9/11/14

चाचा चौधरी एंड कंपनी

पश्चिमोत्तर बिहार के उस जिले में बिजली का न होना रोजमर्रा की बात थी और पर इससे हम स्कूल गोइंग बच्चों को कोई शिकायत भी नहीं थी। रात को लालटेन की रोशनी में किताबों के बीच में आठ आने फी कॉमिक्स मिला करती और इसका गणित भी एकदम साफ़-सफ्फाक था। मसलन कॉमिक्स पाँच रुपये की तो उसका किराया उस मूल्य का दस फीसदी होता था यानी पचास पैसा। यह किराए का कॉमिक्स अट्ठारह से चौबीस घंटे के लिए लिया जाता था। जिसे जैसा है, वैसी ही हालत में लौटाया जाना अनिवार्य होता था। शहर में बेशक कॉन्वेंट और सरकारी स्कूलों के बच्चों के बीच के भेद को हम कई तरह से आंक सकते हैं पर कॉमिक्स के मामले में छात्र एकता का कोई सानी नहीं था। होता भी कैसे उन कॉमिक्सों के किरदारों ने हम सभी बच्चों में नाभि-नाल संबंध जोड़ा था। हम सबकी दिनचर्या लगभग एक-सी थी। दिन-भर स्कूल और शाम को हमलोग कभी अपने शहर के अभय पुस्तकालय तो कभी राज पुस्तकालय तो कभी किसी नई-नई खुली कॉमिक्स लाइब्रेरी से मनोज कॉमिक्स, राज कॉमिक्स, तुलसी कॉमिक्स, इंद्रजाल कॉमिक्स लाते थे, लेकिन इन सभी कॉमिक्स में जिस कॉमिक्स का क्रेज हममें सबसे अधिक था या यूँ कहें कि जिससे हम अधिक कनेक्ट हो पाते थे वह डायमंड कॉमिक्स और उसकी चाचा चौधरी की श्रृंखला थी। हम सभी दोस्त और भाई-बहन हर महीने के पहले हफ्ते में इस सीरिज का बेसब्री से इंतज़ार किया करते थे और चूँकि मुझे साइकिल चलानी आती थी और शहर के लगभग हरेक मोहल्ले, चौक के कॉमिक्स लाइब्रेरियों की खबर मुझे ही होती थी, इसलिए इनको लाने की जिम्मेदारी मुझे मिलती थी। यह सभी कॉमिक्स स्कूल बैग में छुपा कर लाये जाते थे।  जिन्हें पिताजी के डर से दिन में पढना मुश्किल होता था पर सबके सोने के बाद रात को लालटेन की रौशनी में आँख गड़ाकर किताबों के बीच रखकर पढ़ा जाता था। इस तरह की प्रोफेशनल ईमानदारी अब शायद नहीं बची, जो ईमानदारी हमने प्राण अंकल के रचे किरदारों के साथ बरती थी। बहरहाल, एक रोज पिताजी रात को किताबों में छिपा कर पढ़े जाने की हमारी कौमिक्सिया आदत को भांप गए। पिताजी की सैद्धांतिक मान्यता थी कि कॉमिक्स की संगत में बच्चे बिगड़ जाते हैं, अपनी पढ़ाई से उनका डेविएशन हो जाता है। सो,  तबियत से हमारी पिटाई हुई, मुर्गा बनाया गया, हमारे खजाने के तमाम कॉमिक्स की खोजबीन करके उसी रात उनका होलिका दहन हुआ और हमसे गंगाजली उठवाकर कसम ली गयी कि हम आज से कॉमिक्स नहीं पढेंगे। मुझे आज भी यह अंदेशा है, यह गद्दारी मेरी बड़ी दीदी की करामात थी। जिसका परिणाम दीदी के लिए यह हुआ कि मैं और मेरा छोटा भाई थोड़ी बड़ी क्लास में जाने पर इतिहास में पलासी युद्ध के कारण आदि पढ़-लिख गए तो दीदी को बात-बात में मीर जाफर की उपाधि देने लगे।  कुल मिलाकर इस पूरे घटनाक्रम की एवज में दो बातें हुईं, एक तो यह कि हम गंगाजल की लाज नहीं रख पाए और ईश्वरीय भय से मुक्त हुए। दरअसल हम प्राण अंकल और चाचा चौधरी, चाची, साबू, राकेट और अपने अन्य किरदार साथियों पिंकी बिलू, रमन जी इत्यादि से अपना नाता तोड़ने को किसी भांति राजी नहीं हुए। सच कहें तो दिल माना नहीं। दूसरी बात यह हुई कि एक अजीब तरह की ढीठता व्यवहार में आ गयी, माने हमलोग किसी और जगह छुपकर पढ़ने लगे थे।  