12/10/09

एक फ़साना हबीब -अना तनवीर




पिछले दिनों मैं भोपाल स्थित 'इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ' में था और मौका था नया थियेटर के गोल्डेन जुबली वर्ष का.मानव संग्राहलय ने अपने आयोजन "हबीब उत्सव"के तहत दो दिनों का 'सुरता हबीब ' नाम से सेमीनार भी कराया था जिसमें प्रसन्ना.वामन केंद्रे,लताफत हुसैन ,महमूद फारूकी,शम्पा शाह,नया थियेटर के पुराने कलाकार,प्रयाग शुक्ल,डॉ.विनायक सेन,अनूप जोशी, आदि नामवर रंगकर्मी जुटे.पर इस पांच दिवसीय हबीब उत्सव की खासियत दो मायने में महत्वपूर्ण है.पहला कि इसमें हबीब साहब के 'आगरा बाज़ार,राजरक्त,सड़क,चरणदास चोर,कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना,जिन लाहौर नहीं वेख्या वो जन्म्या ही नई,नाटकों का मंचन हुआ.पर दूसरी बात जो है वो उन सब में अहम है औए वो ये कि इस पूरे उत्सव के दौरान एक चेहरा सबको हैरत में डालता रहा वो था -हबीब साहब की बेटी अन्ना तनवीर का,जो फ़्रांस की बहुत मशहूर सिंगर है.कलाकार पिता की कलाकार बेटी.आप चौंक गए ना?जी हाँ सबकी यही पता था कि हबीब की एक ही बेटी थी - नगीन तनवीर ,पर आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि अन्ना नगीन से बड़ी हैं और काफी प्रतिभाशाली भी.वह नगीन की सौतेली पर प्यारी बहन है,जिससे भारतीय रंगजगत नहीं जानता.अन्ना पांच भाषाओं में गीत गाती है और संगीत देती हैं.फिलहाल ब्रिटेन के दौरे पर हैं और फ़्रांस में ही रह रही हैं.दिल्ली वापस आते वक़्त मित्र अमितेश के साथ अन्ना और मैं भी एक ही ट्रेन शताब्दी से वापस आये.आने वाले समय में हबीब साहब की आत्मकथा का दूसरा अंश भी पब्लिश हो जायेगा पर हाँ अन्ना और उसकी मां को लिखे पत्रों से हबीब साहब के जीवन का एक यह भी पहलू सामने आएगा जो उनके व्यक्तित्व को और उभार देगा.आम उठापटक से परे अन्ना और उसकी मां के पास हबीब साहब की अच्छी यादें हैं.सुरक्षित और सहेजी.अन्ना के साथ बातचीत में भोपाल से दिल्ली का सफ़र कैसे कटा पता नहीं चला पर हाँ यह यात्रा जीवन के कुछ सबसे यादगार सफ़र में रहेगी हमेशा.अन्ना का सौम्य सहज स्वभाव और मुस्कराहट के साथ.एक चीज़ और एडिनबरा के फ्रिंज फर्स्ट अवार्ड (जो तब बेस्ट नाटक के लिए चरणदास चोर को मिला)के वक़्त अन्ना भी साथ थी और लगभग नया थियेटर के हर विदेशी दौरे पर जहां हबीब साहब उनके महान पिता थे(जैसा अन्ना ने कहा),

10/21/09

"LE JUSTES"by अल्बेयर कामू-हिंसा के रास्ते क्रांति या क्रांति के लिए हिंसा की बहस


बीसवीं शताब्दी के महान चिन्तक और लेखक अल्बेयर कामू के नाटक le justes का हिंदी रूपांतर "न्यायप्रिय"(अनुवाद-प्रो.शरतचंद्रा और सच्चिदानंद सिन्हा)का सफ़ल मंचन पिछले ७-१० अक्टूबर को पटना के कालिदास रंगालय में नत्मंड़प नाट्य-समूह द्बारा किया गया.इस नाटक का निर्देशन संभाला था जाने माने रंग-निर्देशक और रंगकर्मी परवेज़ अख्तर साहब ने.'न्यायप्रिय'के प्रस्तुति आलेख की परिकल्पना हिन्दुस्तान की गुलामी और उससे मुक्ति के लिए की जा रही हिंसक क्रांतिकारी गतिविधियों को ध्यान में रख कर की गयी है.'न्यायप्रिय'का कथानक एक भूमिगत क्रांतिकारी संगठन के इर्द-गिर्द घूमता है.गुलाम भारत में यह क्रांतिकारी दल अँगरेज़ कलेक्टर की हत्या की योजना बनाता है,जिसमें शामिल होने के लिए कनाडा में फरारी जीवन जी रहा तेजप्रताप यहाँ आता है.शेखर जो दल में मस्ताना के नाम से मशहूर है,निश्चित कारवाई के दिन अँगरेज़ कलेक्टर की बग्घी में बच्चों को देखकर बम नहीं फेंक पाता.दल में इसको लेकर एक तीखी बहस शुरू हो जाती है.दमयंती दल की एक पुरानी सदस्य है,जो शेखर से प्रेम करती है.दल प्रमुख बलदेव दो दिन बाद बम फेंकने की योजना बनाता है.कलेक्टर की हत्या के बाद शेखर गिरफ्तार हो जाता है.जेल में खुफिया विभाग का अधिकारी शेखर को कई प्रलोभन देता है.शेखर से मिलने मारे गए अँगरेज़ कलेक्टर की पत्नी और पंडित त्रिवेदी भी पहुँचते हैं ताकि वह प्रायश्चित कर ले.शेखर को फांसी लगती है.फांसी के दिन एक गहरी पीडा से गुजरती दमयंती अगला बम फेंकने और फांसी के तख्ते तक पहुँचने का निश्चय करती है.(ब्रोशर)-यद्यपि 'न्यायप्रिय'क्रान्ति की हिंसा पर बहस है या फिर हिंसक क्रान्ति पर एक बहस.यह नाटक अपने आलेख और परिकल्पान में भले ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय में उपजे एक भूमिगत क्रांतिकारी दल के सदस्यों के बीच क्रान्ति के लिए हिंसा कितनी जरुरी क्यों जरुरी के पक्ष और विपक्ष के तर्कों को सामने लाता है पर मौजूदा हालात में आज जब नक्सली हिंसा की बढती घटनाओं के बीच बुद्धिजीवी वर्ग में मत-वैभिन्य हो रखा है तब इस नाटक के बहाने इस बात पर विचार करना अधिक जरुरी हो जाता है कि-

-क्या क्रान्ति के लिए हिंसा जरुरी है?

-अनदेखे न्यायपूर्ण समाज के भविष्य के लिए वर्तमान को लहूलुहान करना कहाँ तक न्यायसंगत है?

-क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन के लिए हिंसक तरीके क्या मानवीय कष्टों को कम करते हैं?

-क्या पार्टी के कायदे और निर्देशों के बीच अपने दिल और मानवीय संवेदनाओं की कोई जगह नहीं होती?नाटक में तेजप्रताप और शेखर के बीच की बहसें सार्त्र और कामू के समय की परिस्थितियों की ओर इशारा करती लगती है,कामू भी १९३५ में फ्रांसीसी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए और बाद में अपने स्वतंत्र विचारों के कारण पार्टी से निष्कसित कर दिए गए.बहरहाल,नाटक पर लौटते हैं.नटमंडप के कलाकारों जावेद अख्तर खान ,मोना झा,विनोद कुमार,अजित कुमार निवेदिता,बुल्लू,,राजू,अनिश अंकुर आदि ने अपना शत-प्रतिशत अभिनय योगदान देकर इस नाटक को सफल बनाया.सबसे जरुरी बात जो यहाँ कहनी महत्वपूर्ण है वह ये कि पटना के कालिदास रंगालय में जिस स्थिति में नाटकों का मंचन हो रहा है और जिस अभाव में नाट्य-कला को यहाँ जीवित रखे हुए हैं वह काबिले-तारीफ़ है.उन्हें सैल्यूट करना चाहिए.बिहार की मिटटी ने अनेक रंग-विभूतियों को पैदा किया है और आज भी यहाँ परवेज़ अख्तर,जावेद अख्तर,मोना झा,विनोद कुमार,संजय उपाध्याय,राजीव रंजन आदि नामचीन रंगधुनी कार्यरत हैं जो राष्ट्रीय-अंतर्राश्तिर्य स्टार पर बिहार के रंगमंच को पहचान दिला रहे है पर बिहार का कला और संस्कृति मंत्रालय पता नहीं किस ओर आँखें मूंदे बैठा है.

अंत में ,परवेज़ अख्तर इस जटिल और बहस कायदे की बहस वाली वैचारिक नाट्य-प्रस्तुति के लिए प्रशंसा के पात्र हैं.न्यायप्रिय सच्चे अर्थों में le justes का सृजनात्मक प्रयास है.

9/25/09

'मि.योगी' का जायका ख़राब करेगा -वाट्स योर राशि'




आज हमारे अगल-बगल के सिनेमाघरों में हाई-फाई निर्माता-निर्देशक आशुतोष गोवारिकर की 'वाट्स योर राशि' रिलीज हो गयी है..जैसा कि शुरूआती सिनेडियों ने बताया है ,लगता है आशुतोष इस बार बिना वजह फिल्म बना बैठे हैं.'...राशि' का नाम पहली बार सुनते ही दूरदर्शन के बहुचर्चित धारावाहिक 'मि.योगी' की याद आगई थी,और साथ ही यह आशंका भी कि कहीं उस क्लासिक सीरियल का बंटाधार न हो जाये.ऐसी आशंका वाजिब थी क्योंकि मि.योगी की कहानी भी लगभग यही थी कि एक बांका सजीला नौजवान अमेरिका से अपने लिए एक अदद कन्या विवाह हेतु ढूँढने इंडिया आता है और हर एक लड़की के साथ उसका जो साक्षात्कार होता है उससे कॉमिक सिचुएशन बनती है और वह भी बिना किसी मुहँ-बिचकाऊ ऐक्टिंग अथवा फूहड़ संवादों के.यही इस धारावाहिक की जान थी जो इसे क्लासिक बना गयी.एन आर आई भारतीय की भूमिका तब के चर्चित टीवी कलाकार मोहन गोखले ने निभाई थी.बहरहाल,'वाट्स योर राशि की कथा तो वैसी नहीं पर आशुतोष अतिशय प्रयोगधर्मी डाईरेक्टर तो नहीं ही हैं ना उन्हें ऐसे प्रयोगों में कूदना था बिना किसी धाँसू तैयारी के.आशुतोष बड़े निर्देशक हैं वह बड़े कलाकारों को लेकर फिल्म बनाते हैं.बड़े बजट की फिल्म बनाते हैं.बड़ी महाकाव्यात्मक ऊँचाईयों(?)वाली कथाओं को अपनी फ़िल्मी कथा बनाते हैं.हर बार उनका नायक महा(बड़ा)अभिनेता होता है मसलन-आमिर खान,शाहरुख़ खान,ह्रितिक रोशन,फिर ऐसे में इस कथा में हरमन बेचारा तो छोटा ही ठहरा..खैर अपना क्या है एक और फिल्म लग गयी इस हफ्ते इसका भी आस्वाद तो होना ही था...सिनेडियों को तो सिनेमा का बहाना चाहिए..

9/2/09

"Gloomy sunday"-एक महान हत्यारी कविता.


gloomy sunday वह गीत है,जिसे सुनकर करीब २०० लोगों ने आत्महत्या कर ली थी.इस गीत का लेखक था-हंगरी का "लाजेलो झावोर".झावोर की प्रेमिका ने उसे धोखा दिया और रविवार के दिन जब उसकी शादी का कार्ड लाजेलो को मिला तो उसका दिल टूट गया,तब उसने इस हत्यारे,हृदयविदारक,प्रणय गीत की रचना की.

"now tears are my wine
and greef is my bread
each sunday is gloomy
which feels me with death"
अर्थात, अब आंसू ही मेरी मदिरा है/
और दुःख ही मेरी रोटी/
अब हर इतवार मेरे लिए दुखद है/
जो मुझे मृत्यु भाव से भर देता है."-

जब इस गीत को फेमस संगीतकार "रेज्जो सेरेज़"ने मार्मिक स्वरों में गाकर रिकार्ड कर बाज़ार में पहुँचाया तो उसे सुनकर आत्महत्या करने वालों का तांता लग गया,कुछ ने ज़हर खा ली तो कुछ ने खुद को गोली मार ली और कुछ मानसिक दिवालियेपन के शिकार हो पागल हो गए.यही नहीं यह पड़ोसी देशों लन्दन और अमेरिका में भी अपनी छाप छोड़ आया,वहाँ के कई कॉलेज जाने वाले और स्कूलों के बच्चे-बच्चियों ने आत्महत्या कर ली.बी.बी.सी.द्बारा प्रतिबंधित हो जाने के बाद इसके रिकार्ड बाज़ारों से गायब हो गए.आज यह केवल पुस्तकों में दर्ज है और इसके संगीतकार 'रेज्जो सेरेज़'ने ६९ वर्ष की उम्र में १९६८ में बुडापेस्ट की एक आठ मंजिली इमारत से कूदकर आत्महत्या कर ली.यह 'gloomy sunday'का अंतिम शिकार था.

(रेफर्रेंस-कादम्बिनी सितम्बर १९९३ पेज-९४-९६ )

7/10/09

कमबख्त फिल्म ...


