12/17/13

भिखारी ठाकुर के मायने

“ठनकता था गेंहुअन
तो नाच के किसी अँधेरे कोने से
धीरे-धीरे उठती थी
एक लंबी और अकेली
भिखारी ठाकुर की आवाज़

कवि केदारनाथ सिंह की यह पंक्तियाँ भोजपुरी और पूरे पुरबियों के बीच भिखारी ठाकुर की लोकप्रसिद्धि का बयान ही है. प्रख्यात रंग-समीक्षक हृषिकेश सुलभ ने भी भिखारी ठाकुर की आवाज़ को ‘अधरतिया की आवाज़’ कहा है. जब भी भोजपुरी संस्कृति और कला-रूपों पर बात होती है, भिखारी ठाकुर का नाम सबसे पहले जुबान पर आता है. ऐसा होने की कई वाजिब वजहें हैं. भारतीय साहित्य और रंगजगत में ऐसे उदाहरण शायद ही मिले, जहाँ कोई सर्जक या रंगकर्मी प्रदर्शन के लगभग सभी पक्षों पर सामान दक्षता रखता हो और उसनें कहीं से कोई विधिवत शिक्षा न ली हो. अमूमन जितने भी रंगकर्मियों ने अपनी लोक-संस्कृति का हिस्सा होकर अपने रंगकर्म को विकसित किया अथवा उसको दूसरी संस्कृतियों से भी परिचय कराया, वह सभी किसी-न-किसी स्कूल के सीखे हुए, दक्ष और सुशिक्षित कलाकार थे. फिर चाहे वह महान रंगकर्मी हबीब तनवीर, एच.कन्हाईलाल या रतन थियम ही क्यों न हों. यहाँ इन पंक्तियों के लिखने का अभीष्ट बस इतना ही है कि यहाँ इन रंगकर्मियों से या उनके रंगकर्म से भिखारी ठाकुर की तुलना करना नहीं है, ना तुलना हो सकती है. ये सभी रंगकर्मी अलग-अलग परिस्थितियों में अपनी-अपनी लोक-संस्कृति, अपनी कला जनमानस में सिद्ध कर चुके हैं और किसी परिचय के मुहताज नहीं, पर भिखारी ठाकुर के सन्दर्भ इनका जिक्र इसलिए जरुरी हो जाता है क्योंकि ये भी भिखारी ठाकुर की ही तरह लोकप्रिय संस्कृति और लोक साहित्य के पैरवीकार रहे हैं. इस सन्दर्भ में इनकी बात करना इसलिए भी जरुरी हो जाता है कि भिखारी ठाकुर को इन लोगों की तरह विरासत में न तो कोई बेहतर प्लेटफोर्म मिला, ना ही आखर ज्ञान हेतु कोई विधिवत व्यवस्था. फिर भी उनके भीतर सीखने की, कुछ करने की जो ललक थी, वही उनको भीड़ से अलग खड़ी करती है. उन्हें विशिष्ट बनाती है.

कलाकार अथवा साहित्यकार अपने समय-समाज से निरपेक्ष होकर सर्जना-रचना नहीं कर सकता. एक उत्कृष्ट और जागरूक रचनाकार की कलम अपने देश-काल की परिस्थितियों का बयान दर्ज करती है, जिससे कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियाँ अपने उस लोक-सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिवेश की उन सच्चाईयों से रु-ब-रु हो सके, जो उस समाज और समय में व्याप्त हो. भिखारी ठाकुर भी पाने समय के ऐसे ही सर्जक, भोक्ता थे, जिन्होंने अपने समय की सामंती मानसिकता, जातिवादी सोच, वर्ग-विभेद की राजनीति, श्रमिक संस्कृति, पलायन और पीछे रह गयी प्रोषितपतिकाओं की वेदना को प्रत्यक्षतः देखा ही नहीं बल्कि सामियाने के बीचो-बीच मंचासीन होकर उन सवालों से दो-दो हाथ करने की प्रेरणा भी दी. रंगकर्म जनवादी कला है और भिखारी ठाकुर मूलतः प्रगतिशील, जनवादी  रंगकर्मी/कलाकार थे. ऐसे प्रगतिशील सर्जकों को लोक यूँ ही नहीं छोड़ देता उसके लिए भी यथास्थिति की पोषक शक्तियाँ कई दुश्वारियाँ पैदा करती हैं, पर सोना आग में तप के और निखरता है. यह बात भिखारी ठाकुर पर अक्षरशः लागू होती है. कई दफे यह स्थितियाँ होती हैं, कि उस कलाकार/सर्जक का मूल्यांकन उसके समय में नहीं हो पता है. इसके कई कारण हो सकते है. भिखारी ठाकुर की स्थिति भी इससे भिन्न तनिक थी. यद्यपि दिक्कतें भिखारी से थीं पर  भिखारी ठाकुर को उस समय के प्रगतिशील शक्तियों ने पहचाना और विभिन्न उपाधियों-विशेषणों यथा ‘अनगढ़ हीरा’, ‘भोजपुरी के शेक्सपियर’,’भोजपुरी के भारतेंदु’ आदि से नवाजा. पर सामंती ताकतें गाल बजाने में ही मशगूल रहीं और उन्हें एक नचनिया, लौंडा नाच करने वाला ही मानती रही. भोजपुरी के एक कवि शिवनंदन भगत, जो भिखारी ठाकुर के ही सामयिक थे, ने उनके विरोध में एक कविता भी लिखी :

“जाति के हजाम भईले, पेशा के नापाक कईले
हिजरा के गिनती में गईले भिखरिया
दोकड़ा के सेंदुर अवसर, बुढ़िया बनके नाच कईले
रोपेया में इज्जति गँववले भिखरिया.”1

इसके अलावा रघुवंश नारायण सिंह जी ने भी महेश्वर प्रसाद की पुस्तक ‘जनकवि भिखारी’ की समीक्षा में कुछ ऐसी ही बातें ऐसी कही हैं, जो तत्कालीन सोच का कच्चा-चिट्ठा प्रस्तुत करती हैं. मसलन बहुत दिन पहले आरा से निकलने वाले 'भोजपुरी'में श्री बीरेंद्र किशोर का एक लेख छपा था 'भोजपुरी के शेक्सपियर  भिखारी ठाकुर'. बहुत लोगों ने जब उसे पढ़ा तो अचरज में पड़ गए,सिहर गए  कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली. यह तो अजब मेल बैठाया गया ,ऐसा बहुत लोगों ने कहा. बात सही भी थी बाकी राहुल बाबा ( सांकृत्यायन जी ) भिखारी को महाकवि कह चुके थे. अब हम लोग क्या करें.......उन्होंने भोजपुरी की जान कर (जानते बूझते ) सेवा थोड़ी न की थी. उन्हें तो नाचना गाना था. पहले तुलसी,कबीर सुर वगैरह के पद कंठ किया बाद में सरस्वती की कृपा उनपर हुई तो खुद भी पद जोड़ने लगे. मुझे शक है कि भिखारी कभी नाटककार के रूप में गिने जायेंगे. उन्हें नाटक से क्या मतलब ? वे अंक ,गर्भांक जानने कहाँ गये ? उनके सभी खेल ,तमाशे अपने हैं, जिससे देहाती गंवारू जनता को मोहा ,खींचा जा सके उन्होंने वही नाचा-गाया, इनका सब 'बैले'हो सकता है, जिसे नाच-गान के साथ रूपक कहा जाए, तब शायद कुछ सधे तो सधे ,भिखारी में नाटकीयता है, वे रूप बनने और बनाने में  और नक़ल उतारने में भी सफल खिलाड़ी है.”2 लोक प्रसिद्ध कलाकारों-सर्जकों को अपने समय में इस तरह के गर्दभ-गान सुनने को मिलते हैं, जो समय के नक्कारखाने में तूती की आवाज़ ही साबित हो जाते हैं.  रघुवंश जी ने अपने इस लेख/समीक्षा में जिस तरह की चिंता की और ध्यान दिलाया था कि भिखारी विरोधियों को यह लगता था कि वे कभी सूर, कबीर, तुलसी सम पद नहीं लिख पाएँगे और यदि लिख लिया जो जग-प्रसिद्ध न हो सकेंगे, वह बात निर्मूल ही साबित हुई. भिखारी ठाकुर ने तुलसी, कबीर, सूर की तरह कविताएँ भी लिखीं और नाटकार के साथ-साथ लोगों ने उनकी कवित्व शक्ति को भी पहचाना. कवि रूप में भी उनकी ख्याति किसी से छुपी नहीं हैं. भिखारी ठाकुर ने धर्म आधारित कवितायेँ भी लिखी. इसका कारण स्पष्ट है कि “लोक साहित्य का मूल आधार धर्म रहा है. सृष्टि के सभी मानव मूल रूप में धर्म में आस्था रखते हैं. कृष्णदेव उपाध्याय ने इस संबंध में लिखा है कि धर्म की आधारशिला पर ही लोक साहित्य की प्रतिष्ठा हुई.” भिखारी ठाकुर इसके अपवाद नहीं थे. साथ ही, वह लोकसंस्कृति के उस पक्ष के पैरवीकार थे, जहाँ “संस्कृति के अंतर्गत, समाज की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक व्यवस्था का सम्मिलित प्रवाह निरंतर गतिमान होता है.”4 भिखारी ठाकुर सजग चेतना के कलाकार थे, उनके सामने परिवार का विघटन, पति के परदेस जाने के बाद घर में अकेले रह गयी उसकी ब्याहता के सामने घर के भीतर और समाज में उपस्थित खतरे, लोक जीवन के अन्य दुःख-दर्द, हर्ष-उल्लास, पर्व-त्यौहार आदि का दृश्य साक्षात था. जाग्रत मस्तिष्क का यह कलाकार इन सब स्थिति-परिस्थितियों से निरपक्ष नहीं रह सकता था. इसलिए उनका साहित्य, उनकी कला अपने समय की सामाजिक चेतना और स्थितियों का यथार्थ प्रतिबिम्ब है. उनकी सर्जनात्मकता की शक्ति इसमें थी कि उनके रचनाकर्म में भोजपुर प्रान्त की तद्-युगीन सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक प्रवृतियों, सच्चाईयों का समावेश था. जो किसी भी लोक साहित्य, लोककला का एक अनिवार्य पक्ष है. एक मशहूर कथन है कि संस्कृतिशून्य व्यक्ति निरा पशु होता है. संस्कृति मनुष्य की जीवन जीने की एक बुनियादी शैली और गुण है.  इस स्तर से भी भिखारी ठाकुर भोजपुरी लोक-संस्कृति के अगुआ नायक थे.     
       
