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Showing posts from 2009

एक फ़साना हबीब -अना तनवीर

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पिछले दिनों मैं भोपाल स्थित 'इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ' में था और मौका था नया थियेटर के गोल्डेन जुबली वर्ष का.मानव संग्राहलय ने अपने आयोजन "हबीब उत्सव"के तहत दो दिनों का 'सुरता हबीब ' नाम से सेमीनार भी कराया था जिसमें प्रसन्ना.वामन केंद्रे,लताफत हुसैन ,महमूद फारूकी,शम्पा शाह,नया थियेटर के पुराने कलाकार,प्रयाग शुक्ल,डॉ.विनायक सेन,अनूप जोशी, आदि नामवर रंगकर्मी जुटे.पर इस पांच दिवसीय हबीब उत्सव की खासियत दो मायने में महत्वपूर्ण है.पहला कि इसमें हबीब साहब के 'आगरा बाज़ार,राजरक्त,सड़क,चरणदास चोर,कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना,जिन लाहौर नहीं वेख्या वो जन्म्या ही नई,नाटकों का मंचन हुआ.पर दूसरी बात जो है वो उन सब में अहम है औए वो ये कि इस पूरे उत्सव के दौरान एक चेहरा सबको हैरत में डालता रहा वो था -हबीब साहब की बेटी अन्ना तनवीर का,जो फ़्रांस की बहुत मशहूर सिंगर है.कलाकार पिता की कलाकार बेटी.आप चौंक गए ना?जी हाँ सबकी यही पता था कि हबीब की एक ही बेटी थी - नगीन तनवीर ,पर आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि अन्ना नगीन से बड़ी हैं और काफी प्रतिभाशाली भी.व

"LE JUSTES"by अल्बेयर कामू-हिंसा के रास्ते क्रांति या क्रांति के लिए हिंसा की बहस

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बीसवीं शताब्दी के महान चिन्तक और लेखक अल्बेयर कामू के नाटक le justes का हिंदी रूपांतर "न्यायप्रिय"(अनुवाद-प्रो.शरतचंद्रा और सच्चिदानंद सिन्हा)का सफ़ल मंचन पिछले ७-१० अक्टूबर को पटना के कालिदास रंगालय में नत्मंड़प नाट्य-समूह द्बारा किया गया.इस नाटक का निर्देशन संभाला था जाने माने रंग-निर्देशक और रंगकर्मी परवेज़ अख्तर साहब ने.'न्यायप्रिय'के प्रस्तुति आलेख की परिकल्पना हिन्दुस्तान की गुलामी और उससे मुक्ति के लिए की जा रही हिंसक क्रांतिकारी गतिविधियों को ध्यान में रख कर की गयी है.'न्यायप्रिय'का कथानक एक भूमिगत क्रांतिकारी संगठन के इर्द-गिर्द घूमता है.गुलाम भारत में यह क्रांतिकारी दल अँगरेज़ कलेक्टर की हत्या की योजना बनाता है,जिसमें शामिल होने के लिए कनाडा में फरारी जीवन जी रहा तेजप्रताप यहाँ आता है.शेखर जो दल में मस्ताना के नाम से मशहूर है,निश्चित कारवाई के दिन अँगरेज़ कलेक्टर की बग्घी में बच्चों को देखकर बम नहीं फेंक पाता.दल में इसको लेकर एक तीखी बहस शुरू हो जाती है.दमयंती दल की एक पुरानी सदस्य है,जो शेखर से प्रेम करती है.दल प्रमुख बलदेव दो दिन बाद बम फेंकने की

'मि.योगी' का जायका ख़राब करेगा -वाट्स योर राशि'

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आज हमारे अगल-बगल के सिनेमाघरों में हाई-फाई निर्माता-निर्देशक आशुतोष गोवारिकर की 'वाट्स योर राशि' रिलीज हो गयी है..जैसा कि शुरूआती सिनेडियों ने बताया है ,लगता है आशुतोष इस बार बिना वजह फिल्म बना बैठे हैं.'...राशि' का नाम पहली बार सुनते ही दूरदर्शन के बहुचर्चित धारावाहिक 'मि.योगी' की याद आगई थी,और साथ ही यह आशंका भी कि कहीं उस क्लासिक सीरियल का बंटाधार न हो जाये.ऐसी आशंका वाजिब थी क्योंकि मि.योगी की कहानी भी लगभग यही थी कि एक बांका सजीला नौजवान अमेरिका से अपने लिए एक अदद कन्या विवाह हेतु ढूँढने इंडिया आता है और हर एक लड़की के साथ उसका जो साक्षात्कार होता है उससे कॉमिक सिचुएशन बनती है और वह भी बिना किसी मुहँ-बिचकाऊ ऐक्टिंग अथवा फूहड़ संवादों के.यही इस धारावाहिक की जान थी जो इसे क्लासिक बना गयी.एन आर आई भारतीय की भूमिका तब के चर्चित टीवी कलाकार मोहन गोखले ने निभाई थी.बहरहाल,'वाट्स योर राशि की कथा तो वैसी नहीं पर आशुतोष अतिशय प्रयोगधर्मी डाईरेक्टर तो नहीं ही हैं ना उन्हें ऐसे प्रयोगों में कूदना था बिना किसी धाँसू तैयारी के.आशुतोष बड़े निर्देशक हैं वह बड़े कलाका

"Gloomy sunday"-एक महान हत्यारी कविता.

