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कमबख्त फिल्म ...

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किसी फिल्म के हिट होने का क्रेटेरिया क्या है या होता है?बहुत संभव है मेरी और आपकी राय लगभग समान हो.बीबीसी हिंदी पर कमबख्त इश्क के हिट होने की खबर है साथ ही यह भी कि अक्षय कुमार ने भव्य पार्टी दी और शाहरुख़ खान को भी पार्टी में बुलाया.यह एक अलग बात है.मेरी समस्या अक्षय कुमार की इन दिनों की कुछ फिल्मों से बढ़ी है.और मैं यह सोचता हूँ कि फिल्म के लिए स्क्रिप्ट का दमदार होना जरुरी है या नहीं?कोई नाम मात्र की भी स्टोरी लाइन तो हो..पर नहीं. दर्शकों का टेस्ट क्या हो चला है इसे पकड़ पाना ना तो ट्रेड पंडितों के पास है ना ही फिल्म समीक्षकों के पास. "कमबख्त इश्क"कुछ उन फिल्मों में से थी जिनके लिए सिनेडियों(सिनेमा प्रेमियों)ने बहुत बेसब्री से इंतज़ार किया था मगर सही में यह फिल्म जिस तरह से बन कर सामने आई है उसे देख कर यही कहा जायेगा कि कम-से-कम अब साजिद नाडिया..और शब्बीर खान क्या दिखाना चाहते थे उनसे ही पूछा जाये तो बता नहीं पायेंगे..पर विडम्बना है कि फिल्म हिट है. मेरे लिए यह फिल्म देखना एक त्रासदी से गुजरने जैसा अनुभव रहा है.यह फिल्म कमबख्त इश्क से कमबख्त फिल्म में शुरू होते ही तब्दील ह...

पीयूष मिश्रा का विडियो साक्षात्कार "www.mihirpandya.com"पर.

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गुलाल देखने के बाद जो पीयूष मिश्रा के नए नए मुरीद हुए हैं और वे भी जो रंगमंच के दिनों से ही इस बेहतरीन कलाकार के फन के कायल हैं,उनके लिए एकदम नया और ख़ास विडियो साक्षात्कार मेरे अभिन्न मित्र और आवारा हूँ ब्लॉग के 'मिहिर पंड्या' के वेबसाइट www.mihirpandya.com पर उपलब्ध है.इस इंटरव्यू की सबसे ख़ास बात है कि अन्य कलाकारों के रेट-रटाये और घिसे -पिटे फार्मुलेबाजी वाले साक्षात्कार के बीच इस अद्भुत कलाकार ने अपने दिल का दरद दिल्ली के रंगमंच मार्क्स की बात कर अपनी दुकानदारी चलाने वाले छद्म मार्क्सवादियों तक पर अपनी तीखी टिपण्णी दी है.मिहिर के ही ब्लॉग साथी वरुण ग्रोवर ने अनुराग कश्यप के मशहूर प्ले "the skeleton women" जो पृथ्वी थिएटर मुम्बई में खेला जा रहा है के मौके पर अनौपचारिक तौर पर लिया और फिर जो सिलसिला चला तो बस एक से एक बात निकलती चली गयी.पीयूष मिश्रा के अब तक छपे इंटरव्यू को आप भूल जायेंगे.यकीन जानिए ये वही पीयूष मिश्रा हैं जिनके नाम की तूती दिल्ली के रंगजगत में बोलती थी.आखिर क्यों रंगमंच का एक बहुत ही उम्दा कलाकार इतना खिन्न हो गया इस मंच से .?क्यों वह अपने संघर्ष...