किसी फिल्म के हिट होने का क्रेटेरिया क्या है या होता है?बहुत संभव है मेरी और आपकी राय लगभग समान हो.बीबीसी हिंदी पर कमबख्त इश्क के हिट होने की खबर है साथ ही यह भी कि अक्षय कुमार ने भव्य पार्टी दी और शाहरुख़ खान को भी पार्टी में बुलाया.यह एक अलग बात है.मेरी समस्या अक्षय कुमार की इन दिनों की कुछ फिल्मों से बढ़ी है.और मैं यह सोचता हूँ कि फिल्म के लिए स्क्रिप्ट का दमदार होना जरुरी है या नहीं?कोई नाम मात्र की भी स्टोरी लाइन तो हो..पर नहीं. दर्शकों का टेस्ट क्या हो चला है इसे पकड़ पाना ना तो ट्रेड पंडितों के पास है ना ही फिल्म समीक्षकों के पास. "कमबख्त इश्क"कुछ उन फिल्मों में से थी जिनके लिए सिनेडियों(सिनेमा प्रेमियों)ने बहुत बेसब्री से इंतज़ार किया था मगर सही में यह फिल्म जिस तरह से बन कर सामने आई है उसे देख कर यही कहा जायेगा कि कम-से-कम अब साजिद नाडिया..और शब्बीर खान क्या दिखाना चाहते थे उनसे ही पूछा जाये तो बता नहीं पायेंगे..पर विडम्बना है कि फिल्म हिट है. मेरे लिए यह फिल्म देखना एक त्रासदी से गुजरने जैसा अनुभव रहा है.यह फिल्म कमबख्त इश्क से कमबख्त फिल्म में शुरू होते ही तब्दील हो जाती है.कुछेक दिक्कतें आपके लिए- १-इस फिल्म में जबकि सारी स्टोरी अक्षय और करीना के आसपास ही रही तो इसमें जावेद जाफरी ,बोमन इरानी,और किरण खेर का काम क्या था...(पता नहीं जावेद की मति मारी गयी है या पापी पेट का सवाल..कौन जाने?) २-करीना सुपर मॉडल थी पर एक बार भी रैंप पर नहीं दिखी ना उन्हें यह टाईटल मिलते दिखा..बहरहाल यह भी अजीब सा लगा कि यह सुपर माडल अपने सर्जन बनने को लेकर माडलिंग से भी ज्यादा संघर्षरत है...काश ऐसा हो जाता रियल लाईफ में भी.कि कोई स्टारडम के पीक पर पहुँच कर भी दो पेशा विपरीत दिशाओं वाले साथ लेकर चल रहा हो.वैसे शब्बीर साहब करीना के किरदार को खाली डाक्टर ही रहने देते तो भी काम चल ही जाता ३-फिल्म में एक भी गाना या दृश्य ऐसा नहीं है जिसे याद रखा जा सके.. ४-नयी नयी और हिंसक शब्दावली सुननी सीखनी हो तो स्वागत है इस कमबख्त ...में ५-किसी सीन का मतलब ठीक से उभरता नहीं यह देखना हो तो स्वागत है ६-सबसे बड़ी बात ---पैसे ज्यादा हो जेब में खुजली मचा रहे हों तो भी स्वागत है.. ७-ब्रेंडन रुथ,डेनिस ,और स्टेलोन की क्या मजबूरियां थी अल्लाह जाने कुल मिलाकर "कमबख्त फिल्म अररर इश्क टाइम पैसे दिमाग की पूरी बर्बादी है...हम तो चट गए भाई ..

6/4/09

पीयूष मिश्रा का विडियो साक्षात्कार "www.mihirpandya.com"पर.



गुलाल देखने के बाद जो पीयूष मिश्रा के नए नए मुरीद हुए हैं और वे भी जो रंगमंच के दिनों से ही इस बेहतरीन कलाकार के फन के कायल हैं,उनके लिए एकदम नया और ख़ास विडियो साक्षात्कार मेरे अभिन्न मित्र और आवारा हूँ ब्लॉग के 'मिहिर पंड्या' के वेबसाइट www.mihirpandya.com पर उपलब्ध है.इस इंटरव्यू की सबसे ख़ास बात है कि अन्य कलाकारों के रेट-रटाये और घिसे -पिटे फार्मुलेबाजी वाले साक्षात्कार के बीच इस अद्भुत कलाकार ने अपने दिल का दरद दिल्ली के रंगमंच मार्क्स की बात कर अपनी दुकानदारी चलाने वाले छद्म मार्क्सवादियों तक पर अपनी तीखी टिपण्णी दी है.मिहिर के ही ब्लॉग साथी वरुण ग्रोवर ने अनुराग कश्यप के मशहूर प्ले "the skeleton women" जो पृथ्वी थिएटर मुम्बई में खेला जा रहा है के मौके पर अनौपचारिक तौर पर लिया और फिर जो सिलसिला चला तो बस एक से एक बात निकलती चली गयी.पीयूष मिश्रा के अब तक छपे इंटरव्यू को आप भूल जायेंगे.यकीन जानिए ये वही पीयूष मिश्रा हैं जिनके नाम की तूती दिल्ली के रंगजगत में बोलती थी.आखिर क्यों रंगमंच का एक बहुत ही उम्दा कलाकार इतना खिन्न हो गया इस मंच से .?क्यों वह अपने संघर्ष के दिनों के कड़वाहट को पचा नहीं पा रहा है?और भी बहुत कुछ ..आखिर एक कलाकार के संवेदनशील मन को ठेस कहीं न कहीं हम जैसों से भी पहुंची है...कृपया इस इंटरव्यू को पढिये और मिहिर के इस प्रयास पर उनकी हौसलाअफजाई कीजिये,.....

5/30/09

राजनीतिक राम के बरक्स पारिवारिक राम की छवि -उत्तररामचरित


रा.ना.वि. के ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव के नाटकों पर लिखने की अगली कड़ी में आज भवभूति द्बारा रचित और प्रसन्ना द्बारा निर्देशित नाटक "उत्तररामचरित" के बारे में कुछ.
उत्तररामचरित का संस्कृत से हिंदी अनुवाद 'पंडित सत्यनारायण कविरत्न' ने किया है.कविरत्न जी ने भवभूति के तीनों नाटकों का हिंदी और ब्रज में मिला-जुला अनुवाद किया यानी गद्य को हिंदी में तो पद्य को ब्रज में.उनकी यह कुशलता नाटक के प्रदर्शन में काफी सहयोगी सिद्ध हुई भी है."उत्तररामचरित"भी एक तरह से रामलीला ही है.पारंपरिक रामलीला खासकर एक नैतिक नाटक है जिसमे बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाई जाती है.इस नाटक में कोई शैतान नहीं है कोई खल पात्र नहीं.अगर प्रसन्ना की माने तो-"यह नाटक आत्मसंघर्ष पर केन्द्रित है.इसमें अच्छा आदमी अपने अच्छे होने की कीमत अदा करता है-यंत्रणा के द्बारा."-इस नाटक पर कुछ और बात से पहले पाठकों को यह याद दिला दूं कि प्रसन्ना ने इस नाटक का मंचन/निर्देशन १९९१ में किया था,जब एक राजनीतिक दल ने सत्ता के लिए राम की आध्यात्मिक छवि का दुरूपयोग कर उसको राजनीतिक छवि सही कहा जाये तो 'साम्प्रदायिक'उग्र युवा प्रतीक के तौर पर प्रस्तुत किया था.यद्यपि भवभूति का राम विशुद्ध पारिवारिक व्यक्ति है.उसके परिवार में एक पत्नी,भाई ,सेवक इत्यादि हैं.भवभूति का राम युद्ध के बाद की परिस्थितयों से लड़ता है ,अपने-आप से लड़ता है और यह इतना ज़मीनी है इतना कोमल है कि पत्नी वियोग में लोट-लोट कर विलाप करता है और अपने निर्णय पर पश्चात्ताप करता है कि क्यों उसने गर्भवती पत्नी को लोकोपवाद के कारण कष्ट भोगने जंगल में भेज दिया.भगवा बिग्रेड कभी भी इस राम को जनता के सामने लाने का दुस्साहस नहीं कर सकता क्योंकि उनका गढा हुआ राम 'एंग्री यंगमैन' हैवह शक्ति के अपने ज़मीन की लड़ाई लड़ रहा है.
'दरसल राम की सार्वजनिक छवि उन्हें सीता त्याग को बाध्य करती है जो उनकी गर्भवती पत्नी है और उधर उनका निजी प्रेमी रूप इस वियोग से उत्पीडित होता है.इस तरह भवभूति नैतिक विडम्बना के भीतर से एक खूबसूरत प्रेमकहानी निकाल लाते है.उल्लेखनीय है कि अंत में सीता ही राम को पुनर्जीवन देती है.भवभूति ने यहाँ राम को नश्वर मनुष्यों की ही तरह प्रस्तुत किया है.अपने निजी जीवन की असहायता के कारण ही वे जनसाधारण को इतने प्रिय लगते हैं.'(प्रसन्ना)
भवभूति को कालिदास के समकक्ष का नाटककार माना जाता है.इस नाटक के रूप में उन्होंने एक विशिष्ट रचना दी है.नाटक के रूप में उत्तररामचरित में वो सारे गुण और लक्षण हैं जो एक सफल नाटक में होने चाहिए.इसमें प्रेम,दुःख,त्रासदी,संघर्ष और नियति के तथा जीवन के विविध रूपों के दर्शन होते हैं.नाट्य-समीक्षक रविन्द्र त्रिपाठी के शब्दों को उधार लेते हुए-"रा.ना.वि.रंगमंडल के कलाकारों ने इस नाटक को १९९२ तथा २००६ में खेला.इतने वर्ष पहले वह वक़्त था जब राम-मंदिर को लेकर देश भर में एक तनाव था...उस समय प्रसन्ना ने राजनीतिक राम की छवि के बरक्स आध्यात्मिक राम को स्थापित किया था.यह एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप था,लेकिन इस बार प्रसन्ना का यह नाटक राजनैतिक नहीं बल्कि नैतिकता की खोज और गृहस्थ जीवन के मूल्यों की स्थापना है."-इस नाटक में दो सिरे उभरते हैं-लोकोपवाद और उसके कारण सीता के परित्याग का दंश.इसी के बीच राम आत्मयंत्रणा में जीते हैं.तुलसी के राम जहां मर्यादा पुरुषोत्तम हैं वहीँ भवभूति के राम मनुष्य ,पति और पिता भी .इसमें राम का रूप अधिक मानवोचित है.इस नाटक की इसी विशिष्टता के कारण ही तो कहा गया है-"उत्तर रामचरिते भव्भूतिर्विशिष्यते".
सही मायनों में विवाह नैतिकता और प्रेम का यह नाटक हर दृष्टि से देखने योग्य है.रंगमंडल तो सदारमे है ही तिस पर प्रसन्ना का निर्देशन 'सोने पे सुहागा' हो गया है.प्रसन्ना ने यह नाटक अपने पुराने संगीत निर्देशक साथी जिन्होंने १९९१ में इस नाटक की संगीत-रचना की थी ,की स्मृति को समर्पित किया है.जिन किसी महाशय को यह चिंता हो कि बिना आधुनिक वाद्य या अत्याधिक प्रकाश के आयोजन अथवा चकाचौंध के बिना थिएटर संभव नहीं है उनके लिए उत्तररामचरित को सबक है.यह नाटक न्यूनतम में तैयार होकर अधिकतम की सीमा से आगे जाकर आपका मनोरंजन करता है. *****************************************************************************************
परिकल्पना और निर्देशन-प्रसन्ना सह-निर्देशक-सौउती चक्रवर्ती नाटककार-भवभूति अनुवाद-पंडित सत्यनारायण कविरत्न संगीत-डॉ.गोविन्द पाण्डेय नृत्य-संरचना-विद्या शिमलड़का प्रकाश-पराग सर्माह वस्त्र-सज्जा-अर्चना शास्त्री मंचन स्थल-सम्मुख सभागार (नाट्य महोत्सव की समय-सारणी पिछली पोस्ट से देखे.)