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gloomy sunday वह गीत है,जिसे सुनकर करीब २०० लोगों ने आत्महत्या कर ली थी.इस गीत का लेखक था-हंगरी का "लाजेलो झावोर".झावोर की प्रेमिका ने उसे धोखा दिया और रविवार के दिन जब उसकी शादी का कार्ड लाजेलो को मिला तो उसका दिल टूट गया,तब उसने इस हत्यारे,हृदयविदारक,प्रणय गीत की रचना की. "now tears are my wine and greef is my bread each sunday is gloomy which feels me with death" अर्थात , अब आंसू ही मेरी मदिरा है/ और दुःख ही मेरी रोटी/ अब हर इतवार मेरे लिए दुखद है/ जो मुझे मृत्यु भाव से भर देता है."- जब इस गीत को फेमस संगीतकार "रेज्जो सेरेज़"ने मार्मिक स्वरों में गाकर रिकार्ड कर बाज़ार में पहुँचाया तो उसे सुनकर आत्महत्या करने वालों का तांता लग गया,कुछ ने ज़हर खा ली तो कुछ ने खुद को गोली मार ली और कुछ मानसिक दिवालियेपन के शिकार हो पागल हो गए.यही नहीं यह पड़ोसी देशों लन्दन और अमेरिक

कमबख्त फिल्म ...

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किसी फिल्म के हिट होने का क्रेटेरिया क्या है या होता है?बहुत संभव है मेरी और आपकी राय लगभग समान हो.बीबीसी हिंदी पर कमबख्त इश्क के हिट होने की खबर है साथ ही यह भी कि अक्षय कुमार ने भव्य पार्टी दी और शाहरुख़ खान को भी पार्टी में बुलाया.यह एक अलग बात है.मेरी समस्या अक्षय कुमार की इन दिनों की कुछ फिल्मों से बढ़ी है.और मैं यह सोचता हूँ कि फिल्म के लिए स्क्रिप्ट का दमदार होना जरुरी है या नहीं?कोई नाम मात्र की भी स्टोरी लाइन तो हो..पर नहीं. दर्शकों का टेस्ट क्या हो चला है इसे पकड़ पाना ना तो ट्रेड पंडितों के पास है ना ही फिल्म समीक्षकों के पास. "कमबख्त इश्क"कुछ उन फिल्मों में से थी जिनके लिए सिनेडियों(सिनेमा प्रेमियों)ने बहुत बेसब्री से इंतज़ार किया था मगर सही में यह फिल्म जिस तरह से बन कर सामने आई है उसे देख कर यही कहा जायेगा कि कम-से-कम अब साजिद नाडिया..और शब्बीर खान क्या दिखाना चाहते थे उनसे ही पूछा जाये तो बता नहीं पायेंगे..पर विडम्बना है कि फिल्म हिट है. मेरे लिए यह फिल्म देखना एक त्रासदी से गुजरने जैसा अनुभव रहा है.यह फिल्म कमबख्त इश्क से कमबख्त फिल्म में शुरू होते ही तब्दील

पीयूष मिश्रा का विडियो साक्षात्कार "www.mihirpandya.com"पर.

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गुलाल देखने के बाद जो पीयूष मिश्रा के नए नए मुरीद हुए हैं और वे भी जो रंगमंच के दिनों से ही इस बेहतरीन कलाकार के फन के कायल हैं,उनके लिए एकदम नया और ख़ास विडियो साक्षात्कार मेरे अभिन्न मित्र और आवारा हूँ ब्लॉग के 'मिहिर पंड्या' के वेबसाइट www.mihirpandya.com पर उपलब्ध है.इस इंटरव्यू की सबसे ख़ास बात है कि अन्य कलाकारों के रेट-रटाये और घिसे -पिटे फार्मुलेबाजी वाले साक्षात्कार के बीच इस अद्भुत कलाकार ने अपने दिल का दरद दिल्ली के रंगमंच मार्क्स की बात कर अपनी दुकानदारी चलाने वाले छद्म मार्क्सवादियों तक पर अपनी तीखी टिपण्णी दी है.मिहिर के ही ब्लॉग साथी वरुण ग्रोवर ने अनुराग कश्यप के मशहूर प्ले "the skeleton women" जो पृथ्वी थिएटर मुम्बई में खेला जा रहा है के मौके पर अनौपचारिक तौर पर लिया और फिर जो सिलसिला चला तो बस एक से एक बात निकलती चली गयी.पीयूष मिश्रा के अब तक छपे इंटरव्यू को आप भूल जायेंगे.यकीन जानिए ये वही पीयूष मिश्रा हैं जिनके नाम की तूती दिल्ली के रंगजगत में बोलती थी.आखिर क्यों रंगमंच का एक बहुत ही उम्दा कलाकार इतना खिन्न हो गया इस मंच से .?क्यों वह अपने संघर