जिनकी रचनाओं, नाट्य-प्रदर्शनों से व्यक्ति अपने-आप को, अपनी संस्कृति, अपने समाज, परिवेश को समझता रहा है. भिखारी ठाकुर का कद इतना बड़ा है कि उन्हें किसी एक फ्रेम में मापना संभव ही नहीं. बस इतना ही कि भोजपुरी, पुरबी संस्कृति का ध्वज भिखारी ठाकुर के हाथ में है और इस संस्कृति को, समाज की संकल्पना एवं अध्ययन उनके बिना संभव नहीं. भिखारी ठाकुर भोजपुरी प्रान्त के सांस्कृतिक अध्ययन में एक अनिवार्य जरुरत बनके सामने आते हैं. इसका एक उदाहरण सामने है कि भोजपुरी प्रदेशों ही नहीं बल्कि समस्त पूर्वी श्रमिक संस्कृति में एक लोक-प्रचलित गीत सुनने में आता है :

“रेलिया ना बैरी, जहाजिया न बैरी
से पईसवा बैरी ना
मोर सैयां के बिलमावे से पईसवा बैरी ना”

भारतवर्ष का पूर्वांचल प्रांत गरीबी, बाढ़, सूखा जैसे कई मारों से टूटा हुआ प्रान्त है. बिना किसी आदर्शवादी या रामराजी चाशनी के कहें तो पैसा जीवन जीने की तीन मूलभूत जरूरतों में सबसे ऊपर है. इस प्रान्त के कई गाँव आज भी नौजवानों से खाली हैं. कोई इसी दो पैसे कमाने के फेर पूरब की ओर कोलकाता, असम गया हुआ है, तो कोई मुंबई, दिल्ली, पंजाब में अपमानित होकर रह रहा है, खाड़ी देशों की ओर पलायन भी खूब है. पीछे रह गए हैं बूढ़े माँ-बाप, बच्चे और रोटी-सूखती-सुबकती पत्नियाँ. राजकपूर के ‘श्री420’ का पुरबिया राजू इसी पैसे के लिए मुम्बई जाता है, ‘दो बीघा जमीन’ का किसान कोलकाता में हाथ रिक्शा खींचता है. आज़ादी से पहले की यह दशा आज भी वैसी ही है. भिखारी ठाकुर समय से आगे देख रहे थे. बिदेसिया तब भी था, आज भी है, बस रूप-रंग-ढंग बदला है. भिखारी ठाकुर इस नब्ज़ की धड़कन को जानते थे. बद्रीनारायण थोडा आगे बढ़कर भिखारी ठाकुर को समस्त भारत के किसानों की दुर्दशा का चितेरा घोषित करते हुए लिखते हैं “भिखारी ठाकुर में भारतीय गाँव-जीवन के आर्थिक अपवाय की दर्दनाक गाथा है. पुलिस दमन, सामाजिक विसंगतियाँ नए आर्थिक दबावों से सामाजिक संबंधों के टूटन की जितनी सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक समझ भिखारी ठाकुर के साहित्य में मिलती है, उतना तत्कालीन अभिजात स्वीकृत तथा शिक्षित रचनाकारों की रचनाओं में नहीं दिखाई पड़ता.”5 भारतीय रंगजगत में दूर-दूर तक ऐसा रंगकर्मी नज़र नहीं आता, जो अपने तमाम सीमाओं के बावजूद इतनी पैनी और सूक्ष्म संवेदनशील दृष्टि रखता है.  

भिखारी ठाकुर बीसवीं शताब्दी के लोक कलाकार थे, जिसने वैश्विक प्रसिद्धि और ऊँचाईयाँ पाई. सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ मशाल उठाने वाले इस कलाकार/रचनाकार पर अपने पारंपरिक मूल्यों की भी छाप थी. वे अपने विरासत में मिले इन मूल्यों के बावजूद जड़ता के, यथास्थितिवाद के पैरवीकार न होकर प्रयासों में खालिस प्रगतिशील थे. नाच मंडली से जीवन यापन और उसी नाच के मंच से कबीर की भांति अपने कुशल अभिनय से उस सामंती समाज का नकली चेहरा सबके सामने ले आते थे. हालांकि भिखारी ठाकुर का परिवेश भी मध्यकालीन समाज-व्यवस्था से बहुत अलग नहीं था. भिखारी ठाकुर जिस तरह के जातिगत संरचना से आते थे, वहाँ इस पूरी दकियानूसी सिस्टम से सीधे-सीधे दो-दो हाथ करना भिखारी ठाकुर के लिए संभव नहीं था. अतः इस व्यवस्था से टकराना या इस पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करना एक कूटनीतिक चतुराई वाले प्रयास की माँग करता था और भिखारी ठाकुर जैसा कलाकार इस खेल का महारथी था. उन्होंने बड़े ही चतुराई से इस व्यवस्था को उसके बनाये मंच से चुनौती दी. जनप्रिय कलाकार के मुँह से अपने पर पड़ती चोट से यह तंत्र तिलमिलाने के अलावा कर ही क्या सकता था.
आज जब भिखारी ठाकुर हमारे बीच नहीं हैं, तब उनके लिखे-खेले नाटक आज के नए विमर्शों के मध्य और भी प्रासंगिक हो उठे हैं. भिखारी ठाकुर का समय औपनिवेशिक समय था, आज उत्तर औपनिवेशिक दौर में भी भिखारी ठाकुर के उठाए प्रश्न हमारे समाज में विद्यमान हैं, चाहे वह दलित वर्ग से सम्बंधित हों या स्त्रियों का पक्ष. आज भी इन प्रश्नों से जूझते बड़े समाज की ओर किसकी दृष्टि है? जिन श्रमिकों का बड़ा चित्रण भिखारी ठाकुर ने किया, उनकी कोई जाति नहीं थी. सब पूरब के बेटे हैं, जो आज भी पलायन को मजबूर हैं और घर में पीछे रह गयीं औरतें रोने को मजबूर हैं. हमारे बड़े प्रजातंत्र के नीति-नियंता कहाँ हैं? श्रमिक संस्कृति का इतना बड़ा चितेरा भारतीय साहित्य में दिखाई नहीं देता, जिसके प्रश्नों का जवाब आज तक अनुत्तरित है.      

सन्दर्भ सूची :
1.    लेख-भोजपुरी के शेक्सपियर कवि : भिखारी ठाकुर , आधुनिक भोजपुरी के दलित कवि और काव्य, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, गौतम बुक सेंटर, शाहदरा, दिल्ली – 93. पृ.-17.ISBN 978-93-80292-29-8.सं.2000.
2.    देखें (मूल लेख भोजपुरी में),समीक्षा , जनकवि भिखारी, रघुवंश प्रसाद सिंह, अंजोर(भोजपुरी पत्रिका), अंक-अक्टूबर-नवम्बर 1967).
3.    लेख-लोकभाषा और लोक 3 साहित्य : सैद्धांतिक पक्ष, गवेषणा, अक्टूबर-दिसंबर,2008, सं.  मीरा सरीन, केंद्रीय हिंदी संस्थान,आगरा,पृ-48.
4.    लोक संस्कृति : आयाम और परिप्रेक्ष्य, सं. महावीर अग्रवाल, शंकर प्रकाशन, दुर्ग, मध्य प्रदेश, पृ-8.
5.    (लोक संस्कृति और इतिहास, बद्रीनारायण, लोकभारती प्रकाशन, 15ए,महात्मा गाँधी रोड, इलाहाबाद,पृ-38.


12/3/13

सिनेमाई युवा का संसार

(यह लेख भारतीय पक्ष पत्रिका के लिए जुलाई 2010 में लिखा गया था. आज अचानक ही इसकी छायाप्रति हाथ लगी. फिर भारतीय पक्ष के वेबसाईट से आर्काईव से अपने इस लेख की प्रति ली और  आपसे शेयर करूँ.-मोडरेटर ) 

समानांतर सिनेमा के युवा-वर्ग का असंतोष और सिस्टम में उसकी लघुता ज्यों की त्यों दिखती है। बिना किसी चमत्कार के नंगा, कड़वा सच, नंगे और अधिक कड़वे रूप में दर्शकों को झिंझोड़ता है। पर पैरलल सिनेमा का यह युवा प्रश्न उठा कर सिस्टम का शिकार होता दिखता है और कहीं न कहीं इस बात को साबित कर देता है कि इस भ्रष्ट गठजोड़ की गांठ इतनी मजबूत है कि यह आम आदमी से टूटेगी नहीं और उसकी नियति इसके खिलाफ खत्म ही होना है।

