7/8/15

अमिताभ का सिनेमा (सुशील कृष्ण गोरे)

(इस लेख को समालोचन ब्लॉग से साभार लिया गया है)
 डॉ.हरि‍वंशराय बच्चन ने उन्हें अपनी सर्वश्रेष्ठ कवि‍ता माना है. मैं अमि‍ताभ को सभी 

सर्वनामों की एक संज्ञा मानता हूँ.अश्चर्यजनक सफलता के बीच सौम्यतादंभहीन अनुशासनवि‍नम्र स्पष्टताधैर्यवान संतुलनसंकटों को परास्त कर देने वालीअदम्य शक्ति जैसे गुणों की अद्भुत खान हैं अमि‍ताभ. एक ऐसा वि‍शेष्य जि‍सके आगे सभी वि‍शेषण छोटे पड़ते हों. उनकीअपराजेय शक्ति का लोहा तो दो बार काल को भी मानना पड़ा है.
सि‍नेमा का रूपहला पर्दा हो या जीवन की जंग अमि‍ताभ अंत में एक अपराजि‍त नायक बनकर उभरते हैं. यह संयोग ही हैकि फि‍ल्मी पर्दे पर उनके द्वारा नि‍भाए गए एंग्री यंगमैन के जि‍न सशक्त कि‍रदारों को बॉक्स ऑफि‍स पर कीर्ति‍मानों के नए झण्डेगाड़ने वाला माना जाता है - वे सब वि‍जय थे. एंग्री यंगमैन नाम से एक आयरिश लेखक लेजली एलन पॉल ने 1951 में अपनी आत्मकथा लिखी थी. संभवत: यह मुहावरा यहीं से प्रचलित हुआ था. बाद में जॉन ऑसबर्न के नाटक Look Back in Anger (1956)को प्रोमोट करने के लिए इसी तर्ज़ पर एंग्री यंगमेन शब्द चल निकला. इन सब का मतलब एक ही होता है व्यवस्था और दमनकारी सत्ताओं का पुरजोर विरोध.
अमिताभ को अपने युग के गुस्से का अभिनेता माना जाता है. सातवां दशक आजादी के बाद 20 सालों में व्यवस्था से मोहभंग का प्रतिनिधि दशक था. गरीबी, भ्रष्टाचार, बेईमानी, अपराध और हिंसा सिस्टम में रचते-बसते जा रहे थे. आजादी की लड़ाई में जिस सुशासन और सुराज के ख्वाब़ सजाए गए थे वे चकनाचूर होने लगे थे. सत्ता और वर्चस्व की लड़ाई हावी हो गयी. इसमें गरीब, असहाय, बेबस और मज़लूम तबके की ज़िंदगी पिसने लगी थी. अमिताभ इसी तबके के एक नुमाइंदे के रूप में सामने आते हैं. उनके चेहरे पर एक ईमानदार मिल मजदूर बाप के बेटे का संपूर्ण स्वाभिमान और गौरव दमकता रहता है जब वे दीवार में फेंके हुए पैसे नहीं उठाते. पोर्ट पर गोरखपुर से आए एक कुली के हफ्ता न देने का दर्दनाक हस्र देखने के बाद उनका गुस्सा गुंडों के खिलाफ जंग के रूप में फूटता है.
अमिताभ शोषण और दमन के शिकार वर्गों के नायक बनकर उभरे. वे सत्ता के जुल्म का प्रतिरोध थे. सत्ता चाहे किसी भी किस्म की हो. बाहर वे गैर-कानूनी और असामाजिक तत्वों की धुलाई करते हैं तो घर के भीतर वे अपने पिता को भी चुनौती देते हैं. चाहे वेत्रिशूल में आर.के.गुप्ता यानी संजीव कुमार हों या शक्ति में अश्विनी कुमार यानी दिलीप कुमार ही क्यों न हों. वे माँओं के दुलारे बेटे के रूप में बेजोड़ हैं. माँओं के लिए पिता से टक्कर लेने में भी अमिताभ के एंग्री एंगमैन का एक बारीक आयाम देखा जा सकता हैं.त्रिशूल में वे आर.के.गुप्ता कंस्ट्रक्शन कं. के हर सौदे को छीनकर अपनी परित्यक्ता माँ के नाम से शांति देवी कंस्ट्रक्शन का एक समानांतर साम्राज्य खड़ा करते हैं. शक्ति, देशप्रेमी, सुहाग जैसी फिल्मों में अपनी माँ के प्रति हमदर्द है. दीवार में माँ की ख़ातिर वे जहाँ पहले कभी नहीं गए थे उस मंदिर की चौखट पर भी प्रार्थना के लिए गए. अमिताभ का यह तेवर स्त्रीवादी विमर्श का एक भाष्य खड़ा करता है.
इन फि‍ल्मों में जि‍न कि‍रदारों को अमि‍ताभ ने अपने दमदार अभि‍नय से यादगार बना दि‍या था वे आज उम्र के 35-40वें पायदानपर पहुँच चुके उस समय के कि‍शोर-युवकों को सम्मोहन पाश में बाँध लेते थे. वे अमि‍ताभ में अपनी ही छवि नुमाया होते देख रहेथे. अमि‍ताभ का गुस्साआक्रोशगुंडों-अपराधि‍यों के सिंडीकेट पर गरीबों के रक्षक के रूप में उनका हमला और शोषणअन्यायएवं अत्याचार के वि‍रुद्ध उनकी अकेली जंग कहीं--कहीं हर युवा दि‍ल में पक्के इरादे से गरीब एवं कमजोर आदमी के पक्ष मेंलड़ने का जोश भरती थी. इस प्रकार वे समकालीन समाज एवं उसकी परि‍स्थि‍ति‍यों में नि‍र्मि‍त हो रहे युवा मानस के प्रतीक बनगए थे. भले ही अमि‍ताभ बच्चन को उनकी ज्यादातर शुरूआती फि‍ल्मों में क्रोध से लाल आंखों वाले खामोश परंतु अकेले नि‍हत्थेदस-दस गुंडों को पीटकर धराशायी कर देने में समर्थ एक ऐसे आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी नायक के रूप में पेश कि‍या गया होलेकि‍न जो कई बार खुद कानून को अपने हाथों में लेकर शंहशाह की तरह अपने फैसले लेने लगता है जि‍सके सामने इंसाफ कीखाति‍र अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खि‍लाफ बंदूक उठा लेने का ही एक आखि‍री रास्ता बच जाता है. जब वह कहता है – लगता है जो दीवार हम दोनों के बीच है वह इस पुल से भी ऊँची है............ या उफ्फ! तुम्हारे उसूल, तुम्हारे आदर्श.......तुम्हारे सारे उसूलों को गूँथकर एक वक्त की रोटी भी नहीं बनाई जा सकती.......... तो समय का सारा वृतांत सारे भाष्यों की लकीरों और किरिचों के साथ व्यक्त हो जाता है........तालियों की गड़गड़ाहट थमती नहीं.........आज भी उसकी अनुगूँजें बजती हैं - स्मृतियों के पार्श्व में मद्धम.....मद्धम.......
