2/18/12

महेंद्र मिश्र : जीवन एवं सांस्कृतिक परिचय

[ भोजपुरी समाज में जब भी किसी सांस्कृतिक शख्सियत की बात पूछी जाती है,लोग बड़े गर्व से भिखारी ठाकुर का नाम लेते हैं | यह अच्छी बात है,इससे इनकार नहीं परन्तु यह उतनी ही दुखद बात है कि,भोजपुरी समाज के एक और बड़े रत्न 'महेंद्र मिश्र ' पता नहीं क्यों लोगों को याद नहीं हैं | अगर कुछ लोगों को महेंद्र मिश्र याद भी हैं तो उनका विस्तृत विवरण उन्हें नहीं मालूम | हालांकि रवीन्द्र भारती ने 'कंपनी उस्ताद'नामक नाटक लिख कर और संजय उपाध्याय ने इसे मंचित कर इस अनभिज्ञता को काफी हद तक कम किया है | इस बीच मुझे महेंद्र मिश्र पर एक लेख बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की 'परिषद् पत्रिका '(अप्रैल २००७ से मार्च २००८)में डॉ. सुरेश कुमार मिश्र का 'महेंद्र मिश्र :जीवन एवं सांस्कृतिक परिचय 'नाम से मिला | उस लेख को आप सभी सुधीजनों के लिए ज्यों का त्यों साभार प्रस्तुत कर रहा हूँ | इस लेख को ब्लॉग जगत में आप पाठकों के समक्ष लाने का कोई व्यावसायिक प्रयोजन नहीं है,अपितु सांस्कृतिक चाहना है ,जो संभवतः एक जागरूक भोजपुरी भाषी होने के नाते ही उपजी है | उम्मीद है डॉ.सुरेश मिश्र जी इस स्थिति को समझेंगे | लेख किस स्तर का है इसे प्रबुद्ध वर्ग देखें पर यहाँ इसे प्रस्तुत करने का उद्देश्य मात्र मिश्र जी के बारे में जानकारी मुहैया करना है |- मोडरेटर जन्नत टाकिज ]

महेंद्र मिश्र या महेंदर मिसिर का नाम बिहार एवं उत्तर प्रदेश के लोकगीतकारों में सर्वोपरि है | वे लोकगीत की दुनिया के सम्मानित बादशाह थे | उनकी रचित'पूरबी'वहाँ-वहाँ तक पहुँची है,जहाँ-जहाँ भोजपुरी सभ्यता,संस्कृति एवं भोजपुरी भाषा पहुँची है |'हद्द छाड़ी बेहद्द भया' | मारीशस,फिजी,सूरीनाम तक उनकी पूरबी तथा अन्य गीत पहुँच चुके हैं | इतनी व्याप्ति का कारण यह रहा है कि,उनका कृतित्व अनेक विरोधी रचना-तत्वों से बना था और वे सिर्फ गायक ही नहीं,अपितु आशुकवि,संगीतकार,कीर्तनकार,प्रवचनकर्ता और धर्मोपदेशक भी थे | अपनी पूरी जिंदगी में उन्होंने कभी दूसरों द्वारा रचित गीत नहीं गया | हमेशा स्वरचित गीत ही गाते रहे |

जिस समय हिंदी की संत काव्य परंपरा के अंतिम कवि श्रीधर दस,धरनी दास और लक्ष्मी सखी आदि की रचनायें बिहार और उत्तर प्रदेश की भोजपुरी भाषी जनता में गूँज रही थी और भोजपुरी मिट्टी को काव्य और आध्यात्म की सौंधी खुशबू से जीवंत बना रही थी,उसी समय महेंद्र मिश्र की रचनायें भी समाजोद्धार एवं राष्ट्रीयता के आन्दोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका दर्ज करा रही थीं | समाज के प्रति एक सजग साहित्यकार की भूमिका का निर्वाह करते हुए श्री मिश्र जी ने हिंदी में भी लिखा,भोजपुरी में भी लिखा और हिंदी-भोजपुरी मिश्रित काव्य-भाषा का निर्माण किया | यह तत्कालीन युग-धर्म की माँग थी | यह उनके लेखन का एक प्रयोगमय पक्ष ही कहा जायेगा कि,उन्होंने सिर्फ भोजपुरी भाषा में नहीं लिखा | संभवतः उनके समक्ष एक विराट क्षेत्र उपस्थित था,जो ना सिर्फ खड़ी बोली जानता था,न सिर्फ भोजपुरी बल्कि दोनों भाषाओं का प्रयोग रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में करता था और आज भी करता है |

महेंद्र मिश्र को लिखित-अलिखित भोजपुरी लोकगीतों की एक लम्बी और समृद्ध परंपरा मिली थी, जिससे प्रेरित होकर उन्होंने एक विशाल वांग्मय की रचना की | मगर भोजपुरी भाषी जनता के भोजपुरिया संस्कारों ने उनके गुणों को कम ही स्वीकृति दी | उनके जीवन और साहित्य के सम्बन्ध में अनेक अप्रमाणिक घटनाओं को जोड़कर एक मनोहर और रोमांचक वायवीय मिथक का निर्माण किया जाता रहा | इसका परिणाम हुआ कि,उनका वास्तविक जीवन-वृत्त और सम्पूर्ण कवि-कर्म गौण एवं विलुप्त होता गया | कभी-कभी तो कल्पित घटनाओं का इतना सुन्दर,मोहक वितान खड़ा किया गया कि, ऐसा प्रतीत होने लगता है कि,वे ऐतिहासिक पात्र नहीं हैं, कोई मिथकीय पात्र हैं |

