1/28/19

हर्षिल डायरी - 2


गतांक से आगे 
...सुकी गाँव में दिल्ली वाले नेटवर्क को समस्या हो रही थी लेकिन बीती शाम में ही ऋचा के सलाह अनुसार होटल वाले के फ़ोन में मैंने देहरादून में ऋचा के पिता जी को अपनी लोकेशन और गाड़ी की स्थिति बता दी थी. पहले तो उन्होंने जोर का ठहाका लगाया कि हमलोग जाकर एक जगह फंस गए हैं लेकिन ठीक हैं. मामला यह था था कि मैंने चंबा से आगे आते समय उनको फ़ोन करके खूब चिढ़ाया था कि आप देहरादून ही रह गए और देखिए हमने बिना प्लान के गंगोत्री तक का रास्ता नापने निकल गए और उसी बातचीत में ऋचा के पापा ने कहा आज रात आप उत्तरकाशी रुकोगे तो सुबह हमलोग आपको पीछे से ज्वाइन कर लेंगे, लेकिन मैंने कहाँ अजी आज की रात तो हर्षिल ही रुकेगी यह गाड़ी और संयोग देखिए न उत्तरकाशी ना हर्षिल गाड़ी सुकी गाँव के पास सुस्ती में आई और शायद विधाता ने यही मिलने का करार तय किया हुआ था. शायद इसे ही कहते हैं अपना चेता होत नहीं प्रभु चेता तत्काल. अब सुकी की रात भी गज़ब बीती. ऋचा के पापा भी देहरादून से सुबह दास बजे के करीब सुकी आ गए और नीचे उत्तरकाशी में एक मिस्त्री को बोल आए थे. एक और कमाल बात थी कि बाहर के नम्बर की ख़राब कार को देखते हुए तक़रीबन हर दूसरे सवारी कार वाले ने उत्तरकाशी में किसी न किसी मिस्त्री को हमारे होटल वाले का नम्बर दे दिया था ताकि उसके हिसाब से बात करके वह सुकी आकर कैम्प के पास खड़ी दिल्ली नम्बर की गाड़ी की मरम्मत कर जाए. देर शाम तक एक मिस्त्री अपनी गाड़ी से सुकी आया और हमारी कार की मरम्मत में जुट गया. मैकेनिक कितना दक्ष था यह तो मालूम नहीं पर उसके उत्साह और गाड़ी के डिजाईन को देखते हुए सलाम करने का जी कर रहा था. उसकी कार थी तो स्विफ्ट लेकिन दशहरे की झांकी सरीखी बनी ठनी थी. खैर! 4 से 5 घन्टे की मेहनत और चांदनी रात में सामने वाले पर्वत से बारीक़ से वृहतर होते चांदनी को पसरते देखना एक अलग ही अनुभव ही था. उस दृश्य को बयान करना मुश्किल है जब एकाएक उजाला बढ़ते बढ़ते सामने वाले पर्वत की नोक से एक नगीने की तरह क्षण पर टिका फिर मुकुट की तरह बढ़ा और समूचे वैली और हमारी पीठ की ओर वाले पहाड़ की तीखी ढलान पर सेब के खेतों में भीतर तक छा गया. कार अब ठीक थी, लेकिन जिस रास्ते पर हमें आगे जाना था, उस लिहाज से इस मिस्त्री पर मेरा भरोसा पता नहीं क्यूँ टिक नहीं रहा था. जोगिन्दर की भी यही राय थी, तिस पर सत्रह सौ के वाटर पम्प के साढ़े पाँच हजार चुकाने के बाद मिस्त्री का उदार होकर दिखाना कि 'वह तो भला हो जो मैं ही था अन्यथा कोई और होता तो शायद ही इतने में करता', मूड को थोड़ा ख़राब कर ही गया था लेकिन मन के एक कोने में यह बात संतोष के साथ साँसे ले रही थी कि कल की सुबह हर्षिल में बीतेगी. अफ़सोस इस बात का भी नहीं था कि दो रातें सुकी में बीत गयीं वह भी किसी और वजह से.
जाना पहाड़ी विल्सन राजा के घर हर्षिल में