हिंदी सिनेमा के इतिहास पर गौर करें तो हम पाएंगे कि उन फिल्मों का प्रतिशत अधिक है, जो शहरी रवायत के कथानक लिए हुए हैं जबकि इसके उलट गंवई कहानियों वाली फिल्में अपेक्षाकृत कम ही आई हैं। इस भेद के भीतर जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। सामान्यत: हिंदी सिनेमा के युवा चरित्रों की बात की जाये तो इसकी नींव शुरुआत में ही पड़ गयी थी। नयी-नयी मिली आजादी ने मोहभंग की स्थिति में तब के युवा-वर्ग को दोराहे पर खड़ा कर दिया था। श्री 420′ और आवाराका युवा नायक यह जान गया था, कि यहां केवल रुपया ही पूजा जाता है। जबकि बाद की स्थितियां थोड़े अलग तरह से सामने आयीं। आमतौर पर हिंदी सिनेमा का युवा चरित्र मुख्यत: शहरी उच्च वर्ग/ उच्च मध्यवर्ग, मध्यवर्ग/निम्न मध्य वर्ग/ झोपड़पट्टी तथा गांव का सीधा-साधा नौजवान रहा है। यह स्थिति पुरुष और स्त्री दोनों पर समान रूप से लागू होती है। चाहे बात मदर इंडियाकी हो या लगानकी। यद्यपि 70 का दशक हिंदी सिनेमा इतिहास का एक महत्वपूर्ण दौर है। यह वही समय है जब परदे पर एंग्री यंग मैनका उदय होता है और उसने अपने आने के साथ ही सिनेमा के रोमांस किंग को रिप्लेस कर दिया। तत्कालीन युवा का यह एंग्री रूपदर्शकों की डिमांड नहीं थी बल्कि तत्कालीन व्यवस्था से उपजे असंतोष का युवा प्रतीक था। यह सहज बात है कि व्यवस्था से उपजने वाली परिस्थितियों से कोई भी कला रूप प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती। जब हमारे इर्द-गिर्द सिस्टम अराजक स्थिति में पहुंच चुका था और देश में बेरोजगार, शिक्षित युवाओं की एक पूरी जमात अंधेरे में ठोकरें खाने को विवश थी, ‘एंग्री यंग मैनने तब इसी युवावर्ग के दबे आक्रोश को सिल्वर स्क्रीन पर जगह दी। सिनेमा में युवा चरित्रों के निर्माण में भारतीय राजनीति का भी गहरा प्रभाव पड़ा।

कुछ पाने को आतुर तेजाबी आंखे

युवा चेहरे का यह असंतुष्ट एंग्री रूप न केवल 70 के मेनस्ट्रीम सिनेमा में आया बल्कि बाद के दशकों में समानांतर सिनेमा में भी दिखा। पर यह सोचने वाली बात थी कि अब तक जो वर्ग सिनेमा और समाज दोनों जगह नान-सीरियस माना जाता रहा था, एकाएक ऐसा असंतुष्ट कैसे दिखने लगा। राजेश खन्ना तक तो ये तेजाबी आंखें रोमांस फरमाती रही थीं। अब युवाओं के सिनेमाई प्रतिनिधि भ्रष्ट-तंत्र को तहस-नहस कर देने और उसमें अपनी जगह बनाने के लिए किसी भी हद तक जाने को आतुर थे। यह मेनस्ट्रीम का युवा खुद कानून को हाथ में लेता है। अपने ऊपर हुए जुल्मों के खिलाफ सड़क पर लड़ाई लड़ता है। वह अविश्वासी है, वह जानता है कि सरकारी तंत्र एक छलावा है। यह इस सड़ चुके सिस्टम को बर्बाद कर देने की कूबत रखता है, जबकि समानांतर सिनेमा के युवा-वर्ग का असंतोष और सिस्टम में उसकी लघुता ज्यों की त्यों आती है। बिना किसी चमत्कार के नंगा, कड़वा सच, नंगे और अधिक कड़वे रूप में दर्शकों को झिंझोड़ता है। पर पैरलल सिनेमा का यह युवा प्रश्न उठा कर सिस्टम का शिकार होता दिखता है और कहीं न कहीं इस बात को साबित कर देता है कि इस भ्रष्ट गठजोड़ की गांठ इतनी मजबूत है कि यह आम आदमी से टूटेगी नहीं और उसकी नियति इसके खिलाफ खत्म ही होना है। ऋआक्रोशके ओमपुरी और पारके नसीरुद्दीन शाह के किरदार को देखकर तो कम से कम ऐसा ही लगता है) राज कपूर, दिलीप कुमार, देव आनंद का गांधीवादी युवा जाने-अनजाने ऋहृदय परिवर्तन से) सिस्टम का पार्ट बन ही जाता है वहीं गुरुदत्त का नौजवान कवि महान क्लासिक प्यासामें समाज द्वारा पैदा किये अवसाद में गहरे उतरता ही चला जाता है। इन सबकी अपनी महत्ता है पर इन सबके उलट मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और रवि टंडन का युवक लगभग नास्तिक है और वह हिंदी सिनेमा के जबरदस्त चालू फार्मूले के साथ अमानवीय ताकत लेकर आता है। हिंदी सिनेमा का यह समय इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि आपातकाल के संशय और उठा-पठक वाले समय में राजनीति में जयप्रकाश नारायणजैसे व्यक्तित्व ने युवाओं को दिशा दी तो सिनेमा ने सिस्टम से सीधे दो-दो हाथ करने को सिल्वर स्क्रीन का अवतार दिया। समझदार निर्देशक जानते थे कि भारतीय जनता अपने दुखों के निवारण के लिए अवतार या मसीहे का इंतजार करती है। उन्होंने दर्शकों की इस मानसिकता का फायदा उठाया। तीन घंटे के लिए ही सही, परदे पर उन्होंने मसीहा को उतार दिया जो जंजीर, कुली, दीवार, नास्तिक, त्रिशूल, आदि फिल्मों में दिखायी देता है।

समानांतर सिनेमा का युवा
वैसे हिंदी सिने जगत में इस तरह के फिल्मों का बीज भुवन सोम1969, मृणाल सेन) से ही पड़ गया था जो पूर्णरूपेण आठवें दशक में फला-फूला। हिंदी सिनेमा का यह आठवां दशक संवेदनशील, यथार्थपरक, कलात्मक तथा सीमित बजट वाली फिल्मों के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है। इस दौर में सईद मिर्जा, श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, गौतम घोष, सई परांजपे, मणि कौल, कुमार शाहनी जैसे निर्देशक सामने आये जिन्होंने सलीम लंगड़े पर मत रो, 36 चौरंगी लेन, अंकुश मंडी, पार, अर्धसत्य, आक्रोश जैसी फिल्मों के माध्यम से एक अलग तरह की ही दुनिया प्रस्तुत की जिसे हम जान-बूझकर देखना ही नहीं चाहते थे। और जो हमारे समय का कड़वा सच था। अंकुशके चारों युवा नायक सच के पक्ष में बोलने के बावजूद और कोर्ट में अपना पक्ष रखने के बावजूद मरने को अभिशप्त हैं और यह बिन बोले कह जाते हैं कि बिना राजनीतिक जागरूकता के कोई हमारे समय में साथ नहीं देगा। हमें सिस्टम की कमान अपने हाथों में लेनी होगी और जिसके लिए वृहत्तर वैचारिक जागृति की जरुरत है। इन फिल्मों का युवा किसी विशेष आन्दोलन का परिणाम नहीं था। यह उन नए फिल्मकारों के अपने जीवन अनुभव, और उसके प्रति एक बौध्दिक यथार्थवादी दृष्टि तथा परिवेश बोध से गहरे जुड़ाव और गंभीर समझ का युवा था। अफसोस यह युवा उन तमाम आम युवाओं तक पैठ नहीं बना सका जिनकी बात यह करता था। इसने बुध्दिजीवी युवावर्ग पैदा किया, जो समाज के लिए अधिक मानवीय था। यद्यपि यह मानवीयता के लिए प्रतिबध्द होकर भी अपने मूल स्वभाव में व्यवस्था-विरोधी था।


युवा-काऊ ब्याय बनाम कालेज गोइंग रोमांस
80 के दशक बाद की मुख्यधारा की फिल्मों का युवा फिर से अपनी इमेज नान सीरियसवाली बनाने लगा और बाकी बची-खुची कसर हालीवुड प्रेरित काऊ ब्यायसंस्कृति ने ने पूरी कर दी। शिवा’ ‘अर्जुन’ ‘गर्दिश’, ‘परिंदा’, ‘काला बाजारजैसी फिल्मों ने इन युवाओं को कालेज के परदे पर उतारा। यह युवा कालेजों में छोटे-छोटे गुटों में बंटकर मारपीट, गुंडागर्दी करने लगा। गलियों नुक्कड़ पर हफ्ता वसूलने लगा। उसके इस रूप पर हिरोइनें जान लुटाती हैं। भले ही यह उनसे बदतमीजी करता हो। यह युवा उसी तरह के सैडिस्टिक दृश्य का एक्सटेंशन बना जिसकी बुनियाद राजकपूर ने अपने जवानी के दिनों में रखी थी। यानि स्त्री पर पुरुष शक्ति के प्रभुत्व को ग्लोरिफाई करना। कविता सरकार ने लिखा है-भारतीय दर्शकों में इस तरह के सैडिज्म के लिए विशेष आकर्षण है। इतना ही नहीं इस तरह का मर्दवाद दर्शकों ने अमिताभ की फिल्मों में मर्द’, ‘दीवारमें भी खूब पसंद किया। यानि कितने ही हंटर मार ले, जख्मों पर नमक छिड़क ले पर मर्द के सीने में दर्द नहीं होता। तेजाबजैसी फिल्में कालेज गोइंग युवा को रोमांस की पटरी और पेड़ों के इर्द-गिर्द बेतहाशा नचा-गवा कर अंत में एंग्री यंग मैन का भी रूप दे देती रहीं। यानि थ्री इन वन पैकेज। इसी दौर में यह एंटी हीरोके तौर पर भी डेवलप हुआ। यह नया युवा कालेज, गुंडागर्दी और राजनीति के गलियारे में चक्कर लगाता रहा। इसी समय जोशीले’ ‘दोस्त’, ‘गरीबों का रखवालाजैसी फिल्मों ने काऊ ब्याय संस्कृति को देशी रूप में दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया।