राजनीतिक राम के बरक्स पारिवारिक राम की छवि -उत्तररामचरित

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रा.ना.वि. के ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव के नाटकों पर लिखने की अगली कड़ी में आज भवभूति द्बारा रचित और प्रसन्ना द्बारा निर्देशित नाटक "उत्तररामचरित" के बारे में कुछ. उत्तररामचरित का संस्कृत से हिंदी अनुवाद 'पंडित सत्यनारायण कविरत्न' ने किया है.कविरत्न जी ने भवभूति के तीनों नाटकों का हिंदी और ब्रज में मिला-जुला अनुवाद किया यानी गद्य को हिंदी में तो पद्य को ब्रज में.उनकी यह कुशलता नाटक के प्रदर्शन में काफी सहयोगी सिद्ध हुई भी है."उत्तररामचरित"भी एक तरह से रामलीला ही है.पारंपरिक रामलीला खासकर एक नैतिक नाटक है जिसमे बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाई जाती है.इस नाटक में कोई शैतान नहीं है कोई खल पात्र नहीं.अगर प्रसन्ना की माने तो-"यह नाटक आत्मसंघर्ष पर केन्द्रित है.इसमें अच्छा आदमी अपने अच्छे होने की कीमत अदा करता है-यंत्रणा के द्बारा."-इस नाटक पर कुछ और बात से पहले पाठकों को यह याद दिला दूं कि प्रसन्ना ने इस नाटक का मंचन/निर्देशन १९९१ में किया था,जब एक राजनीतिक दल ने सत्ता के लिए राम की आध्यात्मिक छवि का दुरूपयोग कर उसको राजनीतिक छवि सही कहा जाये तो 'सा

जहां मौत एक सहज कविता सरीखी है-राम नाम सत्य है

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रेपर्टरी (एन एस डी)का यह नाटक "राम नाम सत्य है"-मूल रूप से मराठी नाटककार 'डॉ.चंद्रशेखर फनसलकर'का लिखा हुआ है.फनसलकर के नाटकों और विशेषकर एकांकियों पर लिखते हुए 'विजय तेंदुलकर' ने लिखा है-"उनके एक-अंकीय नाटकों में थिएटर की संभावनाओं और सीमाओं,दोनों के प्रति सजगता का पता चलता है.लेकिन उनमे व्यक्त होने के लिए और भी बहुत कुछ शेष रहता है.उनके भीतर एक प्रकार की बेचैनी.एक असंतोष और आक्रोश निहित है"-इस नाटक को फनसलकर जी ने मराठी में 'खेली-मेली' के नाम से लिखा है.जिसका अनुवाद इस नाटक के निर्देशक'चेतन दातार'ने ही किया है. यह नाटक जैसा कि खुद नाटककार का कहना है-प्यार,भाईचारे और थोड़े बहुत हौंसले से मनुष्य नर्क में भी जीवन को सहज बना सकता है और आगे बढ़ रहा है.यही मनुष्य के भीतर उम्मीद और आशा का संचार करता है,जबकि आज हमारे चारों और की जो मूल्यवान और अच्छी चीज़ें हैं वो या तो ढह रही हैं या मृतप्राय हो गयी हैं.यह नाटक मनुष्य की इसी 'कभी मृत न होने वाली'प्रवृति को पकड़ने का प्रयास है."-नाटक देखते हुए एपी फनसलकर की इस बात से सहमत हो सक

लोकधर्मी शैली का सहज नाटक -"सदारमे"(रा.ना.वि.में)

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नरहरी शास्त्री जैसे विख्यात और 'श्रीकृष्ण लीला ,कंसवध चरित्र,महात्मा कबीरदास,जालंधर,श्री कृष्णभूमि परिणय ,अदि पौराणिक नाटकों के लेखक की ही रचना है -'सदारमे'.जो आजकल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव में रंगमंडल द्वारा खेला जा रहा है.दरअसल यह नाटक कंपनी शैली का है,कहने का अर्थ यह है कि .नरहरी शास्त्री के अधिकाँश नाटकों का प्रदर्शन कर्नाटक की ऐतिहासिक ड्रामा कंपनी 'गुब्बी नाटक कंपनी'ने किया है और वे सभी प्रर्दशित नाटक पौराणिक कथाओं का आधार लिए हुए थे.कंपनी के आग्रह पर कि शास्त्री जी एक ऐसा नाटक लिखे जिसमे लोक-तत्वों की सादगी और खूबसूरती हो तब "सदारमे"लिखा गया.नरहरी शास्त्री जी ने इस नाटक की रचना कंपनी के आग्रह पर की. 'सदारमे का शाब्दिक अर्थ है-हमेशा सुंदर (सदा + रमे,सदा का अर्थ हमेशा और रमे संस्कृत शब्द के रम्य से बना है)लगभग एक सदी पूर्व लिखा गया नाटक नाट्यधर्मी नहीं बल्कि लोकधर्मी शैली में है.सीधी-सादी इस कहानी का उद्देश्य शुद्ध मनोरंजन करना है."-(ब्रोशर -सदारमे निर्देशकीय )दरअसल लोकधर्मी शैली के नाटकों का सबसे मज़बूत पक्ष

आचार्य तार्तूफ़.. रा.ना.वि.रंगमंडल की उम्दा प्रस्तुति.

