2/26/09

भावी ब्यूरोक्रेट्स के दिमाग में घुसा गोबर


कल से डीयू के क्रिश्चियन कालोनी में एक नौटंकी शुरू हो गयी है.जैसा कि आप सभी जानते हैं पटेल चेस्ट का यह इलाका मशहूर है इस बात से कि यहाँ से छोटे-छोटे शहरों से पढ़ कर आये बच्चे प्रशासनिक सेवाओं में जाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं.शायद इसीलिए इस जगह को प्रशासनिक सेवाओं में जाने वालों की फैक्ट्री कही जाती है.आंकडे जैसा बताते हैं कि इस कालोनी में दड़बेनुमा कमरों में लगभग ४००० से अधिक युवा अपनी ज़वानी को एक लक्ष्य के पीछे गला रहे हैं.इनके लिए रात-दिन का मतलब नहीं है.इनके डिस्कशन में अभी तक हमें देश-दुनिया की हलचलें ही सुनने में आती थी.डीयू के पीजी होस्टल्स में रहने वाले स्टूडेंट्स किसी बात की तथ्यात्मकता बताने के लिए यह कह देते रहे हैं कि 'भाई मेरी बात पे भरोसा ना हो तो पटेल चेस्ट /क्रिश्चियन कालोनी के लड़कों से पता कर लो'-पर अब यह स्थिति पिछले दो दिनों से बदली हुई है और रात भर जागने वाला यह इलाका आजकाल इधर-उधर मुहँ छुपाता फिर रहा है.पुलिस की दबिश इलाके में बढ़ गयी है और हमारे कल के ब्यूरोक्रेट्स आसपास के अपने अन्य मित्रों के यहाँ सिर छुपाते फिर रहे हैं..कुछेक की तो गिरफ्तारी भी हुई है पर यह नहीं पता चल पाया है कि वह वाकई स्टूडेंट्स थे या इन स्टूडेंट्स को भड़काने वाले खलिहर लोग.
हुआ यूँ कि दो दिन पहले क्रिश्चियन कालोनी के एंट्रेंस गेट पर किसी सिरफिरे ने कहीं से एक मूर्ति लाकर (रातों-रात)रख दी.पता नहीं इससे उसका क्या भला होने वाला था या किसी सो कॉल्ड ज्योतिषी ने बता दिया था कि ऐसा करने से शायद उसका सेलेक्शन देश की सर्वोच्च मानी जाने वाली सेवा में हो जायेगा.ध्यान रहे कि कुछ ही दिनों में सिविल सेवा के मुख्य परीक्षा के परिणाम आने वाले हैं.बहरहाल,यह इलाका घोषित तौर पर ईसाईयों का है और पता नहीं कबसे इनकी आबादी यहाँ बसी हुई है,ये यहाँ पर अपनी दुकाने चलाते हैं,जिनमें जैसा कि जाहिर ही है कि स्टेशनरी और प्रतियोगी परीक्षाओं के सामग्री ही मिलती है.ये सायबर कैफे ,पीसीओ बूथ चाय-बिस्कुट से लेकर पान-सिगरेट,जेरोक्स इत्यादि की दुकाने चलाते हैं,इनके सबसे बड़े ग्राहक यहाँ दडबों में रहने वाले छात्र ही होते हैं.यहाँ ईसाईयों का एक बड़ा कब्रिस्तान और एक गिरिजाघर भी है.इस मूर्ति के रखे जाने के बाद यहाँ के शांत माहौल में एकाएक गर्मी आ गयी है और यह स्वाभाविक भी है.इस मूर्ति को लगे चंद घंटे ही बीते थे कि किसीने मूर्ति हटा दी.