5/29/09

जहां मौत एक सहज कविता सरीखी है-राम नाम सत्य है



रेपर्टरी (एन एस डी)का यह नाटक "राम नाम सत्य है"-मूल रूप से मराठी नाटककार 'डॉ.चंद्रशेखर फनसलकर'का लिखा हुआ है.फनसलकर के नाटकों और विशेषकर एकांकियों पर लिखते हुए 'विजय तेंदुलकर' ने लिखा है-"उनके एक-अंकीय नाटकों में थिएटर की संभावनाओं और सीमाओं,दोनों के प्रति सजगता का पता चलता है.लेकिन उनमे व्यक्त होने के लिए और भी बहुत कुछ शेष रहता है.उनके भीतर एक प्रकार की बेचैनी.एक असंतोष और आक्रोश निहित है"-इस नाटक को फनसलकर जी ने मराठी में 'खेली-मेली' के नाम से लिखा है.जिसका अनुवाद इस नाटक के निर्देशक'चेतन दातार'ने ही किया है. यह नाटक जैसा कि खुद नाटककार का कहना है-प्यार,भाईचारे और थोड़े बहुत हौंसले से मनुष्य नर्क में भी जीवन को सहज बना सकता है और आगे बढ़ रहा है.यही मनुष्य के भीतर उम्मीद और आशा का संचार करता है,जबकि आज हमारे चारों और की जो मूल्यवान और अच्छी चीज़ें हैं वो या तो ढह रही हैं या मृतप्राय हो गयी हैं.यह नाटक मनुष्य की इसी 'कभी मृत न होने वाली'प्रवृति को पकड़ने का प्रयास है."-नाटक देखते हुए एपी फनसलकर की इस बात से सहमत हो सकते हैं.अथाह दुःख के बेला में भी दर्शक उस उदासी को सहज तौर पर समझ नहीं पाता और उसे इसकी वेदना और कसक का पता नाटक के अंत पर ध्यान देने पर चलता है.इस नाटक के किरदारों के एक एक कर मरने के साथ आप स्तब्ध होते हैं यह जानते हुए कि जिस रोग से ये ग्रसित(एड्स,कैंसर आदि)हैं उससे तो इन्हें मरना ही है पर कमाल ये है कि एक किरदार के मरने की खबर के साथ चंद पलों की खामोशी फिर वही जिंदगी जिंदादिली का नाम है मुर्दादिल क्या ख़ाक जिया करते हैं,के साथ कहानी आगे बढती है और दर्शक भी तुंरत सामान्य अवस्था में लौट आता है. निर्देशक चेतन दातार ने अपने निर्देशकीय में यह साफ कर दिया है कि-'यह नाटक मृत्यु के बारे में नहीं है/लेकिन/यह नाटक पूरी तरह जीवन के बारे में है ..../यह नाटक एड्स के बारे में नहीं है /लेकिन यह नाटक जीवन के बारे में है,जिसे हमारे बिछडे मित्रों की अनुपस्थिति के बावजूद पूरे जोश के साथ जिया जाता है./यह नाटक मुस्कानों,कहकहों और अपने प्रियजनों के साथ बिताये प्रसन्न क्षणों के बारे में है....यह पूरा नाटक वर्तमान और भविष्य ,दुःख और हंसी,कटु और नम्र का मिश्रण है./-'नाटककार का यह कथन पूरे नाटक के एक एक परत को खोल के सामने रख देता है और एक सहज सरल ढंग से इस नाटक को सामने रखता है. ध्यान देने वाली बात ये है कि एड्स का कथानक में एक किरदार जैसा ही महत्त्व होने के बावजूद दर्शक एक उम्दा नाटक देखते हैं ना कि स्वास्थ्य मंत्रालय का ,चलो कंडोम के साथ'का कैम्पेन .थोडी सी असावधानी से ऐसा हो सकने की पूरी संभावना थी.चेतन ने इस स्थिति को कुशलता से संभाला है.इस कोशिश में नाटक कई जगह धीमा पड़ता है पर फिर भी पूरे तौर पर इस नाटक का प्रभाव दर्शकों पर पड़ता है और वे इसका भरपूर आनंद उठाते हैं.एक और ख़ास बात -मैंने जब इस नाटक को देखा था (१२ दिसम्बर २००६)तब मुख्य पात्र गोपीनाथ मिरासे की भूमिका -टीकम जोशी (जवान गोपीनाथ)और अनूप त्रिवेदी(बीमार गोपीनाथ)ने निभाई थी और रंगमंडल को जानने वाले इस बात से इनकार नहीं करेंगे कि क्या किरदार निभाया होगा दोनों ने..इसी तरह एक पात्र है जो गोपीनाथ के हंसते खेलते समूह को नौटंकी मानता है वह किरदार है-समीप सिंह द्वारा अभिनीत दामू का इस पात्र के मरने का दृश्य आपको बरबस ही उदास कर देगा यही क्षण है नाटक में जब आप हंसते हंसते एकाएक सच्चाई के कड़वे पल का अनुभव करते हैं.यहाँ मौत एक सहज कविता बन जाती है. कुल मिलाकर रंगमंडल की एक और दमदार प्रस्तुति ( नाटककार-डॉ.चंद्रशेखर फनसलकर अनुवाद,डिजाईन और निर्देशन-चेतन दातार विडियो आर्ट और अनिमेशन-ज्ञान देव वस्त्र-सज्जा-कृति वी.शर्मा संगीत-भास्कर चंदावरकर )

( यह ४ साल पहले देखी इस प्रस्तुति की त्वरित प्रतिक्रिया है,आप इस नाटक के किरदारों दामू /गोपी नाथ मिराशे /नल्लु ब्रिस्टल -आपके साथ जुड़कर बाहर आते हैं - मुन्ना कुमार पाण्डेय )

5/28/09

लोकधर्मी शैली का सहज नाटक -"सदारमे"(रा.ना.वि.में)


नरहरी शास्त्री जैसे विख्यात और 'श्रीकृष्ण लीला ,कंसवध चरित्र,महात्मा कबीरदास,जालंधर,श्री कृष्णभूमि परिणय ,अदि पौराणिक नाटकों के लेखक की ही रचना है -'सदारमे'.जो आजकल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव में रंगमंडल द्वारा खेला जा रहा है.दरअसल यह नाटक कंपनी शैली का है,कहने का अर्थ यह है कि .नरहरी शास्त्री के अधिकाँश नाटकों का प्रदर्शन कर्नाटक की ऐतिहासिक ड्रामा कंपनी 'गुब्बी नाटक कंपनी'ने किया है और वे सभी प्रर्दशित नाटक पौराणिक कथाओं का आधार लिए हुए थे.कंपनी के आग्रह पर कि शास्त्री जी एक ऐसा नाटक लिखे जिसमे लोक-तत्वों की सादगी और खूबसूरती हो तब "सदारमे"लिखा गया.नरहरी शास्त्री जी ने इस नाटक की रचना कंपनी के आग्रह पर की. 'सदारमे का शाब्दिक अर्थ है-हमेशा सुंदर (सदा + रमे,सदा का अर्थ हमेशा और रमे संस्कृत शब्द के रम्य से बना है)लगभग एक सदी पूर्व लिखा गया नाटक नाट्यधर्मी नहीं बल्कि लोकधर्मी शैली में है.सीधी-सादी इस कहानी का उद्देश्य शुद्ध मनोरंजन करना है."-(ब्रोशर -सदारमे निर्देशकीय )दरअसल लोकधर्मी शैली के नाटकों का सबसे मज़बूत पक्ष उनका लोक-संगीत होता है.इस नाटक के कई गीत संवादात्मक तथा कई संवाद गीतात्मक हैं.निर्देशक का कौशल इस बात में दिखता है कि उन्होंने एक कर्नाटक शैली के संगीत को किस तरह से हिन्दुस्तानी संगीत के साथ प्रस्तुत किया है.हास्य-प्रधान घटनाओं का पुट लिए यह नाटक लगभग २ घंटे की अवधि का है. जैसा कि सभी जानते हैं कि मूल नाटक में २०० गाने हैं और यह पूरे रात चलता था.अतः ऐसे में नाटक को आज के सन्दर्भों में तैयार करना वाकई काबिले तारीफ़ है.पर कुछ बातें नाटक के प्रदर्शन की.नाटक का कथानक कुछ यूँ है - राजकुमार जयवीर की सांसारिक जीवन बिताने में कोई रूचि नहीं है.वो अपने पिता के राजगद्दी पर भी नहीं बैठना चाहता.वह दर्शनशास्त्र का अनुसरण करके ही काफी संतुष्ट है.राज उद्यान में उसकी मुलाक़ात एक माध्यमवर्गीय सुन्दर अबोध कन्या सदारमे से होती है,और सब कुछ बदल जाता है.,जयवीर के पिता उसकी शादी में बाधक सदरामे के पिता और भाई के तमाम शर्तें मान कर भी जयवीर और सदारमे की शादी करवा देते हैं.चूँकि सदारमे वणिक वर्ग से सम्बंधित है और उसके पिता और भाई नीचता की हद तक पतित हैं अतः सदारमे की परेशानियां शादी के साथ ही शुरू हो जाती है.अब जबकि नवदम्पति के पास सर छुपाने को जगह नहीं है ऐसे में परेशानियां आरम्भ होती हैं.सदारमे इस चुनौती को स्वीकार करती है और जीवन की हर बाधा को बुद्धिमता पूर्वक हल करती है और नाटक मंगल अंत को पाटा है. यह नाटक सहज तौर पर ही रखा गया होता तो भी इसका प्रभाव कमतर नहीं होता ,बावजूद इसके निर्देशक ने कई प्रसंग अनावश्यक डाल दिए है जैसे शराबी मुनादी वाले का प्रसंग.और कई हास्य प्रसंग अधिक लम्बे हो जाने के कारण भी उबाऊ लगने लगते हैं .तिस पर रेपर्टरी के कलाकारों के काम की दाद देनी होगी कि उन्होंने अपने काम से निराश नहीं किया है ..अमित पाठक ,दक्षा शर्मा ,निधि मिश्रा,मोहम्मद अब्दुल कादिर शाह और समीप सिंह ने हमेशा की तरह बढ़िया काम किया है.इन सबके बीच जो दो आर्टिस्ट तेजी से अपनी पहचान बनाते जा रहे हैं उनमे 'जोय मिताई'और सविता कुंद्रा का नाम उल्लेखनीय है.अन्त्य सोनी, बरंती सोनी के किरदार में अनूप त्रिवेदी और संजय मापारे फिट है . कुल मिलाकर रंगमंडल के नाटकों के शौकीनों के लिए यह नयी प्रस्तुति बहुत उम्मीदों वाली नहीं है ,रंगमंडल के कई उम्दा प्रदर्शनों के बीच यह नाटक उन्नीस ही है बीस नहीं. ******************************************* डिजाइन एंड डाईरेक्शन-बी.जयश्री हिंदी अनुवाद-शैलजा राय सेट डिजाइन-एम.एस .सथ्यु लाईट डिजाइन-अशोक सागर भगत संगीत-अंजना पूरी वस्त्र-सज्जा-मीता मिश्रा स्थल -अभिमंच (रा.ना.वि.के ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव की समय सारणी पिछले पोस्ट में जारी है)

5/27/09

आचार्य तार्तूफ़.. रा.ना.वि.रंगमंडल की उम्दा प्रस्तुति.


'आचार्य तार्तूफ़'मशहूर फ्रांसीसी नाटककार 'मौलियर' के विख्यात हास्य चरित्र 'तार्तूफ़'का आचार्य तार्तूफ़ के रूप में भारतीय अवतरण है.सत्रहवी शताब्दी के इस नाटक को वर्तमान समय से जिस तरह से जोड़ा गया है वह वाकई कमाल का है और इसका श्रेय भी सबसे अधिक इसके निर्देशक 'प्रसन्ना'को जाता है.
इसकी कथा का सार-संक्षेप यूँ है कि ओमनाथ नाम का बनिया जो मूलतः दिल्ली का रहने वाला है लेकिन आध्यात्मिक खोज के लिए पोंडिचेरी जाता है,जहां उसकी मुलाक़ात एक अर्ध फ्रांसीसी भारतीय खस्ताहाल शख्स से होती है.यह शख्स अपने को तार्तूफ़ का वंशज बताता है मगर असल में वह एक असफल अभिनेता है.एक टेलीविजन धारावाहिक के निर्माण के दौरान उसने संस्कृत के कुछ श्लोक याद कर लिए थे.वह अपनी खस्ताहाली से निकलने की जुगत में है.पोंडिचेरी समुद्री तट पर आचार्य तार्तूफ़ ओमनाथ को अपनी जाल में फंसा लेता है और ओमनाथ को लगता है कि एक आध्यात्मिक गुरु पाने की उसकी कोशिश पूरी हुई.
मोलिअर का तार्तूफ़ सिर्फ पाखंडी है.उसका यह भारतीय अवतार आचार्य तार्तूफ़ वह आधुनिक हिन्दू स्वामी या महाराज है जो करतबबाज भगवान् सरीखा बन चुका है.सत्रहवी शताब्दी के यूरोप में उभरे मध्यवर्ग ने तार्तूफ़ के उदय की पृष्ठभूमि बनायीं थी तो.उसका 'एक में दो'यानी 'टू इन वन'भारतीय संस्करण पुराने पड़ गए सांस्कृतिक मूल्यों और आधुनिक व्यापारिक वर्ग की आक्रामकता से जन्मा है.आज भारत में जो अर्थव्यवस्था उभर रही है उसमे आचार्य तार्तूफ़ जैसे स्वामी सहज रूप से पैदा होते हैं.

यह सच है कि प्राचीन काल से ही भारत में ऐसे धर्मगुरु होते हैं जिन्होंने देश के बाहर ही भारतीय आध्यात्म का निर्यात किया.लेकिन इस नाटक का आचार्य तार्तूफ़ इक्कीसवी सदी के भारत का वह स्वामी है जो बुद्ध ,कबीर या सूरदास जैसे आध्यात्मिक पुरुषों का विलोम है.इक्कीसवी सदी का यह स्वामी आस्था को फ़िल्मी गाना बना देने वाला सफल व्यापारी है.
आस्था का दुरूपयोग इस नाटक का एक विषय है,जो दूसरा है अभिनेता की प्रदर्शन क्षमता का बेजा इस्तेमाल.नाटक यह सवाल उठाता है कि एक अभिनेता और स्वामी में क्या फर्क है?दोनों अभिनय करते हैं.दोनों ही टेलीविजन ,अखबार और तरह-तरह के विज्ञापनों से अपना प्रचार कराते हैं.दोनों पैसा.राजनैतिक सत्ता और शोहरत चाहते हैं.फिर भी एक फर्क है.रंगमंच का कलाकार इमानदार है.वह कभी अपने किरदार को वास्तविक नहीं मानता.लेकिन आज का धर्मगुरु या स्वामी अपने को आस्था का मूर्तिमान रूप मानता है.
यदि आज के स्वामी सच्चे हैं तो मध्यकाल के भक्त क्या थे?सच्चा संत कभी अपने को साबित करने के लिए करतब नहीं दिखाता.न तो ईसा ने ऐसा किया न हज़रात मोहम्मद साहब ने.सूरदास सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं रूपकात्मक रूप से भी अंधे थे.महर्षि रमण कभी अपने छोटे से कस्बे तिरुअन्नामलाई से बाहर नहीं निकले.रामकृष्ण सिर्फ एक पुजारी रहे.ये सभी सादा जीवन जीते और वन कुसुम जैसे बने रहे.आज के अति-उत्साही स्वामियों की बाजीगरी ,उनकी प्रवचन शैली और चेले बनाने में उनकी कलाकारी की तुलना सादा जीवन जीने वाले संतों से की जानी चाहिए,तब दोनों में अंतर दिखेगा और हमारे आँखों पर उनके द्वारा या खुद के द्बारा चढाया गया पर्दा हटेगा.
प्रसन्ना ने अपने निर्देशकीय नोट में आगे लिखा है-'रंगमंच अपने उत्कृष्ट रूप में हमेशा सादा और सरल होता है.इस नाटक की प्रस्तुति में हमने सादगी के सिद्धांत का पालन किया है.हमने रंगमंडल के प्रचुर भण्डार का पुनः उपयोग किया है.सिर्फ वस्त्र-सज्जा और मंच सामग्रियों जैसी भौतिक चीजों का ही नहीं बल्कि मुहावरों ,कहानियों,हाज़िरजवाबियों और धुनों का भी.'-कुल मिलाकर यह हास्य नाटक आपको विशुद्ध मनोरंजन देगा ..
(इस नाटक की समय सारणी के लिए पिछली पोस्ट देखे.)-
 
आलेख,परिकल्पना एवं निर्देशन -"प्रसन्ना " संगीत-काजल घोष प्रकाश-परिकल्पना-पराग सर्माह नृत्य संरचना-निधि मिश्रा *(साभार-ब्रोशर 'आचार्य तार्तूफ़")

5/26/09

रा.ना.वि.में "ग्रीष्मकालीन नाट्य समारोह २१ मई से १७ जून तक..