बात कहीं से भी करि‍ए आपको अमि‍ताभ के चरि‍त्रों में एक साथ हमारे साधारण मध्यवर्गीय पारि‍वारि‍क जीवन के सभी मानवीयएवं भावनात्मक रूप एवं उनकी अभि‍व्यक्ति‍यां दि‍ख जाएंगी. माँ से आदि‍म कि‍स्म का गहरा लगावछल और बेईमानी सेपराजि‍त एक पि‍ता का दर्द एक सुलगते अंगार की तरह जीवन भर अपने सीने में दबाए और इस कारण भगवान से भी खफ़ा औरउसके प्रति अनास्था के कारण मंदि‍र के बाहर बैठे अमि‍ताभ का जि‍द्दी स्वभाव उनके खुरदरे चेहरे और भारी आवाज की हर लकीरऔर हर परत से बयां हो जाता है. तनावघुटनजज्बातों की कश्मकशआत्मालापवसूल पर अडि‍ग चरि‍त्र को जीता उनका हरकि‍रदार खरा बन जाता है. उसका गुस्सा केवल व्यवस्था से ही नहीं, भगवान की सत्ता से भी है. लेकिन इसी अमिताभ की प्रतिभा हास्य और प्रेम के रूपों में भी अद्वितीय कलाकारी का नमूना पेश करती है.
कोलकाता के बर्ड एंड कं. नामक एक शिपिंग कंपनी की एक नौकरी छोड़कर मुंबई में हीरो बनने आए जिस आदमी की आवाज को भद्दी और लंबाई को बाँस जैसी कहकर फिल्म निर्माताओं ने तिरस्कृत किया, कौन जानता था कि वही एक दिन इस मायानगरी का कभी अस्त न होने वाला सुपरस्टार बन जाएगा. उसी की तूती बोलेगी. उसी आवाज की दीवानी पीढ़ियाँ हो जाएंगी. क्या आप जानते हैं सत्यजीत रॉय की फिल्म शतरंज के खिलाड़ी तथा मृणाल सेन की फिल्म भुवनसोम के वायस नेरेटर अमिताभ बच्चन ही थे. अभी 2005 में Luc Jacquet निर्देशित एक फ्रेंच डाक्यूमेंटरी फिल्म मार्च ऑफ पेंग्विन्स में भी उनकी आवाज का इस्तेमाल किया गया. इस वृत्तचित्र को आस्कर पुरस्कार मिला.  
अमि‍ताभ ने हिंदी सि‍नेमा के कई बने-बनाए सांचों को तोड़ा. जैसे उन्होंने पहली बार मुख्यधारा के सुपर स्टार को उसके हास्य केसाथ जोड़ा. इस थीम पर बनी चुपके-चुपकेडॉनअमर अकबर एंथोनीदो और दो पांच, नमक हलाल जैसी फि‍ल्में अभि‍नय केइस नाटकीय रूपांतरण को चरि‍तार्थ करती हैं. इसी प्रकार अमि‍ताभ ने नायि‍का के साथ रोमांस के फार्मूला सि‍द्धांतों को भी तोड़ा. वेपहली बार उस भाव के साथ अपनी नायि‍काओं से मुख़ाति‍ब हुए जि‍सका इंतजार हिंदी सि‍नेमा की नायि‍का मोतीलालदि‍लीपकुमार आदि के जमाने से कर रही थी. जीतेंद्रराजेंद्र कुमारशशि कपूर जैसे अभि‍नेताओं ने तो अपना ज्यादा समय नायि‍काओं सेअभि‍सार या उनके आगे-पीछे कल्लोल करने में खर्च कि‍या. नायि‍काएं इसके बावजूद उन्हें एकदम दयनीय रूप से भोला समझतीरहीं और ऊपर से नाज-नखरे दि‍खाकर उन्हें रुलाती-तड़पाती रहीं. अमि‍ताभ अपनी कि‍सी भी नायि‍का का दि‍ल जीतने के लि‍ए नतो कभी पानी की टंकी पर चढ़े और  ही दि‍ल टूटने पर आरा मशीन पर कटने के लि‍ए समाधि लगाकर बैठे. तो एक खास प्रकारके पौरुषेय प्रेम का आवि‍र्भाव अमि‍ताभ के एंग्री यंगमैन के अवतार के साथ-साथ होता है. एक धीरोद्दात नायक. इसकी तफ़सील मेंजाने की जरूरत नहीं.
अमि‍ताभ ने अतीत के रि‍कॉर्ड तो तोड़ ही डाले और इस दि‍ग्वि‍जय अभि‍यान के दौरान उन्होंने  केवल सि‍नेमा बल्कि इस उत्तर-आधुनि‍क समय के तमाम क्षेत्रों में जो नया रच दि‍या वह भवि‍ष्य के लि‍ए भी अप्रति‍म मानक बन गए हैं. यह अमि‍ताभ काव्यक्ति‍त्व है या उनका नक्षत्र कि वे जि‍स चीज को हाथ लगा देते हैं वह शि‍खर छू लेता है. उसके बाद कोई ऊँचाई नहीं बचती. कौनबनेगा करोड़पतिजि‍से मीडि‍या शास्त्र में रि‍यल्टी शो कहा जाता हैकी बेजोड़ सफलता की वज़ह अमि‍ताभ ही थे. यही वह मोड़ हैजहां से अमि‍ताभ बाजार के सबसे महंगे ब्रांड बन जाते हैं. उनकी यह भूमि‍का उनके नायकों के वि‍परीत थी. अब अमि‍ताभ बड़े पर्देके अलावा छोटे पर्दे पर वि‍लासि‍ता के उत्पाद लेकर उपस्थि‍त था. अब उसके चेहरे पर व्यवस्था के खि‍लाफ क्रोध की कोई भीशि‍कन शेष नहीं थी. बल्कि अब उसका वही चेहरा पूँजी के प्रकाश में नहाकर दमकने लगा था. वे जमाने के रंग में इस कदर रंगतेचले गए कि व्यावसायि‍कता को मंत्र मानने के सि‍वा सब कुछ भुलाते रहे. वि‍ज्ञापन की दुनि‍या में चाहें अगर तो अभि‍नय सम्राटदि‍लीप कुमारइंडि‍यन ग्रेगरी पैक देव आनंदराजेश खन्ना जैसे चोटी के सि‍तारे भी  सकते थे. लेकि‍न शायद उनके वसूलफि‍ल्मी पर्दे पर नि‍भाए गए वसूलों से ज्यादा ठोस एवं पक्के हैं. देव आनंद जब सक्रि‍य दि‍खते हैं तो साफ दि‍खता है कि वे कि‍सीकृति की आत्मा को ढूँढ़ रहे हैं. वे फि‍ल्म नि‍र्माण कला से प्रेरि‍त दि‍खते हैं. कुछ योगदान करते हैं. वे शुद्ध पेशेवर कलाकर की तरहअंधाधुंध अपनी बाजारू कीमत वसूलते नहीं दि‍खते.
अमिताभ को अपनी कीमत का अंदाज़ा रहा है. विकीपीडिया के अनुसार शोले ने 2,36,45,00,000 रुपये यानी 60 मिलियन डॉलर की रिकार्डतोड़ आमदनी की थी. 1999 में बी.बी.सी. ने शोले को फिल्म आफ दि मिलेनियमघोषित किया. बॉलीवुड के के इस शंहशाह की बेशुमार कामयाबी और शोहरत को देखकर फ्रांसीसी फिल्म डायरेक्टर फ्रांक्वा त्रूफा ने अमिताभ को One-man Industry कहा था.