एंटी हीरो बनाम प्रेम दूत का उदय
कयामत से कयामत तक’ ‘मैंने प्यार कियाने आमिर खान और सलमान खान को युवावर्ग के बीच प्रेमदूतों के तौर पर स्थापित कर दिया। आर्चीज के कार्ड एक दूसरे को भेजे जाने लगे। खेतों में सरसों लहराने लगी। दूर-दराज के कस्बों तक में वेंलेनटाइन डे मनाया जाने लगा। यह समय प्रेम के सबसे बड़े सितारे शाहरुख खान के उदय का भी था। हर नया पैदा होने वाला बच्चा अब राज या राहुल था। यह दौर दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे का था। यह युवा चरित्र अपने कालेजों में प्रेम के गीत गाने और अपनी सारी ऊर्जा हिरोइन को पाने में लगाता है। नब्बे के उदारवादी दौर में जब बाजार में नयी संभावनाएं जन्म ले रही थीं, तब ऐसे में इन फिल्मों के युवा चरित्रों ने भी सिनेमा को एक नया मोड़ दिया। हालांकि संजय दत्त का खलनायक ऋएंटी हीरो इमेज को) दर्शकों द्वारा खासा पसंद किया गया। यानि इस दौर में भी हिंदी सिनेमा में युवाओं का चरित्र गीत-संगीत, प्रेम और हिंसा के त्रायी पर झूलता रहा। हिंदी सिनेमा की एक बड़ी खूबी रही है कि हर दौर में मुख्यधारा के सिनेमा के बरक्स एक समानांतर सिनेमा की परंपरा भी चलती रही। जो समय दर समय अपने मिजाज को और बेहतर करती रही। खान त्रायी के जादू के समय में भी सत्याऔर युवाजैसी फिल्में आयीं जिन्होंने महानगरीय युवा की एक दूसरी छवि गढ़ी जो अधिक चौकाऊं थीं। अंडरवर्ल्ड के भीतर का युवा और शहरी-शिक्षित मध्यवर्गीय युवा की इमेज प्रस्तुत करती इन फिल्मों ने फिर से उस मिथक को तोड़ा जहां इन युवाओं का चरित्र नान सीरियस फिर से बनने लगा था। लगानका भुवन जहां गंवई माहौल में एक लीडर के तौर पर उभरता है, वहीं नासा का भारतीय युवा वैज्ञानिक स्वदेशलौट अपने पढ़े-लिखे नौजवानों को ब्रेन ड्रेन के जाल से निकल आने को प्रेरित करता है। प्रेम इसमें भी कहीं बाहर नहीं जाता बल्कि वह मजबूती देने का आधार बनता है। दिल चाहता हैके युवक बर्गर, पित्जा खाते गोवा बीच और क्लबों में घूमते युवाओं को अलमस्ती का पाठ देते हैं। इस अलमस्ती के बीच भी यह पीढ़ी अपने समाज से शून्य नहीं है। वह सच का झंडा बुलंद करता है। आजाद मुल्क में इंडिया गेट पर एक अलग किस्म की सार्थक आजादी हेतु लाठियां खाता है और रंग दे बसंतीके माध्यम से नए समय के भगत सिंह, बिस्मिल आजाद के तौर पर उभरता है। यहां से हिंदी सिनेमा में युवा चरित्रों की छवियों ने गंभीर दिल को छू लेने वाली बुनियाद रखी। यह स्त्रियों से पशुवत व्यवहार नहीं करता, उन्हें बराबरी का दर्जा देता है।

मल्टीप्लेक्स फिल्मों की युवा छवि
21वी सदी में लड़कियां लड़कों से आगे निकल जायेंगी, यह सुनते-सुनते बड़े होते हमने फिल्मों में देख लिया, यहां देवदास निरुत्तर है। पारो अब रेत को मुट्ठी में नहीं पकड़ना चाहती (देव डी)। देवदास मरता नहीं, जीने की प्रेरणा देता है कि जियो क्योंकि जिंदगी बहुत खूबसूरत है। अनुराग कश्यप एक नए युवक देवदास को सामने लाते हैं। दिवाकर बैनर्जी ओये लकी, लकी ओयेमें उस युवक को सामने लाते हैं जो चोर है पर दुनिया सफेद कालर में उसकी भी बाप है। रजत कपूर जैसे नए लोग मिथ्याजैसी गंभीर फिल्म देते हैं जहां युवा के अपने सपनीले संसार नंगी और क्रूर सच्चाई में दम तोड़ देते हैं।

यह हमेशा से चलता आ रहा है कि युवा नायक अलमस्ती के आलम में कुछ गंभीर बातें कर जाता है। यह स्थिति अब भी है पर सिस्टम को लेकर अभी भी जो प्रश्न राजकपूर उठा चुके हैं उन्हीं, प्रश्नों को थोड़े और विस्तृत रूप में आज के नए निर्देशकों ने भी अपनी तरह से अपनी फिल्मों में उठाया है। फिल्म बनाने का तरीका काफी बदला है और कथा कहने, किरदार रचने का भी। फिर भी वर्तमान का हिंदी सिनेमा जगत ने इस युवा छवि को और भी बेहतर बनाया है। जाने-अनजाने इन फिल्मों ने हमारी युवा पीढ़ी को काम के ट्रेडिशनल रास्ते से अलग रास्ता चुनने को भी प्रेरित किया है। राक आनके युवक अपना बैंड बनाते हैं। समर 2010′ के युवक डाक्टर सुदूर देहात में जाकर प्रैक्टिस करते हैं। राजनीतिके युवक पारिवारिक विरासत को संभालने की लड़ाई लड़ते दिखते हैं। यह एक नए किस्म का उभार है।हिंदी सिनेमा ने एक नए तरह की युवा छवि रची है जो परम्परा और आधुनिकता में समन्वय करने में सक्षम है।

(सभी चित्र : विभिन्न स्रोतों से,गूगल इमेज के मार्फ़त : साभार)


11/5/13

“Beyond Borders people and perception “ दसवाँ सत्यवती मेमोरियल लेक्चर (जाहिदा हिना)

( पिछले कुछ महीनों से मीडिया द्वारा कश्मीर में बार-बार बोर्डर पर गोलीबारी, क्रोस बोर्डर आतंकवाद की खबरें  आ रही हैं, इधर देश के भीतर आगामी चुनावों को लेकर जिस तरह का माहौल एक सोची-समझी रणनीति के तहत रच दिया गया है, वैसे में एक अजीबोगरीब घुटन का वातावरण आस-पास आकार लेने लगा है. इस तरह के हालात में मुझे यह जायज़ लगा कि लगभग एक वर्ष पहले मेरे कॉलेज में पाकिस्तान की ख्यात लेखिका जाहिदा हिना का दिया सत्यवती मेमोरियल व्याख्यान beyond borders, people and perception आपसे शेयर किया जाये, हमें आइना दिखाता यह व्याख्यान यहाँ प्रस्तुत है कि हम जा कहाँ रहे हैं, हम हो क्या गए हैं.- मोडरेटर) 


माननीय उप-कुलपति दिल्ली विश्वविद्यालय प्रो.विवेक सुनेजा, प्रो.अपूर्वानंद, शिबा सी.पांडा, डॉ.अजीत झा, डॉ.सतेन्द्र कुमार जोशी, डॉ.देवेन्द्र प्रकाश, डॉ.साधना आर्या, मैं आप सब लोगों का बेहद शुक्रिया अदा करती हूँ कि आपने मुझे दिल्ली के इस मशहूर कॉलेज में आने की दावत दी और ‘Beyond borders people and perception’ जैसे अहम मुद्दे पर बात करने का मौका दिया | मैं हॉल में बैठे हुए तमाम फैकल्टी मेम्बर्स, तमाम स्टूडेंट्स एवं दूसरे मेहमानों की भी शुक्रगुजार हूँ |

ये मेरे लिए बहुत इज्ज़त की बात है कि मैं ‘फ्रीडम मूवमेंट’ की एक आदर्शवादी महिला के नाम पर बने हुए ‘एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन’ में आप लोगों के बीच मौजूद हूँ और अपने दिल की बात आपसे कह रही हूँ |

अब से चंद दिनों पहले जब मुझे आपके कॉलेज की मेमोरियल लेक्चर कमिटी की तरफ से ‘१०वें सत्यवती मेमोरियल लेक्चर’ की दावत मिली और ये कहा गया कि मैं ‘Beyond borders people and perception’ पर बात करूँ तो मैं ये सोचती रही कि शब्द.....हवा, चाँदनी, धूप, पक्षी, पखेरू और दरिया की लहरों जैसे होते हैं,जो तमाम सरहदों और हदों को, सारी सीमाओं को किसी मुश्किल, किसी अड़चन, किसी पासपोर्ट, किसी वीजा के बिना पार कर जाते हैं | अगर मेरी सोच शब्दों में ढलकर सीमाओं को पार न करती, तो ये कैसे मुमकिन था कि आज मैं यहाँ आपके सामने अपनी बात करने के लिए मौजूद होती |

मैं आज इस मेमोरियल लेक्चर के शुरू में बहन सत्यवती को याद करुँगी, जिन्होंने सिर्फ 38 वर्ष  की उम्र पाई और जो हमारी freedom movement(स्वतंत्रता संग्राम) का एक चमकता हुआ सितारा हैं |
उन्होंने जिस जीवटपन और बहादुरी से अपना चैन, आराम, अपनी घर-गृहस्थी, अपने बच्चों की मोहब्बत भरी और शरारतों से भरा उनका बचपन freedom movement(स्वतंत्रता संग्राम) पर, quit india movement (भारत छोड़ो आंदोलन) पर कुर्बान कर दिया और अपनी तमाम खुशियाँ तज दीं | इसके लिए हम उन्हें जितने सलाम करें, वो कम है | हमारे घरों की दूसरी माँओं की तरह उन्होंने कितनी मर्तबा अपने बच्चों को अपने हाथों से पूरी खिलाई होगी लेकिन फिर इन्हीं हाथों से उन्होंने लाहौर जेल पर तिरंगा लहराया | उनको सलाम करते हुए मुझे अपनी एक कहानी ‘तितलियाँ ढूँढने वाली’ याद आई, जिसमें एक आदर्शवादी माँ अपने वतन के तमाम बच्चों के लिए आज़ादी की तमाम तितलियाँ ढूँढते हुए लाहौर जेल में फाँसी चढ़ गई थी | मेरी ये कहानी आज़ादी मिलने के बाद की है, जब पाकिस्तान में dictatorship(तानाशाही) के ज़माने में सियासी जद्दोजहद से जुड़ी हुई एक औरत ने माँ होने के बावजूद मौत का इंतखाब किया था |