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'आचार्य तार्तूफ़'मशहूर फ्रांसीसी नाटककार 'मौलियर' के विख्यात हास्य चरित्र 'तार्तूफ़'का आचार्य तार्तूफ़ के रूप में भारतीय अवतरण है.सत्रहवी शताब्दी के इस नाटक को वर्तमान समय से जिस तरह से जोड़ा गया है वह वाकई कमाल का है और इसका श्रेय भी सबसे अधिक इसके निर्देशक 'प्रसन्ना'को जाता है. इसकी कथा का सार-संक्षेप यूँ है कि ओमनाथ नाम का बनिया जो मूलतः दिल्ली का रहने वाला है लेकिन आध्यात्मिक खोज के लिए पोंडिचेरी जाता है,जहां उसकी मुलाक़ात एक अर्ध फ्रांसीसी भारतीय खस्ताहाल शख्स से होती है.यह शख्स अपने को तार्तूफ़ का वंशज बताता है मगर असल में वह एक असफल अभिनेता है.एक टेलीविजन धारावाहिक के निर्माण के दौरान उसने संस्कृत के कुछ श्लोक याद कर लिए थे.वह अपनी खस्ताहाली से निकलने की जुगत में है.पोंडिचेरी समुद्री तट पर आचार्य तार्तूफ़ ओमनाथ को अपनी जाल में फंसा लेता है और ओमनाथ को लगता है कि एक आध्यात्मिक गुरु पाने की उसकी कोशिश पूरी हुई. मोलिअर का तार्तूफ़ सिर्फ पाखंडी है.उसका यह भारतीय अवतार आचार्य तार्तूफ़ वह आधुनिक हिन्दू स्वामी या महाराज है जो करतबबाज भगवान् सरीखा बन चु

रा.ना.वि.में "ग्रीष्मकालीन नाट्य समारोह २१ मई से १७ जून तक..

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल प्रत्येक वर्ष की तरह इस बार भी हमारी गर्मियों को बेहतरीन बनाने के लिए अपने बेहतरीन नौ नाटकों के साथ फिर उपस्थित है.पेश है आपकी सुविधा हेतु समय-सारणी और अन्य विवरण - ==================================================================== २१ मई /७:०० बजे -"सदारमे"       निर्दे.-बी.जयश्री (अवधि-१घ.५० मिं.)हिंदी ---अभिमंच सभागार  २२ मई /७:०० बजे - "सदारमे"------------------'वही------------------------------------------------- २३ मई /३:३० बजे और ७:०० बजे- "सदारमे"------------वही---------------------------------------- २४ मई /३:३० और ७:०० बजे -"सदारमे"----------------------वही------------------------------------  ===================================================================== २५-२६-और २७ मई /७:०० बजे -"उत्तररामचरित",  निर्दे.-प्रसन्ना (अवधि-२ घंटे)हिंदी--सम्मुख सभागार  ===================================================================== २८-२९ मई  /७:०० बजे- "जात ही पूछो साधु की"-    निर्दे.-

'मेरी स्वाभाविकता'-(रत्नेश विष्वक्सेन की कविता)

रत्नेश विष्वक्सेन रांची कालेज (रांची)में हिंदी के लेक्चरार हैं.अपने आसपास और खुद पर बीतती चीज़ों के ऊपर नितांत निजी तौर पर उन्होंने बहुत कुछ लिखा है,वे अपनी लिखनी खासकर कविता के क्षेत्र में अपने तक ही तब रखा करते थे(मैं उनके स्नातक के दिनों की बात कर रहा हूँ)अब तो खैर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख छपते रहते हैं.प्रस्तुत है आपके लिए उनके निजी क्षणों का एक दृश्य:- सांस की रफ़्तार /जैसे मीलों की थकान पीकर मंद हो गयी है/ बरौनियों में कुछ मलिनता/जो तय करती है अक्सर / मेरी उदासी को. कभी-कभी घबरा जाता हूँ,/घिग्गियों और धमकियों के बीच ,अपनी मनुष्यता से एक प्रश्न करता हूँ-उसके होने को लेकर. नहीं बहा पाता हूँ हिचकियों में- तो कभी भरा हुआ हूँ ,हुआ ही रहकर/ काम लेता हूँ. दर्द जैसे किसी चीज़ को , जो उलाहनों के बीच अटकी होकर भी,थाम लेती है मुझे/ कड़वाहट से भर उठता हूँऔर अफ़सोस के कुछ निशब्द नगमें , अव्यक्त पलकों को वजनी करने लगते हैं. जब होता हूँ चिंतनशील अपराधी की तरह / अपने सवालों के कटघरों में अनुत्तरित , तबलगता है कि अपने जीवन के बाईसवें अध्याय में अब ढोंग नहीं कर पाता . मैंने वर्ष नहीं अनुभ

