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Showing posts from February, 2009

भावी ब्यूरोक्रेट्स के दिमाग में घुसा गोबर

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कल से डीयू के क्रिश्चियन कालोनी में एक नौटंकी शुरू हो गयी है.जैसा कि आप सभी जानते हैं पटेल चेस्ट का यह इलाका मशहूर है इस बात से कि यहाँ से छोटे-छोटे शहरों से पढ़ कर आये बच्चे प्रशासनिक सेवाओं में जाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं.शायद इसीलिए इस जगह को प्रशासनिक सेवाओं में जाने वालों की फैक्ट्री कही जाती है.आंकडे जैसा बताते हैं कि इस कालोनी में दड़बेनुमा कमरों में लगभग ४००० से अधिक युवा अपनी ज़वानी को एक लक्ष्य के पीछे गला रहे हैं.इनके लिए रात-दिन का मतलब नहीं है.इनके डिस्कशन में अभी तक हमें देश-दुनिया की हलचलें ही सुनने में आती थी.डीयू के पीजी होस्टल्स में रहने वाले स्टूडेंट्स किसी बात की तथ्यात्मकता बताने के लिए यह कह देते रहे हैं कि 'भाई मेरी बात पे भरोसा ना हो तो पटेल चेस्ट /क्रिश्चियन कालोनी के लड़कों से पता कर लो'-पर अब यह स्थिति पिछले दो दिनों से बदली हुई है और रात भर जागने वाला यह इलाका आजकाल इधर-उधर मुहँ छुपाता फिर रहा है.पुलिस की दबिश इलाके में बढ़ गयी है और हमारे कल के ब्यूरोक्रेट्स आसपास के अपने अन्य मित्रों के यहाँ सिर छुपाते फिर रहे हैं..कुछेक की तो गिरफ्तारी भी हुई

अपने भीतर के काले बन्दर को देखने की कमज़ोर कोशिश...दिल्ली-६

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दिल्ली-६ कई मायनो में ख़ास फ़िल्म होते-होते रह जाती है.यह अक्सर होता है कि जब कोई निर्देशक एक बढ़िया फ़िल्म दे देता है तब उससे दर्शकों की उम्मीदें अधिक बढ़ जाती हैं.क्योंकि तब वह अपना एक दर्शक वर्ग बना चुका होता है.'रंग दे बसंती'से राकेश ने हिन्दी सिनेमा में २१वी सदी के यूथ की चिंता और सोच को एक रचनात्मक रूप देते हैं और लगभग स्तब्ध करते हैं.यही इस फ़िल्म को बड़ा कद देती है.इस फ़िल्म ने दिल्ली-६ के लिए पहले से ही एक पृष्ठभूमि तैयार कर दी कि अब राकेश क्या देने जा रहे हैं.दिल्ली-६ का ताना-बाना ४ स्तरों पर तैयार करने के बावजूद भी राकेश फ़िल्म को संभाल नहीं पाये हैं.टुकडों-टुकडों में सभी को यह फ़िल्म पसंद आ सकती है या आई है,पर राकेश के निर्देशक कद के लिहाज़ से यह सतही होकर रह गई है.फ़िल्म का एक एंगल वहीदा रहमान के दिल्ली-६ से जुड़ता है जहाँ वह अपने अन्तिम दिनों के लिए अपनी मिटटी में आती है और साथ में उनका पोता अभिषेक बच्चन (रोशन)भी है.पर कुछेक घटनाओं के बाद दादी का यह कहना कि "अब तो यहाँ मरने का भी दिल नहीं करता.."वर्तमान राजनितिक-सामाजिक स्थितियों की ओर इशारा कर देता है.आख़

"जय हो"- रहमान,गुलज़ार साहब ,और रेसुल...

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ऑस्कर अवार्ड्स का पिटारा खुल गया है और 'slumdog...'ने ८ मूर्तियाँ अपने हिस्से में डाल ली हैं.वाकई यह बहुत बड़ी खुशखबरी है कि भारतीय पृष्ठभूमि की ये कहानी दुनिया भर में पसंद की गई है.सभी चैनल वाले चीख-चीख कर बता रहे हैं कि भारतीय सिनेमा जगत में कमाल हो गया.पर क्या वाकई?दरअसल ,इस फ़िल्म के ऊपर मेरा कोई कमेन्ट नहीं है कि यह बुरी है,आप सभी की तरह मुझे भी फ़िल्म ठीक-ठाक लगी .पर क्या करूँ.१०० से ऊपर की रकम खर्चने के बाद भी मुझे मीरा नायर की "सलाम बॉम्बे"याद आती रही..बहरहाल यह एक अलग बात है. मेरी कठिनाई थोडी-सी इस बात को लेकर है कि अगर अपने डैनी भइया का नाम इस फ़िल्म के निर्देशक के रूप में नहीं जुड़ा होता तो क्या ....?और हमें खुशी किस बात को लेके होना चाहिए ..इस फ़िल्म को ८ ऑस्कर मिले हैं इस बात को लेकर या अपने रहमान,गुलज़ार साहब,रेसुल पोकुट्टी ने अपने बेमिसाल काम से वेस्टर्न हेकड़ी को अपने आगे झुका ही लिया.कम-से-कम मुझे तो यही लगता है कि,अपनी फ़िल्म है का राग जो बघार रहे हैं और खुशी के गुब्बारे सरीखे फूले जा रहे हैं उन्हें इतना तो समझ ही लेना चाहिए कि "जय हो...."-वाल

यह एक्सटेंसन है देवदास का-देव डी

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याद कीजिये जब आंखों में आँसू भरकर जाते हुए देवदास से चंद्रमुखी पूछती है-'फ़िर कब मिलना होगा?'-और देवदास इस बात को कहता है कि यदि अगला जन्म होता है तो मैं तुमसे दूर नहीं रह पाऊंगा '-संवाद कमोबेश ऐसा ही है -देवदास मर जाता है प्रेम की कसक दिल में लिए। पारो का जाने क्या हुआ(जैसा शरतचंद्र ने अपने नावेल में लिखा)। बहरहाल,देवदास देखने के बाद जो मन पे एक भारी पत्थर सा पड़ जाता था,वही उसको एक ख़ास फ़िल्म बनाता था। इस ट्रीटमेंट को चाहे वह बरुआ हो,रॉय हों ,या फ़िर भंसाली..सभी ने यूज किया । अनुराग कश्यप इन सबमें इसीलिए ख़ास हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने इसे पिछली फिल्मों की तरह सिर्फ़ भावनाओं का जाल पहना कर नहीं पेश किया -उन्होंने फ़िल्म में लगभग सभी जगहों पर नयेपन को दर्शाया है। इन्ही कुछ बिन्दुओं पर देव डी १- पारो चमत्कृत करती है- याद कीजिये पिछली तीनों पारो को ,जो प्रेम और स्वाभिमान की मूर्ति थी,और अपने देव के लिए अंत तक आह भरती रही थी। देव डी की पारो इस maamle में अधिक क्रांतिकारी है। चाहे उसे अपने प्यार को जताना हो(गद्दे सायकल पे लादकर गन्ने के खेत में जाकर देव को अपने प्यार का अहसा