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल प्रत्येक वर्ष की तरह इस बार भी हमारी गर्मियों को बेहतरीन बनाने के लिए अपने बेहतरीन नौ नाटकों के साथ फिर उपस्थित है.पेश है आपकी सुविधा हेतु समय-सारणी और अन्य विवरण -
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२१ मई /७:०० बजे -"सदारमे"       निर्दे.-बी.जयश्री (अवधि-१घ.५० मिं.)हिंदी ---अभिमंच सभागार 
२२ मई /७:०० बजे - "सदारमे"------------------'वही-------------------------------------------------
२३ मई /३:३० बजे और ७:०० बजे- "सदारमे"------------वही----------------------------------------
२४ मई /३:३० और ७:०० बजे -"सदारमे"----------------------वही------------------------------------
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२५-२६-और २७ मई /७:०० बजे -"उत्तररामचरित",  निर्दे.-प्रसन्ना (अवधि-२ घंटे)हिंदी--सम्मुख सभागार 

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२८-२९ मई  /७:०० बजे- "जात ही पूछो साधु की"-    निर्दे.-राजिंदर नाथ (अवधि-१घ.५० मिं.)हिंदी,-कमानी सभागार 
३० मई /३:३० और ७:०० बजे -जात ही पूछो साधु की"----------------वही------------------------------------

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३१ मई /३:३० और ७:०० बजे -"आचार्य तार्तूफ़"    निर्दे.-प्रसन्ना (अवधि-१घ.५० मिं.)हिंदी-  सम्मुख सभागार 
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१ जून और २ जून /७:०० बजे- "सदारमे"   निर्दे.-बी.जयश्री   (अवधि-१घ.५० मिं.)हिंदी    कमानी सभागार 
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३ और ४ जून /७:०० बजे - "मैं इस्तांबूल हूँ"    निर्दे.-मोहन महर्षि   (अवधि-२घ.१५ मिं.)हिंदी कमानी सभागार 
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५ जून ७:००बजे- "घासीराम कोतवाल"   निर्दे.-राजिंदर नाथ (अवधि-२घ.)हिंदी  कमानी सभागार 
६ जून ३:३० और ७:०० बजे -"घासीराम कोतवाल"---------------वही----------------------------------------

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७ और ८ जून /७:०० बजे - "१८५७ एक सफरनामा" निर्दे.-नादिरा ज़हीर बब्बर (अवधि-२घ.२० मिं.)हिंदी   कमानी 

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९,/१० और ११ जून /७:०० बजे -"राम नाम सत्य है"    निर्दे.-चेतन दातार (अवधि-१घ.५०मिन्त )हिंदी    श्रीराम सेंटर 
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१२ जून /७:०० बजे- "उत्तररामचरित"   निर्दे.-प्रसन्ना  (अवधि-२घ.)हिंदी   सम्मुख सभागार 
१३ जून /३:३० और ७:०० बजे -"उत्तररामचरित"-----------वही-------------------------------

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१४ जून /३:३० बजे और ७:०० बजे -"काफ्का-एक अध्याय"   निर्दे.-सुरेश शर्मा (अवधि-१घ.२७मिन.)हिंदी सम्मुख सभागार 
१५ जून /७:०० बजे-"काफ्का-एक अध्याय"-------------वही-------------------------------------------------

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१६ और १७ जून /७:००बजे -"आचार्य तार्तूफ़"   निर्दे.-प्रसन्ना  (अवधि-१घ.५० मिं.)हिंदी    सम्मुख सभागार 

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(*****कार्यक्रम के समय और नाटकों के प्रदर्शन में फेरबदल संभव है..)
इन बेहतरीन नाटकों के साथ गर्मियों को ठंडक दीजिये..)

5/8/09

'मेरी स्वाभाविकता'-(रत्नेश विष्वक्सेन की कविता)

रत्नेश विष्वक्सेन रांची कालेज (रांची)में हिंदी के लेक्चरार हैं.अपने आसपास और खुद पर बीतती चीज़ों के ऊपर नितांत निजी तौर पर उन्होंने बहुत कुछ लिखा है,वे अपनी लिखनी खासकर कविता के क्षेत्र में अपने तक ही तब रखा करते थे(मैं उनके स्नातक के दिनों की बात कर रहा हूँ)अब तो खैर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख छपते रहते हैं.प्रस्तुत है आपके लिए उनके निजी क्षणों का एक दृश्य:-
सांस की रफ़्तार /जैसे मीलों की थकान पीकर मंद हो गयी है/
बरौनियों में कुछ मलिनता/जो तय करती है अक्सर /
मेरी उदासी को.
कभी-कभी घबरा जाता हूँ,/घिग्गियों और धमकियों के बीच
,अपनी मनुष्यता से एक प्रश्न करता हूँ-उसके होने को लेकर.
नहीं बहा पाता हूँ हिचकियों में- तो कभी भरा हुआ हूँ ,हुआ ही रहकर/
काम लेता हूँ.
दर्द जैसे किसी चीज़ को ,
जो उलाहनों के बीच अटकी होकर भी,थाम लेती है मुझे/
कड़वाहट से भर उठता हूँऔर अफ़सोस के कुछ निशब्द नगमें ,
अव्यक्त पलकों को वजनी करने लगते हैं.
जब होता हूँ चिंतनशील अपराधी की तरह /
अपने सवालों के कटघरों में अनुत्तरित ,
तबलगता है कि
अपने जीवन के बाईसवें अध्याय में अब ढोंग नहीं कर पाता .
मैंने वर्ष नहीं अनुभव बिताये हैं
प्रत्येक पल की मिठास और चुभन को झुलसकर जिया है.
एक इमानदार कोशिश लगातार करता हूँ.,
जैसे जीने के लिए ,हर बार मरता हूँ.
हर रात सोने के पहले /सिरहानों के नीचे दर्द को,सहलाने के बाद/
मुझे अनुत्तरित होना पड़ता है.
हारना कोई नहीं चाहता ,मैं भी नहीं
पर जीतने के लिए ,उन्हें हराना होगा,
जिन्ही से सीखी हैं जिंदगी की बातें
तो भीतर हाहाकार उठता है.तब डर लगता है,
तब दुःख होता है.जब देखता हूँ
एक रात और बीत गयी एक दिन और जा रहा है
बहती नदी को देखकर मुग्ध होता हूँ.
हवाओं से हिलती फुनगियों पर प्रसन्न होता हूँ
पर हर रात जब,बिस्तर पर अपने सवालों सेघिरता हूँ/
तो मैं इस अनिर्णय पर /
रोता हूँ और मान लेता हूँ
मैं "स्वाभाविक" हूँ....

(यह कविता हिन्दू कालेज होस्टल में रत्नेश जी द्वारा उनके सेकंड इयर में लिखी गयी थी...उनकी पुरानी डायरी से मिली है.कविता का शीर्षक है-"मेरी स्वाभाविकता")

4/5/09

'जाति ही पूछो साधू की'-विजय तेंदुलकर (रा.ना.वि.में)एक उम्दा प्रदर्शन


विजय तेंदुलकर के व्यंग्य नाटक "जाति ही पूछो साधू की"देखते हुए,हरिशंकर परसाई की 'काक झकोरे'में संकलित एक व्यंग्य रचना 'होना एक इंटरव्यू का'बरबस ही याद आती है.ऐसा किसी साहित्यिक मेल के कारण नहीं बल्कि कथ्य के प्रस्तुति के लिहाज़ से.किसी भी नौकरी में अपने मनपसंद उम्मीदवार को लेने के लिए जिन नौटंकियों का सहारा लिया जाता है, उस खेल से हम सभी थोडा-बहुत वाकिफ हैं.शिक्षा जगत में ये कुछ अधिक ही है,इसमें दो राय नहीं हो सकती.वैसे सदियों से अपने आदमी को अधिकाधिक लाभ पहुंचाने का खेल चलता आया है.हिंदी में रीतिकालीन कवि बिहारी लाल जी ने लिखा भी है-"अपने अंग को जानिके /जोबन नृपति प्रवीण....."-यह तो आज तक चल रहा है और चलेगा.जैक नाम की यह चीज़ बहुत कायदे की चीज़ है जी सब कुछ पे भारी.आपके डिग्री,आपकी योग्यता ,आपके सपनों पर भी.अगर आप उच्च शिक्षा प्राप्त हैं और जैक नहीं है तो आपको ईश्वरीय अनुकम्पा की ही जरुरत होगी.ये जैक नाम का ब्रम्हास्त्र बड़ा अचूक है.विजय तेंदुलकर का यह नाटक ऐसे ही कारस्तानियों को परत-दर-परत सामने खोलता है.दरअसल यह नाटक केवल शिक्षा-तंत्र के ही नहीं बल्कि हमारी अन्य कई दकियानूसी धारणाओं,हमारी संस्थाओं और हमारी प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है.कहने को तो यह हास्य नाटक है पर जैसे-जैसे यह नाटक आगे बढ़ता है वैसे-वैसे नाटक का कटाक्ष तीक्ष्ण-से-तीक्ष्णतर होता जाता है.नाटक महिपत वभ्रुवाहन के लम्बे कथन से शुरू होता है,जिसमे वह अपनी वर्तमान स्थिति-परिस्थिति बताता है.महिपत ने बहुत जुगत और मेहनत से एम.ऐ .की परीक्षा तृतीय श्रेणी से उतीर्ण कर लेता है.इसके बाद महिपत के जीवन में नौकरी के आवेदनों और इन्कारों का दौर शुरू होता है.बाद में,वह यह समझ जाता है कि सिफारिसिज्म के बिना नौकरी मिलना मुश्किल है.वह इस ओर प्रयासरत हो जाता है पर व्यर्थ,यहाँ भी ऐन वक़्त पर कभी जातिगत तो कभी रिश्तेदारी वाली अड़चनें आ जाति हैं और बिना जैक का महिपत फिर वहीँ का वहीँ रह जाता है.एक दिन अचानक सुदूर क्षेत्र के एक कालेज से इंटरव्यू का बुलावा आता है और एकमात्र उम्मीदवार होने की वजह से उसका चयन "स्वर्गीय माताजी गयाबाई सूतराम कला एवं विज्ञान महाविद्यालय "में प्रोफेसर (लेक्चरर)के पद पर हो जाता है.अब यहाँ एक अलग किस्म की दुश्वारियां सामने आती हैं पर तमाम हथकंडे अपनाने के बाद भी महिपत अपनी नौकरी बचा नहीं पाता और "पुनर्मुषकों भवः "की स्थिति में आ जाता है.यानी शिक्षित बेरोजगार....महिपत के रोल में अम्बरीश सक्सेना ने प्रभावित किया है.हालांकि मंच पर उनकी संवाद अदायगी और बॉडी लैंग्वेज को देखते हुए हास्य अभिनेता 'विजय राज'याद आते रहे.इस बार पूतना के रोल में सविता कुंद्रा जंची हैं.संगीत रंगमंडल के कलाकारों का ही था और निर्देशन राजिंदर नाथ का.कुल मिलाकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के रंगमंडल की एक और उम्दा पेशकश.(स्थान-अभिमंच सभागार /दिनांक २ से ५ अप्रैल तक/समय -६ बजे सांय ४ और ५ को ३ बजे से एक्स्ट्रा शो भी था)

3/31/09

सपनों की कब्रगाह है-बॉलीवुड..


"इस मायानगरी में कई पहुंचे पर हर जुम्मे चढ़ते-उतारते सूरज के साथ ही अपने वजूद को बनाते-तलाशते खो गए"-
कुछ को उनकी मन-माफिक ज़मीन नहीं मिली कुछ को सही पहचान.जज्बे और जीवट वाला यहाँ फिर भी रुके और खुद को बनाने की जुगत में लगे रहे.यह बात तो सभी को मालुम है कि,इतने पुराने बरगदों के बीच किसी नए बिचडे को अपनी जमीन पकड़ने में क्या परेशानी होती है उसे आसानी से समझा जा सकता है.इन बिचडों को उन्ही के बीच का थोडी जगह बना चुका पेड़ ही पहचान सकता है और अमूमन ऐसा ही होता आया भी है.पीयूष मिश्रा पहले ऐसे शख्स या कलाकार नहीं हैं जिन्हें अपनी जमीन बनाने में समय लगा है.इससे पहले रंग-जगत से उधर को(सिनेमा जगत)जाने वालों की फेहरिस्त काफी लम्बी है.कुछ अभी उधर जाने की उड़ान भरने को तैयार बैठे अपने दिनों को मजबूत बनाने में लगे हैं और मुम्बई से अपने कनेक्शन तलाशने में लगे हैं.वैसे भी एन एस डी के तीन साल या रंगमंडल के लम्बे समय और अपना अमूल्य रंग-योगदान देने.,या फिर श्रीराम सेंटर इत्यादि जगहों पर ऐसे कई कलाकारों की जमात देखी जा सकती है.जो चाय के अनगिनत प्यालों के साथ अपने सपने बुन रहे हैं या उधर का जुगाड़ फिट करने में लगे रहते हैं.यह सही है कि प्रतिभा लोहा मनवा लेती है पर क्या हो अगर ये प्रतिभा सही समय पर असर ना दिखाए.तब स्वाभाविक है कि कुंठा और फ्रस्ट्रेशन बढती है.एक समय की नामचीन और बेहतरीन अभिनेत्री 'सुरेखा सीकरी'को सही पहचान अब टीवी पर 'बालिका वधू'के मार्फ़त मिली है और लोगों ने (आम औडिएंस)ने उनकी रेंज को देखा है.इसके उलट अभी भी कई ऐसे कलाकार हैं जो अभी भी छिटपुट किरदारों में यदा-कदा दिख जाते हैं.इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने साक्षात्कार में पीयूष मिश्रा का दर्द उनकी बातों में झलक जाता है(२९-०३-२००९),साथ ही ,हमें राजेंद्र गुप्ता से लेकर रघुवीर यादव तक का उदाहरण सामने नज़र आता है जिन्होंने रंगमंच से सिनेमा में अपनी पैठ बनायी.ओमपुरी और नसीरुद्दीन शाह तो खैर अब माईलस्टोन बन चुके हैं,सफल और बहुत ही सफल.इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि अकेले इन दो कलाकारों ने जो रास्ता और पहचान बनायीं है वह सभी के लिए प्रेरणा-स्त्रोत है.पर बात वही है कि सभी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता ,किसीको...-बहरहाल रंगजगत से जो बड़ा रेला सिल्वर स्क्रीन की ओर झुक रहा है उसके पीछे कौन सी मेन बातें हैं ?इस पर ध्यान देना अधिक जरुरी है.पीयूष मिश्रा जैसा समर्थ कलाकार यह कहने को मजबूर हो जाता है कि 'yes i was restless for success'-अभी भी रंगमंच इस स्थिति में नहीं आ पाया है कि एक कलाकार को उसकी जिंदगी को सहज और सफल तरीके से चला सके.यह भले ही हम कह दे कि ऐसा नहीं है और परिस्थितियाँ बदल रही हैं-पर क्या वाकई ?रंगमंच के ये पुतले क्यों बॉलीवुड में नकार दिए जाते हैं या उन्हें उनकी सही जगह नहीं मिलती इसको देखने की जरुरत है.जब तक सपने ज़िंदा हैं तब तक आदमी जिंदा है ..'पाश'ने लिखा है ना कि 'सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना'-सही में बॉलीवुड सपनों को सच करने का एक मंच देता है पर यह बात भी उतनी ही बड़ी और कड़वी सच्चाई है कि यह जगह सपनों की कब्रगाह भी है...
शेष अगली पोस्ट में.

