11/20/08

मिस्टिक हिमालय में "चोपता"की चांदनी रात ...



गढ़वाल वैसे तो अनेकानेक सुंदर-सुंदर जगहों से भरा पड़ा है। पर हम जिस जगह की बात कर रहे हैं वह चोपता है। चोपता गोपेश्वर से ३८ किलोमीटर की दूरी पर केदारनाथ वन्य -जीव प्रभाग के मध्य स्थित एक छोटी किंतु बेहद ही खूबसूरत जगह है। यहाँ पहुँचने के दो रास्ते हैं-पहला जो अधिक आसान और सीधा है वह गोपेश्वर ,मंडल होकर तथा दूसरा उखीमठ होकर। उखीमठ केदारनाथ बाबा की शारदीय पीठ है। चोपता को गढ़वाल का चेरापूंजी कहा जाता है ।कारण यहाँ बदल कभी भी आकर आपके ऊपर हलकी-तेज़ फुहार छोड़ जाते हैं।जैसे ही आप गोपेश्वर की तरफ़ से आते हैं और जब माईल स्टोन यहाँ शो करता है किचोपता १ किलोमीटर तभी आप अपने पैर अपनी गाड़ी के ब्रेक पर तेज़ी से लगाने को मजबूर हो जाते हैं। ना ना ..बात ज्यादा खतरे की नहीं है। दरअसल ,इस तीखे मोड़ से मुड़ते ही चोपता अपनी सारी खूबसुरती आपके आंखों में भर देता है,और आप फटी-फटी आंखों और खुले मुहँ से इस दृश्य और वहाँ पसरी अलौकिक शान्ति को बस देखते ही रह जाते हैं।

सामने दूर-दूर तक फैला विराट दुधिया हिमालय अपनी मौन तपस्या करता जान पड़ता है,आप बस इस दृश्य को पूरा जी लेना चाहते है। एक सलाह है ,जहाँ तक सम्भव हो ,कैमरे की क्लिक के बजाये दिल के कैमरे में इसे पहले क्लिक करें फ़िर कहीं और। क्योंकि ,चोपता मन नहीं भरने देता हाँ आपकी छुट्टियां ही कम पड़ जाती हैं। यहाँ जगह अपने दूर दूर तक फैले हरे-हरे बुग्यालों के लिए मशहूर है(बुग्याल-हरे घास के वो मैदान जो उंचाई पर बर्फीली चोटियों से लगे हुए हैं)। चोपता से ४ किलोमीटर ऊपर पंचकेदारों में से सबसे उंचाई पर स्थित तुंगनाथ का मन्दिर है। यहाँ तक जाने के लिए बढ़िया ट्रेल पी.डबल्यू.डी.के सौजन्य से बनी हुई है। चोपता आपको आम हिल स्टेशनों से अलग इस कारण भी लगेगा क्योंकि यहाँ टूरिस्टों के लंड-चौडे जत्थे उनका कूड़ा-कचरा ,पोलीथिन के ढेर नहीं दीखते और एक बात कि यहाँ आज भी दूकान वाला गैस की बजाय लकड़ी पर ही खाना बना कर देता है,वो भी लोकल सब्जियों के साथ। चूँकि यहाँ सालो भर बेहद ठंडा वातावरण होता है तो आप यहाँ के होटलों में मडुवे की रोटी और लहसन की चटनी की मांग कीजिये (जो सामान्तया मिल जाती है) ।