अब क्या था इस काम का होना था कि हमारे भीतर का काला बन्दर तुंरत कुलांचे मारता हुआ इन भावी ब्यूरोक्रेट्स के भीतर समा गया और इन लोगों ने तुंरत ही हिन्दू धर्म के तथाकथित रक्षकों को बुला लिया और उनके नेतृत्व में बगल में ही रह रहे पादरी के घर पर रात में धावा बोला और जो कुछ कहा बस समझ ही लीजिये.स्थिति की नजाकत को समझते हुए पादरी ने हाथ जोड़ दिए और ये लोग जयकारा लगाते उसी गेट की ओर लौट आये.
मामला यहीं ख़त्म नहीं हुआ है उसी समय मूर्ति की स्थापना वहा हुई और दो-चार नौजवान जिन्हें अपना इहलोक सुधारने की चिंता रही होगी (?)वही धर्मरक्षा में सोये भी.बजरंगी बाबाओं और शिव के प्रतापी सैनिकों ने अपना तेज़ दिखाया और चल दिए या शायद वहीँ मंडरा रहे हैं पर कमाल देखिये कि हमारी प्रिय दिल्ली पुलिस का मौरिस नगर थाना ठीक इस गेट के सामने है और पादरी वाला काण्ड १५-२० पुलिस वालों के सामने हुआ था.एक प्रत्यक्षदर्शी नौजवान जो उसी कालोनी में रहता है वह ख़ुशी-ख़ुशी बता भी रहा था कि'भैया साले पुलिस वालों की हिम्मत नहीं हुई रोकने की हीहीही ...लड़के ज्यादा थे ना इसीलिए वो खाली मैनेज कर रहे थे."अब आज की स्थिति ये है की 'जौ के साथ घुन भी पिस रहा है,यानी जो इस काण्ड कुकर्म में शामिल नहीं हैं उनकी भी धर-पकड़ चल रही है.मैं सोचता हूँ कि अच्छे ब्यूरोक्रेट्स निकलेंगे यहाँ से..जिनके इतना पढ़-लिख लेने के बावजूद भी उनके दिमागों में कूड़ा ही भरा है.ऐसी ही कन्डीशन रही तो यही बाद में आदमियों को खाने वाले नेताओं के हथियार बनेंगे.और हंसी इस बात पर भी आ रही है कि छतीस करोड़ देवताओं को जो हमेशा स्वर्ग की सुन्दर-सुन्दर अप्सराओं से घीरे होते हैं,जहां रास-रंग खुशियाँ ही हर ओर बरसती हैं(?) उनके रहने की जगह अब किसी कालोनी का एंट्रेंस गेट ही बचा है.इससे पहले भी सडकों के बीच में विभिन्न धर्मात्माओं ने अपने-अपने प्रार्थना-घर बनाए थे अब ये ऐसे जगहों पे भी होने लगा.अब उस गेट पर खड़े होने वाले रेहडी वाले,ठेले वाले किधर जायेंगे,कोई भिखारी भीख कहाँ मांगेगा?वहाँ जो आस-पास आवारा पशु-जानवर कुछ-कुछ किया करते थे वह बेचारे किधर जायेंगे?भगवान जी(?) के लिए कोई माकूल जगह नहीं बची है क्या?या यह समझा जाए कि अब सिविल सेवा के लिए मेहनत नहीं बल्कि इसी तरह के नौटंकियों की जरुरत है....? ये तमाशा लंबा ना खिंचे तो ही अच्छा है पर इस मानसिकता का क्या करें..." इंडिया के नक्शे पर गाय ने गोबर कर है वर वह अब हमारे दिमाग तक चढ़ आया है"