कुछ आलोचक अमि‍ताभ के फि‍ल्मी चरि‍त्रों से बनी उनकी महानायक यामिलेनि‍यम स्टार (जि‍से अमि‍ताभ लगातार खारि‍ज करते हैंकी छवि को महत्वनहीं देते हैं. वे कहते हैं कि यह सारा घटनाक्रम एक संयोग है जि‍समें अमि‍ताभ कोअच्छी फि‍ल्में मि‍लींउनकी पटकथाएं समकालीन सामाजि‍क परि‍स्थि‍ति‍यों कोउकेरने में समर्थ थींबहुत सार्थक संवाद लि‍खे गएबड़े नि‍र्देशक और बड़े बैनरमि‍ले इत्यादि‍. उनकी शुरूआत ही ख्वाज़ा अहमद अब्बास जैसे एक बड़े लेखक द्वरा निर्देशित फिल्म सात हिंदुस्तानी से हुई। इसके बाद प्रकाश मेहरा, मनमोहन देसाई जैसे दिग्गज डायरेक्टर के अलावा सलीम-जावेद की जोड़ी अमिताभ को मिली जिनकी मेहनत और हुनर ने अमिताभ को लंबी रेस का घोड़ा बना दिया. साथ हीअमि‍ताभ एक कुलीन घराने से ताल्लुक रखने वाले उस जमाने के प्रसि‍द्ध प्रोफेसर,कवि एवं सांसद डॉ.हरि‍वंशराय बच्चन के सुपुत्र थे. अपने मातापि‍ता से वि‍रासत मेंमि‍ली प्रति‍भालगनअनुशासननि‍ष्ठासमर्पण के संस्कार के अलावा उन्हें नेहरू परि‍वार का संरक्षण भी प्राप्त था. 
इसी प्रकार कुछ समीक्षक यह भी कहते हैं कि फि‍ल्मों तक तो फि‍र भी ठीक था लेकि‍न इतने बड़े पि‍ता (जि‍न्हें अमि‍ताभ अपने सेसहस्र गुना बड़ा मानते हैं-यहाँ तक कि दो-तीन साल पहले जब उन्हें लंदन में किसी विश्विद्यालय द्वारा प्रति‍ष्ठि‍त डॉक्टरेट कीउपाधि से अलंकृत कि‍या जा रहा था तो वे कुछ लज्जालु से दि‍खने लगे थे - पूछने पर कहा कि उन्हें डॉ.बच्चन  कहा जाएक्योंकि डॉ.बच्चन एक ही है जो वे नहीं हो सकतेके सुपुत्र का तेल-साबुन-चॉकलेट आदि का व्यावसायि‍क वि‍ज्ञापन करना कुछहजम नहीं होता. उनके कॉमर्शियल एंडोरश्मेंट ज्यादातर शहरी मध्यवर्ग के उपभोग की वस्तुओं पर केंद्रित हैं जो सीधे-सीधे मुनाफा के अर्थशास्त्र से जुड़ते हैं। वे कहते हैं कि अमि‍ताभ बच्चन को ब्रांड एंबेसडर कहलाना पसंद है लेकि‍न डॉ.बच्चन कहलाना नहीं.इसी द्वंद्वात्मकता के बीच एक व्यावसायि‍क अमि‍ताभ बच्चन छि‍पा है जो अपने सेलेब्रि‍टी का पाई-पाई वसूलना जानता है. वह एबीसीएल के घाटे को पूरा करने वाला एक मध्यवर्गीय इंसान सरीखा अमिताभ है जिसे केनरा बैंक के कर्ज़ को चुकता कर अपने घर प्रतीक्षा को गिरवीमुक्त करना है. सन् 2000 में अमिताभ ने फिर एक बार भारतीय मनोरंजन जगत पर अपनी छाप-छवि छोड़ने में कामयाबी हासिल की. यह ब्रिटेन के एक क्विज प्रोग्राम का भारतीय संस्करण केबीसी यानी कौन बनेगा करोड़पति का प्रसारण था जिसे अमिताभ की नायाब प्रस्तुति ने टीआरपी की नई बुलंदियों पर पहुँचा दिया.
उन दिनों दिल्ली की सारी सड़कें खाली हो जाती थीं जब टी.वी. पर कौन बनेगा करोड़पति शुरू हो जाता था. यह अमिताभ के अपनी शैली में दर्शकों को नमस्कार, आदाब़, सतश्री अकाल कहने का समय होता था जिससे देश के सभी माता-पिता, बहन और भाई संबोधित होना चाहते थे. महानायक की एक अजीब सी पकड़ जिसकी गिरफ्त में न आना एक असंभव सत्य था. सुधीश पचौरी नेजनसत्ता में उन्हीं दिनों लिखा था कि छोटे परदे पर जो करिश्मा अमिताभ ने किया है वह सिर्फ़ अमिताभ ही कर सकते थे. माताजी नमस्कार, पिताजी नमस्कार को हिंदी में जिस ढंग से कहा जाना चाहिए वह केवल कविवर हरिवंशराय बच्चन के सुपुत्र अमिताभ की हिंदी ही कर सकती थी. यह केवल अमिताभ बच्चन से ही संभव था. अमिताभ के मुँह से हिंदी पुन:-पुन: संस्कारित होती एक आकर्षक और ज़हीन जुबान बनती चली जाती है. उनकी हिंदी में संस्कार और बाजार दोनों का अद्भुत साम्य और विस्तार है. अमिताभ की हिंदी का जादू दुर्निवार है.... इर्रेजेस्टिबल.
इसे अमिताभ का दूसरा अवतार कहा जाता है. यह उनके कॅरियर और असली ज़िंदगी दोनों के कष्टों से उबरने का समय था. यहाँ तक आते-आते वे 58 साल की बुढ़ाती उम्र में पहुँच चुके थे. सोचिए फिल्मी परदे का यह बिग बी असली ज़िंदगी में भी कितना साहसी हो चुका था कि किसी तूफान से उसके अंदर का मर्द परास्त नहीं हो सकता था. उसके एक फिल्मी किरदार ने सच ही कहा था – अभी तक आपने जेल की जंजीरें देखीं हैं जेलर साहब.....कालिया के हिम्मत का फौलाद नहीं देखा जेलर साहब...........
अमिताभ की प्रोफेसनल ऊर्जा भी गज़ब की है. वे कहते हैं कि  जब तक शरीर में दमहै काम करता रहूँगा या जब तक काम मि‍लता रहेगा काम करता रहूँगा जबकि कामवे इस कदर करना चाहते हैं कि शरीर का दम छूटने लगे. अखबारों की रि‍पोर्ट मानेंतो वे जरूरत से ज्यादा काम करने या भागदौड़ से थकने के कारण ही कुछ सालगंभीर रूप से बीमार हो गए थे. अभी कल यानी 16 अप्रैल 2011 के डी.एन.ए., मुंबई संस्करण में एक ख़बर मैंने ट्रैक की कि अमिताभ फिर बहुत प्रोफेशनल हो रहे हैं और बहुत ज्यादा काम कर रहे हैं. रिपोर्टर ने लिखा है कि वे अपने व्यस्त शूटिंग कार्यक्रमों के कारण बहुत भागदौड़ और हवाई यात्राएं कर रहे हैं. अंग्रेजी में इसे जेटलैग और चॉक-ए-ब्लॉक शेड्यूल कहा जाता है. वे कभी कि‍सी सामाजि‍क या राहत के कार्यों मेंहि‍स्सा लेते हुए नहीं देखे जाते हैं. कभी वे पुणे और बाराबंकी में कि‍सान बनकरजमीन लेकर वि‍वाद में फँस जाते हैं तो कभी उनके आयकर को लेकर हंगामा खड़ाहो जाता है. बुरी तरह बीमार हो जाते हैं तो सुर्खि‍यों मेंवि‍स्तर से उठकर कुछ महीनेआराम करने के बाद धुआँधार शूटिंग में व्यस्त हो जाते हैं तो सुर्खि‍यों में.  