वस्तुतः,महेंद्र मिश्र भोजपुरी भाषा और साहित्य को उर्ध्वमुखी दिशा प्रदान करने वाले, उसमें काव्य और आध्यात्म के माध्यम से गंभीर जीवन दर्शन का पुट भरने वाले और अश्विनी कुमारों की तरह जीवन को जीने वाले एक जागरूक कवि थे | तन-मन से एक समर्पित गायक और प्रसंग तथा अवसर के अनुरूप कविता रच लेने की सारस्वत क्षमता के कारण उनकी कविता में गेयता का स्थान सर्वोपरि है | बिलकुल वैसे ही जैसे तुलसी,सुर,निराला और महादेवी वर्मा में है और जैसे उनके रचनाओं के काव्य और संगीतात्मकता को अलग नहीं किया जा सकता |
                                                                                               
{ शेष अगली कड़ी में....}

12/7/11

इश्क और बेबसी का बयान : रॉकस्टार

'रॉकस्टार'देखते हुए अनजाने में ही हंगेरियन पोएट 'लजेलो झावोर' की याद आती रहती है | झावोर के 'ग्लूमी सन्डे' ने दिल टूटने के बाद जो तान छेड़ी,उसके प्रभाव में कईयों ने अपनी जान गंवाई | यहाँ 'इरशाद कामिल'ने फिर 'बेबसी का बयान'दर्ज किया है तो वहाँ लजेलो ने 'नाऊ द टीयर्स आर माई वाइन एंड ग्रीफ इज माई ब्रेड/ईच सन्डे इज ग्लूमी ,व्हिच फील्स मी विद डेथ 'रचा था | यहाँ तमाम बन्धनों और अडचनों में 'जार्डन'के गीत है उधर इस ग्लूमी गीत को बीबीसी ने प्रतिबंधित कर दिया था | दर्द दोनों ही ओर अपने उच्चतम स्तर  पर है | 'रॉकस्टार'आपको इरशाद कामिल जैसा समर्थ गीतकार देता है वहीँ रहमान के संगीत ने फिर से रहमान द जीनियस को सिद्ध किया है | इम्तियाज़ के निर्देशन ने अपनी नींव  और पुख्ता की है तो मोहित चौहान चौकाते हैं | इम्तियाज़ अली,इरशाद कामिल,ए.आर.रहमान,मोहित चौहान,रणवीर कपूर की मेहनत का सम्मिलित सुखद परिणाम है -रॉकस्टार | थियेटर से बाहर आते-आते फिल्म के कई दृश्य दिल पर छप चुके होते हैं और एक हल्की-सी  हूक दिल में बाकी रह जाती है | बस एकमात्र कमजोरी सेकेण्ड हॉफ में कुछ एडिटिंग का है पर यह भी बड़ी दिक्कत नहीं पैदा करती क्योंकि 'नादान परिंदों'के घर आने की आवाज़ 'माईग्रेशन'के सम्बन्ध में 'चिट्ठी आई है 'से अब तक की दूरी भी तय करती है और इसलिए परेशान नहीं होने देती | इम्तियाज़ इरशाद के साथ मिलकर साहित्य को सिनेमा में बड़ी बारीकी से बुनते है | अली की यह फिल्म रूमी और जायसी की कविताई की सीढ़ी के सहारे 'इश्क हकीकी से इश्क मजाजी'की अंतहीन यात्रा तय करने की कोशिश है |     

8/23/11

सलवा जुडूम के मुल्क में बस्तर बैंड


बस्‍तर हम सब जानते हैं. पर उस बस्‍तर का अर्थ परेशान करता है. मुन्‍ना पांडे ने बस्‍तर का एक दूसरा अर्थ हमारे सामने रखा है: बस्‍तर बैंड. लोक परंपरा की जीवंत मिसाल. ठेठ देसी. अगर कुछ गौरवशाली हो सकता है परंपराओं में, तो बस्‍तर बैंड बेशक उनमें से एक है. मुमकिन है, हिंदुस्‍तान के मुख्‍तलिफ हिस्‍सों में और भी ऐसी कलाएं मिसाल बनने की स्थिति में आ पहुंची होंगी. उन्‍हें फिर से जीवंत बनाना हमारे समय की बड़ी चुनौतियों में से एक है. तय है कि इमदादों से ये काम नहीं होगा. इमदाद धरोहर बना सकते हैं, दीर्घाओं में कलाओं की नुमाइश लगा सकते हैं, या फिर म्‍युजियम में कैद कर सकते हैं. जरूरत इन परंपराओं को पुनर्जीवित करने की है, डायनमिक बनाने की है. दिलचस्‍पी और इच्‍छाशक्ति जरूर इस दिशा में कारगर साबित हो सकते हैं. बहारें वापस आ सकती हैं. बहरहाल, सरोकारियों से गुजारिश है कि वे इस दि शा में कुछ सकारात्‍मक पहल लें. वोलंटियर करें. पहले चरण में दस्‍तावेजीकरण का काम तो हो ही सकता है. ये पता तो चले कि हमारी लोक कलाओं में कितने रंग थे, कितने रह गए और कितने रह जाएंगे. अगले दौर में उनके पुनर्जीवन के रास्‍ते पर साझा प्रयास भी किया जाएगा. फिलहाल बस्‍तर बैंड से जान-पहचान करें.

