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सरकार, रंगमंच और साँस्कृतिक नीति (बंसी कौल का मंतव्य)

प्रस्तुत लेख वरिष्ठ रंगकर्मी  बंसी  कौल के  साक्षात्कार का लेख  रूप में प्रस्तुति है. यह साक्षात्कार  राष्ट्रीय नाट्य विद्यायल में  मुन्ना कुमार पाण्डेय औr अमितेश द्वारा वर्ष 2013 में लिया गया था और यह समकालीन रंगमंच के दूसरे अंक में प्रकशित हुआ था.  इस लेख को छापने के लिए  दोनों साक्षात्कारकर्ता  संपादक समकालीन रंगमंच के आभारी हैं. पत्रिका में यह लेख भिन्न शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, यहाँ  हमने अपने हिसाब से शीर्षक तय किया है.- मॉडरेटर  .......................................................... मुझे नहीं मालूम कि इंडियन गवर्नमेंट की कोई कल्चरर पालिसी है या नहीं , या इस तरह की पालिसी हो इस पर कोई विचार किया गया है कि क्या होना चाहिए ?   कल्चरर प्रोग्राम जरुर है. बीच बीच में   कुछ इस तरह के लोग आते रहें है जिनको लगता था की कल्चर की रूप रेखा बने , जैसे एक ज़माने में जोनल सेंटर को लेकर उस वक्त एक आईडिया था    कि जितनी भी लोककलाएं है उनका आपस में आदान प्रदान हो .     देश एक दूसरे को अगर जानता था तो संसद...

लोकधर्मी नाट्य-परंपरा और भिखारी ठाकुर : स्वाति सोनल

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स्वाति सोनल दिल्ली विश्वविद्यालय की शोधार्थी और विश्वविद्यालय शिक्षण सहयोगी  हैं. फिलहाल लोकनाटकों पर पीएच.डी. शोधरत हैं. जन्नत टाकिज के लिए भिखारी ठाकुर पर लिखा इनका शोध -पत्र  साभार आप सभी के लिए प्रस्तुत है-मॉडरेटर. ----------------------------------- चित्र साभार: http://www.exoticindia.com/books/nzc616.jpg भारतीय लोकधर्मी नाट्य-परंपरा की प्राचीनता, विविधता, शक्ति व समृद्धि निर्विवाद है। आदिनाट्याचार्य भरतमुनि द्वारा रचित ‘नाट्यशास्त्र’ में भी ‘लोक’ के बुनियादी महत्त्व को रेखांकित किया गया है। अवश्य ही भरत के समक्ष नाट्य-प्रयोग की एक सुदृढ़ परंपरा रही होगी जो कि ‘लोक-परंपरा’ के रूप में उपस्थित होगी। ‘ नाट्यशास्त्र ’ में भरत ने इसी उपस्थित परंपरा को एक सुसंबद्ध व सर्वमान्य रूप प्रदान करने की चेष्टा की होगी। तभी उन्होंने ‘नाट्यशास्त्र’ में स्थान-स्थान पर ‘लोक’ के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में उसके समाधान हेतु ‘लोक’ की ओर दृष्टि का निर्देश किया है – “लोको वेदस्तथाध्यात्मं प्रमाणं त्रिविधिं स्मृतम् I वेदाध्यात्मपदार्थेषु प्रायो ...

लोक संस्कृति बरअक्स लोकप्रिय संस्कृति (राजीव रंजन गिरि)

रात नाच महोत्सव समिति , बिलासपुर लोक पर केंद्रित पत्रिाका ' मड़ई ' का वार्षिक प्रकाशन करती है। यह पत्रिाका निःशुल्क वितरित होती है। डॉ. कालीचरण यादव के संपादन में इस पत्रिाका ने रचनाकारों-पाठकों के बड़े समुदाय को जोड़ा है। लोक के विभिन्न पहलुओं में दिलचस्पी रखने वाले पाठक यह पत्रिाका डॉ. कालीचरण यादव , बनियापारा , जूना बिलासपुर , बिलासपुर , छत्तीसगढ़- ४९५००१ को पत्रा लिखकर भेजने का आग्रह कर सकते हैं। लोक पर केंद्रित इस पत्रिाका के २४ अंक प्रकाशित हो चुके हैं। लिहाजा , आगामी अंक इसका रजत जयंती अंक होगा। लोक के विभिन्न आयामों को समेटने वाली इस पत्रिाका का मौजूदा दौर में ' लोक ' की प्रकृति , चरित्रागत बदलाव आदि को लेकर चिंता लाजिमी है। ' मड़ई ' के चौबीसवें अंक के संपादकीय और कुछेक लेखों में इस पर विचार किया गया है। अपनी चिंता और सरोकार को शब्द देते हुए कालीचरण यादव ने लिखा है कि लोक संस्कृति एक अवधरणा के रूप में मनुष्य की सामूहिक चेतना की सहज अभिव्यक्ति है। वह मनुष्य के सामाजिक अनुभवों का सर्जनात्मक रूपांतरण है। लोक मंगल की कामना उसका स...