7/30/11

लकीर-हबीबी लांघने की असफल कोशिश-"बहादुर कलारिन"

'बहादुर कलारिन' मूलतः छत्तीसगढ़ी लोक कथा का हबीब तनवीर द्वारा नाट्य रूपांतरण है | इस नाटक को नया थियेटर की मशहूर और भारतीय रंगजगत की बेहतरीन अभिनेत्रियों में शुमार 'फ़िदा बाई'के गुजर जाने के बाद हबीब तनवीर ने इस नाटक को करना बंद कर दिया,उनका मानना था कि बहादुर कलारिन की किरदार की जितनी परतें हैं वह सबके बस की बात नहीं,इसलिए फ़िदा बाई के चले जाने के बाद मैंने यह नाटक बंद कर दिया | हबीब साहब के रंगकर्म को नजदीक से जाने वाले यह बखूबी जानते हैं कि बहादुर कलारिन भले ही चरणदास चोर जितना मशहूर न हुआ हो पर यह नाटक हबीब तनवीर के दिल के काफी करीब था | इस नाटक को कुछ वर्ष पहले रायपुर में कुछ रंगकर्मियों ने खेलने की कोशिश की थी,पर उनका यह प्रयास एक कमजोर प्रयास बनकर रह गया बहादुर कलारिन का नाटकीय तनाव इसकी जान है और इसको सँभालने के लिए कुशल निर्देशन और दक्ष अभिनेताओं की मांग करता है | २९ जुलाई को दिल्ली के कमानी सभागार में संगीत नाटक अकादमी के सौजन्य से दर्पण लखनऊ की टीम ने इस नाटक को अवधि-हिंदी मिश्रित जबान में श्री उर्मिल कुमार थपलियाल के निर्देशन में खेला | अवधी और हिंदी के मेल,लोक-संगीत का प्रयोग तथा रंग-छंगा की मंचीय उपस्थिति कराकर थपलियाल जी ने नाटक के लोक तत्वों को भरसक जीवित करने की कोशिश की पर यह बात कहावत में ही अच्छी लगती है कि तबियत से पत्थर उछाला जाये तो आसमान में सुराख हो सकता है | हबीब तनवीर ने जो लकीर खींच दी है वह लकीर लांघना सबके बूते की बात नहीं है | थपिलियाल इससे अछूते नहीं रह सके | बहादुर कलारिन की इस प्रस्तुति में रूपांतरण करते हुए एक बड़ी गलती तो यही पर उभर कर सामने आ जाती है जब राजा के मरने के बाद के दृश्य में सीधे शादियों का दृश्य प्रस्तुत कर दिया जाता है | इस नाटक में जिस इन्सेस्ट की ओर इशारा है और जिस वजह से यह कहानी ईडिपस कॉम्प्लेक्स के साथ एक महान दुखांत की जमीन तैयार करती है,वह दर्पण की प्रस्तुति से गायब दिखा | जबकि मूल कथानक में राजा की मृत्यु पश्चात विलाप करती बहादुर पहली बार अपने जवान होते बेटे 'छछान'के गले लगती है और छ्छान के मन में पहली बार इन्सेस्ट का मनोरोग अपनी ही माँ के प्रति जागता है | बाकी की कसर छ्छान बने अभिनेता ने पूरी कर दी | ग्रामीणों के अभिनय में नैसर्गिकता का अभाव साफ़ दिखा
बहादुर के किरदार को दबंग और चंचल दिखाने में भी साफ़ कमी रही और इसी वजह से राजा या छ्चान वाले गंभीर दृश्यों में भी दर्शकों को हंसी आ रही थी | जब गंभीर अभिनय क्षण पर दर्शकों को आप बाँध न सकें तो इसके मायने यह हुआ कि या तो निर्देशक अपनी किस्सा बयानी ठीक नहीं रख सका है अथवा अभिनेताओं ने किरदार गहराई से नहीं किया | जबकि पहली बार जब बहादुर कलारिन कोरबा के खुले मंच पर खेला और कारखाने के कामगारों और देहातियों द्वारा देखा गया तब यह ट्रेजेडी शुरू से आखिर तक सन्नाटें में देखी गयी थी | इसकी वजह साफ़ है कि नाटक के क्रियाव्यपार में प्रेक्षकों को अनुभव की तीव्रता और गहराई दिखाई दी | वैसे भी रंगमंच की अपेक्षा का वास्तविक अर्थ नाटक के मंच पर अभिनेताओं के माध्यम से दृश्य रूप में मूर्त हो सकने की क्षमता और दर्शकों को बाँध लेने के सामर्थ्य से जुड़ा है | इस दृष्टि से भी थपलियाल अपनी इस प्रस्तुति में असफल रहे
मूल बहादुर कलारिन में गीतों की योजना उसके कथा विस्तार को ताकत देती है | 'अईसन सुन्दर नारी के ई बात ,कलारिन ओकर जात / चोला माटी का हे राम एकर का भरोसा / होगे जग अंधियार,राजा बेटा तोला का होगे-जैसे गीत इस ट्रेजेडी को एक सार्थक ऊँचाई देते हैं पर अवधी भाषा (बोली) की यह प्रस्तुति इस ओर से भी निराश करती है | लोक आख्यान 'बहादुर कलारिन'का नाट्य रूप तैयार करते समय नाटककार हबीब तनवीर के सामने 'राजा ईडिपस'की कथा थी,तो दूसरी ओर इन्सेस्ट का मनोरोग भी | इन्सेस्ट की इसी मनोवृति ने इस नाटक को त्रासद रूप दिया क्योंकि उन्होंने इस नाटक के कथानक के सफल बुनावट के लिए मनोविज्ञान के इसी आदिपक्ष 'ईडिपस कॉम्प्लेक्स' और आत्मरति ग्रंथि यानि 'न्यूरोसिस कॉम्प्लेक्स' के सिद्धांत को अपनाया है और जब यह दृश्य नाटककार-निर्देशक के मन में साफ़ हो तो नाटक का कथानक मंच पर खुलकर प्रेक्षकों के सामने आता है पर अफ़सोस लगभग डेढ़ घंटे का समय लेकर भी अवधी की बहादुर न तो अपने साथ जोड़ सकी न उसकी ट्रेजेडी बाँध सकी और बाकि की कसर अभिनेताओं ने पूरी कर दी | ऐसे में निर्देशक-रूपान्तरकार उर्मिल थपलियाल जी पर ही जवाबदेही आती है क्योंकि हबीब तनवीर के पसंदीदा नाटकों को जब भी कोई मंच पर लेकर आएगा उसे हबीब द्वारा खींची लकीर से बार-बार झूझना होगा | ऐसे में भी दर्पण समूह की जिम्मेदारी बढ़ गयी थी क्योंकि तुलना तो अवश्यम्भावी थी और थपलियाल जी, दर्पण समूह इस कथा को अपने प्रयोगों से मंच पर ईमानदारी से रख न सका | कुल मिलाकर निराशाजनक अनुभव रहा और एक वाक्य में कहें तो नाटक नौटंकी बन गया (यहाँ नौटंकी का अभिधात्मक अर्थ न लें )