अब,इस जगह के बारे में कुछ बेहद जरुरी। यह क्षेत्र सघन वन क्षेत्र है अतः रात-विरातदेख भाल कर निकलिए । चोपता में जगह से लगभग ५०० मीटर की दूरी पर एक ऊँचा टावर जंगलात विभाग ने बना रखा है,आप यहाँ से रात में दुर्लभ और लगभग गुम हो चुके जानवरों की प्रजातियाँ देख सकते हैं,जैसे कि 'कस्तूरी मृग और हिमालयन रीछ बाघ इत्यादि पर इसके लिए चांदनी रात का होना जरुरी है। चोपता की चांदनी रात बेहद खूद्सुरत होती है..शब्दों में बयान करना मुश्किल है क्योंकि यहाँ जब चांदनी हिम शिखरों पर पड़ती है तब दिमाग बंद हो जाता है और दिल धड़कना भूल जाता है। वैसे चोपता एक बेस कैम्प की तरह यूज कीजिये क्योंकि मैं जिस चांदनी की बात कर रहा हूँ वह केवल शरद पूर्णिमा के चाँद की है। इस समय यहाँ का सारा इलाका बर्फ की सफ़ेद चादर ओढ़ लेता है और जब बर्फ की इन चादरों पे चांदनी पसरती है..जी चाहता है कि बस सारी कायनात यही रुक जाए । वैसे भी इस पूर्णिमा में चाँद का दीदार चोपता के ऊपर लगभग ४२०० मी.पर स्थित चंद्रशिला से करना अधिक ठीक होता है जो तुंगनाथ मन्दिर से सीधी १ किलोमीटर की चढाई पर है। एक रात यहाँ बिता लेने का दम सभी के बूते के बाहर की चीज़ है। और यह शौक अच्छी तैयारी और साजो-सामान की मांग करता है। इस मौसम में जबकि ऊपर कुछ भी नहीं मिलता खाने और गाईड के बगैर जाना जान-जोखिम में डालना है। इस मौसम में कई ट्रैकर्स गोपेश्वर से लगभग २३ किलोमीटर की ट्रेकिंग करके सीधे तुंगनाथ मन्दिर के सामने पहनते हैं। मन्दिर के कपाट शीतकाल के लिए पहले ही बंद कर दिए जाते हैं,और आपके पास इस चांदनी रात में चाँद को निहारने का सुख पाने के लिए अपने साथ लाये टेंट या फ़िर मन्दिर के पीछे बनी एक छतरी के इर्द-गिर्द अपने को पूरी तरह बंद और गर्म हैवी वूलेन पर ही निर्भर रहना पड़ता है। पर यह पूरी रात एक ऐसी याद दिल में छोड़ जाती है जिसे ना आप भूल पाते हैं ना ये ख़ुद को आपको भूलने देती है।

अगले दिन चाँद की पहाडी यानी चंद्रशिला से सूर्योदय देखिये। यह रात से कम किसी भी सूरत में नहीं होती। सूर्य की पहली किरण जब सामने दूर-दूर तक पसरे चौखम्बा ,गंगोत्री,केदार डोम,सतोपंथ नंदा घुंटी शिखरों पर पड़ती है तो लगता है जैसे इन शिखरों ने स्वर्ण मुकुट धारण कर लिया है और सूर्य अपनी स्वर्ण-रश्मियों से इनका अभिषेक कर दिया है...पर जल्दी कीजिये यहाँ बादल शीघ्र घिर आते हैं ...

फ़िर सोचना क्या है ..हो आइये एक बार चोपता ..फ़िर बताइए मुसाफिर ने कैसी कही?

बस यही ऋषिकेश से एन.एच.५८ के साथ-साथ देवप्रयाग,नन्द प्रयाग,रुद्र प्रयाग चमोली गोपेश्वर होते हुए मंडल के रास्ते "चोपता".और क्या ...

11/18/08

मेरे शहर की पहचान बनाते सिनेमाघर...


एक कविता कभी पढ़ी थी,शायद फर्स्ट इयर में,उसकी पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार थी-

"अपने शहर में हम

अपने घर में रहते हैं,

दूसरेशहर में हमारा घर

हमारे भीतर ......."


सम्भव हैं,किआप सब में से कई इस बात ,इस लाइन से सहमत होंगे। घर से बाहर जाते हम सभी अपने साथ उस घर,गाँव ,कस्बे ,मुहल्ले, और उस शहर से जुड़े कुछ पक्के पहचानों को हम अपने साथ दूसरे शहर में भी लेकर चले आते हैं। हम शायद इस बात पर ध्यान ना देते हों पर यह सही हैं कि कुछ समय बीतने के बाद जब हम अपने शहर वापस लौटते हैं,तब हमारी आँखें अपने लगातार बदल रहे शहर के बीच अपनी उन्ही पुरानी पहचानों को ढूंढती हैं। कुछ चीज़ें बदलती हुई अच्छी लगती हैं कुछ एक टीस सी पैदा करती हैं।

सिनेमा हॉल मेरे शहर की भीड़ और आबादी के बीच एक सांस्कृतिक अड्डेबाजी का मंच देते थे।मेरे छोटे से शहर गोपालगंज में कुल-जमा पाँच छविगृह हैं। इनके नाम हैं(वरीयता क्रमानुसार -जनता सिनेमा,श्याम चित्र मन्दिर,कृष्णा टाकिज, चंद्रा सिनेमा,सरस्वती चित्र मन्दिर,और राजू मिनी टाकिज। इन सभी सिनेमा घरों में आर्किटेक्चर के लिहाज़ से कोई ख़ास फर्क तो नहीं हैं पर हाँ...इनके फ़िल्म प्रदर्शन और प्रदर्शन हेतु फ़िल्म चयन का तरीका इनकी अलग-अलग खासियत बता देता हैं।