हर्षिल के पास है मुखबा गाँव. सर्दियों में गंगोत्री धाम की डोली की यहीं पर पूजा अर्चना की जाती है. हर्षिल सेना के दो रेजिमेंट्स के बीच में भागीरथी के सुरम्य तट पर बसा एक बेहद खूबसूरत गाँव है. इसकी ऊँचाई 2500 मी. है और यहाँ के रसीले सेब नीचे खूब मशहूर हैं. कहते हैं इस इलाके में सेबों की फसल से पहला परिचय अंग्रेज फ्रेडरिक विल्सन ने कराया था, जिसे यहाँ के स्थानीय लोग पहाड़ी विल्सन के नाम से पुकारते हैं. हर्षिल आने का एक बड़ा कारण यह विल्सन भी रहा, वह अंग्रेज जिसका इस इलाके में आना, झूले वाले पुल का बनाना, स्थानीय युवती से विवाह बंधन में बंधना और फिर उस पर रोबर्ट हचिन्सन का द राजा ऑफ़ हर्षिल नाम से किताब लिखना, अपने आप में मिथकीय और जासूसी कथाओं की तरह रोमांचक है. विल्सन का पुराना कॉटेज एक दुर्घटना में जल गया था लेकिन जंगलात वालों ने उस जगह पर लगभग उसी तरह का एक कॉटेज बनवाया हुआ है जिसमें उत्तरकाशी और नीचे से आने वाले अधिकारी वगैरह ठहरते हैं. हर्षिल के पुराने निवासी कहते हैं आज जो कॉटेज आप देख रहे हैं हैं वह तो कुछ भी नहीं जो विल्सन के समय की थी. वैसे भी हर पुरानी चीज जो केवल कथाओं में बाख गई हो अपने किस्सों में बड़ा आकार ले ही लेती है. संभव है विल्सन के कॉटेज के साथ ही यह रहा हो. अलबता, कहने को हर्षिल की ख़ूबसूरती ने राजकपूर सरीखे फिल्मकार को अपनी ओर आकर्षित किया और गंगोत्री धाम जाने वालों तीर्थयात्रियों को भी पर कायदे से इस हर्षिल गाँव को देखने के लिए एक दिन भी पूरा है और महसूसने के लिए हफ्ता भी कम है. हर्षिल महसूसने की जगह है. यहाँ की सुबह-दोपहर-शाम तय कीजिए
अहले सुबह की चाय के बाद भागीरथी के फैलाव के साथ किनारे-किनारे दूर तक ढलानों पर तने खड़े खुशबूदार देवदार से बतियाते और उनको अपने नथुनों में भरते जाईये और लौटते हुए मुख्य सड़क पर किसी छोटी धुएं की काली पड़ी दीवारों वाली टपरी के बाहर ताज़ी उतर रही धूप में खड़े चम्मच की दालचीनी अदरक वाली चाय को बंद बटर और ऑमलेट के साथ सुबह का नाश्ता करते हुए अपने कॉटेज लौट आइए. हर्षिल के मुख्य बजर से एक पतली से गली हर्षिल के डाकघर तक जाती है. कहने को यह डाकघर के नाम पर पुरानेपन का एकमात्र ढांचा भर है पर सिनेमाप्रेमी खासकर 'राम तेरी गंगा मैली' वाले इस डाकघर के पास अपनी तस्वीर खिंचवाने का लोभ नहीं छोड़ पाते क्योंकि समय और बाज़ार ने जब जीवन में, प्रकृति में हर ओर एक तरह की तब्दीली कर दी है, वैसे में यह डाकघर समय के उसी बिंदु पर वैसे ही अक्षुण्ण खड़ा है जैसा कि राजकपूर ने अस्सी के दशक में सिनेमा बनाते हुए छोड़ा था. डाक विभाग को भी मोबाइल के ज़माने में बहुत जल्दी नहीं है इस चालू डाकघर को बदलने की और शायद इस छोटे और समय के एक बिंदु पर ठहरे हुए इस एकमात्र दृश्य को उस चाय की दुकान के बाहर के पटरे पर बैठे घंटों ताका जा सकता है क्योंकि कुछ चीजें ठहरी हुई अधिक सुंदर लगती हैं. अब बेशक चिट्ठियाँ बहुत नहीं आती-जाती पर सुदूर इलाके में इसके खम्भे पर टिक्के लेटरबॉक्स का मुँह  मुस्कुराते हुए खुला रहता है, राजकपूर की नायिका ने इसी के पास डाकबाबू को दिक् किया था - 'पहाड़ों की डाक व्यवस्था भी अजीब है डाक बाबू, आने वाले पहले आ जाते हैं और उनके आने की खबर देने वाली चिट्ठियाँ बाद में'. यह हर्षिल का वही सुंदर डाकघर है जो व्यक्तिगत तौर पर मुझे और ऋचा को बेहद पसंद है.