हम जब सीमाओं की बात करते हैं, तो ये बात याद आती है कि आज़ादी के जोश ने औरत और मर्द के बीच Gender differences(लिंग भेद) के बीच की सीमाएँ मिटा दी थी | जेल जाने और लाठियाँ खाने के लिए, जान से गुज़र जाने के लिए सब एक थे | वो मर्द हों या औरतें, स्टूडेंट्स हों या घर-गृहस्थिनें सबके आदर्श एक थे | सत्यवती, सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, मृदुला साराबाई, अनीस किदवई, कमला बहन पटेल और दूसरी बहुत-सी औरतों ने हजारों बरस पर फैली हुई Gender Identity(लिंग आधारित पहचान) की सरहदें पार कर ली थी और Freedom movement(स्वतंत्रता संग्राम) के इस अज़ीम धारे का हिस्सा बन गई थी, जिसमें सभी शामिल थे |

हम सब सरहदों के बारे में जानने की कोशिश करते हैं, तो हमें मालूम होता है कि समय का दरिया इन सरहदों, इन सीमाओं को बदलता चला जाता है | यही देखिये की आज जिस जगह हम मौजूद हैं, उसका नाम अशोक-ए-आज़म के नाम पर अशोक विहार है | किसी ज़माने में अशोक की सल्तनत की सीमाएँ मगध से बामियान तक फैली हुई थीं, लेकिन फिर ये सीमाएँ बदलती रहीं और हम नहीं जानते कि आने वाले वर्षों में कितने मुल्कों की सीमाएँ बदलेंगी |
लेकिन जब आज हम Beyond borders(सीमाओं से परे) की बात करते हैं, तो ये दरअसल हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का किस्सा है | इन दोनों मुल्कों का रिश्ता पहले दिन से तनाव का शिकार रहा है | जिस ज़माने में मुस्लिम लीग पाकिस्तान मूवमेंट चला रही थी, उस वक्त ये कहा जा रहा था कि हमें ब्रिटिश राज से आज़ादी के साथ ही बँटवारा भी चाहिए | ये कहा जाता था कि कम्युनल लाईन्स पर हिंदुस्तान की तफ्सीम से हिंदू-मुस्लिम संघर्ष (Conflicts) और झगड़ा खत्म हो जायेगा और दोनों मुल्कों के लोग अपनी-अपनी सरहदों के अंदर आज़ादी से जिंदगी गुज़ारेंगे | अपने शहरियों को उनके Political, Democratic और Social rights (सामाजिक अधिकार)  देंगे और दोनों Co-Existence(सह-अस्तित्व) की बुनियाद पर International Community(अंतर्राष्ट्रीय समुदाय) में अपनी सकारात्मक भूमिका अदा करेंगे लेकिन बँटवारे  के बाद दोनों तरफ जो कुछ हुआ, वो इन वादों के बिल्कुल उलट था |     
ये इसी का नतीजा है कि आज दोनों मुल्क जो एक बहुत बड़ी मैन पावर रखते हैं, दोनों Natural और  Mineral resources से मालामाल हैं, जिनके खेत सोना उगलते हैं, उनकी दौलत जंग की तैयारियाँ निगलती रहती हैं | आज से दस बरस पहले महबूब-उल-हक हियोमन Develpoment Report में कहा गया कि
“आजकल हमें (पाकिस्तान) जुनूबी कोरिया बनने का शौक हो रहा है, लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि जुनूबी कोरिया हर साल अपनी आबादी के हर शख्स की बेसिक एजुकेशन पर तक़रीबन 130 डॉलर खर्च करता है, जबकि मलेशिया तालीम पर सालाना 128 डॉलर फी शख्स खर्च कर रहा है | अगर इसका Comparison(तुलना) जुनूबी एशिया के मुल्कों से किया जाये तो मालूम होता है कि हिन्दुस्तान अपनी आबादी के हर फर्द की बेसिक तालीम पर सालाना 9 डॉलर, पाकिस्तान 3 डॉलर, बांग्लादेश 2 डॉलर, फी शख्स के हिसाब से खर्च कर रहे हैं |“

हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दक्खिनी एशिया के पिछड़े हुए मुल्कों में हैं | दक्खिनी एशिया के 80 करोड़ लोग सेहत और सफाई की बुनियादी सुविधाओं से महरूम हैं | 38 करोड़ अफराद पढ़े-लिखे हैं और 30 करोड़ इंसान नल की बजाय जोहड़ों का पानी पीने पर मजबूर हैं |

इन तमाम मुश्किलों के बावजूद ये आप लोगों की खुशकिस्मती है कि आपके यहाँ पहले दिन से Democracy (जम्हूरियत/प्रजातंत्र)) कायम रही और इसका सफर कदम-बा-कदम आगे बढ़ता रहा और हमारी बदनसीबी है कि हम आज़ादी के बाद Democracy(जम्हूरियत/प्रजातंत्र)  को बढ़ावा ना दे सके | ऐसा पहली मर्तबा हुआ है कि हमारी एक Elected Government(चुनी हुई सरकार) अपना tenure(कार्यकाल/अवधि) पूरा करने वाली है, वरना उससे पहले कभी दो, कभी ढाई वर्ष में हमारी Elected Government(चुनी हुई सरकार) की छुट्टी होती रही | आपके यहाँ भी ग़ुरबत और भुखमरी है लेकिन हमारे यहाँ Poverty Line(गरीबी रेखा) से नीचे जिंदगी जीने वालों में मुसलसल बढ़ोतरी हो रही है और अब वो चालीस फीसद हो चुकी है |

इस जगह मुझे महात्मा गाँधी के चंद जुमले याद आ रहे हैं | उन्होंने कहा था – “उस गरीब तरीन, कमज़ोर तरीन शख्स को याद कीजिए, जिसे आपने देखा हो और अपने आप से पूछिए कि जो कदम आप उठाने जा रहे हैं, क्या उसका कुछ फायदा उसको होगा ? क्या उसे उससे कुछ हासिल होगा ? क्या उससे वो अपनी जिंदगी और अपनी किस्मत पर कुछ काबू हासिल कर सकेगा ?”

महात्मा गाँधी ने जिस गरीब इंसान की बात की थी, बरेसगीर के इस पिछड़े हुए और पिसे हुए गरीब इंसान को क्या हमने बीते हुए चौंसठ वर्षों में कुछ याद किया ? हमने ऐसा नहीं किया और दोनों तरफ सरहदें मज़बूत की जाती रहीं, उन पर जंग होती रही | दोनों तरफ की गोलीबारी ने इंसानों के घरों और पक्षी-पखेरुओं के घोंसलों को जलाकर राख कर दिया |

आज सरहदें भी वहीँ हैं, सरहदों के पार मुल्क भी वहीँ है और उन मुल्कों में रहने वाले लोग भी वहीँ हैं और ये सब कुछ 1947 से मौजूद है | एक पाकिस्तानी के तौर पर मुझे ये मानना चाहिए कि मेरे मुल्क की सीमाएँ सिमट गई हैं | ईस्ट बंगाल हमसे अलग हो गया और 1971 से वो  बांग्लादेश है, एक आज़ाद मुल्क |
हम ये कैसे भुला सकते हैं कि हिन्दुस्तान के नक़्शे पर जब सरहदें खींची गई तो दोनों तरफ के लाखों बेगुनाह लोग, दोनों तरफ के जुनूनी और सफाक लोगों के हाथों क़त्ल हुए | बस्तियाँ और औरतें बर्बाद हुईं | इतिहास का सबसे बड़ा Exodus(निष्क्रमण) सबसे बड़ा तरके वतन हुआ | वो ख्वाब जो दिखाए गए थे, के ये बँटवारे के बाद हिन्दू और मुस्लिम Community(समुदाय) के बीच तनाव खत्म हो जायेगा, वो झूठा साबित हुआ | तभी 14 अगस्त 1947 की रात फैज़ साहब ने लाहौर के माल रोड पर अपनी आँखों से जो कुछ होते देखा, उसने उनके दिल के टुकड़े कर दिए और उन्होंने अपनी मशहूर नज़्म लिखी –

‘ये दाग दाग उजाला ये शब गज़ीदा सहर
वो इंतज़ार था जिसका ये वो सहर तो नहीं’
उन्होंने अपनी इस नज़्म को खत्म करते हुए कहा था –
‘निजात-यय-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई
चले चलो के वो मंजिल अभी नहीं आई’

इनकी ये नज़्म लाहौर से निकलने वाले अदबी रिसाले ‘सवेरा’ में छपी थी और इस जुर्म सज़ा में ‘सवेरा’ की पब्लिकेशन पर छः महीने का बैन (Ban) लग गया था और फिर फैज़ साहब पर जो गुजरी, वो एक लंबी कहानी है, जिसको आप, मैं और दूसरे यहाँ बैठे हुए बहुत से लोग जानते हैं | जिस वक्त बँटवारा हो रहा था, उस वक्त ऐसे बहुत से लोग मौजूद थे, जो ये जानते थे कि अगर हमने बँटवारे की कीमत पर आज़ादी ली, तो वो हमें बहुत महँगी पड़ेगी | आपसी नफरत खत्म होना तो दूर की बात है, ये नफरत अपनी इन्तहा को पहुँचेगी | उन लोगों में सबसे अहम नाम मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और उनके दूसरे साथियों का है, जो बेबसी से ये सब कुछ होता देखते रहे | समय उस वक्त उनके खिलाफ था और उसने उनकी ख्वाहिश के खिलाफ फैसला दिया | इसके बावजूद मौलाना आज़ाद ने और दूसरे बहुत से लोगों ने अपना point of view (दृष्टिकोण) नहीं बदला और अपनी बात पर अटल रहे | मौलाना को कॉंग्रेस का ‘शो ब्वॉय’ कहा गया | अलीगढ़ स्टेशन पर उनके गले में जूते के हार डाले गए लेकिन उन्होंने कॉंग्रेस और हिन्दुस्तान को नहीं छोड़ा | वो दोनों Communities (समुदायों)  के बीच भाईचारे की बात करते रहे |
गुजरी हुई छह दहाइयों में दोनों मुल्कों की सरहदों पर Tension (तनाव) अपनी इन्तेहा पर पहुँची | हमने आपस में छोटी-बड़ी पाँच जंगें लड़ीं | हमारे आपसी Relations(संबंध) खराब रहे | हमारे अंदर नफरतों का ज़हर फैलता रहा 
लेकिन दोनों तरफ कुछ लोग थे, जो ये कहते रहे कि लड़ाई-दंगे से, नफरत से कुछ नहीं होगा, एक-दूसरे की सरहदों का एहतराम कीजिए | एक-दूसरे के लिए अच्छा सोचिए | निर्मला देशपांडे, जिन्हें हम सब दीदी कहते थे, वो “गोली नहीं बोली” का नारा लगाती रहीं | मुझ जैसे लोग पाकिस्तान में “पाक-हिंद प्रेम सभा” बनाकर अमन की और दोस्ती की बात करते रहे | हम कहते थे कि हमने लड़ाई-दंगों को आजमा कर देख लिया | इसका नतीजा सिर्फ तबाही, बर्बादी, भुखमरी, ग़ुरबत और बेरोज़गारी की सूरत में निकला | अब क्यों न अमन को भी एक मौका दिया जाए | उसे आजमा कर देखा जाये कि उसका नतीजा क्या निकलता है |

