2/26/15

सरकार, रंगमंच और साँस्कृतिक नीति (बंसी कौल का मंतव्य)

प्रस्तुत लेख वरिष्ठ रंगकर्मी  बंसी  कौल के  साक्षात्कार का लेख  रूप में प्रस्तुति है. यह साक्षात्कार  राष्ट्रीय नाट्य विद्यायल में  मुन्ना कुमार पाण्डेय औr अमितेश द्वारा वर्ष 2013 में लिया गया था और यह समकालीन रंगमंच के दूसरे अंक में प्रकशित हुआ था.  इस लेख को छापने के लिए  दोनों साक्षात्कारकर्ता  संपादक समकालीन रंगमंच के आभारी हैं. पत्रिका में यह लेख भिन्न शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, यहाँ  हमने अपने हिसाब से शीर्षक तय किया है.- मॉडरेटर 
..........................................................
मुझे नहीं मालूम कि इंडियन गवर्नमेंट की कोई कल्चरर पालिसी है या नहीं, या इस तरह की पालिसी हो इस पर कोई विचार किया गया है कि क्या होना चाहिए? कल्चरर प्रोग्राम जरुर है. बीच बीच में  कुछ इस तरह के लोग आते रहें है जिनको लगता था की कल्चर की रूप रेखा बने, जैसे एक ज़माने में जोनल सेंटर को लेकर उस वक्त एक आईडिया था   कि जितनी भी लोककलाएं है उनका आपस में आदान प्रदान हो.  देश एक दूसरे को अगर जानता था तो संसद की वजह से जनता था क्योंकि जगह जगह से सांसद आते थे और एक दूसरे को जानते थे और जो लिटरेट लोग थे उन्हें अंदाजा था की फलाने राज्य में क्या हो रहा है . लेकिन वह के जो कलाकार थे जैसे मान लीजिये मणिपुर के जो लोक कलाकार थे वे नहीं जानते थे कि कश्मीर में क्या हो रहा है ? कश्मीर में कौन कौन सी कलाएं है ? तो तीन तरह की चीजें होती है समाज में जो देश की जोड़ती है एक तो पोलिटिकली देश जुड़ता है जैसे की पार्लियामेंट ,एक एजुकेशन से जुड़ता है जिससे लिट्रेसी कितनी है तीसरा जुडाव जो होता है जिसे हम इमोशनल जुडाव कहते है वह आर्ट से ही होता है यह उतना ही इम्पोर्टेंट है जितना एजुकेशन है ये उतना ही इम्पोर्टेंट है जितना की पोलिटिकल है.  तो किसी हद तक वह अच्छा था  हर जोन के अन्दर अलग अलग स्टेट्स थी, कही ओवरलैपिंग थी तो बहुत सारे फेस्टिवल्स होते थे, आदान प्रदान होता था एक दूसरे को लोग जानने लगे थे और इसे भी करीब २० एक साल हो गए लेकिन होता क्या है कि जब भी आप कोई प्रोग्राम करते या कोई भी आईडिया लेकर आते है उसके बाद फिर जो बदलाव आता  है क्योंकि समाज हमेशा बदलता रहता है नयी इकोनमी आती रहती है,  नयी चीजे समाज में होती रहती है तो उसका बदलाव भी उसी तरह जरुरी है.  होता क्या है सरकार कभी कभी इंटेंशनली चीजे अच्छी तो करती है लेकिन वो वैसे ही फिर पुराने ढर्रे पर चलती रहती  है जाहिर है की समाज बदला है और उनके करने के तौर तरीके नहीं बदले है तो फिर  वह बहुत सतही लगने लगता है. जैसे मान लीजिये इंडस्ट्री में, कि आज मार्किट बदल रहा है तो नयी स्ट्रेटजी अपनाती है नए प्रोडक्ट तैयार करते हैं.  उनका मूलतः काम होता है कि उन्हें धंधा करना है, उन्हें पैसा कमाना है तो वो रोज स्ट्रेटजी बदलती है जो कि आर्ट्स में भी होना चाहिए जो किन्ही कारणों से नहीं हो पा रहा है. चाहे वो ट्रेनिंग इंस्टिट्यूटस हो चाहे वो  कल्चरर संस्थाए हो.
 एक ज़माने में पंडित नेहरु जब प्रधानमंत्री थे  तो शायद उन्हें लगा था की एकादमी होनी चाहिए जो आर्ट्स को संरक्षण दे सके फिर ये तीन अकादमी बनी, फिर स्टेट गवर्नमेंट्स ने अपने अपने एकादमी बनाये तो कुछ दिन तक तो वे ठीक ठाक चला ,चाहे वो ओर्गानायिजेशन थे, अवार्ड्स थे, फेस्टिवल्स थे तो कुछ दिनों तक तो वो चला फिर बाद में वो एक जगह आकर रुक गया.  लगातार चीजो का दुबारा से मुआयना होना चाहिए जरुरत क्या है कि हर समय  उस पर ध्यान देना चाहिए.  मान लीजिये जोनल सेंटरों में ये  आदान प्रदान हो गया और यंग लोग जितने भी यंग परफोरमर्स है इंटरनेट पर एक दूसरे से बात करते है अब एस०एम०एस० वाली जेनरेशन है पूरी तरह से लेकिन अब क्या जरुरत है उसकी आदान प्रदान की इस पर बात करनी चाहिए.  क्युंकि पहले जितनी भी ये आर्ट्स थी ये प्रदर्शनकारी कलाएं  थी ये एक वे लाइफ का हिस्सा थी मन लीजिये होली थी तो होली में जो नाच होता था वो प्रदर्शनकारी कला नहीं थी. वो एक हम अपने लिए करते थे, अगर हम गाँव में 10 लोग नाच रहे है तो देखने वाले कम होते थे करने वाले ज्यादा होते थे इसीलिए क्योंकि वो जीवन प्रक्रिया का हिस्सा था लेकिन अब वह ख़तम हो गया है करने वाले अलग हो गए है देखने वाले अलग हो गए है. जब देखने वाले अलग हो जाते है और करने वाले अलग हो जाते है तो जाहिर है रूल्स बदलते है. जब आप प्रदर्शनकारी कला बनते है तब उसकी ट्रेनिंग की जरुरत है, तब उसमे प्रजेंटेशन की जरुरत है, तब उसमे टेक्नोलोजी आएगी कि उसका कैसे इस्तेमाल करे. वो नहीं हुआ तो ये जो विरोधाभास रहता है हमारे पूरे सोच में जिस वजह से हम न इधर के रहते है न उधर के वही हुआ है. जैसे २६ जनवरी में,   एक समय में आदिवासी इस देश का कभी भी दिल्ली आता था तो वो २६ जनवरी में ही आता था उसको वही एक मौका मिलता था दिल्ली देखने का, और तब वह आदिवासी इसलिए नहीं आता था की उनको परफोर्म करना है.  उनका रहन सहन  उनके फॉर्म्स है जो झांकियों के माध्यम से दिखाया जाता था.  उन्होंने आना बंद कर दिया या वे परफोरमर नहीं बन पाए, वो ख़त्म हुए या नए अर्बन लोगो ने उसे टेक ओवर कर लिया.
दूसरा ये भी देखना है की जब से ये लिट्रेसी मिशन ऑफ़ इण्डिया शुरू हुआ और जाहिर है लिट्रेसी रेट बढ़ा पुरे देश में तो उसे भी कल्चर से जोड़ना जरुरी है . जब आदमी पढ़ लिख गया तो जाहिर है उसकी जरूरते, सोच विचार भी बदल गया जो जाहिर है आर्ट्स भी बदलने चाहिए.   हमने ये तो कर दिया 60% लिट्रेसी रेट कर दिया है लेकिन वो तो 60-70% तक का है लेकिन 2013 में एक और ऐसे जमात पैदा हुयी है जो स्कूल छोड़ रही है स्कूल जा नहीं रही है बीच बीच में इस तरह से ये लगातार होनी चाहिए आप ये नहीं कह सकते की आपने एक बार शुरू कर दिया तो आपको उस तरफ देखने की जरुरत नहीं है आपको हर बार ही वापस लौट कर जाना होगा वापस उसकी प्रोसेस में जाना पड़ेगा समय की जरूरतों के हिसाब से अगर आप नहीं करते पाते तब एक टाइम पर जाकर ये सब ठप हो जाते है और उनका कोई स्वरुप नहीं रहता ,ये प्रोब्लम हमारे यहाँ बहुत हुयी है इस देश में.   
 अकादमियों का सिर्फ़ ये हो गया है कि साल में 5 फेस्टिवल्स करने है वो 5 करते है . आपको 10 फेस्टिवल्स करने है वो 10 फेस्टिवल्स भी करते है. लेकिन हम उस तरह से नहीं देख रहे ही जैसे एक ज़माने में पूरे भारत में हजारो मेंले लगते उसमें कल्चर भी थे वो कल्चर ही है न हम सिर्फ कल्चर को आर्ट्स की नजर से न देखे ओवरआल जो संस्कृति होती है लाइफस्टाइल होती है उसे देखेंपशु मेले तो हमारे बदल गए हैं क्युकी पशु मेले वालो को ये समझ आ गया है की पशु मेले में पशु बेचने का और क्या तरीका हो सकता है ? लेकिन हमारी अर्बन जो सोच थी आर्ट्स को लेकर वो नहीं बदली है वो वही की वही है जाहिर है आपको ठहराव लगता है लगता है सबकुछ रुक गया है और सब कुछ रुक इसलिए गया है क्युकी आप उसे कंपटीट नयी इकोनमी से कर रहे है नयी इकोनमी अपने तरह का आर्ट पैदा कर रही है उस इकोनमी को जरुरत है उस तरह का आर्ट उसको अपना प्रोडक्ट बेचना है हम जैसे लोग जो भी अच्छा बुरा करते है तो मुझे समझ नहीं आ रहा है आज के दिन मुझे खुद को समझ में नहीं आ रहा है की मेरी जरुरत क्या है ? मेरी जरुरत वाकई में है भी की नहीं है मुझे नहीं लगता की मेरी जरुरत है.   आप जैसे चंद दोस्त आये मैंने कोई प्ले कर दिया, मैंने कोई रोल कर दिया और बाहर जाकर आपने वाह-वाह भी कर दिया या कह दिया बहुत फूहड़ है घटिया है, तो ये कुछ चंद लोगों तक सिमट के रह गया है तो जाहिर है आप उसे कल्चरर पालिसी कहे या कल्चरर प्रोग्राम कहे और ओवरआल कल्चरर पालिसी मुझे नहीं लगता की हमारे देश में कही है और मुझे लगता है की होनी भी नहीं चाहिए. जितना कल्चरर पालिसी बनाते है सरकारों में कि हम ये ये करेंगे तो वो कल्चरर प्रोग्रामिंग होगी, वो कल्चरर कैलेण्डर होगा, कैलेण्डर कल्चरर पालिसी नहीं होता है.
