5/29/11

जनकवि भिखारी ठाकुर : रघुवंश नारायण सिंह


(यह मूल लेख भोजपुरी में लिखित है.जो भोजपुरी की बंद हो चुकी पत्रिका 'अंजोर'के अक्टूबर-जनवरी १९६७ अंक से साभार लिया गया है.मूल लेख जनकवि भिखारी ठाकुर नाम के पुस्तक जिसके लेखक श्री महेश्वर प्रसाद जी हैं ,की समीक्षा भी है और अपनी तरफ से कुछ टिप्पणियां भी.पाठकों की सुविधा के लिए हमने इसे हिंदी में रूपांतरित करके प्रस्तुत किया है,ताकि भोजपुरी नहीं जानने वाले भी भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले इस महान रंगधुनी के और बिदेसिया के रचयिता के बारे में जान सकें.पर भिखारी ठाकुर के बारे में सभी उल्लिखित राय ,लेखक महोदय की है,इससे रूपांतरणकार की  रजामंदी  जरुरी नहीं .रूपांतरण/अनुवादक - मुन्ना कुमार पाण्डेय  )


बहुत दिन पहले आरा से निकलने वाले 'भोजपुरी'में श्री बीरेंद्र किशोर का एक लेख छपा था 'भोजपुरी के शेक्सपियर  भिखारी ठाकुर' | बहुत लोगों ने जब उसे पढ़ा तो अचरज में पड़ गए,सिहर गए  कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली | यह तो अजब मेल बैठाया गया ,ऐसा बहुत लोगों ने कहा | बात सही भी थी बाकी राहुल बाबा ( सांकृत्यायन जी ) भिखारी को महाकवि कह चुके थे | अब हम लोग क्या करें | 
सन १९२३ की बात है,मेरे गाँव के एक भाई की शादी तय हुई | संयोगवश उनके मामा का घर कुतुबपुर में  ही था,जो भिखारी ठाकुर का गाँव है | बस भिखारी ठाकुर का नाच हो गया | भिखारी ठाकुर का नाम सुनते ही पूरे जवार ( एरिया ) भर के लोग जमा हो गए | रात भर गहमागहमी रही | मैं गाँव में नहीं था इसीलिए मुझे देखने को नहीं मिला | जब मैं  गाँव आया तो न जाने कितने दिन तक भिखारी की चर्चा होती रही,उनके गीत गाये जाते रहे | मुझे भिखारी ठाकुर का नाच देखने का मौका नहीं लगा | गाँव -जवार में कहीं हुआ भी तो लाज के मारे जाने का मन नहीं हुआ | जब तिलौथु गया तो श्री राधा प्रसाद सिन्हा के रुरल क्लब में भिखारी का नाच हुआ | वहीं पर पहली बार भिखारी का नाच देखने का मौका मिला | मैंने खूब नजदीक से बढ़िया से हर तरह से सब देखा | 
भिखारी की तुलना शेक्सपियर से कोई बेकार बात नहीं थी | शेक्सपियर जो व्यक्ति थे उनसे.और उनका जो नाट्य साहित्य है,उससे दोनों में जमीन आसमान का फर्क था | उस समय में शेक्सपियर का जो स्थान समाज में था,वही भिखारी का भी रहा या है | भिखारी आज भी समाज के आदमी नहीं बन सके | उन्हें आज भी नाच चाहिए,पैसा चाहिए | बिना नाच के और भाड़ा के वे कहीं नहीं जा सकते थे |  पटना में जब उनके नाम के किताब का लोकार्पण समारोह हुआ तो वे नहीं आये क्योंकि उसी दिन उनका साटा (कार्यक्रम करने हेतु अनुबंध) था | एकबार सिवान के भोजपुरी सम्मलेन में उनको बुलाया गया था तो वह गये थे पर उस सभा के योग्य वह नहीं थे | जहां मनोरंजन जी,डाक्टर धर्मेन्द्र ब्रह्मचारी शास्त्री,प्रो.रामेश्वर सिंह कश्यप थे वही पर भिखारी ठाकुर ने भी अपना बेसुरा राग सुनाया | यही हाल शेक्सपियर का भी था | अभी इन दिनों एक आदमी ने कहा कि आप लोग भिखारी ठाकुर को कहाँ ले जायेंगे | उनके साहित्य का गुण गाईये उनका नहीं | 
