीं कर पाए जिसकी नींव भारतेंदु ने रखी . भारतेंदु एक साथ नाट्य लेखक, निर्देशक, अभिनेता और नाटक के लिए अनिवार्य समूह को बाँधने वाले व्यक्तित्व थे . भारतेंदु जानते थे कि जिस मार्ग पर वो पग धरने जा रहे हैं वो आसान काम नहीं इसलिए अभिनय जैसे कठिन कर्म को भी उन्होंने साध लिया था . भारतेंदु काशी की उन गलियों और घाटों को लगातार देख-परख रहे थे उन गलियों में फैले कर्मकांड का भेद भी उनकी दृष्टि से छुपा नहीं था और सबसे बड़ी बात ये कि वो विदेशी सत्ता की ताकत और उसके खेल को समझ रहे थे और उनमें पिसती जाती भोली-भाली जनता के दुखों का भी उन्हें संज्ञान था पर बात थी कि भारतीय जनता में आलस्य, काहिली और अंधविश्वास इतने व्याप गए थे कि जब तक उन पर सामने की सामने प्रहार न होता वो चेतती नहीं . इन्ही सब स्थितियों के बीच  शायद कहीं न कहीं ये भी पता था कि समय बहुत कम है और काम कठिन इसलिए बहुत कम समय में ही भारतीय रंगकर्म को भारतेंदु ने उस दिशा में मोड़ दिया जो अब तक के रंगचिंतन का मार्गदर्शन करने में महती भूमिका का निर्वाह कर रहा है.
भारतेंदु के सामने अपने रंगकर्म को प्रतिष्ठित करने में सबसे पहली और कड़ी चुनौती भाषा की थी . उस भाषा की आवश्यकता के दबाव को भारतेंदु ने अनुभव किया जो सीधे-सीधे भारत की जनता के हृदय को जाकर तीर की तरह भेद दे . यही कारण है कि भारतेंदु की भाषा  में वो वार है जो प्रहार करता है और उस प्रहार का परिणाम ठीक वैसा ही घातक होता है जो कबीर की भाषा का था . भारतेंदु जिस भाषा का चुनाव भारत की सीधी-सादी जनता तक पहुँचने के लिए करते हैं वो भाषा है रंगकर्म की भाषा . भारतेंदु इस बात को भली भांति समझते थे कि भारत में श्रुति और स्मार्त की एक लम्बी परम्परा रही है जिसमें समाज में फैली जड़ता और कुरीतियों के प्रति एक लम्बी लड़ाई लड़ी गयी है भारतेंदु भी ऐसे रंगकर्म को अपने उदेश्य को चरितार्थ करने का साधन बनाते हैं जो आज तक ज्यों का त्यों जनता को प्रभावित भी कर रहा है और गलत के खिलाफ उद्वेलित भी करता रहा है . भारतेंदु का रंगमंच कई मायनों में संस्कृत और लोक नाट्य रंगमंच का विस्तार लगता है परन्तु अपने उदेश्य की समकालीनता और भव्यता के कारण भारतेंदु का रंगकर्म बहुत आगे का रंगकर्म हो जाता है . भारतेंदु अपने नाटक नामक निबंध में संस्कृत नाटकों का सविस्तार हवाला देते हैं और साथ ही उस समय पश्चिम में जिस तरह के नाटक लिखे जा रहे थे उसकी भी बात कहते हैं परन्तु अपनी बात जोड़ते हुए जब वह नाटक नामक निबंध में यह कहते हैं कि नाटक का उदेश्य देशवत्सलता, समाज संस्कार और स्वदेशानुराग है तब भारतेंदु अपने रंगकर्म को पूरा का पूरा समकालीन परिस्थितियों से जोड़कर देख रहे होते हैं . भारतेंदु की समकालीन स्थितियाँ नाटक और रंगमंच के बिलकुल भी उपयुक्त नहीं थी विकट स्थितियों में देशजागरण और समाजोत्थान वो भी नाटक के माध्यम से . नाटक जो तब तक जनता की दृष्टि में अपने विराटत्व से बहुत नीचे आ चुका था . भारतेंदु नाटक नामक निबंध की पाद टिप्पणी में दर्ज करते हैं – “ हिन्दुस्तान से नृत्य विद्या उठ गयी, यह विद्या आगे इस देश में ऐसी