 अगर आप कल्चरर पालिसी बनायेंगे तब भी सांस्कृतिक शुन्यता रहेगी. ज्यादा से ज्यादा प्रोग्राम बढ़ेंगे ,आप ये कह देंगे की साहब थियेटर के 10 के बदले 20 फेस्टिवल हो लेकिन अगर उसके पीछे कोई विचार नहीं होगा जो कि आप देख रहे होंगे जैसे आप टेलीविज़न पर दूसरी चीजे हो रही है जैसे वो शोज होते हैं बच्चों के.  वो नयी इकोनमी मार्किट में अपने लिए पैदा की है क्योंकि उनको लगता है उनको जरुरत है.  उनको अपना प्रोडक्ट बेचना है उस प्रोडक्ट को बेचने के लिए वो अपनी कला उत्पन्न करते हैं.  ये जो नयी इकोनमी आर्ट्स फॉर्म पैदा कर रही है उसके पैरलर दुसरे तरह के आर्ट्स फॉर्म, मैं नहीं कह रहा हूँ की वो बहुत एबस्ट्रेक्ट हो बहुत ही ना समझने वाली हो, पैदा होनी चाहिये.  
 हम उस सदी में रह रहे है जहां पर एक दूसरे तक पहुंचना बहुत आसान है चाहे वो एसएमएस हो, इंटरनेट हो, टेक्नोलोजी हो  लेकिन सबसे ज्यादा अभाव इसी सदी में है.टेक्नोलोजी ने एक दूसरे को इतना नजदीक कर दिया है लेकिन इसी टेक्नोलोजी ने आपको दूर भी कर दिया है. २१वीं सदी में रहकर अगर सबसे कटा हुआ इन्सान अगर कहीं है तो वो इस सदी में है पहले ऐसा शायद नहीं होता था कि अगर कबीर का गीत किसी जगह होता था तो पता नहीं कैसे दूसरी जगह पहुच जाता था. तब तो ऐसा कुछ नहीं था ना टेलीविजन था, ना कुछ था. यात्राओं के जरिये पहूंचता था.  लेकिन आज  सबकुछ होते हुए जो ये विडम्बना है क्यों नहीं पहुच रही सबके पास ?
 पहले हिंदुस्तान टाइम्स है या नवभारत टाइम्स है. पहले अगर एक जगह प्ले होता था या कुछ भी होता था तो ये खबर सब जगह पहुंच जाती थी, देर से ही सही. क्योंकि इनका एक पेज होता था जो राष्ट्रीय होता था अब चुंकि मालिकों ने कहा कि नहीं साहब मुझे तो अब एडिशन चाहिए. अगर आप हरियाणा में जायेंगे तो 12 एडिशन होंगे किसी अख़बार के तो वो उसी मोहल्ले तक सीमित है. अगर वह उस मोहल्ले तक सीमित है तो जाहिर है उस मोहल्ले वाले ही जानेगे की मैंने क्या किया या उस मोहल्ले के लोगो ने क्या किया लेकिन उस दुसरे मोहल्ले के लोग उस खबर को नहीं जानेगे.  मुझे लगता है की ये भी एक मार्किट स्ट्रेटजी है क्योंकि उनको ऐड्स कलेक्ट करने है.  आपकी पहुंच पूरे भारत में नहीं है उस मोहल्ले तक है. ये हमें भी मालूम है करने वाले को भी और लिखने वाले को थोडा छेड़ दो वो भी रोना रोयेगा यार मैं तो मालिकों के लिए काम कर रहा हूँ , मालिक उसे कहता है न की भाई तुमको इतनी तनख्वाह मिलेगी जिस दिन जगह होगी तभी लिखोगे, जिस दिन बहुत अच्छा आर्टिकल भी लिखा होगा तो बिज़नस मैनेजर आएगा कहेगा भाई साहब छोडिये ये सब काट दो,इतनी जगह बची है उसमे छाप दूंगा मैं आपको .
संगीत नाटक अकादमी में हर बार क्या होता रहा, जब भी  सेक्रेटरी बदले तो प्राथमिकता बदल गई ..इसीलिए ये भी एक सवाल पैदा होने लगा है आजकल और इसको ब्यूरोक्रेसी बहुत उससे कह रही है की क्या कलाकार कोई एडमिनिस्ट्रेटर हो सकता है कि नहीं? हम कहते है हो सकते हैं. लेकिन उनके पास फिर एक जबाब है की साहब जहां जहां कला का एडमिनिस्ट्रेटर हुआ वह वो उतना ही पतनशील हुआ.   किसी जगह एक डांसर सेक्रेट्री हुआ तो जाहिर है उन्होंने  कहा कि   डांस के आस पास ही सारा काम हो, अगर थोडा बजट दूसरी कलाओं का भी है तो वो दे दो. इसीलिए आपने ब्यूरोक्रेसी का पॉइंट जो है प्रूव कर दिया यही जोनल सेंटर्स में हुआ है आपको हैरानी होगी एक  जब जोनल सेंटर खुल रहे थे तब ये बात हुयी थी तब वो प्रियाम्बल में भी लिख था की शुरू में इसको कुछ वर्षों तक इसको हैंडल ब्यूरोक्रेट्स करे और आने वाले वर्षों में इसका हेड आर्टिस्ट ही करे लेकिन वैसा हुआ नहीं पड़ा रहता है २० साल तक. आईएएस या नॉन आईएएस या दूसरी सर्विसेस के लोग उसको हेड करते रहे जबकि एक आईएएस किसी डिपार्टमेंट में 70हजार करोर का बजट होता है लेकिन यहाँ तो सिर्फ 2 करोड़ के लिए आना चाहता है 70 हजार में नहीं जाना चाहता क्युकी 70हजार में वो तय हुआ होता है की ये तुम्हारा एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट का 70हजार करोर है इसमें 10 हजार करोड़ उस डिपार्टमेंट में जायेगा उसमे कुछ चेक साइन होता है लेकिन यहाँ 2 करोर में फ्रीडम है आप चाहे जहा उसको खर्च करे आपको फाइनेंस के पास नहीं जाना की साहब यहाँ से वहा टेक्सी ले रहा हूं. इसीलिए कभी 4 हजार करोड़ की बड़ी फ्रीडम है बजाय 7 हजार करोड़ की जहा आप दस्तखतकार है जहा आप सिर्फ सिग्नेचर करते है. कभी कभी वही ब्यूरोक्रेट्स कहता है कि मैं तो 6 हजार करोड़ का डिपार्टमेंट सँभालता हूँ  तो हम कहते है की वह तो आप सिर्फ साइन करते थे क्युकी सिर्फ चेक जाना है आपके पास आया 500 करोड़ इस डिपार्टमेंट को 500 करोड़ उस डिपार्टमेंट को. यहाँ तो .. ये ऐसी फ्रीडम है   जैसे ,मान लीजिये मुझे इवेंट करना है वह मुझे सीओ बताता है आपको कैसे करना है यहाँ से यहाँ जायेंगे उसको बजट दिखाना है लेकिन वह तो बजट हटा है कभी कभी 2-2 करोड़ वो मई उतना एन्जॉय नहीं करता जितना मैं अपना करता हूं जिसका बजट होता है 30000/- वहा जो फ्रीडम है अपना थियेटर करने में वो मुझे वहां नहीं मिलती है.  
थियेटर के सारे काम एनएसडी का  नहीं था. ये फेस्टिवल करना उनका काम था  अकादमिक इंस्टीटयूट है अकादमिक काम करें. लेकिन एक ज़माने में बजाज साहब को लगा वो जानते थे हम एनएसडी में नेशनल फेस्टिवल करते है तो उनको बजट उठाकर दे दिया हकीकत में वह बजट जाना चाहिए था संगीत नाटक अकादमी कोलेकिन उन्होंने भी कहा ठीक है पिंड छुटा, अब जब वहा पिंड छुटा तो थियेटर का मामला धरातल में चला गया, मिनिस्ट्रीज को भी लगा कि थियेटर का कारोबार जो भी थियेटर का जो भी  उत्थान या जो भी होना है वो यही हो जायेगा.  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थान  में  जिस जिस तरह के लोग आयंगे जिस जिस जगह से उनका अपना विजन होगा आप उससे सहमत हो सकते है  असहमत भी हो सकते है.  जाहिर है की कोई व्यक्ति विशेष आया उसे लगा कि ऐसा थिएटर होना चाहिए तो वैसा ही होगा. और मुझे नहीं लगता की उनका इंटरेस्ट इतना है कि इसका पुरे हिंदी प्रदेश पर क्या  असर हुआ है  यह देखें
राज्यों का मामला ये है कि मध्य प्रदेश में एक ज़माने में अर्जुन सिंह थे, मतलब देखिये अंत में कोई भी राजनेता अगर कुछ करना चाहता है तो उसमें पहले वह अपना फायदा भी देखता है. ऐसा नहीं है कि उसका आर्ट के प्रति प्रेम होता है,  हो सकता है मिसेज गाँधी को खुश करने के लिए भारत भवन खोला. क्योंकिकि नेहरु परिवार में एक वीकनेस थी इन संस्थानों  कि और जाहिर है उससे दूसरी तरह की साख उनकी बनी और कुछ अच्छा काम हुआ और वह अफसर भी ऐसा आया उसने भी साख कायम की और फिर वह फेस्टिवल्स चलते रहते हैदूसरी सरकार आई वह बीजेपी की तो लगा कि हमें भी कुछ करना चाहिए और कुछ होता है.  वहां के बाबू हावी होने लगे. मध्य प्रदेश में भी है ये प्रोब्लम कि वह बाबू तय करता है की क्या करना है, कौन गन्दा है और कौन अच्छा ग्रुप है.  अब जैसे  मध्य प्रदेश में क्या हुआ था कि जो उस वक्त भोपाल में कहते है की छर्रे अशोक वाजपेई जी के छर्रे थे वो इस वक्त पावरफुल हो गए है लेकिन उनकी अक्ल जो है नहीं बढ़ी है रहे वो छर्रे के छर्रे वो आपको कुछ होने नहीं दे रहे हैकरेंगे तो  हमहीं करेंगे. मध्य प्रदेश में तो ये स्थिति हो गयी है अब अगर लोकल जो स्वयंसेवी संस्थाए है अगर वो कुछ करती है तो अगर कुछ बड़ा करती है तो इससे छर्रों को बड़ी तकलीफ होती है की अरे ये इनका काम नहीं था ये तो हमारा काम था, वह भी एक कम्पटीशन चलता है.   
