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सरकार, रंगमंच और साँस्कृतिक नीति (बंसी कौल का मंतव्य)

प्रस्तुत लेख वरिष्ठ रंगकर्मी  बंसी  कौल के  साक्षात्कार का लेख  रूप में प्रस्तुति है. यह साक्षात्कार  राष्ट्रीय नाट्य विद्यायल में  मुन्ना कुमार पाण्डेय औr अमितेश द्वारा वर्ष 2013 में लिया गया था और यह समकालीन रंगमंच के दूसरे अंक में प्रकशित हुआ था.  इस लेख को छापने के लिए  दोनों साक्षात्कारकर्ता  संपादक समकालीन रंगमंच के आभारी हैं. पत्रिका में यह लेख भिन्न शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, यहाँ  हमने अपने हिसाब से शीर्षक तय किया है.- मॉडरेटर  .......................................................... मुझे नहीं मालूम कि इंडियन गवर्नमेंट की कोई कल्चरर पालिसी है या नहीं , या इस तरह की पालिसी हो इस पर कोई विचार किया गया है कि क्या होना चाहिए ?   कल्चरर प्रोग्राम जरुर है. बीच बीच में   कुछ इस तरह के लोग आते रहें है जिनको लगता था की कल्चर की रूप रेखा बने , जैसे एक ज़माने में जोनल सेंटर को लेकर उस वक्त एक आईडिया था    कि जितनी भी लोककलाएं है उनका आपस में आदान प्रदान हो .     देश एक दूसरे को अगर जानता था तो संसद...

'अबाउट राम'- राम कथा की निराली प्रस्तुति

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कहानी कहने का या सम्प्रेषण की दृष्टि से रंगमंच एक जीवंत और बहुत सशक्त माध्यम है यह सीधे तौर पर अभिनेता और दर्शक के बीच संवाद करता है और यह संवाद विविध रूपों में होता है-जैसे अनेक प्रकार की ध्वनियाँ ,शारीरिक मुद्राएं आदि अभिनेता अपने अभिनय से अपना सम्प्रेषण सामाजिकों तक प्रेषित करता है कभी गाकर, कभी नाच कर तो कभी अपने अभिनय से परन्तु ,मंच से अभिनेता अदृश्य हो और उसकी जगह कठपुतलियों,मुखौटो,तथा तकनीक को सामने लाया जाए तो संवाद के लिए एक कुशल और अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता होती है मानव के सहयोग से इनमें गतियाँ उत्पन्न होती हैं और यह बेजान होते हुए भी मंच पर बोल पड़ती हैं ,दर्शकों का जुड़ाव उससे हो जाता है इस तरह की प्रस्तुति कठिन तपस्या और निरंतर अभ्यास की मांग करती है नाटक की पश्चमी परंपरा में यूनानी देवता डायोनिशस के उत्सवों में मुखौटों को लगाने की परिपाटी थी जो आगे चलकर अभिनेताओं के मुंह पर लगाकर मंचासीन होने की परम्परा में आ गयी जापान की 'नोह'शैली या काबुकी में, तो अपने यहाँ ठेरुकुट्टू कुडी अट्टम आदि में इनका प्रयोग देखने को मिलता है यह मुखौटें सभी प्रयोगों में कथा के पा...

"१३वां भारंगम"-फिर वही कहानी

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पिछले तेरह वर्षों से भारंगम सफलतापूर्वक अपने नए नए सोपानों पर चढ़ता जा रहा है | इसमें कोई दो-राय नहीं कि इसने एक अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप गढ़ लिया है | बावजूद इसके हर बार भारंगम एक ख़ास तरह के रंगकर्मियों,नाटकों और खेमेबाज़ियों के कारण हमेशा चर्चा में रहा है,जो कि विवादों की जमीन पर पनपे पौधे सरीखा है | इसके कई वाजिब कारण हैं | मसलन- (१) इस समारोह में वही कुछ चेहरे क्यों रिपीट होते रहते हैं जिनका योगदान भारतीय रंग-परंपरा को बढाने में कुछ विशेष नहीं है और वह अभी लर्निंग पीरियड में ही हैं पर,वह इस आयोजन के प्रतिनिधि रंग-व्यक्तित्व बने दीखते हैं ? (२) क्यों यह समारोह आज भी एक ईमानदार भारतीय रंग-परम्परा का मंच नहीं बन पाया ? (३) इतना ही नहीं,यह समारोह हर वर्ष इस तथ्य की जाने-अनजाने पुष्टि करता क्यों दीखता है कि जो रंगकर्मी या दल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के आला हाकिमों के खेमे का नहीं उनके नाटकों को ही इस समारोह का एंट्री कार्ड क्यों मिलता है? (४) क्यों अब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ही पास आउट (प्रशिक्षित)स्नातकों को ही वरीयता मिलती रही है ? (५) इस समारोह में पिछले कुछ समय से विद्यालय के खेल...