मुझे अच्छी तरह याद है कि 1979 में जब हम 12-14 लोगों ने “पाक-हिंद प्रेम सभा” बनाई, अमन की और दोस्ती की बात करने के लिए जलसा किया और उस वक्त के इंडियन कौंसिल जेनरल मणिशंकर अय्यर को चीफ गेस्ट बनाया तो हम गद्दार और ‘रॉ’ (RAW) के एजेंट कहे गए |

शायद यही वजह है कि कारगिल एडवेंचर(Adventure) के फ़ौरन बाद मई 2000 में जब हिना जिलानी, अस्मा जहाँगीर और मैं 60 औरतों और लड़कियों के साथ दोस्ती बस के जरिए लाहौर से वाघा के रास्ते दिल्ली के लिए रवाना हुए तो मुझे अपनी आँखों पर यकीन नहीं आता था कि हिन्दुस्तान जाने के लिए इतनी बहुत-सी औरतें हमारे साथ हैं | इसलिए कि जब 1979 में हम कराची वालों ने “पाक-हिंद प्रेम सभा” बनाई, तो बहुत मुश्किल से 10-12 लोग उसमें शामिल होने के लिए तैयार हुए थे | हर शख्स डरता था, यूँ लगता था, जैसे हम हिन्दुस्तान से अमन की बात नहीं कर रहे, पाकिस्तान से गद्दारी कर रहे हैं | और अब पुलों के नीचे से पानी तो क्या बड़े-बड़े दरिया बह गए हैं | पाकिस्तान-हिन्दुस्तान के दरम्यान अमन की बात करना इन दिनों फैशन है | अब जब मैं साल में तीन मर्तबा औरतों की बुलाई हुई अमन कॉन्फ्रेसों में जाती हूँ, वहाँ बेहतरीन अदीब, खवातीन और अमन के लिए सर गरम कारकुन औरतों की बातें सुनती हूँ, तो जी खुश होता है और महसूस होता है कि बात वाकई आगे बढ़ी है |

जंग...औरतों, मर्दों, बच्चों, बूढों, शहरों, देहातों सभी को अपना निवाला बनाती है, लेकिन औरत पर दोहरा अज़ाब आता है | जंग की सूरत में उनका सब कुछ दाँव पर लग जाता है | उनका घर, उनके बच्चे, उनका खानदान, घर के मर्द लड़ने जायेंगे, मारे जाएँ, जंगी कैदी बनें या लापता हो जायें, जिस्मानी या जेहनी तौर पर माजूर होकर घर लौटें तो उनकी हर वजह के तश्दूद को उनके घर की औरत सहती है | दर-ब-दर होने की सूरत में सर छुपाने के लिए ठिकाना ढूँढना, दो वक्त की रोटी, ईंधन, पानी और दवा का इंतजाम करना उनकी जिम्मेदारी होती है | और सितम बलाए सितम ये के वो फातेह फौजियों के हाथों बे-हुरमत होकर बदतरीन जिस्मानी और रूहानी और जेहनी टॉर्चर से गुजरती हैं |

बात वाकई आगे बढ़ी है और जिंगोइज्म(jingoism) में दोनों तरफ की माशी और इक्तासादी तरक्की को जिस क़दर नुकसान पहुँचाया, उसने आहिस्ता-आहिस्ता दोनों तरफ के लोगों का perception(धारणा) बदलना शुरू कर दिया | और अब हाल यह है कि दोनों हुकूमतें अमन की बात करने और फ्रेंडशिप पैक्ट (friendship pact) पर दस्तखत करने में पीछे रह गयीं हैं और दोनों तरफ के लोग आगे निकल गए हैं |

सरहद के पार जहाँ से मैं आई हूँ, वहाँ अब जनता कि Majority(बहुमत)  तमाम बड़ी पॉलिटिकल पार्टीज, ज्यादातर अदीब, शायर और Intellectuals (बुद्धिजीवी), journalists(पत्रकार), industrialists(उद्योगपति) यही कहते हैं के सरहदों के दोनों तरफ न सिर्फ अमन चाहिए बल्कि हर सेक्टर में हमें मिलजुल कर काम करना चाहिए, वीजा रिजीम(resime) को बहुत liberal(उदार) होना चाहिए, क्योंकि लोग जब आज़ादी से एक-दूसरे से मिलते हैं, तो उनका perception (धारणा) बदलता है और वह यह जान पाते हैं के दूसरी तरफ भी इन्हीं जैसे इंसान बसते हैं और इनके दुःख-दर्द भी इन्हीं के जैसे हैं |

आज सरहदें भी वहीँ हैं, सरहदों के पास बसने वाले दोनों मुल्क वहीँ हैं, इनमें रहने वाले भी वहीँ हैं, लेकिन लोगों की सोच में, इनके perception (धारणा) में ड्रामाई तब्दीली हुई है | अमन, दोस्ती और भाईचारे की जो फिज़ा आज है, वह इससे पहले कभी नहीं थी | हद तो यह है के पाकिस्तान के सबसे पॉपुलर टेलीविजन स्टेशन से चंद दिनों पहले एक प्रोग्राम में यह कहा गया के आज का पाकिस्तान न सिर्फ करारदाद पाकिस्तान से मुख्तलिफ़ है, बल्के Founding Father और करोड़ों मुसलमानों ने पाकिस्तान के बारे में जो ख्वाब देखा था, उससे भी बिल्कुल मुख्तलिफ़ नज़र आता है | आज का पाकिस्तान वो पाकिस्तान नज़र आता है, जो दरअसल कॉंग्रेस से जुड़े हुए और पाकिस्तान की तकसीम को कबूल न करने वाले मुसलमान लीडर दिखाते थे | वह कहते थे के पाकिस्तान के नाम पर हिन्दुस्तान की तकसीम दरअसल मुसलामानों के लिए अच्छा फार्मूला नहीं है |  और ये बर्रेसगीर में रहने वाले मुसलमानों की बेहतरी का मंसूबा नहीं है , ये बात सौ फीसद तो सही साबित नहीं हुई, लेकिन मुकम्मल तौर पर गलत भी साबित नहीं हुई है | प्रोग्राम के एंकर पर्सन ने कहा के उस वक्त के कॉंग्रेस के सदर मौलाना अबुल कलाम आजाद की हर मुमकिन कोशिश थी के हिंदुस्तान की तकसीम न हो | उनका ये कहना था के हिंदुस्तान की तकसीम मुसलमानों के लिए परेशानी का सामान पैदा कर सकती है |

23 मार्च 2012 वह ऑन एयर जाने वाले इस प्रोग्राम में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के विजन से जो बातें कही गयीं, उन्हें सुनकर मुझे यकीन नहीं आया के पाकिस्तानी टेलीविजन से मौलाना आज़ाद की तक़रीर सुनाई जा सकती है | ऐसे ही बहुत-सी बातें हैं, जो अब पाकिस्तान में की जा रही हैं | आपके यहाँ भी लोगों का Perception(धारणा) बदल रहा है | सोचने की बात यह है के इस Perception(धारणा) में बदलाव आने की कितनी भारी कीमत हम दोनों मुल्कों में रहने वालों ने अदा की है |

जिन दिनों दोनों मुल्कों ने एटमी धमाके किये, उस ज़माने में जिंगोइज्म(jingoism) उरूज पर था, दोनों तरफ से यह कहा जा रहा था के Balance of Terror कायम रहना चाहिए | ये बहुत मुश्किल वक्त था | ये वह दिन थे, जब Balance of Terror को ना मानने वाले गद्दार कहे जा रहे थे | ऐसे मौके पर Pakistan peace coalition  ने 28 मई 2002 को जिंगोइज्म(jingoism) के खिलाफ कराची में एक सेमिनार किया था | मैंने इसमें एक पर्चा पढ़ा था और इसके आखिर में कहा था के पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के दरम्यान अगर न्यूकलियाई जंग छिड़ जाती है अगर जौहरी हथियार इस्तेमाल होते हैं तो इनकी आँच ढाका और काठमांडू तक जायेगी, इनके खंडहर से उठने वाले न्युकलियाई बादल श्रीलंका को भी ढाँप लेंगे और तिब्बत के इन बौद्ध मठों तक इस आग की तपीश महसूस की जायेगी, जहाँ अभी बारूद की बू तक नहीं पहुँची | हिमालय की बर्फ पिघलेगी और चीन के खेत भी झुलस जायेंगे, जो चीनी किसानों ने पहाड़ों में सीढियाँ तराश कर उगाई हैं | ये मसला सिर्फ पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का नहीं है, ये जुनूबी एशिया का मामला है, ये इससे आगे की ज़मीनों और इंसानों की जिंदगी का मामला है |