प्रचलित थी कि सब अच्छे लोग इसको सीखते थे . ’’ नृत्य भी नाटक का ही एक अंग रहा या यूँ कह लें कि बात अगर अभिनय की आ जाए तो फिर नृत्य और नाटक में भेद ही कहाँ रह जाता है . भारतेंदु की चिंता मंच से जुड़ी उन कलात्मक विधाओं और उनकी प्रासंगिकता को लेकर थी जिनके कारण भारत देश जाना जाता रहा . भारतेंदु को नाटक को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए जिस तरह का परिश्रम करना पड़ा होगा उसकी कल्पना भी असम्भव लगती है . आज जब भारतीय रंगकर्म के सामने तमाम ज़रूरी आवश्यकताएँ मौजूद हैं तब भी भारतीय रंगमंच स्वयं को प्रतिष्ठित करने में असमर्थ है, परन्तु एक अकेले भारतेंदु ने रंगमंच में उस गति को शामिल कर दिया था जो किसी भी जीवित देश के रंगकर्म में होनी चाहिए . भारतेंदु और उनके मंडल का रंगकर्म किसी आन्दोलन या क्रांति से कम नहीं था यह केवल एक व्यक्ति का रंगकर्म नहीं था बल्कि ये सम्पूर्ण राष्ट्र से जुड़ा हुआ एक महती कार्य था . रंगकर्म के प्रति जिस समर्पण और अनुशासन की आवशयकता होती है वो भारतेंदु मंडल के एक-एक सदस्य में कूट-कूट कर भरा था . लगभग हज़ार सालों के मौन के बाद भारतेंदु नाटक को मुख्य धारा से जोड़ते हैं और उसे हिन्दी साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं यह घटना किसी भी चमत्कार से कम नहीं थी . नाटक और रंगकर्म के लिए जिस संगठित अप्रोच की आवश्यकता है उसको आकार देने में भारतेंदु  को अपने युग के तनावों और दबावों को सीधे-सीधे स्वयं पर लेना पड़ा होगा इसी कारण जब भारतेंदु के रंगकर्म की बात आती है तो मध्यकाल के संत और भक्त कबीर की भी याद आती है जिन्होंने मध्यकालीन जड़ मानसकिता से मुखर विद्रोह मोल लिया . भारतेंदु इस बात को स्पष्ट करते हैं कि योरोप में नाटकों का प्रचार भारत से कहीं बाद में हुआ – “ योरोप में नाटकों का प्रचार भारतवर्ष के पीछे हुआ है . पहले दो मनुष्यों के संवाद को ही वहाँ नाटकों का सूत्रपात मानते हैं . प्राचीन ईसाई धर्मपुस्तकों में ‘बुक अव जाब’ और सुलैमान के गीतों में ऐसे संवाद मिलते है किन्तु इनके अतिरिक्त हिब्रू भाषा में और कोई प्राचीन नाटक का ग्रन्थ नहीं . योरोप में सबसे प्राचीन नाटक यूनान में मिलते हैं और यह निश्चय अनुमान हुआ है कि भारतवर्ष से वहाँ यह विद्या गयी होगी . ” ( नाटक, भारतेंदु ग्रंथावली, पृष्ठ, ५७७ ) भारतेंदु यहाँ पाश्चात्य नाट्य कला का विशद विवेचन करते हैं . यूनान, रोम, इटली की नाट्य कला तथा नाटककारों और नाट्य पाठ की विषद विवेचना करते हैं . स्पष्ट है कि भारतेंदु भारत में एक बार फिर नाट्य कला का पूर्ण उत्कर्ष देखने को लालायित थे और यही कारण है कि विरोधी परिस्थितियों में भी संघर्षरत रहे . संदेह नहीं कि आज भारत में नाटक वहाँ  नहीं जहाँ उसे होना चाहिए पर यह भी सत्य है कि आज भी सम्पूर्ण भारत में कई कई ऐसे नाट्य जीवी हैं जो केवल और केवल नाटक इसलिए कर रहें हैं क्योंकि वो नाटक के प्रति समर्पण रखते हैं . भारत में अभिनय कर्म के प्रति जो कर्मठता बिना किसी स्वार्थ भाव के और बिना किसी अनुदान के देखी जाती है वाकय में उसका सानी कहीं नहीं .