बात  सही है | उन्होंने भोजपुरी की जान कर (जानते बूझते ) सेवा थोड़ी न की थी | उन्हें तो नाचना गाना था | पहले तुलसी,कबीर सुर वगैरह के पद कंठ किया बाद में सरस्वती की कृपा उनपर हुई तो खुद भी पद जोड़ने लगे | मुझे शक है कि भिखारी कभी नाटककार के रूप में गिने जायेंगे | उन्हें नाटक से क्या मतलब ? वे अंक ,गर्भांक जानने कहाँ गये ? उनके सभी खेल ,तमाशे अपने हैं | जिससे देहाती गंवारू जनता को मोहा ,खींचा जा सके उन्होंने वही नाचा-गाया | इनका सब 'बैले'हो सकता है जिसे नाच-गान के साथ रूपक कहा जाए तब शायद कुछ सधे तो सधे ,भिखारी में नाटकीयता है, वे रूप बनने और बनाने में  और नक़ल उतारने में भी सफल खिलाड़ी है | इसमें मैं उनकी तारीफ़ करूँ या न करूँ लोग तो कर ही रहे हैं | जब हज़ार नहीं लाखों लोग उनके नाच को देखने कोस दो कोस से नहीं चार पाँच कोस से आकर जुट जाते हैं ,तो मेरे एक कहने से क्या होगा कि भिखारी कुछ नहीं जानते हैं | वे नाटक हैं,नाटककार कैसे हो सकते हैं | 
भिखारी जनकवि हैं इसमें किसी को कोई मीन मेख नहीं नहीं है,न होगा | कवि या कविता के बारे में मेरा अपना एक ख्याल(नज़रिया) है | वह यह कि,हर आदमी कुछ न कुछ कवि होता है जो ज्यादा प्रतिभा वालोया होता है वह चमक जाता है और जो थोडा बहुत होता है वह फुस्स हो जाता है,दब जाता है,छितरा जाता है | हमारे ग्रुप में एक कवि कैलाश सिंह थे जिन्हें २८ सितम्बर १९४२ को अंग्रेजों ने मारते मारते मौत के घाट उतार दिया | मेरे जानकारी भर में वैसी वीरगति किसी की नहीं हुई | हमलोग उन्हें कवि जी कहा करते थे | वे बड़े भावुक आदमी थे,जब भी बोलते तो तुक में बोलते थे | तुक उन्हें खोजना नहीं पड़ता था,जैसे उनका मन प्राण काव्यमय था | मुझे तो याद नहीं आ रहा,सोचूंगा तो दो-चार जोड़-जाड़कर कह दूंगा पर वे दनादन बोलते जाते थे और सभी तुक पर सधे रहते थे | मेरे गाँव में टेंगर सिंह हैं | गाँव में कोई भी घटना होती उसपर एक गीत बना देते | दो-चार दिन गाते चलते थे फिर भूल जाते-भुला देते | वैसे ही मौजम पुर में शिवनंदन कवि थे | वे भी राह चलते कविता करते चलते थे | एक डंडा रहता था जिस पर ठेका ताल देते और गाते थे | बहुत अच्छे भाव भरे गीत हुए गीत बना देते | उनका तो नाम हो गया था | भिखारी को वही प्रतिभा मिल गयी और उसमें थोडा गुण पड़ा गया नाच की वजह से | भिखारी ने खुद कहा है-'एह  पापी के कवन पुन से भईल चहुँ दिसि नाम | भजन भाव के हाल ना जनली , सबसे ठगली दाम |'(इस पापी के किस पुण्य से चारों दिशा में नाम हुआ | भजन भाव का हाल न जाना सबसे पैसा ठग लिया ) इस दाम को ठगने के लिए उन्होंने सब कुछ किया | बिदेसिया के नाच के साथ उन्होंने धोबी धोबिनिया को भी जोड़ दिया था,जो बहुत ही फूहड़ और नंगा (अश्लील )था | मुझे लगता है कि उसी वजह से ज्यादे लोग जुटते थे | पीछे जब उसकी शिकायत होने लगी तब भिखारी ने उसे छोड़ दिया | यहाँ तक कि तिलौथु में हम सब देख रहे थे तो राधा बाबु ने जोर मारा कि थोडा 'वह'भी हो जाये तब भिखारी उसको करने में बड़ा सहम रहे थे | पर बड़े आदमी की बात थी,भोर होने को थी.लड़के और औरतें चली गयीं तब 'वह'हुआ | उसमें था -'धोबिनिया के छौड़ी इहे बड़ा बिसनिया कि माई घटिये पर नेहाय , सभ रस लेलस एहे मलहा छोकड्वा कि मुहवा के सुरती नसाय ' ( धोबन की बेटी बड़ी विषैली है वह घाट पर ही नहाती है मुंह में की सुरती (खैनी ) नासा कर सब रस इसी मल्लाह के लड़के ने लिया है )| और भी बहुत कुछ था जो कहने लायक नहीं है |