मगर यह सच है कि हममें अब ढीठता तो थी पर पिताजी या अन्य बड़ों के प्रति सम्मान की कीमत पर इसे बदतमीजी हरगिज नहीं कहा जा सकता था। हाँ! कॉमिक्स पढ़ने में रणनीतिक तब्दीलियाँ आ गयी गयी थी। चाचा चौधरी एंड कंपनी ने हमें बदतमीजी की शिक्षा कभी नहीं दी। अन्य स्कूलों की ही तरह प्राण अंकल के इस स्कूल में भी आदमियत का पाठ पढ़ाया जाता था। अच्छाई का दामन थाम मानवता की सेवा का भाव हममें भरा जाता था। असल में प्राण अंकल के रचे किरदार डक टेल्स, मिकी माउस, टॉम ऍन जेरी वाली मासूमियत वाले किरदार थे, जो फीलगुड संस्कृति के पैरवीकार थे। पर यह बात पिताजी और हमारे संत जोसेफ स्कूल के उसूलपसंद प्राचार्य श्रीमान एम.सी. मैथ्यू को कौन समझाए? उनके लिहाज से यह एक बेहद खराब आदत थी और शायद ड्रग एडिक्शन से भी अधिक ख़राब। किसी का क़त्ल करने से भी अधिक बुरा। हमारे स्कूल प्रिंसिपल के माथे भी कई कॉमिक्सों को फाड़ने और हमारी जमात के कई बच्चों को सजा देने का पाप है। इन सबमें जो अधिक चुभने वाली बात थी वह यह कि हमारे बड़े चाचा चौधरी की सामाजिक-मानसिक अहमियत समझने को राजी नहीं थे, जबकि पश्चिम के स्पाइडरमैन, ही-मैन, सुपरमैन, बैटमैन इत्यादि के सामने प्राण अंकल ने खांटी देशी पगड़ी और हाथ में लट्ठ लेने वाले चाचा चौधरी को खड़ा किया, जिनका दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता था। यह प्राण अंकल की ही योग्यता थी कि उन्होंने हम कस्बाई बच्चों के जेहन में कंप्यूटर का नाम तब घुसा दिया था, जब कंप्यूटर व्यवहार में तो दूर आम बोलचाल में भी नहीं थे। मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया पर चाचा चौधरी के बारे में लिखा है कि चाचा चौधरी की रचना चाणक्य के आधार पर की गयी है, जो बहुत बुद्धिमान व्यक्ति थे। मुझे इस उदाहरण से थोड़ी आपत्ति है। चाचा चौधरी और चाणक्य की साम्यता महज बुद्धि के आधार पर करना जायज नहीं। वह जैसे हैं बस अनूठे और अपने में एक ही हैं। न भूतो ना भविष्यति। यकीन नहीं होता तो उन तमाम बच्चों से पूछिए जो अब मध्यवय की ओर अग्रसर है और जिन्होंने प्राण अंकल के अचानक जाने के बाद अपने बचपने की ओर एकाएक दौड़ लगायी है। वैसे हमारी भावनाओं से अलग पिताजी और समूह को इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता था कि चाचा जी के साथ ज्यूपिटर ग्रह का वासी बलशाली साबू भी रहता है, जो चाचा जी के चातुर्य और अपनी ताकत से बुरी ताकतों को धूल चटा देता है। हमारे लिए यह घोर आश्चर्य का विषय था कि उनका इन बातों से भी कुछ लेना-देना नहीं था कि वर्ष 1995 में प्राण अंकल का नाम ‘लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स’ में दर्ज हुआ अथवा ‘द वर्ल्ड एंसाइक्लोपीडिया ऑफ़ कॉमिक्स’ ने उन्हें ‘भारत का वाल्ट डिज्नी’ घोषित किया। उन्हें इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि अमेरिका के ‘इंटरनेशनल म्यूजियम ऑफ़ कार्टून आर्ट’ में प्राण अंकल के इस कार्टून स्ट्रिप चाचा चौधरी को स्थायी रूप से जगह दी गयी है।  