7/28/11

नायक,खलनायक की वापसी : " सिंघम "

दक्षिण भारत की सिनेमा में यह नायक खलनायक का शह-मात और टशन हमेशा से दर्शकों को लुभाता रहा है

इधर पिछले कुछ वर्षों से हिंदी सिनेमा में भी मल्टीप्लेक्स कल्चर के बरक्स सिंगल स्क्रीन दर्शकों ने 'वांटेड' (सलमान खान अभिनीत ) से सलमान खान के कैरियर को एक नयी ऊँचाई दी जिसके दम पर उन्होंने 'दबंग'और 'रेडी' जैसी फिल्मों से अपनी ब्रांड इमेज पक्की कर ली
'वांटेड' इस मामले में पहली फिल्म बनती है,जहां नायक और खलनायक सिनेमा के दो छोरों पर खड़े होकर अपनी चालें चलते हैं और अंत में हीरो जीतता है
याद कीजिये ऐसा कब हुआ था जब दर्शकों को फिल्म का विलेन याद रह गया हो ? 'गनी भाई(प्रकाश राज) का कैरेक्टर दर्शकों को लुभाता और डराता रहा और प्रकाश राज द्वारा निभाया यह विलेनियस किरदार नायक के सामने किसी तरह भी फीका नहीं था
गब्बर सिंह,शाकाल,मोगैम्बो,डॉ.डैंग,तो आज तक लोगों के जेहन में बसे हुए हैं पर उदारवादी दौर में सिनेमा ने मेकिंग से लेकर प्रेजेंटेशन में जो पलटी खायी,उसमें हमारा यह खलनायक कहीं गायब सा हो गया था
इसीकी वापसी की कोशिश एक समय दुश्मन और संघर्ष से तनूजा चंद्रा ने की थी और सफल भी रहीं थी पर उसके बाद गैप आ गया था
यह भी कह सकते हैं कि प्रतिनायक का किरदार मजबूती और इमानदारी से गढ़ा ही नहीं गया या इसकी जरुरत ही महसूस ही नहीं की गयी
'गनी भाई' (वांटेड)के बाद रामगोपाल वर्मा ने 'भुक्का रेड्डी' (रक्तचरित्र में अभिमन्यु सिंह द्वारा निभाया गया चरित्र )में यह खलनायक हीरो के किरदार जितनी इमानदारी से लिखा और प्रस्तुत किया
'वांटेड' के बाद मेगा हिट 'दबंग'ने छेदी सिंह(सोनू सूद द्वारा निभाया किरदार) को नायक 'चुलबुल पाण्डेय'(सलमान खान)के सामने रखा पर 'छेदी सिंह'में वह बात नहीं दिखी
संभव है,यहाँ निर्देशक का मंतव्य नायक को मसीहाई ऊँचाई देने का अधिक रहा हो जिसका शिकार अनजाने में इस फिल्म का विलेन हो गया |
हिंदी सिनेमा में ७०-८० का दशक नायक-प्रतिनायक के बेहतर दौर का समय रहा