3/14/09

पुते हुए चेहरों का सच..-"गुलाल"


भूल जाइए कि,हिंदी फिल्मों का मतलब पेड़ों,सरसों के खेतों और बल्ले-बल्ले ही है.अनुराग कश्यप जैसे नयी पीढी के निर्देशकों ,फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा में एक ऐसी लहर पैदा की है ,जिससे जोहर,चोपडा की मार से डरे दर्शकों को एक नयी सुकून मिलती दिख रही है.साल के शुरू में देव-डी और अब "गुलाल"अनुराग कश्यप को सामान्य से काफी ऊपर तक उठा देती है.गुलाल कई मायनों में देखने लायक है.चाहे वह इसके एक्टर्स हो,प्लाट हो,दृश्य हो,गीत संयोजन हो या फिर संवाद,अनुराग की बाजीगरी हर जगह १००%में उपस्थित है.गुलाल हर लिहाज़ से एक बड़े निर्देशक की फिल्म है.
फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि भले ही राजस्थान की हो पर यह पूरे भारत की सच्चाई है.राजपुताना का ख्वाब बेचकर अपने जातिगत,राजनीतिक हित साधने वाला दुकी बना (के.के.)हो या फिर लुंज-पुंज नपुंसकता की हद तक बेवकूफियां करने वाले दिलीप सिंह (राजा सिंह चौधरी)हो ,सभी अपने आस-पास के कैरेक्टर्स हैं,खालिस वास्तविक जीवन के कैरेक्टर्स.यूनिवर्सिटी या कालेज की राजनीति को ज़रा भी नजदीक से जानने और देखने वाला व्यक्ति इस फिल्म के एक-एक संवाद को अपने सुने या सुनाये बातों की तरह समझ लेगा कि आखिर किस तरह की मैनुपूलेटिंग वह करते है और क्या हथियार कैसा हथियार अपने राजनीतिक स्वार्थ साधने को करते हैं.अब भूल जाइए कि सत्तर का दशक कभी मशहूर था अपने छात्र आन्दोलन को लेकर.अब का आन्दोलन बदल गया है,इसको नियंत्रित करने वाली शक्तियां कम-से-कम ईमानदार और छात्र तो नहीं ही हैं.इस फिल्म को देखते वक़्त मुझे अपने आस-पास का दिल्ली विश्वविद्यालय का चुनावी माहौल याद आता रहा.रैगिंग के खौफ से छात्रों का नामर्दगी की हद तक सीनिअर्स की गुलामी करना और ऐसा नहींकरनेपरपिटना.राजपूत,भूमिहार,ब्राह्मण,दलित,जाट,गुज्जर,बिहारी,आदि ऐसे कितने ही समीकरण है जिनसे हमारे छात्र-संघ का गठन होता है.कितनी ही शराब की बोतलें,बाबाओं (दुकी बना टाईप)का प्रताप यहाँ चलता है वह किसी से छुपा नहीं है.अनुराग कश्यप ,पियूष मिश्रा जैसे लोगों ने यह सीन खुद अपनी आँखों से देख रखा है,और इसका सबूत गुलाल में दीखता है.....शराब भी पीता हूँ.......जब कोई कुछ नहीं करता तो ला (कानून)पढने लगता है.गुलाल इस मायने में भी अधिक ज़मीनी है कि इसमें आपको ना सिर्फ देशी बल्कि अंतर्राष्टीय राजनीति के भी दृश्य दिखते हैं(मुजरे वाले प्रसंग में-'जैसे इराक में घुस गया अंकल सैम'.).बहरहाल,गुलाल में चित्र भले ही राजपूती एंगल के सहारे से कही गयी है पर सच्चाई सभी ऐसे समाजों की है जो क्षेत्र,जाति,धर्म का सहारा लेकर चले और हमारे सिरों पे बैठ गए हैं और जाने-अनजाने हम उनके इस प्रयास में सहयोगी ही बन गए.नायक दिलीप इस तरह की समस्या से ग्रस्त युवक है.जो हम-आप में से कोई भी हो सकता है.दुकी बना उस ढहे या ढह रहे सामंती ढांचे का आधुनिक चेहरा है.इससे परे फिल्म में इस सामंती नकाब के पीछे का एक चेहरा वह भी है जहां औरतें बस एक ऑब्जेक्ट की तरह आती हैं.जो सदियों से चली आ रही मानसिकता को प्रत्यक्ष करती है जहां man is subject of desire and woman is the object of desire कह दिया जाता है.दुकी की पत्नी चाहरदीवारी में बंद रहने को अभिशप्त है,उसे यह जाने का हक़ नहीं कि उसके पति ने अपनी रात किसके बिस्तर पर बिताई है.हाँ किरण का किरदार एक पल को यह भ्रम दे सकता है कि वह इन औरतों से थोडा आगे है पर यह भी भ्रम जल्दी टूटता है,और वह भी अपने भाई के राजनीतिक स्वार्थ का सटीक गोली बनती है और सबसे कमाल की बात तो ये है कि उसे पता है कि वह क्या कर रही है और क्यों कर रही है.रणंजय सिंह का किरदार अपने बाप के हिज हाईनेस वाली दुनिया से नफरत करता है पर इस व्यवस्था में उसी पिद्दी से पर हिट फार्मूले की पैरवी करता दिख रहा है-"राजपूत हो?-असल...).और बाप की सामन्ती नौटंकी का विरोधी होने के बावजूद उसी सिस्टम के दुकी का सहयोगी बनता है.'गुलाल'मजबूत फिल्म नहीं बनती अगर पियूष मिश्रा जैसा किरदार उसमे अनुराग ने नहीं डाला होता.फिल्म में जिस तरह के तनाव को डाईरेक्टर ने रचा है,वह पियूष मिश्रा के अर्धपागल वाले किरदार के मार्फ़त और स्ट्रोंग बन गया है.-'इस किरदार के संवाद,कवितायें,गीत'-घर प्रतीत कराते है गोया आप थिएटर में कोई नाटक देख रहे हैं और यह पात्र एक नेपथ्य की भूमिका में नाटक के क्रियाव्यापार को पोशीदा तरीके से सामने ला रहा है.सही कहें तो 'गुलाल' एक्टरों या संगीतकार,या निर्देशक की फिल्म नहीं बल्कि कलाकारों की फिल्म है,जिसका एक-एक पहलु स्तब्ध करता है और फिल्म का एक-एक दृश्य घटनाक्रम जो-जो हमसे जुड़ते हैं हमारे सफ़ेद और भौंचक चेहरों पर इस ज़हरीले गुलाल को मल देते हैं.देव-डी के निर्देशक का यह यु-टर्न उसकी काबिलियत के लिए तालियाँ बजाने पर मजबूर कर देता है पर प्रश्न फिर भी वही रहता है कि 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है'-क्या असली डेमोक्रेसी यही है?पुरे फिल्म में एक नाम हर ओर दिखता है वह है-डेमोक्रेसी बीअर '-क्या वाकई ऐसे चिन्हों के मार्फ़त अनुराग वर्तमान प्रजातंत्र की हकीकत बयान कर रहे है?और इस तरह कि व्यवस्था में जो अच्छी सोच है वह साईड लाइन होकर मजाकिया हो गयी है या फिर दुकी बना जैसों के प्रजातंत्र में बस पुते चेहरे और मुखौटों में छुपी रहने को मजबूर हैं.कम-से-कम पियूष मिश्रा के किरदार को देख कर यही लगता है.
दरसल,अनुराग कश्यप की यह फिल्म राजनीति के पुते चेहरों के पीछे की हकीकत-बयानी का दस्तावेज है,जो कहीं से भी फंतासियों के माध्यम से अपनी बात नहीं करती ना-ही कोई आदर्श लेकर सामने आती है.बल्कि यह फिल्म नंगे सच को उसके नंगे रूप में ही हमारे सामने लाकर रख देती है और यह जता देती है कि इस काजल की कोठरी में कोई बेदाग़ नहीं है सबने अपने चेहरों पर गुलाल मल रखा है..कालिख तो खैर हैं ही लगने को देर-स्वर पर लगनी तो है जरुर या फिर क्या पता लग भी गयी हो हमें पता नहीं चल रहा या हम सच्चाई स्वीकारना नहीं चाहते.'गुलाल' को कहा जा रहा है कि देर से आई है पर 'देर आये दुरुस्त आये '......अनुराग कश्यप का काम हिंदी सिनेमा जगत के घडियाली आंसुओं और हैपी-हैपी दुनिया के फ़िल्मी व्यापारियों के बीच थोडा सुकून देने वाला है.कम-से-कम अपने लिए तो इतना इमानदारी से कह ही सकता हूँ.यह नए किस्म की पैदावार है (अनुराग कश्यप ,नवदीप सिंह,राजकुमार गुप्ता,रजत कपूर,दिबाकर बैनर्जी,सौरभ शुक्ल,विनय पाठक,पियूष मिश्रा आदि)जिनके जड़ें आम लोगों तक गहरे आती हैं और बड़ी उर्वर हैं.
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3/9/09

बस यही बचे थे?अब हाय-तौबा क्यों?


राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के निजी वस्तुओं की नीलामी की खबरें पिछले कई दिनों से सूचना-तंत्रों की सुर्खियों में थी.पता नहीं हर बार ऐसे मामलों पर हमारी गवर्नमेंट को क्या हो जाता है.शायद किसी कंट्री में ऐसा नहीं होता होगा जहां उसके फादर ऑफ़ द नेशन के साथ इतनी बेरुखी से पेश आया जाता है.बहरहाल,गांधीजी की चीज़ें अपनी सही जगह पर आ गयी हैं.देशवासियों को जय हो..जय हो...करना चाहिए.(शायद).पर,देखने वाली बात ये है कि हमारे जो वस्तुएं इतनी महत्वपूर्ण हैं, वह लाया किस आदमी ने ?जिस नशाबंदी और नशाखोरी के खिलाफ गांधीजी जीवन भर संघर्षरत रहे आखिर उसी फिल्ड के महारथी कहे जाने वाले शराब किंग "विजय माल्या"ने गांधीजी के इन सामानों को खरीद लिया और देश लेकर आये हैं,वह भी एक बड़ी भारी रकम देकर.अब अखबार वाले चिल्ला रहे हैं कि,आखिर एक शराब का व्यवसायी ऐसा कैसे कर सकता है,पर इतने से माल्या के इस काम का महत्त्व ख़त्म नहीं हो जाता.अजी जब हमारी सरकार इस हद तक सोई है कि अब राष्ट्रपिता तक से ही पोलिटिक्स कर दिया.अब तो ये भी नहीं कहा जा सकता कि ये (व्यवस्था)संवेदनहीन हो गयी है.कम से कम इस काम से विजय माल्या ने समाज के एक बड़े हिस्से का दिल जीत लिया है.और मुझे नहीं लगता कि इसके भीतर के सूत्रों (जो हो भी सकते हैं और नहीं भी ,इस पर सोचने की जरुरत बेमानी है)को तलाशना सुबह लाने के लिए रात के अँधेरे को टोकरी में भरकर बाहर फेंकने जैसा निरर्थक प्रयास ही होगा.अब चाहे एक शराब व्यवसायी ने ही ऐसा किया हो पर उस पर ऊँगली उठाना अपनी खीझ दिखाने और खींसे निपोरने जैसा ही होगा..

3/6/09

नौटंकी वाया रिक्शा-शो....जय हो...