 दुसरे प्रदेशों में अगर आप बजट निकाले तो आप पाएंगे की दुसरे प्रदेशों में बजट अच्छे खासे हैं. लेकिन उनको इस तरह  के कुछ अधिकारी मिले नहीं,  अकादमी नहीं नहीं बनीयु.पी. का तो आपको मालूम ही है यु.पी.  में भारतेंदु नाट्य अकादमी खुला उसको भी रोज ही बंद करने पर तुले रहते है. संगीत नाटक अकादमी थी.  एक ज़माने में नागर जी(अमृतलाल नागर) वगैरह चेयरमेन हुआ करते थे उन दिनों बहुत काम हुआ.   एक ज़माने में सबसे अच्छा काम यु.पी.  में ही हुआ . चाहे वो कानपुर था लखनऊ था इलाहबाद था देहरादून था, रामपुर , बहराइच, गोंडा,हम इस इस जगहों पर जाते थे. उस वक्त जितने भी थियेटर में सक्रिय लोग थे हम आधे समय यु.पी.  में ही मिलते थे.   और संस्थाए भी बहुत सक्रिय थी दर्पण ने तो कितनी ब्रांचेज खोल रखी थी. रामपुर जैसे जगह पर उर्दू के लेखाक इक़बाल मजिग  वहां खूब थियेटर करते थेजैसे श्रीलाल शुक्ल जी वो थोड़े लेखक थे तो उसे सपोर्ट करते थे वो लखनऊ में एक जमाना था जब नागर जी , यशपाल जी और ये सब लोग शाम को रिहर्सल में आते थे अब नागर जी अगर रिहर्सल में आकर बैठेंगे तो थोडा असर तो पड़ता ही है न अरे यार नागर जी हमारे रिहल्सल में बैठे हैं वो अब नहीं हो रहा है.   
 अब ये हो गया है कि मध्य प्रदेश मे अगर खजुराहो महोत्सव करता है तो हमें भी करना चाहिए. हम आगरा फेस्टिवल करेंगे,  उड़ीसा जो कोणार्क फेस्टिवल कर रहा है,  इस तरह के महोत्सव शुरू होने लगे और थियेटर इसमें पिछड गया. दूसरा ये भी हुआ हिंदी बेल्ट का दुर्भाग्य भी है हिंदी बेल्ट के जितने यंग लोग निकले जो एनएसडी में आये मेरे ख्याल में अगर हम पूरी लिस्ट निकाले ड्रामा स्कूल के मुशिकल से एक्का दुक्का आयेंगे अब काम करने के लिए चुकी जब वो एनएसडी आता था उसको लगता था की अब मेरी रोजी रोटी अब यही है अब रोजी रोटी के जूझना बहुत जरुरी है वो उसको मिलता नहीं जो किसी भी यंग आदमी के साथ हो सकता है तो वो फिर यही घूमता था दिल्ली में देखिये हमलोग अपवाद है जो दिल्ली में रहके दिल्ली छोड़कर वापस गए हमारी तो मदर टंग भी नहीं थी हिंदी. हमारे लिए तो कर्म थी बढ़ गए हिंदी तो इसलिए हम वापस हम हिंदी इलाकों में चले गए लेकिन हम फिर लौटते है फिर वापस जाते है फिर लौटते है लेकिन हिंदी बेल्ट का कोई अपना वापस नहीं गया और जिस वजह से अगर कभी कोई वापस गए भी तब वापस लौटे जब वह सब कुछ बदल चुका है तो ये प्रोब्लम हिंदी बेल्ट में रही है कि अगर उस वक्त उनको स्टूडेंट्स को सपोर्ट मिलती तो वापस वह कुछ कर लेते.  एक लोकल पोलिटिक्स भी है कि एनएसडी वालों को नहीं लेना तो वही से स्टूडेंट्स निकले थे वही उसको हेड करेंगे.  हिंदी बेल्ट में अपनी जो पूरे देश भर की जो मेजर इकोनमी है हिंदी फिल्म  वो बनती कहां है बम्बई में. तो जाहिर है हिंदी का लड़का या लड़की कहा जायेगा. बम्बई ही जायेगा. अगर हिंदी फिल्म हिंदी बेल्ट में बन रही हो तो शायद थियेटर की भी स्थिति कुछ अलग होती   सीरियल्स बन रहे होते जहा से उसको थोडा बहुत जरिये मंच और तब वो हो नहीं पाया किन्ही कारणों से क्युकी मराठी में मराठी आदमी थियेटर भी करता है मराठी फिल्म में भी जाता है कन्नड़ या मलयालम या बांग्ला या तमिल या जितनी भी भाषाए है लेकिन आज भी टेलीविजन के जो सबसे ज्यादा टीवी सीरियल हिंदी में बनते है लेकिन बनते कहा है बम्बई में.
संस्कृति को आप पूरी इकोनोमिकली संस्कृति का हिस्सा नहीं बनाते है  तोउसका क्या  फायदा मिलेगा?   हमलोगों ने उस इकोनमी का हिस्सा नहीं बनाया. जाहिर है की फसल कटी और फसल काटने के बाद नाच करने लगे, वो संस्कृति थी तो वो नहीं हो पाया. एक ज़माने   जितनी भी थियेटर कम्पनियाँ थी, हिंदी बेल्ट में सबसे ज्यादा पारसी कम्पनियाँ ही थी, वो मेलों में जाती थी और मेलो में रात भर में परफोर्म करती थी और वो कम्पनियाँ चल जाती थी. लेकिन वो इसलिए था की उस वक्त मेलों में जो गाँव वाला जाता था रात को आने की बस नहीं होती थी वो रात बिताने के लिए टेंट में नाटक भी देखने जाता था और वह रात में नाटक देखता था और सुबह  जो बस होती थी या बैलगाड़ी जो भी उससे वो वापस आ जाता था लेकिन इस बिच मेलों में बस जाने लगी है अब वह रात को वापस आता है तो जाहिर है अब वो थियेटर कंपनिया बंद हो गयी..  अगर संस्कृति को इकोनोमी से नहीं जोड़ेंगे तो  कल्चरर पालिसी नहीं बन पायेगी वो एक कल्चरर प्रोग्राम ही बन जायेगा
  संस्थान जो शब्द जो है वो इस देश में इमरजेंसी के बाद ख़त्म हो गया हैपॉलिटिक्स भी एक संस्थान होता है हम इंस्टुयशन फार बिल्डिंग स्कूल या आर्ट ऑफ़ इंस्टुयशन जिसको बोलते है, कबीर का मोवमेंट एक इंस्टुयशन यही कहते थे न! इंस्टुयशन जब बिल्डिंग में बदला, आपने बिल्डिंग को  खड़ा कर दिया इंस्टुयशन को ख़त्म कर दिया.  ये इमरजेंसी के बाद हुआ इस देश में मिसेज गाँधी एज अ पॉलिटिक्स,  इंस्टुयशन को ख़त्म किया और ये शायद अख़बारों में भी हुआ था. इंस्टुयशन जब ख़त्म हुए फिर दुबारा बने नहीं.  होना ये चाहिए जो आप कह रहे है की आईडिया ऑफ़ इंस्टुयशन जब नहीं बनेगा तब तक कल्चर पालिसी भी नही होगी.  इंस्टुयशन होगा तभी  सामूहिकता भी होगी. क्योंकि समूह टिका ही है इंस्टुयशन में. इंस्टुयशन में सामूहिकता का उल्लास  होता है. होली का होना ही अपने आप में इंस्टुयशन होता है, दिवाली का होना ही अपने आप में इंस्टुयशन होता है लेकिन अब वो नहीं है.    
  विचार का आभाव  इसी का हिस्सा है . जब ग्रांट्स बटने लगी ये सरकार ने तय किया की भईया इतना पैसा इन लोगो को बाटना है. हांलाकि मैं भी इसका हिस्सा हूं. मैं इससे बच नहीं सकता...लेकिन ये क्या हो गया है कल्चरर डिपार्टमेंट की ग्रांटस है वो एक तरह से नरेगा हो गया है.  अब उसमें हो क्या गया है की परसों कोई बता रहा था अब नरेगा का जो पैसा आता है पंचायत में तो जाहिर है उस में 50 मजदुर लगायेंगे 50 मजदुर जब तक सड़क खोदेगा उसमें लगते है 2 महीने पंचायत का प्रमुख jcb मंगवाता है jcb से सड़क 3 दिन में खुदवाता है और अगर jcb ने लिए 8000 रुपये जो भी घंटे का तो उसका हुआ कुल 16हजार रुप्पाए फिर वो हिसाब लगता है की 100 मजदूरो का कितना हिसाब हुआ उनके उतने पैसे काटकर वो वैसे मजदूरी दे देता है की तुम दो महीने लगाते मुझे jcb से दो दिन में कम हो गया लेकिन तुम भी अपने पैसे लो लो .ही हो रहा है क्युकी बट रहा है.  विचार जहा एक संगठन पैदा कर सके लोगो को जो आप करने वाले है देखने वाले को छोडिये.   मेजर प्रोब्लम हो रहा है की हम लोगो को संगठित नहीं कर पा रहे है . उस तरह का विचार नहीं है. ज  ह थिएटर उसमें शायद थोडा विचार है थोडा बहुत लेकिन अभी जिसको कहते है की आप जब हम कह रहे की साहब 60 % ग्रोथ है इस देश में यही कह रहे है न 60 % का नारा चल पड़ा है हो सकता है सच भी होगा लेकिन उसके बाद भी आपके पास थिएटर करने वाला लोग नहीं है मतलब आप रोज जूझते है मैं अपनी बात कर सकता हूँ की आज से 10 साल पहले मेरे पास 50-60 लोग जुड़ने को तैयार थे अब मेरी ये स्थिति है की दिन को 15 फोन आये की 2-3 लड़के बिहार भेजो हमारे साथ तो कहा जा रहे हो वह जा रहे हो मैंने कहा क्यों तो कहे दो साल हो गए न अब हर एक के लिए पड़ाव हो गयी है ये जगह तो एक तरह से पड़ाव की हो गयी है वो खनका भी नहीं है जहा आदमी एक दो रात सो सके तो पड़ाव की तरह हो गयी है या तो पुरे यूथ को दिशाहीन वाला मामला है चारो तरफ तो जब आपको  थियेटर में अब   संगठन चाहिये . भाई पेंटिंग तो कर नहीं रहा हूँ जहा मैं अकेला हूँ कविता तो लिख नहीं रहा हूँ मैं अकेला हूँ ... लोगों को लामबंद करने का काम लेफ्ट करता था इस देश में ..कुछ तो करता ही था न वो एक तरह से जो विचार जो संगठन का विचार जो जोड़ने का काम करता था तो हमारा काम होता था थियेटर का विचार जोड़ना अभी भी दोने काम मेरे सिरे पड़े है तो मुझ्समे उतनी कैपेसिटी नहीं है वो करने की ..अब देखए अब ज्यादा आसन होना चाहिए यंग लोग इतने है पुरे हिंदुस्तान में उनको क्यों नही ये खड़े कर प् रहे है अक्सर मेरा ये सवाल है .राजनीतिक विचार इतने कम है यंग लोगों में वो किसी मुवमेंट में जाते हैं और फ़िर निकल जाते हैं. लेकिन एक प्रकार का पोटेंशियल भी हाल में देखने को मिला है लेकिन लेफ़्ट उसको कैश ही नहीं कर पा रहा है. इन मुवमेंट्स को लेफ़्ट ही सब्से ज्यादा अटैक कर रहा था.  मैं  फिर भी निराश नहीं हूँ ..क्योकि अंत में थियेटर ही एक है देखिये अगर अंत संसार नष्ट  हो जायेगा  आखिर परिवार जो होगा वो थियेटर का ही होगा क्युक्की 4 लोग अगर आपस में बैठे या एक दुसरे को गाली दे तो ये आखिरी परिवार बचेगा इसीलिए मैं बहुत घबराने वाला नहीं हूँ कि  सब खत्म क्यों क्या कैसे हो गया.