चूँकि,मेरा शहर भोजपुरी प्रान्त का शहर हैं,तो दर्शकिया मिजाज़ फिल्मों से अधिक प्रभावित हो जाता दीखता हैं। आजकल 'निरहुआ'(भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार )ने बिहारी होने का गौरव-भाव सभी में जगह रखा हैं। (इसमे राज ठाकरे से ज्यादा चंद्रा सिनेमा में लगे दिनेश लाल यादव'निरहुआ'का हाथ हैं जिसमे वह बिहारी गौरव /अस्मिता के लिए लड़ता दिखाया गया हैं। )

जनता सिनेमा (सिनेमा रोड)

जनता सिनेमा गोपालगंज शहर के डिस्ट्रिक बनने के पहले से मौजूद हैं। अभी कुछ साल पहले इसका जीर्णोधार हुआ हैं। यह टाकिज १९५८ में बना और हाल ही में इसने अपने सफलता की पचासवीं वर्षगाँठ मनाई हैं और इसके उपलक्ष्य में भोजपुरी फ़िल्म 'दूल्हा अलबेला' का आल इंडिया प्रीमियर किया गया। जनता सिनेमा is लिहाज़ से इसका शहर के लोगों में अपना रसूख बनाया हुआ हैं क्योंकि यहाँ सदा पारिवारिक फिल्में ही लगती हैं। और फैमिली वालों को यहाँ फ़िल्म देखने आने में कोई अटपटा भी नहीं लगता। एक ख़ास बात और,गोपालगंज के सभी सिनेमाघरों में फ़िल्म शुरू होने के पहले कोई गीत हाल के बाहर लगे चोंगे (माने लाउड स्पीकर)पर अपना ख़ास गीत बजाते रहते हैं ,जनता सिनेमा का पेट गीत है - 'पैसा फेंको तमाशा देखो'

श्याम चित्र मन्दिर

इस हाल के बारे में मैं अपनी एक पोस्ट में विस्तार से लिख चुका हूँ ,जो अब 'चवन्नी छाप ब्लॉग' पर प्रकाशित हैं। यह सिनेमा हाल भी काफ़ी पुराना हैं और स्कूल्स के पास होने की वजह से भी काफ़ी मशहूर हैं,मेरे दी के करीब तो खैर हैं ही। इस हाल का अपना गीत हैं -'ई हैं बंबई नगरिया तू देख बबुआ'। इन सिनेमा घरों में इन गानों के बजने के साथ ही पब्लिक को पता लग जाता था कि अब टिकट कटनेके लिए काउंटर खुल गया हैं।इसमे भी अपेक्षाकृत पारिवारिक फिल्में लगती रही हैं और अब तो नई रीलिज़ भी आने लगी हैं। एक ख़ास बात और,कि सिर्फ़ यही एक हाल हैं जो यहाँ हॉलीवुड के डब फिल्मों और चर्चित हिन्दी फिल्मों को अपने यहाँ दिखाता हैं।

कृष्णा टाकिज (हजियापुर मोड़ )

पुरानेपन में यह हाल तीसरे नंबर पर हैं। इसके काउंटर खुलने की घोषणा 'मुकद्दर का सिकंदर' के गाने "रोते हुए आते हैं सब ,हँसता हुआ जो जाएगा..."। इस सिनेमा हाल के शहर से थोड़ा-सा बहार होने की वजह से परिवार वाले दर्शक तो कम पर गाँव से शहर आकर फ़िल्म देखने वालों और पास ही स्थित भी.एम्.इंटर कॉलेज के छात्रों की संख्या अधिक हैं। यह टाकिज सी-ग्रेड और हिंसक फार्मूला /हारर फिल्मों को अपना परदा प्रोवाईड करता हैं। आर्किटेक्चर और सीट कैपेसिटी के लिहाज़ से शहर का बढ़िया और सुंदर हॉल। ऐसी (सी-ग्रेड)फिल्मों का में अड्डा होने के बावजूद जब यहाँ 'नदिया के पार 'लगी थी तो पूरे ढाई महीने चली थी।

चंद्रा सिनेमा (बंजारी मोड़)

चंद्रा अपेक्षाकृत नया हॉल हैं और स्कूल के दिनों में हमने टैक्स फ्री प्रदर्शन होने की वजह से यहाँ पुरानी फिल्में खूब देखी हैं।यह शहर के बाहर स्थित हैं ,नेशनल हाईवे के किनारे इसलिए यहाँ पारिवारिक दर्शक ना के बराबर आते हैं। हाँ..शहर में बने और सिनेमाघरों से इसका साउंड सिस्टम सबसे बढ़िया हैं।हॉल के बिल्डिंग पर मत जाईयेगा ..ऊपर से यह आलू का गोदाम लगता हैं। पर नई-नई फिल्मों को लगाने की वजह से लोग इसका रुख करते हैं। 'तोहफा'फ़िल्म याद हैं ?जीतेन्द्र वाली ?जी हाँ..उसी का गाना 'प्यार का तोहफा ....लाया लाया लाया'-इसकी पहचान बनाता हैं।