कल अपने समाजवादी नीतिश कुमार जी "slumdog.."देखने गए.आज के सभी अखबारों की सुर्खियों में उनकी रिक्शानशीन मुस्कुराती हुई तस्वीर छाई हुई है.साथ ही,इस फिल्म के बारे में उनके उदगार भी कि"मैं ज़रा भुसकौल छात्र हूँ इसलिए अब तक फिल्म नहीं देख पाया था.अब इनको कौन बताये कि ये अचानक ही रिक्शा सवारी के साथ फिल्म में उस रास्ते से जाना जो पटना का सबसे भीड़ वाला इलाका है,कोई यूँ ही वाली बात नहीं थी.सुशासन को इस तरीके से दिखाने का अच्चा मौका है यह जबकि लोक सभा चुनावों की घोषणा कुछ ही दिनों पहले हो चुकी है.राजनीति के राजपथ पर लोहिया के लोग अब उनकी(लोहिया)तरह या सिद्धांतों के आस-पास कितने रह गए हैं,यह तो नहीं कहा जा सकता पर हाँ इतना जरुर है कि आज की राजनीती में अपनी जुगाली कैसे चलाते रहनी है यह बहुत अच्छे से पता है."slumdog..."तक पहुँचने का ये रास्ता वाकई लाजवाब है पर क्या करें इस खोपडी में यह बात आसानी से नहीं घुसती कि बस यूँ ही फिल्म देखने जा रहा हूँ.अपने उपलब्धियों के साथ ही अगर नीतिश जी जनता दरबार में जाएँ तो ही अच्छा है क्योंकि उनके फेवर में यह बात कम-से-कम (लालू यादव के बाद)है कि उनके किये कराये जा रहे कुछ काम लोगों को दिख रहे हैं,और बिहार की चुनावी बयार भी उनके तरफ बह रही है. पर,क्या करें,नेताजी लोगों का कलेजा इतना सा होता है कि चुनाव की लहर चलते ही अपने स्टंट चालु कर देते हैं.सोच कर ही कितना अच्छा लगता हैं ना कि एक बीमारू स्टेट उनकी मुखिया जी 'slumdog...'देखने रिक्शे से जा रहे हैं,कहीं वे अपने स्टेट की हालत का प्रतिबिम्ब ही तो नहीं देखने गए थे..जिसका अंत उन्हें (उन्ही के शब्दों में)आशावादी लगा..(वैसे फिल्म तो आशावादी है ही)? हो सकता है..पर अब इस सीजन की शुरुआत नीतिश जी अपनी इनिंग से खेल दी है अब उनके ही समाजवादी मित्र /गुरु भाई लालूजी की इनिंग आने ही वाली है.तो क्या इस बात की उम्मीद लगाई जाए की अगले वाले भाईजी भैसगाडी/बैलगाडी से सिनेमा देखने जायेंगे?पर तब तक शायद 'slumdog....'बदल जायेगी ...खैर कोई बात नहीं जल्दी ही "आ देखे ज़रा "रीलिज होने वाली है...इसे ऑस्कर तो नहीं मिला पर हाँ मौसम के लिहाज़ से टाईटल बढ़िया है...खेल शुरू है भावुक मत होइए अभी और तमाशे दिखेंगे ...पूरब से पश्चिम तक ,उत्तर से दक्षिण तक..तब तक सुर्खियाँ कैसे बटोरे अभियान का मजा लीजिये....जय हो

3/4/09

हंसिकाएं..कुछ हल्के-फुल्के पल.

जीवन में हंसने के मौके खुश रहने के मौके बड़े कम हैं.इसी तंगदिली के वक़्त तन्हादिली के वक़्त आपके चेहरों पे एक मुस्कान देता हूँ.कुछ देर के लिए कम-से-कम ये हंसी आपको सुकून दे.

"एक बहु और एक सास
उनके पुत्र थे -श्री प्रकाश
बैठे थे उदास ,अचानक
माँ ने कहा-बेटा कल्पना करो,
मैं और बहु दोनों गंगा नहाने,
हरिद्वार जायें,हमारा पाँव फिसल जाए,
और हम दोनों ही डूब जाएँ .
तो तू अपना धर्म कैसे निभाएगा ?
डूबती हुई माँ और बीवी में,
किसको बचायेगा?
साहेबान-कदरदान-मेहरबान
लड़का था परेशान
उसके समझ में कोई युक्ति नहीं आई
क्योंकि एक तरफ था कुँआ तो
दूसरी तरफ थी खाई
अचानक बीवी ने मुंह खोला यूँ बोला-
'हे प्राणनाथ !डूबती हुई माँ और बीवी में ,
अपनी माँ को ही बचाना
माँ की ममता को मत लजाना
अरे हमारा क्या है हम तो ज़वान हैं
मौत से भी जूझ जायेंगे और
हमें बचाने जिन्हें तैरना नहीं आता
वो भी कूद जायेंगे." -----(सुरेश नीरव की कविता)

काका हाथरसी का नाम आप सबसे अछूता नहं है ,उन्ही की चार लाईने
"देख सुन्दरी षोडशी मन बगिये खिल जाये
मेंढक उछले प्यार के जिया हिया हिल जाए
जिया हिया हिल जाये ,बिमारी है यह खोटी
रोटी भावे नहीं ,फड़कती बोटी-बोटी
पुष्ट पहलवां भी हो जाता ढीलम-ढीलू
दिन भर चिल्लाये बेचारा
-इलू इलू इलू इलू........(काका हाथरसी)

3/2/09

देखी ज़माने की यारी..कुछ किस्मत की ..(वाया-शफीक सलाम बॉम्बे फेम)


ऑस्कर अवार्ड के बाद चहुँ-ओर जय हो की धूम मची हुई है.slumdog .. से लेकर smile pinki के बाल कलाकारों की तारीफों में सभी ने कसीदे गढ़ डाले हैं.मुम्बई के स्लम में रहने वाले उन बच्चों के लिए राज्य सरकार ने मकान देने की घोषणा कर डाली है..पिंकी हम सब के लिए स्पेशल हो ही गयी है..सभी बच्चे देश भर के बच्चों का आकार ले चुके हैं.इसी बहाने परिधि से आने वाले इन दो-चार खुशकिस्मत बच्चों की किस्मत और भविष्य दोनों सुधर जायेंगे, कम-से-कम इसकी उम्मीद तो मुझे है.पर क्या वाकई ये खुमार उनके जीवन में एक सुनहरी बुनियाद रख पायेगा?अब के माहौल में तो उम्मीद हाँ की ही नज़र आती है.मेरे ऐसा सोचने के पीछे कोई बहुत दार्शनिक बात नहीं छुपी है बल्कि इन्ही बच्चों का एक अतीती चेहरा सामने है..जो ऑस्कर तो नहीं ले पाया था (निर्देशक डैनी बोयल जो नहीं थे)पर हाँ उस फिल्म का एक अहम् हिस्सा था,और ऑस्कर की देहरी तक भी पहुंचा था.slumdog...की खुमारी में डूबे और इसे एक महान फिल्म बताने वालों के लिए अंग्रेजी दैनिक "the hindu"के शुक्रवार १३ फ़रवरी के एडिशन में "beyond the slumdog alley"(kiswar desai)ने लिखा-"salaam bombay"is shocking and real-and completely authentic...nair's is clearly the really "indian"film.it does have a heart unlike "slumdog"...पर मेरा किसी फिल्म के महान बताने और किसी को उस महान (?)फिल्म के बरक्स खराब फिल्म से मतलब नहीं है.दरअसल,एक तरफ ये कलाकार हैं,जिन्हें मीडिया,समाज हमने और आपने अभी-अभी आँखों पे चढाया है..पर एक तरफ वह कलाकार भी है,जो आज बेंगलुरु की सड़कों पर आज ऑटो चलाकर अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहा है.ये कलाकार,मजदूर "शफीक"है.जिसने मीरा नायर की "सलाम बॉम्बे"में "कृष्णा चाय-पाव"की भूमिका निभाई थी,यह आज बेंगलुरु के झोपड़पट्टी में रहा रहे हैं.१९८८ में रीलिज मीरा नायर की इस फिल्म ने देश-विदेश में अनेक पुरस्कार लिए थे.इस फिल्म को "पावर्टी पॉर्न"कहा जाता है.खैर,इस शफीक पर 'अमर उजाला ने कल (१ मार्च)को एक खबर छापी है.उसे पढिये-"इसे किस्मत का खेल कहें या कुछ और सच यही है.......slumdog...फिल्म के बाल कलाकारों की सफलता उन्हें अन्दर तक ख़ुशी देती है पर वे यह कहना नहीं भूलते कि उनकी किस्मत मेरे जैसी नहीं हो.......मायानगरी बड़ी जल्दी चने के झाड़ पर चढाती है और गिराने में एक पल नहीं लगाती.बस उम्मीद प्रार्थना यही है कि इन बच्चों के अरमान और सपने अपने मुकाम तक पहुंचे.....वरना ज़िन्दगी हीरो को जोकर बनाते देर नहीं लगाती ..किस्मत कनेक्शन भी थोडा जरुरी है(अगर शफीक की माने तो..)

2/26/09

भावी ब्यूरोक्रेट्स के दिमाग में घुसा गोबर


कल से डीयू के क्रिश्चियन कालोनी में एक नौटंकी शुरू हो गयी है.जैसा कि आप सभी जानते हैं पटेल चेस्ट का यह इलाका मशहूर है इस बात से कि यहाँ से छोटे-छोटे शहरों से पढ़ कर आये बच्चे प्रशासनिक सेवाओं में जाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं.शायद इसीलिए इस जगह को प्रशासनिक सेवाओं में जाने वालों की फैक्ट्री कही जाती है.आंकडे जैसा बताते हैं कि इस कालोनी में दड़बेनुमा कमरों में लगभग ४००० से अधिक युवा अपनी ज़वानी को एक लक्ष्य के पीछे गला रहे हैं.इनके लिए रात-दिन का मतलब नहीं है.इनके डिस्कशन में अभी तक हमें देश-दुनिया की हलचलें ही सुनने में आती थी.डीयू के पीजी होस्टल्स में रहने वाले स्टूडेंट्स किसी बात की तथ्यात्मकता बताने के लिए यह कह देते रहे हैं कि 'भाई मेरी बात पे भरोसा ना हो तो पटेल चेस्ट /क्रिश्चियन कालोनी के लड़कों से पता कर लो'-पर अब यह स्थिति पिछले दो दिनों से बदली हुई है और रात भर जागने वाला यह इलाका आजकाल इधर-उधर मुहँ छुपाता फिर रहा है.पुलिस की दबिश इलाके में बढ़ गयी है और हमारे कल के ब्यूरोक्रेट्स आसपास के अपने अन्य मित्रों के यहाँ सिर छुपाते फिर रहे हैं..कुछेक की तो गिरफ्तारी भी हुई है पर यह नहीं पता चल पाया है कि वह वाकई स्टूडेंट्स थे या इन स्टूडेंट्स को भड़काने वाले खलिहर लोग.
हुआ यूँ कि दो दिन पहले क्रिश्चियन कालोनी के एंट्रेंस गेट पर किसी सिरफिरे ने कहीं से एक मूर्ति लाकर (रातों-रात)रख दी.पता नहीं इससे उसका क्या भला होने वाला था या किसी सो कॉल्ड ज्योतिषी ने बता दिया था कि ऐसा करने से शायद उसका सेलेक्शन देश की सर्वोच्च मानी जाने वाली सेवा में हो जायेगा.ध्यान रहे कि कुछ ही दिनों में सिविल सेवा के मुख्य परीक्षा के परिणाम आने वाले हैं.बहरहाल,यह इलाका घोषित तौर पर ईसाईयों का है और पता नहीं कबसे इनकी आबादी यहाँ बसी हुई है,ये यहाँ पर अपनी दुकाने चलाते हैं,जिनमें जैसा कि जाहिर ही है कि स्टेशनरी और प्रतियोगी परीक्षाओं के सामग्री ही मिलती है.ये सायबर कैफे ,पीसीओ बूथ चाय-बिस्कुट से लेकर पान-सिगरेट,जेरोक्स इत्यादि की दुकाने चलाते हैं,इनके सबसे बड़े ग्राहक यहाँ दडबों में रहने वाले छात्र ही होते हैं.यहाँ ईसाईयों का एक बड़ा कब्रिस्तान और एक गिरिजाघर भी है.इस मूर्ति के रखे जाने के बाद यहाँ के शांत माहौल में एकाएक गर्मी आ गयी है और यह स्वाभाविक भी है.इस मूर्ति को लगे चंद घंटे ही बीते थे कि किसीने मूर्ति हटा दी.अब क्या था इस काम का होना था कि हमारे भीतर का काला बन्दर तुंरत कुलांचे मारता हुआ इन भावी ब्यूरोक्रेट्स के भीतर समा गया और इन लोगों ने तुंरत ही हिन्दू धर्म के तथाकथित रक्षकों को बुला लिया और उनके नेतृत्व में बगल में ही रह रहे पादरी के घर पर रात में धावा बोला और जो कुछ कहा बस समझ ही लीजिये.स्थिति की नजाकत को समझते हुए पादरी ने हाथ जोड़ दिए और ये लोग जयकारा लगाते उसी गेट की ओर लौट आये.
मामला यहीं ख़त्म नहीं हुआ है उसी समय मूर्ति की स्थापना वहा हुई और दो-चार नौजवान जिन्हें अपना इहलोक सुधारने की चिंता रही होगी (?)वही धर्मरक्षा में सोये भी.बजरंगी बाबाओं और शिव के प्रतापी सैनिकों ने अपना तेज़ दिखाया और चल दिए या शायद वहीँ मंडरा रहे हैं पर कमाल देखिये कि हमारी प्रिय दिल्ली पुलिस का मौरिस नगर थाना ठीक इस गेट के सामने है और पादरी वाला काण्ड १५-२० पुलिस वालों के सामने हुआ था.एक प्रत्यक्षदर्शी नौजवान जो उसी कालोनी में रहता है वह ख़ुशी-ख़ुशी बता भी रहा था कि'भैया साले पुलिस वालों की हिम्मत नहीं हुई रोकने की हीहीही ...लड़के ज्यादा थे ना इसीलिए वो खाली मैनेज कर रहे थे."अब आज की स्थिति ये है की 'जौ के साथ घुन भी पिस रहा है,यानी जो इस काण्ड कुकर्म में शामिल नहीं हैं उनकी भी धर-पकड़ चल रही है.मैं सोचता हूँ कि अच्छे ब्यूरोक्रेट्स निकलेंगे यहाँ से..जिनके इतना पढ़-लिख लेने के बावजूद भी उनके दिमागों में कूड़ा ही भरा है.ऐसी ही कन्डीशन रही तो यही बाद में आदमियों को खाने वाले नेताओं के हथियार बनेंगे.और हंसी इस बात पर भी आ रही है कि छतीस करोड़ देवताओं को जो हमेशा स्वर्ग की सुन्दर-सुन्दर अप्सराओं से घीरे होते हैं,जहां रास-रंग खुशियाँ ही हर ओर बरसती हैं(?) उनके रहने की जगह अब किसी कालोनी का एंट्रेंस गेट ही बचा है.इससे पहले भी सडकों के बीच में विभिन्न धर्मात्माओं ने अपने-अपने प्रार्थना-घर बनाए थे अब ये ऐसे जगहों पे भी होने लगा.अब उस गेट पर खड़े होने वाले रेहडी वाले,ठेले वाले किधर जायेंगे,कोई भिखारी भीख कहाँ मांगेगा?वहाँ जो आस-पास आवारा पशु-जानवर कुछ-कुछ किया करते थे वह बेचारे किधर जायेंगे?भगवान जी(?) के लिए कोई माकूल जगह नहीं बची है क्या?या यह समझा जाए कि अब सिविल सेवा के लिए मेहनत नहीं बल्कि इसी तरह के नौटंकियों की जरुरत है....? ये तमाशा लंबा ना खिंचे तो ही अच्छा है पर इस मानसिकता का क्या करें..." इंडिया के नक्शे पर गाय ने गोबर कर है वर वह अब हमारे दिमाग तक चढ़ आया है"