'जाति ही पूछो साधू की'-विजय तेंदुलकर (रा.ना.वि.में)एक उम्दा प्रदर्शन

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विजय तेंदुलकर के व्यंग्य नाटक "जाति ही पूछो साधू की"देखते हुए,हरिशंकर परसाई की 'काक झकोरे'में संकलित एक व्यंग्य रचना 'होना एक इंटरव्यू का'बरबस ही याद आती है.ऐसा किसी साहित्यिक मेल के कारण नहीं बल्कि कथ्य के प्रस्तुति के लिहाज़ से.किसी भी नौकरी में अपने मनपसंद उम्मीदवार को लेने के लिए जिन नौटंकियों का सहारा लिया जाता है, उस खेल से हम सभी थोडा-बहुत वाकिफ हैं.शिक्षा जगत में ये कुछ अधिक ही है,इसमें दो राय नहीं हो सकती.वैसे सदियों से अपने आदमी को अधिकाधिक लाभ पहुंचाने का खेल चलता आया है.हिंदी में रीतिकालीन कवि बिहारी लाल जी ने लिखा भी है-"अपने अंग को जानिके /जोबन नृपति प्रवीण....."-यह तो आज तक चल रहा है और चलेगा.जैक नाम की यह चीज़ बहुत कायदे की चीज़ है जी सब कुछ पे भारी.आपके डिग्री,आपकी योग्यता ,आपके सपनों पर भी.अगर आप उच्च शिक्षा प्राप्त हैं और जैक नहीं है तो आपको ईश्वरीय अनुकम्पा की ही जरुरत होगी.ये जैक नाम का ब्रम्हास्त्र बड़ा अचूक है.विजय तेंदुलकर का यह नाटक ऐसे ही कारस्तानियों को परत-दर-परत सामने खोलता है.दरअसल यह नाटक केवल शिक्षा-तंत्र के ही नहीं बल

सपनों की कब्रगाह है-बॉलीवुड..

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"इस मायानगरी में कई पहुंचे पर हर जुम्मे चढ़ते-उतारते सूरज के साथ ही अपने वजूद को बनाते-तलाशते खो गए"- कुछ को उनकी मन-माफिक ज़मीन नहीं मिली कुछ को सही पहचान.जज्बे और जीवट वाला यहाँ फिर भी रुके और खुद को बनाने की जुगत में लगे रहे.यह बात तो सभी को मालुम है कि,इतने पुराने बरगदों के बीच किसी नए बिचडे को अपनी जमीन पकड़ने में क्या परेशानी होती है उसे आसानी से समझा जा सकता है.इन बिचडों को उन्ही के बीच का थोडी जगह बना चुका पेड़ ही पहचान सकता है और अमूमन ऐसा ही होता आया भी है.पीयूष मिश्रा पहले ऐसे शख्स या कलाकार नहीं हैं जिन्हें अपनी जमीन बनाने में समय लगा है.इससे पहले रंग-जगत से उधर को(सिनेमा जगत)जाने वालों की फेहरिस्त काफी लम्बी है.कुछ अभी उधर जाने की उड़ान भरने को तैयार बैठे अपने दिनों को मजबूत बनाने में लगे हैं और मुम्बई से अपने कनेक्शन तलाशने में लगे हैं.वैसे भी एन एस डी के तीन साल या रंगमंडल के लम्बे समय और अपना अमूल्य रंग-योगदान देने.,या फिर श्रीराम सेंटर इत्यादि जगहों पर ऐसे कई कलाकारों की जमात देखी जा सकती है.जो चाय के अनगिनत प्यालों के साथ अपने सपने बुन रहे हैं या उधर का जुग

पुते हुए चेहरों का सच..-"गुलाल"

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भूल जाइए कि,हिंदी फिल्मों का मतलब पेड़ों,सरसों के खेतों और बल्ले-बल्ले ही है.अनुराग कश्यप जैसे नयी पीढी के निर्देशकों ,फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा में एक ऐसी लहर पैदा की है ,जिससे जोहर,चोपडा की मार से डरे दर्शकों को एक नयी सुकून मिलती दिख रही है.साल के शुरू में देव-डी और अब "गुलाल"अनुराग कश्यप को सामान्य से काफी ऊपर तक उठा देती है.गुलाल कई मायनों में देखने लायक है.चाहे वह इसके एक्टर्स हो,प्लाट हो,दृश्य हो,गीत संयोजन हो या फिर संवाद,अनुराग की बाजीगरी हर जगह १००%में उपस्थित है.गुलाल हर लिहाज़ से एक बड़े निर्देशक की फिल्म है. फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि भले ही राजस्थान की हो पर यह पूरे भारत की सच्चाई है.राजपुताना का ख्वाब बेचकर अपने जातिगत,राजनीतिक हित साधने वाला दुकी बना (के.के.)हो या फिर लुंज-पुंज नपुंसकता की हद तक बेवकूफियां करने वाले दिलीप सिंह (राजा सिंह चौधरी)हो ,सभी अपने आस-पास के कैरेक्टर्स हैं,खालिस वास्तविक जीवन के कैरेक्टर्स.यूनिवर्सिटी या कालेज की राजनीति को ज़रा भी नजदीक से जानने और देखने वाला व्यक्ति इस फिल्म के एक-एक संवाद को अपने सुने या सुनाये बातों की तरह समझ लेग

बस यही बचे थे?अब हाय-तौबा क्यों?