आम आदमी बस्तर का नाम सुनते ही किस तरह की तस्वीर अपने मन में बनाता होगा,इसकी कल्पना सहज की जा सकती है | पर यह तस्वीर का वह पहलू है जिसकी निर्मिति हमारे प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने रची-गढ़ी है | छत्तीसगढ़ के वनों में अनेक संस्कृतियाँ अपने मूल रूप में मौजूद हैं, जिनपर अभी उपभोक्ता संस्कृति ने जाल नहीं फेंका या यह कि अभी तक हमारे वन-प्रांतरों की यह अनमोल धरोहर अभी तक इससे अछूती रह गयी है यह राहत की भी बात है | इसकी बड़ी वजह वहाँ तक इस भोगवादी मानसिकता की पहुँच का न होना भी रहा हो सकता हैं | बहरहाल, बस्तर बैंड बस्तर का एक सांगीतिक चेहरा है और अपने रूप, दृश्यात्मकता और प्रदर्शन  से यह

अहम साजिंदे
बहुत चौकाने वाली भी है | ‘बस्तर बैंड’ की संकल्पना स्व.हबीब तनवीर के नया थियेटर और छत्तीसगढ़ के सक्रिय रंगकर्मी अनूप रंजन की है | अनूप ने बस्तर के लगभग सभी कबीलों में घूम-घूमकर अब लुप्त हो चुके अथवा प्रयोग में नहीं आने वाले कई वाद्य-यंत्रों को इकट्ठा करके प्रदेश के राजकीय संग्रहालय को सौंपा है | अनूप बताते हैं कि ‘बाद में मुझे अहसास हुआ कि ये जो वाद्य यन्त्र धीरे-धीरे प्रयोग से हटते जा रहे हैं और इनके बजाने वाले भी कम होते जा रहे हैं ऐसे में इनको म्यूजियम की शोभा बढाने के बजाये प्रयोग में लाया जाए तथा इनको जो बजा सकते हैं उनकी खोज की जाए |’बस्तर बैंड में बस्तर के लगभग सभी कबीलों के चालीस से भी अधिक सदस्य और इतने ही वाद्य शामिल हैं | अनूप अपने इस प्रयास के पीछे की प्रेरणा हबीब साहब के कामों से मिली भी बताते हैं | इस बैंड का प्रत्येक सदस्य तीन-चार वाद्य यन्त्र बजाने में सक्षम है | मौखिक ध्वनियों, लकड़ी और तारों से बने बाजों, थापों, नृत्य आदि एक किस्म का जादू पैदा करते हैं और हमें ऐसा लगता है गोया सभ्यता के पहले चरण में आ गए हों और तमाम किस्म की बौद्धिक जुगालियों से निर्मित यह समाज अभी इस क्षण कहीं है ही नहीं | बस्तर की जितनी भी जनजातियाँ हैं उनकी परम्पराएं भी एक दूसरे से अलहदा हैं मसलन,घोटूल,मूरिया,दण्डामी,माड़िया इत्यादि आदिम जनजातियों के वाद्य यन्त्र और परम्पराएं तक अलग है बावजूद इसके अनूप रंजन ने इसे एक मंच पर बड़े ही जतन से ऐसे संयोजन से उतारा है कि सभी मिलकर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत का एक समृद्ध और मुकम्मल तस्वीर उपस्थित करते हैं |
बस्तर के आदिवासी ‘लिंगों देव’को अपना संगीत गुरु मानते हैं | उनकी मान्यता है कि इन वाद्य यंत्रों की रचना लिंगों देव ने ही की थी | ‘लिंगों पेन’ वा  ‘लिंगों पाटा’ अथवा ’लिंगों देव’ के गीतों में इन वाद्य यंत्रों का जिक्र मिलता है | यह बैंड बस्तर की सदियों से चली आ रही आदिम जीवन की लोक जीजिविषा और परंपरा का ध्वज वाहक है | अनूप रंजन बताते हैं,

थिरकने से रोकना मुश्किल
‘मेरे आदिवासी वाद्य यंत्रों के संग्रहण के शौक ने पता नहीं कब जूनून का रूप अख्तियार कर लिया | लगभग दस बरस के इस श्रमसाध्य,खर्चीले बैंड का जूनून सन 2004 में अपनी शक्ल अख्तियार कर पाया | जिसकी पच्चीसवीं प्रस्तुति इस अगस्त माह में दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में हुई और इस बेमिसाल प्रस्तुति ने दिल्ली के सांस्कृतिक हलकों में लोक सौंदर्य की जड़ीभूत सौन्दर्याभीरूची को झंकझोर दिया | छत्तीसगढ़ के इस जनजातीय संगीत जिसमें गीत, संगीत, नृत्य सभी कुछ है कि प्रस्तुति दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में भी हो चुकी है |’
जो वाद्य यंत्र आपको इस दुनिया से किसी और दुनिया में हमें आसानी से लेकर चले जाते हैं, उनके नाम उतने ही दुरूह हैं| इन वाद्य यंत्रों में, गोगा ढोल,मिरगिन ढोल,सियाडी बाजा, बेदुर, सुलुड,  चिटकुल, उजीर, किकिड, तेहंडोर, गोती, नरपराय, गुटापराय, चरहा, दुसिर, मुंडा, तपकी, अकुम, तोड़ी, तुडबड़ी, नंगूरा, धुरवा ढोल, माडिया ढोल आदि हैं |
साथ ही अगर हम इस बैंड के सदस्यों पर ध्यान दे तो इसमें कोया समाज या कोइतोर समाज के मुरिया, दण्डामी, मुंडा, मोहरा, भतरा, लोहरा, परजा, हलबा, मिरगिन, अदबा आदि समाजों के पारंपरिक और विभिन्न अवसरों पर प्रस्तुत किए जाने वाले संस्कारिक गीत-संगीत-नृत्य को उसकी सामूहिकता में सम्मिलित किया गया है | बस्तर बैंड प्रकृति का संगीत है और ऐसे प्रयासों की सराहना होनी चाहिए | इतना ही नहीं, यह बैंड अपने सांगीतिक प्रयासों से हमारे तथाकथित शहराती और विकसित समाजों के सोच से परे बस्तर की उस तस्वीर को सामने लाता है जहाँ इस विकसित समाज ने उसे बारूदी ढेर पर बैठा विस्फोटक ज्वलनशील जगह बना दिया है | जब आज पूँजी आधारित व्यवस्था ने बस्तर को आदिवासियों,उनकी जमीनों, खनिजों और संसाधनों के दोहन की ही जगह बना दी है, ऐसे में यह बैंड बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को सामने लाता है, जिसको देखने का अवकाश किसी के पास नहीं है या कोई देखना ही नहीं चाहता | बस्तर बैंड देखते हुए हो सकता है आपको कुछ अनूठी चीज़ न मिले पर यह बैंड अपने वाद्ययंत्रों, नृत्यों, गीतों और प्रस्तुतियों से आपको रोमांचित करता है, इसमें कोई दो-राय नहीं | बस्तर बैंड बस्तर के आदिम संगीत का प्रतिनिधि है | बस्तर माने केवल नक्सल, पुलिस और बारूद ही नहीं होता |
पूरी टीम