राजनीतिक राम के बरक्स पारिवारिक राम की छवि -उत्तररामचरित

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रा.ना.वि. के ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव के नाटकों पर लिखने की अगली कड़ी में आज भवभूति द्बारा रचित और प्रसन्ना द्बारा निर्देशित नाटक "उत्तररामचरित" के बारे में कुछ. उत्तररामचरित का संस्कृत से हिंदी अनुवाद 'पंडित सत्यनारायण कविरत्न' ने किया है.कविरत्न जी ने भवभूति के तीनों नाटकों का हिंदी और ब्रज में मिला-जुला अनुवाद किया यानी गद्य को हिंदी में तो पद्य को ब्रज में.उनकी यह कुशलता नाटक के प्रदर्शन में काफी सहयोगी सिद्ध हुई भी है."उत्तररामचरित"भी एक तरह से रामलीला ही है.पारंपरिक रामलीला खासकर एक नैतिक नाटक है जिसमे बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाई जाती है.इस नाटक में कोई शैतान नहीं है कोई खल पात्र नहीं.अगर प्रसन्ना की माने तो-"यह नाटक आत्मसंघर्ष पर केन्द्रित है.इसमें अच्छा आदमी अपने अच्छे होने की कीमत अदा करता है-यंत्रणा के द्बारा."-इस नाटक पर कुछ और बात से पहले पाठकों को यह याद दिला दूं कि प्रसन्ना ने इस नाटक का मंचन/निर्देशन १९९१ में किया था,जब एक राजनीतिक दल ने सत्ता के लिए राम की आध्यात्मिक छवि का दुरूपयोग कर उसको राजनीतिक छवि सही कहा जाये तो 'साम...

जहां मौत एक सहज कविता सरीखी है-राम नाम सत्य है

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रेपर्टरी (एन एस डी)का यह नाटक "राम नाम सत्य है"-मूल रूप से मराठी नाटककार 'डॉ.चंद्रशेखर फनसलकर'का लिखा हुआ है.फनसलकर के नाटकों और विशेषकर एकांकियों पर लिखते हुए 'विजय तेंदुलकर' ने लिखा है-"उनके एक-अंकीय नाटकों में थिएटर की संभावनाओं और सीमाओं,दोनों के प्रति सजगता का पता चलता है.लेकिन उनमे व्यक्त होने के लिए और भी बहुत कुछ शेष रहता है.उनके भीतर एक प्रकार की बेचैनी.एक असंतोष और आक्रोश निहित है"-इस नाटक को फनसलकर जी ने मराठी में 'खेली-मेली' के नाम से लिखा है.जिसका अनुवाद इस नाटक के निर्देशक'चेतन दातार'ने ही किया है. यह नाटक जैसा कि खुद नाटककार का कहना है-प्यार,भाईचारे और थोड़े बहुत हौंसले से मनुष्य नर्क में भी जीवन को सहज बना सकता है और आगे बढ़ रहा है.यही मनुष्य के भीतर उम्मीद और आशा का संचार करता है,जबकि आज हमारे चारों और की जो मूल्यवान और अच्छी चीज़ें हैं वो या तो ढह रही हैं या मृतप्राय हो गयी हैं.यह नाटक मनुष्य की इसी 'कभी मृत न होने वाली'प्रवृति को पकड़ने का प्रयास है."-नाटक देखते हुए एपी फनसलकर की इस बात से सहमत हो सक...

लोकधर्मी शैली का सहज नाटक -"सदारमे"(रा.ना.वि.में)

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नरहरी शास्त्री जैसे विख्यात और 'श्रीकृष्ण लीला ,कंसवध चरित्र,महात्मा कबीरदास,जालंधर,श्री कृष्णभूमि परिणय ,अदि पौराणिक नाटकों के लेखक की ही रचना है -'सदारमे'.जो आजकल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव में रंगमंडल द्वारा खेला जा रहा है.दरअसल यह नाटक कंपनी शैली का है,कहने का अर्थ यह है कि .नरहरी शास्त्री के अधिकाँश नाटकों का प्रदर्शन कर्नाटक की ऐतिहासिक ड्रामा कंपनी 'गुब्बी नाटक कंपनी'ने किया है और वे सभी प्रर्दशित नाटक पौराणिक कथाओं का आधार लिए हुए थे.कंपनी के आग्रह पर कि शास्त्री जी एक ऐसा नाटक लिखे जिसमे लोक-तत्वों की सादगी और खूबसूरती हो तब "सदारमे"लिखा गया.नरहरी शास्त्री जी ने इस नाटक की रचना कंपनी के आग्रह पर की. 'सदारमे का शाब्दिक अर्थ है-हमेशा सुंदर (सदा + रमे,सदा का अर्थ हमेशा और रमे संस्कृत शब्द के रम्य से बना है)लगभग एक सदी पूर्व लिखा गया नाटक नाट्यधर्मी नहीं बल्कि लोकधर्मी शैली में है.सीधी-सादी इस कहानी का उद्देश्य शुद्ध मनोरंजन करना है."-(ब्रोशर -सदारमे निर्देशकीय )दरअसल लोकधर्मी शैली के नाटकों का सबसे मज़बूत पक्ष उ...