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राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के निजी वस्तुओं की नीलामी की खबरें पिछले कई दिनों से सूचना-तंत्रों की सुर्खियों में थी.पता नहीं हर बार ऐसे मामलों पर हमारी गवर्नमेंट को क्या हो जाता है.शायद किसी कंट्री में ऐसा नहीं होता होगा जहां उसके फादर ऑफ़ द नेशन के साथ इतनी बेरुखी से पेश आया जाता है.बहरहाल,गांधीजी की चीज़ें अपनी सही जगह पर आ गयी हैं.देशवासियों को जय हो..जय हो...करना चाहिए.(शायद).पर,देखने वाली बात ये है कि हमारे जो वस्तुएं इतनी महत्वपूर्ण हैं, वह लाया किस आदमी ने ?जिस नशाबंदी और नशाखोरी के खिलाफ गांधीजी जीवन भर संघर्षरत रहे आखिर उसी फिल्ड के महारथी कहे जाने वाले शराब किंग "विजय माल्या"ने गांधीजी के इन सामानों को खरीद लिया और देश लेकर आये हैं,वह भी एक बड़ी भारी रकम देकर.अब अखबार वाले चिल्ला रहे हैं कि,आखिर एक शराब का व्यवसायी ऐसा कैसे कर सकता है,पर इतने से माल्या के इस काम का महत्त्व ख़त्म नहीं हो जाता.अजी जब हमारी सरकार इस हद तक सोई है कि अब राष्ट्रपिता तक से ही पोलिटिक्स कर दिया.अब तो ये भी नहीं कहा जा सकता कि ये (व्यवस्था)संवेदनहीन हो गयी है.कम से कम इस काम से विजय माल्या ने स

नौटंकी वाया रिक्शा-शो....जय हो...

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कल अपने समाजवादी नीतिश कुमार जी "slumdog.."देखने गए.आज के सभी अखबारों की सुर्खियों में उनकी रिक्शानशीन मुस्कुराती हुई तस्वीर छाई हुई है.साथ ही,इस फिल्म के बारे में उनके उदगार भी कि"मैं ज़रा भुसकौल छात्र हूँ इसलिए अब तक फिल्म नहीं देख पाया था.अब इनको कौन बताये कि ये अचानक ही रिक्शा सवारी के साथ फिल्म में उस रास्ते से जाना जो पटना का सबसे भीड़ वाला इलाका है,कोई यूँ ही वाली बात नहीं थी.सुशासन को इस तरीके से दिखाने का अच्चा मौका है यह जबकि लोक सभा चुनावों की घोषणा कुछ ही दिनों पहले हो चुकी है.राजनीति के राजपथ पर लोहिया के लोग अब उनकी(लोहिया)तरह या सिद्धांतों के आस-पास कितने रह गए हैं,यह तो नहीं कहा जा सकता पर हाँ इतना जरुर है कि आज की राजनीती में अपनी जुगाली कैसे चलाते रहनी है यह बहुत अच्छे से पता है."slumdog..."तक पहुँचने का ये रास्ता वाकई लाजवाब है पर क्या करें इस खोपडी में यह बात आसानी से नहीं घुसती कि बस यूँ ही फिल्म देखने जा रहा हूँ.अपने उपलब्धियों के साथ ही अगर नीतिश जी जनता दरबार में जाएँ तो ही अच्छा है क्योंकि उनके फेवर में यह बात कम-से-कम (लालू यादव के बा

हंसिकाएं..कुछ हल्के-फुल्के पल.

जीवन में हंसने के मौके खुश रहने के मौके बड़े कम हैं.इसी तंगदिली के वक़्त तन्हादिली के वक़्त आपके चेहरों पे एक मुस्कान देता हूँ.कुछ देर के लिए कम-से-कम ये हंसी आपको सुकून दे. "एक बहु और एक सास उनके पुत्र थे -श्री प्रकाश बैठे थे उदास ,अचानक माँ ने कहा-बेटा कल्पना करो, मैं और बहु दोनों गंगा नहाने, हरिद्वार जायें,हमारा पाँव फिसल जाए, और हम दोनों ही डूब जाएँ . तो तू अपना धर्म कैसे निभाएगा ? डूबती हुई माँ और बीवी में, किसको बचायेगा? साहेबान-कदरदान-मेहरबान लड़का था परेशान उसके समझ में कोई युक्ति नहीं आई क्योंकि एक तरफ था कुँआ तो दूसरी तरफ थी खाई अचानक बीवी ने मुंह खोला यूँ बोला- 'हे प्राणनाथ !डूबती हुई माँ और बीवी में ,

देखी ज़माने की यारी..कुछ किस्मत की ..(वाया-शफीक सलाम बॉम्बे फेम)