(www.sarokar.net पर आज प्रकाशित ) 

8/21/11

सामा-चकेबा - मिथिलांचल की गौरवशाली परंपरा

'(लोक संस्कृति  की समृद्ध विरासत  बिहार  की भूमि में सदा-सर्वदा से गहरे विद्यमान रही है | आज का नवयुवक एक तरफ तो उत्तर औपनिवेशिक  समय में मज़बूरी वश अपनी सांस्कृतिक जड़ों  से कटता जा रहा है  या कटने को विवश है  तो दूसरी तरफ हमारी लोक परंपरा पर भी खतरे की तलवार लटक ही है | इसके पीछे निश्चित ही बाज़ार और उसकी शक्तियां हैं पर बिहार की सांकृतिक छवि को जन-जन तक और विशेषकर युवाओं तक पहुँचाने का जिम्मा बिहार के संस्कृति मंत्रालय ने उठाया है | हमें उनके इस प्रयास को सराहना चाहिए | उन्होंने बिहार की सांकृतिक पहचान बनाते कुछ लोक परम्पराओं पर अपनी पुस्तिका 'बिहार विहार'निकाली है जिसमे  इन कला रूपों का परिचयात्मक विवरण है | यहाँ मिथिलांचल की गौरवशाली परम्परा 'सामा-चकेबा'पर उसीसे एक अंश  साभार ...)


सामा चकेबा'एक प्रकार का 'कंपोजिट' आर्ट है | इसमें मिटटी की बनी अनगढ़ मूर्तियाँ,बाँस के हस्तशिल्प,लिखियार,मिथिला पेंटिंग,गायन,सांस्कारिक अनुष्ठान,नृत्य,अभिनय आदि सब कुछ एक साथ रूपाकार होता है,जो इसे बेहद आकर्षक दृश्यात्मकता प्रदान करता  है | दैनन्दिनी के कार्य से निवृत  होने के बाद कार्तिक मास के सिहरन वाली रात के दूसरे प्रहर में दुग्ध धवल चांदनी में यह 'खेल'प्रारम्भ होता है तथा अमूमन तीसरे प्रहर तक चलता है |  हर रात,तालाब(नदी),बाग़-बगीचे,खेत-खलिहान,मंदिर और ग्राम प्रदक्षिणा का इसमें कार्यक्रम चलता है | इस पूरे खेल के दौरान ननद-भौजाई की चुहलबाजी और हँसी-मजाक वातावरण को जीवंत  बनाये रखते हैं | पद्म पुराण की एक पौराणिक कथा से भी 'सामा-चकेबा'को जोड़ा जाता है | इस कथा में श्रीकृष्ण के दरबार के एक पात्र (चूड़क)की नजर उनकी पुत्री'समा'(श्यामा)पर रहती है | पर सामा 'चारुवाक'नामक युवक से प्यार करती है | प्रेमांध चूड़क श्रीकृष्ण के पास इसकी चुगलखोरी करता है | श्रीकृष्ण शाप देते हैं और सामा-चारुवाक पक्षी बन जाते हैं | बहन के शापित  होने की खबर भाई साम्ब को लगती है | वह श्रीकृष्ण से अनुनय-विनय करता है पर श्रीकृष्ण राजधर्म की आड़ लेकर उसके आग्रह को ठुकरा देते हैं | साम्ब शिव की आराधना में घनघोर तपस्या करते हैं  | शिव प्रसन्न होते हैं तथा मुक्ति का मार्ग बताते हैं | इस मार्ग का अनुसरण कर साम्ब महिलाओं को संगठित करते हैं | श्रीकृष्ण झुकते हैं और सामा-चारुवाक शाप-मुक्त होते हैं |स्त्री के संगठित प्रतिरोध,राज प्रशासन के झुकने,भाई के बहन के प्रति अटूट प्रेम और चुगलखोरों को सजा-यही उत्स है 'सामा-चकेबा'पर्व का | इस पूरे कथानक का बेहद रोचक अभिनय इस पर्व में होता है | आज भी मिथिलांचल के गाँवों में स्त्रियाँ 'सामा-चकेबा'खेलती हैं | कला  मर्मज्ञों ने इसके कथा सूत्र की रोचकता,आकर्षक दृश्यात्मकता,गीत-संगीत-नृत्य और इसके पारंपरिक स्वरुप को देखते हुए इसे परिमार्जित कर पारंपरिक 'लोकनृत्य'के रूप में विकसित किया है | इसका बहुआयामी स्वरुप,गायन की विविधता,प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम,भाई-बहन के स्नेहिल सम्बन्ध,चुगलखोरों(समाज विरोधियों)के प्रति सामूहिक-संगठित विरोध,लोक कल्याण की भावना,संस्कारों का प्रशिक्षण,जैसे अनेक खण्डों में बांटकर इसे समझने का प्रयास किया है | इसीलिए इस बहुआयामी लोकनृत्य में शेष बातें एक जैसी होने पर भी प्रदर्शनकारी दल के विचार चिंतन के आधार पर इसकी व्याख्या बदल जाती है | यही इस लोकनृत्य की निजता और विशेषता भी है |   