जे.एन.यू की छात्रा सुष्मिता दासगुप्ता ने अमिताभ पर एम.फिल. का पर्चा Social Construction of A Hero: Images by Amitabh Bachchan और बाद में अपनी पी.एच.डी. का शोध-प्रबंध Sociology of Hindi Commercial Cinema: A Study of Amitabh Bachchan विषय पर पूरा किया. इसे पेंग्विन बुक्स ने Amitabh – The Making of A Super Star नाम से पुस्तकाकार छापा है. सुष्मिता ने बताया है कि शुरू-शुरू में अमिताभ जी उन्हें इस विषय पर पी.एच.डी. करने से यह कहते हुए रोकते रहे कि उनके पर शोध का कोई अकादमिक मूल्य या महत्व नहीं होगा. लेकिन एम.फिल डिजर्टेशन पढ़ने के बाद उन्हें अच्छा लगा और आगे के शोध के दौरान अमिताभ जी के आतिथेय में उन्हें पूरे सात दिन मुंबई स्थित उनके घर प्रतीक्षा में ठहरने का अविस्मरणीय अवसर भी मिला था.
इतनी हैरतअंगेज कामयाबियों के बावज़ूद अमिताभ बच्चन की विनम्रता और अडिग अनुशासन अपने आपमें एक अध्याय है. प्रशस्तियों से अमिताभ की दूरी उनकी भव्यता को असाधारण बनाती है. यदि आप उनका चर्चित ब्लॉग बिगअड्डा विजिट करें तो आपको उसके होमपेज पर ही डॉ.बच्चन द्वारा यीट्स की एक सुंदर और जीवन में उतारने वाली कविता का हिंदी अनुवाद पढ़ने को मिलेगा. अमिताभ बच्चन को पिता की पसंद की कविता कितनी पसंद है. शायद पिता-पुत्र की इस महान जोड़ी की सबसे निराली अदा उनकी विनम्रता में छिपी है जो उन्हें अभेद्य बना देती है. वे जब ख़ुद समीक्षा के लिए प्रस्तुत हों तो कौन उन्हें हरा सकता है. देखिए यह कविता:
मैं आमंत्रित करता हूँ उनको जो मुझको बेटा कहते
पोता या परपोता कहते,
चाचा और चाचियों को भी,
ताऊ और ताइयों को भी,
जो कुछ मैंने किया उसे वे जांचे-परखे-
उसको मैंने शब्दों में रख दिया सामने-
क्या मैंने अपने बुज़ुर्गवारों के वारिस नुत्फे को
शर्मिंदा या बर्बाद किया है?
जिन्हें मृत्यु ने दृष्टि पारदर्शी दे रक्खी
वे ही जाँच-परख कर सकते.
अधिकारी मैं नहीं
कि अपने पर निर्णय दूँ,
लेकिन मैं संतुष्ट नहीं हूँ.
डब्ल्यु.बी.ईट्सअनुवाद: डॉ.हरिवंशराय बच्चन 
इस लेख को इस मूल लिंक पर भी पढ़ा जा सकता हूँ 
http://samalochan.blogspot.in/2011/04/blog-post_18.html


2/26/15

सरकार, रंगमंच और साँस्कृतिक नीति (बंसी कौल का मंतव्य)

प्रस्तुत लेख वरिष्ठ रंगकर्मी  बंसी  कौल के  साक्षात्कार का लेख  रूप में प्रस्तुति है. यह साक्षात्कार  राष्ट्रीय नाट्य विद्यायल में  मुन्ना कुमार पाण्डेय औr अमितेश द्वारा वर्ष 2013 में लिया गया था और यह समकालीन रंगमंच के दूसरे अंक में प्रकशित हुआ था.  इस लेख को छापने के लिए  दोनों साक्षात्कारकर्ता  संपादक समकालीन रंगमंच के आभारी हैं. पत्रिका में यह लेख भिन्न शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, यहाँ  हमने अपने हिसाब से शीर्षक तय किया है.- मॉडरेटर 
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मुझे नहीं मालूम कि इंडियन गवर्नमेंट की कोई कल्चरर पालिसी है या नहीं, या इस तरह की पालिसी हो इस पर कोई विचार किया गया है कि क्या होना चाहिए? कल्चरर प्रोग्राम जरुर है. बीच बीच में  कुछ इस तरह के लोग आते रहें है जिनको लगता था की कल्चर की रूप रेखा बने, जैसे एक ज़माने में जोनल सेंटर को लेकर उस वक्त एक आईडिया था   कि जितनी भी लोककलाएं है उनका आपस में आदान प्रदान हो.  देश एक दूसरे को अगर जानता था तो संसद की वजह से जनता था क्योंकि जगह जगह से सांसद आते थे और एक दूसरे को जानते थे और जो लिटरेट लोग थे उन्हें अंदाजा था की फलाने राज्य में क्या हो रहा है . लेकिन वह के जो कलाकार थे जैसे मान लीजिये मणिपुर के जो लोक कलाकार थे वे नहीं जानते थे कि कश्मीर में क्या हो रहा है ? कश्मीर में कौन कौन सी कलाएं है ? तो तीन तरह की चीजें होती है समाज में जो देश की जोड़ती है एक तो पोलिटिकली देश जुड़ता है जैसे की पार्लियामेंट ,एक एजुकेशन से जुड़ता है जिससे लिट्रेसी कितनी है तीसरा जुडाव जो होता है जिसे हम इमोशनल जुडाव कहते है वह आर्ट से ही होता है यह उतना ही इम्पोर्टेंट है जितना एजुकेशन है ये उतना ही इम्पोर्टेंट है जितना की पोलिटिकल है.  तो किसी हद तक वह अच्छा था  हर जोन के अन्दर अलग अलग स्टेट्स थी, कही ओवरलैपिंग थी तो बहुत सारे फेस्टिवल्स होते थे, आदान प्रदान होता था एक दूसरे को लोग जानने लगे थे और इसे भी करीब २० एक साल हो गए लेकिन होता क्या है कि जब भी आप कोई प्रोग्राम करते या कोई भी आईडिया लेकर आते है उसके बाद फिर जो बदलाव आता  है क्योंकि समाज हमेशा बदलता रहता है नयी इकोनमी आती रहती है,  नयी चीजे समाज में होती रहती है तो उसका बदलाव भी उसी तरह जरुरी है.  होता क्या है सरकार कभी कभी इंटेंशनली चीजे अच्छी तो करती है लेकिन वो वैसे ही फिर पुराने ढर्रे पर चलती रहती  है जाहिर है की समाज बदला है और उनके करने के तौर तरीके नहीं बदले है तो फिर  वह बहुत सतही लगने लगता है. जैसे मान लीजिये इंडस्ट्री में, कि आज मार्किट बदल रहा है तो नयी स्ट्रेटजी अपनाती है नए प्रोडक्ट तैयार करते हैं.  उनका मूलतः काम होता है कि उन्हें धंधा करना है, उन्हें पैसा कमाना है तो वो रोज स्ट्रेटजी बदलती है जो कि आर्ट्स में भी होना चाहिए जो किन्ही कारणों से नहीं हो पा रहा है. चाहे वो ट्रेनिंग इंस्टिट्यूटस हो चाहे वो  कल्चरर संस्थाए हो.