सरस्वती चित्र मन्दिर (यादवपुर रोड)

इस सिनेमा हॉल में छोटे शहर के लिहाज़ से थोडी अधिक सुविधाएं मुहैया हैं। इसके मालिक बिहार राज्य के शिक्षा जगत में बड़े अधिकारी पोस्ट से सेवानिवृत हुए हैं और तब यह हॉल बनाया हैं। इस सिनेमा हॉल का दुखद पहलु यह हैं कि यहाँ साउथ की डब फिल्में ही अधिक लगती हैं या फ़िर पुरानी भोजपुरी फिल्में । स्टाफ के लिहाज़ से यह खाराब हॉल हैं पर सुविधाओं के लिहाज़ से अच्छा । इसका कोई ख़ास गीत नहीं हैं ,पर अधिकाँश यहाँ मिथुन के '''शिकारी"फिल्म का गाना'तू मेरा हाथी ,मैं तेरा साथी ही बजता हैं"। इस हॉल के पास जमीन भी काफ़ी हैं ,अपनी तमाम खूबियों के बावजूद अच्छे मैनेजमेंट की डिमांड करता हैं।

राजू मिनी टाकिज (पुरानीचौक)

इस हॉल के क्या कहने बस इतना जानिए कि यह अकेला ऐसा हॉल हैं जो ३५ एम्.एम् के परदे और पुराने प्रोजेक्शन मशीन से चलता हैं और इसकी बैठने की क्षमता भी १००-१२५ की हैं। यह पहले विडियो हॉल हुआ करता था और अब एक छोटा सा हॉल हैं। ख़ास बात -"अपने गुणों और फ़िल्म प्रदर्शनों के लिहाज़ से दिल्ली के कश्मीरी गेट पर स्थित'रिट्ज़'सिनेमा का छोटा भाई हैं। एक प्रबंधक,एक टिकट क्लर्क ,तीन गेटकीपरों के हवाले हैं -राजू मिनी टाकिज। और दर्शक ..(अंधेरे में ज्यादा आते हैं जनाब...)


गोपालगंज शहर का एक अपना तेवर हैं सिनेमा को लेकर । यहाँ कब कौन सी फ़िल्म पिट जाए या फ़िर कब कौन सी हिट हो जाए कहना मुश्किल हैं। सत्या, दिल चाहता हैं, जैसी फिल्में दो-एक दिनों में उतर गई थी। अब तो भोजपुरिया रंग चंहु और बिखरा पड़ा हैं .......

11/16/08

भगवान् बचाए इन चाटों से....(कैंटीन ओनर्स वाले )