2/24/09

अपने भीतर के काले बन्दर को देखने की कमज़ोर कोशिश...दिल्ली-६


दिल्ली-६ कई मायनो में ख़ास फ़िल्म होते-होते रह जाती है.यह अक्सर होता है कि जब कोई निर्देशक एक बढ़िया फ़िल्म दे देता है तब उससे दर्शकों की उम्मीदें अधिक बढ़ जाती हैं.क्योंकि तब वह अपना एक दर्शक वर्ग बना चुका होता है.'रंग दे बसंती'से राकेश ने हिन्दी सिनेमा में २१वी सदी के यूथ की चिंता और सोच को एक रचनात्मक रूप देते हैं और लगभग स्तब्ध करते हैं.यही इस फ़िल्म को बड़ा कद देती है.इस फ़िल्म ने दिल्ली-६ के लिए पहले से ही एक पृष्ठभूमि तैयार कर दी कि अब राकेश क्या देने जा रहे हैं.दिल्ली-६ का ताना-बाना ४ स्तरों पर तैयार करने के बावजूद भी राकेश फ़िल्म को संभाल नहीं पाये हैं.टुकडों-टुकडों में सभी को यह फ़िल्म पसंद आ सकती है या आई है,पर राकेश के निर्देशक कद के लिहाज़ से यह सतही होकर रह गई है.फ़िल्म का एक एंगल वहीदा रहमान के दिल्ली-६ से जुड़ता है जहाँ वह अपने अन्तिम दिनों के लिए अपनी मिटटी में आती है और साथ में उनका पोता अभिषेक बच्चन (रोशन)भी है.पर कुछेक घटनाओं के बाद दादी का यह कहना कि "अब तो यहाँ मरने का भी दिल नहीं करता.."वर्तमान राजनितिक-सामाजिक स्थितियों की ओर इशारा कर देता है.आख़िर दिल्ली-६ ही नहीं पूरे भारत के कंपोजिट कल्चर को 'अयोध्या,गोधरा,और मालेगाँव जैसी घटनाओं ने प्रभावित तो किया ही है और वह भी बड़े स्तर पर.दूसरा एंगल ओमपुरी-पवन मल्होत्रा के परिवारों,मुनीम जी-मुनीम की जवान बीवी और फोटोग्राफर ,मौलवी और कुछ मुसलमान किरदारों के साथ जुड़ता है.फ़िल्म के पहले हाफ में ये एंगल दिल्ली के कस्बाई कल्चर को ठीक-ठाक ढंग से दिखा जाती है और आप मुस्कराते हुए इंटरवल की देहरी पर आ पहुँचते हैं. सोनम कपूर और अभिषेक की केमेस्ट्री ठीक-ठाक लगी है.पर एक फ़िल्म को एक स्तर देने में स्क्रिप्ट का भी योगदान होता है जो अन्तिम तक दर्शकों को बांधता है,बस इसी की कमी अन्तिम के १५-२० मिनट्स में खल जाती है जब राकेश मेहरा फ़िल्म के ट्रीटमेंट के साथ रिस्क नहीं ले पाते और हीरो को जिंदा रख देते हैं.ऐसा शायद दर्शकों की डिमांड को ध्यान में रख कर किया गया है पर,यह समझ नही आता कि ये समझौता राकेश ओमप्रकाश मेहरा जैसे डाईरेक्टर को क्योंकर करना पडा.?बहरहाल,तीसरा एंगल रामलीला वाले प्रसंग का है जिसके दोहों और चौपाईयों के इर्द-गिर्द फ़िल्म की घटनाएं अपना आकार ले रही हैं.फ़िल्म के इस हिस्से में राकेश का कौशल दिखा है.शायद राम के रामराज्य का कोंसेप्ट निर्देशक के ध्यान में था ...तभी तो अन्तिम के दृश्यों में राकेश एक यूटोपियन समाज की रचना करते दिखे हैं..अतिशय प्रयोग भी कभी-कभी बुरा हो जाता है.'मसकली 'की मटकन ही फिम के अंत तक याद रह जाती है,यह रंग दे बसंती के निर्देशक की असफलता है.हिंदू-मुसलमानों के आपसी बैर और उसमें नेता-साधु गठबंधन तथा काले बन्दर के त्रियोग से हम सब के भीतर झाँकने की पुरजोर कोशिश है.फ़िल्म के दो किरदार प्रभावित करते हैं-पहला वह जो आइना लिए दिल्ली-६(पता नहीं चांदनी चौक का माहौल रचने के बाद निर्देशक अपने चरित्रों के मुहँ से बार-बार 'हम दिल्ली-६ वाले..जुमला क्यों कहला रहा है.भला कोई अपने पिन कोड से अपने ट्रेडिशन को बताता है क्या ) के मुख्य किरदारों के चेहरों के आगे कर देता है,यह कैरेक्टर कम उपस्थिति के बावजूद फ़िल्म के बाद भी याद रहता है.किसी ने सही ही लिखा है कि "आईना देखने से डरता है आदमी/कहीं उसकी ख़ुद से मुलाकात न हो जाए" -पर,जब फ़िल्म में नायक को इस आईने को दिखाए जाने की व्याख्या करते दिखाया जाता है तो दर्शक एक बार फ़िर कोफ्त से भर जाता है. फ़िल्म देखने वाले किसी भी सामान्य व्यक्ति को इसकी व्याख्या गैर-जरुरी लगेगी.-दूसरा किरदार 'जलेबी'(दिव्या दत्ता) का है,जिसमें इस उदार,संस्कृत,सामाजिक सद्भाव के अग्रदूत भारतीय समाज का फर्जी चेहरा बेनकाब होता है.दिल्ली-६ के बढ़ते बच्चों को 'जलेबी'जवान करती है,कोतवाल के जवान धड़ की मांसल जरुरत का साधन है और सबका कूड़ा साफ़ करने के बावजूद मन्दिर के भीतर आने का अधिकार नहीं रखती.राकेश ओमप्रकाश ने बढ़िया कलाकारों का चयन किया है पर २ घंटे १८ मिनट की फ़िल्म में कुछ तो अंत तक अंट नहीं पाये.रघुवीर यादव जैसा कलाकार रामलीला ही गाता रह जाता है और आप यदि ध्यान से ना देखे तो पता भी नहीं चलेगा कि यह रामायण गा कौन रहा है.
समस्या फ़िल्म के पूरे ट्रीटमेंट को लेकर नहीं जनमती बल्कि अंत के २० मिनटों को लेकर है.रंग दे...में फ़िल्म के वह सारे किरदार जो पहले हाफ में 'मस्ती की पाठशाला ...'-को ही अपना लाईफ मंत्रा बताते हैं वह कैसे इस पूरे सिस्टम से युवा असंतोष की पहचान बन जाते हैं और शहीद हो जाते हैं.इसी ट्रीटमेंट ने रंग दे...को एक क्लासिक फ़िल्म का दर्जा दिया और हमारी अपेक्षाएं 'दिल्ली-६'से बढ़ गई.पर,अफ़सोस इस बार राकेश रिस्क नहीं ले पाये..फ़िल्म का ट्रेडिशनल एंड रखने के बजाये ओपन एंड ही रहता और रोशन(नायक) का किरदार उस दंगे की बलि चढ़ जाता तो मज़ा कुछ और ही होता.क्योंकि आज जिस तरह का परिवेश हमारे आकाओं (तथाकथित)ने रच दिया है उसमें ह्रदय-परिवर्तन की बाद थोडी अटपटी लगती है,एक दूसरे को मारने कूटने पर आमादा भीड़ यदि एक भाषण से रास्ते आ जाए तो हमारे आसपास ऐसे सैकडों भाषणबाजिये हैं.हिंदू धर्म में लाईफ को सर्कुलर माना गया है कि-'जीवन का अंत नहीं होता'-इसी कारण हमारे नाटकों में सुखांत का प्रावधान है और इसीसे सिनेमा में भी यह आया पर क्या हमारा सिनेमा ऐसा ही रहा है..नहीं .फ़िर भी ...राकेश से ऐसे अंत की उम्मीद नहीं थी.फ़िल्म चल रही है ,हिट भी हो जायेगी पर यह एक बढ़िया निर्देशक के सतही काम का नमूना है.. काश,अपने भीतर छुपे इस काले बन्दर को हम सभी देख लेतें .....तब शायद मसकली और बढ़िया से मटक पाती.

2/23/09

"जय हो"- रहमान,गुलज़ार साहब ,और रेसुल...


ऑस्कर अवार्ड्स का पिटारा खुल गया है और 'slumdog...'ने ८ मूर्तियाँ अपने हिस्से में डाल ली हैं.वाकई यह बहुत बड़ी खुशखबरी है कि भारतीय पृष्ठभूमि की ये कहानी दुनिया भर में पसंद की गई है.सभी चैनल वाले चीख-चीख कर बता रहे हैं कि भारतीय सिनेमा जगत में कमाल हो गया.पर क्या वाकई?दरअसल ,इस फ़िल्म के ऊपर मेरा कोई कमेन्ट नहीं है कि यह बुरी है,आप सभी की तरह मुझे भी फ़िल्म ठीक-ठाक लगी .पर क्या करूँ.१०० से ऊपर की रकम खर्चने के बाद भी मुझे मीरा नायर की "सलाम बॉम्बे"याद आती रही..बहरहाल यह एक अलग बात है. मेरी कठिनाई थोडी-सी इस बात को लेकर है कि अगर अपने डैनी भइया का नाम इस फ़िल्म के निर्देशक के रूप में नहीं जुड़ा होता तो क्या ....?और हमें खुशी किस बात को लेके होना चाहिए ..इस फ़िल्म को ८ ऑस्कर मिले हैं इस बात को लेकर या अपने रहमान,गुलज़ार साहब,रेसुल पोकुट्टी ने अपने बेमिसाल काम से वेस्टर्न हेकड़ी को अपने आगे झुका ही लिया.कम-से-कम मुझे तो यही लगता है कि,अपनी फ़िल्म है का राग जो बघार रहे हैं और खुशी के गुब्बारे सरीखे फूले जा रहे हैं उन्हें इतना तो समझ ही लेना चाहिए कि "जय हो...."-वाला अपना ऑस्कर है ...पर साथ ही ,"स्माईल पिंकी"की टीम को बधाई .रियली इस टीम ने इस वृतचित्र के माध्यम से उनलोगों के लिए एक राह खोली है जो सामाजिक मुद्दों की फिल्में (छोटी ही सही)बनाते हैं पर बड़ा मंच नहीं ले पाते और अंततः ये जिनके समस्याओं को लेकर बनाई जाती है उन्ही से दूर रह जाती है.
वैसे चाहे कुछ भी हो इस शर्मीले और सौम्य संगीतकार ने एक ऐतिहासिक पत्थर पे अपना नाम दर्ज कराकर हमारा मान बढ़ा दिया है..."जय हो".....रहमान.

2/15/09

यह एक्सटेंसन है देवदास का-देव डी


याद कीजिये जब आंखों में आँसू भरकर जाते हुए देवदास से चंद्रमुखी पूछती है-'फ़िर कब मिलना होगा?'-और देवदास इस बात को कहता है कि यदि अगला जन्म होता है तो मैं तुमसे दूर नहीं रह पाऊंगा '-संवाद कमोबेश ऐसा ही है -देवदास मर जाता है प्रेम की कसक दिल में लिए। पारो का जाने क्या हुआ(जैसा शरतचंद्र ने अपने नावेल में लिखा)। बहरहाल,देवदास देखने के बाद जो मन पे एक भारी पत्थर सा पड़ जाता था,वही उसको एक ख़ास फ़िल्म बनाता था। इस ट्रीटमेंट को चाहे वह बरुआ हो,रॉय हों ,या फ़िर भंसाली..सभी ने यूज किया । अनुराग कश्यप इन सबमें इसीलिए ख़ास हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने इसे पिछली फिल्मों की तरह सिर्फ़ भावनाओं का जाल पहना कर नहीं पेश किया -उन्होंने फ़िल्म में लगभग सभी जगहों पर नयेपन को दर्शाया है। इन्ही कुछ बिन्दुओं पर देव डी

१- पारो चमत्कृत करती है-याद कीजिये पिछली तीनों पारो को ,जो प्रेम और स्वाभिमान की मूर्ति थी,और अपने देव के लिए अंत तक आह भरती रही थी। देव डी की पारो इस maamle में अधिक क्रांतिकारी है। चाहे उसे अपने प्यार को जताना हो(गद्दे सायकल पे लादकर गन्ने के खेत में जाकर देव को अपने प्यार का अहसास कराना),अपने प्रेम का प्रतिदान ढीठाई से माँगना हो,या देव से उसके बारे में उल्टा-सीधा कहने वाले को सबक सिखाना । पर,इन सबके अलावे जो ख़ास बात उसके व्यक्तित्व की है वो ये कि ये पारो ना अपने सेक्सुअलिटी को लेकर कहे गए तीखे बातों को भूलती है ना ही फ़िल्म में अपने प्यार के टूट जाने का मातम मनाती है। यहाँ तक कि जब उसे मौका मिलता है तो उसे सूद समेत वसूलती है-"तेरी औकात बता रही हूँ...(देव से होटल के कमरे में का दृश्य याद कीजिये),देवदास को भव्य नायकों वाला व्यवहार नहीं बल्कि ठोस बराबरी का हिसाब किताब ,आख़िर पारो हमेशा क्यों भुगते..... । एकदम २१ वी सदी की नारी ..जो अपने शर्तों पर प्रेम करती है,फ़िर चाहे वह सेक्सुअलिटी के स्तर पर हो,या सामाजिक प्रदर्शन के स्तर पर..ये लड़की बरबस ही मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है..फ़िर ये भी कि अपनी शादी में जी खोल कर नाचने का साहस अब भी कितनी लडकियां कर पाती हैं..