लोकधर्मी नाट्य-परंपरा और भिखारी ठाकुर : स्वाति सोनल

स्वाति सोनल दिल्ली विश्वविद्यालय की शोधार्थी और विश्वविद्यालय शिक्षण सहयोगी  हैं. फिलहाल लोकनाटकों पर पीएच.डी. शोधरत हैं. जन्नत टाकिज के लिए भिखारी ठाकुर पर लिखा इनका शोध -पत्र  साभार आप सभी के लिए प्रस्तुत है-मॉडरेटर.
-----------------------------------

चित्र साभार: http://www.exoticindia.com/books/nzc616.jpg

भारतीय लोकधर्मी नाट्य-परंपरा की प्राचीनता, विविधता, शक्ति व समृद्धि निर्विवाद है। आदिनाट्याचार्य भरतमुनि द्वारा रचित ‘नाट्यशास्त्र’ में भी ‘लोक’ के बुनियादी महत्त्व को रेखांकित किया गया है। अवश्य ही भरत के समक्ष नाट्य-प्रयोग की एक सुदृढ़ परंपरा रही होगी जो कि ‘लोक-परंपरा’ के रूप में उपस्थित होगी। नाट्यशास्त्रमें भरत ने इसी उपस्थित परंपरा को एक सुसंबद्ध व सर्वमान्य रूप प्रदान करने की चेष्टा की होगी। तभी उन्होंने ‘नाट्यशास्त्र’ में स्थान-स्थान पर ‘लोक’ के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में उसके समाधान हेतु ‘लोक’ की ओर दृष्टि का निर्देश किया है –
“लोको वेदस्तथाध्यात्मं प्रमाणं त्रिविधिं स्मृतम् I
वेदाध्यात्मपदार्थेषु प्रायो नाट्यं प्रतिष्ठितम्   II 23 II
वेदाध्यात्मोपपन्नं तु शब्दच्छन्दस्समन्वितम् I
लोकसिद्धं भवेत् सिद्धं नाट्यं लोकात्मकं तथा II 24 II
न च शक्यं हि लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च I
शास्त्रेण निर्णयं कर्तुं भावचेष्टाविधिं प्रति    II 25 II
नानाशिला: प्रकृतय: शीले नाट्यं प्रतिष्ठितम् I
तस्माल्लोकप्रमाणं हि विज्ञेयं नाट्ययोक्तृभि: II 26 II
अर्थात् नाट्य में तीन प्रमाण माने गए हैं – लोक, वेद तथा अध्यात्म। नाट्य प्राय: वेद और अध्यात्म में प्रतिष्ठित है (23)। वेद तथा अध्यात्म से युक्त तथा शब्द और छंद से समन्वित नाट्य लोकसिद्ध तथा लोकात्म होता है (24)। इस स्थावर-जंगम (जड़-चेतन) लोक की भाव और चेष्टाओं का निर्णय शास्त्र से संभव नहीं (25)। लोक में विभिन्न प्रकार के स्वभाव वाले लोग होते हैं और स्वभाव में ही नाट्य प्रतिष्ठित है। इसलिए नाट्य-प्रयोक्ता को लोक प्रमाण को स्वीकार करना चाहिए (26)।” [1]
लोक में प्रचलित नाट्य-परंपरा की दीर्घकालीनता पर प्रकाश डालते हुए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, “इसके (‘नाट्यशास्त्र’ के) पूर्व अनेक नाट्यग्रन्थ और नाटक लिखे गए होंगे और नृत्य, संगीत आदि सुकुमार विनोदों की बहुत पुरानी परंपरा रही होगी; क्योंकि ‘नाट्यशास्त्र’ में सैकड़ों ऐसी नाट्यरुढियाँ बताई गई हैं जो बिना दीर्घकाल के परंपरा के बन ही नहीं सकतीं।”[2]
 डॉ. शिवकुमार मधुरने भी इसी लोक-परंपरा की महत्ता और प्राचीनता का उल्लेख करते हुए लिखा है- “भरत का नाट्यशास्त्र कोई आकस्मिक उपज नहीं है, वरन् पूर्व परंपरा को लेकर की गई एक सुनिश्चित योजना है। क्योंकि इतना तो स्पष्ट है कि भरत के नाट्यशास्त्र का आधार लोकनाट्य ही रहे होंगे।”[3] निश्चित ही भरत ने अपने समय में उपस्थित लोकधर्मी नाट्य-परंपरा का अध्ययन व चिंतन-मनन कर, इस प्रचलित कला-रूप को ‘नाट्यशास्त्र’ में शास्त्रीय रूप देने का प्रावधान किया है। ‘नाट्यशास्त्र’ में उन्होंने न केवल ‘लोकधर्मी’ व ‘नाट्यधर्मी’ परम्पराओं का उल्लेख-मात्र किया है, अपितु ‘लोकधर्मी’ नाट्य-परंपरा का ‘नाट्यधर्मी’ रूढ़ियों के विकास में अमूल्य योगदान को भी स्वीकारा है। भरत द्वारा परिभाषित ‘लोकधर्मी’ अभिनय की वह शैली है जो स्वाभाविकता पर बल देती है। लोक अपने दैनंदिन जीवन में जैसा आचरण करते हैं जब वैसा ही मंच पर भी अभिनीत किया जाये तो वह ‘लोकधर्मी’ अभिनय शैली के अंतर्गत आएगा। ‘लोकधर्मी’ नाट्य-प्रयोग ताम-झाम रहित, शुद्ध-स्वाभाविक अभिनय पर आश्रित है। लोकवार्ता व लोकक्रिया इसके मूल आधार है न कि दृश्य-सज्जा, अलंकृतता व अन्य ताम-झाम।
जब अभिनय-प्रदर्शन लोक या जन-साधारण की परंपरा के अनुसार हो तो वह ‘लोकधर्मी’ कहलाता है। यह तथ्यात्मक अपरिष्कृत या ग्राम्य विधि है जिसमें कि कृत्रिमता का परिहार व पूर्णतया सादगी पर बल रहता है। इसमें अतिरंजकता का समावेश नहीं होता। ‘नाट्यधर्मी’ अभिनय शैली ‘लोकधर्मी’ अभिनय शैली की अपेक्षा अधिक कल्पना-समृद्ध, वैचित्र्यपूर्ण व अनुरंजक होती है। इसमें सांकेतिक वाक्य, स्वगत या आकाशभाषित का प्रयोग मिलता है। इसके पात्र दिव्य और अदिव्य दोनों होते हैं। नृत्य व संगीत का शास्त्रीय रूप इसमें प्रस्तुत होता है। पात्रों की भूमिका में ‘विपर्यय’ (पुरुष स्त्री-पात्र की भूमिका में व स्त्री पुरुष-पात्र की भूमिका में) ‘नाट्यधर्मी’ अभिनय शैली के अंतर्गत आता है। मानवीय सुख दु:खादि को आंगिक अभिनय एवं वाद्यादी के संयोग से अतिरेक रूप में प्रस्तुत करना ‘नाट्यधर्मी’ अभिनय की विशेषता है। ‘लोकधर्मी’ विधा ‘नाट्यधर्मी’ विधा का आधार है। ‘लोकधर्मी’ की नींव पर ही ‘नाट्यधर्मी’ का प्रासाद तैयार होता है। मौलिक तत्त्व ‘लोकधर्मी’ व उसका परिष्कृत रूप ‘नाट्यधर्मी’ होता है।[4]
हम यह कह सकते हैं कि ‘लोकधर्मी’ व ‘नाट्यधर्मी’ के मध्य एक निश्चित विभाजक रेखा खींच पाना संभव नहीं है। दोनों की सीमाएँ घुली-मिली रहती हैं। किसी प्रयोग में किस शैली की प्रधानता है इस आधार पर हम उसे एक निश्चित शैली-विशेष के अंतर्गत डालते हैं। जब सहज लोक-जीवन के विविध पक्षों का चित्रण बिना ताम-झाम के, सादगीपूर्ण ढंग से लोक द्वारा, लोक के लिए प्रस्तुत हो तो हम उसे ‘लोकधर्मी’ प्रयोग कहेंगे भले ही उसमे बीच-बीच में एकाधिक ‘नाट्यधर्मी’ प्रयोग के चिन्ह मिले। यहाँ सुप्रसिद्ध पारंपरिक नाट्यकर्मी कावलम नारायण पणिक्कर को उद्धृत करना प्रासंगिक होगा। संगीता गुन्देचा से भेंटवार्ता के दौरान ‘लोकधर्मी’ और ‘नाट्यधर्मी’ अभिनय शैली पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा है, “जहाँ तक लोकधर्मी और नाट्यधर्मी का प्रश्न है, उनमें डिग्री का फर्क है। लोकधर्मी में भी नाट्यधर्मी के गुण होते हैं और नाट्यधर्मी में लोकधर्मी के।”[5]
“लोक-प्रवृत्तियों से संवादी नाट्य ‘लोकधर्मी’ तथा उसका सौन्दर्याधायक अंश ‘नाट्यधर्मी’। ‘लोकनाटक’ का तंत्र और रचना-विधान शास्त्रीय नाटक के स्तर से कभी नहीं लिया जा सकता। इसमें शास्त्र के स्थान पर लोक-परंपरा और चिरविकसित नाट्यरूढियाँ मूल्यवान हैं। गीत, नृत्य, पुराण (मिथ) तथा यथार्थ जीवन-प्रसंग और लोककथा इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। लोकनाटक के कथानक और इतिवृत्त में एक के बाद एक दूसरी घटना, गीत और नृत्य के ताल-मेल से घुलती-मिलती हुई आगे बढती है, कभी व्यवस्थित ढंग से, कभी अव्यवस्थित ढंग से। तभी लोकनाटक को जीवन और प्रवृत्ति की सहज ‘प्रतिछवि’ की संज्ञा मिली है। इसका मंच जीवन के बीच अपने आप रच उठता है। चारों ओर जन-परिधि में घिरकर कहीं भी, किसी स्थान पर नदी या रम्य मार्ग में, किसी वृक्ष तले इसका मंच अपने आप उभर आता है। न इसमें पट-परिवर्तन के प्रसाधन की अपेक्षा है, न दृश्य-परिवर्तन कि आवश्यकता।”[6]
लोकधर्मी नाट्य-परंपरा में भिखारी ठाकुर का विशिष्ट स्थान है। 18 दिसंबर 1887 ई. में बिहार के सारण जिला के अंतर्गत जन्म लेने वाले भिखारी ठाकुर का सम्पूर्ण जीवन अपने नाटकों के लिए समर्पित रहा है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इन्हें ‘भोजपुरी का अनगढ़ हीरा’ कहा है। वहीँ अंग्रेजी के विद्वान डॉ. मनोरंजन प्रसाद सिन्हा ने इन्हें ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ की संज्ञा दी है. हालाँकि शेक्सपियर से भिखारी ठाकुर की समानता दोनों के नाटकों की पद्यात्मकता और लालित्य-कौशल को लेकर की जा सकती है, परन्तु जहाँ तक कथानक, भाषा, भावभूमि व निरूपण का क्षेत्र है दोनों में अत्यंत भिन्नताएँ हैं। शेक्सपियर के नाटक अभिजात और शास्त्रीय के अंतर्गत आते हैं जबकि भिखारी ठाकुर के नाटक शत-प्रतिशत लोक-जीवन से जुड़े हैं। भिखारी ठाकुर के नाटकों में लोकजीवन समग्रता से उभर कर आया है। लोकधर्मी नाटक की तमाम विशेषताएँ – लोकजीवन का सम्यक चित्रण, सादगी पूर्ण दृश्य-विधान, गीत संगीत की प्रधानता, लचीलापन (सब कुछ शास्त्रीय नियम सम्मत न होकर ‘इम्प्रोवाइजेशन’ की पूरी गुंजाइश) – ये सब भिखारी ठाकुर के नाटकों में मिलते हैं। अपने नाटकों में उन्होंने तत्कालीन स्थानीय समस्याओं का निरूपण अत्यंत कुशलता व कलात्मकता के साथ किया है, जिससे कि वे मार्मिकता के साथ साथ मनोरंजकता की नई ऊँचाईयाँ छूने में सफल रहे। जहाँ कहीं दर्शक-वर्ग उनके नाटकों में आये करुणापूर्ण दृश्यों के साथ तादात्म्य स्थापित कर अश्रुधारा प्रवाहित करने लगता वहीँ बटोहिया या विदूषक तुरंत विषय परिवर्तन कर अपनी वाकपटुता से माहौल को हल्का बना देता। उनके नाटकों में दर्शक और कलाकारों के मध्य का सम्बन्ध कृत्रिम न होकर सहज-स्वाभाविक होता। दोनों के मध्य सीधा संवाद स्थापित होता था। साथ ही उनके नाटकों के पात्रों में विशिष्टीकरण का अभाव मिलता है। इनके हर पात्र बहुआयामी होते हैं। क्षणभर पहले जो पात्र बटोहिया या बिदेसिया की भूमिका में नजर आता दूसरे ही क्षण अपनी भूमिका निर्वाह के पश्चात मंच पर ही वह खंजरी, ढोलक बजाने वालों के मध्य शामिल हो जाता। जो लोग ‘अलगाववाद’ की सिद्धांत (A।ienation Theory) रूप में अवधारणा को ब्रेख्त या पश्चिम की देन मानते हैं, उनका यह भ्रम भिखारी ठाकुर के नाटकों से परिचय के पश्चात बखूबी समाप्त हो जाता है।