 एक ज़माने में पंडित नेहरु जब प्रधानमंत्री थे  तो शायद उन्हें लगा था की एकादमी होनी चाहिए जो आर्ट्स को संरक्षण दे सके फिर ये तीन अकादमी बनी, फिर स्टेट गवर्नमेंट्स ने अपने अपने एकादमी बनाये तो कुछ दिन तक तो वे ठीक ठाक चला ,चाहे वो ओर्गानायिजेशन थे, अवार्ड्स थे, फेस्टिवल्स थे तो कुछ दिनों तक तो वो चला फिर बाद में वो एक जगह आकर रुक गया.  लगातार चीजो का दुबारा से मुआयना होना चाहिए जरुरत क्या है कि हर समय  उस पर ध्यान देना चाहिए.  मान लीजिये जोनल सेंटरों में ये  आदान प्रदान हो गया और यंग लोग जितने भी यंग परफोरमर्स है इंटरनेट पर एक दूसरे से बात करते है अब एस०एम०एस० वाली जेनरेशन है पूरी तरह से लेकिन अब क्या जरुरत है उसकी आदान प्रदान की इस पर बात करनी चाहिए.  क्युंकि पहले जितनी भी ये आर्ट्स थी ये प्रदर्शनकारी कलाएं  थी ये एक वे लाइफ का हिस्सा थी मन लीजिये होली थी तो होली में जो नाच होता था वो प्रदर्शनकारी कला नहीं थी. वो एक हम अपने लिए करते थे, अगर हम गाँव में 10 लोग नाच रहे है तो देखने वाले कम होते थे करने वाले ज्यादा होते थे इसीलिए क्योंकि वो जीवन प्रक्रिया का हिस्सा था लेकिन अब वह ख़तम हो गया है करने वाले अलग हो गए है देखने वाले अलग हो गए है. जब देखने वाले अलग हो जाते है और करने वाले अलग हो जाते है तो जाहिर है रूल्स बदलते है. जब आप प्रदर्शनकारी कला बनते है तब उसकी ट्रेनिंग की जरुरत है, तब उसमे प्रजेंटेशन की जरुरत है, तब उसमे टेक्नोलोजी आएगी कि उसका कैसे इस्तेमाल करे. वो नहीं हुआ तो ये जो विरोधाभास रहता है हमारे पूरे सोच में जिस वजह से हम न इधर के रहते है न उधर के वही हुआ है. जैसे २६ जनवरी में,   एक समय में आदिवासी इस देश का कभी भी दिल्ली आता था तो वो २६ जनवरी में ही आता था उसको वही एक मौका मिलता था दिल्ली देखने का, और तब वह आदिवासी इसलिए नहीं आता था की उनको परफोर्म करना है.  उनका रहन सहन  उनके फॉर्म्स है जो झांकियों के माध्यम से दिखाया जाता था.  उन्होंने आना बंद कर दिया या वे परफोरमर नहीं बन पाए, वो ख़त्म हुए या नए अर्बन लोगो ने उसे टेक ओवर कर लिया.
दूसरा ये भी देखना है की जब से ये लिट्रेसी मिशन ऑफ़ इण्डिया शुरू हुआ और जाहिर है लिट्रेसी रेट बढ़ा पुरे देश में तो उसे भी कल्चर से जोड़ना जरुरी है . जब आदमी पढ़ लिख गया तो जाहिर है उसकी जरूरते, सोच विचार भी बदल गया जो जाहिर है आर्ट्स भी बदलने चाहिए.   हमने ये तो कर दिया 60% लिट्रेसी रेट कर दिया है लेकिन वो तो 60-70% तक का है लेकिन 2013 में एक और ऐसे जमात पैदा हुयी है जो स्कूल छोड़ रही है स्कूल जा नहीं रही है बीच बीच में इस तरह से ये लगातार होनी चाहिए आप ये नहीं कह सकते की आपने एक बार शुरू कर दिया तो आपको उस तरफ देखने की जरुरत नहीं है आपको हर बार ही वापस लौट कर जाना होगा वापस उसकी प्रोसेस में जाना पड़ेगा समय की जरूरतों के हिसाब से अगर आप नहीं करते पाते तब एक टाइम पर जाकर ये सब ठप हो जाते है और उनका कोई स्वरुप नहीं रहता ,ये प्रोब्लम हमारे यहाँ बहुत हुयी है इस देश में.   
 अकादमियों का सिर्फ़ ये हो गया है कि साल में 5 फेस्टिवल्स करने है वो 5 करते है . आपको 10 फेस्टिवल्स करने है वो 10 फेस्टिवल्स भी करते है. लेकिन हम उस तरह से नहीं देख रहे ही जैसे एक ज़माने में पूरे भारत में हजारो मेंले लगते उसमें कल्चर भी थे वो कल्चर ही है न हम सिर्फ कल्चर को आर्ट्स की नजर से न देखे ओवरआल जो संस्कृति होती है लाइफस्टाइल होती है उसे देखेंपशु मेले तो हमारे बदल गए हैं क्युकी पशु मेले वालो को ये समझ आ गया है की पशु मेले में पशु बेचने का और क्या तरीका हो सकता है ? लेकिन हमारी अर्बन जो सोच थी आर्ट्स को लेकर वो नहीं बदली है वो वही की वही है जाहिर है आपको ठहराव लगता है लगता है सबकुछ रुक गया है और सब कुछ रुक इसलिए गया है क्युकी आप उसे कंपटीट नयी इकोनमी से कर रहे है नयी इकोनमी अपने तरह का आर्ट पैदा कर रही है उस इकोनमी को जरुरत है उस तरह का आर्ट उसको अपना प्रोडक्ट बेचना है हम जैसे लोग जो भी अच्छा बुरा करते है तो मुझे समझ नहीं आ रहा है आज के दिन मुझे खुद को समझ में नहीं आ रहा है की मेरी जरुरत क्या है ? मेरी जरुरत वाकई में है भी की नहीं है मुझे नहीं लगता की मेरी जरुरत है.   आप जैसे चंद दोस्त आये मैंने कोई प्ले कर दिया, मैंने कोई रोल कर दिया और बाहर जाकर आपने वाह-वाह भी कर दिया या कह दिया बहुत फूहड़ है घटिया है, तो ये कुछ चंद लोगों तक सिमट के रह गया है तो जाहिर है आप उसे कल्चरर पालिसी कहे या कल्चरर प्रोग्राम कहे और ओवरआल कल्चरर पालिसी मुझे नहीं लगता की हमारे देश में कही है और मुझे लगता है की होनी भी नहीं चाहिए. जितना कल्चरर पालिसी बनाते है सरकारों में कि हम ये ये करेंगे तो वो कल्चरर प्रोग्रामिंग होगी, वो कल्चरर कैलेण्डर होगा, कैलेण्डर कल्चरर पालिसी नहीं होता है.