8/15/11

बेवजह का कुकुरहांव "आरक्षण" पर

आरक्षण रिलीज हो चुकी है और पिछले हफ्ते तक जो सम्मानीय बंधू इसके विपक्ष में हल्ला बोल किये हुए थे और सर- फुटौव्वल पर आमादा थे,उन्हें अब तक तो यह मालूम पड़ गया होगा कि यहाँ मामला वैसा नहीं था,जैसा उन्होंने अंदाजा लगाया था

याने खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली बात आरक्षण पर सोलह आने फिट बैठती है
आरक्षण देखकर यह लगता हैं कि जिस शख्स का नाम प्रकाश झा है,क्या उसकी क्रियेटिविटी को दीमक लगने लगे हैं ? क्या ये वही फिल्मकार है जिसने दामुल,मृत्युदंड जैसी फिल्में दी थी ? पता नहीं हमारा सिनेमा एक ख़ास किस्म के आदर्शवादिता को क्यों ढ़ोता है
फिल्म का नायक आदर्शवादी प्रिंसिपल प्रभाकर आनंद (अमिताभ बच्चन ) आरक्षण के पक्ष में बोलकर और सच के पक्ष में खडा होने की वजह से अपने पद और संस्थान से निकाल दिया जाता है
उसके दलित स्टुडेंट और फिल्म के दूसरे नायक दीपक कुमार(सैफ अली खान) उसके साथ आकर उसके तबेला स्कूल को अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर सँभालते हैं और यहाँ से यह फिल्म अपने मूल मुद्दे से भटक जाती है
आरक्षण का जरूरी मुद्दा कहीं और चला जाता है
फिल्म प्राईवेट कोचिंग और प्राईवेट शिक्षा संस्थानों की पैरेरल व्यवस्था की ओर चल देती है
बीच-बीच में फिल्म कहीं-कहीं वर्गभेद के मुद्दे को छूती है पर वह आरक्षण के मुद्दे से कतई मेल नहीं करता
आरक्षण की जितनी भी डिबेट प्रकाश झा से या उनकी समझ से संभव थी,उतनी उन्होंने पहले हाफ में रख छोड़ी है
कायदे से फिल्म के जिस हिस्से से आरक्षण समर्थक वर्ग को दिक्कत होनी चाहिए उस ओर उनका ध्यान नहीं जा रहा
फिल्म का एक दृश्य है कि दलित शिक्षक और नायक दीपक कुमार ,अपने शिक्षक प्रभाकर आनंद के मामले में अपने इलाके के दलित नेता से सहयोग मांगता है पर वह शिक्षा मंत्री ( सौरव शुक्ला)के आगे बिक जाता है इतना ही नहीं वह अपनी कुर्सी के सपने के लालच में उस सवर्ण मंत्री और प्रतिनायक मिथिलेश सिंह (मनोज बाजपेयी ) के आगे मिमियाने वाले अंदाज़ में चित्रित हुआ है
क्या निर्देशक इसको दिखा कर इस वर्ग को यह सन्देश देना चाहता था कि देखो आपके वर्ग का प्रतिनिधि कितनी संकीर्ण सोच (फिल्म में जिसे मंद बुद्धि कहा गया है ) का है या यह कि दलितों और उनकी स्थिति में अब तक अधिक बदलाव ना होने के पीछे उनके द्वारा चुने गए इसी तरह के प्रतिनिधि रहे हैं,जो अपने को दलितों का सच्चा हितैषी और प्रतिनिधि बताते रहे हैं ? यह फिल्म प्रच्छन्न रूप से आरक्षण के आर्थिक आधार पर दिए जाने के तर्क की पैरवी करता दिखता है
एक बड़ा इरिटेटिंग पात्र पंडित छात्र का है जिसे अपनी फीस तक के लिए जूझना पड़ता है | यह पात्र पूरी फिल्म में जिस हिंदी का प्रयोक्ता दिखा है वैसी हिंदी पता नहीं प्रकाश झा ने किस हिन्दुस्तान में सुनी है

सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि वह कैरेक्टर इंजीनियरिंग पढना चाहता है और बाद में पढता भी है
आरक्षण फिल्म के गरियाने वालों को खासकर वह दृश्य भी याद रखना चाहिए जब दलित नायक दीपक कुमार थाने में बंद है तब उसकी जमानत उसी का सवर्ण अमीर साथी सुशांत सेठ (प्रतीक बब्बर) ही कराता है
अब प्रश्न उठता है कि क्या जब भी जमानत जैसे काम या ऐसे ही अन्य काम जिनमें सिफारिश या पैसों की बात होनी है वह बिना सवर्णों के सहयोग के नहीं होगी ? दलितों का उद्धार या उत्थान सवर्णों का ही मुहताज/कृपापात्री रहेगा ?इस बात को महज फ़िल्मी प्रयोग या सहज स्वाभाविक मानकर नहीं चला जा सकता
आरक्षण देखते हुए कई दफे यह लगता है गोया प्रकाश झा ने बाघ और बकरी (इसे अभिधार्थ ना लें )के एक ही घाट पर पानी पीने के कपोलकल्पित रामराज्य को ही फिल्म में उतारने की कोशिश की है
फिल्म का नायक प्रभाकर आनंद कोचिंग शिक्षा व्यवस्था को अपने तबेला स्कूल (एक आदर्श अवधारणा )के माध्यम से ध्वस्त कर देना चाहते हैं और यह इसी तरह के रामराज्य को बनाने की गांधीवादी कोशिश लगती है पर यह पूरा प्रकरण फिल्म का सबसे बोरिंग और लम्बा खींच गया दृश्य है
कायदे से प्रकाश झा ने फिल्म आरक्षण के शीर्षक के साथं न्याय तो नहीं ही किया है
ना तो यह फिल्म आरक्षण की पैरवी करती दिखती है न ही मुखालफत
यह मध्यममार्गी फिल्म है अगर हम यह मान लें कि यह फिल्म आरक्षण के इर्द-गिर्द है
इस फिल्म के शीर्षक से इसका जुड़ाव बस इतना सा है कि फिल्म में दिखाए गए संस्थान का प्रिसिपल आरक्षण के पक्ष में बोलने की वजह से मुसीबत में फंसा दिया जाता है
ध्यान से देखा जाये तो यह प्रिंसिपल इस स्टेटमेंट से पहले ही शिक्षामंत्री जी के भांजे और एक ट्रस्टी महोदय के नजरों में पहले ही खटक रहा होता है
आरक्षण के पक्ष में बोलना महज़ उसके ताबूत की आखरी कील होता है
लब्बोलुआब यह कि यह फिल्म प्रकाश झा की अब तक कि सबसे कमजोर और भटकी हुई फिल्म है और सही कहें तो यह झा का कमर्शियल स्टंट मात्र है,जिसका महज शीर्षक देखकर ही आरक्षण समर्थकों ने बेवजह का कुकुरहांव (इसे भी कृपया अभिधार्थ न लें )मचा दिया
दरअसल यह वैसा ही मानो जब बच्चे को चम्मच में शहद डाल कर चटाई जाए और बच्चा शहद छोड़कर चम्मच को ही दाँतों से पकड़ ले
हाँ ! झा के ट्वीट के खिलाफ मैं भी हूँ
(बहरहाल,फिल्म के एक छोटे दृश्य में भोपाल रंगमंच के बेमिसाल एक्टर आलोक चटर्जी और नया थियेटर के हिमांशु त्यागी को देखा सुखद है पर यह मेरी व्यक्तिगत राय इन कलाकारों के लिए है फिल्म से इसका कोई लेना देना हैं )



7/30/11

लकीर-हबीबी लांघने की असफल कोशिश-"बहादुर कलारिन"