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ऑस्कर अवार्ड के बाद चहुँ-ओर जय हो की धूम मची हुई है.slumdog .. से लेकर smile pinki के बाल कलाकारों की तारीफों में सभी ने कसीदे गढ़ डाले हैं.मुम्बई के स्लम में रहने वाले उन बच्चों के लिए राज्य सरकार ने मकान देने की घोषणा कर डाली है..पिंकी हम सब के लिए स्पेशल हो ही गयी है..सभी बच्चे देश भर के बच्चों का आकार ले चुके हैं.इसी बहाने परिधि से आने वाले इन दो-चार खुशकिस्मत बच्चों की किस्मत और भविष्य दोनों सुधर जायेंगे, कम-से-कम इसकी उम्मीद तो मुझे है.पर क्या वाकई ये खुमार उनके जीवन में एक सुनहरी बुनियाद रख पायेगा?अब के माहौल में तो उम्मीद हाँ की ही नज़र आती है.मेरे ऐसा सोचने के पीछे कोई बहुत दार्शनिक बात नहीं छुपी है बल्कि इन्ही बच्चों का एक अतीती चेहरा सामने है..जो ऑस्कर तो नहीं ले पाया था (निर्देशक डैनी बोयल जो नहीं थे)पर हाँ उस फिल्म का एक अहम् हिस्सा था,और ऑस्कर की देहरी तक भी पहुंचा था.slumdog...की खुमारी में डूबे और इसे एक महान फिल्म बताने वालों के लिए अंग्रेजी दैनिक "the hindu"के शुक्रवार १३ फ़रवरी के एडिशन में "beyond the slumdog alley"(kiswar desai)ने लिखा-"sal

भावी ब्यूरोक्रेट्स के दिमाग में घुसा गोबर

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कल से डीयू के क्रिश्चियन कालोनी में एक नौटंकी शुरू हो गयी है.जैसा कि आप सभी जानते हैं पटेल चेस्ट का यह इलाका मशहूर है इस बात से कि यहाँ से छोटे-छोटे शहरों से पढ़ कर आये बच्चे प्रशासनिक सेवाओं में जाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं.शायद इसीलिए इस जगह को प्रशासनिक सेवाओं में जाने वालों की फैक्ट्री कही जाती है.आंकडे जैसा बताते हैं कि इस कालोनी में दड़बेनुमा कमरों में लगभग ४००० से अधिक युवा अपनी ज़वानी को एक लक्ष्य के पीछे गला रहे हैं.इनके लिए रात-दिन का मतलब नहीं है.इनके डिस्कशन में अभी तक हमें देश-दुनिया की हलचलें ही सुनने में आती थी.डीयू के पीजी होस्टल्स में रहने वाले स्टूडेंट्स किसी बात की तथ्यात्मकता बताने के लिए यह कह देते रहे हैं कि 'भाई मेरी बात पे भरोसा ना हो तो पटेल चेस्ट /क्रिश्चियन कालोनी के लड़कों से पता कर लो'-पर अब यह स्थिति पिछले दो दिनों से बदली हुई है और रात भर जागने वाला यह इलाका आजकाल इधर-उधर मुहँ छुपाता फिर रहा है.पुलिस की दबिश इलाके में बढ़ गयी है और हमारे कल के ब्यूरोक्रेट्स आसपास के अपने अन्य मित्रों के यहाँ सिर छुपाते फिर रहे हैं..कुछेक की तो गिरफ्तारी भी हुई

अपने भीतर के काले बन्दर को देखने की कमज़ोर कोशिश...दिल्ली-६

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दिल्ली-६ कई मायनो में ख़ास फ़िल्म होते-होते रह जाती है.यह अक्सर होता है कि जब कोई निर्देशक एक बढ़िया फ़िल्म दे देता है तब उससे दर्शकों की उम्मीदें अधिक बढ़ जाती हैं.क्योंकि तब वह अपना एक दर्शक वर्ग बना चुका होता है.'रंग दे बसंती'से राकेश ने हिन्दी सिनेमा में २१वी सदी के यूथ की चिंता और सोच को एक रचनात्मक रूप देते हैं और लगभग स्तब्ध करते हैं.यही इस फ़िल्म को बड़ा कद देती है.इस फ़िल्म ने दिल्ली-६ के लिए पहले से ही एक पृष्ठभूमि तैयार कर दी कि अब राकेश क्या देने जा रहे हैं.दिल्ली-६ का ताना-बाना ४ स्तरों पर तैयार करने के बावजूद भी राकेश फ़िल्म को संभाल नहीं पाये हैं.टुकडों-टुकडों में सभी को यह फ़िल्म पसंद आ सकती है या आई है,पर राकेश के निर्देशक कद के लिहाज़ से यह सतही होकर रह गई है.फ़िल्म का एक एंगल वहीदा रहमान के दिल्ली-६ से जुड़ता है जहाँ वह अपने अन्तिम दिनों के लिए अपनी मिटटी में आती है और साथ में उनका पोता अभिषेक बच्चन (रोशन)भी है.पर कुछेक घटनाओं के बाद दादी का यह कहना कि "अब तो यहाँ मरने का भी दिल नहीं करता.."वर्तमान राजनितिक-सामाजिक स्थितियों की ओर इशारा कर देता है.आख़

"जय हो"- रहमान,गुलज़ार साहब ,और रेसुल...