इतना ही नहीं ‘रमन हम एक हैं’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय एकता के लिए भी सम्मानित किया गया। बहरहाल, कॉमिक्सों से हमारे याराने ने कई दफे, कई बार खूब पिटाई करवाई पर चाचा चौधरी, साबू, चाची, बिल्लू, पिंकी, श्रीमतीजी, रमन, गब्दू, बजरंगी पहलवान, जोजी, भीखू, तोषी, गोबर सिंह, डगडग, राकेट, धमाका सिंह आदि के साथ अपनी तगड़ी वाली दोस्ती हो गयी थी। किस तरह से वैद्यराज चक्रमाचार्य की जहर लिख कर छुपाई हुई दवा को पुलिस से बचने के लिए डाकू राका पी गया और जिसकी वजह से वह कभी न मर सकने वाला विलेन बन गया, यह हमारे लिए हमेशा आश्चर्य की बात थी। धमाका सिंह और गोबर सिंह की कारस्तानियों ने भी हमारा खूब मनोरंजन किया, इनसे दो-चार हुए, अंत में एक राज की बात यह कि मैंने और मेरे छोटे भाई रिंकू ने अपने कॉमिक्स के जखीरे से एक पार्ट टाईम कॉमिक्स लाइब्रेरी (सरस्वती पुस्तकालय) अपने घर के पीछे भूसा रखने वाले दालान में खोला था, चूँकि उधर की ओर पिताजी आते नहीं थे, सो कुछ दिन यह चला पर बाद में फिर वही ‘मीर जाफर’ तो हर ओर थे। पिताजी ने फिर खबर ली। पर प्राण अंकल के अचानक जाने के साथ यह सब क्षण एकाएक दिलो-दिमाग में कौंध गए। सच कहें तो इन सबको याद करके गुदगुदाहट-सी अब भी होती है। वह जो लालटेन की रौशनी में किताबों के भीतर छुपाकर इन कॉमिक्सों को पढ़ना था, वह जो मार खाकर भी इनको पढ़ने का जो जज्बा था, वह किरदारों के साथ जीने मरने का जो जज्बा था, वह जो जेबखर्ची बचाकर कॉमिक्स पुस्तकालय से इन्हें ला कर पढ़ने का जज्बा था, वह जो शहर में खुलने वाले हर पुस्तकालय का तुरंत मेंबर होना था, वह दीवानगी इन्हीं हाथों से रचे जादू की थी। ऐसे ही सोने की कलम थामे चित्रों को जबान देने वाले प्राण अंकल आपको अंतिम सलामी। आपने अपने किरदारों से हमारे भीतर आदमियत भरी। उनका यह कथन कि ‘यदि मैं लोगों के चेहरे पर एक मुस्कान ला सका तो मैं अपने जीवन को सफल मानूँगा’ उन्हें विश्व के कुछ महान सर्जनात्मक प्रतिभाओं के साथ खड़ा कर देता हैसाहिर ने एक नज्म चाचा नेहरु के देहांत पर लिखी थी प्राण अंकल! मैं इन पंक्तियों को आपके लिए उधार लेता हूँ “जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है, जिस्म मिट जाने से इंसान नहीं मर जाते”  

Published in सबलोग(मासिक पत्रिका), सं. किशन कालजयी, अंक सितम्बर 2014  

9/8/14

लोक संस्कृति बरअक्स लोकप्रिय संस्कृति (राजीव रंजन गिरि)

रात नाच महोत्सव समिति, बिलासपुर लोक पर केंद्रित पत्रिाका 'मड़ई' का वार्षिक प्रकाशन करती है। यह पत्रिाका निःशुल्क वितरित होती है। डॉ. कालीचरण यादव के संपादन में इस पत्रिाका ने रचनाकारों-पाठकों के बड़े समुदाय को जोड़ा है। लोक के विभिन्न पहलुओं में दिलचस्पी रखने वाले पाठक यह पत्रिाका डॉ. कालीचरण यादव, बनियापारा, जूना बिलासपुर, बिलासपुर, छत्तीसगढ़- ४९५००१ को पत्रा लिखकर भेजने का आग्रह कर सकते हैं। लोक पर केंद्रित इस पत्रिाका के २४ अंक प्रकाशित हो चुके हैं। लिहाजा, आगामी अंक इसका रजत जयंती अंक होगा।