तुलसी  बाबा ने लिखा है कि 
'हमहूँ कहब अब ठकुर सोहाती ,नाहीं त मौन रहब दिन राती | काहे आ त कोई नृप होई हमें का हानी,चेरी छोड़ का होईबि रानी |" यहाँ भी यही सवाल है | यह भोजपुरी का आदि काल है | इसमें जो हो रहा है उसीको होने दिया जाये कि इस पर लगाम लगाया जाये | मंथरा को तो चेरी छोड़कर रानी नहीं होना था पर पर भोजपुरी के जो पहरुए हैं उन्हें सोने (सोये रहने) का कोई हक़ नहीं है | इसलिए जागो सोने वालों का नारा जरुरी है | भोजपुरी में जिसे जो मन में आ रहा है वही लिख दे रहा है | यह नहीं होना चाहिए | लिखने वाला लिखे और छापे मगर हम सभी को उसकी तारीफ़ के पुल नहीं बाँधने चाहिए | इसमें मैं महेंद्र शास्त्री जी की तारीफ़ करूँगा कि उन्होंने भोजपुरी के सबसे बड़े सेवक को लिख दिया कि 'आप कवि हैं नहीं,तो आप आगे वालों की राह भी बिगाड़ते क्यों चल रहे हैं ?'ऐसे ही हम सभी को साफ़ कहना चाहिए नहीं तो यह गंवार कविताई  भोजपुरी का सत्यानाश करेगी |
जनकवि भिखारी ठाकुर लिखने में महेश्वर जी ने जो मेहनत की है उसके लिए उन्हें धन्यवाद मिलना चाहिए | यह किताब हिंदी में लिखी गयी है,इसका सिलसिला ठीक करके इसे अंग्रेजी में भी कर दिया जाये तो और मज़ा आ जाये | सिलसिला ठीक करने से मतलब कि आदि और अंत ठीक होना चाहिए | मतलब यह कि भोजन के पहले घी और अंत में दही चीनी चले | बहुत लोग कहते हैं कि भाई घी दाल में गिरे या भात में ,घी का लड्डू टेढा भी भला कहा जाता है | पर मुझे यह लगता है कि जो काम किया जाये उसे प्रेम से किया जाये | हड़बड़ी का ब्याह कनपटी में सिन्दूर जैसी बात नहीं होनी चाहिये |
भिखारी  असल में बिदेसिया हैं | वे पहले बिदेसिया हैं फिर पीछे कुछ और | इसीलिए मैंने 'बिदेसिया' नामक फिल्म में चतुर्वेदी जी और त्रिपाठी जी से कहा कि 'बिदेसिया में भिखारी नहीं तो बिदेसिया क्या ?'भिखारी को बुलाया गया पर उसमें भी वह फिट न हो सके | खैर जो हो जनकवि भिखारी ठाकुर नाम, की किताब में सबसे पहले भिखारी ठाकुर का एक छोटा संक्षेप में जीवनवृत्त रहता फिर उसके बाद में सबसे पहले बिदेसिया रहता |इस किताब में बिदेसिया खोजने में दिवाला निकल जा रहा है (बहुत निराशा हाथ लग रही है )| उनकी कथा तो है,परिचय के रूप में उनकी भाषा जम नहीं रही है | लेखक को उसे सजाकर संवारकर रखना चाहिए था |
इस   पुस्तक में लेखक के लेक्चर बहुत हैं | काव्य के रूप में गुण,शब्द का चुनाव भाषा का मिठास वगैरह कम ही दिखाया गया है | किताब जब हिंदी में है तब हिंदी भाषी के लायक भी होना चाहिए था | भोजपुरी शब्दों के माने मतलब (अर्थ) गैर भोजपुरी लोग नहीं जानते हैं इसलिए उन शब्दों के अर्थ देना चाहिए था | खरन्दाकार का बेमतलब भरमार भी व्यर्थ ही है | वह तो ध्वनि की चीज़ है | ध्वनि का मतलब सभी को पता नहीं है इसलिए कई जगह वह बेमतलब का हो गया है | 



5/28/11

हंगामा है क्यों बरपा " देसवा"और पक्ष-विपक्ष