हालाँकि भिखारी ठाकुर ने अनेक नाटक रचे व खेले हैं, परन्तु ‘बिदेसिया’ नाटक उनकी विशेष पहचान बन चुका है। कहा जाता है कि ‘बिदेसिया’ नाटक उनकी पहली नाट्य-रचना है। अपने गाँव कुतुबपुर में जब उन्होंने रामलीला मंच की स्थापना की थी तो उसी पर इस नाटक को पहली बार अभिनीत किया गया था। यह नाटक इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि आने वाले समय में भिखारी ठाकुर और ‘बिदेसिया एक दूसरे के पर्याय से बन गए और उनके सभी नाटकों को बिदेसिया रंगमंच के अंतर्गत ही गिना जाने लगा। ‘बिदेसिया’ के अलावा उनके अन्य नाटकों में – राधेश्याम बहार नाटक, द्रौपदी पुकार नाटक, गंगा-स्नान, सूरदास, भाई-विरोध, बेटी-वियोग, विधवा-विलाप, ननद-भौजाई संवाद, पुत्र-वध आदि उल्लेखनीय है। नाटक के नामों के शीर्षक से ही इनके विषय-वस्तु के अंतर्गत आने वाली समस्याओं व स्थितियों का पता चल जाता है।
लोकमानस प्राय: धर्म के प्रति अनुरागी हुआ करता है। लोकजीवन के कलाकार होने के कारण भिखारी ठाकुर के नाटकों में राम, कृष्ण, गंगा आदि से सम्बंधित प्रसंग प्रमुख स्थान प्राप्त करते हैं। भिखारी ने प्रसिद्ध रामायण कथा व कृष्ण कथा के विराट विस्तार में से लोकजीवन में प्रचलित अंशों को चुनकर अपने गीति-नाट्यों को सजाया। किन्तु इस अंतर के साथ कि इन कथाओं के नायक व इनमे प्रचलित धार्मिक-सामाजिक अनुष्ठान पर भिखारी भोजपुरी क्षेत्र की संस्कृति को आरोपित कर देते हैं। उदाहरणार्थ- भिखारी द्वारा वर्णित राम की बारात रामचरितमानस के अयोध्या की बारात से बिलकुल भिन्न भोजपुर की बारात मालूम पड़ती है। परिछावन, गुरहत्थी, लावाछिंटाई, पाणिग्रहण आदि विधियों से लेकर बारातियों के आपसी नोक-झोंक का अत्यंत विस्तार से वर्णन उनके नाटकों में मिल जाता है। कृष्णलीला सम्बन्धी भिखारी के पदों की विशेषता उनका दो रूपों में प्रयोग है। प्राय: हर पद या गाना एक ओर पद या गाना है तो दूसरी ओर संवाद का सहज रूप। यह भिखारी के नाटकीय कौशल का प्रमाण है। भिखारी के नाटकों के सामाजिक संदर्भ व परिवेश के सफल चित्रण में उनके पात्रों के नाम-चयन भी अत्यंत उपयुक्त हैं, जैसे – गबर, उपकारी, उपदर, उजागर, प्यारी, दुलारी, मलेछु, गलीच, झांटुल, उद्वास, चटक, लोमा, उत्पातो आदि। नामों की सूची में प्राय: हर नाम नागरिकता व प्रबुद्धता से दूर ग्राम्यता या भदेसपन के निकट है।
लोकधर्मी नाटक की सार्थकता उसके मंचन में ही निहित है। ये नाटक खेले जाने के लिए ही रचे जाते हैं। इनके लिखित पाठ से महत्त्वपूर्ण इनका मंचन होता है। स्थान की उपलब्धता व दर्शक के रुझान के अनुकूल इन्हें उसी समय छोटा बड़ा कर दिया जाता है। भिखारी ठाकुर के नाटक इस दृष्टि से एकदम खरे उतरते हैं। नाटकों के प्रति पूर्वाग्रह या कठोर अनुशासन के स्थान पर दर्शकों की रुचि उनकी प्राथमिकता रही है। अगर दर्शक किसी दृश्य-विशेष में रम रहे हैं तो आवश्यकतानुसार कल्पना का प्रयोग कर, नई बातें गढ़ कर पात्र दृश्य को बड़ा करते चलते हैं; और अगर दर्शक पक्ष से मनोनुकूल प्रतिक्रिया न मिल रही हो तो नाटक छोटा करने के लिए कुछ खण्डों को छोड़ भी दिया जा सकता है। इससे नाटक की पूरी कथा बाधित नहीं होती। जिस स्थान पर नाटक खेला जा रहा हो अगर वहाँ की कोई ज्वलंत समस्या हो तो  भिखारी ठाकुर किसी न किसी बहाने उसकी चर्चा अपने नाटकों में करा देते। यह ‘इम्प्रोवाईजेशन’ (Improvisation ) लोकधर्मी नाटकों में ही पाया जाता है। ‘लचीलापन’ लोकधर्मी नाटकों की विशेषता है।
लोकधर्मी नाटकों में कथानक व पात्र अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं न कि मंच-व्यवस्था। सब कुछ मंच पर उपस्थित कराने का आग्रह न होकर बहुत कुछ दर्शकों की कल्पनाशक्ति पर भी छोड़ दिया जाता है। भिखारी ठाकुर की मंच-व्यवस्था में भी स्थानीय व सुलभ रूप में उपलब्ध हो पाने वाले साधनों का ही उपयोग होता था। मंच खुला व अत्यंत मामूली होता था। पीछे के भाग पर एक साधारण पर्दा टंगा होता था जिसके सामने वाद्य-यंत्र बजाने वाले मंच के एक कोने में बैठते थे। मंच पर पात्रों का आवागमन सीधे-सादे ढंग से नेपथ्य से या फिर कई अवसरों पर दर्शकों के मध्य से गुजर कर भी होता था। पात्रानुकूल वेशभूषा होती थी पर इसमें भी अनावश्यक ताम-झाम से परहेज किया जाता था। इन सबके बावजूद भिखारी ठाकुर के नाटकों की लोकप्रियता का रहस्य यही मालूम पड़ता है कि उनके प्रदर्शन दर्शकों के लिए इतने आत्मीय व विश्वसनीय इसीलिए हो जाते थे क्योंकि उनकी कथावस्तु का सम्बन्ध लोकजीवन के उस वर्ग से संबद्ध था जो कम से कम साधनों में जीने का अभ्यस्त था। उनके लिए बेमतलब के ताम-झाम व दृश्य-सज्जा का उतना महत्त्व नहीं होता जितना कि अभिनय व्यापार की सहजता व संप्रेषणीयता का। नाटक में प्रदर्शित स्थितियों व समस्याओं से दर्शक का सहज तदाकार हो जाता था। चाहे नौकरी की तलाश में नवविवाहिता पत्नी को छोड़ दूसरे देश नौकरी के लिए जाने की विवशता हो या पैसे के अभाव में बेमेल विवाह की कारुणिकता; वैधव्य के भयानक अभिशाप का चित्रण हो या संपत्ति के लालच में परिवार का बंटवारा; या फिर ननद-भौजाई की मीठी झडपें अथवा देवर-भाभी के बीच की समस्याएँ – इन सारे के सारे प्रसंगों से लोक का जुडाव सहज-स्वाभाविक रूप में हो जाता।
लोकधर्मी नाट्य-परंपरा में गीत, संगीत व नृत्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। भिखारी के नाटकों में पद्यात्मकता की प्रधानता इसी महत्ता का निर्वाह करती नजर आती है। लिखित पाठ पर बहुत अधिक जोर न होने के कारण पद्य रूप में संवाद सहज रूप में स्मरणीय व संप्रेषणीय होते हैं। भिखारी के नाटकों में पात्रों का कथोपकथन अधिकांश काव्य/पद्य रूप में ही मिलता है। संस्कृत नाट्य-परंपरा की तर्ज़ पर नाटकों की शुरुआत भी मंगलाचरण से होती है। वाद्य-यंत्र भी सारे के सारे प्रचलित होते थे, जैसे – ढोलक, झाल, हारमोनियम, कंसी, सारंगी. करताल, झाँझ, खँजरी आदि।
भिखारी ठाकुर के नाटकों में अधिकांशत: नारी पात्रों की भूमिका पुरुष ही करते थे। स्वयं भिखारी ठाकुर सत्तर साल की उम्र में भी एक अल्हड गोपी की भूमिका इस प्रकार निभाते थे कि दर्शकों के लिए इस बात का अनुमान लगा पाना कठिन होता था कि षोडशी गोपी की भूमिका सत्तर साल का बूढ़ा निभा रहा है। यह ‘विपर्यय’ नाट्यधर्मी शैली का अंग है, परन्तु भिखारी ठाकुर के नाटकों में शास्त्रीय नियमबद्धता के पालन के रूप में न आकर यह तत्कालीन समाज के नियमों के अनुकूल था जिसके अनुसार स्त्रियों का मंच पर सबके सामने अभिनय करना अच्छा नहीं माना जाता था। इसी करणवश स्त्री पात्रों की भूमिका भी पुरुष अभिनेता ही करते थे। संकलन-त्रय के प्रति भी बहुत आग्रह भिखारी के नाटकों में नहीं मिलता। अगर बिदेसिया को गाँव से कलकत्ता जाना है तो वह बजते गीत के लय पर झूमता मंच के एक दो चक्कर काटता और इस उक्ति के साथ कि ‘लो भैया! पहुँच गए कलकत्ता’, कलकत्ता पहुँच जाता। लोकधर्मी शैली में बल बिलकुल यथार्थवादी निरूपण पर न होकर सहज रूप से संप्रेषण पर होता है। इस सहज संप्रेषण में लोकधर्मी नाट्यधर्मी की रेखाएँ घुल मिल जाती हैं।
भिखारी ठाकुर के नाटकों की लोकग्राहिता ही इसका प्राण है। ये लोकधर्मी नाटक लोक द्वारा, लोक के लिए, लोक का जीवंत, यथातथ्य व मनभावन चित्रण है। बिना पाठ में लगे ये लोकधर्मी नाटक आज भी लोगों के मन में रचे बसे हैं ये इनकी जीवंतता व लोकप्रियता का सहज प्रमाण है।