अब विभागों में मिड-टर्म परीक्षाओं की घंटियाँ लगभग बज चुकी हैं या फ़िर बजने ही वाली है.ऐसे में अब तक कैंटीन ओनर्स करने वाले (वैसे छात्र जो घर से अपना बोरा-बस्ता लेकर आते तो हैं कॉलेज पर सारा दिन कॉलेज कैंटीन में गप्पे और पता नहीं क्या-क्या हांकते रहते है)छात्रों ने अपनी परीक्षा पास करने की मुहीम तेज़ कर दी है.ऐसे होनहार बिरवानों के कारण कुछ तो छुटभैये सीनियर बड़े खुश होते हैं ,तो कुछ की वाकई शामत आ जाती है.छुटभैये किस्म के सीनियर इन होनहारों के लिए तत्काल कोटा के समान होते हैं या फ़िर रिजर्वेशन अगेंस्ट कैंसिलेशन के जैसे.दरअसल ,इन कैंटीन ओनर्स वाले जूनियर मित्रों/साथियों के इर्द-गिर्द काफ़ी ऐसी बालिकाएं भी साथ देती रहती हैं जो इनके द्बारा बताये गए (माने फेंके गए गप्पों)बातों की खासी मुरीद/फैन होती हैं और इसी मौके पर इस अभियान में जोर-शोर से उनका साथ देती है ,जिस मिशन का नाम होता है-सीनियर पकडो-नोट्स टेपों.छुटभैये सीनियर को तो बस इसी मौके का इंतज़ार होता है और यही सही मौका भी क्योंकि जिस डिपार्टमेन्ट ने उन्हें नाकारा करार देकर इस वर्ष एडमिशन नहीं दिया होता है,तो ये अपने जूनियर्स को बताते है कि 'फलां टीचर नहीं चाहता था कि मैं यहाँ आऊं क्योंकि उसकी पोल-पट्टी खुल जाती या फ़िर ये कि मैं उसकी चाटता नहीं न भाई इस करान आज बाहर हूँ खैर तुम मेरे नोट्स लो और देखो कि कहाँ -कहाँ से रेफरेंस जुटाए हैं मैंने (मतलब किन-किन बुक्स से टीपी है)और क्या ख़ास निष्कर्ष दिया है.'-अब मज़ा तब आता है जब कोई काईयाँ जूनियर उनकी दुखती रग पे हाथ रख देता है-सर आपका नेट/जे आर ऍफ़ हुआ है'-बस सीनियर महाशय पहले तो उसे इस अंदाज़ में घूरते हैं मानो उसे यह समझाने कि कोशिश कर रहे हों कि ......ये ,तुझे मौका देखकर बात भी करने नहीं आती ,क्योंकि काफ़ी जूनियर बालिकाएं भी सर के इस विभागीय प्रचंड-प्रताप को सुन रही होती रहती हैं,पर झेंप मिटाते हुए एक लाइन में जवाब देंगे-'अजी,अभी बच्चे हो जानते नहीं नेट/जे आर ऍफ़ योग्यता का सही पैमाना है.'-बहरहाल,इन सीनियरों से पहले ट्राई मारी जाती है ,रिज़र्व खाते में रखे गए सीनियर के आस-पास.इन सेनिओर्स की पहले अच्छी-खासी पड़ताल इनके द्वारा की जाती है कि किस मूड का है और कहाँ रहता है,फोन पर बात करना ठीक रहेगा या नहीं?वगैरह-वगैरह.सहमत तब आती है जब यह सीनियर कैम्पस में ही रहता हो.यानी आस-पास,ये चांडाल-चौकडी वहाँ पहुँच जायेगी औए साथ में एकाध बालिकाएं जूनियर भी दांत निपोरती पहुंचेंगी.-'सर,घर पे इत्ता सारा काम होता है कि पढने का टाईम मुश्किल से ही मिलता है.'-लड़का कहेगा-सर जी,दूर से आता हूँ बस में लटक कर ,अब बताओ आप ही कि २ घंटे तो आने और २ घंटे जाने में ही लगते हैं अब ऐसे में आप ही बताओ कैसे पढ़ें,सर जी इस बार हेल्प कर दो अगले साल से जी लगाकर पढ़ लेंगे '-पर वह सीनियर मन में क्या सोचता है जो ख़ुद अपने एकाध महीने में जमा किए जाने वाले दीजर्टेशन के बारे में सोच रहा होता है कि अगले घंटों में किन-किन टोपिक्स को खत्म करना है.मिड-टर्म के ठीक पहले उग आने वाले इन चाटों का शिकार हाल ही हुआ हूँ ..जैसे तैसे पिंड छुडाया है ये कहकर कि -भाई,दिसम्बर के बाद इत्मीनान से मिल लेना...'मगर एकाध तो घाघों के बाप होते हैं ना...बस पूछिए मत....सोचता हूँ 'कहीं....दम सीधी होती है भला?'-यूनिवर्सिटी को छात्र हित में कैंटीन ओनर्स की डिग्री देनी शुरू की जानी चाहिए.

11/15/08

हर लिहाज़ से बेहतरीन प्रस्तुति है -"विक्रमोवर्शियम".


यूँ तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय हर वर्ष अपनी प्रस्तुतियाँ देता है मगर रंग-प्रेमियों को इसके सेकंड इयर के छात्रों की किसी क्लासिक नाट्य प्रस्तुति काइंतज़ार रहता है ,जो यह हर वर्ष देते हैं। वैसे द्वितीय वर्ष के छात्रों के पाठ्यक्रम का हिस्सा है यह संस्कृत के नाटक। बस ऐसा जान लीजिये कि इनके सही मायने में नाट्य विद्यालय के अकादमिक दर्जे से यह पहली प्रस्तुति होती है। और इन नाटकों को तैयार करने में इस विद्यालय के पास तथा इनसे जुड़े एक्सपर्ट्स की अच्छी-खासी मौजूदगी है। पर ,दो नाम ख़ास तौर से बहुत सम्मानित और इस क्लासिकीय विधा के नाटक के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है वह है-श्री के.एस.राजेंद्रन जी (जो यही एसोशियेट प्रोफेसर हैं। )और दूसरे हैं-श्री प्रसन्ना जी(इनकी प्रमुख प्रस्तुतियां हैं-'उत्तर रामचरित','आचार्य तार्तुफ़')। २ साल पहले राजेंद्रन ने अपने निर्देशन में कालिदास के महान नाटक "मालविकाग्निमित्रम"को रंगजगत में उतारा था,तब यह नाटक उस साल खेले गए कुछ बेहतरीन नाटकों में से एक माना गया था। इस वर्ष फ़िर इन्ही के निर्देशन में कालिदास के ही एक और नाटक "विक्रमोवर्शियम"द्वितीय वर्ष के छात्रों द्बारा खेला गया (आज इस नाटक की अन्तिम प्रस्तुति है )। कहना ना होगा कि ,मेरे कुछ बेहतरीन देखे गए नाटकों में से एक नाटक यह भी है।