इंडिया हैबिटेट सेंटर में 'देसवा'के प्रदर्शन के बाद जितनी चर्चा इस फिल्म को लेकर उठी है या सोशल नेटवर्किंग साईट फेसबुक पर जबरदस्त टिप्पणियों (जो व्यक्तिगत हमलों तक पहुँच गयी या ले ली गयी  ) का जो दौर चला है,उसे मैं एक सकारात्मक कदम मानता हूँ | जिसका प्रभाव आगे आने वाली इस तरह की भोजपुरी फिल्मों पर पड़ेगा इसकी थोड़ी उम्मीद की जा सकती है | देसवा को लेकर अविनाश (मोहल्ला लाईव ) और अमितेश के अपने अपने पक्ष रहे और बाद में स्वप्निल जी ने भी चवन्नी पर अपनी राय दी है | 
मेरी बात पहले अमितेश के लिखे से है,फिर स्वप्निल जी के और तब मेरी बात 'देसवा' को लेकर है की क्यों मैं देसवा के पक्ष में हूँ |
अमितेश ने 'देसवा' के पक्ष में नहीं होने के अपने कारण गिनाये हैं और देसवा को एक बेहतर सिनेमा बनते बनते एक औसत सिनेमा रह जाने को लेकर पूरी बात रखते दिखाई देते हैं | जिसपर कईयों ने उनके साथ नूराकुश्ती शुरू कर दी | यह भी दुरुस्त स्थिति नहीं है | हम कोई लक्ष्मण रेखा नहीं खींच सकते कि कौन हमारे सिनेमा के पक्ष में खड़ा  होगा , कौन नहीं या किसे नहीं खड़ा होना चाहिए | अमितेश सिर्फ देसवा को भोजपुरी फिल्म के बदलते चेहरे का अगुआ मानने की मुहिम को नकारते हैं पर उसके प्रयास को सराहते दीखते हैं -"देसवा भोजपुरी फिल्मों के लिए रास्ता बनाना चाहती है इस तर्क के आधार पर इस मुहिम को समर्थन दिया जा सकता है |...आज भी मेरी शुभकामना इसके (देसवा) साथ है |"- ऐसे में उनकी राय को एकदम से विपक्ष में खड़ा भी नहीं मान सकते | दरअसल,'देसवा' विविध मंचों से पिछले कई महीनों से भोजपूरी सिने प्रेमियों के बीच चर्चा में थी,तो ऐसे में कईयों ने इससे कुछ अधिक ही उम्मीद लगा ली थी शायद जहाँ तक नितीन चन्द्र नहीं सोच पाए,मेरे लिहाज़ से उन्हें सोचना भी क्यों चाहिए था उन्हें जो बनाना था उस ओर उनकी लेखनी/निर्देशकीय चली भी है पर किस हद तक वह इफेक्टिव रही है यह आगे पता चलेगा  | वैसे भी कोई  फिल्म कितनी महान है,होनी है या होगी इसका निर्णय तब तक आलोचकों के हाथ में नहीं है जब तक कि वह दर्शक वर्ग के बीच ना जाये | कई बार उसको उसकी मेहनत का सर्टिफिकेट जनता देती है | तो कई बार आलोचक फिल्म के पब्लिक डोमेन में आने के बाद अपनी राय और दृष्टियों से फिल्म को महान या क्लासिक की श्रेणी में रख देता है भले ही दर्शकों के लिहाज़ से वह फिल्म कैसी भी रही हो | यह एक अलग स्थिति है | देसवा को लेकर जो भी टिप्पणियाँ हो रही हैं या हुई हैं,उनमें से कई अराजकता की हद तक की हैं | ऐसे में हमें तय करना होगा कि हम कितने परिपक्व हैं कि अपनी एक सीधी आलोचना भी हमसे बर्दाश्त नहीं होती | बेहतर स्थिति यह होती है कि हम एक तर्क के बरक्स अपना भी एक सॉलिड तर्क से सामने वाले को संतुष्ट करें | वर्ना यह सब कुकुरहांव छोड़कर कुछ और नहीं हो सकेगा | 
स्वप्निल जी ने जो कुछ लिखा है उस पर मन एक पल को स्तब्ध होता है कि क्या हमारी मादरे-जबान कोई पानी पर खींची लकीर है जो कुछेक फ़ालतू फिल्मों और उनमें प्रयुक्त द्विअर्थी संवादों ,गीतों से मोहभंग का शिकार हो जाये ? वह भी तब जब भोजपुरी के वाक्य संरचना में एक बेलौसपन है,जहां भदेस शब्द (मेरा ईशारा भोजपुरिये समझ रहे होंगे ) धड़ल्ले से प्रयोग में आतें हैं और वाक्यों को चुटीला /बात को प्रभावी बनाने के लिए उसमें इस तरह के शब्द प्रयोग चटनी का काम करते हैं | मसलन उन्होंने लिखा है -" जितना ही इस भाषा से प्रेम है उतना ही इस भाषा में बनने वाली फिल्मों से दूरी बनाये रखता हूँ |मुझे डर लगता है कि ये फिल्में अपनी विषयवस्तु की वजह से इस भाषा से मेरा मोहभंग कर सकती है | 'गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो'को छोड़कर कोई भी दूसरी फिल्म मुझपर प्रभाव नहीं छोड़ पाई या बहुत बुरा प्रभाव छोड़ा |" अब इस पूरे स्टेटमेंट में कई पेंच हैं | स्वप्निल जी ने अगर भोजपुरी फिल्मों की सीमा को गंगा मईया...