सहायक ग्रन्थ :
1.     बिहार की नाटकीय लोकविधायें, डॉ. महेश कुमार सिन्हा, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना, प्रथम संस्करण जुलाई 2001।
2.     संक्षिप्तनाट्यशास्त्रम्, राधावल्लभ त्रिपाठी, वाणी प्रकाशन, द्वितीय आवृत्ति 2009।
3.     समकालीन रंगमंच, दीनानाथ साहनी, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना, प्रथम संस्करण 2003।
4.     भारत के लोकनाट्य, डॉ. शिवकुमार मधुर’,  वाणी प्रकाशन, प्र.सं. 1980।
संपर्क :
स्वाति सोनल      
शोधार्थी
हिंदी-विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, ई-मेल :- swatisn।@gmai।.com

संदर्भ सूची.


[1] संक्षिप्तनाट्यशास्त्रम्, राधावल्लभ त्रिपाठी, पृ. 232-33, वाणी प्रकाशन, द्वितीय आवृत्ति 2009.
[2] प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद, हजारी प्र. द्विवेदी, पृ. 21, राजकमल प्रकाशन, प्र.सं. 1963.
[3] भारत के लोकनाट्य, डॉ. शिवकुमार ‘मधुर’, पृ. 6, वाणी प्रकाशन, प्र.सं. 1980.
[4] नाट्यशास्त्र में आंगिक अभिनय, डॉ. भारतेंदु द्विवेदी, विश्वभारती अनुसंधान परिषद, ज्ञानपुर (वाराणसी), प्र. सं. 1990.

[5] रंग-प्रसंग, सम्पादित द्वारा प्रयाग शुक्ल, नई दिल्ली : राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का अर्द्धवार्षिक वृत्त, 2001.
[6] रंगमंच और नाटक की भूमिका, डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल, नेशनल पब्लिशिंग हॉउस, संस्करण 1965. 