2/24/09

अपने भीतर के काले बन्दर को देखने की कमज़ोर कोशिश...दिल्ली-६


दिल्ली-६ कई मायनो में ख़ास फ़िल्म होते-होते रह जाती है.यह अक्सर होता है कि जब कोई निर्देशक एक बढ़िया फ़िल्म दे देता है तब उससे दर्शकों की उम्मीदें अधिक बढ़ जाती हैं.क्योंकि तब वह अपना एक दर्शक वर्ग बना चुका होता है.'रंग दे बसंती'से राकेश ने हिन्दी सिनेमा में २१वी सदी के यूथ की चिंता और सोच को एक रचनात्मक रूप देते हैं और लगभग स्तब्ध करते हैं.यही इस फ़िल्म को बड़ा कद देती है.इस फ़िल्म ने दिल्ली-६ के लिए पहले से ही एक पृष्ठभूमि तैयार कर दी कि अब राकेश क्या देने जा रहे हैं.दिल्ली-६ का ताना-बाना ४ स्तरों पर तैयार करने के बावजूद भी राकेश फ़िल्म को संभाल नहीं पाये हैं.टुकडों-टुकडों में सभी को यह फ़िल्म पसंद आ सकती है या आई है,पर राकेश के निर्देशक कद के लिहाज़ से यह सतही होकर रह गई है.फ़िल्म का एक एंगल वहीदा रहमान के दिल्ली-६ से जुड़ता है जहाँ वह अपने अन्तिम दिनों के लिए अपनी मिटटी में आती है और साथ में उनका पोता अभिषेक बच्चन (रोशन)भी है.पर कुछेक घटनाओं के बाद दादी का यह कहना कि "अब तो यहाँ मरने का भी दिल नहीं करता.."वर्तमान राजनितिक-सामाजिक स्थितियों की ओर इशारा कर देता है.आख़िर दिल्ली-६ ही नहीं पूरे भारत के कंपोजिट कल्चर को 'अयोध्या,गोधरा,और मालेगाँव जैसी घटनाओं ने प्रभावित तो किया ही है और वह भी बड़े स्तर पर.दूसरा एंगल ओमपुरी-पवन मल्होत्रा के परिवारों,मुनीम जी-मुनीम की जवान बीवी और फोटोग्राफर ,मौलवी और कुछ मुसलमान किरदारों के साथ जुड़ता है.फ़िल्म के पहले हाफ में ये एंगल दिल्ली के कस्बाई कल्चर को ठीक-ठाक ढंग से दिखा जाती है और आप मुस्कराते हुए इंटरवल की देहरी पर आ पहुँचते हैं. सोनम कपूर और अभिषेक की केमेस्ट्री ठीक-ठाक लगी है.पर एक फ़िल्म को एक स्तर देने में स्क्रिप्ट का भी योगदान होता है जो अन्तिम तक दर्शकों को बांधता है,बस इसी की कमी अन्तिम के १५-२० मिनट्स में खल जाती है जब राकेश मेहरा फ़िल्म के ट्रीटमेंट के साथ रिस्क नहीं ले पाते और हीरो को जिंदा रख देते हैं.ऐसा शायद दर्शकों की डिमांड को ध्यान में रख कर किया गया है पर,यह समझ नही आता कि ये समझौता राकेश ओमप्रकाश मेहरा जैसे डाईरेक्टर को क्योंकर करना पडा.?बहरहाल,तीसरा एंगल रामलीला वाले प्रसंग का है जिसके दोहों और चौपाईयों के इर्द-गिर्द फ़िल्म की घटनाएं अपना आकार ले रही हैं.फ़िल्म के इस हिस्से में राकेश का कौशल दिखा है.शायद राम के रामराज्य का कोंसेप्ट निर्देशक के ध्यान में था ...तभी तो अन्तिम के दृश्यों में राकेश एक यूटोपियन समाज की रचना करते दिखे हैं..अतिशय प्रयोग भी कभी-कभी बुरा हो जाता है.'मसकली 'की मटकन ही फिम के अंत तक याद रह जाती है,यह रंग दे बसंती के निर्देशक की असफलता है.हिंदू-मुसलमानों के आपसी बैर और उसमें नेता-साधु गठबंधन तथा काले बन्दर के त्रियोग से हम सब के भीतर झाँकने की पुरजोर कोशिश है.