तक ही सीमित कर दिया तो इस लिस्ट में कई नाम हाशिये पर चले गए हैं जो भोजपुरी सिनेमा की मास्टरपीस हैं जैसे-भईया दूज,गंगा किनारे मोरा गाँव,बलम परदेसिया,साँची पिरितिया,लागी नाही छूटे राम,दुल्हा गंगा पार के,गंगा जईसन भौजी हमार,पिया के गाँव,सजनवा बैरी भईले हमार,दंगल इत्यादी तथा कुछ समय पहले आई गंगा जईसन माई हमार और कब अईबू अंगनवा हमार जैसी फिल्में अगर उन्होंने देख लेंगे  तो मेरा दावा है कि उनकी आशंका निर्मूल साबित होगी | भोजपुरी सिनेमा की जड़े 'कचा-कच'छाप (जिस ओर देसवा में  इशारा है ) सिनेमा की नहीं है | यह तो आगे चलकर ऐसा बना और इसका एक बड़ा कारण ८८-९५ के बीच आये इसके विभिन्न अल्बम थे जिन्हें बिजेंदर गिरी ,तपेश्वर चौहान,राधेश्याम रसिया,गुड्डू रंगीला,कलुआ जैसे छुट्भईयों ने बनाया और जिनके मुनाफे के बाज़ार को देखते हुए बाद में फिल्मों में भी अपना लिया गया क्योंकि बाज़ार का अर्थशास्त्र इसको सूट करता था | बावजूद इसके शारदा सिन्हा ,भरत शर्मा'व्यास',मुन्ना सिंह,काफी हद बालेश्वर यादव,आनंद मोहन (सांच कह ब$ जूता खईब$ फेम) और थोडा पीछे जायें तो महेंद्र मिश्र,महेंद्र शास्त्री (सिवान वाले ) और भिखारी ठाकुर के गीत भी भोजपुरी अस्मिता की पहचान रहे | तब ऐसे में पलायन करके या आशंका जता के कि 'कहीं अपनी नैसर्गिक भाषा से मेरा मोहभंग न हो जाये 'की चिंता गैरवाजिब है क्योंकि हमें ही इसके पतन के कारणों की तलाशकर उन्हें या तो दूर करना चाहिए अथवा जो इस कोशिश में लगे हैं उनको सहयोग करना चाहिए | और बावजूद इसके हमारी नज़र यदि 'गंगा मईया तोहे..'से आगे नहीं  जाती तब शक होता है कि भोजपुरी सिनेमा को देखने का अनुभव कितना है | 
'देसवा'को मैंने फेसबुक पर if u missed deswa u missed the changing/new face of bhojpuri cinema,its a honest start,lets join hands लिखा | यह एक त्वरित नहीं बल्कि एक सोची-समझी लिखाई थी | ऐसा नहीं है कि मुझे देसवा से उसके कथ्य,उसके ट्रीटमेंट,डिटेलिंग को लेकर समस्या नहीं रही पर मेरे लिए वाजिब बात यह थी कि काफी समय बाद एक फिल्म  भोजपुरी में आई जो पूरी तरह से भोजपुर ही नहीं बल्कि पूरे बिहार और पूर्वांचल की जमीनी दिक्कतों की पड़ताल करता है | इसके अलावे इस समय में जब भोजपुरी संगीत के मायने 'जब मारे ला बलमुआ त,हचाहच मारेला,सईयाँ फरलके पर फार अ ता, बलमुआ छक्का मार गईल,मिसिर जी तू त बाड़ा बड़ी ठंढा,मार द सटा के लोहा गरम बा '-बन गए हैं ऐसे में देसवा में शारदा सिन्हा ,भरत शर्मा के गाये गीत कितने घटना आधारित मार्मिक और दिल को छू लेने वाले हैं इस पर देसवा के कथानक /ट्रीटमेंट से असहमति रखने वाले भी सहमती जताएंगे और जता रहे हैं | दरअसल देसवा जिस तरह के कलेवर की फिल्म है उस तरह से इसका दर्शक वर्ग तैयार नहीं हुआ है | और यह बात भी उतनी ही सच्ची है कि इंडिया