 अगर आप कल्चरर पालिसी बनायेंगे तब भी सांस्कृतिक शुन्यता रहेगी. ज्यादा से ज्यादा प्रोग्राम बढ़ेंगे ,आप ये कह देंगे की साहब थियेटर के 10 के बदले 20 फेस्टिवल हो लेकिन अगर उसके पीछे कोई विचार नहीं होगा जो कि आप देख रहे होंगे जैसे आप टेलीविज़न पर दूसरी चीजे हो रही है जैसे वो शोज होते हैं बच्चों के.  वो नयी इकोनमी मार्किट में अपने लिए पैदा की है क्योंकि उनको लगता है उनको जरुरत है.  उनको अपना प्रोडक्ट बेचना है उस प्रोडक्ट को बेचने के लिए वो अपनी कला उत्पन्न करते हैं.  ये जो नयी इकोनमी आर्ट्स फॉर्म पैदा कर रही है उसके पैरलर दुसरे तरह के आर्ट्स फॉर्म, मैं नहीं कह रहा हूँ की वो बहुत एबस्ट्रेक्ट हो बहुत ही ना समझने वाली हो, पैदा होनी चाहिये.  
 हम उस सदी में रह रहे है जहां पर एक दूसरे तक पहुंचना बहुत आसान है चाहे वो एसएमएस हो, इंटरनेट हो, टेक्नोलोजी हो  लेकिन सबसे ज्यादा अभाव इसी सदी में है.टेक्नोलोजी ने एक दूसरे को इतना नजदीक कर दिया है लेकिन इसी टेक्नोलोजी ने आपको दूर भी कर दिया है. २१वीं सदी में रहकर अगर सबसे कटा हुआ इन्सान अगर कहीं है तो वो इस सदी में है पहले ऐसा शायद नहीं होता था कि अगर कबीर का गीत किसी जगह होता था तो पता नहीं कैसे दूसरी जगह पहुच जाता था. तब तो ऐसा कुछ नहीं था ना टेलीविजन था, ना कुछ था. यात्राओं के जरिये पहूंचता था.  लेकिन आज  सबकुछ होते हुए जो ये विडम्बना है क्यों नहीं पहुच रही सबके पास ?
 पहले हिंदुस्तान टाइम्स है या नवभारत टाइम्स है. पहले अगर एक जगह प्ले होता था या कुछ भी होता था तो ये खबर सब जगह पहुंच जाती थी, देर से ही सही. क्योंकि इनका एक पेज होता था जो राष्ट्रीय होता था अब चुंकि मालिकों ने कहा कि नहीं साहब मुझे तो अब एडिशन चाहिए. अगर आप हरियाणा में जायेंगे तो 12 एडिशन होंगे किसी अख़बार के तो वो उसी मोहल्ले तक सीमित है. अगर वह उस मोहल्ले तक सीमित है तो जाहिर है उस मोहल्ले वाले ही जानेगे की मैंने क्या किया या उस मोहल्ले के लोगो ने क्या किया लेकिन उस दुसरे मोहल्ले के लोग उस खबर को नहीं जानेगे.  मुझे लगता है की ये भी एक मार्किट स्ट्रेटजी है क्योंकि उनको ऐड्स कलेक्ट करने है.  आपकी पहुंच पूरे भारत में नहीं है उस मोहल्ले तक है. ये हमें भी मालूम है करने वाले को भी और लिखने वाले को थोडा छेड़ दो वो भी रोना रोयेगा यार मैं तो मालिकों के लिए काम कर रहा हूँ , मालिक उसे कहता है न की भाई तुमको इतनी तनख्वाह मिलेगी जिस दिन जगह होगी तभी लिखोगे, जिस दिन बहुत अच्छा आर्टिकल भी लिखा होगा तो बिज़नस मैनेजर आएगा कहेगा भाई साहब छोडिये ये सब काट दो,इतनी जगह बची है उसमे छाप दूंगा मैं आपको .
संगीत नाटक अकादमी में हर बार क्या होता रहा, जब भी  सेक्रेटरी बदले तो प्राथमिकता बदल गई ..इसीलिए ये भी एक सवाल पैदा होने लगा है आजकल और इसको ब्यूरोक्रेसी बहुत उससे कह रही है की क्या कलाकार कोई एडमिनिस्ट्रेटर हो सकता है कि नहीं? हम कहते है हो सकते हैं. लेकिन उनके पास फिर एक जबाब है की साहब जहां जहां कला का एडमिनिस्ट्रेटर हुआ वह वो उतना ही पतनशील हुआ.   किसी जगह एक डांसर सेक्रेट्री हुआ तो जाहिर है उन्होंने  कहा कि   डांस के आस पास ही सारा काम हो, अगर थोडा बजट दूसरी कलाओं का भी है तो वो दे दो. इसीलिए आपने ब्यूरोक्रेसी का पॉइंट जो है प्रूव कर दिया यही जोनल सेंटर्स में हुआ है आपको हैरानी होगी एक  जब जोनल सेंटर खुल रहे थे तब ये बात हुयी थी तब वो प्रियाम्बल में भी लिख था की शुरू में इसको कुछ वर्षों तक इसको हैंडल ब्यूरोक्रेट्स करे और आने वाले वर्षों में इसका हेड आर्टिस्ट ही करे लेकिन वैसा हुआ नहीं पड़ा रहता है २० साल तक. आईएएस या नॉन आईएएस या दूसरी सर्विसेस के लोग उसको हेड करते रहे जबकि एक आईएएस किसी डिपार्टमेंट में 70हजार करोर का बजट होता है लेकिन यहाँ तो सिर्फ 2 करोड़ के लिए आना चाहता है 70 हजार में नहीं जाना चाहता क्युकी 70हजार में वो तय हुआ होता है की ये तुम्हारा एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट का 70हजार करोर है इसमें 10 हजार करोड़ उस डिपार्टमेंट में जायेगा उसमे कुछ चेक साइन होता है लेकिन यहाँ 2 करोर में फ्रीडम है आप चाहे जहा उसको खर्च करे आपको फाइनेंस के पास नहीं जाना की साहब यहाँ से वहा टेक्सी ले रहा हूं. इसीलिए कभी 4 हजार करोड़ की बड़ी फ्रीडम है बजाय 7 हजार करोड़ की जहा आप दस्तखतकार है जहा आप सिर्फ सिग्नेचर करते है. कभी कभी वही ब्यूरोक्रेट्स कहता है कि मैं तो 6 हजार करोड़ का डिपार्टमेंट सँभालता हूँ  तो हम कहते है की वह तो आप सिर्फ साइन करते थे क्युकी सिर्फ चेक जाना है आपके पास आया 500 करोड़ इस डिपार्टमेंट को 500 करोड़ उस डिपार्टमेंट को. यहाँ तो .. ये ऐसी फ्रीडम है   जैसे ,मान लीजिये मुझे इवेंट करना है वह मुझे सीओ बताता है आपको कैसे करना है यहाँ से यहाँ जायेंगे उसको बजट दिखाना है लेकिन वह तो बजट हटा है कभी कभी 2-2 करोड़ वो मई उतना एन्जॉय नहीं करता जितना मैं अपना करता हूं जिसका बजट होता है 30000/- वहा जो फ्रीडम है अपना थियेटर करने में वो मुझे वहां नहीं मिलती है.  