फ़िल्म के दो किरदार प्रभावित करते हैं-पहला वह जो आइना लिए दिल्ली-६(पता नहीं चांदनी चौक का माहौल रचने के बाद निर्देशक अपने चरित्रों के मुहँ से बार-बार 'हम दिल्ली-६ वाले..जुमला क्यों कहला रहा है.भला कोई अपने पिन कोड से अपने ट्रेडिशन को बताता है क्या ) के मुख्य किरदारों के चेहरों के आगे कर देता है,यह कैरेक्टर कम उपस्थिति के बावजूद फ़िल्म के बाद भी याद रहता है.किसी ने सही ही लिखा है कि "आईना देखने से डरता है आदमी/कहीं उसकी ख़ुद से मुलाकात न हो जाए" -पर,जब फ़िल्म में नायक को इस आईने को दिखाए जाने की व्याख्या करते दिखाया जाता है तो दर्शक एक बार फ़िर कोफ्त से भर जाता है. फ़िल्म देखने वाले किसी भी सामान्य व्यक्ति को इसकी व्याख्या गैर-जरुरी लगेगी.-दूसरा किरदार 'जलेबी'(दिव्या दत्ता) का है,जिसमें इस उदार,संस्कृत,सामाजिक सद्भाव के अग्रदूत भारतीय समाज का फर्जी चेहरा बेनकाब होता है.दिल्ली-६ के बढ़ते बच्चों को 'जलेबी'जवान करती है,कोतवाल के जवान धड़ की मांसल जरुरत का साधन है और सबका कूड़ा साफ़ करने के बावजूद मन्दिर के भीतर आने का अधिकार नहीं रखती.राकेश ओमप्रकाश ने बढ़िया कलाकारों का चयन किया है पर २ घंटे १८ मिनट की फ़िल्म में कुछ तो अंत तक अंट नहीं पाये.रघुवीर यादव जैसा कलाकार रामलीला ही गाता रह जाता है और आप यदि ध्यान से ना देखे तो पता भी नहीं चलेगा कि यह रामायण गा कौन रहा है.
समस्या फ़िल्म के पूरे ट्रीटमेंट को लेकर नहीं जनमती बल्कि अंत के २० मिनटों को लेकर है.रंग दे...में फ़िल्म के वह सारे किरदार जो पहले हाफ में 'मस्ती की पाठशाला ...'-को ही अपना लाईफ मंत्रा बताते हैं वह कैसे इस पूरे सिस्टम से युवा असंतोष की पहचान बन जाते हैं और शहीद हो जाते हैं.इसी ट्रीटमेंट ने रंग दे...को एक क्लासिक फ़िल्म का दर्जा दिया और हमारी अपेक्षाएं 'दिल्ली-६'से बढ़ गई.पर,अफ़सोस इस बार राकेश रिस्क नहीं ले पाये..फ़िल्म का ट्रेडिशनल एंड रखने के बजाये ओपन एंड ही रहता और रोशन(नायक) का किरदार उस दंगे की बलि चढ़ जाता तो मज़ा कुछ और ही होता.क्योंकि आज जिस तरह का परिवेश हमारे आकाओं (तथाकथित)ने रच दिया है उसमें ह्रदय-परिवर्तन की बाद थोडी अटपटी लगती है,एक दूसरे को मारने कूटने पर आमादा भीड़ यदि एक भाषण से रास्ते आ जाए तो हमारे आसपास ऐसे सैकडों भाषणबाजिये हैं.हिंदू धर्म में लाईफ को सर्कुलर माना गया है कि-'जीवन का अंत नहीं होता'-इसी कारण हमारे नाटकों में सुखांत का प्रावधान है और इसीसे सिनेमा में भी यह आया पर क्या हमारा सिनेमा ऐसा ही रहा है..नहीं .फ़िर भी ...राकेश से ऐसे अंत की उम्मीद नहीं थी.फ़िल्म चल रही है ,हिट भी हो जायेगी पर यह एक बढ़िया निर्देशक के सतही काम का नमूना है.. काश,अपने भीतर छुपे इस काले बन्दर को हम सभी देख लेतें .....तब शायद मसकली और बढ़िया से मटक पाती.