राजेंद्रन तो इस तरह के नाटक के माहिर माने जाते ही हैं,और इस नाटक के बाद तो खैर यह दर्जा निर्विवादित रूप से उन्ही के पास रहेगा।

'विक्रमोवर्शियम'एक विधा के तौर पर त्रोटक है। संकृत काव्यशास्त्र के अनुसार ,त्रोटक एक ऐसी नाट्य विधा है,जिसमे श्रृंगारिकता अधिक मातृ में होती है और जिसके पात्रों में दैवी एवं मानुषी पात्रों का सम्मिश्रण होता है। (सन्दर्भ- विक्रमोवर्शियम ,अनुवाद-इंदुजा अवस्थी,रा.ना.वि.)'विक्रमोवर्शियम 'में उर्वशी नामक अप्सरा के प्रति राजा पुरुरवा के गहन प्रेम का वर्णन किया गया है। यह कथा 'ऋग्वेद 'से ली गई है लेकिन चरित्र निर्माण और कथा -विकास में अपने रचनात्मक कौशल से कालिदास ने इसे भव्य उंचाई प्रदान की है। पुरुरवा उर्वशी को एक राक्षस के चंगुल से मुक्त कराता है जैसा कि नाटक के शीर्षक से इंगित है। यह नाटक इन्ही दोनों के प्रेम,बिछोह,और पुनर्मिलन की कथा है।

संस्कृत नाटकों के प्रस्तुति में सबसे बड़ी चुनौती होती है उसके सही त्तारिके से दर्शक-वर्ग के बीच पहुँचा देना।क्योंकि रीयलिस्टिक नाटकों के बीच नंदी-गान से शुरू होने वाले इन स्टालाईज़ नाटकों को रोचक ढंग से पेश करना सही में बड़ी मेहनत की डिमांड करता है। इन नाटकों में किए जाने वाले अभिनय को 'नाट्यधर्मी अभिनय' कहा जाता है। इस काम को राजेंद्रन ने नृत्यांगना .कोरियोग्राफर,और समीक्षक (हिंदू में बतौर पत्रकार)अंजला राजन के सहयोग से पूरा किया और इनदोनों के सम्मिलित प्रयास के बाद जो परिणाम सामने आया वही है -विक्रमोवर्शियम। 'मालविकाग्निमित्रम'में अपने गायकी से जान फूंकने वाले अनिल मिश्रा यहाँ भी (इस बार विनी वोरा के साथ ) मौजूद थे।वेशभूषा के लिए अम्बा सान्याल तो हैं ही।हाँ..यहाँ गोविन्द पाण्डेय के संगात के बिना बात अधूरी ही रह जायेगी । कमाल का संगीत ,सहज,और सुमधुर। स्वयं उन्ही के शब्दों में कहें तो-"जिस प्रकार नाटक के प्रखर बिन्दु श्रृंगार-विरह-प्रेमोन्माद है,उसे ही सरल संगीत के माध्यम से उभारने का छोटा-सा प्रयास है,शास्त्रीयता रहे पर पूर्ण रूप से नहीं ,ऐसा विचार रहा साथ ही छात्र संगीत में ही उलझ न जाए । "

निर्देशक ने शास्त्रीय एवं लोक नृत्यात्मक मुद्राओं का उपयोग किया है संगीत भी उसी के साथ बहे ऐसी ही कोशिश है.

ऐसी प्रस्तुतियां साल में एकाध ही आती हैं ..जिन्होंने इसे नहीं देखा उन्हें इसके दुबारा खेले जाने तक इंतज़ार करना होगा ...अफ़सोस.