थियेटर के सारे काम एनएसडी का  नहीं था. ये फेस्टिवल करना उनका काम था  अकादमिक इंस्टीटयूट है अकादमिक काम करें. लेकिन एक ज़माने में बजाज साहब को लगा वो जानते थे हम एनएसडी में नेशनल फेस्टिवल करते है तो उनको बजट उठाकर दे दिया हकीकत में वह बजट जाना चाहिए था संगीत नाटक अकादमी कोलेकिन उन्होंने भी कहा ठीक है पिंड छुटा, अब जब वहा पिंड छुटा तो थियेटर का मामला धरातल में चला गया, मिनिस्ट्रीज को भी लगा कि थियेटर का कारोबार जो भी थियेटर का जो भी  उत्थान या जो भी होना है वो यही हो जायेगा.  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थान  में  जिस जिस तरह के लोग आयंगे जिस जिस जगह से उनका अपना विजन होगा आप उससे सहमत हो सकते है  असहमत भी हो सकते है.  जाहिर है की कोई व्यक्ति विशेष आया उसे लगा कि ऐसा थिएटर होना चाहिए तो वैसा ही होगा. और मुझे नहीं लगता की उनका इंटरेस्ट इतना है कि इसका पुरे हिंदी प्रदेश पर क्या  असर हुआ है  यह देखें
राज्यों का मामला ये है कि मध्य प्रदेश में एक ज़माने में अर्जुन सिंह थे, मतलब देखिये अंत में कोई भी राजनेता अगर कुछ करना चाहता है तो उसमें पहले वह अपना फायदा भी देखता है. ऐसा नहीं है कि उसका आर्ट के प्रति प्रेम होता है,  हो सकता है मिसेज गाँधी को खुश करने के लिए भारत भवन खोला. क्योंकिकि नेहरु परिवार में एक वीकनेस थी इन संस्थानों  कि और जाहिर है उससे दूसरी तरह की साख उनकी बनी और कुछ अच्छा काम हुआ और वह अफसर भी ऐसा आया उसने भी साख कायम की और फिर वह फेस्टिवल्स चलते रहते हैदूसरी सरकार आई वह बीजेपी की तो लगा कि हमें भी कुछ करना चाहिए और कुछ होता है.  वहां के बाबू हावी होने लगे. मध्य प्रदेश में भी है ये प्रोब्लम कि वह बाबू तय करता है की क्या करना है, कौन गन्दा है और कौन अच्छा ग्रुप है.  अब जैसे  मध्य प्रदेश में क्या हुआ था कि जो उस वक्त भोपाल में कहते है की छर्रे अशोक वाजपेई जी के छर्रे थे वो इस वक्त पावरफुल हो गए है लेकिन उनकी अक्ल जो है नहीं बढ़ी है रहे वो छर्रे के छर्रे वो आपको कुछ होने नहीं दे रहे हैकरेंगे तो  हमहीं करेंगे. मध्य प्रदेश में तो ये स्थिति हो गयी है अब अगर लोकल जो स्वयंसेवी संस्थाए है अगर वो कुछ करती है तो अगर कुछ बड़ा करती है तो इससे छर्रों को बड़ी तकलीफ होती है की अरे ये इनका काम नहीं था ये तो हमारा काम था, वह भी एक कम्पटीशन चलता है.   
 दुसरे प्रदेशों में अगर आप बजट निकाले तो आप पाएंगे की दुसरे प्रदेशों में बजट अच्छे खासे हैं. लेकिन उनको इस तरह  के कुछ अधिकारी मिले नहीं,  अकादमी नहीं नहीं बनीयु.पी. का तो आपको मालूम ही है यु.पी.  में भारतेंदु नाट्य अकादमी खुला उसको भी रोज ही बंद करने पर तुले रहते है. संगीत नाटक अकादमी थी.  एक ज़माने में नागर जी(अमृतलाल नागर) वगैरह चेयरमेन हुआ करते थे उन दिनों बहुत काम हुआ.   एक ज़माने में सबसे अच्छा काम यु.पी.  में ही हुआ . चाहे वो कानपुर था लखनऊ था इलाहबाद था देहरादून था, रामपुर , बहराइच, गोंडा,हम इस इस जगहों पर जाते थे. उस वक्त जितने भी थियेटर में सक्रिय लोग थे हम आधे समय यु.पी.  में ही मिलते थे.   और संस्थाए भी बहुत सक्रिय थी दर्पण ने तो कितनी ब्रांचेज खोल रखी थी. रामपुर जैसे जगह पर उर्दू के लेखाक इक़बाल मजिग  वहां खूब थियेटर करते थेजैसे श्रीलाल शुक्ल जी वो थोड़े लेखक थे तो उसे सपोर्ट करते थे वो लखनऊ में एक जमाना था जब नागर जी , यशपाल जी और ये सब लोग शाम को रिहर्सल में आते थे अब नागर जी अगर रिहर्सल में आकर बैठेंगे तो थोडा असर तो पड़ता ही है न अरे यार नागर जी हमारे रिहल्सल में बैठे हैं वो अब नहीं हो रहा है.   
 अब ये हो गया है कि मध्य प्रदेश मे अगर खजुराहो महोत्सव करता है तो हमें भी करना चाहिए. हम आगरा फेस्टिवल करेंगे,  उड़ीसा जो कोणार्क फेस्टिवल कर रहा है,  इस तरह के महोत्सव शुरू होने लगे और थियेटर इसमें पिछड गया. दूसरा ये भी हुआ हिंदी बेल्ट का दुर्भाग्य भी है हिंदी बेल्ट के जितने यंग लोग निकले जो एनएसडी में आये मेरे ख्याल में अगर हम पूरी लिस्ट निकाले ड्रामा स्कूल के मुशिकल से एक्का दुक्का आयेंगे अब काम करने के लिए चुकी जब वो एनएसडी आता था उसको लगता था की अब मेरी रोजी रोटी अब यही है अब रोजी रोटी के जूझना बहुत जरुरी है वो उसको मिलता नहीं जो किसी भी यंग आदमी के साथ हो सकता है तो वो फिर यही घूमता था दिल्ली में देखिये हमलोग अपवाद है जो दिल्ली में रहके दिल्ली छोड़कर वापस गए हमारी तो मदर टंग भी नहीं थी हिंदी. हमारे लिए तो कर्म थी बढ़ गए हिंदी तो इसलिए हम वापस हम हिंदी इलाकों में चले गए लेकिन हम फिर लौटते है फिर वापस जाते है फिर लौटते है लेकिन हिंदी बेल्ट का कोई अपना वापस नहीं गया और जिस वजह से अगर कभी कोई वापस गए भी तब वापस लौटे जब वह सब कुछ बदल चुका है तो ये प्रोब्लम हिंदी बेल्ट में रही है कि अगर उस वक्त उनको स्टूडेंट्स को सपोर्ट मिलती तो वापस वह कुछ कर लेते.  एक लोकल पोलिटिक्स भी है कि एनएसडी वालों को नहीं लेना तो वही से स्टूडेंट्स निकले थे वही उसको हेड करेंगे.  हिंदी बेल्ट में अपनी जो पूरे देश भर की जो मेजर इकोनमी है हिंदी फिल्म  वो बनती कहां है बम्बई में. तो जाहिर है हिंदी का लड़का या लड़की कहा जायेगा. बम्बई ही जायेगा. अगर हिंदी फिल्म हिंदी बेल्ट में बन रही हो तो शायद थियेटर की भी स्थिति कुछ अलग होती   सीरियल्स बन रहे होते जहा से उसको थोडा बहुत जरिये मंच और तब वो हो नहीं पाया किन्ही कारणों से क्युकी मराठी में मराठी आदमी थियेटर भी करता है मराठी फिल्म में भी जाता है कन्नड़ या मलयालम या बांग्ला या तमिल या जितनी भी भाषाए है लेकिन आज भी टेलीविजन के जो सबसे ज्यादा टीवी सीरियल हिंदी में बनते है लेकिन बनते कहा है बम्बई में.