९० का दशक प्रेम-कहानियों के नाम रहा तो २१ वीं सदी हिंदी सिनेमा जगत में नए किस्म के सिनेमा और नयी सोच के युवा लेखकों और निर्देशकों के उभार का दौर रहा जिसकी बानगी आज हम देख रहे हैं
वांटेड से लेकर नयी रिलीज 'सिंघम'में ७० का वह नायक-खलनायक का दौर दक्षिण भारतीय फिल्मों के प्रभाव और सिंगल स्क्रीन थियेटर के आडियेंस की वजह से फिर से लौटा है
उसूल,चोर-पुलिस,चेसिंग दृश्य,सरे-बाज़ार जूतम-पैजार,हॉल में सीटियाँ बजाने को मजबूर करने वाले संवाद,अतुल बलशाली नायक,सिनेमा में बे-जरुरत नायिका,वापस लौट आये हैं
अजय देवगन,प्रकाश राज अभिनीत और 'गोलमाल'फेम निर्देशक रोहित शेट्टी की "सिंघम" इसी तरह की फिल्म है
जो नायक और खलनायक के दांव-पेंचों के बीच दर्शकों को सीट से बाँध कर रखती है
भले ही अजय देवगन का स्टारडम सलमान खान की तरह का न हो पर वह एक दमदार अभिनेता हैं यह इस फिल्म में दिखता है
पर इस फिल्म का सबसे मजबूत पात्र इसका खलनायक 'जयकांत शिक्रे'(प्रकाश राज ) है
प्रकाश में एक ख़ास किस्म का ह्यूमर है,जो दर्शकों को अपने से जोड़ लेता है और यह उनकी अभिनय क्षमता को दर्शाता है
यह खलनायक कई बार नायक 'सिंघम'पर भारी पड़ता है
खासतौर पर नायक और खलनायक के आपसी संवादों और टकराव वाले दृश्यों में
'दबंग'जहाँ स्टार वैल्यू और 'मुन्नी बदनाम'के बूते बड़ी हिट साबित हुई तो 'सिंघम' में उसका निर्देशन,कथा प्रवाह,नायक-खलनायक का बेहतरीन किरदार आपको इस फिल्म के लिए प्रभावित करता है
'सिंघम'फुल इंटरटेनर है,शालीमार बाग़ (दिल्ली) के डीटी सिनेमा में यह फिल्म देखते मैं इस बात पर खुश होता रहा कि बिना दिमागी कसरत किये आप कसे हुए निर्देशन में यह बेहतर मनोरंजक सिनेमा देख रहे है और एक बड़ा आश्चर्य भी हुआ कि जब भी खलनायक (जयकांत शिक्रे का प्रकाश राज द्वारा निभाया किरदार )परदे पर आया लोगों ने तालियाँ-सीटियाँ बजायी
यह एक खलनायक को दर्शकों का इनाम था,एक अभिनेता को उसका पुरस्कार था दर्शकों द्वारा और इन दर्शकों में छोटे बच्चे भी अधिक थे,मुझे मोगैम्बो से डर लगता था अपने बचपने में और यहाँ खलनायक आकर्षित कर रहा था,यह किरदार तथा अभिनेता की ताकत है,जो मसाला हिंदी सिनेमा से लुप्त हो चला था
यह हालत एक पॉश इलाके के मल्टीप्लेक्स के दर्शकों की थी तो सिंगल स्क्रीन के हमारे असली सिनेमचियों का ज़रा सोचिये
वांटेड,रक्तचरित्र,दबंग और अब सिंघम ने हिंदी सिनेमा के परदे पर नायक और खलनायक की वापसी करायी है



उम्मीद है आने वाले समय में कुछ और मजेदार फिल्में दिखेंगी
तब तक सिंघम से मज़े लें
***1/२ (मस्ट वाच मूवी)





एक थे रसूल मियाँ नाच वाले

भिखारी ठाकुर के नाच का यह सौंवा साल है लेकिन भोजपुर अंचल के जिस कलाकार की हम बात कर रहे हैं उसी परंपरा में भिखारी ठाकुर से लगभग डेढ़ दशक प...