लोक के विभिन्न आयामों को समेटने वाली इस पत्रिाका का मौजूदा दौर में 'लोक' की प्रकृति, चरित्रागत बदलाव आदि को लेकर चिंता लाजिमी है। 'मड़ई' के चौबीसवें अंक के संपादकीय और कुछेक लेखों में इस पर विचार किया गया है। अपनी चिंता और सरोकार को शब्द देते हुए कालीचरण यादव ने लिखा है कि लोक संस्कृति एक अवधरणा के रूप में मनुष्य की सामूहिक चेतना की सहज अभिव्यक्ति है। वह मनुष्य के सामाजिक अनुभवों का सर्जनात्मक रूपांतरण है। लोक मंगल की कामना उसका सारतत्व है। उसकी वस्तु में जीवन की नैसर्गिक लय होती है। वह स्थानीय हो सकती है और उसमें मनोरंजन के भरपूर तत्व भी हो सकते हैं, परंतु उसका एक सामाजिक चरित्रा होता है। वह व्यक्ति को समूह के भीतर लाती है और उसका सर्वांगीण परिष्कार करती है। लोक संस्कृति में सार्वकालिक मानवीय मूल्य अंतर्निहित होते हैं। सामूहिकता उसकी सबसे बड़ी विशेषता है और सामाजिक सहकार उसका अर्थपूर्ण संदेश है। लोक संस्कृति की चिंताएं मानवीय होती हैं और इसीलिए वह मनुष्य को अध्कि सामाजिक और अध्कि मानवीय बनाती है। दरअसल वह सामूहिक रचनात्मकता का प्रतिपफल है। जिसे लोग सामूहिकता में ही पढ़ते हैं। वस्तुतः वह समूह की, समूह के लिए, समूह के द्वारा अभिव्यक्त सर्जनात्मकता है।
अब सवाल उठता है कि मौजूदा दौर में ऐसा क्या है द्घटित हुआ है कि लोक के प्रति लोगों की चिंता बढ़ गयी है। कहना न होगा कि यह लोकप्रिय संस्कृति है। लोकप्रिय संस्कृति यानि पॉपुलर कल्चर यानी पॉप कल्चर। इस लिहाज से देखें तो कहना होगा कि 'लोक संस्कृति' और 'लोकप्रिय संस्कृति' में पफर्क है। विचार योग्य बात यह है कि क्या 'लोकप्रिय संस्कृति' ;पॉपुलर कल्चर के अर्थ मेंद्ध 'लोक संस्कृति' का विस्तार, विकास अथवा अगला पड़ाव है? या 'लोक संस्कृति' के बरअक्स अपनी जगह बना रही 'लोकप्रिय संस्कृति' बिल्कुल प्रतिलोम है? आनेवाले समय में 'लोक संस्कृति' की जगह क्या 'लोकप्रिय संस्कृति' ही बचेगी? क्या 'लोकप्रिय संस्कृति' 'लोक संस्कृति' को लील जाएगी? इन सवालों पर विचार करने वाले बु(र्ध्मियों को 'मड़ई' के संपादकीय, सुरेंद्र वर्मा और प्रखर युवा आलोचक जयप्रकाश के आलेखों पर गौर पफरमाना चाहिए। बकौल कालीचरण यादव, 'हमारा समय बाजार के उत्कर्ष का समय है। आज सब कुछ का बाजार है और सब कुछ बाजार है।' यह सही है कि बाजार का अस्तित्व प्राचीन काल से ही रहा है परंतु पहले बाजार वस्तु विनिमय का केंद्र था। वह समाज की अनिवार्य आवश्यकता था। उसके माध्यम से मनुष्य और समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी। इसलिए पहले का बाजार एक स्वाभाविक और नैसर्गिक बाजार था। आज के बाजार को हम इस अर्थ में अस्वाभाविक और अप्राकृतिक कह सकते हैं कि वह पहले उपभोग की कृत्रिाम परिस्थितियां पैदा करता है। गौण वस्तुओं की आवश्यकताओं का आरोपण करता है। उसके द्वारा पोषित-पालित उपभोक्ता संस्कृति लुभावने विज्ञापनों के माध्यम से पूरे समाज पर अपना प्रभुत्व स्थापित करती है। इस बाजार की अपनी एक विचारधरा है। उसका अपना एक नियम है, शैली और शिल्प है। इस बाजार की अपनी एक संस्कृति होती है जो वास्तविक लोक संस्कृति के समानान्तर लोकप्रियता के नाम पर लोगों पर थोपी जाती है। लोकप्रिय संस्कृति को मुनापफे से जोड़कर देखा जाता है। वह बाजार के हितों के अनुकूल होती है। लोकप्रिय संस्कृति को प्रौद्योगिकी के माध्यम से लोकप्रिय बनाया जाता है। इस प्रकार लोक संस्कृति की समूहगत रचनात्मकता का विरूपण व अवमूल्यन किया जाता है। लोकप्रिय संस्कृति, लोक संस्कृति के लिए आज सबसे बड़ी चुनौती है।