11/13/08

जरुरत है अब रंग बदलने की(भोजपुरी फिल्में)


जहाँ तक भोजपुरी फिल्मों के धडाधड आने की बात है वही एक समस्या इनके स्तरसे जुड़ी हुई तेज़ी से उभर रही है। ये समस्या इनके मेकिंग से ही जुड़ी नहीं है बल्कि इसके प्रस्तुतीकरण और कथ्य से भी जुड़ी है। 'उफान पर है भोजपुरी सिनेमा"शीर्षक के तहत मैंने एक ब्लॉग-पोस्ट पिछले महीने लिखी थी,इस पोस्ट पर प्राप्त टिप्पणियों में से एक ब्लॉगर साथी ने अपनी प्रतिक्रिया लिखी किवह सब तो ठीक है पर भोजपुरी सिनेमा गंभीर नहीं हो रहा है। उनकी बात के जवाब में मैंने यह लिखा कि अभी तो तेज़ी आई है आने वाले समय में कुछ सार्थक सिनेमा भी यह इंडस्ट्री देगा,जिसे राष्ट्रीय स्तर पर नोटिस किया जायेगा।

मगर मुझे पता है कि यह भी इतना आसान नहीं है जबकि इस इंडस्ट्री में पैसा इन्वेस्ट करने वाले राजनेता,अब तक रेलवे ,सड़क की ठेकेदारी करने वाले सफेदपोश लोग और विशुद्ध व्यापारी लोग ही हैं। हाल ही में अपने घर से लौटा हूँ । वहां भोजपुरी की दो फिल्में देखीपहली का नाम था-बलम परदेसिया और दूसरी नई फ़िल्म थी -हम बाहुबली। हम बाहुबली आज के भोजपुरी सुपरस्टार रवि किशन और दिनेश लाल यादव'निरहुआ'अभिनीत थी,वही'बलम परदेसिया ८० के दशक की सुपेर्हित फ़िल्म थी जिसमें राकेश पाण्डेय और नजीर हुसैन ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थी। अब दोनों फिल्मों का जो बेसिक फर्क था वह भोजपुरी के टोनऔर ज्यादा जमीनी होने को लेकर था और हाँ..जिस भोजपुरी समाज में गीत-संगीत की धुनें शहनाई ,सारंगी,हारमोनियम ,तबला ,झार,करताल,और गायकी में निर्गुण ,चुहल लिए था ,वह केवल 'बलम परदेसिया' में देखने को मिला जबकि अपने समय के अनुसार 'हम बाहुबली' वही बोल्लिवूडिया तेवर का. फ़िल्म ख़राब तो नहीं थी पर अपने से 'बलम परदेसिया'जैसा जुडाव पैदा करने में नाकाम थी.जबकि ध्यान देने वाली बात है कि दोनों ही इस इंडस्ट्री की पोपुलर/मेनस्ट्रीम की सिनेमा हैं.'गीत-संगीत की तो बात ही छोड़ दीजिये नए दौर के भी भोजपुरिये नौजवानों ने 'बलम परदेसिया'के 'गोरकी पतरकी रे'और'हंसके जे देखअ तू एक बेरिया हम मरी मरी जाएब तोहार किरिया '-जरुर सुन रखा है. बहरहाल,हमारी बहस का मुद्दा इस इंडस्ट्री के गंभीर होने को लेकर है,वाकई अब ऐसा समय है जब भोजपुरी सिनेमा जगत ने अपनी पहचान को पुखा और अपनी नींव को मजबूत कर लिया है तो उसे भी अब अपनी माटी के जमीनी यथार्थ को इंगित करती कुछ फिल्में बनानी चाहिए जो इस भाषिक प्रदेश की गुंडा,दबंगई,नेतागिरी जैसी स्टीरीयो टाइप इमेज से उलट कुछ अलग,कुछ अधिक सार्थक हो,जैसे बांग्ला,तेलुगु,मराठी,मलयाली,उड़िया,ने अपने कम प्रभाव क्षेत्र के बावजूद अपने क्षेत्रीय फिल्मी संसार के मेनस्ट्रीम सिनेमा मेकिंग के समानांतर खड़ी की है.प्रश्न मात्र ये नहीं है कि इसे कौन करेगा बल्कि इसको करने के लिए जिस प्रोग्रेस्सिव मानसिकता की जरुरत है उसको डेवलप किए जाने की जरुरत है. अब भोजपुरी फ़िल्म जगत ने अपने जौहर दिखाकर अपनी ताकत को जाहिर कर दिया है पर यह सही मायनों में तभी पूर्णता को पायेगा जब कोई ऐसी क्लासिक काम पैदा करके दिखा दे जो विश्व स्तर पर मार्क की जाए तो क्या कहने.सम्भव हैं कुछ समय में ऐसा हो जाए ..तब तक इंतज़ार ....

11/9/08

बस आज होगी अब आखरी दहाड़.......