संस्कृति को आप पूरी इकोनोमिकली संस्कृति का हिस्सा नहीं बनाते है  तोउसका क्या  फायदा मिलेगा?   हमलोगों ने उस इकोनमी का हिस्सा नहीं बनाया. जाहिर है की फसल कटी और फसल काटने के बाद नाच करने लगे, वो संस्कृति थी तो वो नहीं हो पाया. एक ज़माने   जितनी भी थियेटर कम्पनियाँ थी, हिंदी बेल्ट में सबसे ज्यादा पारसी कम्पनियाँ ही थी, वो मेलों में जाती थी और मेलो में रात भर में परफोर्म करती थी और वो कम्पनियाँ चल जाती थी. लेकिन वो इसलिए था की उस वक्त मेलों में जो गाँव वाला जाता था रात को आने की बस नहीं होती थी वो रात बिताने के लिए टेंट में नाटक भी देखने जाता था और वह रात में नाटक देखता था और सुबह  जो बस होती थी या बैलगाड़ी जो भी उससे वो वापस आ जाता था लेकिन इस बिच मेलों में बस जाने लगी है अब वह रात को वापस आता है तो जाहिर है अब वो थियेटर कंपनिया बंद हो गयी..  अगर संस्कृति को इकोनोमी से नहीं जोड़ेंगे तो  कल्चरर पालिसी नहीं बन पायेगी वो एक कल्चरर प्रोग्राम ही बन जायेगा
  संस्थान जो शब्द जो है वो इस देश में इमरजेंसी के बाद ख़त्म हो गया हैपॉलिटिक्स भी एक संस्थान होता है हम इंस्टुयशन फार बिल्डिंग स्कूल या आर्ट ऑफ़ इंस्टुयशन जिसको बोलते है, कबीर का मोवमेंट एक इंस्टुयशन यही कहते थे न! इंस्टुयशन जब बिल्डिंग में बदला, आपने बिल्डिंग को  खड़ा कर दिया इंस्टुयशन को ख़त्म कर दिया.  ये इमरजेंसी के बाद हुआ इस देश में मिसेज गाँधी एज अ पॉलिटिक्स,  इंस्टुयशन को ख़त्म किया और ये शायद अख़बारों में भी हुआ था. इंस्टुयशन जब ख़त्म हुए फिर दुबारा बने नहीं.  होना ये चाहिए जो आप कह रहे है की आईडिया ऑफ़ इंस्टुयशन जब नहीं बनेगा तब तक कल्चर पालिसी भी नही होगी.  इंस्टुयशन होगा तभी  सामूहिकता भी होगी. क्योंकि समूह टिका ही है इंस्टुयशन में. इंस्टुयशन में सामूहिकता का उल्लास  होता है. होली का होना ही अपने आप में इंस्टुयशन होता है, दिवाली का होना ही अपने आप में इंस्टुयशन होता है लेकिन अब वो नहीं है.    
  विचार का आभाव  इसी का हिस्सा है . जब ग्रांट्स बटने लगी ये सरकार ने तय किया की भईया इतना पैसा इन लोगो को बाटना है. हांलाकि मैं भी इसका हिस्सा हूं. मैं इससे बच नहीं सकता...लेकिन ये क्या हो गया है कल्चरर डिपार्टमेंट की ग्रांटस है वो एक तरह से नरेगा हो गया है.  अब उसमें हो क्या गया है की परसों कोई बता रहा था अब नरेगा का जो पैसा आता है पंचायत में तो जाहिर है उस में 50 मजदुर लगायेंगे 50 मजदुर जब तक सड़क खोदेगा उसमें लगते है 2 महीने पंचायत का प्रमुख jcb मंगवाता है jcb से सड़क 3 दिन में खुदवाता है और अगर jcb ने लिए 8000 रुपये जो भी घंटे का तो उसका हुआ कुल 16हजार रुप्पाए फिर वो हिसाब लगता है की 100 मजदूरो का कितना हिसाब हुआ उनके उतने पैसे काटकर वो वैसे मजदूरी दे देता है की तुम दो महीने लगाते मुझे jcb से दो दिन में कम हो गया लेकिन तुम भी अपने पैसे लो लो .ही हो रहा है क्युकी बट रहा है.  विचार जहा एक संगठन पैदा कर सके लोगो को जो आप करने वाले है देखने वाले को छोडिये.   मेजर प्रोब्लम हो रहा है की हम लोगो को संगठित नहीं कर पा रहे है . उस तरह का विचार नहीं है. ज  ह थिएटर उसमें शायद थोडा विचार है थोडा बहुत लेकिन अभी जिसको कहते है की आप जब हम कह रहे की साहब 60 % ग्रोथ है इस देश में यही कह रहे है न 60 % का नारा चल पड़ा है हो सकता है सच भी होगा लेकिन उसके बाद भी आपके पास थिएटर करने वाला लोग नहीं है मतलब आप रोज जूझते है मैं अपनी बात कर सकता हूँ की आज से 10 साल पहले मेरे पास 50-60 लोग जुड़ने को तैयार थे अब मेरी ये स्थिति है की दिन को 15 फोन आये की 2-3 लड़के बिहार भेजो हमारे साथ तो कहा जा रहे हो वह जा रहे हो मैंने कहा क्यों तो कहे दो साल हो गए न अब हर एक के लिए पड़ाव हो गयी है ये जगह तो एक तरह से पड़ाव की हो गयी है वो खनका भी नहीं है जहा आदमी एक दो रात सो सके तो पड़ाव की तरह हो गयी है या तो पुरे यूथ को दिशाहीन वाला मामला है चारो तरफ तो जब आपको  थियेटर में अब   संगठन चाहिये . भाई पेंटिंग तो कर नहीं रहा हूँ जहा मैं अकेला हूँ कविता तो लिख नहीं रहा हूँ मैं अकेला हूँ ... लोगों को लामबंद करने का काम लेफ्ट करता था इस देश में ..कुछ तो करता ही था न वो एक तरह से जो विचार जो संगठन का विचार जो जोड़ने का काम करता था तो हमारा काम होता था थियेटर का विचार जोड़ना अभी भी दोने काम मेरे सिरे पड़े है तो मुझ्समे उतनी कैपेसिटी नहीं है वो करने की ..अब देखए अब ज्यादा आसन होना चाहिए यंग लोग इतने है पुरे हिंदुस्तान में उनको क्यों नही ये खड़े कर प् रहे है अक्सर मेरा ये सवाल है .राजनीतिक विचार इतने कम है यंग लोगों में वो किसी मुवमेंट में जाते हैं और फ़िर निकल जाते हैं. लेकिन एक प्रकार का पोटेंशियल भी हाल में देखने को मिला है लेकिन लेफ़्ट उसको कैश ही नहीं कर पा रहा है. इन मुवमेंट्स को लेफ़्ट ही सब्से ज्यादा अटैक कर रहा था.  मैं  फिर भी निराश नहीं हूँ ..क्योकि अंत में थियेटर ही एक है देखिये अगर अंत संसार नष्ट  हो जायेगा  आखिर परिवार जो होगा वो थियेटर का ही होगा क्युक्की 4 लोग अगर आपस में बैठे या एक दुसरे को गाली दे तो ये आखिरी परिवार बचेगा इसीलिए मैं बहुत घबराने वाला नहीं हूँ कि  सब खत्म क्यों क्या कैसे हो गया.