हैबिटेट सेंटर में उपस्थित दर्शक समुदाय भोजपुरी सिनेमा के दर्शक-वर्ग का चेहरा नहीं था ,होगा भी कि नहीं इसको भी स्पष्टतः नहीं कहा जा सकता | भोजपुरी का मध्य वर्ग भोजपुरी सिनेमा नहीं देखता | आगे देसवा अगर ऐसी गुंजाईश पैदा करती दिखती है तो उसका स्वागत होना ही चाहिए | भोजपुरी सिनेमा के पिछले २० सालों के प्रोडक्शन पर गौर फरमाईये ,आप सहज ही अंदाज़ा लगा लेंगे कि मुद्दों पर आधारित कितनी फिल्में बनी हैं ? अंग-प्रदर्शन और अश्लीलता के मुद्दे पर अलग से बिचार और बहस की पर्याप्त गुंजाईश बनती है | देसवा के बनाने वाले ने जिस तन्मयता से फिल्म बनानी चाही अगर वह समीक्षकों की उम्मीदों सरीखा नही बन पाया तो इसके लिए अधिक शोरगुल के जरुरत नहीं हैं | जरुरत इसके अच्छे पक्ष को भी उजागर करने की है | यह पक्ष अभिनय ,संगीत-गीत,गायकों का चयन,कलाकारों का चयन,लोकेशन,इश्यु बेस्ड प्लाट का भी हो सकता है है और इस ओर से देसवा देखें तो मामला बैलेंस हो जाता है | इसलिए अपने तमाम कच्चेपन में भी (जिसे आलोचकों समीक्षकों ने नकारा )यह फिल्म भोजपुरी सिनेमा के लिए एक बड़ा प्लेटफोर्म तैयार कर चुकी है | या तो हम देसवा को चेंजिंग सिनेमा के तौर पर देखें सराहें या पिनाकियों की तरह लम्बी नाक लिए दोष सूंघते फिरे ! 'देसवा'अगर थोड़ी सी ही सही सम्भावना जगाती है तब तो यह अपने आप में वाकई काबिले तारीफ़ है | थोड़े समय के लिए छोडिये कंटेंट,गीत,शब्द चयन,सीन का ट्रीटमेंट आइये सीधे उन सवालों पर जो सिनेमा उठाती है तब शायद देसवा को हम दिल के करीब महसूस करेंगे | इसमें कोई दो-राय नही कि भले ही देसवा बदलते भोजपुरी सिनेमा का अगुआ दस्ता न हो पर एक मजबूत पिलर जरूर बनकर उभरी है | क्योंकि सिनेमा केवल एक चीज़ से नहीं बनती,देसवा भी इसका उदाहरण है इसमें कै शेड्स हैं जो इसे आम फिल्मों से परे एक खास आकार देते हैं | नितीन ने कहा था कि सभी कुछ होगा इस सिनेमा में ,नही होगा तो बस एक वल्गरिटी | और इस वायदे को नितीन ने सईलेंटली दिखा दिया है | देसवा इसी वजह से देखना चाहिए | और कहानी लिखने से परे उसे उसके रिलीज़ होने का इंतज़ार करें |अभी के लिए तो 'देसवा'सही राह पर है और मशाल लेकर उस राह पर है,जहां से कुछेक उत्साही साथी आगे आयेंगे और भोजपुरी सिनेमा बदल जायेगा पूरी तरह से | देसवा को कमतर आंकना भूल है और बॉक्स आफिस इसे प्रभावित नही करेगा | कैसे एक सिनेमा अपने तमाम कमियों के बावजूद 'कल्ट'बनती जाती है ,देसवा उसका उत्कृष्ट उदाहरण है | जहां धड़ल्ले से वाहियात फिल्में आ रही हो और भोजपुरी सिनेमा के रूप को अरूप कर रही है ,वैसे में नितीन चन्द्र की यह फिल्म अपनी तमाम सीमाओं के 
के बावजूद एक संभावना जगाती है तब  तक रिलीज़ होने से पहले इसपर हल्ला मचाना पक्ष या विपक्ष में उचित नहीं होगा | 

5/7/11

डराने की निरीह कोशिश और थ्री-डी का लालीपाप -HAUNTED

अगर आप भूतिया फिल्मों के शौक़ीन हैं और चाहते हैं फिल्म को देखकर डर का रोमांच महसूस करें तो मेरी एक सलाह है कि कम-से-कम हमारी हिंदी फिल्मों के भूतिया इफेक्ट को न देखें | haunted  इस तरह की एक फिल्म है | इस फिल्म की कहानी पर नज़र ना डाले यह एक साथ ही कई फिल्मों जो कि जाहिर है भट्ट की ही फिल्मों का कोकटेल है | डरावना माहौल तैयार करने में उन्होंने वही सारी तिकड़में आजमाई हैं,जिन्हें हम बार बार देखते रहे हैं | थ्री डी का लालीपाप इस फिल्म को कितना आगे ले जायेगा इसमें संदेह की भरपूर गुंजाईश है | ले दे कर हमारे पास इन फिल्मों के चुनिन्दा फार्मूले होते हैं -मसलन 
