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सलवा जुडूम के मुल्क में बस्तर बैंड...

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बस्‍तर हम सब जानते हैं. पर उस बस्‍तर का अर्थ परेशान करता है. मुन्‍ना पांडे ने बस्‍तर का एक दूसरा अर्थ हमारे सामने रखा है: बस्‍तर बैंड. लोक परंपरा की जीवंत मिसाल. ठेठ देसी. अगर कुछ गौरवशाली हो सकता है परंपराओं में, तो बस्‍तर बैंड बेशक उनमें से एक है. मुमकिन है, हिंदुस्‍तान के मुख्‍तलिफ हिस्‍सों में और भी ऐसी कलाएं मिसाल बनने की स्थिति में आ पहुंची होंगी. उन्‍हें फिर से जीवंत बनाना हमारे समय की बड़ी चुनौतियों में से एक है. तय है कि इमदादों से ये काम नहीं होगा. इमदाद धरोहर बना सकते हैं, दीर्घाओं में कलाओं की नुमाइश लगा सकते हैं, या फिर म्‍युजियम में कैद कर सकते हैं. जरूरत इन परंपराओं को पुनर्जीवित करने की है, डायनमिक बनाने की है. दिलचस्‍पी और इच्‍छाशक्ति जरूर इस दिशा में कारगर साबित हो सकते हैं. बहारें वापस आ सकती हैं. बहरहाल, सरोकारियों से गुजारिश है कि वे इस दि शा में कुछ सकारात्‍मक पहल लें. वोलंटियर करें. पहले चरण में दस्‍तावेजीकरण का काम तो हो ही सकता है. ये पता तो चले कि हमारी लोक कलाओं में कितने रंग थे, कितने रह गए और कितने रह जाएंगे. अगले दौर में उनके पुनर्जीवन के रास्‍ते पर स...

सामा-चकेबा - मिथिलांचल की गौरवशाली परंपरा

' (लोक संस्कृति  की समृद्ध विरासत  बिहार    की भूमि में सदा-सर्वदा से गहरे विद्यमान रही है | आज का नवयुवक एक तरफ तो उत्तर औपनिवेशिक  समय में मज़बूरी वश अपनी सांस्कृतिक जड़ों  से कटता जा रहा है  या कटने को विवश है  तो दूसरी तरफ हमारी लोक परंपरा पर भी खतरे की तलवार लटक ही है | इसके पीछे निश्चित ही बाज़ार और उसकी शक्तियां हैं पर बिहार की सांकृतिक छवि को जन-जन तक और विशेषकर युवाओं तक पहुँचाने का जिम्मा बिहार के संस्कृति मंत्रालय ने उठाया है | हमें उनके इस प्रयास को सराहना चाहिए | उन्होंने बिहार की सांकृतिक पहचान बनाते कुछ लोक परम्पराओं पर अपनी पुस्तिका 'बिहार विहार'निकाली है जिसमे  इन कला रूपों का परिचयात्मक विवरण है | यहाँ मिथिलांचल की गौरवशाली परम्परा 'सामा-चकेबा'पर उसीसे एक अंश  साभार ...) सामा चकेबा'एक प्रकार का 'कंपोजिट' आर्ट है | इसमें मिटटी की बनी अनगढ़ मूर्तियाँ,बाँस के हस्तशिल्प,लिखियार,मिथिला पेंटिंग,गायन,सांस्कारिक अनुष्ठान,नृत्य,अभिनय आदि सब कुछ एक साथ रूपाकार होता है,जो इसे बेहद आकर्षक दृश्यात्मकता प्रदान ...