कालीचरण जी ने 'लोकप्रिय संस्कृति' को मोटे तौर पर बाजार की पैदाइश बताया है। गौर से देखने पर ज्ञात होता है कि 'लोकप्रिय संस्कृति' ;पॉपुलर कल्चरद्ध तीन मकार के सहारे पैदा और विकसित होती है। ये तीन मकार हैं- मनी, मार्केट और मीडिया। यही कारण है कि इन तीन मकारों के विकास और व्याप्ति के साथ-साथ 'लोकप्रिय संस्कृति' भी बढ़ती जा रही है और इसका दायरा विकसित होता जा रहा है। लोकप्रिय संस्कृति से लोक संस्कृति को मिलने वाली चुनौती के मद्देनजर इसकी सुरक्षा पर विचार करते हुए कालीचरण यादव ने इसरार किया है कि 'हमें लोक संस्कृति की सीमाओं को भी समझना होगा। लोक संस्कृति की समर्थता को रेखांकित करते हुए उसकी नयी अवधारणा विकसित करनी होगी, नए परिप्रेक्ष्य बनाने होंगे। अब लोक संस्कृति की शु(ता और मौलिकता का आग्रह बहुत प्रासंगिक नहीं रह गया है। लोक संस्कृति को काल सापेक्ष बनाना होगा। लोक संस्कृति को ऐतिहासिक विकास की निरंतरता से जोड़ना होगा। लोक संस्कृति रूढ़ियों और परंपराओं के दुहराव का नाम भर नहीं है। हमारी परंपरा में जो कुछ भी सुंदर है, जो कुछ भी सकारात्मक है, उसे आत्मसात करते हुए लोक संस्कृति को नई सर्जनात्मकता से जोड़ना होगा। हमारे समय की चिंताओं से जुड़कर ही वह सामूहिक सर्जनात्मकता को पल्लवित कर सकेगी। अतः जरूरी है कि लोक संस्कृति के नए प्रतिमान गढ़े जाएं, नई अवधरणाएँ विकसित की जाएं। आज के प्रतिकूल समय में लोक कला के विभिन्न रूपों में मानवीय चिंताओं के लिए स्पेस बनाना होगा। उसकी कालब(ता सुनिश्चित करनी पड़ेगी। जिससे हमारी लोक संस्कृति जन शिक्षण का माध्यम बन सकेगी। इस प्रकार वह अपने प्रतिरोधत्मक तेवर को अध्कि अर्थवान और धरदार बना सकेगी तथा बाजारोन्मुखी लोकप्रिय संस्कृति का सशक्त प्रतिपक्ष और विकल्प भी बन सकेगी।' गौर करने लायक बात है कि लोक संस्कृति 'बहता नीर' की तरह होती है। यह 'कूप जल' नहीं होती। हालांकि जो लोग लोक संस्कृति को 'कूप जल' की तरह समझते हैं, उन्हें भी यह सोचना होगा- जैसा कि कालीचरण जी ने बताया है- कि यह रूढ़ियों और परंपराओं के दुहराव का नाम भर नहीं है। मोटे तौर पर कालीचरण जी की बात ठीक है, पर गहराई से विचार करें तो पता चलेगा कि रूढ़ि भी परंपरा नहीं होती। रूढ़ि और परंपरा में भी पफर्क है। परंपरा ऐतिहासिक विकास क्रम में बदलती-परिवर्तित होती जाती है। जबकि रूढ़ि तो है ही रूढ़ि, यह बदलती नहीं है।
इस लिहाज से देखें तो 'कूप जल' भी शब्द के सच्चे अर्थों में रुढ़ि नहीं है। कारण कि 'कूप जल' नित्य नया, ताजा होता रहता है। कुंए में अपने जल की मात्राा को बढ़ाने और निथारकर सापफ करने की क्षमता होती है। 'कूप जल' की जड़ें गहरी होती हैं। ऊपर से भले 'कूप जल' प्रवाहित होते न दिखे पर वह प्रवाहमान होता है। बहरहाल, नए बदलते माहौल में 'लोक संस्कृति' भी बदलेगी और अर्थवत्ता ग्रहण करेगी।
