भवरवा के तोहरा संग जाई............भोजपुरी फिल्मी यात्रा.

भोजपुरी की पहली फ़िल्म थी "गंगा मईया तोहे पियरी चढैबो"। यह अपने समय की सबसे चर्चित फ़िल्म थी। इस फ़िल्म के निर्माता बनारस के कुंदन कुमार थे,यद्यपि भोजपुरी फिल्मों का दर्शक वर्ग काफ़ी बड़ा था ,फ़िर भी उस अनुपात में इसकी फिल्में नही आयीं जो आनी चाहिए थी ।देखने वाली बात ये है कि ये दर्शक- वर्ग समुन्दर पार मॉरिसौस,फिजी ,सूरीनाम, अमेरिका ,हॉलैंड,नेपाल,अफ्रीकी देशों में बड़ी संख्या में था । अगर देश के भीतर की बात करें,तो दर्शक न केवल बिहार बल्कि उत्तर प्रदेश,वेस्ट बंगाल ,मध्य प्रदेश ,पंजाब ,हरियाणा,में भी था। बावजूद इसके भोजपुरी की दूसरी फ़िल्म एक लंबे अन्तराल के बाद "बिदेसिया"के रूप में आयी । इस फ़िल्म में सुजीत कुमार ,पद्मा खन्ना ने काम किया था । बाद में इस ओरथोडी तेज़ी आई और अगली फ़िल्म जल्दी ही परदे पर दिखी -"लागी छूटे नही राम "। दरअसल ये भोजपुरी का वोह दौर था,जब भोजपुरी फ़िल्म जगत ने करवटें लेनी शुरू कर दी थीऔर ये करवटें आगे आने वाले समय में भोजपुरी फिल्मों का नया व्याकरण लिखे वाली थी। कहना ना होगा ऐसा हुआ भी और १९७३-७४ में आई 'बलम परदेसिया 'ने आने वाले समय की झलक भी दिखा दी। इस फ़िल्म में राकेश पाण्डेय और पद्मा खन्ना ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थी। इसफ़िल्म के निर्माता -निर्देशक हिन्दी फिल्मों के मशहूर चरित्र अभिनेता 'नजीर हुसैन 'थे । इसी बीच 'माई के सौगंध ','गंगा घाट',आदि फिल्में आई,मगर जो प्रसिद्दि 'दंगल'को मिली ,वो कमाल की थी। फ़िर आयी दिलीप बोस के निर्देशन में १९८३-८४ की सबसे बड़ी हिट फ़िल्म -'दूल्हा गंगा पार के '। कुणाल और गौरी खुराना अभिनीत इस फ़िल्म ने अपने बेहतरीन गीत-संगीत से भोजपुरिया समाज में धूम मचा दी । बस फ़िर क्या था ,अब अगली बारी 'गंगा किनारे मोरा गावं'की थी। भोजपुरी फिल्मों का बाज़ार बढ़ने लगा था और इस और अब नॉन-भोजपुरिया लोग भी इस फिल्ड में आने लगे। अमजद खान की'गोदना',के.से.बोकाडिया की 'गंगाजल'इसी का नतीजा थी। लेकिन जिन लोगोंने भोजपुरी की आत्मा अपने फिल्मों में सही तरीके से पेश की उनमे मोहन जी प्रसाद(हमार भौजी),सुजीत कुमार(पान खाए सैय्या हमार),कुणाल सिंघ(हमार दूल्हा )के नाम प्रमुख हैं। धीरे-धीरे भोजपुरी फिल्मों में तेज़ी आ गई। 'पिया रखिह सेनुरवा के लाज'' बैरी कंगना ,'दगाबाज़ बलमा'इसी दौर में आई।ये फिल्में कही-न-कही भोजपुरी समाज की सही तस्वीर प्रस्तुत करती थी। ९० के बाद आई ,मोहन जी प्रसाद की 'हमर सजना'ने एक बार फ़िर शांत पड़े भोजपुरी फिल्मों के मार्केट को जिन्दा कर दिया और लोगों का ध्यान एक बार फ़िर इधर हुआ। इससे पहले टी.वी.की सीता यानि दीपिका अभिनीत एक फ़िल्म-'सजनवा बैरी हो गईले हमार' सिल्वर जुबली मना चुकी थी। इसके बाद का दौर थोड़ा-सा धीमा रहा ।भरत शर्मा ,शारदा सिन्हा,महेंद्र मिश्रा ,बालेश्वर यादव,मुन्ना सिंह आदि ने भोजपुरी गीतों को जिन्दा रखा और इन्ही के तुंरत बाद की स्थिति भोजपुरी गीत-संगीत का ख़राब दौर हो गई। बहरहाल मनोज तिवारी,आनंद मोहन,कल्पना ,देवी इत्यादि ने कुछ अच्छे गीत गाये और भोजपुरी को और पापुलर किया। फ़िर अपनी इसी लोकप्रियता को मनोज तिवारी ने फिल्मों में आकर भुनाया और देखते ही देखते सुपर स्टार बन गए। 