2/23/09

"जय हो"- रहमान,गुलज़ार साहब ,और रेसुल...


ऑस्कर अवार्ड्स का पिटारा खुल गया है और 'slumdog...'ने ८ मूर्तियाँ अपने हिस्से में डाल ली हैं.वाकई यह बहुत बड़ी खुशखबरी है कि भारतीय पृष्ठभूमि की ये कहानी दुनिया भर में पसंद की गई है.सभी चैनल वाले चीख-चीख कर बता रहे हैं कि भारतीय सिनेमा जगत में कमाल हो गया.पर क्या वाकई?दरअसल ,इस फ़िल्म के ऊपर मेरा कोई कमेन्ट नहीं है कि यह बुरी है,आप सभी की तरह मुझे भी फ़िल्म ठीक-ठाक लगी .पर क्या करूँ.१०० से ऊपर की रकम खर्चने के बाद भी मुझे मीरा नायर की "सलाम बॉम्बे"याद आती रही..बहरहाल यह एक अलग बात है. मेरी कठिनाई थोडी-सी इस बात को लेकर है कि अगर अपने डैनी भइया का नाम इस फ़िल्म के निर्देशक के रूप में नहीं जुड़ा होता तो क्या ....?और हमें खुशी किस बात को लेके होना चाहिए ..इस फ़िल्म को ८ ऑस्कर मिले हैं इस बात को लेकर या अपने रहमान,गुलज़ार साहब,रेसुल पोकुट्टी ने अपने बेमिसाल काम से वेस्टर्न हेकड़ी को अपने आगे झुका ही लिया.कम-से-कम मुझे तो यही लगता है कि,अपनी फ़िल्म है का राग जो बघार रहे हैं और खुशी के गुब्बारे सरीखे फूले जा रहे हैं उन्हें इतना तो समझ ही लेना चाहिए कि "जय हो...."-वाला अपना ऑस्कर है ...पर साथ ही ,"स्माईल पिंकी"की टीम को बधाई .रियली इस टीम ने इस वृतचित्र के माध्यम से उनलोगों के लिए एक राह खोली है जो सामाजिक मुद्दों की फिल्में (छोटी ही सही)बनाते हैं पर बड़ा मंच नहीं ले पाते और अंततः ये जिनके समस्याओं को लेकर बनाई जाती है उन्ही से दूर रह जाती है.
वैसे चाहे कुछ भी हो इस शर्मीले और सौम्य संगीतकार ने एक ऐतिहासिक पत्थर पे अपना नाम दर्ज कराकर हमारा मान बढ़ा दिया है..."जय हो".....रहमान.

2/15/09

यह एक्सटेंसन है देवदास का-देव डी


याद कीजिये जब आंखों में आँसू भरकर जाते हुए देवदास से चंद्रमुखी पूछती है-'फ़िर कब मिलना होगा?'-और देवदास इस बात को कहता है कि यदि अगला जन्म होता है तो मैं तुमसे दूर नहीं रह पाऊंगा '-संवाद कमोबेश ऐसा ही है -देवदास मर जाता है प्रेम की कसक दिल में लिए। पारो का जाने क्या हुआ(जैसा शरतचंद्र ने अपने नावेल में लिखा)। बहरहाल,देवदास देखने के बाद जो मन पे एक भारी पत्थर सा पड़ जाता था,वही उसको एक ख़ास फ़िल्म बनाता था। इस ट्रीटमेंट को चाहे वह बरुआ हो,रॉय हों ,या फ़िर भंसाली..सभी ने यूज किया । अनुराग कश्यप इन सबमें इसीलिए ख़ास हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने इसे पिछली फिल्मों की तरह सिर्फ़ भावनाओं का जाल पहना कर नहीं पेश किया -उन्होंने फ़िल्म में लगभग सभी जगहों पर नयेपन को दर्शाया है। इन्ही कुछ बिन्दुओं पर देव डी