हर्षिल की दुपहरी बाजार से बाहर रेजिमेंट एरिया से निकल पर विल्सन के कॉटेज के पीछे बहते पहाड़ी झरने को पार करके उस गाँव की जाने का समय है जहाँ स्थानीय बुनकर ऊनी दस्ताने, स्वेटर, बंडी, मोज़े, मफलर, टोपी, अचार, मुरब्बे आदि बनाकर बेचते हैं. यह सब हर्षिल के स्थानीय बाजार के अलावा बाहर भी भेजी जाती हैं. मेरे लिए इस इलाके का सबसे सुन्दर समय अक्टूबर तय है क्योंकि ठण्ड की बहुतायत न होने की वजह से सफ़ेद धूप खिलती मिलती है, आसपास सस्ते सेब खूब मिलते हैं और रास्ते खुले होने की वजह से आप उन जगहों पर आसानी से घूम आते हैं जो सामान्यत: बर्फ के मौसम में आप नहीं देख सकते. वैसे भी पहाड़ों में बर्फ एक किस्म का रंग भर देती है और आप उसके परे जाकर उस इलाके की वास्तविक ख़ूबसूरती नहीं देख पाते हैं. हर्षिल में भी खूब बर्फ़बारी होती है लेकिन हर्षिल के रंग अक्टूबर-नवंबर में ही अधिक चटख दिखेंगे और जो रंगों का वैविध्य लिए होते हैं. दोपहर की गढ़वाली कढ़ी, चावल के भोजन के बाद, शाम दूसरी दुनिया में ले जाती है. वैसे जिन महानुभावों को माँसाहार और मदिरा का शौक हो उनके लिए भी हर्षिल मुफीद जगह है क्योंकि गंगोत्री से छह कोस से अधिक की दूरी और दो रेजिमेंट्स के बीच बसे होने की खासियत ने कुछ सहूलियत यहाँ प्रदान कर रखी है. हर्षिल वैसे भी आपको बहुत कुछ एडवेंचर्स के लिए आमंत्रित नहीं करती बल्कि वह आपको अपने भीतर की कृत्रिमता से बाहर खींच लेती है जहाँ आपके शहर का जंग लगा इंसान झटके से नया हो उठता है. हमलोगों के लिए वही तो स्थिति थी. यहाँ विज्ञापनों वाली पर्वतीय दुनिया से अलग करने-महसूसने को बहुत कुछ न होने की स्थिति में भी वह क्या है जो हर्षिल के लिए अपना प्यार और दैवीय आकर्षण बनाये रखा है. उस शाम मुख्य सड़क से टहल कर आते भागीरथी के पुल के ऊपर सनसन बहती बर्फीली हवा और नदी के शोर से अधिक उस पुल पर बंधे कपड़ों के तिकोनों की फरफराहट के बीच जोगी रुक कर बोला 'सर यहाँ न माल रोड जैसी चहलकदमी है, न बिजली लट्टुओं की जगमग, न बहुत सुविधाएँ लेकिन कुछ ऐसा है, जिसे मैं हमेशा यहाँ आकर जीना चाहूँगा और शायद यही वह 'कुछ' रहा जिसके लिए सुकी में दो रातें खराब कार के ठीक होने की उम्मीद में टिके होने के बावजूद हमें हर्षिल ले आया.
हर्षिल का राजा - फ्रेडरिक 'पहाड़ी' विल्सन - किस्सा अनूठा उर्फ़ जितने मुँह उतनी बातें
हालाँकि फ्रेडरिक 'पहाड़ी' विल्सन को पहाड़ी विल्सन का पुकार नाम उसके इस इलाके के प्रति प्यार की वजह से मिला है और यह ऐतिहासिक रूप से इस इलाके में आया सच्चा किरदार है लेकिन राबर्ट हचिसन ने लिखा है कि यदि आप इस इलाके में विल्सन की कथा सुनने निकलते हैं तो सबसे बड़ी समस्या यह है कि छह लोगों के पास छह किस्म की कहानी है लेकिन उनमें किंचित समानता होते हुए भी पर्याप्त भेद भी है. पर यह ज्ञात तथ्य है कि उसकी दो पत्नियाँ थी जो पास के ही पड़ोसी गाँव मुखबा की थीं. पहली रैमत्ता से कोई संतान न होने की स्थिति में उसने सुगरामी(गुलाबी) से विवाह किया और जिससे उसके तीन बेटे - नथनिअल, चार्ल्स और हेनरी हुए. हर्षिल और मुखबा के स्थानीय नागरिक उन्हें स्थानीय उच्चारण के हिसाब से नाथू, चार्ली साहिब और इंद्री कहा करते थे. हर्षिल में विल्सन की आमद कैसे हुई थी यह बाद बहुत स्पष्ट नहीं है. कोई कहता अंग्रेजों की पलटन का निकाला हुआ सिपाही या अधिकारी था तो कोई किसी और कथा का आधार देता. मसलन, वह योर्कशायर के मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता था और अपने को व्यापारी, फोरेस्टर या कॉन्ट्रेक्टर कहा करता लेकिन इतना जरुर है कि इधर के इलाके में सेब कीई खेती और झूला पुल बनाने की कारीगरी विल्सन की प्रसिद्धि का बड़ा कारण रही