9/11/14

चाचा चौधरी एंड कंपनी

पश्चिमोत्तर बिहार के उस जिले में बिजली का न होना रोजमर्रा की बात थी और पर इससे हम स्कूल गोइंग बच्चों को कोई शिकायत भी नहीं थी। रात को लालटेन की रोशनी में किताबों के बीच में आठ आने फी कॉमिक्स मिला करती और इसका गणित भी एकदम साफ़-सफ्फाक था। मसलन कॉमिक्स पाँच रुपये की तो उसका किराया उस मूल्य का दस फीसदी होता था यानी पचास पैसा। यह किराए का कॉमिक्स अट्ठारह से चौबीस घंटे के लिए लिया जाता था। जिसे जैसा है, वैसी ही हालत में लौटाया जाना अनिवार्य होता था। शहर में बेशक कॉन्वेंट और सरकारी स्कूलों के बच्चों के बीच के भेद को हम कई तरह से आंक सकते हैं पर कॉमिक्स के मामले में छात्र एकता का कोई सानी नहीं था। होता भी कैसे उन कॉमिक्सों के किरदारों ने हम सभी बच्चों में नाभि-नाल संबंध जोड़ा था। हम सबकी दिनचर्या लगभग एक-सी थी। दिन-भर स्कूल और शाम को हमलोग कभी अपने शहर के अभय पुस्तकालय तो कभी राज पुस्तकालय तो कभी किसी नई-नई खुली कॉमिक्स लाइब्रेरी से मनोज कॉमिक्स, राज कॉमिक्स, तुलसी कॉमिक्स, इंद्रजाल कॉमिक्स लाते थे, लेकिन इन सभी कॉमिक्स में जिस कॉमिक्स का क्रेज हममें सबसे अधिक था या यूँ कहें कि जिससे हम अधिक कनेक्ट हो पाते थे वह डायमंड कॉमिक्स और उसकी चाचा चौधरी की श्रृंखला थी। हम सभी दोस्त और भाई-बहन हर महीने के पहले हफ्ते में इस सीरिज का बेसब्री से इंतज़ार किया करते थे और चूँकि मुझे साइकिल चलानी आती थी और शहर के लगभग हरेक मोहल्ले, चौक के कॉमिक्स लाइब्रेरियों की खबर मुझे ही होती थी, इसलिए इनको लाने की जिम्मेदारी मुझे मिलती थी। यह सभी कॉमिक्स स्कूल बैग में छुपा कर लाये जाते थे।  जिन्हें पिताजी के डर से दिन में पढना मुश्किल होता था पर सबके सोने के बाद रात को लालटेन की रौशनी में आँख गड़ाकर किताबों के बीच रखकर पढ़ा जाता था। इस तरह की प्रोफेशनल ईमानदारी अब शायद नहीं बची, जो ईमानदारी हमने प्राण अंकल के रचे किरदारों के साथ बरती थी। बहरहाल, एक रोज पिताजी रात को किताबों में छिपा कर पढ़े जाने की हमारी कौमिक्सिया आदत को भांप गए। पिताजी की सैद्धांतिक मान्यता थी कि कॉमिक्स की संगत में बच्चे बिगड़ जाते हैं, अपनी पढ़ाई से उनका डेविएशन हो जाता है। सो,  तबियत से हमारी पिटाई हुई, मुर्गा बनाया गया, हमारे खजाने के तमाम कॉमिक्स की खोजबीन करके उसी रात उनका होलिका दहन हुआ और हमसे गंगाजली उठवाकर कसम ली गयी कि हम आज से कॉमिक्स नहीं पढेंगे। मुझे आज भी यह अंदेशा है, यह गद्दारी मेरी बड़ी दीदी की करामात थी। जिसका परिणाम दीदी के लिए यह हुआ कि मैं और मेरा छोटा भाई थोड़ी बड़ी क्लास में जाने पर इतिहास में पलासी युद्ध के कारण आदि पढ़-लिख गए तो दीदी को बात-बात में मीर जाफर की उपाधि देने लगे।  कुल मिलाकर इस पूरे घटनाक्रम की एवज में दो बातें हुईं, एक तो यह कि हम गंगाजल की लाज नहीं रख पाए और ईश्वरीय भय से मुक्त हुए। दरअसल हम प्राण अंकल और चाचा चौधरी, चाची, साबू, राकेट और अपने अन्य किरदार साथियों पिंकी बिलू, रमन जी इत्यादि से अपना नाता तोड़ने को किसी भांति राजी नहीं हुए। सच कहें तो दिल माना नहीं। दूसरी बात यह हुई कि एक अजीब तरह की ढीठता व्यवहार में आ गयी, माने हमलोग किसी और जगह छुपकर पढ़ने लगे थे।  मगर यह सच है कि हममें अब ढीठता तो थी पर पिताजी या अन्य बड़ों के प्रति सम्मान की कीमत पर इसे बदतमीजी हरगिज नहीं कहा जा सकता था। हाँ! कॉमिक्स पढ़ने में रणनीतिक तब्दीलियाँ आ गयी गयी थी। चाचा चौधरी एंड कंपनी ने हमें बदतमीजी की शिक्षा कभी नहीं दी। अन्य स्कूलों की ही तरह प्राण अंकल के इस स्कूल में भी आदमियत का पाठ पढ़ाया जाता था। अच्छाई का दामन थाम मानवता की सेवा का भाव हममें भरा जाता था। असल में प्राण अंकल के रचे किरदार डक टेल्स, मिकी माउस, टॉम ऍन जेरी वाली मासूमियत वाले किरदार थे, जो फीलगुड संस्कृति के पैरवीकार थे। पर यह बात पिताजी और हमारे संत जोसेफ स्कूल के उसूलपसंद प्राचार्य श्रीमान एम.सी. मैथ्यू को कौन समझाए? उनके लिहाज से यह एक बेहद खराब आदत थी और शायद ड्रग एडिक्शन से भी अधिक ख़राब। किसी का क़त्ल करने से भी अधिक बुरा। हमारे स्कूल प्रिंसिपल के माथे भी कई कॉमिक्सों को फाड़ने और हमारी जमात के कई बच्चों को सजा देने का पाप है। इन सबमें जो अधिक चुभने वाली बात थी वह यह कि हमारे बड़े चाचा चौधरी की सामाजिक-मानसिक अहमियत समझने को राजी नहीं थे, जबकि पश्चिम के स्पाइडरमैन, ही-मैन, सुपरमैन, बैटमैन इत्यादि के सामने प्राण अंकल ने खांटी देशी पगड़ी और हाथ में लट्ठ लेने वाले चाचा चौधरी को खड़ा किया, जिनका दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता था। यह प्राण अंकल की ही योग्यता थी कि उन्होंने हम कस्बाई बच्चों के जेहन में कंप्यूटर का नाम तब घुसा दिया था, जब कंप्यूटर व्यवहार में तो दूर आम बोलचाल में भी नहीं थे। मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया पर चाचा चौधरी के बारे में लिखा है कि चाचा चौधरी की रचना चाणक्य के आधार पर की गयी है, जो बहुत बुद्धिमान व्यक्ति थे। मुझे इस उदाहरण से थोड़ी आपत्ति है। चाचा चौधरी और चाणक्य की साम्यता महज बुद्धि के आधार पर करना जायज नहीं। वह जैसे हैं बस अनूठे और अपने में एक ही हैं। न भूतो ना भविष्यति। यकीन नहीं होता तो उन तमाम बच्चों से पूछिए जो अब मध्यवय की ओर अग्रसर है और जिन्होंने प्राण अंकल के अचानक जाने के बाद अपने बचपने की ओर एकाएक दौड़ लगायी है। वैसे हमारी भावनाओं से अलग पिताजी और समूह को इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता था कि चाचा जी के साथ ज्यूपिटर ग्रह का वासी बलशाली साबू भी रहता है, जो चाचा जी के चातुर्य और अपनी ताकत से बुरी ताकतों को धूल चटा देता है। हमारे लिए यह घोर आश्चर्य का विषय था कि उनका इन बातों से भी कुछ लेना-देना नहीं था कि वर्ष 1995 में प्राण अंकल का नाम ‘लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स’ में दर्ज हुआ अथवा ‘द वर्ल्ड एंसाइक्लोपीडिया ऑफ़ कॉमिक्स’ ने उन्हें ‘भारत का वाल्ट डिज्नी’ घोषित किया। उन्हें इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि अमेरिका के ‘इंटरनेशनल म्यूजियम ऑफ़ कार्टून आर्ट’ में प्राण अंकल के इस कार्टून स्ट्रिप चाचा चौधरी को स्थायी रूप से जगह दी गयी है।  इतना ही नहीं ‘रमन हम एक हैं’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय एकता के लिए भी सम्मानित किया गया। बहरहाल, कॉमिक्सों से हमारे याराने ने कई दफे, कई बार खूब पिटाई करवाई पर चाचा चौधरी, साबू, चाची, बिल्लू, पिंकी, श्रीमतीजी, रमन, गब्दू, बजरंगी पहलवान, जोजी, भीखू, तोषी, गोबर सिंह, डगडग, राकेट, धमाका सिंह आदि के साथ अपनी तगड़ी वाली दोस्ती हो गयी थी। किस तरह से वैद्यराज चक्रमाचार्य की जहर लिख कर छुपाई हुई दवा को पुलिस से बचने के लिए डाकू राका पी गया और जिसकी वजह से वह कभी न मर सकने वाला विलेन बन गया, यह हमारे लिए हमेशा आश्चर्य की बात थी। धमाका सिंह और गोबर सिंह की कारस्तानियों ने भी हमारा खूब मनोरंजन किया, इनसे दो-चार हुए, अंत में एक राज की बात यह कि मैंने और मेरे छोटे भाई रिंकू ने अपने कॉमिक्स के जखीरे से एक पार्ट टाईम कॉमिक्स लाइब्रेरी (सरस्वती पुस्तकालय) अपने घर के पीछे भूसा रखने वाले दालान में खोला था, चूँकि उधर की ओर पिताजी आते नहीं थे, सो कुछ दिन यह चला पर बाद में फिर वही ‘मीर जाफर’ तो हर ओर थे। पिताजी ने फिर खबर ली। पर प्राण अंकल के अचानक जाने के साथ यह सब क्षण एकाएक दिलो-दिमाग में कौंध गए। सच कहें तो इन सबको याद करके गुदगुदाहट-सी अब भी होती है। वह जो लालटेन की रौशनी में किताबों के भीतर छुपाकर इन कॉमिक्सों को पढ़ना था, वह जो मार खाकर भी इनको पढ़ने का जो जज्बा था, वह किरदारों के साथ जीने मरने का जो जज्बा था, वह जो जेबखर्ची बचाकर कॉमिक्स पुस्तकालय से इन्हें ला कर पढ़ने का जज्बा था, वह जो शहर में खुलने वाले हर पुस्तकालय का तुरंत मेंबर होना था, वह दीवानगी इन्हीं हाथों से रचे जादू की थी। ऐसे ही सोने की कलम थामे चित्रों को जबान देने वाले प्राण अंकल आपको अंतिम सलामी। आपने अपने किरदारों से हमारे भीतर आदमियत भरी। उनका यह कथन कि ‘यदि मैं लोगों के चेहरे पर एक मुस्कान ला सका तो मैं अपने जीवन को सफल मानूँगा’ उन्हें विश्व के कुछ महान सर्जनात्मक प्रतिभाओं के साथ खड़ा कर देता हैसाहिर ने एक नज्म चाचा नेहरु के देहांत पर लिखी थी प्राण अंकल! मैं इन पंक्तियों को आपके लिए उधार लेता हूँ “जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है, जिस्म मिट जाने से इंसान नहीं मर जाते”  

Published in सबलोग(मासिक पत्रिका), सं. किशन कालजयी, अंक सितम्बर 2014  

9/8/14

लोक संस्कृति बरअक्स लोकप्रिय संस्कृति (राजीव रंजन गिरि)