बेवजह का कुकुरहांव "आरक्षण" पर

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आरक्षण रिलीज हो चुकी है और पिछले हफ्ते तक जो सम्मानीय बंधू इसके विपक्ष में हल्ला बोल किये हुए थे और सर- फुटौव्वल पर आमादा थे,उन्हें अब तक तो यह मालूम पड़ गया होगा कि यहाँ मामला वैसा नहीं था,जैसा उन्होंने अंदाजा लगाया था याने खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली बात आरक्षण पर सोलह आने फिट बैठती है आरक्षण देखकर यह लगता हैं कि जिस शख्स का नाम प्रकाश झा है,क्या उसकी क्रियेटिविटी को दीमक लगने लगे हैं ? क्या ये वही फिल्मकार है जिसने दामुल,मृत्युदंड जैसी फिल्में दी थी ? पता नहीं हमारा सिनेमा एक ख़ास किस्म के आदर्शवादिता को क्यों ढ़ोता है फिल्म का नायक आदर्शवादी प्रिंसिपल प्रभाकर आनंद (अमिताभ बच्चन ) आरक्षण के पक्ष में बोलकर और सच के पक्ष में खडा होने की वजह से अपने पद और संस्थान से निकाल दिया जाता है उसके दलित स्टुडेंट और फिल्म के दूसरे नायक दीपक कुमार(सैफ अली खान) उसके साथ आकर उसके तबेला स्कूल को अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर सँभालते हैं और यहाँ से यह फिल्म अपने मूल मुद्दे से भटक जाती है आरक्षण का जरूरी मुद्दा कहीं और चला जाता है फिल्म प्राईवेट कोचिंग और प्राईवेट शिक्षा संस्थानों की पैरेरल व्य...

लकीर-हबीबी लांघने की असफल कोशिश-"बहादुर कलारिन"

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'बहादुर कलारिन' मूलतः छत्तीसगढ़ी लोक कथा का हबीब तनवीर द्वारा नाट्य रूपांतरण है | इस नाटक को नया थियेटर की मशहूर और भारतीय रंगजगत की बेहतरीन अभिनेत्रियों में शुमार 'फ़िदा बाई'के गुजर जाने के बाद हबीब तनवीर ने इस नाटक को करना बंद कर दिया,उनका मानना था कि बहादुर कलारिन की किरदार की जितनी परतें हैं वह सबके बस की बात नहीं,इसलिए फ़िदा बाई के चले जाने के बाद मैंने यह नाटक बंद कर दिया | हबीब साहब के रंगकर्म को नजदीक से जाने वाले यह बखूबी जानते हैं कि बहादुर कलारिन भले ही चरणदास चोर जितना मशहूर न हुआ हो पर यह नाटक हबीब तनवीर के दिल के काफी करीब था | इस नाटक को कुछ वर्ष पहले रायपुर में कुछ रंगकर्मियों ने खेलने की कोशिश की थी,पर उनका यह प्रयास एक कमजोर प्रयास बनकर रह गया बहादुर कलारिन का नाटकीय तनाव इसकी जान है और इसको सँभालने के लिए कुशल निर्देशन और दक्ष अभिनेताओं की मांग करता है | २९ जुलाई को दिल्ली के कमानी सभागार में संगीत नाटक अकादमी के सौजन्य से दर्पण लखनऊ की टीम ने इस नाटक को अवधि-हिंदी मिश्रित जबान में श्री उर्मिल कुमार थपलियाल के निर्देशन में खेला | अवधी और हिंदी के मेल,लो...

नायक,खलनायक की वापसी : " सिंघम "

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दक्षिण भारत की सिनेमा में यह नायक खलनायक का शह-मात और टशन हमेशा से दर्शकों को लुभाता रहा है इधर पिछले कुछ वर्षों से हिंदी सिनेमा में भी मल्टीप्लेक्स कल्चर के बरक्स सिंगल स्क्रीन दर्शकों ने 'वांटेड' (सलमान खान अभिनीत ) से सलमान खान के कैरियर को एक नयी ऊँचाई दी जिसके दम पर उन्होंने 'दबंग'और 'रेडी' जैसी फिल्मों से अपनी ब्रांड इमेज पक्की कर ली 'वांटेड' इस मामले में पहली फिल्म बनती है,जहां नायक और खलनायक सिनेमा के दो छोरों पर खड़े होकर अपनी चालें चलते हैं और अंत में हीरो जीतता है याद कीजिये ऐसा कब हुआ था जब दर्शकों को फिल्म का विलेन याद रह गया हो ? 'गनी भाई(प्रकाश राज) का कैरेक्टर दर्शकों को लुभाता और डराता रहा और प्रकाश राज द्वारा निभाया यह विलेनियस किरदार नायक के सामने किसी तरह भी फीका नहीं था गब्बर सिंह,शाकाल,मोगैम्बो,डॉ.डैंग,तो आज तक लोगों के जेहन में बसे हुए हैं पर उदारवादी दौर में सिनेमा ने मेकिंग से लेकर प्रेजेंटेशन में जो पलटी खायी,उसमें हमारा यह खलनायक कहीं गायब सा हो गया था इसीकी वापसी की कोशिश एक समय दुश्मन और संघर्ष से तनूजा चंद्रा ने की ...