(१) हीरो एक लश ग्रीन पर्वतीय स्थल पर एक खूबसूरत किन्तु सुनसान जगह पर बने भूतिया बंगले में आता है ,जहां एंटिक सामनों और आदमकद शीशे के खिडकियों-दरवाजों का भरपूर प्रयोग हुआ होता है |
(२) जलती हुई मोमबत्तियां ,खुबसूरत झूमर के इर्द-गिर्द चक्कर काटकर कैमरा हीरो के चेहरे के पास आता है और पार्श्व में बजता संगीत एक भय का वातावरण निर्मित करता है...एक घोर सन्नाटे के माहौल में औरत की दर्दनाक चीख और फिल्म दौड़ने लगती है |
(३) हिरोइन के साथ एक हादसा हुआ होता है और उसकी रूह उस हादसे के जिम्मेदार कारणों से या तो बदला लेना चाहती है अथवा हीरो को उस और खीचती रहती है ताकि हीरो के मार्फ़त उसे न्याय मिले (भले ही इसके लिए हीरो को २०११ से १९३६ तक की यात्रा करनी हो पीछे की ओर) ऐसा करने में सात्विक संस्कारों का वह नायक नियति से टक्कर ले लेता है और अंततः जीत जाता है (हम एंटी हीरो कभी होते ही नहीं )
(४) हीरो के साथ रात को हमेशा कुछ अनहोनी घटती है जो कैमरे में नहीं आती पर एक बात जरुर होती है कि यह भूत भी शीशे में अपने ओरिजिनल रूप में दीखता है (है न कमाल ,हिंदी सिनेमा के भूतों के साथ निर्माताओं ने बड़ा जुल्म किया हैउनकी कमजोरियां जगजाहिर कर दी है |, )
(५) हीरो के साथ घटते इन दृश्यों को एक अनजान भूतिया ही दिखने वाला रहस्मयी व्यक्ति जानता है | वही होता है तो इस बंगले का रहस्य जनता है (आपने कभी कभी इसे लालटेन लिए ,दाढ़ी बढ़ाये ,मैले कपडे पहने,अजीब तरीके से बोलते.कुछ अजीब करते,या कम्बल ओढ़े हीरो को बड़े अर्थपूर्ण ढंग से देखते कई फिल्मों में देखा होगा )इसमें यह (पिछली फिल्मों से परे )देवदूत होता है |
(६) हीरो अंत में एक ख़ास जगह पर जाकर एक ख़ास टोटका करके उस रूहानी ताकत को परास्त करके उस लड़की की रूह को आज़ाद करता है |
(७) इस पूरे कर्मकांड में लड़की पूरी तरह नायक पर निर्भर होगी क्योंकि हमारे निर्देशक लड़कियों को इस लायक नहीं समझते कि वह हीरो को रूह से बचाए (बिपाशा बसु एक्सेप्शनल केस है )
(८) भय पैदा करने के लिए एक खूबसूरत लोकेशन,एक पुराना बंगला (जो सुनसान जगह और बस्ती से दूर हो)का होना जरुरी होता है | कैमरा  लगातार खली स्पेस में मूव करते रहना होता है,तेज़ संगीत,तेज़ चलती साँसों का स्वर,टूटते कांच के सामान और फिर एकाएक सामने एविल का आ जाना ...रचना होता है और एक हिंदी भूतिया फिल्म तैयार हो जाती है |    
कुल मिलकर  haunted  देखने के बाद कुछ निष्कर्ष भी निकलते हैं और कुछ नयी जानकारियाँ भी मिलती है जो भूतों को/रूहों को समझने में सहायक सिद्ध हो सकती हैं ;-)
(१) भूतिया बंगले से रात को जो भी चीखें आती है वह हमेशा औरत /चुड़ैल की होती है 
(२) अगर इंसान अच्छा है तो ऊपरवाला (?) उसको इस अभियान के लिए अपना दूत बनता है,भले ही वह एक ब्रोकर हो या स्तेंद्फोर्ड यूनिवर्सिटी अमेरिका से पढ़कर आया हो