रात नाच महोत्सव समिति, बिलासपुर लोक पर केंद्रित पत्रिाका 'मड़ई' का वार्षिक प्रकाशन करती है। यह पत्रिाका निःशुल्क वितरित होती है। डॉ. कालीचरण यादव के संपादन में इस पत्रिाका ने रचनाकारों-पाठकों के बड़े समुदाय को जोड़ा है। लोक के विभिन्न पहलुओं में दिलचस्पी रखने वाले पाठक यह पत्रिाका डॉ. कालीचरण यादव, बनियापारा, जूना बिलासपुर, बिलासपुर, छत्तीसगढ़- ४९५००१ को पत्रा लिखकर भेजने का आग्रह कर सकते हैं। लोक पर केंद्रित इस पत्रिाका के २४ अंक प्रकाशित हो चुके हैं। लिहाजा, आगामी अंक इसका रजत जयंती अंक होगा।
लोक के विभिन्न आयामों को समेटने वाली इस पत्रिाका का मौजूदा दौर में 'लोक' की प्रकृति, चरित्रागत बदलाव आदि को लेकर चिंता लाजिमी है। 'मड़ई' के चौबीसवें अंक के संपादकीय और कुछेक लेखों में इस पर विचार किया गया है। अपनी चिंता और सरोकार को शब्द देते हुए कालीचरण यादव ने लिखा है कि लोक संस्कृति एक अवधरणा के रूप में मनुष्य की सामूहिक चेतना की सहज अभिव्यक्ति है। वह मनुष्य के सामाजिक अनुभवों का सर्जनात्मक रूपांतरण है। लोक मंगल की कामना उसका सारतत्व है। उसकी वस्तु में जीवन की नैसर्गिक लय होती है। वह स्थानीय हो सकती है और उसमें मनोरंजन के भरपूर तत्व भी हो सकते हैं, परंतु उसका एक सामाजिक चरित्रा होता है। वह व्यक्ति को समूह के भीतर लाती है और उसका सर्वांगीण परिष्कार करती है। लोक संस्कृति में सार्वकालिक मानवीय मूल्य अंतर्निहित होते हैं। सामूहिकता उसकी सबसे बड़ी विशेषता है और सामाजिक सहकार उसका अर्थपूर्ण संदेश है। लोक संस्कृति की चिंताएं मानवीय होती हैं और इसीलिए वह मनुष्य को अध्कि सामाजिक और अध्कि मानवीय बनाती है। दरअसल वह सामूहिक रचनात्मकता का प्रतिपफल है। जिसे लोग सामूहिकता में ही पढ़ते हैं। वस्तुतः वह समूह की, समूह के लिए, समूह के द्वारा अभिव्यक्त सर्जनात्मकता है।
अब सवाल उठता है कि मौजूदा दौर में ऐसा क्या है द्घटित हुआ है कि लोक के प्रति लोगों की चिंता बढ़ गयी है। कहना न होगा कि यह लोकप्रिय संस्कृति है। लोकप्रिय संस्कृति यानि पॉपुलर कल्चर यानी पॉप कल्चर। इस लिहाज से देखें तो कहना होगा कि 'लोक संस्कृति' और 'लोकप्रिय संस्कृति' में पफर्क है। विचार योग्य बात यह है कि क्या 'लोकप्रिय संस्कृति' ;पॉपुलर कल्चर के अर्थ मेंद्ध 'लोक संस्कृति' का विस्तार, विकास अथवा अगला पड़ाव है? या 'लोक संस्कृति' के बरअक्स अपनी जगह बना रही 'लोकप्रिय संस्कृति' बिल्कुल प्रतिलोम है? आनेवाले समय में 'लोक संस्कृति' की जगह क्या 'लोकप्रिय संस्कृति' ही बचेगी? क्या 'लोकप्रिय संस्कृति' 'लोक संस्कृति' को लील जाएगी? इन सवालों पर विचार करने वाले बु(र्ध्मियों को 'मड़ई' के संपादकीय, सुरेंद्र वर्मा और प्रखर युवा आलोचक जयप्रकाश के आलेखों पर गौर पफरमाना चाहिए। बकौल कालीचरण यादव, 'हमारा समय बाजार के उत्कर्ष का समय है। आज सब कुछ का बाजार है और सब कुछ बाजार है।' यह सही है कि बाजार का अस्तित्व प्राचीन काल से ही रहा है परंतु पहले बाजार वस्तु विनिमय का केंद्र था। वह समाज की अनिवार्य आवश्यकता था। उसके माध्यम से मनुष्य और समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी। इसलिए पहले का बाजार एक स्वाभाविक और नैसर्गिक बाजार था। आज के बाजार को हम इस अर्थ में अस्वाभाविक और अप्राकृतिक कह सकते हैं कि वह पहले उपभोग की कृत्रिाम परिस्थितियां पैदा करता है। गौण वस्तुओं की आवश्यकताओं का आरोपण करता है। उसके द्वारा पोषित-पालित उपभोक्ता संस्कृति लुभावने विज्ञापनों के माध्यम से पूरे समाज पर अपना प्रभुत्व स्थापित करती है। इस बाजार की अपनी एक विचारधरा है। उसका अपना एक नियम है, शैली और शिल्प है। इस बाजार की अपनी एक संस्कृति होती है जो वास्तविक लोक संस्कृति के समानान्तर लोकप्रियता के नाम पर लोगों पर थोपी जाती है। लोकप्रिय संस्कृति को मुनापफे से जोड़कर देखा जाता है। वह बाजार के हितों के अनुकूल होती है। लोकप्रिय संस्कृति को प्रौद्योगिकी के माध्यम से लोकप्रिय बनाया जाता है। इस प्रकार लोक संस्कृति की समूहगत रचनात्मकता का विरूपण व अवमूल्यन किया जाता है। लोकप्रिय संस्कृति, लोक संस्कृति के लिए आज सबसे बड़ी चुनौती है।
कालीचरण जी ने 'लोकप्रिय संस्कृति' को मोटे तौर पर बाजार की पैदाइश बताया है। गौर से देखने पर ज्ञात होता है कि 'लोकप्रिय संस्कृति' ;पॉपुलर कल्चरद्ध तीन मकार के सहारे पैदा और विकसित होती है। ये तीन मकार हैं- मनी, मार्केट और मीडिया। यही कारण है कि इन तीन मकारों के विकास और व्याप्ति के साथ-साथ 'लोकप्रिय संस्कृति' भी बढ़ती जा रही है और इसका दायरा विकसित होता जा रहा है। लोकप्रिय संस्कृति से लोक संस्कृति को मिलने वाली चुनौती के मद्देनजर इसकी सुरक्षा पर विचार करते हुए कालीचरण यादव ने इसरार किया है कि 'हमें लोक संस्कृति की सीमाओं को भी समझना होगा। लोक संस्कृति की समर्थता को रेखांकित करते हुए उसकी नयी अवधारणा विकसित करनी होगी, नए परिप्रेक्ष्य बनाने होंगे। अब लोक संस्कृति की शु(ता और मौलिकता का आग्रह बहुत प्रासंगिक नहीं रह गया है। लोक संस्कृति को काल सापेक्ष बनाना होगा। लोक संस्कृति को ऐतिहासिक विकास की निरंतरता से जोड़ना होगा। लोक संस्कृति रूढ़ियों और परंपराओं के दुहराव का नाम भर नहीं है। हमारी परंपरा में जो कुछ भी सुंदर है, जो कुछ भी सकारात्मक है, उसे आत्मसात करते हुए लोक संस्कृति को नई सर्जनात्मकता से जोड़ना होगा। हमारे समय की चिंताओं से जुड़कर ही वह सामूहिक सर्जनात्मकता को पल्लवित कर सकेगी। अतः जरूरी है कि लोक संस्कृति के नए प्रतिमान गढ़े जाएं, नई अवधरणाएँ विकसित की जाएं। आज के प्रतिकूल समय में लोक कला के विभिन्न रूपों में मानवीय चिंताओं के लिए स्पेस बनाना होगा। उसकी कालब(ता सुनिश्चित करनी पड़ेगी। जिससे हमारी लोक संस्कृति जन शिक्षण का माध्यम बन सकेगी। इस प्रकार वह अपने प्रतिरोधत्मक तेवर को अध्कि अर्थवान और धरदार बना सकेगी तथा बाजारोन्मुखी लोकप्रिय संस्कृति का सशक्त प्रतिपक्ष और विकल्प भी बन सकेगी।' गौर करने लायक बात है कि लोक संस्कृति 'बहता नीर' की तरह होती है। यह 'कूप जल' नहीं होती। हालांकि जो लोग लोक संस्कृति को 'कूप जल' की तरह समझते हैं, उन्हें भी यह सोचना होगा- जैसा कि कालीचरण जी ने बताया है- कि यह रूढ़ियों और परंपराओं के दुहराव का नाम भर नहीं है। मोटे तौर पर कालीचरण जी की बात ठीक है, पर गहराई से विचार करें तो पता चलेगा कि रूढ़ि भी परंपरा नहीं होती। रूढ़ि और परंपरा में भी पफर्क है। परंपरा ऐतिहासिक विकास क्रम में बदलती-परिवर्तित होती जाती है। जबकि रूढ़ि तो है ही रूढ़ि, यह बदलती नहीं है।
इस लिहाज से देखें तो 'कूप जल' भी शब्द के सच्चे अर्थों में रुढ़ि नहीं है। कारण कि 'कूप जल' नित्य नया, ताजा होता रहता है। कुंए में अपने जल की मात्राा को बढ़ाने और निथारकर सापफ करने की क्षमता होती है। 'कूप जल' की जड़ें गहरी होती हैं। ऊपर से भले 'कूप जल' प्रवाहित होते न दिखे पर वह प्रवाहमान होता है। बहरहाल, नए बदलते माहौल में 'लोक संस्कृति' भी बदलेगी और अर्थवत्ता ग्रहण करेगी।
आलोचक जयप्रकाश ने इस मुद्दे को ठीक नोट किया है कि लोक संबंध्ी चिंताएं दो भिन्न ध्रातलों से उठ रही हैं, एक तरपफ लोक के प्रति संरक्षणवादी विचार-दृष्टि है, दूसरी ओर समर्पणवाद है। संरक्षणवादी इस लोक संस्कृति की रक्षा की गुहार लगाते हुए व्याकुल हैं जिसका स्वभाव ही निरंतर बदलाव का है और जो शु(ता के आग्रह का सदैव तिरस्कार करती है, बाहरी प्रभावों के प्रति वह अत्यंत संवेदनशील होती है और उन्हें ग्रहण कर निरंतर पुनर्नव होती है- सच कहा जाए तो उसकी जीवनी-शक्ति का स्रोत उसकी साभ्यतिक संवेदनशीलता में छिपा है। दूसरी तरपफ समर्पणवादी उस लोक संस्कृति को पूंजी-नियंत्रिात और बाजार-केंद्रित भोगवाद की आंध्ी में झोंक देना चाहते हैं जो वैयक्तिक सुखमय की बजाय सार्वजनिक आनंदवाद को लक्ष्यीभूत है- जिसका बुनियादी सरोकार लोकमंगल है। वे मान बैठे हैं कि मॉस कल्चर का प्रतिरोध् संभव नहीं रह गया है। इसलिए यदि वह लोक को लील ले तो यह अंचरज की बात न होगी।
अपने अपने तालिबान
आलोक कुमार सातपुते ने लद्घुकथा को अपनी रचनात्मकता की प्रमुख विधा बनाया है। 'अपने-अपने तालिबान' ;नवचेतन प्रकाशन, दिल्लीद्ध इनकी लद्घुकथाओं का संग्रह है। लद्घुकथा की विशेषता यह होती है कि इसके जरिए रचनाकार अपना विचार, अपना संदेश बेहद कम शब्दों में सीधे-सीधे पाठकों तक पहुँचा देता है। सातपुते की लद्घुकथाएँ भी इसी लिहाज से सपफल हैं। इन लद्घुकथाओं में भारतीय समाज में पफैली विसंगतियों, अंधविश्वासों, रूढ़ियों और वर्चस्ववादी ताकतों की कलई उतारी गई है। इन लद्घुकथाओं में कहीं हास्य है तो कहीं व्यंग्य की धार, जो कभी चिकोटी काटती हैं तो कभी तिलमिला देती है।
आलोक कुमार सातपुते की लद्घुकथाओं की इन विशेषताओं के साथ कुछ कमजोरियों पर भी बात करनी जरूरी है। सातपुते का मानना है कि 'साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा लद्घुकथा के बारे में कापफी सारी बातें कही जाती हैं। कोई इसको चुटकलेबाजी बताता है, तो कोई इसे साहित्य में प्रवेश का बैकडोर कहता है। वास्तव में यह लद्घुकथा को हाशिए पर ले जाने के षड्यंत्रा के तहत बुर्जुवा वर्ग के साहित्यकारों द्वारा पफैलाया गया भ्रमजाल है।' अव्वल तो यह है कि सातपुते के इस मत का आधार क्या है कि लद्घुकथा ही सबसे लोकप्रिय विधा है? साथ ही इसे हाशिए पर ले जाने का षड्यंत्रा बुर्जुवा वर्ग के साहित्यकार कर रहे हैं? जरा सोचिए अगर ये षड्यंत्रा है भी तो इसका बुर्जुवा वर्ग से क्या मतलब? आखिरकार वो कौन कौन से लोग हैं जो इसमें शामिल हैं। बहरहाल इस तर्क हीन बातों के बारे में क्या कहा जाए? इसी तरह 'तुलसी दास का कोर्ट मार्शल' लद्घुकथा में सातपुते का दलित पात्रा कवि तुलसीदास पर आरोप लगाता है कि 'आपने राम को अपने ही जैसा ब्राह्मणवादी बना दिया, और उसके हाथों शूद्र शंबूक का वध करवा दिया।' अब कौन बताए सातपुते जी को कि तुलसीदास के 'रामचरितमानस' में शंबूक वध का प्रसंग ही नहीं है। वाल्मीकि, भवभूति से तुलसी दास की काव्य यात्राा में इस प्रसंग में आये बदलाव के जरिए बदलते ऐतिहासिक सामाजिक परिपे्रक्ष्य को समझा जा सकता है। आलोक कुमार सातपुते ने बगैर जाने समझे इस पर लद्घुकथा लिख दी। बहरहाल...। 

डॉ.राजीव रंजन गिरि  द्वारा लिखित यह लेख साभार लिया गया है