आलोचक जयप्रकाश ने इस मुद्दे को ठीक नोट किया है कि लोक संबंध्ी चिंताएं दो भिन्न ध्रातलों से उठ रही हैं, एक तरपफ लोक के प्रति संरक्षणवादी विचार-दृष्टि है, दूसरी ओर समर्पणवाद है। संरक्षणवादी इस लोक संस्कृति की रक्षा की गुहार लगाते हुए व्याकुल हैं जिसका स्वभाव ही निरंतर बदलाव का है और जो शु(ता के आग्रह का सदैव तिरस्कार करती है, बाहरी प्रभावों के प्रति वह अत्यंत संवेदनशील होती है और उन्हें ग्रहण कर निरंतर पुनर्नव होती है- सच कहा जाए तो उसकी जीवनी-शक्ति का स्रोत उसकी साभ्यतिक संवेदनशीलता में छिपा है। दूसरी तरपफ समर्पणवादी उस लोक संस्कृति को पूंजी-नियंत्रिात और बाजार-केंद्रित भोगवाद की आंध्ी में झोंक देना चाहते हैं जो वैयक्तिक सुखमय की बजाय सार्वजनिक आनंदवाद को लक्ष्यीभूत है- जिसका बुनियादी सरोकार लोकमंगल है। वे मान बैठे हैं कि मॉस कल्चर का प्रतिरोध् संभव नहीं रह गया है। इसलिए यदि वह लोक को लील ले तो यह अंचरज की बात न होगी।
अपने अपने तालिबान
आलोक कुमार सातपुते ने लद्घुकथा को अपनी रचनात्मकता की प्रमुख विधा बनाया है। 'अपने-अपने तालिबान' ;नवचेतन प्रकाशन, दिल्लीद्ध इनकी लद्घुकथाओं का संग्रह है। लद्घुकथा की विशेषता यह होती है कि इसके जरिए रचनाकार अपना विचार, अपना संदेश बेहद कम शब्दों में सीधे-सीधे पाठकों तक पहुँचा देता है। सातपुते की लद्घुकथाएँ भी इसी लिहाज से सपफल हैं। इन लद्घुकथाओं में भारतीय समाज में पफैली विसंगतियों, अंधविश्वासों, रूढ़ियों और वर्चस्ववादी ताकतों की कलई उतारी गई है। इन लद्घुकथाओं में कहीं हास्य है तो कहीं व्यंग्य की धार, जो कभी चिकोटी काटती हैं तो कभी तिलमिला देती है।
आलोक कुमार सातपुते की लद्घुकथाओं की इन विशेषताओं के साथ कुछ कमजोरियों पर भी बात करनी जरूरी है। सातपुते का मानना है कि 'साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा लद्घुकथा के बारे में कापफी सारी बातें कही जाती हैं। कोई इसको चुटकलेबाजी बताता है, तो कोई इसे साहित्य में प्रवेश का बैकडोर कहता है। वास्तव में यह लद्घुकथा को हाशिए पर ले जाने के षड्यंत्रा के तहत बुर्जुवा वर्ग के साहित्यकारों द्वारा पफैलाया गया भ्रमजाल है।' अव्वल तो यह है कि सातपुते के इस मत का आधार क्या है कि लद्घुकथा ही सबसे लोकप्रिय विधा है? साथ ही इसे हाशिए पर ले जाने का षड्यंत्रा बुर्जुवा वर्ग के साहित्यकार कर रहे हैं? जरा सोचिए अगर ये षड्यंत्रा है भी तो इसका बुर्जुवा वर्ग से क्या मतलब? आखिरकार वो कौन कौन से लोग हैं जो इसमें शामिल हैं। बहरहाल इस तर्क हीन बातों के बारे में क्या कहा जाए? इसी तरह 'तुलसी दास का कोर्ट मार्शल' लद्घुकथा में सातपुते का दलित पात्रा कवि तुलसीदास पर आरोप लगाता है कि 'आपने राम को अपने ही जैसा ब्राह्मणवादी बना दिया, और उसके हाथों शूद्र शंबूक का वध करवा दिया।' अब कौन बताए सातपुते जी को कि तुलसीदास के 'रामचरितमानस' में शंबूक वध का प्रसंग ही नहीं है। वाल्मीकि, भवभूति से तुलसी दास की काव्य यात्राा में इस प्रसंग में आये बदलाव के जरिए बदलते ऐतिहासिक सामाजिक परिपे्रक्ष्य को समझा जा सकता है। आलोक कुमार सातपुते ने बगैर जाने समझे इस पर लद्घुकथा लिख दी। बहरहाल...। 

डॉ.राजीव रंजन गिरि  द्वारा लिखित यह लेख साभार लिया गया है 

एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...