'बहादुर कलारिन' मूलतः छत्तीसगढ़ी लोक कथा का हबीब तनवीर द्वारा नाट्य रूपांतरण है | इस नाटक को नया थियेटर की मशहूर और भारतीय रंगजगत की बेहतरीन अभिनेत्रियों में शुमार 'फ़िदा बाई'के गुजर जाने के बाद हबीब तनवीर ने इस नाटक को करना बंद कर दिया,उनका मानना था कि बहादुर कलारिन की किरदार की जितनी परतें हैं वह सबके बस की बात नहीं,इसलिए फ़िदा बाई के चले जाने के बाद मैंने यह नाटक बंद कर दिया | हबीब साहब के रंगकर्म को नजदीक से जाने वाले यह बखूबी जानते हैं कि बहादुर कलारिन भले ही चरणदास चोर जितना मशहूर न हुआ हो पर यह नाटक हबीब तनवीर के दिल के काफी करीब था | इस नाटक को कुछ वर्ष पहले रायपुर में कुछ रंगकर्मियों ने खेलने की कोशिश की थी,पर उनका यह प्रयास एक कमजोर प्रयास बनकर रह गया बहादुर कलारिन का नाटकीय तनाव इसकी जान है और इसको सँभालने के लिए कुशल निर्देशन और दक्ष अभिनेताओं की मांग करता है | २९ जुलाई को दिल्ली के कमानी सभागार में संगीत नाटक अकादमी के सौजन्य से दर्पण लखनऊ की टीम ने इस नाटक को अवधि-हिंदी मिश्रित जबान में श्री उर्मिल कुमार थपलियाल के निर्देशन में खेला | अवधी और हिंदी के मेल,लोक-संगीत का प्रयोग तथा रंग-छंगा की मंचीय उपस्थिति कराकर थपलियाल जी ने नाटक के लोक तत्वों को भरसक जीवित करने की कोशिश की पर यह बात कहावत में ही अच्छी लगती है कि तबियत से पत्थर उछाला जाये तो आसमान में सुराख हो सकता है | हबीब तनवीर ने जो लकीर खींच दी है वह लकीर लांघना सबके बूते की बात नहीं है | थपिलियाल इससे अछूते नहीं रह सके | बहादुर कलारिन की इस प्रस्तुति में रूपांतरण करते हुए एक बड़ी गलती तो यही पर उभर कर सामने आ जाती है जब राजा के मरने के बाद के दृश्य में सीधे शादियों का दृश्य प्रस्तुत कर दिया जाता है | इस नाटक में जिस इन्सेस्ट की ओर इशारा है और जिस वजह से यह कहानी ईडिपस कॉम्प्लेक्स के साथ एक महान दुखांत की जमीन तैयार करती है,वह दर्पण की प्रस्तुति से गायब दिखा | जबकि मूल कथानक में राजा की मृत्यु पश्चात विलाप करती बहादुर पहली बार अपने जवान होते बेटे 'छछान'के गले लगती है और छ्छान के मन में पहली बार इन्सेस्ट का मनोरोग अपनी ही माँ के प्रति जागता है | बाकी की कसर छ्छान बने अभिनेता ने पूरी कर दी | ग्रामीणों के अभिनय में नैसर्गिकता का अभाव साफ़ दिखा
बहादुर के किरदार को दबंग और चंचल दिखाने में भी साफ़ कमी रही और इसी वजह से राजा या छ्चान वाले गंभीर दृश्यों में भी दर्शकों को हंसी आ रही थी | जब गंभीर अभिनय क्षण पर दर्शकों को आप बाँध न सकें तो इसके मायने यह हुआ कि या तो निर्देशक अपनी किस्सा बयानी ठीक नहीं रख सका है अथवा अभिनेताओं ने किरदार गहराई से नहीं किया | जबकि पहली बार जब बहादुर कलारिन कोरबा के खुले मंच पर खेला और कारखाने के कामगारों और देहातियों द्वारा देखा गया तब यह ट्रेजेडी शुरू से आखिर तक सन्नाटें में देखी गयी थी | इसकी वजह साफ़ है कि नाटक के क्रियाव्यपार में प्रेक्षकों को अनुभव की तीव्रता और गहराई दिखाई दी | वैसे भी रंगमंच की अपेक्षा का वास्तविक अर्थ नाटक के मंच पर अभिनेताओं के माध्यम से दृश्य रूप में मूर्त हो सकने की क्षमता और दर्शकों को बाँध लेने के सामर्थ्य से जुड़ा है | इस दृष्टि से भी थपलियाल अपनी इस प्रस्तुति में असफल रहे
मूल बहादुर कलारिन में गीतों की योजना उसके कथा विस्तार को ताकत देती है | 'अईसन सुन्दर नारी के ई बात ,कलारिन ओकर जात / चोला माटी का हे राम एकर का भरोसा / होगे जग अंधियार,राजा बेटा तोला का होगे-जैसे गीत इस ट्रेजेडी को एक सार्थक ऊँचाई देते हैं पर अवधी भाषा (बोली) की यह प्रस्तुति इस ओर से भी निराश करती है | लोक आख्यान 'बहादुर कलारिन'का नाट्य रूप तैयार करते समय नाटककार हबीब तनवीर के सामने 'राजा ईडिपस'की कथा थी,तो दूसरी ओर इन्सेस्ट का मनोरोग भी | इन्सेस्ट की इसी मनोवृति ने इस नाटक को त्रासद रूप दिया क्योंकि उन्होंने इस नाटक के कथानक के सफल बुनावट के लिए मनोविज्ञान के इसी आदिपक्ष 'ईडिपस कॉम्प्लेक्स' और आत्मरति ग्रंथि यानि 'न्यूरोसिस कॉम्प्लेक्स' के सिद्धांत को अपनाया है और जब यह दृश्य नाटककार-निर्देशक के मन में साफ़ हो तो नाटक का कथानक मंच पर खुलकर प्रेक्षकों के सामने आता है पर अफ़सोस लगभग डेढ़ घंटे का समय लेकर भी अवधी की बहादुर न तो अपने साथ जोड़ सकी न उसकी ट्रेजेडी बाँध सकी और बाकि की कसर अभिनेताओं ने पूरी कर दी | ऐसे में निर्देशक-रूपान्तरकार उर्मिल थपलियाल जी पर ही जवाबदेही आती है क्योंकि हबीब तनवीर के पसंदीदा नाटकों को जब भी कोई मंच पर लेकर आएगा उसे हबीब द्वारा खींची लकीर से बार-बार झूझना होगा | ऐसे में भी दर्पण समूह की जिम्मेदारी बढ़ गयी थी क्योंकि तुलना तो अवश्यम्भावी थी और थपलियाल जी, दर्पण समूह इस कथा को अपने प्रयोगों से मंच पर ईमानदारी से रख न सका | कुल मिलाकर निराशाजनक अनुभव रहा और एक वाक्य में कहें तो नाटक नौटंकी बन गया (यहाँ नौटंकी का अभिधात्मक अर्थ न लें )




7/28/11

नायक,खलनायक की वापसी : " सिंघम "

दक्षिण भारत की सिनेमा में यह नायक खलनायक का शह-मात और टशन हमेशा से दर्शकों को लुभाता रहा है