है. विल्सन ने गंगोत्री और हर्षिल के बीच भैरोघाटी के पास एक संस्पेंशन ब्रिज का निर्माण किया था, जिसपर से आरपार जाने में स्थानीय नागरिकों की आनाकानी और अविश्वास को देखते हुए उसने अपने घोड़े पर चढ़कर इस पार से उसपार जाकर जनता में वह विश्वास बहल किया कि इस झूला पुल से घाटी और नदी के प्रबल और भयावह प्रवाह को पार किया जा सकता है. उस रात की डिनर के समय मेरे, ऋचा, पीकू, ऋचा के मम्मी-पापा ने विल्सन के बारे जानने का मन बनाया और रात के लिए गर्म पानी पहुँचाने आए मध्यवर्गीय उम्र वाले वेटर से जब मैंने यह सवाल किया कि पहाड़ी विल्सन के बारे में कुछ बताओ? उसने फ़िल्मी रहस्य ओढने के बाद मुझी से पूछा - 'आप कैसे जानते हो पहाड़ी राजा विल्सन के बारे में ?  रात में उसके बारे में बार नहीं करना, वह आज भी हर चांदनी रात को अपने घोड़े पर बैठकर रस्सी के झूले वाले पुल से गुजरता है. हर्षिल और मुखबा के अनेक ग्रामीणों ने उसके घोड़े की टापों की आवाज़ देर रात गए सुनी है. वह आज भी इन्हीं पहाड़ों में घूमता है.'- मुझे उसके बताने के तरीके में मजा आ रहा था और वह वेटर अपनी पूरी शक्ति से हमें डराने में लगा हुआ था. विल्सन की कथा हर्षिल के शानदार यादों में से है. एक तो इस किस्से को इस इलाके के लगभग सभी ट्रेवेलर्स ने कमोबेश पढ़ रखा है दूसरे एक दूर दराज के अंग्रेज के स्थानीय महिलाओं से विवाह स्थिर कर ताउम्र यहीं ठहर जाने की प्यारी-सी कथा का सुयोग जो इसमें ठहरा है, जहाँ वह विल्सन से स्थानीय 'हुल्सेन साहिब' बन गया था. गढ़वाल के इस हिस्से में यह अंग्रेज साहिब संभवतः रुडयार्ड किपलिंग के उस कथा 'द मैन हु वुड बी किंग' का आधार बना था, यह मैं नहीं कहता, हचिसन साहिब का कहना है. पर यह तो तय जानिए कि ब्रिटिश आर्मी का एक युवा अधिकारी पहले अफगान युद्ध से लौटकर हिमालय के इस इलाके में आता है और इस इलाके में एक बदलाव की जमीन तैयार करता हुआ किंवदंती बन जाता है. मैं सपरिवार और अपने पहले स्टूडेंट जोगी के साथ हर्षिल बार-बार लौटने की भूमिका रचता हुआ नीचे उतरता हूँ. एक डोर-सी बंधी है मेरे और गढ़वाल के बीच जो दिल्ली रहकर भी लौटा लाने को आतुर है हमेशा. पंच केदार की जमीन हो कि गंगोत्री-गोमुख-तपोवन. हर्षिल वाकई यात्रा का अंत नहीं बल्कि शेष है जो कई दफे भी उस 'शेष' को बचा ही रखती है. सम्पूर्णता वैसे भी मृत्यु है और हर्षिल तो जीवन ही जीवन उसका शेष होना श्रेयस है. यात्रा का दुर्गम हर्षिल में इतना रमणीय हो जाता है कि फिर-फिर लौटने की प्रबल उत्कंठा उस दुर्गम के सुगम मान लेती है. चीला वाली टपरी पर खिर्सू सुनकर हंसने वाले फिर गंगोत्री जाना समझ उस पंडित जी ने किसी दैवयोग से ही कहा होगा - शुभास्तु पंथान: और देखिए वही रहा.                              
                       




3 comments:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन मजदूरों की आवाज़ को सादर नमन : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Anu Shukla said...

बेहतरीन
बहुत खूब!

HindiPanda

मुन्ना के पाण्डेय said...

(मोडरेटर की सहमति के बिना इस ब्लॉग का कोई भी अंश/लेख आदि प्रयोग में न लाएँ। इस संबंध में makpandeydu@gmail.com पर मेल कर सकते हैं। सादर - मोडरेटेर, जन्नत टाकीज़)

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