आचार्य तार्तूफ़.. रा.ना.वि.रंगमंडल की उम्दा प्रस्तुति.

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'आचार्य तार्तूफ़'मशहूर फ्रांसीसी नाटककार 'मौलियर' के विख्यात हास्य चरित्र 'तार्तूफ़'का आचार्य तार्तूफ़ के रूप में भारतीय अवतरण है.सत्रहवी शताब्दी के इस नाटक को वर्तमान समय से जिस तरह से जोड़ा गया है वह वाकई कमाल का है और इसका श्रेय भी सबसे अधिक इसके निर्देशक 'प्रसन्ना'को जाता है. इसकी कथा का सार-संक्षेप यूँ है कि ओमनाथ नाम का बनिया जो मूलतः दिल्ली का रहने वाला है लेकिन आध्यात्मिक खोज के लिए पोंडिचेरी जाता है,जहां उसकी मुलाक़ात एक अर्ध फ्रांसीसी भारतीय खस्ताहाल शख्स से होती है.यह शख्स अपने को तार्तूफ़ का वंशज बताता है मगर असल में वह एक असफल अभिनेता है.एक टेलीविजन धारावाहिक के निर्माण के दौरान उसने संस्कृत के कुछ श्लोक याद कर लिए थे.वह अपनी खस्ताहाली से निकलने की जुगत में है.पोंडिचेरी समुद्री तट पर आचार्य तार्तूफ़ ओमनाथ को अपनी जाल में फंसा लेता है और ओमनाथ को लगता है कि एक आध्यात्मिक गुरु पाने की उसकी कोशिश पूरी हुई. मोलिअर का तार्तूफ़ सिर्फ पाखंडी है.उसका यह भारतीय अवतार आचार्य तार्तूफ़ वह आधुनिक हिन्दू स्वामी या महाराज है जो करतबबाज भगवान् सरीखा बन चुक...

रा.ना.वि.में "ग्रीष्मकालीन नाट्य समारोह २१ मई से १७ जून तक..

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल प्रत्येक वर्ष की तरह इस बार भी हमारी गर्मियों को बेहतरीन बनाने के लिए अपने बेहतरीन नौ नाटकों के साथ फिर उपस्थित है.पेश है आपकी सुविधा हेतु समय-सारणी और अन्य विवरण - ==================================================================== २१ मई /७:०० बजे -"सदारमे"       निर्दे.-बी.जयश्री (अवधि-१घ.५० मिं.)हिंदी ---अभिमंच सभागार  २२ मई /७:०० बजे - "सदारमे"------------------'वही------------------------------------------------- २३ मई /३:३० बजे और ७:०० बजे- "सदारमे"------------वही---------------------------------------- २४ मई /३:३० और ७:०० बजे -"सदारमे"----------------------वही------------------------------------  ===================================================================== २५-२६-और २७ मई /७:०० बजे -"उत्तररामचरित",  निर्दे.-प्रसन्ना (अवधि-२ घंटे)हिंदी--सम्मुख सभागार  ===================================================================== २८-२९ मई  /७:०० बजे- "जात ही पूछो साधु की"-    निर्दे.-र...