इधर पिछले कुछ वर्षों से हिंदी सिनेमा में भी मल्टीप्लेक्स कल्चर के बरक्स सिंगल स्क्रीन दर्शकों ने 'वांटेड' (सलमान खान अभिनीत ) से सलमान खान के कैरियर को एक नयी ऊँचाई दी जिसके दम पर उन्होंने 'दबंग'और 'रेडी' जैसी फिल्मों से अपनी ब्रांड इमेज पक्की कर ली
'वांटेड' इस मामले में पहली फिल्म बनती है,जहां नायक और खलनायक सिनेमा के दो छोरों पर खड़े होकर अपनी चालें चलते हैं और अंत में हीरो जीतता है
याद कीजिये ऐसा कब हुआ था जब दर्शकों को फिल्म का विलेन याद रह गया हो ? 'गनी भाई(प्रकाश राज) का कैरेक्टर दर्शकों को लुभाता और डराता रहा और प्रकाश राज द्वारा निभाया यह विलेनियस किरदार नायक के सामने किसी तरह भी फीका नहीं था
गब्बर सिंह,शाकाल,मोगैम्बो,डॉ.डैंग,तो आज तक लोगों के जेहन में बसे हुए हैं पर उदारवादी दौर में सिनेमा ने मेकिंग से लेकर प्रेजेंटेशन में जो पलटी खायी,उसमें हमारा यह खलनायक कहीं गायब सा हो गया था
इसीकी वापसी की कोशिश एक समय दुश्मन और संघर्ष से तनूजा चंद्रा ने की थी और सफल भी रहीं थी पर उसके बाद गैप आ गया था
यह भी कह सकते हैं कि प्रतिनायक का किरदार मजबूती और इमानदारी से गढ़ा ही नहीं गया या इसकी जरुरत ही महसूस ही नहीं की गयी
'गनी भाई' (वांटेड)के बाद रामगोपाल वर्मा ने 'भुक्का रेड्डी' (रक्तचरित्र में अभिमन्यु सिंह द्वारा निभाया गया चरित्र )में यह खलनायक हीरो के किरदार जितनी इमानदारी से लिखा और प्रस्तुत किया
'वांटेड' के बाद मेगा हिट 'दबंग'ने छेदी सिंह(सोनू सूद द्वारा निभाया किरदार) को नायक 'चुलबुल पाण्डेय'(सलमान खान)के सामने रखा पर 'छेदी सिंह'में वह बात नहीं दिखी
संभव है,यहाँ निर्देशक का मंतव्य नायक को मसीहाई ऊँचाई देने का अधिक रहा हो जिसका शिकार अनजाने में इस फिल्म का विलेन हो गया |
हिंदी सिनेमा में ७०-८० का दशक नायक-प्रतिनायक के बेहतर दौर का समय रहा

९० का दशक प्रेम-कहानियों के नाम रहा तो २१ वीं सदी हिंदी सिनेमा जगत में नए किस्म के सिनेमा और नयी सोच के युवा लेखकों और निर्देशकों के उभार का दौर रहा जिसकी बानगी आज हम देख रहे हैं
वांटेड से लेकर नयी रिलीज 'सिंघम'में ७० का वह नायक-खलनायक का दौर दक्षिण भारतीय फिल्मों के प्रभाव और सिंगल स्क्रीन थियेटर के आडियेंस की वजह से फिर से लौटा है
उसूल,चोर-पुलिस,चेसिंग दृश्य,सरे-बाज़ार जूतम-पैजार,हॉल में सीटियाँ बजाने को मजबूर करने वाले संवाद,अतुल बलशाली नायक,सिनेमा में बे-जरुरत नायिका,वापस लौट आये हैं
अजय देवगन,प्रकाश राज अभिनीत और 'गोलमाल'फेम निर्देशक रोहित शेट्टी की "सिंघम" इसी तरह की फिल्म है
जो नायक और खलनायक के दांव-पेंचों के बीच दर्शकों को सीट से बाँध कर रखती है
भले ही अजय देवगन का स्टारडम सलमान खान की तरह का न हो पर वह एक दमदार अभिनेता हैं यह इस फिल्म में दिखता है
पर इस फिल्म का सबसे मजबूत पात्र इसका खलनायक 'जयकांत शिक्रे'(प्रकाश राज ) है
प्रकाश में एक ख़ास किस्म का ह्यूमर है,जो दर्शकों को अपने से जोड़ लेता है और यह उनकी अभिनय क्षमता को दर्शाता है
यह खलनायक कई बार नायक 'सिंघम'पर भारी पड़ता है
खासतौर पर नायक और खलनायक के आपसी संवादों और टकराव वाले दृश्यों में
'दबंग'जहाँ स्टार वैल्यू और 'मुन्नी बदनाम'के बूते बड़ी हिट साबित हुई तो 'सिंघम' में उसका निर्देशन,कथा प्रवाह,नायक-खलनायक का बेहतरीन किरदार आपको इस फिल्म के लिए प्रभावित करता है
'सिंघम'फुल इंटरटेनर है,शालीमार बाग़ (दिल्ली) के डीटी सिनेमा में यह फिल्म देखते मैं इस बात पर खुश होता रहा कि बिना दिमागी कसरत किये आप कसे हुए निर्देशन में यह बेहतर मनोरंजक सिनेमा देख रहे है और एक बड़ा आश्चर्य भी हुआ कि जब भी खलनायक (जयकांत शिक्रे का प्रकाश राज द्वारा निभाया किरदार )परदे पर आया लोगों ने तालियाँ-सीटियाँ बजायी
यह एक खलनायक को दर्शकों का इनाम था,एक अभिनेता को उसका पुरस्कार था दर्शकों द्वारा और इन दर्शकों में छोटे बच्चे भी अधिक थे,मुझे मोगैम्बो से डर लगता था अपने बचपने में और यहाँ खलनायक आकर्षित कर रहा था,यह किरदार तथा अभिनेता की ताकत है,जो मसाला हिंदी सिनेमा से लुप्त हो चला था
यह हालत एक पॉश इलाके के मल्टीप्लेक्स के दर्शकों की थी तो सिंगल स्क्रीन के हमारे असली सिनेमचियों का ज़रा सोचिये
वांटेड,रक्तचरित्र,दबंग और अब सिंघम ने हिंदी सिनेमा के परदे पर नायक और खलनायक की वापसी करायी है



उम्मीद है आने वाले समय में कुछ और मजेदार फिल्में दिखेंगी
तब तक सिंघम से मज़े लें
***1/२ (मस्ट वाच मूवी)