राजनीतिक राम के बरक्स पारिवारिक राम की छवि -उत्तररामचरित


रा.ना.वि. के ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव के नाटकों पर लिखने की अगली कड़ी में आज भवभूति द्बारा रचित और प्रसन्ना द्बारा निर्देशित नाटक "उत्तररामचरित" के बारे में कुछ.
उत्तररामचरित का संस्कृत से हिंदी अनुवाद 'पंडित सत्यनारायण कविरत्न' ने किया है.कविरत्न जी ने भवभूति के तीनों नाटकों का हिंदी और ब्रज में मिला-जुला अनुवाद किया यानी गद्य को हिंदी में तो पद्य को ब्रज में.उनकी यह कुशलता नाटक के प्रदर्शन में काफी सहयोगी सिद्ध हुई भी है."उत्तररामचरित"भी एक तरह से रामलीला ही है.पारंपरिक रामलीला खासकर एक नैतिक नाटक है जिसमे बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाई जाती है.इस नाटक में कोई शैतान नहीं है कोई खल पात्र नहीं.अगर प्रसन्ना की माने तो-"यह नाटक आत्मसंघर्ष पर केन्द्रित है.इसमें अच्छा आदमी अपने अच्छे होने की कीमत अदा करता है-यंत्रणा के द्बारा."-इस नाटक पर कुछ और बात से पहले पाठकों को यह याद दिला दूं कि प्रसन्ना ने इस नाटक का मंचन/निर्देशन १९९१ में किया था,जब एक राजनीतिक दल ने सत्ता के लिए राम की आध्यात्मिक छवि का दुरूपयोग कर उसको राजनीतिक छवि सही कहा जाये तो 'साम्प्रदायिक'उग्र युवा प्रतीक के तौर पर प्रस्तुत किया था.यद्यपि भवभूति का राम विशुद्ध पारिवारिक व्यक्ति है.उसके परिवार में एक पत्नी,भाई ,सेवक इत्यादि हैं.भवभूति का राम युद्ध के बाद की परिस्थितयों से लड़ता है ,अपने-आप से लड़ता है और यह इतना ज़मीनी है इतना कोमल है कि पत्नी वियोग में लोट-लोट कर विलाप करता है और अपने निर्णय पर पश्चात्ताप करता है कि क्यों उसने गर्भवती पत्नी को लोकोपवाद के कारण कष्ट भोगने जंगल में भेज दिया.भगवा बिग्रेड कभी भी इस राम को जनता के सामने लाने का दुस्साहस नहीं कर सकता क्योंकि उनका गढा हुआ राम 'एंग्री यंगमैन' हैवह शक्ति के अपने ज़मीन की लड़ाई लड़ रहा है.
'दरसल राम की सार्वजनिक छवि उन्हें सीता त्याग को बाध्य करती है जो उनकी गर्भवती पत्नी है और उधर उनका निजी प्रेमी रूप इस वियोग से उत्पीडित होता है.इस तरह भवभूति नैतिक विडम्बना के भीतर से एक खूबसूरत प्रेमकहानी निकाल लाते है.उल्लेखनीय है कि अंत में सीता ही राम को पुनर्जीवन देती है.भवभूति ने यहाँ राम को नश्वर मनुष्यों की ही तरह प्रस्तुत किया है.अपने निजी जीवन की असहायता के कारण ही वे जनसाधारण को इतने प्रिय लगते हैं.'(प्रसन्ना)
भवभूति को कालिदास के समकक्ष का नाटककार माना जाता है.इस नाटक के रूप में उन्होंने एक विशिष्ट रचना दी है.नाटक के रूप में उत्तररामचरित में वो सारे गुण और लक्षण हैं जो एक सफल नाटक में होने चाहिए.इसमें प्रेम,दुःख,त्रासदी,संघर्ष और नियति के तथा जीवन के विविध रूपों के दर्शन होते हैं.नाट्य-समीक्षक रविन्द्र त्रिपाठी के शब्दों को उधार लेते हुए-"रा.ना.वि.रंगमंडल के कलाकारों ने इस नाटक को १९९२ तथा २००६ में खेला.इतने वर्ष पहले वह वक़्त था जब राम-मंदिर को लेकर देश भर में एक तनाव था...उस समय प्रसन्ना ने राजनीतिक राम की छवि के बरक्स आध्यात्मिक राम को स्थापित किया था.यह एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप था,लेकिन इस बार प्रसन्ना का यह नाटक राजनैतिक नहीं बल्कि नैतिकता की खोज और गृहस्थ जीवन के मूल्यों की स्थापना है."-इस नाटक में दो सिरे उभरते हैं-लोकोपवाद और उसके कारण सीता के परित्याग का दंश.इसी के बीच राम आत्मयंत्रणा में जीते हैं.तुलसी के राम जहां मर्यादा पुरुषोत्तम हैं वहीँ भवभूति के राम मनुष्य ,पति और पिता भी .इसमें राम का रूप अधिक मानवोचित है.इस नाटक की इसी विशिष्टता के कारण ही तो कहा गया है-"उत्तर रामचरिते भव्भूतिर्विशिष्यते".
सही मायनों में विवाह नैतिकता और प्रेम का यह नाटक हर दृष्टि से देखने योग्य है.रंगमंडल तो सदारमे है ही तिस पर प्रसन्ना का निर्देशन 'सोने पे सुहागा' हो गया है.प्रसन्ना ने यह नाटक अपने पुराने संगीत निर्देशक साथी जिन्होंने १९९१ में इस नाटक की संगीत-रचना की थी ,की स्मृति को समर्पित किया है.जिन किसी महाशय को यह चिंता हो कि बिना आधुनिक वाद्य या अत्याधिक प्रकाश के आयोजन अथवा चकाचौंध के बिना थिएटर संभव नहीं है उनके लिए उत्तररामचरित को सबक है.यह नाटक न्यूनतम में तैयार होकर अधिकतम की सीमा से आगे जाकर आपका मनोरंजन करता है. *****************************************************************************************
परिकल्पना और निर्देशन-प्रसन्ना सह-निर्देशक-सौउती चक्रवर्ती नाटककार-भवभूति अनुवाद-पंडित सत्यनारायण कविरत्न संगीत-डॉ.गोविन्द पाण्डेय नृत्य-संरचना-विद्या शिमलड़का प्रकाश-पराग सर्माह वस्त्र-सज्जा-अर्चना शास्त्री मंचन स्थल-सम्मुख सभागार (नाट्य महोत्सव की समय-सारणी पिछली पोस्ट से देखे.)

Comments

Arvind Mishra said…
बहुत प्रशंसनीय प्रविष्टि ! आभार ! राम का चरित्र सचमुच बहुत उदात्त है और मनीषियों ने इसे जन जन तक पहुंचा कर मानवता की बड़ी सेवा की है ! इस कतार में कहीं आप भी खडे दिख रहे हैं ! साधुवाद !

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