इस रोज मैंने ये भी कहा था के कैसे भूल सकते हैं, इन शहरों में हम सब का माजी रहता है, हमारा हाल और मुस्तकबिल साँस लेता है, क्या हम यह सोच भी सकते हैं के सिंधु, रावी, गंगा, जमुना, सून और मूसा नदी दलदल बन जाए और ये दलदलें करोड़ों इंसानों की लाशों से भरी पड़ी हों | क्या हम अपने तमाम तहजीबी, तारीखी, सकाफती विरसे को भाप बनकार उड़ते हुए देखने का तसव्वुर भी कर सकते हैं | हमारे बर्रेसगीर में वेदें लिखी गई, रामायण लिखी गई, यहाँ महात्मा बुद्ध और महावीर पैदा हुए, खुसरो, मीर, कबीर, ग़ालिब और नजीर पैदा हुए | मताई, गुलेशा, सचल, सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, पंडित रतन नाथ, सरशार, फिराक गोरखपुरी, फैज़ ने यहाँ शायरी की | यहाँ अजंता एलोरा तराशे गए, यहाँ ताजमहल तामीर हुआ, इसी बररेसगीर के हिस्से में हजारहा साधू-संत,पीर-फ़कीर, औलिया आये | मोईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी, सरफुद्दीन याहिया मनेरी, निजामुद्दीन औलिया और देवा शरीफ दरवाद की दरगाहें – क्या इसलिए हैं के यह धुल बनाकर उड़ा दी जाये |

मैं पाकिस्तानी शहरी होने के साथ ही बररेसगीर की शहरी भी हूँ, मेरे लिए कराची, कलकत्ता और कानपूर में लाहौर, लखनऊ और दिल्ली में ढाके और पेशावर में कोई फर्क नहीं है | ये बररेसगीर के शहर हैं | मैं इन सबमें रहती हूँ और ये सारे शहर मेरे अंदर आबाद हैं और गौरी चले या अग्नि निशाना बररेसगीर के कोई भी बस्ती वीरान बने, हलाकत मेरी होगी | किसी हिंदू, किसी मुसलमान, किसी सिख या किसी ईसाई, किसी औरत, मर्द, बच्चे, बूढ़े, किसी कट्टरपंथी या किसी नास्तिक के रूप में मेरी ही जात हलाक हो रही होगी |

इससे बढ़कर खुशी की बात और क्या हो सकती है कि वह मुश्किल दिन गुजर गए हैं, लेकिन फिर भी हमें जागते रहने की जरुरत है के कोई ग्रुप या आतंकवादी दोनों तरफ के लोगों के इस Perception (धारणा) को नुकसान पहुँचाने की कोशिश न करे | हमारी नस्लों का मुस्तकबिल इनका आने वाला कल अमन से जुदा हुआ हो | अमन की हिफाजत हमें जी-जान से करना चाहिए |

अपनी बात खत्म करने से पहले जी चाहता है के आपको बहुत पहले सुनी हुई एक कहानी सुनाऊं | अमन की बात करते हुए, ये कहानी मैं सुनाती हूँ, कहानी कुछ यूँ है | एक कस्बे में दो बच्चे रहते थे | दोनों दो बरस के हुए, तो एक-दूसरे से लड़ने-झगड़ने लगे | कभी एक दूसरे को घूँसे मार कर भाग जाता तो कभी पहला दूसरे को एक थप्पड़ रसीद कर देता | दोनों बारह बरस के हुए तो एक-दूसरे के खिलाफ डंडों और पत्थरों का इस्तेमाल, कभी एक सर फटता तो कभी दूसरे का हाथ टूटता | बाईस बरस के हुए तो दोनों ने एक-दूसरे पर गोलियाँ बरसाने का काम शुरू कर दिया | बयालीस बरस को पहुँचते-पहुँचते दोनों एक-दूसरे पर बम बरसाने लगे | जब बासठ बरस के हुए तो एक-दूसरे के खिलाफ ज़रासीम हथियार तैयार करने लगे | बयासी बरस की उम्र में दोनों मर गए | मरने के बाद भी उनका एक-दूसरे से नाता न टूटा और इनके बेटों ने इन्हें एक-दूसरे के बराबर में दफन कर दिया | कब्र का कीड़ा अपने लातादाद बेटों-बेटियों, पोतों-पोतियों और नवासा-नवासियों के साथ इन दोनों के लाशों को खा रहा था | तो कब्र के कीड़े का ये खानदान इस बात से आगाह नहीं था के इसने जिन लाशों पर जितने दिन दावत उड़ाई है, वे एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे और वे कीड़े जानते भी कैसे के दोनों की कब्रों की मिटटी एक ही जैसी थी |

जरा थमिये कहानी अभी खत्म नहीं हुई है और बात सन 5000 ए.डी. तक जाती है | 5000 ए.डी. में एक बिज्जू ने जमीन से सर निकाल कर अपने चारों तरफ निगाह की तो देखा कि पेड़ झूमते हैं, कौवा काँव-काँव करता है, कुत्ते भौं-भौं करते हैं, मछलियाँ और घोंघे, चाँद और सितारे,समंदर की लहरें, दरिया की मौजें, जमीन पर रेंगती हुई चींटी और हवा में उड़ती हुई गौरेया सब इसी तरह हैं | बिज्जू ने आदमी को तलाश किया लेकिन वह उसे नहीं मिला | उसने करीब से गुजरते हुए लक्कड़बग्घे से आदमी के बारे में पूछा, तो उसने अफ़सोस से गर्दन हिलाई और कहा आदमी.........??? हाँ ! कभी-कभार कोई आदमी नजर आ जाता है |

मुझे यकीन है कि हमारे खूबसूरत बररेसगीर में ऐसा कभी नहीं होगा लेकिन इसके लिए दोनों तरफ के अमन पसंदों को बहुत चौकन्ना रहने की जरुरत है |
आप लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया आप लोगों ने मुझे सुना |
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10/30/13

हिंदी लोकनाट्य : विविधता में एकता


भारत बहुजातीय, बहुसांस्कृतिक, बहुरंगी देश है | अनेक लोक कलाएँ, लोकनाट्य रूप(ज्ञात और अज्ञात) इसके विभिन्न प्रान्तों में बिखरे पड़े हैं | आश्चर्यजनक रूप से इतनी विविधता के बावजूद भारतीय लोकनाटकों में एक जबरदस्त एका दिखाई देती है | यह एका शिल्प के स्तर पर पूर्वरंग, संगीत की प्रधानता, कथावस्तु अथवा सूत्रधार या विदूषक के रूप में दिखाई देती है | लगभग सभी लोकनाटक किसी-न-किसी रूप में नाट्यशास्त्र के पूर्वरंग की विधि का पालन करते हैं | सूत्रधार, नट-नटी, विदूषक इत्यादि नाट्यशास्त्र से ही इधर आये हैं | यही वह धागे हैं, जिनसे बंधकर एक भौगोलिक स्थितियों में ना होने के बावजूद भारत जैसे विशाल देश में जातीय संस्कृति की एकता दिखायी देती है | इस विशिष्टता की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए, डॉ.वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी अपनी पुस्तक "भारतीय लोकनाट्य" की भूमिका में लिखते हैं – “लोकक़ला रुपों की जातीय संस्कृति से गहरी निकटता रही है | ये कला रूप अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी विशिष्टता के अनुरूप परस्पर भिन्न शैल्पिक निजता रखने के बावजूद अंतर्वस्तु के स्तर पर गहरे एकात्म होते हैं | लोकगीतों, कलाओं और लोकनाट्य रूपों के सन्दर्भ में इसे देखा जा सकता है |”लोकनाटकों के उदय की पृष्ठभूमि के बारे में बलवंत गार्गी का मत है कि “संस्कृत नाटक विद्वानों, श्रेष्ठियों और दरबारियों के लिए था | इसकी भाषा बहुत गूढ़ और अलंकृत होती थी | यह जनसाधारण के जीवन में घुला-मिला रहा है | समय के साथ-साथ यह अपना रूप बदलता और बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार अपने-आपको ढालता रहा है |”2  वैसे संस्कृत नाटकों के बाद मध्यकाल के भक्ति आंदोलन ने लोक नाटकों के विकास में बड़ी भूमिका निभाई ऐसा माना जा सकता है, क्योंकि दक्षिण से लेकर सुदूर पूर्व तक लोकनाटकों के कथानकों का बड़ा आधार जनमानस में प्रचलित धार्मिक आख्यान ही रहे | शिष्ट यानी संस्कृत के सामानांतर चलने वाले इस लोकमंच के नाटकों की अपनी एक सुदीर्घ परंपरा रही है | राम और कृष्ण की कथाएँ इन नाटकों में कथ्य का काम करती रही थी और आज भी गतिमान अवस्था में है |

ऐसा क्यों हुआ होगा कि लोकनाटक इतने अधिक प्रभावी और जनव्याप्ति के माध्यम हो गए | दरअसल, संस्कृत नाटक उन अपार जनसमूहों से अपना जुड़ाव कर सकने में असमर्थ हो गए, जिनको दृष्टिपथ में रखकर इस ‘पंचम वेद’ की रचना हुई थी | उमा आनंद ने अपनी पुस्तक ‘द रोमांस ऑफ थियेटर’ में इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए लिखा है – “क्लासिक माने जाने वाले संस्कृत रंगमंच भरतमुनि के विचारों को पूर्ण करने में असमर्थ हो गए, क्योंकि वह संभ्रांत, उच्चवर्गीय राजाओं और उनके कुलीन शिक्षित ब्राह्मणों का होकर रह गया था | वह आमजन का रंगमंच नहीं था | तो आमजन के यहाँ रंगमंच का एक अलग प्रकार विकसित हुआ, आम जनता का/लोक का रंगमंच | यही लोकनाटक है |”3. उमा आनंद के इन तर्कों से सहमत हुआ जा सकता है | जब मंदिरों और राज्याश्रयों में रंगकला पोषित और खास वर्ग के लिए खेली/तैयार की जाती रही, तब ऐसे में बहुसंख्यक जनता के लिए, उनके मनोरंजन के लिए उन्हीं के द्वारा रंगकला रची गई, जिनमें सूत्र भरतमुनि से लिए गए और कथानक लोक प्रचलित धार्मिक आख्यानों से | “लोकनाट्य सामूहिक आवश्यकताओं एवं प्रेरणाओं से निर्मित होने के कारण लोकवार्ता के कथानकों, लोकविश्वासों तथा अन्य तत्वों को समेटकर चलते हैं, इसलिए प्रभावपूर्ण होते हैं |”4. कालान्तर में कथानकों के विषय भी बहुरंगी हो गए, मसलन रंगमंच के कथावस्तु के लिए जिस तरह की प्रस्तावना प्रख्यात, उत्पाद्य और मिश्रित की गई थी, वह धीरे-धीरे लोकनाटकों का भी विषय बनने लगी |