आइये जाने 'गंगोत्री'को

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उत्तराखंड के जनपद उत्तरकाशी में समुद्रतल से ३१४० मीटर की ऊँचाई और जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से १०० कि.मी. की दूरी पर स्थित गंगोत्री हिन्दुओं का पवित्र तीर्थ क्षेत्र है | उत्तराखंड के चार धामों में से एक गंगोत्री धाम, गंगा 'उतरी' से बना है ,यानी वह जगह जहाँ गंगा उतरीं | हिन्दुओं के अन्यतम तीर्थों में से गंगा के इस उद्गोम स्त्रोत को ही अन्यतम तीर्थ की संज्ञा प्राप्त है | पुराणों के अनुसार यहीं पर राजा भागीरथ  ने एक शिला पर बैठ कर ५५०० वर्षों तक तपस्या की थी | ऐसा माना जाता है कि बाद में पांडवों ने भी कुरुक्षेत्र के महासंग्राम के बाद कुछ समय तक यहाँ वास करके  अपने सम्बन्धियों की हत्या के पाप से मुक्ति के लिए यज्ञ किया था | इसके प्रमाण के तौर पर गंगोत्री मंदिर से १.५ कि.मी. की दूरी पर एक गुफा वाली जगह है जिसे स्थानीय सन्यासी और लोग पांडव गुफा के नाम से पुकारते हैं | यहीं पर पास ही 'पांडव शिला' है,जिसके बारे में यहाँ प्रचलित है कि,यहाँ पांडवों ने तप आदि किया था | गंगोत्री एक तीर्थ स्थल होने के साथ साथ एक खूबसूरत पर्वतीय स्थल भी है,जो चारों ओर से देवदार,चीड़ और ऊँचे पर्वतों से...

जनकवि भिखारी ठाकुर : रघुवंश नारायण सिंह

(यह मूल लेख भोजपुरी में लिखित है.जो भोजपुरी की बंद हो चुकी पत्रिका 'अंजोर'के अक्टूबर-जनवरी १९६७ अंक से साभार लिया गया है.मूल लेख जनकवि भिखारी ठाकुर नाम के पुस्तक जिसके लेखक श्री महेश्वर प्रसाद जी हैं ,की समीक्षा भी है और अपनी तरफ से कुछ टिप्पणियां भी.पाठकों की सुविधा के लिए हमने इसे हिंदी में रूपांतरित करके प्रस्तुत किया है,ताकि भोजपुरी नहीं जानने वाले भी भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले इस महान रंगधुनी के और बिदेसिया के रचयिता के बारे में जान सकें.पर भिखारी ठाकुर के बारे में सभी उल्लिखित राय ,लेखक महोदय की है,इससे रूपांतरणकार की  रजामंदी  जरुरी नहीं .रूपांतरण/अनुवादक - मुन्ना कुमार पाण्डेय  ) बहुत दिन पहले आरा से निकलने वाले 'भोजपुरी'में श्री बीरेंद्र किशोर का एक लेख छपा था 'भोजपुरी के शेक्सपियर  भिखारी ठाकुर' | बहुत लोगों ने जब उसे पढ़ा तो अचरज में पड़ गए,सिहर गए  कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली | यह तो अजब मेल बैठाया गया ,ऐसा बहुत लोगों ने कहा | बात सही भी थी बाकी राहुल बाबा ( सांकृत्यायन जी ) भिखारी को महाकवि कह चुके थे | अब हम ल...