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ऑस्कर अवार्ड्स का पिटारा खुल गया है और 'slumdog...'ने ८ मूर्तियाँ अपने हिस्से में डाल ली हैं.वाकई यह बहुत बड़ी खुशखबरी है कि भारतीय पृष्ठभूमि की ये कहानी दुनिया भर में पसंद की गई है.सभी चैनल वाले चीख-चीख कर बता रहे हैं कि भारतीय सिनेमा जगत में कमाल हो गया.पर क्या वाकई?दरअसल ,इस फ़िल्म के ऊपर मेरा कोई कमेन्ट नहीं है कि यह बुरी है,आप सभी की तरह मुझे भी फ़िल्म ठीक-ठाक लगी .पर क्या करूँ.१०० से ऊपर की रकम खर्चने के बाद भी मुझे मीरा नायर की "सलाम बॉम्बे"याद आती रही..बहरहाल यह एक अलग बात है. मेरी कठिनाई थोडी-सी इस बात को लेकर है कि अगर अपने डैनी भइया का नाम इस फ़िल्म के निर्देशक के रूप में नहीं जुड़ा होता तो क्या ....?और हमें खुशी किस बात को लेके होना चाहिए ..इस फ़िल्म को ८ ऑस्कर मिले हैं इस बात को लेकर या अपने रहमान,गुलज़ार साहब,रेसुल पोकुट्टी ने अपने बेमिसाल काम से वेस्टर्न हेकड़ी को अपने आगे झुका ही लिया.कम-से-कम मुझे तो यही लगता है कि,अपनी फ़िल्म है का राग जो बघार रहे हैं और खुशी के गुब्बारे सरीखे फूले जा रहे हैं उन्हें इतना तो समझ ही लेना चाहिए कि "जय हो...."-वाल

यह एक्सटेंसन है देवदास का-देव डी

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याद कीजिये जब आंखों में आँसू भरकर जाते हुए देवदास से चंद्रमुखी पूछती है-'फ़िर कब मिलना होगा?'-और देवदास इस बात को कहता है कि यदि अगला जन्म होता है तो मैं तुमसे दूर नहीं रह पाऊंगा '-संवाद कमोबेश ऐसा ही है -देवदास मर जाता है प्रेम की कसक दिल में लिए। पारो का जाने क्या हुआ(जैसा शरतचंद्र ने अपने नावेल में लिखा)। बहरहाल,देवदास देखने के बाद जो मन पे एक भारी पत्थर सा पड़ जाता था,वही उसको एक ख़ास फ़िल्म बनाता था। इस ट्रीटमेंट को चाहे वह बरुआ हो,रॉय हों ,या फ़िर भंसाली..सभी ने यूज किया । अनुराग कश्यप इन सबमें इसीलिए ख़ास हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने इसे पिछली फिल्मों की तरह सिर्फ़ भावनाओं का जाल पहना कर नहीं पेश किया -उन्होंने फ़िल्म में लगभग सभी जगहों पर नयेपन को दर्शाया है। इन्ही कुछ बिन्दुओं पर देव डी १- पारो चमत्कृत करती है- याद कीजिये पिछली तीनों पारो को ,जो प्रेम और स्वाभिमान की मूर्ति थी,और अपने देव के लिए अंत तक आह भरती रही थी। देव डी की पारो इस maamle में अधिक क्रांतिकारी है। चाहे उसे अपने प्यार को जताना हो(गद्दे सायकल पे लादकर गन्ने के खेत में जाकर देव को अपने प्यार का अहसा

संगीनों के साये में नाटक..जिन्ने लाहौर नई वेख्या ...

जैसा कि आप सभी जानते हैं,राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का भारत रंग महोत्सव इन दिनों राजधानी में चल रहा है,इसमे देश-विदेश के कुछ बेहतरीन ड्रामे प्रर्दशित हो रहे हैं या होने वाले हैं।इसी कड़ी में कल रात पाकिस्तान के "तहरीक-ऐ-निसवां(कराची)की नाट्य-प्रस्तुति थी-'जिन्ने लाहौर नई वेख्या'-इस नाटक के लेखक अपने ही देश के (क्या करें ऐसा कहना पड़ रहा है)असग़र वजाहत हैं। इस नाटक में ऐसा कुछ नहीं है जो किसी ख़ास मुल्क या धर्म को लेकर कुछ अनाप-शनाप लिखा गया हो,चुनांचे ये जरुर है कि ये नाटक धार्मिक कठमुल्लेपन के ऊपर इंसानियत का पैगाम देती है। कहानी बस इतनी है कि 'विभाजन के बाद लखनऊ का एक मुस्लिम परिवार काफ़ी समय रिफयूजी कैम्पों में बिताने के बाद अपने बसाहट के लिए नए आशियाने की तलाश में है। लाहौर में सरकारी तौर पर उन्हें एक रईस हिंदू परिवार की छोड़ी हुई हवेली उन्हें मिल जाती है। पर परेशानी ये है कि उस हवेली में उस हिंदू परिवार के मुखिया की माँ अभी भी रह रही है। पहले थोड़े हिल-हुज्जत के बाद सब उस बुढ़िया को घर के बुजुर्ग की तरह मानने लगते हैं यहाँ तक कि मोहल्ला भी उसे इसी तरह से इज्ज़त देता