(३) वह भला इंसान अपने इस पावन पुनीत काम में समय से पीछे की ओर लौट सकता है औरवह भी  मोबाईल के साथ| इतना ही नहीं वह उस रूह के शरीर(क्योंकि अभी वह रूह नहीं बनी अभी वह शैतान की वासना का शिकार नहीं हुई और हीरो पीछे इसीलिए लौटा है कि इस हो चुकी दुर्घटना को बदलकर एक सुखांत रच सके )की तस्वीर भी खीचता है 
(४) लड़की चाहे १९३६ की हो और अंग्रेजी माहौल में रह रही हो पर वह कितनी मासूम है इसके लिए निर्देशक उससे पूर्वी हिंदी बुलवाते हैं ( वैसे 'हम'लगाकर बोलने से मासूमियत का कुछ लेना देना नहीं है| यह एक जबान भर है ,हमें तो यही पता था )
(५) भूत इत्यादि रात  के ३ बजे सबसे ताकतवर होते हैं (रामसे ब्रदर्स ने आज तक हमें अँधेरे में रखा था कि भूत रात के बारह बजे आते है....थैंक यु भट्ट साब आप न होते तो इस जानकारी के अभाव में  हम तो कट लिए थे संसार से )
(६) भूत आदि लिखा हुआ न तो पढ़ सकते हैं न लिख सकते हैं (जिन्दा व्यक्ति चाहे वह प्रोफ़ेसर ही क्यों न हो,जैसे ही वह शैतानी रूह  बनता है,वह अनपढ़ हो जाता है...है न कमाल !!! )  
(७) हर वह आदमी जो शैतान द्वारा मारा जाता है हमेशा मरते ही सफ़ेद चेहरे का हो जाता है 
(८) लड़की मरने के बाद भी बहुत सुन्दर गायिका रहती है  
(९) विक्रम भट्ट की पिछली फिल्म १९२० की तरह यह आत्मा पादरी से नहीं शांत हो सकती क्योंकि वह हिन्दू आत्मा (अय्यर ) है,यह आत्मा जीसस से नहीं डरती और जीसस के सेवक पादरी को मार देती है 
(१०) भारत की गंगा-जमुनी तहजीब की सच्ची तस्वीर है यह फिल्म | पिछली बार हिरोइन को हीरो ने हनुमान चालीसा का पाठ करके बचा लिया था इस बार दरगाह के सूफी की मज़ार की पाक हवा मिटटी पानी की मदद से वह जीतता है | अगली बार शायद पादरी महाशय या जीसस महोदय शायद अधिक प्रभावशाली हो जायें,तब तक इंतज़ार
(११) एक बड़ी जानकारी यह भी मिलती हैं कि 'शैतान के नाम का उच्चारण नहीं करना चाहिए,क्योंकि जितनी बार भी आप शैतान का नाम उच्चारते हैं,वह उतना ही शक्तिशाली होता  जाता है'(मैं सोचता हूँ कि ,यह बात सिर्फ भूतों पर लागू होती है कि.......खैर!) 
(१२) अब तक आपने सुना होगा-'क्षितिज,जल,पावक,गगन,समीरा /पञ्च तत्व से बना शरीर '-फिल्म में इसकी व्याख्या में फाईव एलिमेंट 'आग,पानी,हवा,मिटटी और रू- ह 'के तौर पर है |(कृपया अपनी जानकारी दुरुस्त कर लें)
कुल मिलकर हमें आज भी एक अदद बेहतरीन हिंदी भूतिया फिल्म की जरुरत है,जिसमें एक कायदे की कहानी हो और फिर उस लिहाज से दृश्यों का रचाव और कैमरा वर्क | निर्माता-निर्देशक यह बार-बार न बताएं कि खूबसूरत लोकेशन और एंटिक बंगले भूतिया होते हैं (दुःख होता है)और हर खूबसूरती का एक भूतिया इतिहास होता है | फिल्म में कहानी ,तकनीक और बढ़िया निर्देशन न हो थ्री डी इफेक्ट भी कुछ नहीं कर सकता | 'HAUNTED' इसी का शिकार हुई है,जिसमें नया होने को कुछ नहीं है | यह फिल्म आप तीन वाजिब वजहों से देख सकते हैं-
(क) यदि आपके पास टाइम बहुत फ़ालतू हो,या करने को कुछ नहीं हो
(ख) यदि जेब में से पैसे उछल-उछलकर गिरना चाहते हों 
(ग) यदि आपने कभी कोई थ्री डी फिल्म ना देखी हो
इन तीनों वाजिब(?) वजहों के लिए आपको मैं सिर्फ 'आल दी बेस्ट'या 'गुड लक'ही बोल सकता हूँ  | क्योंकि मेरे लिए तो यह एक  haunted experience  ही था |  

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...