१- पारो चमत्कृत करती है-याद कीजिये पिछली तीनों पारो को ,जो प्रेम और स्वाभिमान की मूर्ति थी,और अपने देव के लिए अंत तक आह भरती रही थी। देव डी की पारो इस maamle में अधिक क्रांतिकारी है। चाहे उसे अपने प्यार को जताना हो(गद्दे सायकल पे लादकर गन्ने के खेत में जाकर देव को अपने प्यार का अहसास कराना),अपने प्रेम का प्रतिदान ढीठाई से माँगना हो,या देव से उसके बारे में उल्टा-सीधा कहने वाले को सबक सिखाना । पर,इन सबके अलावे जो ख़ास बात उसके व्यक्तित्व की है वो ये कि ये पारो ना अपने सेक्सुअलिटी को लेकर कहे गए तीखे बातों को भूलती है ना ही फ़िल्म में अपने प्यार के टूट जाने का मातम मनाती है। यहाँ तक कि जब उसे मौका मिलता है तो उसे सूद समेत वसूलती है-"तेरी औकात बता रही हूँ...(देव से होटल के कमरे में का दृश्य याद कीजिये),देवदास को भव्य नायकों वाला व्यवहार नहीं बल्कि ठोस बराबरी का हिसाब किताब ,आख़िर पारो हमेशा क्यों भुगते..... । एकदम २१ वी सदी की नारी ..जो अपने शर्तों पर प्रेम करती है,फ़िर चाहे वह सेक्सुअलिटी के स्तर पर हो,या सामाजिक प्रदर्शन के स्तर पर..ये लड़की बरबस ही मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है..फ़िर ये भी कि अपनी शादी में जी खोल कर नाचने का साहस अब भी कितनी लडकियां कर पाती हैं..