यद्यपि आज भी अधिकांशतः धार्मिक और सामाजिक आख्यान ही मूल कथा के तौर पर लोकनाटकों में प्रयुक्त होते हैं | हालांकि यह भी ध्यान देने की बात है कि, इनमें कोई निश्चित स्क्रिप्ट नहीं होती, इसलिए लोकमंच के कलाकार अपने भावों को प्रकट करने के लिए और स्पष्ट होता है | वाक् पटुता और इम्प्रोवाईजेशन इन लोकनाटकों की सबसे बड़ी ताकत होती है | इसलिए लोकनाटकों की रंगशैलियों ममें उन्मुक्तता और तनावहीनता प्रमुख रूप से दिखाई देती है |
नाट्यशास्त्र से कुछ जरुरी टूल्स इन नाटकों ने लिए हैं, मसलन विदूषक या सूत्रधार का चरित्र लगभग सभी लोकनाटकों में अलग-अलग नाम से सभी रूपों में मौजूद है | बिदेसिया में ‘लबार’, नौटंकी में ‘रंगा’, माच में ‘शेरमार खां’, भवाई में ‘रंगला या कुटकड़िया’, बिदापत नाच में ‘बिपटा’, आदि कुछ प्रमुख सह-चरित्र हैं, जिनका मुख्य कार्य नायक की मदद करना, कथानक का विकास करना और अपने आंगिक हाव-भाव, रूपसज्जा तथा संवादों से दर्शकों/जनसमूहों का मनोरंजन करना होता है | वह अपने इन्हीं क्रियाव्यापारों से लोगों में एक उत्सुकता का माहौल और आकर्षण बनाये रखता है | किसी लोकनाटक के प्रसिद्ध और सफल होने के पीछे उसके सूत्रधार/विदूषक की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण होती है | इन लोकनाटक के अभिनेताओं का मुख्य कर्म लोकरंजन करना होता है, अभिनय करना मात्र नहीं | गीत और संगीत की योजना भी लगभग सभी लोकनाटकों में समान रूप से पाई जाती है | एक और बड़ी एकता इन नाटकों में यह भी देखने को मिलती है कि इनमें स्त्री चरित्रों की भूमिका भी पुरुष ही निभाते हैं, यद्यपि हाल के कुछ वर्षों में स्त्री अभिनेत्रियों की भी उपस्थिति इन मंचों पर हुई है | इस जड़ता का टूटना एक स्वागतयोग्य कदम है |
बिदेसिया के प्रदर्शन में और इसे एक नयी ऊँचाई देने वाले रंगकर्मी संजय उपाध्याय ने प्यारी सुन्दरी और रखेलिन की भूमिका में स्त्री अभिनेत्रियों को रखा और नाटक का मजा बेस्वाद नहीं हुआ तथा यह लगातार सफलता से खेला जा रहा है | वहीं इसी लोकनाट्य रूप का एक ‘फॉर्म’ पूनम सिंह के प्रदर्शन का है, जिन्होंने तमाम सामाजिक बंधनों के बावजूद इस लोकनाटक के प्रति लोगों को अपनी इस मानसिकता को बदलने पर मजबूर कर दिया है कि लोकनाटक का मंच केवल पुरुष-प्रधान ही हो सकता है | लोकनाट्य परंपरा के इतिहास में रंगकर्मी पूनम सिंह का यह कदम इसलिए भी सराहनीय है , क्योंकि यह लोक कलाकार अपनी बेटियों को साथ लेकार लोक रंगमंच के पुरुष वर्चस्व को चुनौती दे रहीं हैं | इसकी ताकत उन्हें लोकनाटकों की ही परंपरा से मिली है | आखिर लोकनाटकों के मंच ने खुले में उपेक्षित जनसमुदायों के बीच खड़े होकर अपना स्वरुप और पाठ रचा तथा संस्कृत ‘एलीट’ थियेटर को चुनौती डी | साथ ही, अपना एक व्यापक ‘स्पेस’ बनाया | दरअसल, इसकी व्याप्ति का बड़ा कारण रहा कि यह अभिनटन-परक प्रस्तुति और अपने संवादों-गीतों (संगीतात्मकता) पर अधिक जोर देता है, जो जनता के हृदय में सदियों से उसके सुख-दुःख के साथी रहे हैं |

सही मायनों में यह हमारे लोकसंस्कृति का अटूट हिस्सा है | इसलिए लोकनाटकों को भृत्य जातीय संस्कृति का प्रामाणिक दस्तावेज माना जा सकता है, क्योंकि यह अपने स्थानीय तत्वों के सहारे अपना रंग-विधान खड़ा करती है और हमारी जातीय सांस्कृतिक चेतना के बीज इन्हीं ‘लोकल’ (स्थानीय/आमजन के समाजों) जमीनों से अपना रस लेकर हमारी रंग-अस्मिता को समृद्ध करती हुई, वैश्विक मंच पर आती है | “लोक रंगमंच लोक समाज की देह का अंग है, नागरिक या साहित्यिक रंगमंच उसका बाहरी आभूषण, लोक रंगमंच जीवन की उमंग की स्वाभाविक अनायास अभिव्यक्ति है, नागरिक रंगमंच कलात्मक चेष्टायुक्त अभिव्यक्ति |”5. इसलिए भारतीय रंगमंच का इतिहास भी तब तक अधूरा है, जब तक इसे लिखते समय इन लोकनाटकों के इतिहास और भारतीय रंगमंच के विकास में इनकी भूमिका को अनिवार्यतः महत्वपूर्ण नहीं माना जाता | शायद यही वजह है कि सम्प्रेषण के जादुई और नित नए उपकरणों के बीच भी लोक रंगमंच मजबूती से अपनी जमीन पर खड़ा है, उतनी ही प्रसिद्धि से उतनी ही व्याप्ति से | ऐसा होना इसलिए भी लाजिमी है, क्योंकि इन नाटकों का मंच लोक का चित है, न कि कोरी सैद्धांतिक किताबें | सच कहें तो, लोकनाट्य सामूहिक आवश्यकताओं एवं प्रेरणाओं से निर्मित्त होने के कारण लोक के करीब है और हबीब तनवीर (लोकनाट्य रूप नाचा गम्मत शैली के प्रयोक्ता) जैसे रंगकर्मियों ने तो इसे वैश्विक रंगमंच पर खड़ा कर विश्व को भारतीय रंगमंच का एक और नायाब पक्ष दिखाया है |     

बी.वी.कारंथ ने रंगभाषा के केंद्र में जिस अभिनेता के होने की बात की है, दरअसल वह हमारे लोकनाटकों पर अधिक लागू होती है, जहाँ केंद्र में अभिनेता ही प्रमुख होता है, परन्तु प्राथमिक तौर पर अभिनय उनका ध्येय नहीं बल्कि लोकरंजन मुख्य अभीष्ट होता है | यह भी एक सच्चाई है कि कोई लोक कलाकार या अभिनेता अपनी बोली/भाषा के परफार्मेंस में जितना स्वाभाविक होता है, वह उसी कथा के साथ किसी दूसरी बोली/भाषा में निष्प्रभावी हो जाता है | परिणामतः स्वाभाविकता, जो इन नाटकों का प्राण तत्व होती है, वह अभिनेता के निश्तेज होने के साथ ही खत्म हो जाती है | ऐसी स्थिति में संप्रेषणीय रंगभाषा की निर्मित्ति भी संभव नहीं रह जाती | लोक नाटकों में गीत-संगीत-तत्व और नृत्य की प्रधानता होने के कारण यह कलारूप अन्य नाट्यरूपों की ही तरह रंगभाषा का वितान अभिनेता और अन्य मंचीय उपकरणों के सहारे खड़ा करती है | स्वाभाविक रूप से संगीत और गीत लोकनाटकों का मजबूत पक्ष है | यद्यपि निर्देशक़नुमा जीव लोकनाट्य मंच पर अधिक प्रभावी नहीं, यहाँ सारा क्रियाव्यापार अभिनेता के आसरे होता है | वैसे रंगभाषा का कोई लिखित व्याकरणिक रूप तो नहीं होता, पर अभिनेता और पार्श्व में गतिमान स्थितियाँ ही उसका व्याकरण रचती हैं और यह हर बार अलग-अलग अभिनेता तथा प्रस्तुति के अनुसार अलग प्रभाव की हो सकती है | लोकनाटकों की रंगभाषा और प्रभाव का क्षेत्र तथा इसके प्रेरक और उत्पत्ति का स्त्रोत उनका अपार जनसमूह ही है, जो कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर और पूर्वोत्तर तक विस्तृत है, जिनका आश्रय पाकर यह लोक परंपरा आज तक निर्बाध रूप से गतिशील है |
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संदर्भ सूची :
1. भूमिका, भारतीय लोकनाट्य, डॉ.वशिष्ठनारायण त्रिपाठी, पृ.९.
2. रंगमंच, बलवंत गार्गी, पृ.९२.
3. the classical Sanskrit theatre didn’t fulfill Bharat’s idea, because this was a theatre for the elite, the king and his nobels and    the learned Brahmins. It was not a theatre of the common man, though there was a theatre of another sort for the common     people. This is folk theatre.” Uma anand, The Romance of Theatre. Page.36.   
4. देखें, त्रिलोचन पाण्डेय, सम्मेलन पत्रिका, लोकसंस्कृति विशेषांक वि.सं.२०१०.
5. वीणा, अगस्त१९७२, पृ.९५.