'ससुरा बड़ा पैसा वाला 'याद तो होगी ही,जिसने कमी के मामले में कई हिन्दी फिल्मों को पीछे छोड़ दिया। फ़िर एक और हीरो इस और आया जिसे हिन्दी फिल्मों ने फ्लॉप का लेबल दे दिया था,रवि किशन याद है। ये वही रवि किशन था जो हिन्दी फिल्मों में छोटे-छोटे रोल करने को मजबूर था,उसे भोजपुरी फिल्मों ने बड़ा स्टार बना दिया। 'गंगा जैसन माई हमार' उसकी पहली सबसे बड़ी हिट भोजपुरीथी। अब भोजपुरिया फिल्मों ने इतिहास रचना शुरू कर दिया। अब जो दौर भोजपुरी फिल्मो का है ,उसमें ये फ़िल्म जगत बहुत ही मजबूती से अपनी क्षेत्रीय पहचान के साथ उपस्थित है। मगर क्षेत्रीय फिल्मों के निर्माण में जिन कुछ बातों का ध्यान रखना अनिवार्य होता है,उनमें सबसे प्रमुख है,किफ़िल्म उस क्षेत्र -विशेष की भावभूमि से पूरी तरह जुड़ी रहे। व्यावसायिकता तो हो,क्योंकि घर फूंक तमाशा देखने कि सलाह नही दी जा सकती पर यह सिर्फ़ आर्थिक न होकर प्रोफेशनलिज्म से जुदा हो। इसकी कमी अभी के भोजपुरी फिल्मों में खलती है। वैसे भी क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों पर हिन्दी फिल्मों के मसालों का जबरदस्त दबाव रहता है। भोजपुरी की अंधाधुंध आती फिल्मों पर अब इसका प्रभाव दिखने लगा है। भोजपुरी फ़िल्म 'धरतीपुत्र '(मनोज तिवारी अभिनीत)में एक गाना सीधे-सीधे हालके दिनों की हिन्दी फ़िल्म 'फाइट क्लब' का भोजपुरी अनुवाद थीऔर गाना था 'छोरे की आँखें शराबी है इनमें नशा भी...'। अब सोचिये गोवा के बीच पर बिकनी और शोर्ट्स में जो हीरो-हिरोइन ये गीत उस हिन्दी फ़िल्म में गा रहे है उन्ही की कॉपी करते एक गावं में छत पर ,खेत में ,धोती और कुरता ,लहंगा -चोली पहन कर अनुदित गीत गाते हमारे हीरो-हिरोइन कैसे लगेंगे?वो बड़ा ही भोंडा -सा था। जरुरत इस बात की है किजब हमारी फिल्मों का बाज़ार इतना बढ़ गया है तो अपना ही माल हम क्यों न यूज करें ,क्यों न उसे ही नए तरीके से दर्शकों के सामने लायें । आख़िर ये दर्शक हमारे हैं और हमारी चीज़ों को देखना चाहते हैं,उन्हें जरुरत अपनी ही स्टफ देने की है। वरना स्थिति फ़िर से ऐसी हो जायेगी जब दर्शकों का मोहभंग अपनी ही फिल्मों से हो जाएगा ...फ़िर ....क्या होगा ..सोचिये। भोजपुरिया गीत-संगीत और फिल्मी मिजाज़ के साथ शेष फ़िर कभी.....तब तक मुसाफिर को इजाजत दीजिये ... ।

Comments

हम भोजपुरी फ़िल्म तो अभी तक देखे नहीं हैं...लेकिन आप की पोस्ट से बहुत सी जानकारी ले लिए हैं...धन्यवाद.
नीरज
बहुत ही अच्छी जानकारी।
bahut hui sunder,saargarbhit aur gambhir lekh....good going...keep it up
pravin kumar said…
munna, te jaan le ki e blog itihash rache jaa rahal baa..BAAKI KUCCH NA ..BUS ETNA KI LAGAN, TARK, TATHAY AUR ITEHASH-DRISTI KE JATIL SANTULAN BANAILE RAHH....
Unknown said…
Mr Munna it was well researched and nice to know that people like you are paying attention to regional language. Keep it up and do more comprehensive work.
Hope and wish you do better.
Admin said…
great work.u hv choosen a totally new stream,which is entirely different from the others from that of the others .keep it up
good going
akhilesh

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