२-चंदा को अबकी निराश नही होना पडा ...
एक ऐसी स्त्री जिसने प्रेम की खातिर अपना सब कुछ छोड़ दिया और प्रतिदान में उसे मिला ये कि,शायद पिछले जनम में उसका देव उसे मिल जाए...कल कि किसने देखा है...देवदास के सभी पुराने संस्करणों में यह हूक हमारे दिल में रह ही जाती थी कि ओह..बेचारी चंद्रमुखी...-पर,अनुराग ने इस चंदा को उस हूक के साथ सीन से गायब नहीं किया है बल्कि देवदास को अंततः उसीको मिलते दिखा कर उस विरहाकुल प्रेम का सुखद अंत करा दिया है...यानी दो, समाज से लगभग दुत्कार दिए गए ,व्यक्ति अंततः अपनी दुनिया ख़ुद रचते हैं और जीवन को चुनते हैं ना कि कोरे स्याह और भयानक नैराश्य को..चंदा लकी रही है इस बार ....वैसे भी इस विदेशी बाला चंदा(कल्कि)ने किरदार को जीने की भरपूर कोशिश की है और सफल भी रही है.
3-देव डी यानी फुल पैकेज ऑफ़ मनोरंजन...
अपने पूर्वर्ती सभी देवों की तरह ये देवदास उप्स देव डी ..सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाता और इतना ही नही यह कान का कच्चा भी है.तभी तो अपनी बेवकूफी में अपने प्रेम के स्त्रीत्व को ही गाली दे बैठता है..पर मानिनी नायिका पारो टेसुए नहीं बहती बल्कि जवाबी हमले में अपनी शादी का जश्न मनाती है.पर इन सब के उलट देव का यह किरदार अधिक पोजिटिव है,मेरे ऐसा कहने के पीछे दो बातें है पहली तो ये कि-बार -बार कई बार मैंने देवदास फिल्में देखी हैं और हर बार की तरह इस बार भी इस बेचारे देवा को मरते देखने का साहस अब नहीं था -शायद अनुराग नई पीढी की इस डीमांड को समझ गए थे....इसलिए यह देवदास उप्स (फ़िर गलती हो गई)देव डी (ढिल्लों)अंत में जीवन की कड़वी सच्चाई को अक्सेप्ट करता है और अपनी चंद्रमुखी को झूठा दिलासा नहीं देता कि अगले जनम में शायद...और उसके साथ वह अपने प्रेम के नए संसार में निकल पड़ता है..सच मानिए आप लोगों की बात तो नहीं जानता पर हाँ ...मुझे ये बड़ा सुखद लगा कि चलो अब देव प्रैक्टिकल हो गया है अपनी नादानी से बाहर निकल के.साथ ही पार्श्व से आते शब्द इस दृश्य को और अधिक जिंदादिल बना देते हैं-'भर ले ज़िन्दगी रौशनी से भर ले'-यह देव हमारे अपने आसपास का है ..अब शायद ऐसे नौजवानों को जो पिछले प्रेम में धोखा खा गए हैं और अब फ़िर से एक नई गाँठ बाँधने की जुगत में हैं उन्हें शायद देव डी ही बोला जाने लगेगा ....देवदास बनने का ज़माना गया यह २१ वी सदी है यहाँ निराशा नहीं .इस प्रसंग में एक और बात आती है कि -चुन्नी (दिव्येंदु भट्टाचार्य)दिल्ली के बाहर से आने वाले लड़कों -नौजवानों के बीच पसरे इस जुमले को बड़े चुटीले अंदाज़ में परोसता है कि दिल्ली की कुडियां ...बाप रे बाप...-वह देव को कहता है-दिल्ली में बिल्ली मारो ,खा लो,पालो मत.-क्या वाकई ?अनुराग का इस शहर से खासा जुडाव रहा है...
-------शरतचंद्र के साथ कोई अन्याय नहीं हुआ .ये कोरी भावुकता है...शरत बाबु की कालजयी कृति से अनुराग ने महज अपने हिसाब से मैटेरिअल लिया है .और अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा भी है कि २१वी सदी देवदास है तो हमारे सामने यह तो एकदम साफ़ है कि हम जो देख रहे हैं या देखने जा रहे है वह धोती वाला पारंपरिक नायक नहीं है बल्कि ऐसी पीढी का युवक है अपने तमाम झंझावातों के बावजूद अंततः जीवन में यकिन रखने वाला है.इसके लिए उन सो कोल्ड सामाजिक वृतों का कोई मायने नहीं हैं जिनका कोई सर-पैर नहीं है..इसीलिए वह समाज की तमाम सच्चाईयां स्वीकारता है और एक ऐसी औरत को संगिनी स्वीकारता है जिसका वजूद इस समाज में कम-से-कम स्वीकार वाला तो नही ही है.-स्वीकार का ऐसा साहस यही नया देव ही दिखा सकता है-यह कहीं से शरत बाबु के आदर्शों का ,प्रेम का मजाक नहीं बनाता बल्कि उसको एक नई उंचाई देता है... अनुराग कश्यप कहीं से कुछ फालतू नहीं ठूंसते ....१८ गाने होने के बावजूद सभी फ़िल्म में सिचुएशन के प्रवाह को बनाने में ही मददगार होते हैं......."इमोशनल अत्याचार"का यह अनुरागीय तरीका वाकई अनुराग के लिए सैल्यूट करने पर मजबूर करता है.फ़िल्म के अन्य पक्षों पर क्या कहा जाए...सभी पूरे हैं फुल टू ढंग के और अपने-अपने खांचे में एकदम फिट.हिन्दी फिल्मजगत को इस बार एक नए किस्म की फ़िल्म मिली है जो अधिक समय तक याद रखी जायेगी नंबर १ और चोपडाज की स्टीरेओ टाइप फिल्मों से राहत देने वाली............

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...