२-चंदा को अबकी निराश नही होना पडा ...
एक ऐसी स्त्री जिसने प्रेम की खातिर अपना सब कुछ छोड़ दिया और प्रतिदान में उसे मिला ये कि,शायद पिछले जनम में उसका देव उसे मिल जाए...कल कि किसने देखा है...देवदास के सभी पुराने संस्करणों में यह हूक हमारे दिल में रह ही जाती थी कि ओह..बेचारी चंद्रमुखी...-पर,अनुराग ने इस चंदा को उस हूक के साथ सीन से गायब नहीं किया है बल्कि देवदास को अंततः उसीको मिलते दिखा कर उस विरहाकुल प्रेम का सुखद अंत करा दिया है...यानी दो, समाज से लगभग दुत्कार दिए गए ,व्यक्ति अंततः अपनी दुनिया ख़ुद रचते हैं और जीवन को चुनते हैं ना कि कोरे स्याह और भयानक नैराश्य को..चंदा लकी रही है इस बार ....वैसे भी इस विदेशी बाला चंदा(कल्कि)ने किरदार को जीने की भरपूर कोशिश की है और सफल भी रही है.
3-देव डी यानी फुल पैकेज ऑफ़ मनोरंजन...
अपने पूर्वर्ती सभी देवों की तरह ये देवदास उप्स देव डी ..सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाता और इतना ही नही यह कान का कच्चा भी है.तभी तो अपनी बेवकूफी में अपने प्रेम के स्त्रीत्व को ही गाली दे बैठता है..पर मानिनी नायिका पारो टेसुए नहीं बहती बल्कि जवाबी हमले में अपनी शादी का जश्न मनाती है.पर इन सब के उलट देव का यह किरदार अधिक पोजिटिव है,मेरे ऐसा कहने के पीछे दो बातें है पहली तो ये कि-बार -बार कई बार मैंने देवदास फिल्में देखी हैं और हर बार की तरह इस बार भी इस बेचारे देवा को मरते देखने का साहस अब नहीं था -शायद अनुराग नई पीढी की इस डीमांड को समझ गए थे....इसलिए यह देवदास उप्स (फ़िर गलती हो गई)देव डी (ढिल्लों)अंत में जीवन की कड़वी सच्चाई को अक्सेप्ट करता है और अपनी चंद्रमुखी को झूठा दिलासा नहीं देता कि अगले जनम में शायद...और उसके साथ वह अपने प्रेम के नए संसार में निकल पड़ता है..सच मानिए आप लोगों की बात तो नहीं जानता पर हाँ ...मुझे ये बड़ा सुखद लगा कि चलो अब देव प्रैक्टिकल हो गया है अपनी नादानी से बाहर निकल के.साथ ही पार्श्व से आते शब्द इस दृश्य को और अधिक जिंदादिल बना देते हैं-'भर ले ज़िन्दगी रौशनी से भर ले'-यह देव हमारे अपने आसपास का है ..अब शायद ऐसे नौजवानों को जो पिछले प्रेम में धोखा खा गए हैं और अब फ़िर से एक नई गाँठ बाँधने की जुगत में हैं उन्हें शायद देव डी ही बोला जाने लगेगा ....देवदास बनने का ज़माना गया यह २१ वी सदी है यहाँ निराशा नहीं .इस प्रसंग में एक और बात आती है कि -चुन्नी (दिव्येंदु भट्टाचार्य)दिल्ली के बाहर से आने वाले लड़कों -नौजवानों के बीच पसरे इस जुमले को बड़े चुटीले अंदाज़ में परोसता है कि दिल्ली की कुडियां ...बाप रे बाप...-वह देव को कहता है-दिल्ली में बिल्ली मारो ,खा लो,पालो मत.-क्या वाकई ?अनुराग का इस शहर से खासा जुडाव रहा है...
-------शरतचंद्र के साथ कोई अन्याय नहीं हुआ .ये कोरी भावुकता है...शरत बाबु की कालजयी कृति से अनुराग ने महज अपने हिसाब से मैटेरिअल लिया है .और अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा भी है कि २१वी सदी देवदास है तो हमारे सामने यह तो एकदम साफ़ है कि हम जो देख रहे हैं या देखने जा रहे है वह धोती वाला पारंपरिक नायक नहीं है बल्कि ऐसी पीढी का युवक है अपने तमाम झंझावातों के बावजूद अंततः जीवन में यकिन रखने वाला है.इसके लिए उन सो कोल्ड सामाजिक वृतों का कोई मायने नहीं हैं जिनका कोई सर-पैर नहीं है..इसीलिए वह समाज की तमाम सच्चाईयां स्वीकारता है और एक ऐसी औरत को संगिनी स्वीकारता है जिसका वजूद इस समाज में कम-से-कम स्वीकार वाला तो नही ही है.-स्वीकार का ऐसा साहस यही नया देव ही दिखा सकता है-यह कहीं से शरत बाबु के आदर्शों का ,प्रेम का मजाक नहीं बनाता बल्कि उसको एक नई उंचाई देता है... अनुराग कश्यप कहीं से कुछ फालतू नहीं ठूंसते ....१८ गाने होने के बावजूद सभी फ़िल्म में सिचुएशन के प्रवाह को बनाने में ही मददगार होते हैं......."इमोशनल अत्याचार"का यह अनुरागीय तरीका वाकई अनुराग के लिए सैल्यूट करने पर मजबूर करता है.फ़िल्म के अन्य पक्षों पर क्या कहा जाए...सभी पूरे हैं फुल टू ढंग के और अपने-अपने खांचे में एकदम फिट.हिन्दी फिल्मजगत को इस बार एक नए किस्म की फ़िल्म मिली है जो अधिक समय तक याद रखी जायेगी नंबर १ और चोपडाज की स्टीरेओ टाइप फिल्मों से राहत देने वाली............

1/12/09

संगीनों के साये में नाटक..जिन्ने लाहौर नई वेख्या ...

जैसा कि आप सभी जानते हैं,राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का भारत रंग महोत्सव इन दिनों राजधानी में चल रहा है,इसमे देश-विदेश के कुछ बेहतरीन ड्रामे प्रर्दशित हो रहे हैं या होने वाले हैं।इसी कड़ी में कल रात पाकिस्तान के "तहरीक-ऐ-निसवां(कराची)की नाट्य-प्रस्तुति थी-'जिन्ने लाहौर नई वेख्या'-इस नाटक के लेखक अपने ही देश के (क्या करें ऐसा कहना पड़ रहा है)असग़र वजाहत हैं। इस नाटक में ऐसा कुछ नहीं है जो किसी ख़ास मुल्क या धर्म को लेकर कुछ अनाप-शनाप लिखा गया हो,चुनांचे ये जरुर है कि ये नाटक धार्मिक कठमुल्लेपन के ऊपर इंसानियत का पैगाम देती है। कहानी बस इतनी है कि 'विभाजन के बाद लखनऊ का एक मुस्लिम परिवार काफ़ी समय रिफयूजी कैम्पों में बिताने के बाद अपने बसाहट के लिए नए आशियाने की तलाश में है। लाहौर में सरकारी तौर पर उन्हें एक रईस हिंदू परिवार की छोड़ी हुई हवेली उन्हें मिल जाती है। पर परेशानी ये है कि उस हवेली में उस हिंदू परिवार के मुखिया की माँ अभी भी रह रही है। पहले थोड़े हिल-हुज्जत के बाद सब उस बुढ़िया को घर के बुजुर्ग की तरह मानने लगते हैं यहाँ तक कि मोहल्ला भी उसे इसी तरह से इज्ज़त देता है। मगर इस घर में बुढ़िया की मौजूदगी से कुछ स्थानीय गुंडों को गुस्सा आता है। इनका मानना है कि पकिस्तान सिर्फ़ मुसलामानों का है। इसके लिए वह तमाम जुगत लगाते हैं पर मौलवी तक से उन्हें फटकार मिलती है। अंत में बुढ़िया मर जाती है और उसे मोहल्ला मौलवी साहब के कहे अनुसार हिंदू रीति-रिवाजों से जलाने के लिए सभी मुहल्ले वाले जमा होते हैं। कट्टरपंथियों को यह बात नागवार गुजरती है और वह नमाज़ पढ़ते मौलवी की अंधेरे में हत्या कर देते हैं। कारान बस इतना कि वह कठमुल्लेपन का शिकार मौलवी नहीं था। नाटक टेक्स्ट में यहाँ ख़त्म नहीं होता पर इस नाटक के निर्देशक द्वय शीमा केरमानी,अनवर जाफरी ने नाटक का अंत यही किया है। उनका मानना हैं कि -
'मेरे लिए विभाजन की सभी कहानियां एक ख़ास मायने रखती हैं,परन्तु एक कहानी जो कि न केवल सच्ची घटना पर आधारित हैं,बल्कि इसके साथ उर्दू के प्रतिष्ठित कवि नासिर काज़मी भी जुड़े हैं,जो कि अम्बाला से लाहौर आए। इससे ये कहानी और भी अधिक सम्मोहक हो जाती हैं।..................हमने कई दृश्यों को संपादित किया हैं जिससे कि पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरवाद के अनुरूप नाटक को प्रासंगिक बनाया जा सके। '(ब्रोशर-जिन्ने लाहौर नई वेख्या)
एक तरफ़ कलाकारों को कला को धर्म और राजनीति से परे रखने की बात की जाती हैं और कल जो हुआ वह उन्ही कुछ धार्मिक कठमुल्लों की वजह से हुआ । अपने लगभग ६ वर्षों के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के नाटकों को देखने के क्रम में मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा जिससे मुझे कुछ अजीब सा लगे। अमूमन होता तो ये आया रहा हैं कि यहाँ की फिजाओं में कुछ सुकून जैसा लगता हैं सो ऐसे भी आते-जाते हफ्ता दस दिन में एक चक्कर मार ही आता हूँ। कल का प्ले अभिमंच में था। जिसकी इंट्री भी मेन गेट से ही होती रही हैं पर कल रात तो हद ही हो गई । अभिमंच में पीछे की तरफ़ से इंट्री थी। सुरक्षा व्यवस्था इतनी चाक-चौबंद की पाँच चक्रीय जांच के बाद ही इंट्री मिल रही थी। 'टिकट हाथ में ले लीजिये,मोबाईल ओन कीजिये ,हेलमेट इधर जमा कराइए इत्यादि-इत्यादि'। वह तो अच्छा हुआ कि इतनी टाईटसुरक्षा के बावजूद दर्शकों को अपने जूते-चप्पल पहन कर अन्दर जाने की इजाज़त थी। दर्शकों के ज्यादा हथियार बंद, सादी वर्दी में भी पुलिस का इन्तेजाम ,वह भी क्यों ...दरअसल कुछ दिमागी फितूर के मारे सो कॉल्ड "देशभक्तों "ने इस प्रदर्शन को लेकर धमकियां दी थीं। और सवाल भी खड़े किए थे कि जब देश के हालत इतने ख़राब दौर में हैं(?)तब पाकिस्तानियों को नाटक प्रदर्शन की परमिशन क्यों दी गई। अब इन्हे कौन समझाए ?हमसे तो नहीं हो सकता भैया । कल इतनी दिक्कतों के बाद जब नाटक खेला गया तो एक यादगार प्रदर्शन के हम भी भागीदार हुए। दर्शकों की एक-एक ताली ऐसे देशभक्तों और कठमुल्लेपन पर तमंचे की तरह लग रहा था। एक पल को ऐसा लगा ही नहीं कि हम किसी पराये का कुछ देख रहे हैं या ये कि ये ज़बान हमें समझ नहीं आती। फ़िर ये भी कि दादी का चरित्र हमारे आसपास का था। उनकी चिंता दर्द सभी कुछ तो सिर्फ़ आम आदमी का था। इंसानियत की परिभाषा गढ़ने और ये बताने कि धर्म से ऊपर भी कुछ हैं ,खून के रिश्तों से भी कुछ ऊपर हैं,सरहदों के ऊपर भी कुछ हैं -यानी प्रेम की भाषा ,प्रेम का धर्म,प्रेम की जात ,प्रेम का रिश्ता। ये हमारे नियम-कायदे बनाने वालों(?)को कभी समझ नहीं आएगा ।
रा.ना.वी.को साधुवाद ,उनके सभी सदस्यों को साधुवाद,दर्शकों को साधुवाद और सबसे बढ़कर उन कलाकारों को सलाम हैं जिन्होंने बाहर (मंच के)चल रहे नौटंकी के बीच अपनी प्रस्तुति दी और इस नाटक को इंडो-पाक मैत्री के नाम कर दिया।

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...