भारतेंदु को मूलतः नाटककार कहा जाए या पत्रकार यह बात भी निश्चित तौर पर नहीं कही जा सकती दरअसल उनका हर कर्म एक दूसरे का पूरक रहा जहाँ जब जिस विधा की आवशयकता पड़ी वहाँ  उस विधा  का प्रयोग भारतेंदु ने पुनर्जागरण की प्रक्रिया को धार देने के लिए किया . भारतेंदु इस बात को जान चुके थे कि सदियों की दासता में जकड़ी जनता को उसके अंधविश्वास और रूढ़ मानसिकता से निकालने का साधन ऐसा होना चाहिए जो उनके पीड़ा से दलित मन को त्राण प्रदान कर सके . इसके लिए जिस माध्यम की आवश्यकता थी वो कोई उपदेशात्मक या फिर चोट करने वाला माध्यम नहीं हो सकता था . नाटक जैसा मनोरंजन प्रधान माध्यम ही इस काम को बखूबी निभा सकता था . यह सही है कि भारतेंदु के समक्ष संस्कृत के भव्य मंचीय नाटकों का आदर्श था पर जिस समय भारतेंदु ने नाटक करने की ठानी उस समय उनके पास कहने मात्र भर को भी कोई रंगमंच नहीं था जिस पर वो अपने नाटकों को मंचीय जामा प्रदान कर सकें बावजूद इसके भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र एक से एक महत्वपूर्ण नाटक का सृजन करते गए साथ ही बहुत से नाटकों का हिन्दी में अनुवाद भी किया . रंगमंचीय संकट की इस समस्या का समाधान भारतेंदु ने जिस विध निकाला वो है लोक नाट्य परम्परा, और उससे  भी आगे बढकर उनके नाटक काशी के घाटों को अपने मंच के लिए उपयोग में लाते हैं और एक बड़े संकट का समाधान खोजते हैं बहुत ही सावधानी के साथ . भारतेंदु अपना मंडल बनाते हैं और वो मंडल सही मायनों में रंगकर्म को समर्पित मंडल था या कह लें कि वो भारतेंदु की अपनी खुद की रैपट्री थी जो जुनून की हद तक नाटक करना जानते थे . रंगकर्म के लिए आवश्यकता होती है एक महत्वपूर्ण दिग्दर्शक की और भारतेंदु ने उस युग नायक की भूमिका बहुत ही ईमानदारी से निभाही . भारतेंदु की ईमानदारी का ही परिणाम है कि उनके मंडल में  राधाचरण गोस्वामी, प्रताप नारायण मिश्र और बद्रीनारायण चौधरी जैसे जागरूक और समर्पित रंगकर्मी सम्मिलित हुए . सम्पूर्ण भारतेंदु युग निश्छल समर्पण और महती जीवन मूल्यों और उदेश्यों का युग रहा जिसमें ऐसे-ऐसे जियाले आए जिन्होंने स्वयं के लिए कुछ भी नहीं बचा छोड़ा .