लॉर्ड्स का वह सीन याद कीजिये जब एक दुबले-छरहरे बाबु मोशायने अपने पहले ही मैच में सैकडा ठोक दिया था। या फ़िर वह जब दुनिया को क्रिकेट के मैदान में अपनी जूती के नोंक पर रखने वाली टीम का लीडर इस बंगाल टाईगर के आगे बेचारा बना ग्राउंड में टॉस का इंतज़ार कर रहा था। अब तक लोगों से भद्रजनों के खेल के कायदे सुनने वाला और अपने दूसरे कान से बेहयाई से मुस्कुराते हुए निकाल देने वाली इस दादा टीम को दादा की दादागिरी के आगे बेबस होकर ख़ुद जेंटलमैन गेम का तरीका अपनाए जाने की बात करनी पड़ गई थी। या फ़िर वह दृश्य जब ब्रिटेन की छाती पर बैठ कर बालकोनी से अपनी टी-शर्ट उतार कर भद्रजन खेल की नई परिभाषा ही गढ़ देना । जी हाँ....इस अनोखे और विश्व क्रिकेट में परम्परा से चली आ रही भारतीय इमेज(किसी भी छींटाकशी को सुनकर अनसुना कर देना इत्यादि) को इसी कप्तान ने बदल के रख दिया ।


तमाम तरह के विवादों के बीच जब भारतीय टीम मैच फिक्सिंग के दलदल में फंसती नज़र आ रही थी,तब इस नए जुझारू नौजवान ने इस टीम की बागडोर अपने हाथ में संभाली और उसके बाद जो कुछ कारनामा इसी टीम ने किया वह सबने देखा। जिन विदेशी पिचों पर इस टीम को सब टीमें ईजी केक की तरह लेती थी,अब वह भी बैकफूट पर आ गई। यह नई टीम थी विशुद्ध भारतीय नई टीम। गांगुली अपने कप्तानी ही नहीं बल्कि अपने अग्ग्रेसिव अप्रोच के कारण भी याद किए जायेंगे। कई तरह के विवादों से घिरने के बावजूद यह शख्स अपना लोहा मनवा ही लेता है। टीम से निकाल दिए जाने और उस विज्ञापन में दिखाए जाने के बाद (जिसमे वह कहते थे कि अपने दादा को भूल गए क्या ?)वह और भी करीब लगने लगे थे। जी चाहता था कि काश एक बार ही सही गांगुली वापस आकर अपना सौवा टेस्ट खेल ले ,आख़िर हमारी यह हसरत भी पूरी हुई और गांगुली को चुका हुआ कहने वालों के मुँह पर इस टाईगर ने अपने बल्ले की दहाड़ से ऐसा ताला मारा कि सब भौंचक्के रह गए,यह गांगुली अब वाकई अलग सा था ,कुछ साबित करने का जज्बा लिए शांत,गंभीर।


गांगुली के साथ ही क्रिकेट को नए-नए खिलाड़ी मिले। मतलब कि अब तक खिलाड़ियों का जत्था (जी हाँ जत्था)बंगलुरु,मुम्बई और दिल्ली के क्षेत्र से आता था पर अब इस कप्तान ने अपनी नज़र हर उस खिलाड़ी पर दौडाई जो वाकई कुछ कर सकता था। अब ये खिलाड़ी सुदूर श्रीरामपुर,इलाहाबाद,रांची जैसी जगहों से भी आए हालांकि यह मात्र गांगुली के कारण नहीं था मगर एक कप्तान के तौर पर गांगुली ने चयनकर्ताओं से लगभग नाराजगी मोल लेने की हद तक इन खिलाड़ियों का सप्पोर्ट किया था।युवराज सिंह के गर्दिश के दिन याद कीजिये जब हम-आप भी कहने लगे थे कि इसे क्यों ढोया जा रहा है।


बहरहाल,जो भी हो अगर नागपुर टेस्ट में भी गांगुली ने शतक मार दिया होता तो क्या शानदार विदाई होती। मगर अपनी इस पारी से दादा ने वह सब कुछ पा लिया ,साबित कर दिया जो वह चाहते थे। एक शानदार खिलाडी की शानदार विदाई विरले को ही नसीब होती है।गांगुली उन्हीं विरलों में से एक हैं। सही मायनो में प्रिन्स ऑफ़ कोलकाता ,रियल बंगाल टाईगर । यह वही खिलाड़ी है जिसके बारे में उसके एक सहयोगी खिलाड़ी का स्टेटमेंट था-"ऑफ़ साईड में पहले भगवान हैं फ़िर गांगुली"।


जो भी हो ...इस टाईगर की संभवतः आज आखरी दहाड़ होगी(अगर पारी आई तो॥)। जाओ दादा अलविदा


तुम,तुम्हारा खेल ,तुम्हारी कप्तानी ,तुम्हारी पिच पर वापसी, हमेशा दिल में रहेगी...........




(वैसे मुसाफिर I P L में कोलकाता नाईट राईडर्स के खेल में दादा का इंतज़ार करेगा )

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