आज से डेढ़ सौ बरस पहले भी बिना किसी साधन के नाटक को लेकर इतना अधिक समर्पण भारतेंदु को आज भी विस्मृत नहीं होने देता. वर्तमान में नाटक और रंगमंच पर जिस तरह का संकट काबिज़ है वो बार-बार हमें भारतेंदु कि ओर मुड़ने को उत्प्रेरित करता है . आज जब भारत के पास अनेक विशिष्ट नाट्यशालाएं हैं जहाँ नाटक और रंगमंच के प्रशिक्षण की विधिवत कक्षाएँ चलती हैं साथ ही नाटक और रंगमंच पर सरकार की लगातार दृष्टि रहती है तब भी भारतेंदु के रंगमंच की कमी खटकती नज़र आती है . कारण  साफ़ है भारतेंदु का रंगमंच तब से लेकर अब तक अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है, रंगकर्म  की जितनी समझ और पकड़ भारतेंदु को थी और सीमित साधनों में भी रंगकर्म को उन्होंने जिस हद तक आम जन में लोकप्रिय बनाया वो कमी आज खटकती है . भारतेंदु का रंगकर्म इस बात का साक्षी है कि रंगकर्म की सफलता असफलता बड़े बड़े प्रेक्षागृहों की मुखापेक्षी नहीं है उसके लिए कमरकस जूझने का भाव चाहिए . आज भारतीय रंग महोत्सव और अन्य अनेक नाट्य समारोह में नाटक के प्रति उस समर्पण भाव का अभाव खलता है जो भारतेंदु के रंगमंडल की पहली पहचान रहा . आज जबकि नाट्य संस्थाओं के पास उत्कृष्ट अभिनेता, अभ्यास के लिए स्पेस और पूँजी उपलब्ध है बावजूद उसके रंगमंच में उस तरह के प्रयास नहीं हो रहे जो रंगकर्म को एक निश्चित दिशा दे सकें और समाज को उस ओर मोड़ सकें जो उसकी उन्नति में सहायक हों . कुछ हद तक विश्वविद्यालय में तैयार नुक्कड़ नाटकों में वो उर्जा और तत्परता नज़र आती है परन्तु वे सिर्फ अच्छी गलियों, नुक्कड़ों और विश्वविद्यालय प्रांगणों और प्रतियोगिताओं के लिए संकेंद्रित होकर रह गए हैं . अपने आस-पास खींचे चौखटे से बाहर निकलकर वो जन-जन के और जन जागरण के नाटक नहीं बन पा रहें हैं . यहीं अंतर हैं भारतेंदु के रंगकर्म और आज के रंगकर्म में भारतेंदु ने अपने रंगकर्म को जन जागरण का अचूक माध्यम बनाया और इसके  रंगमंच को दर्शकों तक लेकर स्वयं उनके मध्य गए और यही उनके रंगमंच की असली ताकत बना और यही उनके रंगमंच को आज तक अलग पहचान देता है . भारतेंदु ने नाटक और रंगकर्म के माध्यम से जनजागृति के एक प्लेटफार्म तैयार किया जिसने उस समय के स्वाधीनता आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया . इस स्थान पर डॉ राम विलास शर्मा की किताब भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिन्दी नवजागरण की समस्याएँ से उदृत करना चाहूँगी – “ राजा हरिश्चंद्र की प्रतिज्ञा थी – ‘ चंद टरै सूरज टरै, टरै जगत ब्यौहार ..  पै दृढ़ श्री हरिचंद को, टरै न सत्य विचार . ” चन्द्रावली में सूत्रधार के अनुसार कवि हरिश्चन्द्र की प्रतिज्ञा यह है – “चंद टरै सूरज टरै, टरै जगत के नेम . यह दृढ़ श्री हरिचंद को, टरै न अविचल प्रेम ..  ” ( पृष्ठ, १२७ ) दरअसल यही हैं भारतेंदु बाबु हरिश्चंद्र जिन्होंने दृढ प्रतिज्ञा ले ली थी रंगमंच को एकबार फिर से पुनः प्रतिष्ठित करने की और नाटकों के माध्यम से जनजागृति की . भारतेंदु ने देश हित का बीड़ा अपने दृढ कंधों पर उठाया था और जब तब वो जीवित रहे तब तक इस महती कर्म में लगे रहे . भारतेंदु बाबु हरिश्चंद्र जानते थे कि यही वह देश है जहाँ नाट्यशास्त्र की सुदृढ़ परम्परा का सबसे पहले सूत्रपात हुआ और वह अपने युग की इस सच्चाई को भी जानते थे कि भारत आज सबसे पिछड़ा हुआ दिखाई पड़ता है, त्रासदी की इस गहरी खाई को पाटने का भारतेंदु जो भी कठिन उपक्रम कर सकते थे वो उन्होंने किया . भारतेंदु युग और हिन्दी भाषा की विकास परम्परा में डॉ राम विलास शर्मा लिखते हैं – “ हिन्दी में नाटको की परम्परा प्रायः थी ही नहीं विशेषकर उन नाटकों की जो जनता के बीच खेले जाने के लिए लिखे गए हों . भारतेंदु ने नाटक लिखने की परम्परा को ही जन्म नहीं दिया, उन्होंने नाटक खेलने की परिपाटी भी आरम्भ की और स्वयं अभिनय करके लोगों के सामने एक आदर्श उपस्थित किया . भार्तेदंदु के निधन के चार वर्ष बाद प्रताप नारायण मिश्र ने ‘ब्राह्मण’ में लिखा था कि बाढ़ वर्ष पहले कानपुर में लोग नाटक का नाम भी न जानते थे . वहां पर सबसे पहले रामनारायण त्रिपाठी के उद्योग से भारतेंदु के डॉ नाटक ‘सत्य हरिश्चंद्र और वैदिक हिंसा हिंसा न भवति’ खेले गए थे . तब नाटक खेलने का विरोध हुआ था और विरोधियों में प्रताप नारायण मिश्र जैसे लोग भी थे . इसी से समझा जा सकता है कि भारतेंदु को नाटकों की परम्परा चलने में किन बाधाओं का सामना करना पड़ा होगा . वे बाधाएँ सामने न टिक सकीं, यह तो इसी से सिद्ध है कि प्रताप नारायण मिश्र जो कभी विरोधी थे, स्वयं एक कुशल नाटककार और अभिनेता बन गए . ’’ पृष्ठ, ४५
भारतेंदु के सम्मुख संस्कृत की रंगमंचीय परम्परा और भारत की लोक नाट्य परम्परा का आदर्श पहले से ही विद्यमान था साथ ही साथ यूरोपीय ढब के नाटकों से भी उनका परिचय हो रहा था और एक बड़ी चुनौती के रूप में उनके सामने उपस्थिति थी पारसी रंग परम्परा जिसका उदेश्य केवल और केवल दर्शकों का मनोरंजन कर पैसा कमाना था . पर यह बात भी दीगर है कि नाटक की इस मनोरंजक धारा ने भी नाटक के दर्शक बनाने और नाटक तक आम जन को खीँच कर लाने में कड़ी पहल की . परन्तु भारतेंदु का रंगमंच एक कर्मठ राष्ट्रभक्त का रंगमंच था उसमें अपने समय की सच्चाई अभिव्यंजित थी अभी तक यथार्थ का ऐसा कटु और तिक्त रूप कहीं व्यंजित नहीं हुआ था . संस्कृत का अधिकाँश नाट्य कर्म राजाओं के संरक्षण में हुआ था या फिर कहीं न कहीं विशद नाट्यशालाओं का संरक्षण उन्हें प्राप्त था पर भारत में ऐसा पहली बार भारतेंदु के रंगमंच से होता है कि आम आदमी की चिंता नाटक के केंद्र में आती है और नाटक पुनर्जागरण चेतना का अग्रदूत बनकर सामने आ खड़ा होता है .

भारतेंदु ने जो भी नाटक लिखे उनके केंद्र में मनुष्य और राष्ट्र एक साथ चरितार्तथा पाते नज़र आते हैं . देश की समग्र राजनीतिक-सामाजिक छवि उनके नाटकों में व्यंजित होती है . अंधेर नगरी हो, भारत दुर्दशा हो या फिर वैदिक हिंसा-हिंसा न भवति सभी में भारतेंदु रंगकर्म को केकर कोई न कोई प्रयोग करने में संलग्न थे . भारतेंदु के नाटकों की बनावट इस तरह की है कि वो आअज तक किसी भी रंगमंच पर आसानी से खेले जा सकते हैं . दरअसल भारतेंदु के नाटक सार्वकालीक हैं उन्होंने अपने नाटकों की मंच परिकल्पना और पात्र परिकल्पना जिस प्रकार से की है वो आज भी नाटक के निर्देशक को अपनी और आकर्षित करती है . भारतेंदु क्योंकि स्वयं एक अभिनेता रहे इसलिए वो इस बात को जानते और समझते थे कि वो कौन सी भाषा होगी जिसके साथ निर्देशक और अभिनेता और साथ ही साथ मंच अपना ताल-मेल बैठा पाए और जो दर्शकों को सीधे-सीधे प्रभावित करे यही कारण है कि आज तक भारतेंदु के नाटकों को खेलने में किसी तरह की कोई काल सीमा आड़े नहीं आती . जबकि बाद के नाटककारों के साथ एक बड़ी समस्या नाटक के पाठ की रही चाहे वो जयशंकर प्रसाद हो या फिर एक लम्बे अंतराल के आड़ आए मोहन राकेश हों . भारतेंदु के नाटक जिस  तरह की ‘लिबर्टी’ देते हैं उस तरह की ‘लिबर्टी’ बाद के नाटकार और उनके नाटक नहीं देते . भारतेंदु के नाटक निर्देशक की दृष्टि के विस्तार और अभिनेता को अभिनय के लिए पूरा ‘स्पेस’ देते हैं इसका प्रमुख कारण यही है कि भारतेंद स्वयं एक कुशल अभिनेता और निर्देशक थे और इस नाते वो एक अभिनेता और निर्देशक की सीमाओं और अपेक्षाओं को बहुत बेहतर समझते थे . दरअसल भारतेंदु ने उस समय नाटक को मुख्यधारा से जोड़ा जब अभी हिन्दी में मंचीय नाटक थे ही नहीं . सबसे बड़ी बात भारतेंदु ने भारतीय कलाओं और उनकी प्रासंगिता का आंकलन उस समय किया जिस समय उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता थी. भारतेंदु अपने नाटकों में जितने प्रयोगशील थे उतनी प्रयोगशीलता एक ही नाटककार में दृष्टिगत हो ही नहीं सकती . भारत दुर्दशा की पात्र परियोजना और उनसे सम्बंधित रंग निर्देशों को देखकर लगता है कि भारतेंदु उस समय जो रच रहे थे वह बहुत ही आधुनिक था और उसकी दरकार बहुत अधिक थी उस समय के समाज के मध्य . अंधेर नगरी जैसे नाटक का उसी दिन लिखा जाना और उसी दिन मंचित होना जुनून नहीं था तो और क्या था . भारतेंदु ने नाटक और रंगकर्म को एक बहुत ही मजबूत हथियार के रूप में पुनर्जागरण की चेतना को धार देने के लिए किया और इसमें वे सफल भी रहे . आज भारतेंदु सरीखे रंगकर्मी और रंग्चिन्तक की आवश्यकता है जो एकबारगी फिर से भारतीय रंगकर्म की दिशा को उस ओर मोड़ दे जिस और आवश्यकता है . 

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...